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गरीबी हटाने का लक्ष्य अभी कोसो दूर!

भारत छोड़ो आंदोलन की 75 वीं वर्षगांठ पर संसद में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा था 1991 के बाद हर सरकार के दौर मे प्रगति हुई है प्रगति की दर बढ़ी है. गरीबी भी कम हुई है और जन-जीवन का स्तर भी लेकिन देश की सबसे बड़ी चुनौती गरीबी आज भी है.1991 के बाद नई सरकार ने रास्ता बदलने की कोशिश जरूर की लेकिन गरीबी हटाने का लक्ष्य अभी कोसो दूर है.जन-जीवन का स्तर सुधरा है. किन्तु आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो गरीबी रेखा से नीचे हैं. बड़ी आवश्यकता देश के  संसाधन बढ़े और जहां विकास नहीं हो रहा, उसके लिए काम करें. जिस वर्ग की बात अरूण जेठली ने की थी वह बड़ा वर्ग ऐसा है जो अशिक्षित है ऐसा व्यक्ति काम की कमी के कारण कुछ कार्य नहीं कर पाता उसके दिमाग में कुछ और ही घूमता रहता है.अधिकांश अपराधी प्रवृति की ओर बढ़ते हैं. दूसरा कारण विकास योजनाओं में कमी एवं उदासीनता है जिसके चलते भ्रष्टाचार की स्थिति बनती है .बाल मज़दूरी और दास प्रथा को समाप्त करने कानून जरूर बने लेकिन अमल कितना हुआ?गरीबी का एक बड़ा कारण जो हम देखते हैं वह है कृषी का पिछड़ा होना. उद्योगों को बढ़ावा देने के चक्कर में हम अपने अन्नदाताओ को भूल गय…

ब्रांडेड दवाओं से तेरह गुना तक सस्ती दवा के खिलाफ कौन सी साजिश?

ब्रांडेड दवाओं से तेरह गुना तक सस्ती दवा के खिलाफ कौन सी साजिश?

जैनरिक दवाओं के मामले में भारत की गिनती दुनिया के बेहतरीन देशों में होती है. इस समय भारत  दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा जैनरिक दवाओं  के उत्पादक  वाला देश है किन्तु कितने चिकित्सक ऐसे हैं जो अपनी पर्ची में जैविक दवा लिखते है ? भारत से हर वर्ष करीब बयालीस हजार करोड़ रुपए की जैनरिक दवाएं बाहर दूसरे देशों में जाती है.यूनिसेफ अपनी जरूरत की पचास फीसदी जैनरिक दवाइयां भारत से ही मंगाता है. भारत से कई अफ्रीकी देशों में सस्ती जैनरिक दवाइयां भेजी जाती है तथा आ भी  रही है. इससे यह बात तो साफ है कि भारत में आम जनता के लिए सस्ती जैनरिक दवाइयां आसानी से बनाई व बेची जा सकती हैं किन्तु ऐसा सही ढंग से हो नहीं रहा.जैनरिक दवाओं  पार आम लोगों का विश्वास बढ़ाने और जैविक दवा के इस्तेमाल के लिये प्रेरित करने के लिये यह जरूरी है कि शासन स्तर पर चलाये जाने वाले अस्पताल ये दवाएं अपने मरीजों को मुफ्त में दें तथा प्रायवेट चिकित्सक अपनी पर्ची में कुछ नहीं तो कम से कम एक दवा जरूर लिखे और मरीज के परिवार को भी समझाये कि इससे क्या फायदे हैँ. बहुत से लोगों क…

क्यों बन गये हैं भारत के लिए रोहिग्या सिरदर्द?

