सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

मानवता शर्मसार है? अग्रिपथ...अग्रिपथ..अग्निपथ!

    फिर वही कहानी...! शवों व असहाय को कंधे पर लादना कोई शौक नहीं और न ही दिखावा है, यह सिर्फ हमारी व्यवस्था द्वारा दी गई चोट है, जिसे भी लोग अपने साथ लाद रहे हैं. हमारी अंधी- बहरी व्यवस्था ने कुछ ऐसा बना दिया है कि प्राय: हर महीने कोई असहाय किसी न किसी को अपने कंाधों पर लादने मजबूर है.इसमें चाहे उस व्यवस्था से जुड़ा हुआ खाखी पहनने वाला पुलिस वाला ही क्यों न हो वह भी इस कमजोर व्यवस्था के आगे झुकने मजबूर है. समाज में रौब का दूसरा रूप माने जाने वाले ऐसे व्यक्ति भी एक अस्पताल में स्ट्रेचर न मिलने के कारण अपनी बूढ़ी मां को कंधे पर बिठालकर चलने विवश हुआ. पुरानो में श्रवण कुमार एक ऐसा पात्र था जिसने अपने माता पिता को चारों धाम के दर्शन कराने के लिये अपने कंाधों पर लेकर घूमता रहा लेकि न आज एक अन्य श्रवण कुमार भी छत्तीसगढ़ के परलकोट में मिला जो हमारी घिसटती व्यवस्था के परिपे्रक्ष्य में -परेशान नजर आया जिसे अपने पिता की संदिग्ध परिस्थितियों मे मौत के बाद उनके शव को पोस्ट मार्टम के लिये अपनी बाइक के पीछे गठरी बांधकर ले जाना पड़ा. अच्छी स्वास्थ्य सेवा, एम्बुलेंस, स्वच्छता, सफाई और अस्पतालों के अच्छे प्रबंधन की पब्लिसिटी पर करोडा़ें रूपये व्यय करने वाली सरकारों के लिये यह शर्म से डूब मरने वाली बात है कि ओडिसा के एक माझंी को अपनी पत्नी के शव को अस्पताल से कई किलोमीटर दूर अपने घर तक कंधे पर लादकर ले जाने मजबूर होना पड़ा. यह भी शर्म की बात है कि वहां की सरकार ने इतनी बड़ी मानवीय त्रुटि होने के बाद उस घटना की सत्यता को छिपाने के लिये कहती है कि अस्पताल में एम्बुलेंस मौजूद था लेकिन मांझी ने उसका उपयोग नहीं किया! इस शर्मनाके हादसे के बाद भी न वहां का प्रशासन संभला और न देश में किसी कर्ताधर्ताओ के कान में जू रेंगा. सिलसिला आगे बढ़ता जा रहा है. एक के बाद एक अन्य घटना फिर उसी उड़ीसा में हुई जब एक शक्स अपनी बेटी का शव कंधे पर लादे अस्पताल से निकला्र यह शख्स ओडिशा के अंगुल जिले का गति धीबर था, जो अपनी पांच साल की बेटी का शव लेकर अस्पताल से बाहर निकला और एक किलोमीटर तक उसे ऐसी कोई मदद नहीं मिली जो उन्हें उनके गांव तक छोड़ पाती. यह वही ओडिशा राज्य का बालासोर अस्पताल है जहां लाश को कंधे पर उठाने के लिए अस्पताल के स्वीपर ने शव के ऊपर खड़े होकर अपने पैरों से उस डेड बाडी का कूल्हा तोड़ा और सारी मानवता को झकजोरते हुए कांधे पर गठरी के रूप में रख लिया.तड़क भड़क, सेवा सुष्रुषा सब पैसों वालों के लिये रह गई है और हमारे अस्पताल तो जैसे सिर्फ उन्हीं लोगों के लिये है जिनके पास चांदी की चमक है. बाकी सब कीड़े मकोड़ें.