सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नोट बंदी- ससंद बदी के बाद अब बजट व उत्तर प्रदेश में दाव पेच!

नोट बंदी- ससंद बदी के बाद अब बजट व उत्तर प्रदेश में दाव पेच!
नोटबंदी से अब सब उकता गये हैं,कुछ नया हो जाये,हां बजट की बात की जाये तो इस बार सबका इंतजार उसी पर रहेगा.नोटबंदी-संसद बंदी के बाद जो नया होने वाला है उसमे यूपी का चुनाव और बजट ही है. ऐसी खबरें मिल रही है कि इस बार संभवत: एक फरवरी को पेश होने वाले बजट में सरकार बहुत कुछ करना चाहेगी जिससे नोटबंदी से नाराज जनता खुश भी हो जाये और उत्तर प्रदेश का सिंहासन भी सपा से छीन ले. सरकार इंकम टैक्स में छूट दे सकती है. चार लाख रूपये तक की आमदनी टैकस फ्री हो सकती है.टैक्स स्लेब में भी बदलाव की आशा की जा सकती है.उत्तर प्रदेश की तरफ नजर दौड़ायें तो वहां प्रधानमंत्री पहुुंच गये हैं तो राहुल गांधी भी पूरी तरह सक्रिय हैं. नोटबंदी को तो उन्होंने मुद्दा ही बना लिया. वास्तविकता यही है कि पूरा देश इस समय नोट बंदी और संसद बंदी के चक्कर में है. हो सकता है फरवरीं में यूपी विधानसभा के चुनाव हो जायें, यहां भारतीय जनता पार्टी राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी, के साथ बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समान दावेदारी के साथ सक्रिय है. सपा-कांग्रेस के बीच    गठबंधन की अटकले भी  है. दो साल पहले राज्य में भाजपा को काफी फायदा मिलता दिखा था, जहां इसने 2014 के संसदीय चुनाव में भारी जीत हासिल की थी परन्तु अब हालात बदल चुके है,नोटबंदी अकेला इसका कारण नहीं है. फरवरी में अगर विधानसभा चुनाव होते हैं, तो इसकी घोषणा जनवरी की शुरुआत में कभी भी हो सकती है, इसके तुरंत बाद  आचार संहिता लागू हो जाएगी, जो केंद्र या राज्य सरकार को कोई भी लोक-लुभावन कदम उठाने से रोक देगी.भाजपा को छोड़ अन्य पार्टियों के लिये जनवरी की शुरूआत में चुनाव की घोषणा फायदेमंद नहीं होगी चूंकि आचार संहिता में केंद्रीय बजट जारी करने पर लागू होने की संभावना नहीं है इसका फायदा केन्द्रीय बजट में भाजपा की उत्तर प्रदेश की जनता को लुभाने वाली घोषणाएं हो सकती है. भाजपा के भीतर इस बात को लेकर कशमकश है कि नोटबंदी पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है.आरएसएस और भाजपा की स्थानीय  इकाइयां पहले ही केन्द्र को इससे अवगत भी करा चुकी हैं. इस हालात में भाजपा के पास विकल्प यूपी फतह का श्ुारूआती तौर पर मौका तो केन्द्रीय बजट ही दिखता है.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत छबि भी कुछ खेल यूपी में खेल सकती है. शीतकालीन सत्र पूरी तरह कामविहीन चले जाने व जीएसटी सेवा कर को लागू करने की समय-सीमा टलने के खतरे को देखते हुए भी सरकार जनवरी के दूसरे सप्ताह से संसद का बजट सत्र बुला सकती है. इस बार आम व रेल बजट दोनो  एक साथ  पेश किया जाएगा. नोटबंदी को लेकर अब कुछ नकारात्मक स्वर उठने लगे हैं जबकि ज्यादातर लोग  मुश्किलों को झेलने की मानसिकता मे आ गये  हैं, क्योंकि वे इसे  प्रधानमंत्री द्वारा नेक नीयती के साथ उठाया गया कदम मानते हैं मगर इस नोटबंदी के कारण कुछ खामोश जिंदगियां भी है जो इससे अपने आपको बुरी तरह प्रभावित मानती हैं ऐसे लोग क्या असर डालेंगे कोई इसका अनुमान नहीं लगा सकता.चूंकि देश में  मौन चुनाव हमेशा नया ही कुछ करता रहा है.