एक सरदर्द हमारे ऊपर उस इंटेलिजेंस रिपोर्ट के बाद और बढ़ गया जिसमें कहा गया है कि भारत-म्यांमार बॉर्डर पर कड़ी सुरक्षा के बीच रोहिंग्या मुसलमान पेशेवर तस्करों की मदद से समुद्र के रास्ते देश में घुसपैठ कर सकते हैं. रोहिंग्या मुसलमान स्थानीय एजेंसियों द्वारा उत्पीडऩ और स्थानीय बौद्ध आबादी के साथ उनके विवाद के बाद 2012 से म्यांमार भाग रहे हैं.यहां तक तो ठीक है किन्तु आतंकवादी संगठन इसका फायदा उठाने की कोशिश में लगे हैं. बंगलादेश  शरणार्थियों को झेल चुके भारत के लिये और शरणार्थियों को झेल पाना कठिन ही नहीं सभव भी नहीं है. यूं ही आबादी का बोझ हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है वहीं आंतकवादी गतिविधियों को हम न केवल सीमा पर झेल रहे हैं बल्कि यह हमारी एक आंतरिक समस्या भी बनी हुई है.आज की स्थिति यह है कि 40 हजार रोहिंग्या असम, वेस्ट बंगाल, जम्मू, यूपी और दिल्ली के कैंप में रह रहे हैं.जबकि रोहिंग्या बंगाल जैसे क्षेत्रों से घुसपैठ करने की हर संभव कोशिश में लगे हैें. इसमें यह पहचानना कठिन है कि कौन सही शरणार्थी है और कौन आंतक के खेमे से आकर शामिल हुआ है अत: हमें क्या किसी भी दूसरे देश को भी…

रफतार की नई तकनालाजी...लो आ गई बुलेट ट्रेन!

रफतार की नई तकनालाजी...लो आ गई बुलेट ट्रेन! भारत में इस गुरूवार को जापान और भारत के बीच रफतार की एक नई तकनालाजी का उदय हुआ है. इसमें दो मत नहीं कि जब भी हमारे देश में कुछ इस तरह की तकनालाजी या संस्कृति कदम रखती है तो उसका पहले विरोध होता है जैसा पहले टीवी, कम्पयूटर का हुआ. हाल ही ड्रायवर लेस कार ने ऐसे विरोध को हवा दी. परिवहन मंत्री ने तो यह तक कह दिया कि हम इस कार को भारत की धरती पर कदम रखने नहीं देंगे. इसी कड़ी में अब तेज रफतार से दौडऩे वाली बुलेट ट्रेन भी कई लोगों को रास नहीं आ रही है. इसके पीछे छिपे कुछ कारण भी है जिसपर गौर करने की जरूरत है. भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा होने के बावजूद सुविधाओं, सुरक्षा और किराये के मामले में सदैव आलोचना का शिकार रही है. ऐसे में हाल के कुछ दिनों में आम जनता को लेकर जाने वाली ट्रेनों का बेपटरी होना भी इस नई आधुनिकता को निशाने पर ले रहा है. अहमदाबाद और मुम्बई के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन का फायदा आम जनता को कितना मिलेगा यह अपने आप में प्रश्र है वहीं इसपर खर्च होने वाली राशि पर लगने वाला ब्याज भी किसी को रास नहीं आ रहा है. हम अपने देश में ब…

न्याय में देर है अंधेर नहीं...देरी अब चुभने लगी है!

घिनौने और क्रूर अपराधों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है. इसमें दो मत नहीं कि देश के कानून ने क्रूरतम अपराधों में लिप्त लोगों को बख्शा भी नहीं किन्तु न्याय प्राप्ति में देर अब भी एक समस्या बनी हुई है इसके पीछे मौजूद कारण बताने की जरूरत नहीं. न्यायधीशों की कमी और ज्यादा मामले इसके पीछे एक कारण रहा है. अब धीरे धीरे इस समस्या का समाधान जरूर हो रहा है किन्तु अभी भी अपराध की गति में कोई कमी न आना चिंता का विषय है शायद इसके पीछे एक कारण यह भी है कि हमारा कानून अन्य देशों की बनस्बत कुछ रहम दिल है इसका फायदा उठाकर अपराधी जघन्य अपराध करने से भी नहीं चूकते. बीते वर्षो में कुछेक ऐसे मामले हुए जो मानवता को शर्र्मसार करने वाली थी जिसमें से अधिकांश में आरोपियों को सख्त से सख्त सजा भी मिली. कुछ को तो फांसी पर भी लटकाया गया लेकिन इसके बाद भी अपराधों का ग्राफ कम न होना चिंता का विषय है. इंडियन नेवी के अधिकारी के दो बच्चों गीता चोपड़ा साढ़े16 वर्ष और संजय चोपड़ा 14 वर्ष का 28 अगस्त 1978 को अपहरण और बलात्कार के बाद हत्या हुई- दो अपराधी बिल्ला और रंगा पकड़े गये मुकदमा चला तथा करीब चार साल बाद 31 जनवरी 1982 को…

