सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

नन्हीं बच्चियों की चीख .... कानून कब तक यूं अंधा बहरा बना रहेगा?



इज्जत किसे प्यारी नहीं होती...किसी महिला की इज्जत उसकी जिंदगी होती है और कोई अगर इसी को लूट ले तो फिर उसके जीने का मकसद ही खत्म हो जाता है. कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज में महिलाएं पुरूषों के मुकाबले बहुत कमजोर होती है जबकि समाज ने झांसी की रानी दुर्गावती जैसी  सिंहनियों को भी देखा है मगर सारी महिलाएं वैसे नहीं हो सकती. उनमें से कइयों पर जो अत्याचार होते हैं उसकी निंदा करने वाले, उनको मुआवजा देने वाले तो बहुत सामने आ जाते हैं लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी तो हैं जो हम सबके ऊपर सारे अत्याचारों को अपनी आंखों से देखता है,सुनता है और निर्णय करने की क्षमता रखता है. यह वर्ग ऐसे कानून भी  बना सकता है जो अबलाओं पर अत्याचार को रोकने में सक्षम है फिर उनके सामने कौन सी मजबूरी है जो वो समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को यह कहकर संरक्षण नहीं दे पा रहा जिसके कारण छोटी- छोटी  बच्चियां तक असुरक्षित हो गई. आज बड़ी बड़ी बाते करने वाली हमारी सरकारों की नाक के नीचे एक छोटी सी बच्ची मसल दी जाती है उसे खरोच डाला जाता है फिर भी  हमारा कानून ऐसे जालिमों को वह सजा नहीं दे पाता जिसके वे वास्तव में हकदार हैं.नतीजतन आज स्थिति ऐसे आ गई है कि बच्चियां अपने ऊपर होने वाले अत्याचार से तंग आकर शरीर को आग के हवाले कर देती है या फिर किसी ऊंची मंजिल से कूदकर जान दे दती है या फिर जहर खाकर खुदकुशी कर लेती है अथवा अपने कपड़े के किसी अंग को खीचकर गले में बांधकर अपनी इंहलीला खत्म कर देती है फिर भी हमारे चुने हुए लोग अपने पौराणिक घटिया कानून को संवारकर उसकी ही दुहाई देते हैं कि वह कमजोर है. दुख इस बात का है कि लोग आज इतने असहनशील हो गये हैं कि उनपर न मध्यप्रदेश की ग्यारह साल की बच्ची के साथ हुए यौन अपराध का कोई प्रभाव पड़ता है और न महासमुन्द के पिरदा की उस विवाहिता महिला की चीख सुनाई देती है जिसे दुष्कर्मी उसके घर से उठाकर ले जाकर जंगल में उसके साथ मुंह काला करते हैं.हम इस बात का दावा जरूरत करते हैं कि हमारे देश की आबादी एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा है.इस आबादी में मुटठीभर लोग ऐसे हैं जो किसी बच्ची का यौन शोषण करने के आरोपी है, कुछ ही ऐसे हैं जो दुराचारी की श्रेणी में आते हंै इन दस में से दो को भी ऐसे दुष्कर्म के बाद बीच चोराहे पर लटकाकर इस दुनिया से रूकसत कर दिया जाये तो किसी दूसरे दुष्कर्मी की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह किसी अबला को घूर कर भी देख सके. हर अमन पंसद व्यक्ति की आंखे भर आई होंगी जब उसने सुना कि  मध्य प्रदेश के इटारसी में गैंगरेप की शिकार एक 11 साल की बच्ची ने जेल से छूटे आरोपी के डर से खुद पर केरोसिन उडेलकर आग लगा ली. बच्ची को अधजली हालत में पिता मोटर साइकिल पर 10 किमी दूर इटारसी अस्पताल लेकर पहुंचे .... करीब 40 परसेंट जल चुकी बच्ची ने जो बताया वह भी हमारे कानून की खामियां गिनाता है-कहती है- एक आरोपी जेल से छूट चुका है, दूसरा भी छूट जाएगा मुझे हमेशा डर रहता है कि वे मुझे मार देंगे.छठवीं की स्टूडेंट् कितनी बड़ी होती है उससे 8 महीने पहले खेत में गैंगरेप हुआ था. आरोपी गांव के ही कम उमर के लड़के हैं. क्या ऐसे लोगों को इस समाज में जीने का अधिकार है? अगर हम रोज होने वाली वीभत्स घिनौनी घटनाओं का जिक्र करें तो आंखे भर आयेंगी.उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक परिवार की महिला सदस्यों के साथ सरे आम गेंग रेप की घटना की स्याही अभी सूखी भी नहीं कि महासमुन्द की उस विवाहिता का क्या कसूर था कि दुष्कर्मियो ने उसे उसके घर से उठाकर कहीं का न छोड़ा. दुष्कर्म के बाद उसका वीडियों बनाया ओर उसके प्रायवेट पार्टस को लहूलुहान कर दिया. एक राष्ट्रीय पार्टी का पदाधिकारी इस मामले में लिप्त है शक नहीं कि उसके पूरे प्रभाव का इस्तेमाल होगा और पतली  गली से निकलकर फिर उसी तरह धमायेगा जिस तरह इटारसी की बच्ची के साथ हुआ. हरियाणा रोहतक में भी ऐसा हुआ था. हम अपने वेतन बढ़ाने में कोई देर नहीं करते फिर ऐसे पुराने कानून को बदलने में देर क्यों करते हैं? जो लोग पिंजरे में रहने के आदी होते हैं उन्हें जिंदगीभर पिंजरें में ही रखने का कानून बनाया जाये और जो इसके बाद भी नहीं माने उसे जेल में पूर्ण ऐशोआराम देने की जगह रस्सी पर टांग दिया जाये. समाज में किसी के भी अपनों के साथ  ऐसी घटना हो सकती है जो लोग हमेशा बंदूकधारियों की सुरक्षा में घिरे रहते हैं उनकी बात छोड़ दीजिये उनको  कोई खतरा नहीं  लेकिन आम आदमी जिसे सुरक्षा चाहिये उसे अब सामने आना ही होगा.

