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एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?

एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?
हां यह ठीक है कि नोट बंदी के बाद का एक महीना लाइन में लगते -लगते कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. आज एक महीना बीत चुका है. नवंबर महीने की इसी आठ तारीख को केंद्र सरकार ने  पांच सौ  और हजार रूपये के नोटों का चलन बंद कर देश के हर वर्ग को चौका दिया था. नोटों का चलन  बंद होने से आम और खास सभी किस्म के लोग इसकी चपेट में आ गये. उस समय से बैंको के कामकाज में जहां अंतर आया, एटीएम के सामने अभूतपूर्व भीड़ दिखाई दी वहीं कई एटीएम जहां इस निर्णय के बाद से अब तक खुले नहीं है तो कई में कभी पैसा आता है तो खुलता है और कभी नहीं तो बंद रहता है. नोटबंदी के बाद से विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा.करीब चौरासी  लोगों की मौत का हिसाब मांगा जा रहा है तो  कारोबार बुरी तरह प्रभावित है.कई निजी संस्थानों में कर्मचारियों को महीना बीत जाने  के बाद भी  सेलरी नहीं मिली है.यह सही है कि नोटबंदी ने देश को कैशलेस लेनदेन की ओर एक कदम आगे बढ़ा दिया.एक महीना बीतने के बाद हर कोई इस पूरे एपीसोड़ को तराजू पर तौलता दिखाई दे रहा है..नोटबंदी की घोषणा के बाद देश की 86 प्रतिशत नगदी रातों-रात यूं रद्दी हो जाने से पूंजीपति से लेकर आम इंसान भी प्रभावित हुआ जबकि  सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से लोगों के रहन-सहन, खर्चो में बदलाव आएगा और वह नगदी पर कम आश्रित होंगे.कालाधन बाहर निकलने का दावा सरकारी रिकार्ड पर बहुत अच्छा लग रहा हैं लेकिन जो धन पकड़ा जा रहा है उसमें नये दो हजार, पांच सौ और सौ रूपये के नोट देखकर सभी आश्चर्य चकित हैं. सवाल यह है कि कालाधन है तो उसमें वर्तमान में जारी नये नोट कैसे शामिल हो गये?असल में सरकार की प्लानिंग में कु छ ऐसा छेद रह गया जिसका कालाधन रखने वालों ने खूब उपयोग किया. बंद किये नये नोटों को बदलने में दी गई छूट ने ऐसा मौका कालाबाजारियों को दिया कि सरकार  के गुप्त खेल का पासा ही पलट गया. जो पैसा जनता के हाथ में आना था वह लौटकर फिर कालाबजाारियों के हाथ पहुंच गया.पांच सौ और हजार रूपये हटाने के बाद सरकार कह रही है कि इसके बाद हमारा देश सोने की तरह चमकेगा.ब्याजदर  कम करने के दावे पर आरबीआई ने पानी फेर दिया. कई लोगों ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाया मगर यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इससे क्या फायदा होगा? इंडिया सेंट्रल प्रोग्राम ऑफ द इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर के निदेशक प्रणव सेन ने एक वेबसाइट आइडियास फॉर इंडिया में लिखा है कि विमुद्रीकरण से समूचा असंगठित क्षेत्र स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है.ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने  कहा है कि निरंकुश कार्रवाई जैसी है और सरकार की अधिनायकवाद प्रवृति का खुलासा करती है. अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव  सरकार के नोटबंदी के कदम की सहराना करते हैं-कहते हैं कम अवधि में नोटबंदी विकास को चोट पहुंचा सकती है लेकिन लंबे समय में इसका असर ज्यादा फायदेमंद होगा. मुख्य वैश्विक रणनीतिकार रुचिर शर्मा ने कहा है कि बड़े बिल समाप्त होने से आज कुछ छिपा धन नष्ट हो सकता है लेकिन संस्कृति और संस्थाओं में गहरे परिवर्तन के अभाव की वजह से कल इस काली अर्थव्यवस्था का पुनर्जन्म होगा.नोटबंदी के लंबी अवधि के फायदे  बाद में आएंगे लेकिन नोटबंदी के ठीक बाद हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण कैशलैस लेनदेन रहा.नोटबंदी के ठीक बाद देश के उन पढ़े-लिखे लोगों के बीच क्रेडिट-डेबिट और पेटीएम जैसे माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ गया, जो इनका कम ही इस्तेमाल करते थे या फिर बिल्कुल नहीं करते थे. बावजूद इसके कि वो कैशलेस लेनदेन के लिए पूरी तरह सक्षम हैं और उनको इसके बड़े फायदे भी मालूम हैं.देश की अर्थव्यवस्था में 50 फीसदी से अधिक का योगदान करने वाले असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के लोग जिनकी आबादी में हिस्सा 80 फीसदी है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है.देश में ई-कॉमर्स का विस्तार सालाना 51 फीसदी की दर से हो रहा है. वहीं, नोटबंदी के बाद छोटे-बड़े सभी लोगों के बीच दूध, सब्जी, अंडे और मोबाइल रिचार्ज जैसे कामों के लिए कैशलैस भुगतान का इस्तेमाल बढ़ा. नोटबंदी के बाद बैंकों और एटीएम पर उमड़ी भीड़ ने नोटबंदी की तैयारी पर सवालिया निशान उठाए हैं वहीं नोटों को बदलने व निकालने की सीमा, बैंकों में उमड़ी भीड़ और एटीएम की अधूरी व्यवस्थाओं ने लोगों को दात पीसने पर मजबूर कर दिया. एक मजदूर ने 2000 रुपये के नोट का खुला न मिल पाने के कारण आत्महत्या की कोशिश तक कर डाली.सरकार के इस फैसले का लोगों में हालांकि बढ़-चढ़ कर समर्थन किया जबकि कई लोग इस बात से खुश दिखे कि जिसके पास बड़ी संख्या में काला धन है उनके नोट पूरी तरह से रद्दी हो जाएंगे.


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