अब जुड़ेंगी नदियां एक दूसरे से,देर हुई मगर लाभ होगा!

भारत की सारी बड़ी नदियों को आपस में जोडऩे का प्रस्ताव पहली बार इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने 1858 में दिया था.  कॉटन इससे पहले कावेरी, कृष्णा और गोदावरी पर कई डैम और प्रोजेक्ट बना चुके थे लेकिन तब के संसाधनों के बूते से बाहर होने के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.1970 में तब इरिगेशन मिनिस्टर रहे केएल राव ने फिंर देश की नदियों को एक दूसरे से जोडऩे का प्रस्ताव दिया - वे चाहते थे कि एक नेशनल वॉटर ग्रिड बने ताकि गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में जहां ज्यादा पानी रहता है वह  मध्य और दक्षिण भारत के इलाकों में पानी की कमी को पूरा करें. अगर उस समय से यह योजना क्रियान्वित कर दी जाती तो आज देश की खुशहाली इतनी बढ जाती कि देश देखता रह जाता. एक अंदाज लगाइये उस समय से लेकर अब तक देश के उपयोग में लाया जा सकने वाला कितना पानी अब तक बह गया होगा.बहरहाल राव चाहते थे कि उत्तर भारत का अतिरिक्त पानी मध्य और दक्षिण भारत तक पहुंचाया जाए केंद्रीय जल आयोग ने उनकी इस योजना को तकनीकी रूप से अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर दिया.इसके बाद नदी जोड़ परियोजना की चर्चा 1980 में हुई. एचआरडी मिनिस्ट्री ने एक रिपोर्ट तैयार …

पेट्रोल,डीजल की कीमतों में कमी ही हमारी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लायेगी

यू.एस. सहित कुछ देशों में इन्वैंट्री बढऩे और वल्र्ड मार्के ट में सप्लाई बढऩे से 1 महीने में क्रूड 10 प्रतिशत से ज्यादा सस्ता हुआ है इस सप्ताह गुरूवार को क्रूड 49 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया जो पिछले 4 हफ्तों का लो लैवल है, दूसरी ओर इराक ने साफ  कर दिया है कि वह आगे क्रूड प्रोडक्शन बढ़ाने जा रहा है इससे भी कच्चा तेल सस्ता होने से 1 मई को होने वाली तेल मार्कीटिंग कम्पनियों की पाक्षिक समीक्षा के दौरान पैट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम कम होने  की संभावना व्यक्त की जा रही है. कुछ और ओपेक देशों के भी ईराक की राह पर चलने से इंकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल जो स्थिति बनी है वल्र्ड मार्केट में क्रूड सस्ता होने का फायदा इंडियन कंज्यूमर्स को मिलेगा. आगे क्रू्रड और सस्ता होता है तो सरकार पैट्रोल-डीजल की कीमतों को और कम कर सकती है यह जनता की सरकार से उम्मीद भी है.हमारे देश  में शुरू से अर्थव्यवस्था एक तरह से तेल के भावों पर ही निर्भर रहता है. तेल के भाव बढऩे के साथ साथ वस्तुओं के भावों में भी वृद्वि होना शुरू हो जाती है इसमें कुछ वजह तो लोग कृत्रिम रूप  से भी बना लेते हैं जिसका बहाना भी पेट्रोल डीज…

फिर खिसके प्रभु पटरी से....क्यों ढीली है प्रभू की पटरी?