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

जयललिता बीमार....मार्कंडे का प्यार जागा, लालू भी आये नये अंदाज में!


अपने बयानों को लेकर विवादों में  में!रहने वालों में यूं तो देश के कई नामी गिरामी हैं लेकिल जब पूर्व चीफ जस्टिस मार्कंडे काटजू और पूर्व रेलमंत्री व बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री लालू प्रसाद बोलते हैं तो इसका रंग ही अलग होता है.यह दोनों हस्तियां अपने विवादास्पद बयानों से तत्काल चर्चा में आ जाते हैं.उनके बयानों की या तो तीव्र प्रतिक्रिया होती है या फिर उन्हें स्वंय अपने बयान का खंडन करना पड़ता है. कुछ में उन्हें इसके लिये माफी मांगनी पड़ती है. काटजू हाल ही बिहार पर दिये गये एक बयान के बाद फिर चर्चा में आये थे जिसमें उनके खिलाफ कोर्ट में याचिका भी दायर की है अब उनका ताजा बयान आया है तामिलनाडृ की मुख्यमंत्री जयललिता पर-वे कहते हैं तामिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता  शेरनी है और उनके विरोधी  लंगूर. .काटजू फेस बुक में भी हैं उसी में उन्होंने एक पोस्ट में  लिखा है कि जब वो जवान थे तो उन्हें जयललिता से प्यार हो गया था उन्होंने लिखा, उस वक्त मुझे जयललिता काफी मनमोहक लगती थीं. मैं उनके प्यार में पड़ गया था.लेकिन जयललिता को इस बारे में नहीं पता था, यह एकतरफा प्यार था काटजू ने लिखा, मुझे वह अब भी अच्छी लगती हैं लेकिन अब मैं उतना अच्छा नहीं दिखता मैं उन्हें अब भी प्यार करता हूं और मैं उनके जल्द ही ठीक होने की प्रार्थना करता हूं.तामिलनाडु की सीएम जयललिता कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं उनकी सेहत के बारे में अभी कुछ भी औपचारिक रूप से नहीं कहा गया है. अब खबर है कि राज्यपाल सी. विद्यासागर राव ने  उनके सारे विभाग प्रदेश के वित्त मंत्री ओ. पनीसेल्वम को सौंप दिए हैं देश में यह शायद पहला अवसर है जब किसी मुख्यमंत्री के इतने लम्बे समय तक बीमार होने की स्थिति में भी उनका कार्यभार किसी दूसरे मंत्री के हाथ में नहीं सौपा गया. बहरहाल अब काम देखने का दायित्व जयललिता के सबसे विश्वस्त वित्तमंत्री पनीसेल्वलम को सौंप दिया है जिसपर भी विरोध के स्वर उठे हैं.परिवर्तन के बाद भी जयललिता मुख्यमंत्री बनी रहेंगी. तामिलनाडू के लोग अपने नेताओं- अभिनेताओं के प्रेम जाल में इतने दीवाने हो जाते हें कि आगे पीछे कु छ नहीं देखते-उनको कुछ हो जाने पर आत्महत्या,आत्मदाह तक करने  तैयार रहते हैं-यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है फिर चाहे चह अन्न्नदुराई का मामला हो या चाहे जैमिनी गणेशन का अथवा सुपर स्टार रजनीकांत का- यहां के लोगों ने दीवानगी अपनी हद तक दिखाई है. इस बार मुख्यमंत्री बनने के पूर्व जयललिता को जेल जाना पड़ा था इसपर उनके समर्थकों में से कइयों ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया कुछ अब भी जब जया अस्पताल में भर्ती है तो तरह तरह की अफवाहों सेे अपने आपकों दूर नहीं कर पा रहे- इस हालात से निपटने के लिये पुलिस को एफआईआर तक का सहारा लेना पड़ा.ऐसे में अगर पूर्व जस्टिस की भावनाएं जाग जाती है तो इसमें भी किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिये. अपने विवादित बयानों के  लिये विख्यात दूसरे नेता लालूप्रसाद यादव ने इस बार आरएसएस को निशाना बनाया है विजयादशमी के दिन आरएसएस द्वारा औपचारिक तौर पर अपनी ड्रेस बदलने पर लालू  इसे संघ में शुरू हुआ बदलाव बताते हैं वे कहते हैं स्वयं सेवक खाकी की हॉफ पैंट की जगह फुल पैंट में नजर ही नहीं आएंगे बल्कि उनमें अभी और कई बदलाव होने हैं. अभी तो हमने पेंट को हॉफ से फुल करवाया है, आगे दिमाग को भी ठीक करवाएंगे. लालू तो यह भी कहते हैं  पैंट ही नहीं सोच भी बदलवाएंगे, हथियार भी डलवाएंगे. हम इन्हें अब और जहर नही फैलाने देंगे. यह बयान पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के इसी साल जनवरी महीने में राजद के एक कार्यकर्ता सम्मेलन में आरएसएस पर टिप्पणी के संदर्भ में था जिसमें उन्होनें कहा था कि आरएसएस कैसा संगठन है, जहां बुड्ढा बुड्ढा लोग भी हॉफ पैंट पहनते हैं, क्या उन्हें सार्वजनिक जगहों पर जाने में शर्म नहीं आती? लालू के बयानो की तरह रावड़ी का यह बयान भी  काफी दिनों तक मीडिया की सुर्खियों में रहा था विजयादशमी पर लालू को मौका मिला और उन्होंने रावड़ी के बयान को आगे बढ़ा दिया .हालांकि इसी बीच संघ की ओर से मार्च में अपनी ड्रेस में बदलाव की बात सामने आ गई थी. युवाओं को खुद से जोडऩे और वर्तमान जरूरत को देखते हुए हाफ पैंट की जगह फुल पैंट को अपनाने की बात कही गई थी। मंगलवार को विजयादशमी के दिन संघ ने विधिवत रूप से अपनी ड्रेस में बदलाव किया तो लालू ने तुरंत उस पर निशाना साध दिया.भाजपा नेताओं को लालू का यह बयान पसंद नहीं आया तो वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राबड़ी देवी को अब संघ की प्रशंसा करनी चाहिए क्योंकि उन्हें उनका हॉफ पैंट में घूमना पसंद नहीं था।





सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

हमारी सेना बहादुर थी, बहादुर हैै और रहेगी.....कोई शक?


उड़ी हमले में हमारे अठारह जवानों के मारे जाने के बाद हमारी सेना ने पीओके में पाक ठिकानों पर जाकर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया या 2011 में जिंजर आपरेशन को अंजाम दिया वह हमारी सेना की वीरगाथाओं में से एक है इसका श्रेय किसी पालिटिकल पार्टी का नहीं जाता और न  इस पर सेना के सिवा किसी का  इसको लेकर राजनीति करके लोग क्यों अपना समय गंवा रहे हैं?. देश पर दुश्मनों के हमले होते हैं तो मैदान में नेता नहीं सेना जाती है. सेना की वीरता पर ही जीत और हार का सारा दारोमदार टिका होता है. देश ने आजादी के बाद सेे अब तक कम से तीन से चार युद्व देखे हैं इसमें से कभी  हमारी लड़ाई चीन से हुई तो कभी पाकिस्तान से तो कभी बंगलादेश आजाद कराने के लिये. हर लड़ाई में हमारी फोज ने दुश्मनों के छक्के छुड़ायें हैं. पाकिस्तान से हमारी दुश्मनी पुरानी है पहले वह हमसे फैाज भेजकर मुकाबला करता था लेकिन अब उसकी स्ट्रेटजी बदल गई है उसने देख लिया कि हमसे वह अपनी फौज से टक्कर नहीं ले सकता तो उसने परमाणु अस्त्रो को एकत्र किया और साथ ही अपने ऐसे तत्वों को पालना शुरू किया जो आतंक पर विश्वास करते हैं- उन्हें हमारी सीमा में आतंक फैलाने के लिये भेजने की स्टे्रेटजी ने हमें मजबूर किया कि हम भी  उसकी चाल को किसी न किसी रूप में नाकाम करें. सेना ने वही किया. आतंकवादियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये उनसे निपटा गया. यह सिलसिला सेना गुपचुप रूप से वर्षो से करती आई है लेकिन अब यह मीडिय़ा और राजनेताओं की ज्यादा दिलचस्पी से सार्वजनिक हो गई जिसे हम सुरक्षा के लिये बिल्कुल उचित नहीं मानते. सत्ता, विपक्ष तथा मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का फर्ज बनता है कि वह सेना से  संबन्धित किसी भी गतिविधियों को सार्वजनिक न करें. अभी एक दो दिन पहले एक चैनल ने पाकिस्तान द्वारा हमारे नेताओं द्वारा सर्जिकल आपरेशन पर की गई राजनीति से उत्पन्न वह ब्योैरा प्रसारित किया जिसमें पाकिस्तान ने उसे तोड़ मरोड़कर पेश किया. उड़ी हमले के बाद सरकार ने बहुत से कदम उठाये यह कदम देश के हित में और देश की सुरक्षा के खातिर उठाये गये इसमें कुछ ऐसे कदम भी थे जो युद्व की स्थिति आने पर हमारी सेना को करना था  जिनमें से बहुत सी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना था लेकिन सार्वजनिक होता रहा.कुठ नेताओं ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सवाल उठाये. मुम्बई में आतंकी हमला हुआ था तब मीडिय़ा ने कुछ ऐसे दृश्यों का प्रसारण किया था जिसका फायदा दुश्मनों को मिला मसलन हमारे कमाण्डो अब पहुंच गये हैं-वे पेराशूट से उतर रहे हैं यहां तक कि उनके बिल्डिंग में उतरते  दृश्यों तक को दिखाया गया. क्या यह जरूरी था? तत्कालीन सरकार के ध्यान में जब यह बात आई तो उसने  तत्काल इसपर प्रतिबंध लगाया जो एक सही कदम था. सर्जिकल स्ट्राइक हो या अन्य किसी  भी प्रकार की सुरक्षात्त्मक कार्रवाही- हर मामले में देश के हर नागरिक का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी किसी भी हरकत से चाहे वह बयानबाजी हो या किसी टीवी पर उसका दृष्याकन सबमें बेहद सतर्कता की जरूरत है हमारी छोटी सी गलती दुश्मन को बहुत बडा फायदा पहुंंचा सकती है.सेना ने अपना काम कर दिया, यह सब हमें चैन से सोने के लिये किया. अब इसका ढिढौरा पीटने से क्या मिलने वाला? एक अंग्रेजी अखबार की खबर है कि 2011 में जिंजर आपरेशन भी वर्तमान सर्जिकल स्ट्राइक की तरह किया गया,  जिसमें भारतीय सैनिक तीन पाक सैनिकों के सिर कलम कर ले आए थे. इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सैनिक 48 घंटों तक पाकिस्तान की सीमा में रहे. ठीक है यह सेना का काम है इसे फिर से तरह उखाड़कर हम क्या हासिल करने वाले हैं? हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि हम अपने देश के चारो तरफ दुश्मनों से घिरे हुए हैं हमे अपनी सुरक्ष यूं अंदरूनी खोज करके करने की जगह यह देखना है कि चीन ने भारतीय इलाकों के समीप इतना तगडा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है कि उसको भारत में प्रवेश करने में कभी कोई कठिनाई न हो पाए,उसने पूरब से लेकर पश्चिम तक वल्र्ड स्तर के हाईवे बना लिए हैं। चीन ने लीपू झील इलाके में एक ऐसी सड़क बनाई है, जो सभी मौसमों में काम करती है इससे कैसे निपटा जाये? हमारी सेना ने सर्वोच्च साहस और वीरता का परिचय देते हुए सदैव विजय पताका फहराया है लेकिन हर बार, चाहे वह कांग्रेस की सरकार के दौरान हुआ हो या भाजपा के शासनकाल में सेना के शौर्य का श्रेय नेताओं ने झटकने की कोशिश  की है.