अस्पताल तो यहां तक कहने से नहीं चूकते कि आप प्रभावशाली है यह बात अगर पहले से पता चल जाती तो आपका इलाज सही ढंग से होता. अस्पताल रूपी कथित दैविक व्यवस्था लोगों को जीवित अवस्था में ही नर्क का परिदृश्य दिखा जाती है फिर यह तो मरने वाले हैं इनके बारे में क्या कहें?. आंध्रप्रदेश की वह घटना भी मानवता को तार -तार करने के लिये काफी है जहां अस्पताल का स्ट्रेचर न मिलने पर एक पत्नी अपने बीमार पति को घसीटकर ले जाने मजबूर हुई. यह महिला अस्पताल के रैंप पर धीरे-धीरे चलते हुए एक हाथ से अपने बीमार और विकलांग पति को खींचते हुए दीवार के सहारे आगे बड़ रही थी. धीरे-धीरे वह पैर घसीटते हुए अस्पताल के रैंप पर चढ़ सकी. यह वाकिया आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के गुंटकाल के सरकारी अस्पताल का है लेकिन यह कहानियां उस आजाद हिन्दुस्तान की भी है जहां आजादी पाने के लिये वीरों ने अपने सीने पर गोलियां खाई और अंग्रेजों की फंासी को भी अपने गले में हार की तरह पहन लिया. बाते हम बड़ी बड़ी करने के आदी हो गये हैं लेकिन हमारी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया वरना मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए कूड़े के ढेर का सहारा लेना नहीं पड़ता. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले जगदीश भील की पत्नी की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई. लेकिन पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे. इन सब घटनाओं को अपनी आंखों से देखने के बाद भी हम क्या यही कहें कि बड़ी बड़ी कोठियों से हिन्दुस्तान की तरक्की दिखाई दे रही है. वास्तविकता यही है कि असली हिन्दुस्तान फुटपाथ पर आबाद है... लेकिन दिक्कत यही है कि ऐसे मुश्किल हालात में भी हम कागजों, रिपोर्टों में तरक्की कर रहे हैं, विज्ञापनों में शाइनिंग इंडिया से लेकर सबका साथ, सबका भरपूर विकास हो रहा है. हमारे पास दिखाने को बहुत कुछ है, और छिपाने को भी बहुत कुछ...! जिस दिन हम छिपाने की कोशिश सबसे कम करना शुरू कर देंगे, समझिएगा कि अब सब कुछ ठीक होने लगा है. इस मुश्किल समाज में यह पंक्तियां ही याद आती हैं...गरीब देश के राज्यों के गली कूचे और गरीब बस्तियों में निकल जाइये या फिर किसी बड़े समारोह के कचरे फेकने वाले स्थल पर विदेशों में घूमने और बार बार े चिल्ला चिल्लकर वोट मांगने वालों को बोलिये कि वे वहां जाकर देखें जहां असल हिन्दुस्तान उन्हें नजर आता है जहां बड़े लोगों की पार्टी के फेके हुए झूटन पर ही उनकी जिदगी गुजरती है जहां उनके गरीब संबन्धी बिना इलाज के तड़प तड़प कर दम तोड़ते हैं तथा अर्थियां भी ऐसे ही बेनाम किसी एक संबन्धी के कांधे पर उठकर मुंह चिढाती है कि देखो हिन्दुस्तान तुमने कितनी तरक्की की है!  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

सब कुछ नकली, दवा तो हमें मारने के लिये ही बन रही!