देश में बीते 5 साल में 586 रेल हादसे हुए. इनमें से 53प्रतिशत एक्सीडेंट्स ट्रेन के पटरी से उतरने के चलते हुए शनिवार शाम यूपी के खतौली स्टेशन के पास उत्कल एक्सप्रेस के 12 डिब्बे पटरी से उतरने के चलते 23 लोगों की मौत हो गई और 156 जख्मी हो गए।.रेलवे की इस भीषणतम ट्रेन दुर्घटना की खबर ने दुनिया को चौका दिया तो वहीं जिन परिवारों के साथ बीती उनके होश उड़ गये.घरों से निकलती चीख पुकार और रोने की आवाज ने सबको दहला दिया.यह वही यूपी है जहां पिछले सालों में कई बार रेल दुर्घटनाएं हो चुकी है तथा कई लोग मारे गये हैं. इस बार भी वैसा ही हुआ-पुरी हरिद्वार उत्कल एक्स्सप्रेस  दुर्घटना के समय बताया जा रहा है कि ट्रेन 115 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफतार से दौड़ रही थी-इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि पटरी से उतरने के बाद क्या हुआ होगा. हम तो कल्पना कर सकते हैं लेकिन जिन लोगों ने भी इस नजारे को देखा वह दहल गया. कुछ ही मिनटों में यह खबर सारे चैनलों में वायरल हो गई. चैनलों के संवाददाता और उनके कैमरे घटनास्थल पर पहुंच गये. हमें उनकी सक्रियता की दाद देनी चाहिये लेकिन रेलवे का सुरक्षा तंत्र और उसके अधिकारियों को घटन…

डोकाला विवाद के बाद क्या सब कुछ ठीक!

डोकाला विवाद के बाद क्या सब कुछ ठीक!
यह एक अच्छी खबर इस सप्ताह के शुरू में मिली कि चीन और भारत के बीच डोकाल मामले पर तनाव खत्म हो गया है ओैर दोनों देशों की सेनाओं ने पीछे हटने का निर्णय लिया है. दोनों देश खासतौर से एशिया व अफ्रीका में अपने ढांचेगत संपर्क को बढ़ाने में जुटे हैं. सवाल यह है कि ऐसे कदमों को क्या हम हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ ही देखेंगे? डोका ला विवाद सुलझाने में चीन ने जैसा रवैया दिखाया है और पड़ोसी देशों से जुड़े हमारे संबंध व हितों को लेकर अपनी थोड़ी परिपक्वता का परिचय दिया है, उससे भरोसा होता  है कि भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय वार्ता आगे बढ़ सकती है. इस सप्ताह की शुरूआत में जब भारतीय  विदेश मंत्रालय की तरफ से यह बयान आया कि डोका ला से भारत व चीन, दोनों देशों की सेनाएं लौट रही हैं, तो उसके चंद घंटों पहले ही यह खबर भी आई थी कि गुरमीत राम रहीम के बहाने डोका ला विवाद को लेकर चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत पर तंज कसा है. ग्लोबल टाइम्स  का रुख यही बता रहा था कि चीन अंत तक भारत पर अपनी सेना वापस लौटाने का दबाव बनाता रहा, मगर भारत ने भी अपनी स्थिति साफ कर दी थी कि …

मैरिटल रेप: केन्द्र की दलील मे दम तो है...

मैरिटल रेप: केन्द्र की दलील मे दम तो है...