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

सब में मिलावट....लोग खाये तो क्या?और पिये तो क्या?



आज लोगों के समक्ष यह स्थिति बनती जा रही है कि वे क्या खाये क्या न खाये और क्या  पिये और क्या न पिये. खाने पीने की हर वस्तु या तो मिलावटी हो गई अथवा इसमें इतने केमिकल मिले होते हैं कि यह इंसान के स्वास्थ्य को बुरी तरह झकझोर रही है.देश में हर किस्म के रोगों के लिये अब खानपान जिम्मेदार होता जा रहा है. पिछले कुछ समय से सरकार ने इंसानों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया है उसकी एजेंंसियां बाजार में मौजूद ऐसे कई खाद्य पदार्थो को खोज -खोजकर उनकी जांच कर रही है जिसका बाजार काफी गर्म है अर्थात काफी मात्रा में इसका उपयोग लोग करते हैं.मिलावट से निपटने में सरकार और उपभोक्ता मंचों की जिम्मेदारी तो है ही, कंपनियां भी इस मामले में अपनी भूमिका से मुकर नहीं सकती- होता यह है कि कई कंपनियां अपने ब्रांड की नकल पर ज्यादा शोर नहीं मचातीं, क्योंकि उन्हें नकारात्मक प्रचार का डर रहता है. इस संकोच के साथ मिलावटखोरों व नक्कालों से नहीं निपटा जा सकता. नूडल्स मैगी विवाद ने खाने-पीने की चीजों में मिलावट के मामले को चर्चा का विषय बना दिया था उसके  बाद अब सरकारी जांच में स्प्राइट, कोका कोला, ड्यू, पेप्सी और 7अप में  5 जहरीले तत्व पाये गये हैं स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी)की जांच में पेप्सिको तथा कोका कोला जैसी कंपनियों के कोल्ड्रिंक्स में एंटीमोनी, लीड, क्रोमियम, कैडमियम और कम्पाउंड डीईएचपी जैसे जहरीले तत्व मिले हैं. इससे पूर्व पता चला था कि बहुत सारे घरों में सुबह नाश्ते के समय खाई जाने वाली बे्रड और बेकरी के उत्पादों में कैंसर पैदा करने वाले रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है सेंटर फार साइंस एंड इनवायर्नमेंट (सीएसई) ने बे्रड, पाव, बन, बर्गर बे्रड और पिज्जाबे्रड आदि के  नमूनों की जांच मेें चौरासी फीसद नमूनों में पोटेशियम ब्रोमेट और आयोडेट के अंश मिले. बे्रड बनाने के दौरान आटे में इन नुकसानदेह रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है.चिकित्सक कई बीमारियों के लिए मिलावटी खाद्य पदार्थों को ही जिम्मेवार बताते हैं. जिगर, दिल की बीमारियों और कैंसर के मामलों के तेजी से बढऩे की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों में मिलावट है. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने की तमाम कोशिशों के बाद भी बाजार में मौजूद खाने-पीने की ज्यादातर चीजों के शुद्ध देने का भरोसा नहीं किया जा सकता है.भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसआइए) द्वारा  तैंतीस राज्यों और केंद ्रशासित प्रदेशों में कराए गए सर्वे में झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ व पश्चिम बंगाल के शत-प्रतिशत दूध नमूनों में मिलावट पाई गई. दक्षिण के राज्यों में भी दूध में मिलावट का धंधा फल-फूल रहा है।  दूध में फैट, एसएनएफ, ग्लूकोज, स्टार्च, साल्ट, वेजीटेबल फैट, पाउडर, एसिड आदि तत्व पाए गए. पानी की मात्रा भी अधिक पाई गई. कई नमूनों की जांच में तो डिटर्जेंट व यूरिया जैसे खतरनाक तत्व भी पाए गए यह हमारा देश ही है जहां इस कदर मिलावट को सरकार भी बर्दाश्त करती रहती है और जनता भी. मिलावट के धंधेबाज धड़ल्ले से सक्रिय हैं. पशुओं से अधिक दूध निकालने या सामान्य से ज्यादा सब्जियों के उत्पादन के लिए ऑक्सीटोसिन नामक हारमोन का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है.इसके अलावा, फलों को समय से पहले पकाने या सब्जियों को दिखने में ताजा और आकर्षक बनाने की खातिर भी कई घातक रसायनों का प्रयोग वे करते हैं। दालों को चमकीला बनाने के लिए या मसालों में जिन रंगों का प्रयोग किया जाता है, उनका असर किसी से छिपा नहीं है। तंत्रिका तंत्र, हृदय, गुर्दे से संबंधित कई गंभीर बीमारियों के कारण ये कैंसर तक की वजह बन सकते हैं।सिंथेटिक दूध रासायनिक उर्वरकों (यूरिया), वनस्पति घी, डिटर्जेंट, ब्लीचिंग पाउडर व चीनी को मिला कर बनाया जाता है तथा सस्ते दामों पर बेचा जाता है. दूध की कमी के दौर में अगर सस्ता दूध मिल जाए तो गरीब आदमी उसे खरीदेगा ही.  सिंथेटिक दूध और घी बनाने में मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक रसायनों, उर्वरकों, कीटनाशकों, क्रूड वैक्स तथा इंडोनेशिया से आयातित पाम ऑयल (स्टाइरिन), तंबाकू व जूट का तेल इस्तेमाल किया जाता है. यह पाम ऑयल सस्ता तथा साबुन व डिटर्जेंट बनाने में इस्तेमाल होता है. इस सारे मिश्रण को देसी घी का रूप देने के लिए घी की खुशबू वाला एसैंस व रंग मिलाया जाता है.ये सब चीजें ऐेसी होती हैं जो कैंसर पैदा करती है.वेज तो वेज नान वेज भी मिलावटी हो गया. बकरे की जगह भेढ़ और देशी  अंडे को कलर करके बेचने का धंधा भी फलफूल रहा है. लोगों को इनसबसे कब मुक्ति मिलेगी कोई नहीं जानता
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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

रेलवे में रिकार्ड अपराध.....और अब स्पर्म के लुटेरे भी!




