रविवार, 28 अगस्त 2016

ं शिक्षा के मंदिर में बड़े पुजारी की तानाशाही...क्यों सिस्टम फैल है यहां?



शिक्षा के मंदिर में बड़े पुजारी की तानाशाही...क्यों सिस्टम फैल है यहां?

बहुमत नहीं तो सरकार नहीं चल सकती- डेमोक्रेटिक कंट्री में ऐसा होता है लेकिन डेमोके्रेटिक कंट्री के सिस्टम में ऐसा नहीं हो रहा. सिस्टम को चला रहे कतिपय लोगों के खिलाफ सारी प्रजा एक भी हो जाये तो सिस्टम उसे बनाये रखने में ही अपनी शेखी समझता है. अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ किलोमीटर दूर आदिवासी कांकेर जिले के गढ़ पिछवाड़ी सरस्वती शिशु मंदिर को ही लीजिये यहां का पूरा
जनसमुदाय अर्थात इस शैक्षणिक मंदिर में पढऩे वाले बच्चे वहां का स्टाफ और शिक्षक सभी एक स्वर से मांग कर रहे हैं कि इस शिक्षा मंदिर के बड़े पुजारी अर्थात प्राचार्य को हटाया जाये लेकिन प्रशासन और सरकार दोनों कान में रूई डालकर छात्र-शिक्षकों और स्टाफ को मजबूर कर रहा है कि वे आंदोलन करें. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे एक व्यक्ति को किसी पद से हटा देने से वहां पहाड़ टूटकर गिर जायेगा. अगर बहुमत यह मांग कर रहा है तो उसे हटाने में क्यों देरी की जाती है. एक व्यक्ति अगर सारी व्यवस्था के लिये बोझ बनता है तो क्या हमारे देश में दूसरा कोई नौजवान नहीं है जो इस कार्य को संम्हाल सके. अक्सर ऐसा प्रश्न इस किस्म के आंदोलनों के चलने के बाद उठ खड़ा होता है. कुछ आंदोलन तो कई कई दिन तक खिच जाते हैं इसमें नुकसान न केवल सरकार का होता है बल्कि संबन्धित पक्ष को भी इसका खामियाजा भरना पड़ता है जैसा कि इस मामले में हो रहा है-प्राचार्य के दुव्र्यवहार अपशब्दों के कारण छात्रों को सड़क पर आना पड़ा.उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. तोडफ़ोड़ हुई तो सरकार का नुकसान होगा. ऐसे मामलों में तत्काल डिसीशन क्यों नहीं लिये जाते? कांकेर के गढ़पिछवाड़ी सरस्वती शिशु मंदिर के छात्रों ने शुक्रवार को स्कूल प्राचार्य के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया छात्र स्कूल के बाहर पेड के नीचे धरने पर बैठ नारेबाजी कर रहे हैं उनका आरोप है कि प्राचार्य की प्रताडऩा से तंग आकर शिक्षक स्कूल छोड़ रहे हैं। प्राचार्य छात्रों को नाली के पनपते कीड़े, मक्खी, मच्छर कहकर बुलाते हैं. छात्रों व शिक्षकों सभी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है-शिकायत पहुंचने के तुरन्त बाद संज्ञान  क्यों नहीं लिया गया? बात को बढऩे देने से अच्छा यही होता कि निर्णय तत्काल लिया जाता. वास्तव में यही नौकरशाही की कमजोरियां हैं जो जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के कार्यो का आंकलन करती है.स्कूल के छात्रों शिक्षकों ने काफी सब्र करने के बाद आंदोलन किया होगा.. चूंकि जब पानी सर के ऊपर से निकल जाता है तभी कोई व्यवस्था के खिलाफ सड़क पर उतरने का निर्णय लेता है. इस स्कूल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है जहां कई दिनों से ऐसा ही चल रहा है.शिकायतों का अंबार उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद भी वे कान में रूई डालकर बैठे हैं. एक प्राचार्य से पूरी संस्था खफा है तो इसका मतलब है कि वह पूरा तानाशाह होकर  किसी कि शह पर काम कर रहा है. इससे यह आंकलन भी किया जा सकता है कि कोई ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण दे रहा है.ऐसे में पूरे महकमें के जिम्मेदार लोगो को यह पता लगाना चाहिये था कि आखिर माजरा क्या है? अगर यह पता लगा लिया जाता तो शायद यहां तक की नौबत नहीं आती.यह एक शिक्षा विभाग का मामला नहीं है जहां इस ढंग की लापरवाही बरती जाती है जिसके चलते लोगों को आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है-पहले थोडी सी हलचल, फिर उसका विस्तार, फिर राजनीतिक हस्तक्षेप किन्तु ऐसी छोटी छोटी सी बातों को रोकने की जिम्मेदारी जिनकी होती  है वे इसे और विस्तारित करने और अंत में भारी डेमेज के बाद कोई निर्णय लेने में ही विश्वास करते हैं. इस स्कूल के बारे में भी कुछ ऐसी ही खबर मिली है जिसमें कहा गया है कि एक उच्च पदस्थ व्यक्ति के आचरण ने इस संस्था से न केवल कई योग्य शिक्षकों को अपनी नौकरी छोड़कर जाना पड़ा है वहीं कई छात्रों ने स्क्ूल जाना भी बंद कर दिया है.खबर तो यह है कि एक साल में ग्यारह शिक्षक स्कूल छोड़कर जा चुके हैं. सवाल यह भी उठता है कि इतने दिनों तक उच्च पदों पर बैठे लोगों ने इस संपूर्ण मामले  पर संज्ञान क्यों नहीं लिया?