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में मैरिटल रेप या वैवाहिक बलात्कार को अपराध करार देने के लिए दायर की गई याचिका के खिलाफ़ कहा कि इससे विवाह की संस्था अस्थिर हो सकती है. केन्द्र की दलील में दम है. सरकार ने कहा है कि मैरिटल रेप को अपराध नहीं करार दिया जा सकता है, ऐसा करने से विवाह की संस्था अस्थिर हो सकती है तथा पतियों को सताने के लिए पत्नी के पास ये एक आसान औजार हो सकता है.भारतीय दंड विधान या आईपीसी की धारा 375 के तहत कोई व्यक्ति अगर किसी महिला के साथ अगर इन छह परिस्थितियों में यौन संबन्ध बनाता है तो कहा जाएगा कि रेप किया गया.1. महिला की इच्छा के विरुद्ध 2. महिला की मर्जी के बिना 3. महिला की मर्जी से, लेकिन ये सहमति उसे मौत या नुक़सान पहुंचाने या उसके किसी करीबी व्यक्ति के साथ ऐसा करने का डर दिखाकर हासिल की गई हो.
4. महिला की सहमति से, लेकिन महिला ने ये सहमति उस व्यक्ति की ब्याहता होने के भ्रम में दी हो.
5. महिला की मर्जी से, लेकिन ये सहमति देते वक्त महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं हो या फिर उस पर किसी नशीले पदार्थ का प्रभाव हो और लड़की कंसेट…

ईधन की बढ़ती कीमतें! बर्दाश्त से बाहर..

गुरुवार से पेट्रोल की कीमत में 1.23 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल की कीमत में 89 पैसा प्रति लीटर का इजाफा हो गया. पिछली बार पेट्रोल की कीमत में 1 पैसा प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 44 पैसा प्रति लीटर की वृद्धि हुई थी. इससे पहले 16 अप्रैल को पेट्रोल के दाम में 1.39 रुपये प्रति लीटर और डीजल के दाम में 1.04 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई थी. इस समय आम आदमी की एक बड़ी परेशानी यही है. दाम लगातार बढ़ रहे हैं.इसके बावजूद कि अमरीका और अरब देशों से क्रूड आइल के मामले में समझौते हुए हैं.इस बीच धर्मेन्द्र प्रधान का यह बयान की टैक्स में कोई कमी नहीं होगी लोगो के गुस्से को और बढ़ा रहा है.  जुलाई से अब तक पेट्रोल के मूल्योंं में 6 रुपये की बढौत्तरी हो चुकी है  इस समय पेट्रोल की दर तीन साल के अपने उच्च स्तर पर है. पेट्रोल कीमतों में प्रतिदिन मामूली संशोधन होता है. जो बढ़कर आज उच्च स्तर पर पहुंच रहा है. सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों के आंकड़ों के अनुसार जुलाई की शुरुआत से डीजल की कीमतों में 3.67 रुपये लीटर की बढ़ोतरी हुई है. इस समय डीजल  अपने चार महीने के उच्च स्तर पर है. 16 जून के बाद से सि…

सीबीएस सी कोर्स या बोझ का पिटारा!

सीबीएस सी कोर्स या बोझ का पिटारा! 19 जुलाई 2017 |एंटोनी जोसफ
इस समय सबसे ज्यादा मुसीबत में कोई है तो वह है माता-पिता और किसी भी घर का नन्हा मुन्ना वारिस जो स्कूल प्रबंधन, शिक्षक-शिक्षिकाओं और सरकार के बीच में बुरी तरह फंसा हुआ हैं. सीबीएससी कोर्स एक तरह से शिक्षा न होकर पहाड़ बन गया है, जिसके नीचे दबकर माता-पिता चीख रहे हैं -चिल्ला रहे हैं और बच्चे तड़प रहे हैं. सीबीएससी कोर्स की हकीकत यह है कि उसे न तो बच्चे समझ पा रहे हैं न शिक्षक और न ही कोई ओर! जिनने भी इस पद्धति को बनाया है वे बच्चों के बस्ते में पत्थर की तरह पुस्तकों का ढेर एक तरह से लाद रहे हंै जिसे उठाकर चलने की क्षमता भी उनमे नहीं है, स्कूलों में इतना होमवर्क दे दिया जाता है कि बच्चे घर में न खाना खा पाते हैं न पढ़ पाते हैं न ही खेल कूद की गतिविधियों में भाग ले पाते हैं. वास्तव में देखा जाए तो बच्चों के ऊपर शिक्षा विभाग का या कहे मंत्रालय का या जिसने भी यह कोर्स बनाया है उसका अत्याचार है बल्कि बच्चों के साथ क्रूरता है. एक तरह से सिलेबस इस तरह का तैयार हुआ है कि बच्चे प्रतिदिन कम से कम 10 से 20 किलो तक बोझ स्…

कब तक हम प्रदूषित ध्वनि और जाम की चपेट में फंसे रहेंगे?