यह रेलवे में पनप रहे एक नए अपराध की कहानी है जो एक ऐसे गिरोह द्वारा संचालित है जो पैसा कमाने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं गिरोह ट्रेनों में सफर करने वाले युवकों सेजबर्दस्तीकर उनके स्पर्म निकालकर बेचने का धंधा करता हैं हालाकि इस मामले की पूर्ण सत्यता सामने नहीं आई है  लेकिन एक पीडि़त ने देश के एक प्रमुख अंग्रेजी-हिन्दी चैनल में अपनी आप बीती पोस्ट करने के बाद इस गिरोह का रहस्योद्घाटन किया है. वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार 2 अगस्त 2016 को विशाखापटनम से पटना के लिये एर्नाकलम एक्सप्रेस से रवाना हुए इस शख्स को रात गिरोह के दो सदस्यों ने उसके बर्थ में ही पिस्तौल की नौक पर स्पर्म निकालकर एक पोलीथीन में डालकर चलते बने.उस व्यक्ति ने पहले तो यह बात किसी को नहीं बताई लेकिन बाद में उसने न केवल पूरे कम्पार्टमेंंट को बताया बल्कि एसएमएस के जरिये भी उसने लोगों को सावधान किया है.युवक ने जो एसएमएस भेजा है उसे ज्यों का त्यों चैनल ने अपने वेबसाइट में डाला है ताकि अगर कोई अन्य ऐसा पीडित है तो उसे भी यह बताना चाहिये. पुलिस को भी चाहिये कि वह इसकी सच्चाई का पता लगाये और इस किस्म के अपराधियों को अपने जाल में फांसना एक चुनौती के रूप मेें स्वीकार करें. इस युवक की बात में कितनी सच्चाई है यह पुलिस के अन्वेषण का विषय है किन्तु ऐसा हो रहा है तो भारत की ट्रेन में इस तरह के अपराध का बिल्कुल नया ट्रेंड है, वैसे जापान में ट्रेन में सेक्स अटैक का मामला सामने आया था, इस मामले में अप्रैल 2015 में तेत्सुआ फुकदा नाम के एक अधेड़ की गिरफ्तारी हुई थी उसने 2011 से करीब सौ बार सेक्स अटैक किया था वह ट्रेनों में मुसाफिरों पर स्पर्म छिड़कता था पकड़े जाने पर उसने बताया कि उसे ऐसा करने में मजा आता था, उसकी गिरफ्तारी एक स्कूली लड़की की स्कर्ट पर गिरे स्पर्म के छीटों की डीएनए सैंपल जांच के आधार पर हुई थी. बहरहाल सुरेश प्रभ़ की ट्रेनें इस समय अपराध से लबालब हैं पिछले दो सालों में टे्रनों और स्टेशनों दोनों जगह अपराधों की संख्या में भारी वृद्वि हुई है. यह उनका मंत्रालय खुद कह रहा है.आंकडे बताते हें कि 2014 में ट्रेनों में 13,813 अपराध हुए थे. यह संख्या 2015 में बढ़कर 17,726 हो गई. 2014 में रेल परिसरों में 8,085 अपराध हुए और 2015 में यह संख्या बढ़कर 9,650 हो गई जबकि रेल मंत्रालय ने अपराध रोकने हेतु भी कोई कमी नहीं की है देश भर के 202 संवेदनशील स्टेशनों पर निगरानी तंत्र सीसीटीवी, अभिगमन नियंत्रण और तोडफ़ोड़ विरोधी जांच से जुड़ी एकीकृत सुरक्षा प्रणाली को मंजूरी दी गई है.