गुरुवार, 29 सितंबर 2016

सेना ने वादा निभाया-चुनी हुई जगह और समय पर जवाब दिया!

  इस सर्जिकल स्ट्राइक्स को भले ही कुछ लोग उत्तर प्रदेश चुनाव से पूर्व मोदी की छवि सुधारने का प्रयास या और कुछ कहें लेकिन हम मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी का यह कदम उडी हमले के बाद पाक को सबक सिखाने के लिये उठाया गया अब तक का सबसे बेहतरीन कदम है जो पूरे सोच समझकर और पूरी ब्यूह रचना के साथ किया गया. ठीक वैसा ही जैसा अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ओसामा बिन लादेन के साथ किया था. पाकिस्तान में छिपे इस कुख्यात आंतकवादी को बिल से निकालकर अमरीकियो ने समुन्द्र में फेक दिया था.हमारी सेना ने उनके अनुयायिों को वहीं दफनाने के लिये छोड़ दिया. पाक आतंकवादी ठिकाने पिछले कई समय से भारत के लिये सरदर्द बने हुए हैं. म्यामार में हमारी सेना की कार्यवाही के बाद से लगातार यह मांग उठती आ रही थी कि पाक अधिकृत कश्मीर में छिपे बैठे आतंकवादियों पर भी इसी प्रकार की कार्यवाही की जाये.उड़ी हमले के बाद पाक को उसकी औकात दिखाने का समय आ गया और कहना चाहिये कि नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के समय जिस छप्पन इंच के सीने की बात कही थी वह हकीकत में दिखा दी. ऐसे मामलों में तत्काल निर्णय लेने की जरूरत होती है जो हर किसी के बस की बात नहीं .सेना को ऐसे मामलों में कोई ठोस निर्णय लेने के लिये उच्च स्तर पर आदेश की प्रतीक्षा रहती है इस मामले मेंं फैसला शायद उसी दिन हो गया था जिसदिन पाक के आंतकियों ने उड़ी में अपनी नापाक हरकत को अंजाम दिया. सारे देश के साथ देश का विपक्ष और सत्तासीन लोग सभी यह चाहते थे कि इस बार इन आंतक के ठकेदारों को सबक सिखाना ही होगा. आतंक के ठिकानें पाक अधिकृत क्षेत्रों में थे और यहां जाकर वार करने के लिये प्रधानमंत्री की अनुमति जरूरी थी... और आखिर देश के गुस्से ने अब चाहे जो हों देखा जायेगा कि तर्ज पर एलओसी क्रास करा दी. दुश्मन न केवल मारे गये बल्कि हमने बदला भी निकाल लिया.पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक्स के बाद जश्न का माहौल है. सेना ने जो कहा वो किया. आतंकवादियों को उन्हीं की मांद में उनकी ही भाषा में जवाब दे दिया लेकिन हमें बहुत ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं, दुश्मन अब पहले से ज्यादा आक्रामक होकर बिल में छिपा बैठा हे उनके आंका छिपकर योजनाएं बनाने में लगे हुए हैं. वे मोके की तलाश में हें कभी भी पलटवार कर सकते हैं. जिस प्रकार उड़ी हमले के बाद हमारा लक्ष्य आतकंवादियों के ठिकानों को नष्ट करने का था ठीक इसी प्रकार अब हमार लक्ष्य पडौस में छिपे इन आंतकवादियों के आकाओं को भी उनके बिलों से बाहर निकालकर मारने का होना चाहिये. कई तीसमारखां पाक के संरक्षण में पल रहे हैं और भारत की तरफ आंख गढ़ाये बैठे हैं.पीओके में आतंकियों के ठिकाने ध्वस्त से पाक में छिपे हमारे देश के दुश्मनों के सीने में आग लगी हुई है इससे निपटने भी हमारी फौज पूरी तरह सक्रिय है हम किसी भी मुकाबले के लिये तैयार हैं. हम इतने वर्षो तक उसकी मनमानी को बर्दाश्त करते आ रहे हैं लेकिन अब हमारे सहनशक्ति की हद हो चुकी है. हमें आर या पार चाहिये. सेना पूरी तरह इसके लिये तैयार है-सैनिको को इस दिन का इंतजार था. वे अपनी तरफ से छुट्टियां रद्द करवा रहे हैं.अगर पाक ने हमारी इस कार्रवाही के जवाब में उतरने की कोई भी कोशिश की तो इस बार उसे जवाब पहले जैसा नहीं उससे कई कठोर ढंग से मिलेगा. पाक के आंतकवादियों को उडी हमले की योजना बनाने में काफी समय लगा होगा लेकिन हमने उसके छह ठिकानों को एक ही झटके में समाप्त कर दिया.कमांडोज ने आतंकियों पर ग्रेनेड से हमला किया. अफरा-तफरी फैलते ही स्मोक ग्रेनेड के साथ ताबड़तोड़ फायरिंग की.और , देखते ही देखते 38 आतंकवादियों को ढेर कर दिया गया. हमले में पाकिस्तानी सेना के दो जवान भी मारे गए. साथ ही इस ऑपरेशन में दो पैरा कमांडोज भी लैंड माइंस की चपेट में आने के कारण घायल हुए हैं.सेना प्रमुख दलबीर सुहाग ने इस ऑपरेशन की तारीफ करते हुए ठीक ही कहा है कि सेना ने अपने कहे का पालन किया है और चुनी हुई जगह और समय पर इसका जवाब दिया है.  