सोमवार, 22 अगस्त 2016

आखिर सरकार को डिब्बा बंद सामान की याद तो आई!

आखिर सरकार को डिब्बा बंद सामान की याद तो आई!


कहतेे है न 'बेटर लेट देन नेवरÓ अर्थात देर आये दुरूस्त आये- सरकार ने देर से ही सही  डिब्बा बंद सामग्रियों के बारे में संज्ञान तो लिया. डिब्बा बंद सामग्रियों की मनमर्जी अब बंद होनी चाहिये यह आम लोगों की मांग है. जिस प्रकार खाद्य सामग्रियों व अन्य दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर कं पनिया मनमर्जी चलाती है उसपर रोक लागने के लिये सरकार ने अब अपना पंजा फैला दिया है. डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों पर ब्योरा पढऩे लायक हो- पहली बार इसपर गौर किया गया है. दूसरा और तीसरा कदम इसके बाद उठ सकता है, जिसमें डिब्बा बंद सामग्रियों की  क्वालिटी कैसी है, सही बजन है या नहीं इसको बनाने में कौन कौन सी  सामग्रियों का उपयोग किया गया है. इसकी कीमत अन्य प्रोडक्टस की  तुलना में कितना बेहतर है आदि तय करने की जिम्मेदारी भी सरकार को तय करना है.फिलहाल सरकार की योजना है कि 2011 के पैकेजिंग नियमों में संशोधन किया जाये इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों का पूरा ब्योरा स्पष्ट और पढऩे लायक हो साथ ही सरकार नकली सामानों से ग्राहकों के हितों के संरक्षण के लिये बारकोड जैसी प्रणाली शामिल करने जा रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने ग्राहकों के हित में विधिक माप विज्ञान (डिब्बा बंद वस्तुएं), नियम 2011 में संशोधन के लिये कई दौर की चर्चा की है.उद्योग तथा नियमों में बदलाव की मांग उपभोक्ता लगातार करते आ रहे हैं. वर्तमान स्थितियो में से किन किन बातो ंपर गौर किया जायेगा  यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन हम मानते है पैक वस्तुओं के मूल्यों में कंपनियां अपने हिसाब से कभी भी किसी समय में बदलाव कर देते हैं पहले प्रोडक्ट को कई स्कीम और कम दामों में अच्छी क्वालिटी के साथ निकाल देते हैं उसके बाद देखते हैं कि ग्राहकों का झुकाब इस ओर काफी  हैं तो वे इन वस्तुओं की कीमतों में न केवल भारी इजाफा करते हैं बल्कि इसे बाजार से कुछ दिनों के लिये गायब भी कर देते हैं ताकि इस ग्राहक को इसके पीछे दौड़ते देखे और मजा ले. दूसरी महत्वपूर्र्ण बात है पैकेड वस्तुओं में भरी हुई मात्रा का सही हिसाब किताब नहीं होना, विशेषकर टूथ पेस्ट, षेविंग क्र ीम डयूरेंट, साबुन जैसी वस्तुओं में लिखा हुआ बजन दिखाने के लिये कई टेक्रीक अपनाते हैं ताकि प्रोडक्ट को कम कर मुनाफा कमाया जाये. साबुन के मामले में छोटा बड़ा कर दिया जाता है साथ ही कोई न कोई स्कीम चालू कर जनता को बेवकूफ बना दिया जाय. ठीक इसी प्रकार टूथ पेस्ट का बहुत हिस्सा हवा भरा होता है. कुछ थोड़ी ही मात्रा में प्रोडक्ट होता है इससे ग्राहक को बहुत नुकसान होता है. फेस पावडर और बेबी फूड और अन्य कई मामलों में भी कुछ ऐसा ही होता है चिप्स बगैरह को फूला दिखाने के लिये उसमें हवा भर दी जाती है बाकी माल थोड़ा सा रहता है कीमत ज्यादा सब बड़े मजे से खाते हैं किसी को कोई आपत्ति नहीं. सरकार भी यह मानती है-उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में  एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार ''नियम-7 उत्पाद के ब्योरे के संदर्भ में शब्दों के आकार को बताता है लेकिन अधिकतर कंपनियां इसका कड़ाई से पालन नहीं करती छोटे पैकेट में फोंट का आकार इतना छोटा होता है कि ग्राहकों के लिये उसे पढऩा मुश्किल होता है इसीलिए हमने फोंट के आकार के बारे में अमेरिकी मानक को अपनाने का फैसला किया हैÓÓइस अधिकारी के अनुसार फिलहाल नाम, पता, विनिर्माण तिथि, खुदरा मूल्य जैसी घोषणाओं के लिये फोंट आकार एक एमएम से कम है अमेरिका 1.6 एमएम के आकार का पालन करता है, लेकिन अब सरकार 200 ग्राम: एमएल के लिये 1.5 एमएम रखने की योजना बना रही हैं. 200 ग्राम (एमएल से 500 ग्राम) एमएल तक के डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों पर फोंट आकार दो से बढ़ाकर चार एमएम तथा 500 ग्राम: एमएल से ऊपर के डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के लिये फोंट आकार दोगुना आठ एमएम करने का विचार है इसके अलावा,  बार-कोड या इस प्रकार के चिन्ह पेश करने की योजना बना रहा है ताकि यह चिन्हित हो सके कि खाद्य उत्पाद भारत या अन्य देश में बने हैं और नकली नहीं है साथ ही मंत्रालय डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की अधिकतम मात्रा मौजूदा 25 किलो (लीटर से बढ़ाकर 50 किलो) लीटर करने पर विचार कर रहा है, ''छोटे पैकों के लिये उपभोक्ताओं को अधिक देना पड़ता है इसीलिए चावल, आटा जैसे अन्य सामान 50 किलो लीटर के पैकेट में आएंगे इससे ग्राहकों के लिये लागत कम होगीÓÓ इससे पहले, मंत्रालय ने 2015 में नियम संशोधित किये थे.