विभिन्न स्टेशनों में 5367 सीसीटीवी तथा हर दिन दो हजार तीन सौ ट्रेनों में आरपीएफ ओर 2200ट्रेनों में जीआरपीएफ के जवान तैनात रहते हें फिर  भी अपराध कैसे बढ़ रहे हैं यह यक्ष प्रशन है. इस साल आठ महीने में अकेले छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाली ट्रेनों में चोरी की 298 घटनाएं हो चुकी हैं. पिछले साल की तुलना में सौ से ज्यादा चोरियां अब तक हो चुकी हैं. इसमें भी सबसे ज्यादा घटनाएं रात के समय एसी बोगी में हुई हैं.इसके बाद भी जीआरपी और आरपीएफ के जवानों को रात के समय एसी बोगी के अंदर नहीं जाने दिया जाता चोरों का आसान लक्ष्य एसी बोगी में सफर करने वाली अकेली महिलाएं होती हैं.जीआरपी नियमों की बाध्यता बताकर मजबूरी गिना रही है.13फरवरी को हावड़ा-मुंबई मेल, अमरकंटक एक्सप्रेस और सारनाथ एक्सप्रेस की चार एसी बोगियों में करीब एक करोड़ की चोरी हो गई. इसमें एक ही गैंग के लोगों के शामिल होने की आशंका जताई गई थी. रेलवे में अपराध की ताजा घटना  इस बुधवार की है जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जब कानपुर स्टेशन के पास हथियारबंद लुटेरों ने तड़के दो सुपरफास्ट और एक पैसेंजर ट्रेन में लूटपाट की और विरोध करने पर यात्रियों के साथ मारपीट की जिससे कई लोग घायल हो गये. हथियारों से लैस बदमाशों ने पहले लखनऊ से मुंबई जाने वाली लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस में लूटपाट की. इसके बाद बदमाशों ने वहां से गुजर रही वैशाली एक्सप्रेस के यात्रियों के साथ लूटपाट की बाद में लखनउ कानपुर पैसेंजर ट्रेन में भी लूटपाट की. कुछ  घटनाओ के पीछे पुलिस से मिली भगत से भी इंंकार नहीं  किया जा सकता वरना हथियारबंद पुलिस के होते किसी की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वह यात्रियों के साथ मारपीट व लूटपाट को एक साथ अंजाम दे सके. जो खबरे आ रही है उसके अनुसार  बदमाश लूटपाट करने के बाद भागने में कामयाब रहे चूंकि यह घटना उन्नाव और कानपुर जिलों के बीच हुई तो पहले तो दोनो जिलों की जीआरपी पुलिस सीमा विवाद में ही उलझ पड़ी.













मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

अपराध की तपिश से क्यों झुलस रहा छत्तीसगढ़?