बुधवार, 28 सितंबर 2016

बिना खून खराबे के ही हमने अपने दुश्मन की रीढ़ तोड़ दी!




किसी को अगर सजा देना है तो इससे अच्छी बात ओर क्या हो सकती है कि उससे बात करना ही बंद कर दे. यह सजा उसे मारने- पीटने से भी ज्यादा कठोर होती है. पीएम नरेन्द्र मोदी यह नुस्खा अच्छी तरह जानते हैं.उन्होंने उत्पाती पडौसी को सबक सिखाने के लिये जो रास्ता चुना वह युद्व का न होकर कुछ इसी तरह का है जिसने आंंतक फैलाने वाले पडौसी को संसार में हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया. उड़ी में हमारे अठारह जवानों को शहीद बनाकर वह यह सोचने लगा था कि उसने इस आतंक के बल पर भारत की एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या को सबक सिखा देगा लेकिन उसने यह नहीं समझा कि उसके इस हथियार से बड़ा हथियार लेकर हमारे प्रधानमंत्री मैदान में है. पाक ने लुका -छिपी के खेल में हमारे देश में खून बहाया तो हमने बस इतना कहा कि तुम पानी -पानी के लिये तरसोगे तो उसके होश उड गये.पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया से अलग-थलग करने की रणनीति ने अब अपना असल रूप दिखाना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार ने जहां सिन्धु जल समझौते पर कड़ा रूख अपनाया वहीं मंगलवार को यह  बड़ा फैसला लिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवंबर में इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेंगे और अंतत: दक्षेस सम्मेलन स्थगित भी हो गया चूंकि सार्क में शामिल कोई एक देश भी अगर सम्मेलन में आने से इंकार करता है तो सम्मेलन नहीं होता. इधर बौखलाए पाकिस्तान ने भी कह दिया कि कोई आये चाहे न आये हम नवम्बर में सार्क सम्मेलन आयोजित करके रहेंगे. इस समय सार्क देशों का अध्यक्ष नेपाल है. इस मामले पर एक अच्छी बात यह हुई कि हमें कम से कम यह पता चलने लगा कि हमारे पडौस में हमारे सच्चे दोस्त कौन है.पडौसी देश बंगलादेश, अफगानिस्तान,भूटान ने तत्काल भारत के साथ सार्क सम्मेलन में भाग नहीं लेने का निर्णय लेकर भारत की स्थिति को जहां मजबूत बनाया वहीं यह साबित कर दिया कि इस लड़ाई में वह भारत के साथ है लेकिन अभी  भी बहुत से पडौसी ऐसे हैं जिनकी प्रतिक्रिया अभी मिलना शेष है. अमरीका की मीडिय़ा ने पाक को यह जता दिया कि वह मोदी की अपील को ठुकराकर भारत से पंगा न ले वरना विश्व में अछूत बनकर रह जायेगा. यह पहली बार हो रहा है जब पाकिस्तान विश्व में अकेला पड़ता नजर आ रहा है. उसे चीन की दोस्ती पर बहुत दंभ था लेकिन चीन ने आंतकवाद के मामले मेंं उसका साथ न  देने का ऐलान कर उसे अपनी औकात दिखा दी. भारत ने पाक को उरी हमले में उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत देकर यह जता दिया है कि आतंकवादियों के खिलाफ कदम उठाने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता उसके पास हीं है. सार्क सम्मेलन में भारत सहित चार देशों के भाग नहीं लेने से इस्लामाबाद में यह सम्मेलन अब नहीं होगा.पाकिस्तान ने शायद सपने में भी  नहीं सोचा होगा कि उसके नापाक चालों की आंच इतना उग्र  रूप धारण कर लेगा. सिंधु नदी  का पानी रोकने वाली बात को भी उसने  हीं सोचा.  अगर सिंधु नदी से उसे पानी नहीं मिला तो पाक में त्राहि त्राहि मच सकती है. पाकिस्तान के अस्तित्व  पर भी बैठे बिठाये संकट गहरा जायेगा. हकीकत यह कि सिंधु जल समझौते पर हमारा रूख पाकिस्तान को युद्व से भी भारी पड़ सकता है. शायद इसीलिये पाकिस्तान और बुरी तरह बौखला गया है.केरल के कोझिकोड में प्रधानमंत्री  की गर्जना  और विदेश मंत्री सुषमा सुराज की यूएन में दहाड़ ने वास्तव में विश्व को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत से मुकाबला पाकिस्तान के लिये इतना आसान नहीं है. पाक हुक्मरान भले ही परमाणु अस्त्र से डराने की कोशिश करें लेकिन हमारे पानी ने ही उसके गले को सुखाकर रख दिया. विश्व को भारत यह समझाने में पूरी तरह कामयाब हो गया है कि एक देश सीमापार से लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, इतना ही नहीं, दूसरे देशों के घरेलू मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहा है, ऐसे कठिन समय में  अधिकांश  यूरोपियन राष्ट्रों की तरफ से भी भारत को पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है.अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान से कहा है कि उन्हें हिंसा के जरिए नहीं बल्कि कूटनीति के जरिए आपसी मतभेद सुलझाने चाहिए हालांकि उसने भी स्पष्ट कहा है कि पाकिस्तान को अपनी हदों का ख्याल रखना चाहिए.