रविवार, 21 अगस्त 2016

इतना पैसा रखकर भी हम अपने खिलाडियों को क्यों नहीं सवार पाते?


इतना पैसा रखकर भी हम अपने खिलाडियों को क्यों  नहीं सवार पाते?
किसी को इस बात पर कोई जलन या अफसोस नहीं होना चािहये कि रियो ओलंपिक में जीतने वाली  सिंधु और साक्षी पर इनामों की बौछार हो रही है,किसी को इस बात का भी अफसोस नहीं होना चािहये कि पीवी सिंधु को तेलंगाना सरकार ने पांच करोड़, आंध्र प्रदेश सरकार ने तीन करोड़, दिल्ली सरकार ने दो करोड़, मध्यप्रदेश सरकार ने पचास लाख के अलावा तीन करोड़ रुपये और अन्य खेल संगठनों ने भी पैसा देने का ऐलान किया है. किसी को इस बात का भी कोई मलेह नहीं होना चाहिये कि आंध्र सरकार ने भी उन्हें एक हजार वर्ग गज जमीन और ए-ग्रेड सरकारी नौकरी  देने का फैसला किया है. दूसरी रेसलर साक्षी मलिक जिसने कुश्ती में एक पदक जीत हासिल की  को भी  हरियाणा सरकार ने 2.5 करोड़, दिल्ली सरकार ने एक करोड़ और तेलंगाना सरकार ने  एक करोड़  रुपये देने का फैसला लिया-साक्षी को रेलवे 50 लाख और पदोन्नति देगा जबकि उनके पिता का भी प्रमोशन होगा.ऐसा होना चाहिये लेकिन यह प्रोत्साहन जीतने के बाद ही क्यों? उससे पहले प्रतिभाओं को क्येंा दबोचकर रखा जाता है? काश! खिलाडिय़ों को संवारने पर भी देश की संस्थााएं इतना खर्च करती! तो शायद पूजा जैसी राष्ट्रीय स्तर की हैंड बाल खिलाड़ी को आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता. बता दे कि पटियाला खालसा कालेज के अधिकारियों की ओर से उसे नि:शुल्क छात्रावास सुविधा देने से इनकार करने पर इस राष्ट्रीय खिलाड़ी ने  आत्महत्या कर ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे पत्र में पूजा ने अफसोस जताया कि वह गरीब है और छात्रावास के शुल्क का भुगतान नहीं कर सकती इसलिए वह मौत को गले लगा रही है. पटियाला के खालसा कॉलेज की इस छात्रा ने पत्र में प्रधानमंत्री से अपील की कि वह यह सुनिश्चित करें कि उसके जैसी गरीब लड़कियों को पढ़ाई की सुविधा नि:शुल्क मिले.इस खिलाड़ी को  पिछले साल कॉलेज में नि:शुल्क दाखिला दिया गया था जिसमें हॉस्टल सुविधा और भोजन शामिल था लेकिन इस वर्ष उसे हॉस्टल में रहने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया गया. कॉलेज तक जाने का रोज का खर्चा 120 रुपए था. उसके पिता सब्जी बेचने का काम करते हैं. वित्तीय हालत अच्छी न होने के कारण पहले तो उसने कॉलेज छोडऩे पर विचार किया बाद में यह बड़ा कदम उठाया. यहां भी खेल में घुसी राजनीति का अच्छा खासा  दृश्य सामने आया जिसमें खिलाड़ी ने अपने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए अपने कोच को जिम्मेदार ठहराया है.  