सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

मानवता शर्मसार है? अग्रिपथ...अग्रिपथ..अग्निपथ!

    फिर वही कहानी...! शवों व असहाय को कंधे पर लादना कोई शौक नहीं और न ही दिखावा है, यह सिर्फ हमारी व्यवस्था द्वारा दी गई चोट है, जिसे भी लोग अपने साथ लाद रहे हैं. हमारी अंधी- बहरी व्यवस्था ने कुछ ऐसा बना दिया है कि प्राय: हर महीने कोई असहाय किसी न किसी को अपने कंाधों पर लादने मजबूर है.इसमें चाहे उस व्यवस्था से जुड़ा हुआ खाखी पहनने वाला पुलिस वाला ही क्यों न हो वह भी इस कमजोर व्यवस्था के आगे झुकने मजबूर है. समाज में रौब का दूसरा रूप माने जाने वाले ऐसे व्यक्ति भी एक अस्पताल में स्ट्रेचर न मिलने के कारण अपनी बूढ़ी मां को कंधे पर बिठालकर चलने विवश हुआ. पुरानो में श्रवण कुमार एक ऐसा पात्र था जिसने अपने माता पिता को चारों धाम के दर्शन कराने के लिये अपने कंाधों पर लेकर घूमता रहा लेकि न आज एक अन्य श्रवण कुमार भी छत्तीसगढ़ के परलकोट में मिला जो हमारी घिसटती व्यवस्था के परिपे्रक्ष्य में -परेशान नजर आया जिसे अपने पिता की संदिग्ध परिस्थितियों मे मौत के बाद उनके शव को पोस्ट मार्टम के लिये अपनी बाइक के पीछे गठरी बांधकर ले जाना पड़ा. अच्छी स्वास्थ्य सेवा, एम्बुलेंस, स्वच्छता, सफाई और अस्पतालों के अच्छे प्रबंधन की पब्लिसिटी पर करोडा़ें रूपये व्यय करने वाली सरकारों के लिये यह शर्म से डूब मरने वाली बात है कि ओडिसा के एक माझंी को अपनी पत्नी के शव को अस्पताल से कई किलोमीटर दूर अपने घर तक कंधे पर लादकर ले जाने मजबूर होना पड़ा. यह भी शर्म की बात है कि वहां की सरकार ने इतनी बड़ी मानवीय त्रुटि होने के बाद उस घटना की सत्यता को छिपाने के लिये कहती है कि अस्पताल में एम्बुलेंस मौजूद था लेकिन मांझी ने उसका उपयोग नहीं किया! इस शर्मनाके हादसे के बाद भी न वहां का प्रशासन संभला और न देश में किसी कर्ताधर्ताओ के कान में जू रेंगा. सिलसिला आगे बढ़ता जा रहा है. एक के बाद एक अन्य घटना फिर उसी उड़ीसा में हुई जब एक शक्स अपनी बेटी का शव कंधे पर लादे अस्पताल से निकला्र यह शख्स ओडिशा के अंगुल जिले का गति धीबर था, जो अपनी पांच साल की बेटी का शव लेकर अस्पताल से बाहर निकला और एक किलोमीटर तक उसे ऐसी कोई मदद नहीं मिली जो उन्हें उनके गांव तक छोड़ पाती. यह वही ओडिशा राज्य का बालासोर अस्पताल है जहां लाश को कंधे पर उठाने के लिए अस्पताल के स्वीपर ने शव के ऊपर खड़े होकर अपने पैरों से उस डेड बाडी का कूल्हा तोड़ा और सारी मानवता को झकजोरते हुए कांधे पर गठरी के रूप में रख लिया.तड़क भड़क, सेवा सुष्रुषा सब पैसों वालों के लिये रह गई है और हमारे अस्पताल तो जैसे सिर्फ उन्हीं लोगों के लिये है जिनके पास चांदी की चमक है. बाकी सब कीड़े मकोड़ें.अस्पताल तो यहां तक कहने से नहीं चूकते कि आप प्रभावशाली है यह बात अगर पहले से पता चल जाती तो आपका इलाज सही ढंग से होता. अस्पताल रूपी कथित दैविक व्यवस्था लोगों को जीवित अवस्था में ही नर्क का परिदृश्य दिखा जाती है फिर यह तो मरने वाले हैं इनके बारे में क्या कहें?. आंध्रप्रदेश की वह घटना भी मानवता को तार -तार करने के लिये काफी है जहां अस्पताल का स्ट्रेचर न मिलने पर एक पत्नी अपने बीमार पति को घसीटकर ले जाने मजबूर हुई. यह महिला अस्पताल के रैंप पर धीरे-धीरे चलते हुए एक हाथ से अपने बीमार और विकलांग पति को खींचते हुए दीवार के सहारे आगे बड़ रही थी. धीरे-धीरे वह पैर घसीटते हुए अस्पताल के