नकली दवाओं के कारोबार में भी हम दुनिया में तीसरा सबसे बड़े देश के रूप में शामिल हो गये हैं-इस संकेत ने मानव जीवन को ही खतरे में डाल दिया है.खाने पीने की हर वस्तु हो या रोजमर्रे के उपयोग में आने वाली वस्तुएं अथवा इंसान का जीवन बचाने के लिये उपयोग में आनी वाली दवाएं सभी का उपयोग अब धीरे धीरे हमारे जीवन के लिये खतरा बनता जा रहा है.हाल ही कुछ ऐसे वीडियों वायरल हुए है जो यह दर्शाते हैं कि देश में भारी संख्या में नकली खाद्य सामग्रियां बनाई जा रही  है तथा उसकी खपत भी हो तेजी से हो रही है. एक वीडियों में नकली चावल तथा नकली फल तक तैयार करने की विधि बताई गई है.प्लास्टिक को गलाकरहू बहु चावल की प्रक्रिया जहां इंसान की जिंदगी से खिलवाड़ है वहीं बंद गोभी तक को  प्लस्टिक से तैयार कर बाजार में उतारना लोगों की कमाई का जरिया हो गया  है.दिल्ली के एक  परिवार ने ऐसे ही एक बंद गोभी से छिलका निकालकर यह साबित कर दिया है कि वह गाोभी जो दिखने में हूबहू असली है लेकिन प्लास्टिक की बनी हुई है.खाने पीने की वस्तुओं को एक तरफ रख अगर दवाओं के बारे में बात करें तो प्राय: जीवनरक्षक दवाओं का नकली मार्केट शुरू हो गया है. आखिर यह मिलावट की तकनीक कहां से आ रही है क्या इसके पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है- यह भी विचारणीय प्रश्न है. हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ की राजधानी में फल फ्रूट मार्केट से जो मिलावटी सामग्रियों का जखीरा सामने आया है वह यही इंगित कर रहा है कि व्यक्ति जिन वस्तुओं को अपने स्वास्थ्य वर्धन के लिये कर रहा है वह वास्तव में स्लो पाइजन है. केला सहित अनेक  फल सब्जियों में किसी न किसी केमिकल का उपयोग किया जा रहा है. यहां तक कि अंडा और मीठ तक में भारी मिलावट है.नकली प्लास्टिक का अंडा बाजार में आने लगा ह,ै इसकी पुष्टि भी कई जगह हुई है.देश में बिकने वाली दवाओं में 0.1 प्रतिशत से 0.3 प्रतिशत तक नकली हैं वहीं, चार से पांच प्रतिशत दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरती. नकली दवाओं में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक बेची जा रही है, क्योंकि इनपर मोटा मुनाफा मिलता है. केंद्र सरकार के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में ये तथ्य सामने आए हैं. दिल्ली में बुधवार से शुरू हुए 'इंटरनेशनल ऑथेंटिकेशन कॉन्फ्रेंसÓ में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन का कहना है कि नकली दवाओं के विश्वसनीय आंकड़ों पर अब तक सर्वेक्षण नहीं हुआ था.अब  सरकार ने देशभर से 47 हजार नमूने एकत्र किए जिसमें पता चला कि  नकली दवाओं में एंटीबायोटिक के बाद एंटीबैक्टीरियल दवाओं का स्थान ह.ै निर्यात से पहले सभी दवाओं के नमूनों की जांच होती है ऐसी दवाओं के लिए ड्रग ऑथेंटिकेशन एंड वेरिफिकेशन एप्लिकेशन ('दवाÓ एप) भी बनाया गया है. चारकोल से बनी दर्द निवारक दवाएं, जहरीले आर्सेनिक वाली भूख मिटाने की दवा के रूप में बेची जाती हैं.ऐसी दवाओं से मौत भी हो सकती है.चीन, जापान, पाक, ब्राजील, मैक्सिको, कनाडा नकली दवाओं के लिए चर्चित हैं.