कब तक हम प्रदूषित ध्वनि और जाम की चपेट में फंसे रहेंगे?14 दिसम्बर 2016 |एंटोनी जोसफ ·
रोज सुबह तीन से पांच बजे का समय! जब शहरो में लोग गहरी नींद में होते हैं तब आसपास किसी क्षेत्र से या तो फिल्मी गाने की तेज आवाज आती है या फिर कोई माइक लेकर चीखता चिल्लाता हुआ सुनाई देता है. समझ में नहीं आता कि यह आयोजन किसलिये और किसको सुनाने के लिये?. ध्वनि फेकने वाले स्थल से सवेरे मार्निगं वाक पर निकले लोग बताते हैं कि ऐसे लोग टेप लगाकर सो जाते हंै. यह रोज का सिलसिला है.इसके थोड़ी ही देर बाद किसी आस्था केन्द्र से लाउड स्पीकर की तेज आवाज सुबह चिडिय़ों के चहकने की सुरीली आवाज तक को दबा देती है.कानफोडू आवाज के बाद झल्लाकर उठने वाले शहर के लोग काम पर निकलते हैं तो फिर उन्हें हर पग पर ऐसी ही मुसीबतों का सामना करना पड़ता है ऐसे लोग चाहे पैदल जा रहे हो या सायकिल पर अथवा दो पहिया या चार पहिया वाहन पर. शहर में मौजूद ऐसी किस्म की परेशानियां जिसे प्रशासन अनदेखा करता है पीछा ही नहीं छोड़ता. सड़क या गली पर पहुंचते ही दूसरे किस्म की परेशानी उसे घेर लेती है.सार्वजनिक सड़क पर यह बाधा किसी के बर्थड…

महिलाओं की सुरक्षा पर अब कठोर होगा कानून?

महिलाओं की सुरक्षा पर अब कठोर होगा कानून? 21 मार्च 2017 |

भारत भी विश्व की उस सूची में शामिल हैं जहां महिलाएं सुरक्षित नहीं है. हम चौथे स्थान पर हैं जबकि हमारी परंपरा संस्कृति सब महिलाओं को इज्जत और आदर देती रही है.भला जिस देश में जहां,नर में राम और नारी में सीता देखने की संस्कृति रही हो, नदियों को भी माता कहकर पुकारा जाता हो, भगवान के विभिन्न अवतारों, ऋषि-मुनियों, योगियों-तपस्वियों आदि की क्रीड़ा व कर्म-स्थली रही हो, महिला सशक्तिकरण के लिए दिन-रात एक कर दिया गया हो, संसद में भी तेतीस प्रतिशत महिलाओं को बैठाने की तैयारियां चल रही हों, शीर्ष पदों पर महिलाएं विराजमान हों और हर प्रमुख परीक्षा व क्षेत्र में लड़कियों का वस्र्चव स्थापित हो रहा हो,वहां देशभर में एक के बाद एक नाबालिग लडकियों व बेबस महिलाओं के साथ दिल दहलाने वाली शर्मनाक व दरिन्दगी भरे दुष्कर्म की घटनाओं ने यहां तक सोचने के लिए विवश कर दिया कि आखिर इसका अंत क्या है?देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है. हर 9वें मिनट में एक महिला अपन…

नाव पलटी दर्जनों मरें....कौन है ऐसे हादसों के लिये जिम्मेदार?