सुसाइड नोट में लिखा है, उसी ने मुझे हॉस्टल का कमरा देने से इनकार किया और कहा कि वह हर दिन अपने घर से यहां आया जाया करें. इससे इस प्रतिभाशाली लड़की को हर महीने 3,720 रुपए खर्च करने होते जो उसके पिता वहन नहीं कर सकते. रियो में पदक जीतने के बाद से ही सिंधु और साक्षी पर इनामों की बौछार हो रही है. अब तक केंद्र, राज्य सरकारें, खेल एवं अन्य संगठन सिंधु को 13 करोड़ रुपये के करीब नगद देने की घोषणा कर चुकी हैं,इसके अलावा उन्हें बीएमडब्ल्यू कार और घर भी मिलेगा.साक्षी को भी करीब पांच करोड़ का इनाम दिए जाने की घोषणा हो चुकी है.जीते खिलाडियों ने देश की शान को आसमान तक  पहुंचाया है वे इस इनाम के हकदार भी है लेकिन पूरे  देश में पूजा जैसे कितने ही अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं जिन्हें तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता.खेल की गंदी राजनीति में पड़कर कइयों का भविष्य बरबाद हो जाता है. देश का नाम  रौशन कर सकने वाले कई खिलाड़ी आज भी देश में बदतर स्थितियों में गुजारा  करने मजबूर हैं. जरा सोचिए, अगर जीतने से पहले खिलाडिय़ों को संवारने पर इतना खर्च किया जाता तो शायद नतीजे कुछ और होतेा. यह हम नहीं कह रहे बल्कि  ओलंपिक में सर्वाधिक पदक जीतने वाले अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के आंकड़े बताते हैं कि वहां खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण और सुविधाओं पर ज्यादा खर्च किया जाता है यही कारण है कि पदक तालिका में ये देश आगे रहते हैं. अमेरिका, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों में खिलाडिय़ों को बहुत ही कम नकद पुरस्कार दिया जाता है.ये देश खिलाडिय़ों की प्रतिभा को निखारने पर ज्यादा खर्च करते हैं. भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी समिति के अनुसार, भारत में सिर्फ 3 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति दिन खेल पर खर्च होते हैं। खेल के मामले में अब सोच सिर्फ अमीरों के खेल  क्रि केट तक ही सीमित न रख अन्य खेल और खिलाडिय़ों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. साक्षी,सिुंधु ने तो  इस ओलंपिक में देश  का नाम रौशन कर दिया. कई गरीब  खिलाडिय़ों की कहानी भी  इस दौरान सामने आई.  कम से कम अब हमारे कर्ताधर्ताओं को सतर्क  होने की जरूरत है ताकि और कोई पूजा इस तरह का घातक कदम न उठा ले.



शनिवार, 20 अगस्त 2016

मंहगाई के दौर में नई आशाओं के साथ आये उर्जित पटेल!