रविवार, 25 सितंबर 2016

इंसान की ताकत- बहादुरी(?) के कारनामें इंसानों पर ही




 लोग धीेरे धीरे काफी बहादुर(?) होते चले जा रहे हैं वे कभी अपनी मर्दानगीे सड़कों पर दिखाते हैं तो कभी घरों पर!... और इस  मर्दानगी का शिकार कहीं कोई अबला बनती है तो कभी कोई मासूम सी बच्ची! जबलपुर के एक संभ्रान्त परिवार की महिला ने पिछले दिनों अपनी मासूम बेटी का इसलिये कत्ल कर दिया चूंकि वह बेटी नहीं बेटा चाहती थी- उसने अपनी मासूम बच्ची को मारकर एसी के अंदर छिपा दिया. एक बहादुर(?) प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को दिल्ली में सरे आम चौबीस बार चाकू मारकर अपनी बहादुरी(?) का प्रदर्शन किया. हाल ही चेन्नई की एक अदालत ने दिलचस्प बात कही- पत्नी ने अदालत को बताया था कि उसका बहादुर? पति उसे पीटता है. अदालत ने पति महोदय को फटकार लगाते हुुए कहा कि अगर पीटना ही है तो सरहद पर जाओं वहां आतंकवादी खूब उत्पात मचा रहे हैं, उनको पीटो. ऐसे बहादुर(?) लोगो के लिये कोर्ट का ऐसा ही आदेश शोभा देता है.पता नहीं कितने लोग इसका पालन करेंगे, बहरहाल असल मुद्दा आज यही है कि देशभर में बलवान पुरूष एक  दो या तीन मिलकर किसी  भी अबला के साथ कहीं भी अत्याचार कर रहे हैं,हमारे कानून के लचीलेपन के कारण या तो ऐसे लोगो को कोर्ट से जमानत मिल रही है या फिर उन्हें बरी कर दिया जाता है. गोवा में एक विदेशी महिला से रेप करने वाले दोनो आरोपियों को निर्दोष बरी कर दिया गश्स. कानून की कमजोरी ने अपराधियों को यह मौका दिया. हमारा  कानून क्यों नहीं बताता कि यह नहीं तो इस मामले में कौन इनवाल्व था?ऐसे में तो पीढितों को कभी न्याय ही न मिले. कई ऐसे लोग मर्डर करने के बाद सबूत नहीं होने के कारण छूट जाते हैं. छूटने के बाद पीडि़त पक्ष रोता रहता है-उसे तो कहीं न्याय नहीं मिला. जिसने रेप  किया या मर्डर किया  वह सबके सामने है पर सबूत के अभाव में छूट जाता है. फिर यहां भी वही सवाल  कि आखिर रेप या मर्डर करने वाला कौन?अदालत से बरी होने के बाद पुलिस का काम खत्म ... क्यों हमारी व्यवस्था ने इसतरह के नियमों को अंगीकार कर रखा है जो पीडि़तों को न्याय ही नहीं दिला पा रही है. एक मार्मिक खबर एक रेप पीडि़ता की आई जिसमें उसके साथ तीन युवकों ने रेप किया उसकी जिंदगी  तबाह हो गई हंसता खेलता परिवार सदमें आ गया. युवकों को पकड़कर सजा भी हुई लेकिन परिवार पर जो बीती उसका मुआवजा तो इस जन्म में उसे मिलने वाला नहीं. क्यों ऐसे गलत नियमों को सुधारने  का प्रयास सामाजिक और सरकारी  तौर पर नहीं होता? पति के जेल में होने के कारण अगर किसी महिला केा अपने दुध मुंहे बच्चे पर गुसा निकालने की नौबत आये तो इसे क्या कहना चाहिये? छत्तीसगढ़ के जशपुर में एक मां ने अपनी दस माह की दुधमुंही  बच्ची को इसलिये घूसेा मार मारकर  मार डाला चूंकि उसके पास अपने पति को छुड़ाने के लिये पैसे नहीं थे. कोई भी मां इस  तरह का कृत्य अपने कलेजे के टुकड़े के साथ नहीं करेगी  मगर उसने ऐसा किया वह अब अन्य महिलाओं व समाज  की नजर में दुष्ट मां है और न जाने  क्या- क्या?गरीबी  ओर पैसे के अभाव मे इंसान की मति मारी जा रही है, वह ऐसे कृत्य करने लगा है जिसको कोई भी  इंसान होश मेें रहकर नहीं करना चाहेगा - बहरहाल समाज का  तंत्र भी कई भागों में बंटा हुआ है एक तरफ जहां दु:ख और चिंता है तो दूसरी ओर खुशी भी है. लोग जहां बच्चा न होने  से दुु:खी होकर दूसरे बच्चे की चोरी तक कर डालते हैं वहीं कुछ लोगों के यहां बच्चों की ऐसी बारिश भी हो जाती है कि परिवार इसमें खुशी से फूला नहीं समाता. ऐसा हुआ मेरठ के एक गांव में जहां एक मां ने एक साथ चार बचचो को जन्म दिया तो पुरा परिवार फूला नहीं समाया. इसे और जशपुर की घटना को जोड़कर कैसे देखा जाये?