कारोबारियों का समूह जो पहले एक मतेन था अब उसमें भी बिखराव आ गया है. पेट की मार को बर्दाश्त करने  के लिये कोई तैयार नहीं. ऐसे में यूपी में किस्मत आजमाने अन्य दलों के साथ जुटी केन्द्र की सत्तारूढ पार्टी को उत्तर प्रदेश का चुनाव मुलायम परिवार या मायावती की पार्टी के सामने चूनौतियों का एक पहाड़ है. ऐसे में कारोबारियों को खुश करने के लिये केन्द्र सरकार जीएसटी को सर्वसम्मति से अंतिम रूप देने के लिए जनवरी में अपनी हरसंभव कोशिश करेगी. उत्तर प्रदेश का चुनाव वास्तव में  देश के अन्य राज्यों के लोगों के लिये भी फायदेमंद साबित हो सकता है चूंकि सराकर नोट बंदी से आहत लोगों को खुश करने के लिये टैक्स में कटौती की  घोषणा बजट में कर सकती है. कांग्रेस विशेषकर राहुल गांधी का सारा फोकस किसानों पर है ऐसे में केन्द्र सरकार बजट में कृषि क्षेत्र के लिए पैकेज की घोषणा कर सकती है. रेल बजट को इस बार केंद्रीय बजट में ही शामिल किया जा रहा है, लिहाजा इसमें स्वाभाविक तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा जोर दिया जा सकता है.



रविवार, 18 दिसंबर 2016

कानून बदला किन्तु लोग नहीं बदले!


इंटरनेट पर पोर्न साइट देखते हैदराबाद के पैसठ बच्चो को पकड़कर पुलिस ने उनके पालकों के सिपुर्द किया. यह उस दिन से एक दिन पहले की बात है जब दिल्ली के निर्भया कांड ने चार साल पूरे किये.इसी   दिन चार वर्ष पूर्व निर्भया बलात्कार और निर्मम हत्याकांड ने पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया था ,इसी बर्सी के दिन दिल्ली में नोएड़ा से साक्षात्कार के लिये पहुंची एक बीस साल की लड़की को लिफट देने के बहाने कार में चढाया और उसके साथ रेप किया. कार में ग्रह मंत्रालय की स्लिप लगी थी. इसी दिन अर्थात निर्भया रेप कांड के चार साल होने के दिन ही झारखंड की राजधानी रांची में इंजीनियरिंग कालेज की उन्नीस वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया तथा उसकी गला घोटकर हत्या कर दी गई तथा उसके शव को जलाने का प्रयास किया गया. निर्भया के बाद कानून में बहुत कुछ बदला होगा लेकिन समाज कतई नहीं बदला ,राजधानी दिल्ली में हर रोज छह बलात्कार और देश के विभिन्न राज्यों में पता नहीं कितने? इन मामलों को रोकने की व्यवस्था बनाने के लिए दायर कई पीआईएल पर चार साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट को फाइनल सुनवाई का अवसर नहीं मिला. अभी कुछ माह पूर्व ही यूपी के बुलंदशहर,केरल के तिरूवन्तपुरम में भी जो $कुछ हुआ वह भी समाज में बढ़ रहे ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने कठोर कदम उठाने का संकेत दे गये लेकिन कानून को कठोर बनाने की जिम्मेदारी जिनपर है वे या तो खामोश है या आंख मीचकर बैठे हैं तथा आरोप प्रत्यारोप में लगे हैं. उत्तर प्रदेश की एक जुझारू महिला आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर की पीआईएल पर बहस में इस बात का आग्रह किया गया कि अपराध के बाद दंड देने पर जोर देने की बजाय, अपराध को रोकने की व्यवस्था की जाये. कानून की थकाऊ प्रक्रिया और सरकार द्वारा ऐसे मामलों में विलम्ब पर जवाबदेही कैसे तय की जाये अब इसपर भी बहस की आवश्यकता बन गई है.