 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित बड़े शहर इन दिनों गंभीर किस्म के अपराधों से झुलस रहे हैं वहीं पुलिस की नाकामी ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं. एक के बाद एक अपराध और उसमें पुलिस की विफलता ने यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि आखिर यह शांत राज्य अपराधों से कैसे झुलसने लगा?. एक के बाद एक होने वाले अपराधों से पुलिस से ज्यादा छत्तीसगढ़, विशेषकर राजधानी रायपुर में बाहर से आने वाले नागरिक ज्यादा परेशान हो रहे हैं-घटना के तुरन्त बाद पुलिस की कार्रवाही नाकेबंदी होती है इसमें अपराधी तो पतली गली से निकल जाते हैं लेकिन सड़क पर चलने वाले आम आदमी की फजीहत हो जाती है जैसे उसी ने सारा जुर्म किया हो.हाल ही कई वाहनों को रोककर जबर्दस्त तलाशी ली गई. किसी से कुछ नहीं मिला,उलटे अपराधियों को भागने का मौका मिल गया. बड़ी बड़ी घटनाओं ने शहरों में दहशत की स्थिति पैदा कर रखी है. आम आदमी को अपनी सुरक्षा पर संदेह है.असल में छत्तीसगढ़ बाहरी उन अपराधियों का पनाहस्थल बन गया है जिनकी दूसरे राज्यों की पुलिस को तलाश है. अपराधी कतिपय स्थानीय लोगों की मदद से दूसरे राज्यों से आने वाली ट्रेनों व बसों से यहां पहुंचते हैं तथा अपने रिश्तेदारों के यहां किसी न किसी बहाने ठहरते हैं,अपना मकसद पूरा होते ही आसानी से लौट जाते हैं फिर पुलिस इसको खोजने के लिये टूर प्रोग्राम बनाती है ,दूसरे राज्यों मे खोजबीन कर एक दो पुराने हिस्ट्री शीटरों को लाकर अपनी खानापूर्ति करती है. यह सिलसिला कुछ समय से यूं ही चल रहा है. असल में शहर के प्राय: सभी थानों की यह स्थिति बन गई है कि यहां स्थानीय पुलिस कर्मियों की जगह ऐेसे पुलिस कर्मियों को लगाया गया है जो रायपुर के किसी मोहल्ले को तथा वहां रहने वालों तक से परिचित नहीं हैं. हाल ही भारी मात्रा में चंदन की लकड़ी पकड़ी गई.जब कुछ साल पहले रायपुर मे चंदन तस्करों के बीच संघर्ष में एक व्यक्ति की जान चली गई थी तब से पुलिस को इस बात का अंदाज तो हो ही गया था कि रायपुर और आसपास के शहरो में इसका कोई न कोई लिंक है पर फिर भी उसकी नाक के नीचे यह कारोबार पनपता रहा. उसे इस बात की जानकारी तब लगी जब नागपुर में अपराधी पकडे गये. असल में हमारे यहां कार्रवाही तभी होती है जब हमपर बीतती है या किसी के कहने पर बात आगे बढ़ती है.छत्तीसगढ़ पुलिस के बारे में आज की स्थिति में यही कहा जा सकता है कि एक तरह से उसका राजनीतिकरण हो गया है,उसके कतिपय अफसरों को काम से ज्यादा प्रचार प्रसार में ज्यादा विश्वास हैै शायद एक कारण यह भी है कि अपराधियों को पकडऩे में वह पूर्णत: निष्फल साबित हो रहा हैं. असल बात तो यह है कि आम जनता बिल्कुल सुरक्षित नहीं है, किसी के साथ कभी भी कोई घटना हो सकती है. पुलिस तंत्र पूरी तरह फिसड्डी साबित हो रहा है.राजधानी में अपराधिक घटनाएं प्रति दिन हो रही है और पुलिस एक भी अपराधी को पकडऩे में सफल नहीं है.पुलिस का सूचना तंत्र फेल हो चुका है शासन का शिकंजा भी पुलिस प्रशासन पर जिस तरह होना चाहिए वह नहीं है. राजधानी के लालपुर स्थित शराब दुकान के सेल्स मेन अशोक सिन्हा पर गोलीचलाकर अपराधी 4 लाख रूपए लूटकर ले गयेे वहीं अनुपम नगर में सराफा व्यपारी प्रवीण नाहटा पर दो युवकों ने गोली चलाकर लूटपाट कर चलते बने. पुलिस सड़कों पर बेरियर लगाकर खाख छानती रर्हीँ. इसी तरह टिकरापारा भैंवर सोसयटी में पंकज बोथरा की गोली मारकर हत्या और लूट, भनपुरी की शराब दुकान में कैशियर को गोलीमारकर साढ़े 12 लाख की लूट, शारदा चौक से फैक्ट्री मालिक से साढ़े 12 लाख की उठाईगिरी के साथ शहर में चेन स्नैचिंग की वारदातें तो आये दिन होते रहती है. अब यह स्थिति हो गई है कि पुलिस अपराध का एफआईआर करती है और भूल जाती है. पुलिस का अपना कोई ऐसा तंत्र अभी तक विकसित नहीं हुआ है जो तत्काल अपराधियों की गिरेबान तक पहुंच जाये. बस सीसी कैमरे की धुंधली तस्वीरे ही भगवान बनकर उनके पास है.दिलचस्प बात तो यह है कि कतिपय मामलों में फुटेज मिलने के बाद भी कार्यवाही करने की जगह सीसीटीवी में उबर आये चित्रों को देखकर ललचाते रहते हैं .पुलिस की सुरक्षा आजकल छत्तीसगढ़ में किसे मिल रही है यह आज प्रत्येक व्यक्ति की जुबान पर सवाल के रूप में मौजूद है. अपराधियों के पंजे प्रदेश में बच्चे, बुढ़े, महिलाएं किसी को भी निशाने पर ले लेते हैं औैर हमारी व्यवस्था बस एक मूक दर्शक बनी हुई ताक रही है.  

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

पैसठ हजार लोग 'काले से 'गोरे हो गये, बाकी कब?