मंगलवार, 20 सितंबर 2016

थानों में पिटाई...यह तो होता आ रहा है!


थानों में पुलिस पिटाई कोई नई बात नहीं है-यहां जात पात,ऊंच-नीच या धर्म  देखकर कार्रवाही नहीं होती बल्कि सबकुछ होता है पुलिस या खाकी की दबंगता के नाम पर...चोरी,लूट,अपहरण,हत्या जैसे मामले में थर्ड डिग्री का उपयोग जहां आम बात है वहीं पालिटिकल बदला लेने और पैसे देकर पिटाई कराने के भी कई उदाहरण हैं. इसके पीछे बहुत हद तक हमारी वर्तमान व्यवस्था स्वंय जिम्मेदार हैं जिसने थानों को कई मायनों में छुट्टा छोड़ रखा है जिसपर अक्सर किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं रहता. बड़े अफसर कभी  कबार दूर दराज के थानों  में पहुंच गये तो ठीक वरना सारा थाना वहां के हवलदार और सिपाहियों के भरोसे चलता हैॅ. छत्तीसगढ़ के जांजगीर में एक शिक्षक  के बेटे सतीश के साथ जो कुछ हुआ वह कई थानों में आम लोगों के साथ होता है. कुछ लोग झेल जाते हैं और कुछ यूं ही सतीश की तरह प्राण त्याग देते हैं. सन् 2003 में पूरे पुलिस महकमें में अंबरीश शर्मा कांड की चर्चा रही.टीआई रेंक के इस अधिकारी और उसके साथियों की पिटाई से बलदाऊ कौशिक की पुलिस कस्टड़ी में मौत हो गई. अम्बरीश और साथी पुलिस वालों पर हत्या का मुकदमा चला.अतिरिक्त सेशन जज दीपक तिवारी की अदालत से अम्बरीश शर्मा को दस साल का कठोर कारावास और पैसठ हजार रूपये जुर्माना की सजा हुई अम्बरीश के सहयोगी सब इंस्पेक्टर राजेश पाण्डे को पांच साल का कठोर कारावास व बीस हजार रूपये  जुर्माना की सजा सुनाई गई.इतना ही नहीं इस मामले में थाने के सात अन्य को भी दो दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.कवर्धा थाना के अंतर्गत 22 मई 2002 को पुलिस कस्टडी में बलदाऊ की मौत हुई थी. इस घटना में पुलिस को सजा ने संपूर्ण पुलिस महकमें में सनसनी फैला दी. थानों में मारपीट की  घटनाओं पर अंकुश सा लग गया. पुलिस का काम थर्ड डिग्री मेथड़ के बगैर संभव ही नहीं है चूंकि अपराधी कभी प्यार से पूछो तो बताता नहीं.ऐसे में पुलिस के लिये काम इतना कठिन हो गया कि इसके चलते कई मामलों में अपराधी ही पुलिस पर हावी होने लगे. बहरहाल समय के साथ सब पिछली घटनाओं को भूल जाते हैं, थाने  फिर गर्म होने लगे.  पुलिस के लिये यह एक झटका  देने वाली  बात है कि उन्हें जो  काम समझबूज से निपटाना चाहिये उनमें से निनयानवे प्रतिशत में वे बल का प्रयोग करते हैं यह काम उन लोगों पर कतई नहीं करते जो पैसे वाले हैं, जो रसूखदार है और जो किसी न किसी प्रभावशाली के रिश्तेदार हैं. ऐसे लोगों को अपना शिकार बनाया जाता  है जिसका कोई नहीं .छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में भी शायद कु छ ऐसा ही हुआ.मुलमुला थाने में सतीश नोरंगे जो एक शिक्षक का बेटा हैं कथित रूप से सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में थाने लाया गया और पुलिस कस्टडी में मौत हो गई इस मामले में एक एसआई समेत चार पुलिसवालों पर हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है इसके अलावा सरकार ने न्यायिक जांच बिठा दी है. टीआई समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 302 के अलावा थाने के स्टॉफ पर एससी-एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है.छत्तीसगढ़ में पुलिस प्रणाली  को फिर से दहला देने वाली इस घटना पर अब सरकार कई बिन्दुओं पर जांच करा रही है. हम इस बात का  स्वागत करते हैं कि सरकार ने समय पर  संज्ञान लिया और न्यायिक जांच के आदेश दिये तथा पीडि़त परिवार को छह लाख का मुआवजा और मृतक की पत्नी को  नौकरी देने  का फैसला किया लेकिन अब भी कई प्रश्न पुलिस की प्रणाली पर यूं ही सतह पर है कि संदेह या पूछताछ  के नाम पर क्या किसी भी व्यक्ति को थाने में बुलाने की प्रथा उचित है? क्या पुलिस जब किसी ऐसे संदिग्ध व्यक्ति को थाने  बुलाकर उससे पूछताछ करती है तो उसके पास क्या आधार होता है कि उसने कोई ऐसा कृत्य किया होगा? अगर पूछना ही है तो उसके पास उसके किसी रिश्तेदार को भी बिठाने की क्यों नहीं व्यवस्था की जाती? संदेही के साथ अपराधी जैसा व्यवहार क्यों होता है? उससे सच उगलवाने के लिये पिटाई की जाती है. इस पिटाई का उस समय खामियाजा क्या है जब  यह पता चलता है कि उसका दूर दूर तक इससे कोई संबन्ध नहीं है? क्या सरकारी काम में बाधा डालने जैसे अपराध की सजा थाने में पिटाई है? या उसे अदालत में पेश कर न्याय का इंतजार करना चाहिये? अक्सर पुलिस की कई मामलों में पूछताछ का आधार कुछ ऐसा ही होता आया है. पक्के सबूत के बगैर किसी को भी यूं ही तंग किया जाना एक आदत बन गई है. इससे पुलिस के प्रति लोगों का विश्वास तो घटता ही है और कवर्धा जांजगीर जैसी घटनाएं जन्म लेती है. पुलिस पर कानून का डंडा चलता है तथा अदालती कार्रवाही होती है तो पुलिस में काम करने वाले अन्य स्वच्छ छबि वाले  लोगों के लिये भी काम करना मुश्किल हो जाता है=कहने का तात्पर्य यही कि उनका नैतिक बल गिर जाता है तथा संपूर्ण व्यवस्था को कोसने मजबूर हो जाते हैं. वैसे  जांजगीर के पूरे मामले में सबूत स्पष्ट तौर पर पुलिस के खिलाफ जाता है चूूंकि मृतक  के शरीर पर पड़े  निशान पूरी तरह यह साबित कर रहे हैं कि सतीश के साथ काफी क्रूरता से पुलिस पेश आई थीॅ.चिकित्सकों की कलम पर  भी संदेह की लकीरे हैं1