निर्भया कांड के बाद तीन माह में कानून तो कुछ कड़ा हो गया मगर उसके अपराधियों को न तो उनके असल मुकाम तक पहुंचाया गया और न ही समाज को ऐसा कोई संदेश हमारी व्यवस्था दे पाई ताकि निर्भया की तरह क्रूरता से खत्म की जा रही बच्चियों के भावी जीवन को सुरक्षित कर सकें. निर्भया के बाद उपजे सोशल मीडिया का आंदोलन इतना वृहद, तनावपूर्ण व आक्रोशित था कि उससे कानून और सरकार तो बदल गए पर चार साल बाद भी व्यवस्था जस की तस बनी हुई है जबकि इस दौरान अन्य कई मामलों में कठोर कानून बन गये किन्तु देश में सामाजिक स्तर पर उतर आई इस गंभीर समस्या पर न महिलाओ की ही तरफ से कोई ठोस पहल हुई और न हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े स्तभं की तरफ से. हां होने वाले यौन हमलों पर हर समय चिंता ही प्रकट की जाती रही जो रहरहकर उठती और शांत हो जाती, फिर  तब उठती जब किसी  की आबरू तार तार होकर इस  दुनिया से ही उठ जाती. आखिर कब तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा.? मासूम बच्चियो पर लगातार यौन हमले से  चिंतित मलयालम फिल्मो की अभिनेत्री मीरा जास्मिन ने  सलाह दी थी कि ऐसे पुरूषों को नपुसंक बना दिया जाये. ऐसा सुझाव और भी  कई तरह के सम्मानित लोगों की तरफ से आये हैं.इस दिशा में कदम उठाया जाये तो यह भी  समाज हित मे ही होगा. एक अरब बीस करोड़ की  आबादी में ऐसी विािक्षप्त मानकिसकता वालों की संख्या समाज में एक-दो प्रतिशत से भी कम है आगर इन्हें वाकई में नपुसंक बना  दिया जाये या सर्जिकल आपरेशन कर छोड़ दिया जाये तो समाज को एक कठोर संदेश ही मिलेगा दूसरी बात इतनी बड़ी आबादी और समाज पर कोई असर नहीं पडऩे वाला. हां कानून के प्रति लोगो का विश्वास बढ़ेगा. पीआईएल में छह प्रमुख मांगे शामिल हैं जिन पर भी जल्द निर्णय लिया जाना चाहिये.  देश में 31 प्रतिशत से अधिक सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि दागी हैं, जिनमें से कई के विरुद्ध रेप और अन्य गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं. कतिपय माननीयों द्वारा समाज में अपराध बढ़ाने के साथ आपराधिक लोगों को संरक्षण भी दिया जाता है. इनके विरुद्ध मुकदमों पर फास्ट ट्रैक ट्रायल से इन्हें शीघ्र दंडित करने की जरूरत है.न्याय में देरी अपराधियों को मोहलत देती है.










शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

संसद सेशन शोरगुल-हंगामे में बाईस दिन यूं ही बीत गया



मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में पार्लियामेंट के आठ सेशन हुए हैं. इस बार विंटर सेशन बाईस दिन चला लेकिन प्रोडक्टिवीटी सबसे कम रही. यह अंदेशा तो उसी समय से था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ अक्टूबर को नोटबंदी का ऐलान किया. सब कुछ शायद ठीक चलता यदि सरकार नोटबंदी से पूर्व तैयारी करके चलती. इस निर्णय को लेने के पूर्व सरकार ने शायद यह सोचा भी नहीं कि इसके रिफरकेशन उसके लिये मुसीबतें खड़ी कर देंगी. एटीएम व बैंक तक नये नोट नहीं पहुंचने से लगी लम्बी लाइन और उसमें खड़े होने वाले लोगों की मौत के सिलसिले ने विपक्ष को इतना मौका दिया कि संसद चलने ही नही दी इस बीच और भी ऐसे मामले हो गये जो विपक्ष को एक के बाद एक आक्रामक बनाने में मददगार बनते चले गये. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी  की घोषणा के बाद विदेश चले गये आौर इधर अपना पैसा वापस निकालने के लिये लोग लाइन में लगकर जूझते रहे वहीं कालाधन जमा करने वालों ने एक तरह से बैंकों पर कब्जा जमा लिया. बैंक के कतिपय अधिकारियों व कर्मचारियेां ने मिलकर ऐसी स्थिति निर्मित कर दी जिससे मार्केट में त्राही त्राही मच गई और सड़क पर लाइन में लोग धक्के खाने लगे. विपक्ष ने इसको खूब भुनाया. नोटबंदी पर हंगामे की वजह से जरूरी काम काफी कम हुआ है, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक 16 नवंबर से 9 दिसंबर के बीच लोकसभा में 15प्रतिशत तो राज्यसभा में 19 पतिशत ही प्रोडक्टिविटी रही है अर्थात औसतन 17 प्रतिशत ही कामकाज हो पाया. यह मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में लोकसभा की सबसे कम प्रोडक्टिविटी है.