उर्जित पटेल होंगे रिजर्व बैंक आफ इंडिया के नये गवर्नर. रघुराम राजन  के बाद नया गवर्नर  कौन होगा इसकी चर्चा उसी समय शुरू हो गया थी जब स्वामी विवाद के बाद रघुराम राजन ने आगे अपना कार्यकाल जारी रखने से अनिच्छा प्रकट कर दी थी. भारी ऊहापोह के बाद अंतत: भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल को आरबीआई का 24वां गवर्नर घोषित कर दिया गया. रघुराम राजन  चार सितंबर को पदमुक्त होंगे इसके बाद पटेल उनका  स्थान लेंगे. भारतीय रिजर्व बैंक में गवर्नर  नियुक्ति को  लेेकर इतनी ऊहा पोह शायद इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली. शायद रिजर्व बैंक के इतिहास  में यह पहला अवसर भी है जब इसमें गवर्नर की नियुक्ति को लेकर राजनीति ने भी अपना असर दिखाया. बहरहाल  52 वर्षीय उर्जित पटेल का अनुभव रिजर्व बैंक की कार्यप्रणाली से पूर्व से रहा है इसलि येभी इस पद पर नियुक्ति मामले में कोई नये विवाद की गुंजाइश नहीं दिखती.पटेल 11 जनवरी 2013 को रिजर्व बैंक में डिप्टी गवर्नर नियुक्त किये गये थे और इस साल जनवरी में उन्हें सेवा विस्तार दिया गया अर्थात यह भी कहा जा सकता है कि उन्हें अपने कामों के लिये प्रमोशन मिला हैं. रिजर्व बैंक में डिप्टी गवर्नर के तौर पर पटेल ने आरबीआई की उस समिति की अध्यक्षता की है जिसे मौद्रिक नीति रपट का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी, बाद में यही रपट केंद्रीय बैंक में चल रहे वर्तमान सुधारों का आधार बनी.पटेल समिति की इसी रपट के आधार पर ही मौद्रिक नीति समिति का गठन हुआ,इसके गठन से आरबीआई और उसके गवर्नर की कई सारी शक्तियां समिति के पास चली गई, इसके अलावा सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी बनाने का कदम भी इसी रपट के आधार पर उठाया गया है. स्वतंत्र मौद्रिक नीति समिति के तहत सरकार आरबीआई के लिए एक महंगाई लक्ष्य तय करेगी और आरबीआई गवर्नर यदि उस महंगाई लक्ष्य को पाने में नाकाम रहते हैं तो वह संसद के प्रति जवाबदेह होगा.आरबीआई में डिप्टी गवर्नर नियुक्त होने से पहले पटेल दि बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में सलाहकार (ऊर्जा एवं बुनियादी ढांचा) थे.उन्होंने 1990 में येल विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की, डिग्री प्राप्त की और 1986 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड से एम.फिल किया था. वह 2009 से द ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में एक अनिवासी वरिष्ठ फैलो रहे हैं कहने का तात्पर्य कि  र्योग्यता में किसी  दृष्टि से कम नहीं. वर्ष 2000 से 2004 के बीच पटेल ने कई उच्च स्तरीय राज्य एवं केंद्रीय समितियों में कार्य किया, इनमें प्रत्यक्ष कर पर कार्यबल, वित्त मंत्रालय, शोध परियोजनाओं और बाजार अध्ययन पर सलाहकार समिति, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, अवसंरचना पर प्रधानमंत्री के कार्यबल के लिए सचिवालय, दूरसंचार मामलों पर मंत्री समूह और नागर विमानन सुधार समिति इत्यादि शामिल हैं.पटेल ने कई तकनीकी प्रकाशन, दस्तावेज और भारतीय वृहद अर्थव्यवस्था पर टिप्पणियां भी लिखी हैं.
उर्जित पटेल को राजन के महंगाई के खिलाफ लडऩे वाले सैनिक के तौर पर भी जाना जाता रहा है.उर्जित पटेल उन कुछ लोगों में हैं जो कार्पोरेट जगत में काम करने के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर बने हैं. मिंट स्ट्रीट के इस शीर्ष पद पर अब तक ज्यादातर आर्थिक संस्थानों के अर्थशास्त्री और नौकरशाह ही बैठते रहे हैं.
मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन की पहचान सरकार की विभिन्न आर्थिक और यहां तक कि गैर आर्थिक नीतियों की मुखर आलोचना करने वाले गवर्नर के तौर पर बनी है हाल के महीनों में भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुब्रमणयम स्वामी सहित विभिन्न वर्गों से उन पर राजनीतिक हमले होते रहे है, ये हमले उनकी नीतियों को लेकर हुए हैं. वे तीन साल का कार्यकाल पूरा कर चार सितंबर को पदमुक्त होंगे.गवर्नर के पद पर पटेल की नियुक्ति को राजन की नीतियों को ही आगे बढ़ाने के तौर पर देखा जा रहा है. रिजर्व बैंक गवर्नर के पद पर पटेल की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब खुदरा मुद्रास्फीति छह फीसद से ऊपर निकल चुकी है और थोक मुद्रास्फीति भी 23 महीने के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है. पटेल को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए की सफाई करने के अधूरे काम को भी आगे बढ़ाना होगा हां अब सुब्रमणियम स्वामी भी खुश है तभी तो उन्होंने कहा है-उर्जित पटेल की आलोचना करना मूर्खतापूर्ण होगा जब स्वामी के एक फॉलोवर ने केन्या का नागरिक होने के कारण पटेल की आलोचना की तो स्वामी ने कहा  कि वह केन्या के नागरिक नहीं हैं- वह थे- आर 3 का जन्म भारत में हुआ और उन्होंने भारत में 2007 से रहने के बावजूद अपना ग्रीन कार्ड बरकरार रखना चुना. आर 3 रघुराम राजन का उल्लेख करने के लिए आदिवर्णिक शब्द है. इसका उन्होंने ब्याज दर ऊंची रखकर विकास को नुकसान पहुंचाने के लिए राजन पर हमला करने के दौरान कई बार इस्तेमाल किया.