यह भी पता चला हे कि  दवा के नाम का कॉपीराइट नहीं किया जाता. रजिस्ट्रेशन नहीं होता तथा लैब में परीक्षण भी नहीं होता.नकली दवाओं का कारोबार कितनी तेजी से दुनिया को अपने आगोश में ले रहा है यह बताने के लिये यही काफी है कि नकली दवाओं का कारोबार 2017 के अंत तक सात खरब रुपये तक पहुंच सकता है.पूरे देश में 10500 के करीब दवा कंपनियां पंजीकृत हैं भारत में दवा बाजार 1.10 लाख करोड़ रुपये का है देश में मौजूद दवाओं में करीब 12.5-25प्रतिशत  तक दवाएं नकली हैं तथा दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा, एमपी, गुजरात बड़े बाजार नकली दवाओं के कारोबार के गढ़ बने हुए हैं.चिकित्सक लंबे समय तक एक ही दवा के इस्तेमाल से दवा असर न करने पर उसे नकली मानकर दूसरी दवा लिखकर दे देते हैं फिर उससे आदमी ठीक हुआ तो ठीक वरना उसकी किस्मत. देश  में इंसान की समय से पूर्व मौत के पीछे जहरीली नकली दवा बन गया है. यह मनुष्य की हत्या जैसा क्रिमिनल अपराध है इसमें उस व्यक्ति को फांसी जैसी सजा का प्रावधान होना चाहिये जो इसे बनाता है.आम आदमी को जहां नकली खाद्य पदार्थो के बारे में पूर्ण सतर्कता की जरूरत हैं वहीं सरकार को भी चाहिये कि वह इंसान को मारने वाला जहर बेचने वालों के खिलाफ ठीक उसी रतरह का व्यवहार करें जो किसी बड़े क्रिमिनल के साथ होता है.कुछ कंपनियों ने बार कोडिंग और ग्लोसाइन स्टिकर का इस्तेमाल शुरू किया है, लेकिन यह प्रयोग अभी तक जेनेरिक दवाओं में नहीं किया गया है. सभी किस्म की दवाओं में यह व्यवस्था तत्काल कठोरता से लागू करना जरूरी है.





रविवार, 15 जनवरी 2017

नाव पलटी,दर्जनों मरें....कौन है ऐसे हादसों के लिये जिम्मेदार


यह एक मानवीय प्रवृति बन गई है कि देर से पहुंचे...बस में चढऩा है तो दौड़ के चढ़े, ट्रेन में चढऩा हो तो यहां भी दौड़ लगाये.-प्लेन मिस हो जाये तो सर पर हाथ पकड़कर बैठ जाओं...कभी लाइन में खड़े रहकर सब्र करने की जगह एक दूसरे को धक्का देकर आगे बढऩे की कोशिश में तो कभी कभी बहुत कुछ हो जाता है. यह सब कई सालों से होता आ रहा है इस चक्कर में कइयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. शनिवार को बिहार की राजधानी पटना में मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर आयोजित पतंग उत्सव में भाग लेकर लौट रही एक नाव गंगा नदी में डूब गई. रविवार की सुबह और दोपहर तक शवों को नदी से निकालने का सिलसिला चलता रहा. कम से कम दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे गये. सिर्फ किसी की जिद और किसी की दादागिरी और किसी की लापरवाही के कारण. नाव में जबरन ज्यादा लोग घुस आये थे. नाविक बार बार गिड़गिड़ाता रहा कि ज्यादा लोग चढ़ जाओंगे तो नाव पलट जायेगी लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी और नाव में इतने लोग चढ़ गये कि वह बजन को झेल नहीं सका और नाव पलट गई.नेता दुख जता रहे हैं-प्रशासन अब किसी पर जिम्मेदारी थोपने की कोशिश कर रहा है तथा संपूर्ण मामले की लीपापोती करने का सिलसिला चल पड़ा है है. नाव में 50 से ज्यादा लोग सवार थे.