काला धन एक समानान्तर अर्थ व्यवस्था को पैदा करता है इससे देश का विकास रूक जाता है और उपभोक्ता वस्तुओं तथा उत्पादक वस्तुओं में कमी होती है. ब्लेक मनी अर्थात् गैर कानूनी धन जीवन का एक धु्र्रव सत्य बन चुका है जो पिछले कुछ वर्षो के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचा रहा है. लोकसभा चुनाव में कालाधन एक अहम मुद्दा था, जिसके बल  पर भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला. नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो विदेशों में जो काला धन जमा है वे उसे भारत लायेगे और प्रत्येक व्यक्ति में खाते में पन्द्रह पन्द्रह लाख रूपये डालेंगे-यह वादा कब पूरा होगा यह तो पता नहीं लेकिन देश से कालाधन बाहर लाने के मामले में सरकार को एक विशेष सफलता हाल के महीनों में मिली- सरकार ने घरेलू आय घोषणा योजना (इनकम डिक्लेरेशन स्कीम) आईडीएस लागू की जिसके तहत देश के 64,275 लोगों ने  4 महीनों के दौरान 65,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बेनामी संपत्ति का खुलासा किया. घरेलू आय घोषणा योजना के तहत लोग अपने काले धन का खुलासा तय समय के भीतर करने पर से टैक्स और पेनाल्टी से बच गये. इसके तहत उन्हें काला धन को सार्वजनिक करना था जिसके बाद उनपर कोई कानूनी कार्रवाई होगी. सरकार ने इस योजना के तहत ज्यादा से ज्यादा काला  धन अपने खाते में लाने के लिये कई किस्म की कोशिशें की.इस स्कीम के तहत 45 फीसदी टैक्स और पेनाल्टी के बाद ब्लैकमनी को व्हाइट किया जा सकता था.सरकार ने अभी जो वक्त दिया उससे जितने लोग काले से गोरे हो गये लेकिन अब जो बचे  हैं उनकी संख्या इन गोरे हुए लोगों से बहुत ज्यादा है इनपर सरकार की जो कार्रवाही होगी वह कठोर तो होगी ही साथ ही ऐसे लोगों के पास से जो धन निकलेगा वह शायद इससे कई गुना ज्यादा होगा बशर्ते सरकार इस मामले में ईमानदारी से कठोर कार्रवाही बिना झिझक व बिना प्रभाव को देखे करे.सरकार की धमकी है कि 30 सितंबर के बाद से काला धन रखने वालों को कड़ी कार्रवाई और जेल जाने जैसे अंजामों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. इस योजना में उम्मीद से कम ही सही लेकिन काले धन का खुलासा हुआ है. औसतन हर व्यक्ति ने 1 करोड़ रुपये का खुलासा किया. हालांकि कुछ का ज्यादा है तो कुछ का कम इससे एक प्रशन यह भी पैदा होता है कि कई लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कार्रवाही से बचने के लिये अपने छिपाये गये धन  के कुछ हिस्से को बताकर सरकार की कार्रवाही से बचने का  प्रयास कर गये? काले धन का व्यापार में प्रयोग न किया जाना तथा धन को केवल जोड़कर, छिपाकर रखना एक अच्छा आर्थिक विकास है, क्योंकि इस प्रकार धन की मात्रा में कमी करके मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखता है लेकिन जिस व्यक्ति के पास काला धन होता है वह उसका प्रयोग करना भी जानता है वह जानता है कि जीवन छोटा है इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण को जिया जाना चाहिए इसलिए वह अपने घर का विस्तार करता है, घर में बड़ेे शानो-शौकत एवं ऐय्याशी के साथ रहता है, शादी तथा अन्य उत्सवों पर धन पानी की तरह बहाता है अथवा सोना तथा ऐसे कीमती पत्थर जमीन, हीरे-जवाहरात खरीदता है, जिन्हें पास रखने में आसानी होती है.पिछले कुछ वर्षो के दौरान देश में जहां कालेधन  की बाढ़ आ गई वहीं विदेशी बैंकों में यह बहुत ज्यादा तादात में जमा होता रहा. सरकार अगर देश की तरह विदेश में जमा कालाधन भी बाहर लाने  में कामयाब हो गई तो देश से गरीबी का जहां नामोनिशान मिट जायेगा वहीं लोग अच्छे काम धंधों में भी लग जायेगें. रोजगार को बढ़वा मिलेगा और विकास कार्यो को बल मिलेगा. अपराध की प्रवृत्ति में कमी आयेगी.काले धन के स्वामी तथा नियंन्त्रक काले धन को स्थानीय तथा संसदीय निर्वाचनों में व्यय करने के लिए बचाकर रखते हैं, इसे वह एक प्रकार से उम्मीदवार के ऊपर किया गया अर्थविनियोग समझते है जो बाद में उनके लिए लाभकारी सिद्ध होता है  वे इस बात से अच्छी तरह परिचित होते हैं कि यह अर्थविनियोग एक लम्बे समय का धन स्रोत संयोजन है और इसे वह उम्मीदवार पर उचित समय में प्रयोग करके उससे लाभ उठाते हैं इन प्रवृत्तियों पर अगर तेजी से लगाम लगता है तो संभव है आगे आने वाले दिन देश के प्रत्यके व्यक्ति के लिये अच्छे दिन में बदल जायें.