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जनता के बीच के लोग...लेकिन जनता से कई आगे!




राजा महाराजाओं के दिन लद गये लेकिन हमारी व्यवस्था ने कई ऐसे महाराजा तैयार कर दिये जिनकी लाइफ स्टाइल किसी भी आम आदमी से कही ऊंची है-येह लोग अब भी प्राप्त सुविधाओं से संतुष्ट नहीं हैं उन्हेें जनता की सेवा के लिये और पैसे चाहिये. यह चाहे वेतन में बढौत्तरी के रूप में हो, चाहे भत्ते के रूप में जबकि भारत की गरीब जनता जिनकी बदौलत यह सेवक बनकर ऊंची कुर्सियों पर विराजमान हैं उनमें से कइयों को तो कपड़े लत्ते और मकान की बात छोडिय़ें एक समय का खाना भी मुश्किल से नसीब होता है.उनके बच्चों की शिक्षा  के लिये कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं? और उनके बीमार पडऩे पर उन्हें क्या  क्या बेचना पड़ता है यह किसी  से छिपा नहीं है- आप  मौजूदा उच्च सदन की बात को ही ले लीजिये -442 माननीय करोड़पति बताए जाते हैं. एक माननीय की संपत्ति 683 करोड़ भी है. वहीं एक माननीय ऐसे भी है जिसकी संपत्ति मात्र 34 हजार रुपये है. ठीक हैं यह कम वेतन पाने वाले माननीय अपने वेतन और सुविधाओं में और वृद्वि की मांग कर सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है- सभी मांग कर रहे हैं कि वेतन बढ़ाया जाये. निचले सदन में इसी जून में 57 नए माननीय और जुड गये, जिनमें से 55 करोड़पति हैं. जो सबसे अमीर माननीय हैं उनकी संपत्ति 252 करोड बताई जाती है.देश का हर आदमी शायद यह सुनकर हैरान हो जाये जब उसे यह पता चले कि माननीयों  के ऊपर हमारी जेब से निकलने वाला पैसा हर साल खजाने से उनके लिये कितना निकलता है,माननीयों को इस समय सैलरी 50,000 रुपए प्रतिमाह तो मिलती ही है जो पूरी तरह से टैक्स फ्री है.माननीयों को 3 टेलीफोन लाइन फ्री मिलती है जिनसे वह 1 लाख 70 हजार फोन कॉल हर महीने फ्री कर सकते है, इन्हें हर महीने अपने स्टाफ खर्चे के 45,000 रुपए और 15,000 रुपए स्टेशनरी व अन्य डाक व्यय आदि के मिलते है, इनके घर के अन्य खर्चे जैसे फर्नीचर, धोबी आदि के खर्चे भी सरकार या कहे जनता द्वारा ही फ्री दिए जाते है .हर माननीय अपने घर के लिए 50,000 यूनिट बिजली फ्री इस्तेमाल कर सकता है और जाहिर सी बात है की पानी तो पूरी तरह से ही फ्री मिलता है.हर  माननीय को यह विशिष्ट सुविधा हासिल है कि वह पूरे देश की किसी भी टे्रेन में कही भी फर्स्ट क्लास में फ्री यात्रा कर सकता है और इसके अलावा इन्हें साल में 34 फ्री एयर टिकट भी मिलते है.