अब यह कहा जा रहा है कि प्रशासनिक लापरवाही से यह हादसा हुआ. कोई यह नहीं कह रहा कि छोटी सी नाव में ज्यादा लोगों के जबरदस्ती ओर दादागिारी से चढऩे के कारण यह हादसा हुआ. बिहार से आने वाली ट्रेनों में हम देखते हैं कि कैसे लोग ठूस ठूसकर भरे रहते हैं फिर इस हादसें में हम किसे दोषी समझे? इसमें दो मत नहीं कि प्रशासन,पुलिस,सरकार हर जगह मौजूद नहीं रह सकती लेकिन जब बड़े आयोजन होते हैं तो भीड़ भी ऐसी ही जुटती है इसेे ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि लोगों की सुरक्षा का प्रबंध भी वैसा ही किया जाये. बिहार सरकार और समर्थित पार्टी दोनो मकर संक्रान्ति पर चूड़ा दही खाने में लगे थे तब लोग नदी में डूबकर बचाओं बचाओं चिल्ला रहे थे. मकर संक्रांति पर इतने बड़े आयोजन में नदी पार करने वालों के सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम न करना भी प्रशासन की अक्षमता का ही परिचायक है. महज कुछ दिनों पहले ही यहां सरकार ने प्रकाश पर्व का शानदार आयोजन कर हर तरफ से वाहवाही लूटी थी अब लोग यही पूछ रहे हैं कि बिहार सरकार और प्रशासन से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? प्रकाश पर्व आयोजन से संबंधित तैयारियों की निगरानी खुद मुख्यमंत्री के अलावा मुख्य सचिव और डीजीपी स्तर के अधिकारी  कर रहे थे जबकि पतंग उत्सव की तैयारियों को लेकर इस तरह का कोई दावा नहीं किया गया था. आयोजन स्थल के पास में ही बने डॉल्फिन आइलैंड अम्यूज़मेंट पार्क को भी हादसे की बड़ी वजह माना जा रहा है. जिस जगह पर सरकार ने पंतगबाजी का आयोजन किया था उससे थोड़ी ही दूरी पर ये अम्यूज़मेंट पार्क भी है, जहां लोग अधिक संख्या में मौजूद थे. स्थानीय लोगों के मुताबिक जो नाव डूबी, उस पर सवार लोगों में भारी संख्या इस अम्यूज़मेंट पार्क में घूमने आए लोगों की थी. इस अम्यूज़मेंट पार्क का निर्माण अवैध है इसे बिना किसी सरकारी या प्रशासनिक मंज़ूरी के ही बनाया गया है. वैसे आगे आने वाले समय में इस मामले की जांच होगी और पूर्व के हादसों के तरह इसके भी कुछ परिणाम निकलकर आयेंगे लेकिन जिनको यह क्षति हुई है वह अपूरणीय है. जिसमें गलती भी उनके अपने लोगो की  लगती हैचूंकि नाव में क्षमता से ज्यादा लोग सवार थे.नाव में ज्यादा लोग सवार न हो इसका निर्णय करने  वाला कोर्इ नहीं था इससे नाव में पानी घुसने लगा. जिसके बाद नाव नदी में पलट गई.सरकार ने मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपये मुआवजा देने का एलान किया. पीएम मोदी ने भी मृतक के परिजनों को 2 लाख और घायलों को 50 हजार मुआवजा देने का एलान किया है. पंतगबाजी का कार्यक्रम बिहार सरकार का था, प्रशासन अब बिना अनुमति के अम्यूजमेंट पार्क चलाने वालों पर कार्रवाई की तैयारी में है.अन्य हादसों की तरह यह भी कुछ दिनों तक चर्चा में रहेगा और सब फिर नये हादसे का इंतजार करेंगे..ऐसे हादसों को रोकने किसी सरकार ने अब तक क्यों कार्रवाही नहीं की यह भी एक ज्वलंत प्रश्न है.देश में ऐसे हादसों की एक लम्बी फेहरिस्त है किन्तु एहतियाती कार्रवाही  इस संबन्ध में करने के आंकडे गिने चुने ही हैं.



गुरुवार, 12 जनवरी 2017

भ्रष्ट आचरण पर सरकार का कठोर जवाब?