सोमवार, 19 सितंबर 2016

फिर वही -ढाक के तीन पात! आखिर कब तक?


फिर वही -ढाक के तीन पात! आखिर  कब तक?
सोमवार को दिनभर चले घटनाक्रम के बाद अब यह लगभग निश्चित हो चला है कि उरी हमला भी पिछले अन्य हमलों की ही तरह जुबानी जंग के बाद भुला दी जाएगी लेकिन 17 जवानों की शहादत को देश सदैव याद रखेगा.जम्मू-कश्मीर के उरी में सेना के ब्रिगेड कैंप पर हमले ने देश को झकझोर कर रख दिया है. 17 जवानों के एक साथ शहीदी हो जाने की खबर ने चारों तरफ दुख और सनसनी फैला दी लेकिन यह खबर भी अब पूर्व की घटनाओं की तरह अतीत की बात लगने लगी. वैसे इस बार का  आक्रोश इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला चूंकि इतना बड़ा संहार एकसाथ दुश्मन इससे पहले एक ही दिन में चंद घंटो में शायद इससे पूर्व (मुम्बई हमलों को छोड़कर) कभी नहीं कर पाया.  राजनेता से लेकर अभिनेता, सांसद से लेकर आम आदमी तक, सबने एक सुर में सैनिकों की शहादत को सलाम किया और आतंक के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जरूरत बताई, इन बयानों में से ज्यादातर बयान पुरानी लीक पर थे, कोई नई बात नहीं -आजादी के बाद से ही आतंकवाद का नासूर लेकर पल रहे हमारे देश में हर आतंकी हमले के बाद कमोबेश एक जैसे बयान आते हैं 'हम हमलों की कड़ी निंदा करते हैं, आतंकियों को बख्शा नहीं जाएगा.Ó-'हम अपने जवानों की शहादत का बदला लेंगे, आतंक फैलाने वाले देश को बेनकाब किया जाएगाÓ जैसे बयानों से अखबार और टीवी पट जाते हैं. देश पर आतंकी हमलों के बाद एक तरह की जुबानी जंग शुरू होती है ठीक वैसे ही जैसे छत्तीसगढ़ मेंं माओवादी हमलों के बाद शुरू होती है मगर कभी मुकम्मल नहीं होती, हर बार देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले जवानों की शहादत भुला दी जाती है.शहादत का अंतिम संस्कार भी ऐसे कि कभी कभी तो उसमें भी रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर आ जाती है जैसा हाल ही में शहीद हुए एक जवान के शहीदी पर उसके संस्कार के लिये लकड़ी कम पड़ गई तो उसके पार्थिव शरीर के साथ जो कृत्य किया गया उसने वास्तव में यह सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि हम किस गलतफहमी के मंजर में फंसे हुए हैं. इस रविवार को फिर एक हमला हुआ है, फिर वैसे ही बयान आए हैं, जैसे पहले आते थे, मगर ये बातें कुछ ही  दिन में थम जाएंगी ... आज की सुबह आते आते थम भी गई....हां उन जवानों की शहादत भ्ी भुला दी जाएगी.