नाव पलटी दर्जनों मरें....कौन है ऐसे हादसों के लिये जिम्मेदार? 16 जनवरी 2017 |एंटोनी जोसफ
यह एक मानवीय प्रवृति बन गई है कि देर से पहुंचे...बस में चढऩा है तो दौड़ के चढ़े, ट्रेन में चढऩा हो तो यहां भी दौड़ लगाये.-प्लेन मिस हो जाये तो सर पर हाथ पकड़कर बैठ जाओं...कभी लाइन में खड़े रहकर सब्र करने की जगह एक दूसरे को धक्का देकर आगे बढऩे की कोशिश में तो कभी कभी बहुत कुछ हो जाता है. यह सब कई सालों से होता आ रहा है इस चक्कर में कइयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. शनिवार को बिहार की राजधानी पटना में मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर आयोजित पतंग उत्सव में भाग लेकर लौट रही एक नाव गंगा नदी में डूब गई. रविवार की सुबह और दोपहर तक शवों को नदी से निकालने का सिलसिला चलता रहा. कम से कम दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे गये. सिर्फ किसी की जिद और किसी की दादागिरी और किसी की लापरवाही के कारण. नाव में जबरन ज्यादा लोग घुस आये थे. नाविक बार बार गिड़गिड़ाता रहा कि ज्यादा लोग चढ़ जाओंगे तो नाव पलट जायेगी लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी और नाव में इतने लोग चढ़ गये कि वह बजन को झेल नहीं सका और नाव पलट गई.ने…

इतनी धन- संपदा कि..फटी रह गई लोगों की आंखें...!

इतनी धन- संपदा कि..फटी रह गई लोगों की आंखें...!10 जुलाई 2017 |एंटोनी जोसफ
अब यह बात लगभग साफ होने लगी है कि विदेशों में जमा काले धन से कुछ ज्यादा ही माल हमारे देश के कतिपय परिवारों ने जमा कर रखा है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और रेल मंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग सम्हालने वाला व्यक्ति भले ही यह कहें कि उनपर कार्रवाही राजनीति क बदले की भावना से की गई है तो विश्वास करने वाली बात इसलिये भी नहीं है कि छापेमारी के बाद जिस प्रकार दस्तावेज में संपत्ति का ब्योैरा निकलकर सामने आ रहा है वह देश को चौका रहा है.पूर्व मुख्यमंत्री पर करोड़ों रूपये के चारा घोटाले का दाग पहले से लगा हुआ है और यह मामला अब भी पेन्डिंग है. किसी समय देश का बजट इन महानुभावों की संपत्ति के बराबर हुआ करता था जो अब पता चल रहा है कि किस प्रकार लोग सत्तासीन होने के बाद अपनी संपत्त्ति को दुगना- तिगुना करने में लगे रहते हैं.अपने स्वार्थ के लिये देश के लोगों की खरे पसीने की कमाई को यूं दबा देना तो जनता कतई बर्दाश्त नहीं करेगी. सरकार को निष्पक्षता से और भी ऐसे कई लोगों को बेनकाब करने की जरूरत है जो देश को खोखला कर…

वे गर्दन काट रहे और ये...इनमें उनमें क्या अंतर? इंसान हैं या दरिन्दे!

वे गर्दन काट रहे और ये...इनमें उनमें क्या अंतर? इंसान हैं या दरिन्दे!27 अप्रैल 2017 |एंटोनी जोसफ
लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ठीक ही कहा है-''ये मूर्ख माओवादी जवानों को क्यों मारते हैं? ये बिल्कुल आईएसआईएस जैसे हैं. विचित्र सपने पाले कातिलों का एक झुंड हैं ये आईएसआईएस इंसानों का कत्ल क्रूरता की हद तक जाकर करते हैं जबकि सुकमा के जंगलों में कथित रूप से सत्ता पाने की जंग लड़ रहे लोगों की दुष्टता अमानवीयता यह सिद्व करती है कि यह मानवता को जानतेे ही नहीं.शवों तक को नहीं छोड़ते- हिंसक लड़ाई आखिर किसके लिये है? किसके प्रति है? उस सिद्वान्त के प्रति जो 1967 में नक्सलवादियों के जनक चारू मजूमदार, कनू सान्याल और जंगल संताल ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में शुरू किया था? या उनके खिलाफ जो बेचारे अपने बाल बच्चों का भरण पोषण करने दो जून रोटी कमाने के लिये सरकार के हुक्म का पालन कर रहे हैं? कभी आपस में मिल बैठकर यह क्रूरता करने वाले उन जवानों से मिले और उनकी बाते शांतिपूर्वक सुने तो शायद वे उनको गले लगाये बगैर भी नहीं रहेंगे मगर जिस तरह का क्रूर व्यवहार सुकमा जिले के बुरकाप…