रैंप पर चढ़ सकी. यह वाकिया आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के गुंटकाल के सरकारी अस्पताल का है लेकिन यह कहानियां उस आजाद हिन्दुस्तान की भी है जहां आजादी पाने के लिये वीरों ने अपने सीने पर गोलियां खाई और अंग्रेजों की फंासी को भी अपने गले में हार की तरह पहन लिया. बाते हम बड़ी बड़ी करने के आदी हो गये हैं लेकिन हमारी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया वरना मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए कूड़े के ढेर का सहारा लेना नहीं पड़ता. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले जगदीश भील की पत्नी की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई. लेकिन पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे. इन सब घटनाओं को अपनी आंखों से देखने के बाद भी हम क्या यही कहें कि बड़ी बड़ी कोठियों से हिन्दुस्तान की तरक्की दिखाई दे रही है. वास्तविकता यही है कि असली हिन्दुस्तान फुटपाथ पर आबाद है... लेकिन दिक्कत यही है कि ऐसे मुश्किल हालात में भी हम कागजों, रिपोर्टों में तरक्की कर रहे हैं, विज्ञापनों में शाइनिंग इंडिया से लेकर सबका साथ, सबका भरपूर विकास हो रहा है. हमारे पास दिखाने को बहुत कुछ है, और छिपाने को भी बहुत कुछ...! जिस दिन हम छिपाने की कोशिश सबसे कम करना शुरू कर देंगे, समझिएगा कि अब सब कुछ ठीक होने लगा है. इस मुश्किल समाज में यह पंक्तियां ही याद आती हैं...गरीब देश के राज्यों के गली कूचे और गरीब बस्तियों में निकल जाइये या फिर किसी बड़े समारोह के कचरे फेकने वाले स्थल पर विदेशों में घूमने और बार बार े चिल्ला चिल्लकर वोट मांगने वालों को बोलिये कि वे वहां जाकर देखें जहां असल हिन्दुस्तान उन्हें नजर आता है जहां बड़े लोगों की पार्टी के फेके हुए झूटन पर ही उनकी जिदगी गुजरती है जहां उनके गरीब संबन्धी बिना इलाज के तड़प तड़प कर दम तोड़ते हैं तथा अर्थियां भी ऐसे ही बेनाम किसी एक संबन्धी के कांधे पर उठकर मुंह चिढाती है कि देखो हिन्दुस्तान तुमने कितनी तरक्की की है!  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

सब कुछ नकली, दवा तो हमें मारने के लिये ही बन रही!


नकली दवाओं के कारोबार में भी हम दुनिया में तीसरा सबसे बड़े देश के रूप में शामिल हो गये हैं-इस संकेत ने मानव जीवन को ही खतरे में डाल दिया है.खाने पीने की हर वस्तु हो या रोजमर्रे के उपयोग में आने वाली वस्तुएं अथवा इंसान का जीवन बचाने के लिये उपयोग में आनी वाली दवाएं सभी का उपयोग अब धीरे धीरे हमारे जीवन के लिये खतरा बनता जा रहा है.हाल ही कुछ ऐसे वीडियों वायरल हुए है जो यह दर्शाते हैं कि देश में भारी संख्या में नकली खाद्य सामग्रियां बनाई जा रही  है तथा उसकी खपत भी हो तेजी से हो रही है. एक वीडियों में नकली चावल तथा नकली फल तक तैयार करने की विधि बताई गई है.प्लास्टिक को गलाकरहू बहु चावल की प्रक्रिया जहां इंसान की जिंदगी से खिलवाड़ है वहीं बंद गोभी तक को  प्लस्टिक से तैयार कर बाजार में उतारना लोगों की कमाई का जरिया हो गया  है.दिल्ली के एक  परिवार ने ऐसे ही एक बंद गोभी से छिलका निकालकर यह साबित कर दिया है कि वह गाोभी जो दिखने में हूबहू असली है लेकिन प्लास्टिक की बनी हुई है.