ऐसी सुविधा भारत  के किसी आम नागरिक  को नहीं मिलती-बताइयें ऐसी सुविधाओं के लिये उन्होंने ऐसा कोैन  सा तीर  मार लिया? माननीयों को सरकार या कहें कि हमारी तरफ से जो बंगला मिलता है वह पूरी तरह से सज्जित होता है अर्थात उसमे एसी, फ्रिज, टीवी पहले से ही लगे हुए होते हं और पूरे बंगले की मेंटेनेंस भी जैसे रंग रोगन, फर्नीचर आदि की देखभाल आदि का व्यय भी सरकार की तरफ से किया जाता है अधिकतर माननीय जब बीमार हो जाते हें तो उन्हें चिकित्सा व्यय केंद्र सरकार की तरफ से 'चिकित्सा सेवा योजनाÓ के अंतर्गत दी जाती है. हां जब भी कोई माननीय अधिकारिक रूप से विदेश यात्रा पर जाता है तो इन्हें फ्री बिजनेस क्लास टिकट दी जाती है तथा इन्हें दैनिक यात्रा भत्ता भी अलग से दिया जाता है जो यात्रा के लिए जाने वाले देश के ऊपर आधारित होता है.हम उन्हें  निर्वाचित करते हैं हमारे क्षेत्र में खर्च करने के लिए इन्हें हरमाह 45,000 रुपए अलग से दिए जाते है .सदन के अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए 2,000 रुपए प्रतिदिन अलग से, हर साल 3 अधिवेशन होते है जो कुल 150 दिनों के होते है और अगर आप इन सबका हिसाब जोडोगे तो कुल बनता है 3 लाख रुपए, जो सिर्फ सदन  की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए ही बनता है.अधिवेशन के दौरान माननीयों की मेम को देश के किसी भी हिस्से से दिल्ली आने के लिए 8 बार फ्री एयर टिकट मिलता है और ट्रेन से आना-जाना पूरी तरह से फ्री.  यदि कोई भी व्यक्ति इस देश में एक बार माननीय बन जाता है तो वह पूरी जिंदगी 20,000 रुपए की पेंशन पाने का हकदार बन जाता है याने नौकरी मत करों  माननीय बन  जाओं आपकी निकल पड़ेगी.अगर कोई व्यक्ति पूरे 5 साल के लिए माननीय बना रहता है तो उसकी पेंशन में प्रति वर्ष 15,00 रुपए की अतिरिक्त वृद्धि का भी विधान है.भारत  के हर माननीय को सीधे- सीधे तीन लाख रूपये तो मिलते ही हैं. इसके अलावा उन्हें किसी भी सरकारी और निजी नौकरी के अलावा किसी भी प्रकार का व्यापार करने की भी छूट है सबसे बड़ी बात यह है की अगर कोई माननीय अधिवेशन में भी शामिल नहीं होता तो भी उसे उपरोक्त सारी सुविधाएं मिलती रहेगी.अब यह माननीय मांग कर रहे हैं कि उन्हें कैबिनेट सचिव  से ज्यादा सेलरी दी जाये!





सोमवार, 15 अगस्त 2016

ओलंपिक खेलों में हमारी शर्मनाक स्थिति..साई कितना सही?