अपोजीशन शुरू में यह मांग करता रहा कि पीएम मोदी सदन में आये और नोटबंदी पर अपना पक्ष प्रस्तुत करें लेकिन मोदी नहीं आये जब आये तो विपक्ष दूसरेी मांगों को लेकर अड़ गया. विपक्ष ने जहां सदन का बायकाट किया वहीं राष्ट्रपति से मिलने भी पहुंंचेॅ.पंश्चिम बंगाल  की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी नोटबंदी के मामले पर ज्यादा उद्वेलित थी उनके कहने पर विपक्ष राष्ट्रपति से भी मिला लेकिन यहां भी कोई बात नहीं बनी. विपक्ष के हंगामे पर जहां वरिष्ठ राजनीतिज्ञ लालकृष्ण आड़वाणी व्यथित व क्रोधित हुए वहीं राष्ट्रपति को भी यह कहना पड़ा कि भगवान के लिये संसद को चलने दे. इस अपील का भी असर विपक्ष पर नहीं पड़ा जब नरेन्द्र मोदी सदन में पहुंचे तो विपक्ष का हल्ला फिर बढ़ गया और वे सदन से बिना बोले ही चले गये फिर जब आये तो विपक्ष का हल्ला बरकरार रहा. नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी दोनों ही यह बोलते रहे कि मुझे सदन में बोलने ही नहीं दिया जा रहा. इस बीच एक गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू के किस्से ने पूरे माहौल को नोटबंदी के साथ-साथ इस मामले को गर्म कर दिया और लोकसभा चलने की थोड़ी बहुत संभावना थी वह भी खत्म हो गई.रिजिजू मोदी सरकार के पहले मंत्री हैं जिनपर भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगा. कांग्रेस ने वोटिंग के तहत सदन में चर्चा की मांग की जबकि सरकार इस पर राजी नहीं हुआ. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर चर्चा न करने का आरोप लगाते रहे.16 नवंबर को पार्लियामेंट का विंटर सेशन शुरू हुआ था। यह आज16 दिसंबर तक चला.सेशन शुरू होने से करीब एक हफ्ते पहले ही पीएम ने नोटबंदी का एलान किया था, लिहाजा सरकार अपोजिशन के निशाने पर रहा, मंत्री किरण रिजीजू पर '50 करोड़ रुपए के अरुणाचल बिजली घोटालेÓ में शामिल होने के आरोप ने सदन की कार्रवाही को ठप्प कर दिया. इस सेशन में कई जरूरी बिल पेश होने थे लेकिन हंगामे की वजह से यह मुमकिन नहीं हो सका। सिर्फ दो ही बिल पास हो सके. इनमें एक टैक्सेशन अमेंडमेंट बिल था, दूसरा राइट्स ऑफ पर्सन्स डिसएबिलिटी बिल-2014. टैक्सेशन अमेंडमेंट बिल भी इसलिए पास हुआ, क्योंकि यह फाइनेंस बिल था, जिसे राज्यसभा से पास होना जरूरी नहीं था। संसद के इस सेशन में बाईस बैठके होनी थीं इनमें जीएसटी पर तीन बिल पास होने थे एक सेंटर का जीएसटी बिल, दूसरा इंटीग्रेटेड जीएसटी बिल और तीसरा जीएसटी से राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई तय करने वाला बिल. कुल 9 बिल पेश होने थे, इनमें सरोगेसी (रेग्युलेशन), नेवी ट्रिब्यूनल बिल-2016, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बिल, डिवोर्स अमेंडमेंट बिल-2016 और स्टेटिस्टिक्स एग्रगेशन अमेंडमेंट बिल-2016 भी शामिल थे सेशन के दौरान दो बिल पर लोकसभा में चर्चा होने के आसार थे, जो राज्यसभा से पास हो चुके हैं इन बिल्स में मेंटल हेल्थ केयर बिल-2016 और मेटरनिटी बेनीफिट्स अमेंडमेंट बिल-2016 शामिल था सरकार की  मंशा 15 नए बिल भी पेश होने की भी थी जो पेश नहीं कर सकी.