उनके परिवार के लोग परेशानियों के जंजाल में फंस जायेंगे जैसे कुछ दिन पूर्व बंगलूरू में एक शहीद केपरिवार का घर ही सड़क बनाने के लिये तोड़ दिया गया. रविवार को उरी में हुआ आतंकी हमला सेना पर बीते 26 सालों का सबसे घातक हमला साबित हुआ. 17 जवानों की शहादत पर भारत गमगीन है. हम यूं ही नहीं कह रहे कि उनकी शहादत भुला दी जाएगी, पिछले उदाहरणों के साथ यह बात अपने आप स्पष्ट है. हम छत्तीसगढ़ के लोग तो यह बराबर देखते आ रहे हैं कि पिछले वर्षो के दौरान नक्सलियों ने कितने ही घर उजाड़ दिये. कितने ही परिवारों को उनके अपनों से छीन लिया यहां तक कि कई नेताओं को भी मार डाला गया लेकिन सबमें वहीं निंदा, श्रंद्वाजंलि और मुआवजे का खेल होता रहा. कोई ठोस एक्षन कहीं भी नहीं उठे कि समस्या का निदान सदा सदा के लिये कर दिया जाये. घटना के बाद विशेषकर शहीदी के बाद घडिय़ाली आंसू ऐसे फंू टते हैं जैसे कोई तूफान आ गया हो लेकिन वह जो थमता है उसका भी हश्र उसी रूके झरने की तरह होता है.नक्सलियों को तो हम अपना बताते हैं उन्हें कोई नेता अपना भाई बताता है तो कोई भटके हुए लोग-खून करदे या देश की संपत्ति को तबाह कर दे तो कोई बात नहीं लेकिन जो आंतकी देश में 26 नवंबर, 2008 को  मुंबई का आतंकी हमला कर रहा है उसमें से एक कसाब को फांसी दिलाकर ही हम खुश हो जाते हैं बाकी जो लगातार हम पर हमारेे घर में घुसकर मारके जाते हेैं उनके आंकाओं को खोजकर मारने की बाते सब चंद दिनों में ही फुर्र हो जाती है. मुम्बई  हमले में कुल 166 लोग मारे गए और 293 घायल हुए। भारत पर हुआ यह सबसे बड़ा आतंकी हमला था जिसके बाद बड़े-बड़े बयान आए, डॉजियर भी पाकिस्तान को सौंपे गए मगर आज भी भारत सरकार पाकिस्तान से तेज ट्रायल कराने को कहती है कोई ठोस कार्रवाई अभी तक नहीं हुई. 2 जनवरी, 2016 को पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ, 2 जवान शहीद हुए, जबकि 3 घायलों नेे अस्पताल में दम तोड़ा. भारतीय सुरक्षा बलों ने सभी आतंकियों को मार गिराया. देश के सैन्य ठिकानों पर इसे सबसे बड़े हमलों में गिना जाता है. एक बार फिर, हमले के बाद बयानों की बाढ़ आई, पाकिस्तान की एक टीम भी दौरा करने पठानकोट आई क्या हुआ? ऑटोमटिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड्स से लैस दो आतंकी  अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर में घुसे, घुसते ही उन्होंने अंधाधुध गोलियां बरसायी हमले में 31 नागरिक मारे गए थे और 80 घायल हुए थे.क्या हुआ? 13 मई 2008,के जयपुर धमाके में 15 मिनट के भीतर 9 धमाकों से जयपुर समेत पूरा देश दहल गया था. इन हमलों में 63 लोग मारे गए और 210 घायल हुए.1 अक्टूबर, 2001 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा कॉम्प्लेक्स पर हमला हुआं 38 लोग मारे गए. इसके बाद कश्मीर में आतंकवाद की समस्या को खत्म करने के लिए कई बैठकें की गईं, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात.यह सिलसिला चला आ रहा है पता नहीं कब तक ?

रविवार, 18 सितंबर 2016

अब समय आ गया पाकिस्तान से फिर दो दो हाथ करने का!