अब तक आम लोगों में एक धारणा रही है कि सरकार की सेवा में रहने वाले आईएएस, आईपीएस,आईएफएस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता लेकिन अब इस धारणा के खत्म होने का संकेत है.भ्रष्ट आचरण के एक मामले में लिप्त छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. अठारह साल पहले जांजगीर के बाराद्वार में हुई पैसठ लाख रूपये की डकैती के एक मामले में छत्तीसगढ़ होमगार्ड आईजी राजकुमार देवांगन पर संलिप्तता के आरोप हैं.इस डकैती के समय देवांगन एसपी थे. उनपर लगे आरोपों के बाद सरकार ने पहले उनपर विभागीय कार्यवाही चलाई थी बाद में उन्हें न केवल वापस लिया गया बल्कि पदोन्नत भी कर दिया.प्रधानमंंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली सीसीए कमेटी ने उनके खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया,इसके बाद राज्य सरकार ने उस आदेश का परिपालन कर नौकरी से बाहर कर दिया. सरकार की तरफ से ऐसा अक्सर होता आया है लेकिन देश की एक प्रमुख सेवा से जुड़े इतने बड़े अफसर पर कार्रवाही का मामला इसलिये महत्वपूर्ण हो गया है कि इसका संदेश अन्य ऐसे लोगों के लिये भी यह चेतावनी की तरह है.उक्त अधिकारी के बारे में जो टिप्पणी जांचकर्ताओं ने की है वह भी अपने आप में महत्वपूर्ण है जिसमें यह कहा गया है कि यह अफसर जनहित की सेवा के लिये अनुपयुक्त है.सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की दिशा में उठाया गया यह कदम देशभर के ऐसे भ्रष्ट लोगों में खलबली मचा सकता है जो अभी इसी श्रेणी में आकर लाइन में हैं.असल में देशभर में ऐसे कई कतिपय अधिकारी आज भी कुर्सी से चिपके बैठे हैं जो अपनी हरकतों से बाज नहीं आते.ऐसे लोग सरकार के कड़े नियमों और कानून को ठेंगा दिखाते हुए सरकार और जनता के पैसे से खेल रहे हैं व अपने व अपने परिवार के लिये संपत्ति बनाने में मशगूल हैं इसका एक सीधा उदाहरण तामिलनाडू के चीफ सेक्रेटरी का है जिनके यहां हाल ही करोडों रूपये की संपत्ति बरामद की गई है. राजकुामर देवांगन का मामला सजा तक पहुंचने में करीब अठारह साल का वक्त लगा इस दौरान उन्हें पदोन्नति भी मिली लेकिन कई ऐसे और भी हैं जिन्हें उन्हीं की तरह पदोन्नति भी मिल रही है और कमाई का सिलसिला भी जारी है. हम अगर छत्तीसगढ़ का उदाहरण दे यहां तीन आईएएस और तीन आईएफएस अफसर का मामला कई समय से लंबित है जबकि हमारे पडौसी राज्य में भी ऐसे कई अफसरों पर भ्रष्ट आचरण के केस चल रहे हैं और पद पर भी बैठे हुए हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार करीब सौ से ज्यादा आईएएस,आईपीएस, आईएफएस अफसरों के मामले पेन्डिंग हैं- असल में होना यही चाहिये कि अपराध की पुष्टि के बाद ऐसे भ्रष्ट व निकम्मे अधिकारियों को सेवा से पूथक कर दिया जाये तत्पश्चात ऐसे व्यक्ति द्वारा कमाई गई संपत्ति को जप्त कर सराकर के खजाने में डाल दिया जाय. ऐसे व्यक्ति के लिये ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि भविष्य में वे किसी दूसरी लोक सेवा का हिस्सा न बने.आज देश में हमारे पास योग्य,कुशल व ईमानदार व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है. हम यहां पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस बयान को उद्घ्रत करते हुए बताना चाहते हैं कि केन्द्र से राज्यो को भेजे जाने वाले एक रूपये में से पन्द्राह पैसा भी मुश्किल से लोगों के पास पहुंच पाता है... तो बाकी पैसा कौन खाता है? जबकि सारा पावर ब्यूरोक्रेट, उनके साथ काम करने वाले अन्य लोगों के पास रहता है जिसमें कुछ सांठगांठ बाहरी लोगों एवं राजनेताओं की भी हो जाती है. सरकार जब तक ऐसे सख्त कदम का सिलसिलेवार शुरू नहीं करेगी तब तक यह कहना कठिन है कि लंबित पड़े प्रकरणों को निपटा देने से इस समस्या का समाधान सदा सदा के लिये खत्म हो जायेंगा. एक अनवरत कार्रवाही जारी रखने की जरूरत है. आईजी जैेस बड़े अधिकारी पर कार्यवाही प्रथमदर्शा गिल्टी पाये जाने वाले अन्य लोगों पर भी होनी चाहिये जो न केवल कठोर हो बल्कि संदेशवाहक भी बने..!