रविवार, 11 दिसंबर 2016

एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?

एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?
हां यह ठीक है कि नोट बंदी के बाद का एक महीना लाइन में लगते -लगते कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. आज एक महीना बीत चुका है. नवंबर महीने की इसी आठ तारीख को केंद्र सरकार ने  पांच सौ  और हजार रूपये के नोटों का चलन बंद कर देश के हर वर्ग को चौका दिया था. नोटों का चलन  बंद होने से आम और खास सभी किस्म के लोग इसकी चपेट में आ गये. उस समय से बैंको के कामकाज में जहां अंतर आया, एटीएम के सामने अभूतपूर्व भीड़ दिखाई दी वहीं कई एटीएम जहां इस निर्णय के बाद से अब तक खुले नहीं है तो कई में कभी पैसा आता है तो खुलता है और कभी नहीं तो बंद रहता है. नोटबंदी के बाद से विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा.करीब चौरासी  लोगों की मौत का हिसाब मांगा जा रहा है तो  कारोबार बुरी तरह प्रभावित है.कई निजी संस्थानों में कर्मचारियों को महीना बीत जाने  के बाद भी  सेलरी नहीं मिली है.यह सही है कि नोटबंदी ने देश को कैशलेस लेनदेन की ओर एक कदम आगे बढ़ा दिया.एक महीना बीतने के बाद हर कोई इस पूरे एपीसोड़ को तराजू पर तौलता दिखाई दे रहा है..नोटबंदी की घोषणा के बाद देश की 86 प्रतिशत नगदी रातों-रात यूं रद्दी हो जाने से पूंजीपति से लेकर आम इंसान भी प्रभावित हुआ जबकि  सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से लोगों के रहन-सहन, खर्चो में बदलाव आएगा और वह नगदी पर कम आश्रित होंगे.कालाधन बाहर निकलने का दावा सरकारी रिकार्ड पर बहुत अच्छा लग रहा हैं लेकिन जो धन पकड़ा जा रहा है उसमें नये दो हजार, पांच सौ और सौ रूपये के नोट देखकर सभी आश्चर्य चकित हैं. सवाल यह है कि कालाधन है तो उसमें वर्तमान में जारी नये नोट कैसे शामिल हो गये?असल में सरकार की प्लानिंग में कु छ ऐसा छेद रह गया जिसका कालाधन रखने वालों ने खूब उपयोग किया. बंद किये नये नोटों को बदलने में दी गई छूट ने ऐसा मौका कालाबाजारियों को दिया कि सरकार  के गुप्त खेल का पासा ही पलट गया. जो पैसा जनता के हाथ में आना था वह लौटकर फिर कालाबजाारियों के हाथ पहुंच गया.पांच सौ और हजार रूपये हटाने के बाद सरकार कह रही है कि इसके बाद हमारा देश सोने की तरह चमकेगा.ब्याजदर  कम करने के दावे पर आरबीआई ने पानी फेर दिया. कई लोगों ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाया मगर यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इससे क्या फायदा होगा? इंडिया सेंट्रल प्रोग्राम ऑफ द इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर के निदेशक प्रणव सेन ने एक वेबसाइट आइडियास फॉर इंडिया में लिखा है कि विमुद्रीकरण से समूचा असंगठित क्षेत्र स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है.ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने  कहा है कि निरंकुश कार्रवाई जैसी है और सरकार की अधिनायकवाद प्रवृति का खुलासा करती है. अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव  सरकार के नोटबंदी के कदम की सहराना करते हैं-कहते हैं कम अवधि में नोटबंदी विकास को चोट पहुंचा सकती है लेकिन लंबे समय में इसका असर ज्यादा फायदेमंद होगा. मुख्य वैश्विक रणनीतिकार रुचिर शर्मा ने कहा है कि बड़े बिल समाप्त होने से आज कुछ छिपा धन नष्ट हो सकता है लेकिन संस्कृति और संस्थाओं में गहरे परिवर्तन के अभाव की वजह से कल इस काली अर्थव्यवस्था का पुनर्जन्म होगा.