अब समय आ गया पाकिस्तान से फिर दो दो हाथ करने का!
हकीकत यह है कि आज पूरा देश गुस्से में हैं कि सिर्फ चार आंतकवादी पडौस से आकर हमारे सत्रह जवानों को मारकर चले गये और हमारी सरकार हमेशा की तरह सिर्फ और सिर्फ निंदा करके वही पहली बाते दोहरा कर रह गई. जम्मू-कश्मीर में सेना की एक बटालियन के मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि हम इतने कमजोर कैसे हो गये? रविवार (18 सितंबर) को पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने हमारे सब्र को तोड़कर रख दिया हैं,सबूत हमारे पास है कि उसने जो अस्त्र इस्तेमाल किए उन उपकरणों पाकिस्तान निर्मित होने के निशान  हैं क्या यह सबूत काफी नहीं  कि हम इस देश का नामोनिशान मिटा दें? सेना के शीर्ष अधिकारियों ने इस हमले को 'गंभीर झटकाÓ करार दिया। 17 जवान मारे गये और कम से कम 20 सैनिक घायल भी हो गए जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है.यह बात भी स्पष्ट हो गई हैं कि मारे गए आतंकवादियों का ताल्लुक जैश-ए-मोहम्मद संगठन से हैÓ पठानकोट हमले के बाद हमें उसी समय पाकिस्तान के खिलाफ एक्शन में आ जाना चाहिये था लेकिन क्यों हम बार बार ऐसा सोच रहे हैं कि अब मारा तो ठीक अबकी मार के देख -ऐसा कब तक चलता रहेगा? आतंकवादियों ने अत्याधुनिक हथियारों से गोलीबारी की जिससे सेना के म्प, तंबुओं और अस्थायी शिविरों में आग लग गई. वे दिनभर हमारे इलाके में घुसकर हमारे लोगों को मारते  रहे और हम सिर्फ बाते करने में ही  समय बर्बाद करते रहे. हम इस मामले के बाद आम लोगों की तरह यह सवाल पूछना चाहते हैं कि क्या हमने अपनी ताकत को यूं ही म्यूजियम में संजोकर रख्नने के लिये तैयार कर रखी है? इस हमले के बाद तो यह लगने लगा है कि हम हर हमले पर खामोश रहने की नीति पर चल रहे हैं. आतंकवादियों ने दो साल पहले भी इसी क्षेत्र के मोहरा में इसी तरह का हमला किया था. पांच दिसंबर 2014 को हुए उस आतंकी हमले में 10 जवान शहीद हो गए थे लेकिन तब भी निंदा और खामोशी का यही अदंाज रहा.इस बार हमले की चपेट में आया स्थल सेना के ब्रिगेड मुख्यालय से कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित है.हमले के समय डोगरा रेजीमेंट के जवान एक तंबू में सोए हुए थे जिसमें विस्फोट के चलते आग लग गई,आग पास स्थित बैरकों तक भी फैल गई. सलमाबाद नाला के पास एक क्षेत्र से घुसे आतंकवादियों ने इस हमले को अंजाम दिया था.पठानकोट हमले को भी लोग भूल नहीं पाये हैं. इसबार भी सरकार की तरफ से सीधे सीधे जवाब देने की जगह वही सबकुछ हो रहा है जो पिछले हमलों के बाद हुआ शायद ै  यही कारण है कि इस बार हमले के बाद लोगों का रोष सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति हो गया.हमले के बाद उनकी कही बाते लोगों को पसंद नहीं आइ्र्र ऐसे लोगों ने ट्विटर पर अपना गुस्सा जाहिर किया-कोई मोदी को जल्द से जल्द कोई एक्शन लेने के लिए कह रहा था तो कोई कह रहा था कि पीएम मोदी ने पठानकोट हमले के वक्त भी ऐसी ही बात कही थी, एक ने कहा कि अच्छे दिन की जगह बुरे दिन आ रहे हैं वहीं एक ने तो पीएम मोदी को ही आतंकी बता दिया- एक ने राम मंदिर का नाम लेकर भी बीजेपी सरकार को घेरा एक ने सवाल पूछा है, 'कड़ी निंदा करनेवाले को हटाके आप को पीएम इसीलिए बनाया था !Óजनता की तीखी प्रतिक्रियाएं उनके  आक्रोश को साफ तौर पर उजागर  करती है वहीं पाक के उस बयान ने भी  आग में घी  का काम किया हे जिसमें पाक के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने  कहा है कि अगर हमारी सलामती को खतरा हुआ और किसी ने हमारी जमीन पर कदम रखा तो हम परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेंगे हालाकि हमारी सरकार की तरफ से इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लकिन साठ सालों से हम पाक की ऐसी घमकियों को सिर्फ झेल रहे हैं. इतने युद्व कर हम उसे जमीन चटा चुके हैं अब एक बार और सही, हमें भी उससे किसी प्रकार का डर नहीं होना चाहिये-हम पूरी तरह तैयार हैं. अब या तो आर....या...पार!





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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!


एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!