आजादी के अड़सठ साल-कुछ लोग सोने की थाली में पैदा हुए तो कुछ धोखा देकर बन गये कुबेर

आजादी के अड़सठ साल-कुछ लोग सोने की थाली में पैदा हुए तो कुछ धोखा देकर बन गये कुबेर 23 फरवरी 2017 |एंटोनी जोसफ
सोचिये!!अगर देश के कतिपय कर्ताधर्ता ईमानदार होते और देश का पैसा देश के लोगों के हित में लगाते तो आज हमारे देश की खुशहाली कैसी रहती? सन् 1947 को देश आजाद होने के बाद से ही देश के अपने लोग ही देश को लूटकर खाने लगे इसमें जहां कतिपय नेता तो थे ही साथ ही ब्यूरोक्रेटस और निचले स्तर के अधिकारियों यहां तक कि तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों तक ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी.

आजादी के अड़सठ साल-कुछ लोग सोने की थाली में पैदा हुए तो कुछ धोखा देकर बन गये कुबेर और कुछ ने सत्ता पाने के बाद देश को ही बेच डाला

कोई रिश्वतखोरी के जरिये देश की गरीब जनता को चूसने लगा तो किसी ने तो उसकी साारी जायदाद और संपत्ति ही हड़प कर उसे कहीं का न छोड़ा. अंग्रेज जब देश को छोड़कर गये तो देश में मुश्किल से कुछ ही करोडपति थे लेकिन आज करोड़पति की बात छोडियें अरबपति भी इतने हो गये कि उंगलियों पर तो गिने ही नहीं जा सकते. हम यह नहीं कहते कि सारे करोडपति या अरबपति बनने वाले देश को लूटकर सफेद नहीं बने …

तो फिर ईव्ही एम को बंद कर बैलेट फिर से लाना चाहिये!

तो फिर ईव्ही एम को बंद कर बैलेट फिर से लाना चाहिये! 15 मार्च 2017 |एंटोनी जोसफ
उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में सभी पार्टी और नेताओं ने एक-दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.सभी ने एक-दूसरे पर पर्याप्त तंज कसे और अपने आप को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की पुरजोर कोशिश की.चुनाव परिणाम आये तो इतना अप्रत्याशित की कई के होश उड गये तो कई फूले नहीं समाये. आखिर यूपी में ऐसा क्या था कि पूरे देश की नजर इस चुनाव पर लगी थी.असल में लोग यहां के परिणाम को नोटबंदी का असर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भविष्य देखने लगे थे, शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री स्वंय इस चुनाव में ऐसे उतरे जैसे खुद चुनाव लड़ रहे हो. मोदी की जनसभाओं में भारी भीड़ की मौजूदगी तो यही संदेश दे रही थी कि उत्तरप्रदेश की जनता परिवर्तन चाहती है लेकिन ऐसा कहीं दिखा नहीं कि सारे रिकार्ड तोड़ दे. समाजवादी पार्टी परिवार में दो फाड़ हुई तो पार्टी भी फट गई. मुलायम- शिवापाल की जोड़ी बनी तो अमरसिंह किनारे हुए और राग भी बदल गये. अखिलेश पार्टी के सर्र्वेे सर्वा बन गयें और उनका कांग्र्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से तालमेल बैठा…