नोटबंदी के लंबी अवधि के फायदे  बाद में आएंगे लेकिन नोटबंदी के ठीक बाद हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण कैशलैस लेनदेन रहा.नोटबंदी के ठीक बाद देश के उन पढ़े-लिखे लोगों के बीच क्रेडिट-डेबिट और पेटीएम जैसे माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ गया, जो इनका कम ही इस्तेमाल करते थे या फिर बिल्कुल नहीं करते थे. बावजूद इसके कि वो कैशलेस लेनदेन के लिए पूरी तरह सक्षम हैं और उनको इसके बड़े फायदे भी मालूम हैं.देश की अर्थव्यवस्था में 50 फीसदी से अधिक का योगदान करने वाले असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के लोग जिनकी आबादी में हिस्सा 80 फीसदी है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है.देश में ई-कॉमर्स का विस्तार सालाना 51 फीसदी की दर से हो रहा है. वहीं, नोटबंदी के बाद छोटे-बड़े सभी लोगों के बीच दूध, सब्जी, अंडे और मोबाइल रिचार्ज जैसे कामों के लिए कैशलैस भुगतान का इस्तेमाल बढ़ा. नोटबंदी के बाद बैंकों और एटीएम पर उमड़ी भीड़ ने नोटबंदी की तैयारी पर सवालिया निशान उठाए हैं वहीं नोटों को बदलने व निकालने की सीमा, बैंकों में उमड़ी भीड़ और एटीएम की अधूरी व्यवस्थाओं ने लोगों को दात पीसने पर मजबूर कर दिया. एक मजदूर ने 2000 रुपये के नोट का खुला न मिल पाने के कारण आत्महत्या की कोशिश तक कर डाली.सरकार के इस फैसले का लोगों में हालांकि बढ़-चढ़ कर समर्थन किया जबकि कई लोग इस बात से खुश दिखे कि जिसके पास बड़ी संख्या में काला धन है उनके नोट पूरी तरह से रद्दी हो जाएंगे.


...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!



...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!
अब तक ससंद की कार्रवाही को शांतिपूर्वक देख सुन रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से बुधवार को रहा नहीं गया. उन्होनें लोकसभा के अफसर से पूछ ही लिया कि बैठक कब तक के लिये स्थगित की गई है? उन्हें बताया कि दो बजे तक तो गुस्से में कह ही दिया कि अनिश्चितकाल के लिये क्यों नहीं? तीन हफ्ते बीत गए ससंद के शीतकालीन सत्र के किन्तु अब तक कार्यवाही सामान्य नहीं हो पाई है   नोटबंदी के मसले पर उठा विवाद गुरूवार को  शांत होने की संभावना बन गई थी लेकिन विपक्षी दलों के धरने और आरबीआई की नोटबंदी पर आई रिपोर्टो ने सरकार की मुसीबते और बढ़ा दी.  विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि प्रधानमंत्री सदन में इस मसले पर जवाब दें, दूसरी ओर सत्ता पक्ष चर्चा पर जोर दे रहा है देश की स्थिति और उसमें संसद की भूमिका को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्थिति पर चिंतित हो सकता है. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के क्षोभ को समझा जा सकता है उन्होंने सदन न चल पाने के लिए न केवल संसदीय कार्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष पर भी अंगुली उठाई. निश्चित रूप से यह पिछले कई दिनों से लगातार चल रहे हंगामे के बीच सब कुछ देखने-समझने के बाद की प्रतिक्रिया है. लोकसभा राज्य सभा में मंत्रिगण व नेता मामले को किसी तरह सुलझाने की जगह ताल ठोक रहे हैं. राजनीति के क्षितिज पर लालकृष्ण आडवाणी के अनुभव और कद के मद्देनजर उनकी बातों को हल्के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए उनकी ताजा टिप्पणी को किसी एक दल या पक्ष पर उठाई गई अंगुली के तौर पर भी नहीं देखा जा सकता, उन्होंने अगर विपक्ष के हंगामे से सहमति नहीं जताई है, तो सत्ता पक्ष को भी सदन बाधित करने का जिम्मेदार ठहराया है. जब संसद की कार्यवाही बाधित होती है, तो आमतौर पर केवल विपक्षी दलों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है मगर इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि विपक्षी दलों के किसी बात पर अडऩे के पीछे कारण क्या हैं और सदन को बाधित करने के लिए सत्ता पक्ष की भी कोई जवाबदेही बनती है या नहीं! आडवाणीजी के बाद अब महामहिम राष्ट्रपति ने भी कह दिया है कि भगवान के नाम पर सदन चलने दिया जाये.