पहले प्रधानमंत्री बोले, फिर राष्ट्रपति ने मोहर लगा दी, अब  बीजेपी भी कह रही है कि एक देश एक चुनाव में हमें भी कोई आपत्ति नहीं..तो फिर देरी किस बात की- देश में पांच साल मे सिर्फ एक ही बार चुनाव होना चाहिये-बार बार के चुनाव से जनता ऊब चुकी है-चुनावी खर्च भी बहुत बढ रहा है. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति दोनों की चिंता इस विषय में स्वाभाविक है. आखिर चुनाव के लिये पैसा भी तो जनता की जेब से निकलकर ही लगता है. देश में बढ़ती हुई मंहगाई की जड़ में भी बार बार होने वाले चुनाव है.आजादी के शुरूआती दौर में सब ठीक चल रहा था लेकिन आगे आने वाले समय में यह व्यवस्था गडबडाती चली गई. देश में 26 अक्टूबर 1962 को पहली इमरजेंसी का ऐलान उस समय हुआ जब चीन ने भारत पर हमला किया इसके बाद 3 दिसंबर 1971 को भी इमरजेंसी का ऐलान हुआ जब पाकिस्तान के साथ तीसरा युद्ध हुआ तीसरी और आखिरी बार 25 जून 1975 की रात में इमरजेंसी का ऐलान हुआ और वजह बताई गई देश के अंदरूनी हालात का बेकाबू होना. तीसरी और आखिरी इमरजेंसी करीब दो साल तक लगी, इस दौरान सारे चुनाव और अन्य कई किस्म की गतिविधियों पर लगाम लग गई. इमरजेंसी हटने के बाद शायद फिर कभी चुनाव व्यवस्था पटरी पर नहीं आई.अब इसे पटरी पर लाने का प्रयास तेज हो सकता है चूंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा था कि देशभर में स्थानीय निकाय और राज्य चुनाव वस्तुत: हर साल होते हैं, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में रुकावट आती है. प्रधानमंत्री सभी चुनाव पांच साल में एक बार कराने को लेकर उत्सुक दिखे, वे यह चाहते हैं कि पंचायत से लेकर संसद तक के सभी चुनाव एक साथ होने चाहिए. वैसे सभी चुनावों को एकसाथ कराने का विचार बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी बहुत समय पहले व्यक्त कर चुके थे तथा कई संसदीय समितियों और विधि आयोग ने इस विचार के पक्ष में राय दी है. बीजेपी के सत्तारूढ़ होने के बाद बजट सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से इस विचार को अनौपचारिक तौर पर रखा, जिसको कुछ बड़ी पार्टियों ने समर्थन दिया. अब यह मामला उस समय पुन: एक नई आशा के साथ जागा है जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को शिक्षक दिवस के मौके पर सरकारी स्कूल में एक विशेष क्लास लेने के दौरान लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनावों की वकालत की-इस बयान के तुरंत बाद रायपुर में भाजपा के महासचिव अनिल जैन ने पत्रकारों को यह बताकर कि भाजपा पहले से ही इस विचार का समर्थन करती है ने अब विश£ेषको के लिये यह विषय विचार करने के लिये दे दिया है कि आगे आने वाले समय में इस बिगडी व्यवस्था को किस तरह से सरकार और चुनाव आयोग मिलकर पटरी पर लायेगी़? पटरी पर लाने के लिये एक विकल्प एक बार फिर इमरजेेंसी भी हो सकती है. 1975 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस के पास दोनों सदनों में बहुमत था. लोकसभा में कांग्रेस के 523 में से 363 सदस्य थे और राज्यसभा में उसके सांसदों की संख्या कहीं ज्यादा थी, आज भले ही बीजेपी के पास लोकसभा में 543 में से 281 सदस्य हों लेकिन राज्यसभा में उसके पास 245 में से सिर्फ 46 सदस्य ही हैं, ऐसे में अगर सरकार चाहे भी तो इमरजेंसी नहीं लगा सकती.अनुच्छेद 352 में कहीं ज्यादा सेफगार्ड्स यानी सुरक्षात्मक प्रावधान हैं. राष्ट्र्रपति बिना पूरी कैबिनेट की सिफारिश के इमरजेंसी लागू नहीं कर सकते और इस सिफारिश पर भी संसद के दोनों सदनों की कुल सदस्यों की संख्या के आधे या उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगीऔर अगर ये सिफारिश दोनों सदनों से एक महीने के अंदर पारित नहीं हुई तो इसे असंवैधानिक मान लिया जाएगा.इसके अलावा राज्य पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं. इंदिरा गांधी के समय ओडिशा, तमिलनाडु, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर और  गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन आज की सत्तारूढ़ बीजेपी मुश्किल से महज 13 राज्यों में राज करती है, इनमें से भी कुछ राज्यों में उसकी दूसरे दलों के साथ सरकार है मजबूत राज्य का मतलब पुलिस और प्रशासन पर उसकी पकड़ जो इमरजेंसी जैसे हालात में काफी अहम होती है इतना ही नहीं आज राज्य पहले से कहीं ज्यादा स्वायत्त और आर्थिक तौर पर आजाद हैं, साथ ही करीब-करीब हर राज्य में एक या दो मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी मौजूद हैं.दूसरी ओर हम न्यायपालिका की बात करें तो 1975 की इमरजेंसी में सुप्रीम कोर्ट करीब-करीब खामोश रहा था, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट कहीं ज्यादा मुखर और सक्रिय है.स ुप्रीम कोर्ट आज न सिर्फ सरकार विरोधी बल्कि जजों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं की भी सुनवाई करता है ऐसे में सरकार को चाहते हुए भी सर्वदलीय व राज्यों के समर्थन के बगैर 'एक देश एक चुनावÓ की व्यवस्था को लागू कराने में चुनौती का सामना करना पड़ेगा.