खाने पीने की वस्तुओं को एक तरफ रख अगर दवाओं के बारे में बात करें तो प्राय: जीवनरक्षक दवाओं का नकली मार्केट शुरू हो गया है. आखिर यह मिलावट की तकनीक कहां से आ रही है क्या इसके पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है- यह भी विचारणीय प्रश्न है. हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ की राजधानी में फल फ्रूट मार्केट से जो मिलावटी सामग्रियों का जखीरा सामने आया है वह यही इंगित कर रहा है कि व्यक्ति जिन वस्तुओं को अपने स्वास्थ्य वर्धन के लिये कर रहा है वह वास्तव में स्लो पाइजन है. केला सहित अनेक  फल सब्जियों में किसी न किसी केमिकल का उपयोग किया जा रहा है. यहां तक कि अंडा और मीठ तक में भारी मिलावट है.नकली प्लास्टिक का अंडा बाजार में आने लगा ह,ै इसकी पुष्टि भी कई जगह हुई है.देश में बिकने वाली दवाओं में 0.1 प्रतिशत से 0.3 प्रतिशत तक नकली हैं वहीं, चार से पांच प्रतिशत दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरती. नकली दवाओं में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक बेची जा रही है, क्योंकि इनपर मोटा मुनाफा मिलता है. केंद्र सरकार के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में ये तथ्य सामने आए हैं. दिल्ली में बुधवार से शुरू हुए 'इंटरनेशनल ऑथेंटिकेशन कॉन्फ्रेंसÓ में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन का कहना है कि नकली दवाओं के विश्वसनीय आंकड़ों पर अब तक सर्वेक्षण नहीं हुआ था.अब  सरकार ने देशभर से 47 हजार नमूने एकत्र किए जिसमें पता चला कि  नकली दवाओं में एंटीबायोटिक के बाद एंटीबैक्टीरियल दवाओं का स्थान ह.ै निर्यात से पहले सभी दवाओं के नमूनों की जांच होती है ऐसी दवाओं के लिए ड्रग ऑथेंटिकेशन एंड वेरिफिकेशन एप्लिकेशन ('दवाÓ एप) भी बनाया गया है. चारकोल से बनी दर्द निवारक दवाएं, जहरीले आर्सेनिक वाली भूख मिटाने की दवा के रूप में बेची जाती हैं.ऐसी दवाओं से मौत भी हो सकती है.चीन, जापान, पाक, ब्राजील, मैक्सिको, कनाडा नकली दवाओं के लिए चर्चित हैं.यह भी पता चला हे कि  दवा के नाम का कॉपीराइट नहीं किया जाता. रजिस्ट्रेशन नहीं होता तथा लैब में परीक्षण भी नहीं होता.नकली दवाओं का कारोबार कितनी तेजी से दुनिया को अपने आगोश में ले रहा है यह बताने के लिये यही काफी है कि नकली दवाओं का कारोबार 2017 के अंत तक सात खरब रुपये तक पहुंच सकता है.पूरे देश में 10500 के करीब दवा कंपनियां पंजीकृत हैं भारत में दवा बाजार 1.10 लाख करोड़ रुपये का है देश में मौजूद दवाओं में करीब 12.5-25प्रतिशत  तक दवाएं नकली हैं तथा दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा, एमपी, गुजरात बड़े बाजार नकली दवाओं के कारोबार के गढ़ बने हुए हैं.चिकित्सक लंबे समय तक एक ही दवा के इस्तेमाल से दवा असर न करने पर उसे नकली मानकर दूसरी दवा लिखकर दे देते हैं फिर उससे आदमी ठीक हुआ तो ठीक वरना उसकी किस्मत. देश  में इंसान की समय से पूर्व मौत के पीछे जहरीली नकली दवा बन गया है. यह मनुष्य की हत्या जैसा क्रिमिनल अपराध है इसमें उस व्यक्ति को फांसी जैसी सजा का प्रावधान होना चाहिये जो इसे बनाता है.आम आदमी को जहां नकली खाद्य पदार्थो के बारे में पूर्ण सतर्कता की जरूरत हैं वहीं सरकार को भी चाहिये कि वह इंसान को मारने वाला जहर बेचने वालों के खिलाफ ठीक उसी रतरह का व्यवहार करें जो किसी बड़े क्रिमिनल के साथ होता है.कुछ कंपनियों ने बार कोडिंग और ग्लोसाइन स्टिकर का इस्तेमाल शुरू किया है, लेकिन यह प्रयोग अभी तक जेनेरिक दवाओं में नहीं किया गया है. सभी किस्म की दवाओं में यह व्यवस्था तत्काल कठोरता से लागू करना जरूरी है.