देखें क्या होता है बहरहाल नोटबंदी की अचानक घोषणा के बाद से समूचे देश में जो संकट खड़ा हुआ है उसके लगातार गहराते जाने के मद्देनजर विपक्ष की इस मांग को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री इस मसले पर सदन में बयान दें  इस मांग के पीछे आधार यह हो सकता है कि जब मुद्रा से संबंधित नीतिगत फैसले की घोषणा करना पारंपरिक रूप से रिजर्व बैंक का काम माना जाता रहा है, तो प्रधानमंत्री के स्तर से यह निर्णय और इसकी घोषणा होने की नौबत क्यों आई! प्रधानमंत्री ने यह कहकर विपक्ष को और उत्तेजित कर दिया कि विपक्ष बहस नहीं होने दे रहा उसे एक्सपोस करें.नोटबंदी को साहसिक कदम मानते हुए भी लोग परेशान है तथा  देश भर में एक तरह से आर्थिक अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है अपना पैसे बैंक में जमा होने के बावजूद लोग थोड़े पैसे के लिए भी भटकने पर मजबूर हैं और इसी वजह से अब तक लगभग सौ लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं. लोगों के पास नगदी न होने के चलते समूचे बाजार का कारोबार गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. ऐसी स्थिति में यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना तैयारी के नोटबंदी के फैसले को अचानक लागू करने के बाद पैदा हालात से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है! आर्थिक अराजकता की स्थिति को लोग महसूस करने लगे है लेकिन फिर भी भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन पर काबू पाने की बात से कोई भी असहमत नहीं है लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, उसमें जरूरत इस बात की है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिल कर रोज गहराते संकट का कोई हल निकालें.संसद में हंगामे की  वजह से कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिये जा सके .कई बिल लटके पड़े हैं. 

डिजिटल तो हम हो गये लेकिन चुनौतियां भी तो कम नहीं!


डिजिटल तो हम हो गये लेकिन चुनौतियां भी तो कम नहीं!
अगस्त 2014 में नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल ने डिजिटल इंडिया का फैसला कर लिया था, करीब एक साल की गहन तैयारी के बाद जुलाई 2015 में इसे धूमधाम के साथ लांच किया गया. देश में आज भी नेटवर्क इतना स्लो है कि हमारा स्थान दुनिया में 115 वां हैं ऐसी परिस्थिति में यह हमारी पहली चुनौती है कि हम अपने इंटरनेट नेटवर्क को इतना फास्ट करें कि डिजिटल इंडिया का सपना साकार हो. जाहिर है सरकार एक दिन में इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकती मगर सरकार डिजिटल इंडिया के लिये कटिबंद्व है.देश में नब्बे करोड़ से ज्यादा लोगों के पास फोन हैं जिसमें से मात्र 14 करोड़ लोगों के पास ही स्मार्ट फोन है. स्मार्ट फोन और गैर स्मार्ट फोन को लेकर भी अमीर- गरीब की तरह बांटकर देखा जा सकता हैं,जिनके पास स्मार्ट फोन हैं उनमें से बहुत से लोग साधारण हैं जिसके आधार पर उम्मीद की जा सकती हैं कि उन लोगों को इंटरनेट मिलने भर की देर है.भले ही नोटबंदी के बाद देश के सारे एटीएम के बाहर लम्बी -लम्बी कतारे लगी है लोग पैसा जल्दी  लेने के लिये लड़ रहे कट रहे हैं और कुचलर भी मर रहे हैंं ओर तो ओर पैसा नही मिलने के कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं मगर केशलेस डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को गति मिली है सरकार की मंशा है कि डिजिटल इंडिया के मार्फ़त लोगों को रोजमर्रा की सहूलियतें दिलाई जाए
लेकिन डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के अंदर होने वाली बाते पहले भी हो रही थी- यह उन लोगों तक सीमित था जो कम्पयूटर से लेकर फोन तक चलाने में एक्सपर्ट थे -अब सरकार इसमें बदलाव लाने की कोशिश कर रही है उन लोगों को पहले ट्रेडं करना होगा जो मोबाइल रखते तो है किन्तु उसे सही ढंग से यूस नहीं कर पाते उन्हें भी जिन्हें मोबाइल में सिर्फ नम्बर मिलाना और काल अटेड़ करना ही आता है. एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश में आधार कार्ड की तरह अब आम लोगों को डिजिटल बनाना होगा. क्या यह इतना आसान है? नई पीढ़ी की बात हम नहीं  करते लेकिन पुरानी पीढ़ी का एक वर्ग आज भी  ऐसा है जो मोबाइल से पहले  शुरू हुए कम्पयूटर के माउस को तक हिला नहीं सकता ऐसे में इतनी बड़ी आबादी  को डिजिटल करना बहुत बड़ी चुनौती है. नरेन्द्र मोदी मे आत्मविश्वास है मगर यह उनसे ज्यादा उनकी टीम को व नौकरशाहों में लाना है.साथ ही  जनता का सहयोग भी जरूरी है लाइन में थक चुकी जनता को ही सरकार  ने यह  चुनौती दी है,यह कहकर कि तुम आगे बढो, हम तुम्हारे पीछे हैं. दूसरी ओर सरकार का पहला लक्ष्य होना चाहिये -ब्रॉडबैंड हाइवे. इसके तहत देश के आखरी छोर तक हर  घर में ब्रॉडबैंड के ज़रिए इंटरनेट पहुंचाना होगा.डिजिटल इंडिया और कैशलेस सिस्टम के लिये यह जरूरी  है कि सबके पास फोन की उपलब्धता हो जिसके लिए ज़रूरी है कि लोगों के पास फ़ोन खरीदने की क्षमता हो. आज कंपनियां सस्ते फोन लेकर आ गई है लेकिन इसे भी  खरीदने की क्षमता नहीं होने वाले लोग भी  देश में मौजूद हैं.हर किसी के लिए इंटरनेट अच्छी बात है. इसके लिए पूर्व में स्थापित पीसीओ की तर्ज पर पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्वाइंट बनाए जा सकते हैं. ये पीसीओ आसानी से समस्या हल कर सकते हैं, लेकिन हर पंचायत के स्तर पर इसको लगाना और चलाना भी कोई आसान काम नहीं है. इधर ई-गवर्नेंस. के मामले में हमने  कुछ प्रगति जरूर कर है लेकिन  सरकारी कामकाज में डिजीटल की घुसपैठ अब भी शतप्रतिशत नहीं  है.हर सेवा को इंटरनेट से जोडऩे का.लक्ष्य रखकर आगे बढऩे की  जरूरत  है. इसे लागू करने का पिछला अनुभव बताता है कि दफ्तर डिजिटल होने के बाद भी उनमें काम करने वाले लोग डिजिटल नहीं हो पा रहे हैं. इसका तोड़ निकालने का कोई नया तरीका ढूंढने की जरूरत है. सरकार की मंशा इंटरनेट के ज़रिए विकास गांव-गांव तक पहुंचाने की होना चाहिये.केशलेस सिस्टम ओर नई व्यापारिक अथवा आर्थिक क्रांति के लिए जरूरी है कि हमारा दिमाग, हमारी सोच, हमारा प्रशिक्षण और उपकरण सब कुछ डिजिटल हो.अगर हमने सरकार के ढांचे को इंटरनेट से नहीं जोड़ा तो फिर इसके तहत डिलीवरी कैसे करेंगे?और अगर कर भी दी, तो सही में इसका फायदा लोगों तक नहीं पहुंचता है. इसमें बड़ी धांधली होती है.दुकानों व्यापारिक संस्थानों  में चलने वाली स्वाइप मशीन के लिये चौबीस घंटे इंटरनेट सर्वर का काम करना जरूरी है चूंकि पूरी व्यवस्था इसी से जुड़ी है. अगर डेबिट, रूपे कार्ड हाथ में लेकर चले और व्यापारी तथा बैेक से लिंक न जुड़े तो कैसे चलेगा.जेब में डेबिट कार्ड के साथ में बिना अवरोध के चलने वाला एक अच्छा इंटरनेट सिस्टम में जरूरी है जो फि लहाल देश में नहीं है.