ओलंंपिक खेलों में हमारी शर्मनाक स्थिति के लिये आखिर हम किसे दोष दें.?खिलाडिय़ों को, व्यवस्था को हमारी परंपरा को,हमारी राजनीतिक व्यवस्था को या खेलों के प्रति युवाओं में उत्साह की कमी को? कारण इससे भी ज्यादा हो सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर  जो कारण दिखाई देते हैं वह यह ही है जिसके चलते हम अपने दावे पर खरे नहीं उतर सके. 19 मेडल जीतने का था दावा, दस दिनों  बाद भी खाली हाथ हाकी की टीम सहित 37 से ज्यादा एथलीटस बाहर हो गये हैं. रही सही उम्मीद जिमनास्ट दीपा की पराजय के साथ पूरी हो गई. मेडल जीतने में वह भी कामयाब नहीं रही.भारतीय हाकी टीम  बेलजियम के हाथो पराजित होने के बाद ओलंपिक खेलों से बाहर हो गई. भारत से 119 प्लेयर्स 15 गेम्स में हिस्सा लेने गए थे आधे  से ज्यादा  का सफर बिना मेडल जीते खत्म हो गया,जबकि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) ने ओलिंपिक की शुरुआत से पहले सरकार को भेजी रिपोर्ट में दावा किया था कि 19 मेडल जीते जा सकते हैं. भारत के खराब परफॉर्मेंस पर हालकि अधिकारिक तौर पर किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन चीन ने हमारी आलंपिक खेलों में शर्मनाक स्थिति पर अपने सरकारी मीडिया के जरिए जो वजहें गिनाई हैं उसे भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. इसमें दावा किया गया है कि खेलों में फंडिंग की कमी, स्पोर्ट्स ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार, शाकाहारी खान-पान और नागरिकों के ज्यादा धार्मिक होने की वजह से भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा.चीन की मीडिया के अनुसार ज्यादातर भारतीय शाकाहारी हैं और इससे खेलों में नुकसान होता है,साथ ही यह भी लिखा कि भारतीय परिवार बच्चों को खेलने के लिए प्रेरित नहीं करते हैं वे अपने बच्चों को डॉक्टर और अकाउंटेंट बनाना चाहते हैं, खिलाड़ी नहीं. रिपोर्ट में 2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स का हवाला देते हुए बताया गया है कि उसमें हुई धांधलियों ने भविष्य में किसी खेल आयोजन की उम्मीद को धूमिल कर दिया है. क्रिकेट के दबदबे को भी अन्य खेलों के लिए नुकसानदायक बताया गया है, रिपोर्ट में भारतीय सरकार का खेल को लेकर क्लियर विजन न रखने की बात भी कही गई है,चीन अपनी बातों के तर्क में कहता है कि चीनी  सरकार  ने 2001 में एथलेटिक्स, स्वीमिंग और अन्य वाटर स्पोर्ट्स में सुधार के लिए कैसी पॉलिसी बनाई वहीं भारत सरकार ने अब तक इस तरह की कोई पहल नहीं की है.विश्व ओलंपिक में चीन,जापान, अमरीका का सदैव जलवा रहता है लेकिन हमारा राष्ट्र इतना बड़ा और अच्छे खिलाड़ी होने के बाद भी दूसरे देशों के खिलाडिय़ों का किसी स्तर पर मुकाबला नहीं कर पाते.यह नहीं कि सरकार ने खेलों को प्रोत्साहित करने में ढिलाई बरती है-सरकार की तरफ से अच्छे खिलाडियों को प्रोत्साहित किया जाता है लेकिन हमारी खेल राजनीति और अच्छे खिलाडिय़ों को पहुंच वाले  खिलाडिय़ों के सामने अनदेखा करने की बहुत पुरानी  सोच ने खेल में प्रतिष्ठावान खिलाडियों को पीछे छोड़ दिया है. दीपा का ही उदाहरण ले जिम्रास्टिक में ले देकर यह खिलाड़ी आगे बढ़ी थी जिसपर अपेक्षाकृत घ्यान नहीं दिया गया बल्कि उसकी जरूरतों को तक  पूरा नहीं किया गया.हां हम बैडमिंटन के क्षेत्र में कुछ जलवा दिखा पाये हैं यहां श्रीकांत और सिंधू से पदक की उम्मीद जागी है. दोनों क्वार्टर फायनल में पहुंच गये हैं जबकि कुश्ती में विकास से भी आशा टूट गई है वह भी हार गया है.  बहरहाल हम साई के उस दावे पर भी सवाल  उठाना चाहेंगे कि उसने वर्तमान परिस्थियों में चयन की गई टीम से किस तरह ओलंपिक में 19 मेडल जीतने का दावा किया था? उसने खेल मंत्रालय को सौंपी 240 पन्नों की रिपोर्ट में कहा था कि इसमें सबसे ज्यादा चार मेडल शूटिंग में मिलेंगे लेकिन ओलंपिक में सब ठाय ठाय फिस्स हो गया.  कुश्ती में तीन और एथलीटिक्स, बैडमिंटन, बॉक्सिंग, तीरंदाजी और टेनिस में दो-दो मेडल का दावा किया था.जिम्नास्टिक और हॉकी में एक-एक पदक की बात कही गई यह सब  ऐसे कहा गया जैसे बाजार में मेडल रखा है और वहां पहुंचे खरीदकर ले आयेंगे.शर्मसार करने वाली  बात तो यह भी  है कि एक मंत्री महोदय ने वहां  जाकर जो शर्मनाक हरकत की उसने भी देश को शर्मसार किया. क्यों ऐसे लोगों को किरकरी कराने के लिये भेजा जाता है?  साई की रिपोर्ट इंडियन प्लेयर्स के हालिया प्रदर्शन और उनके इवेंट में विदेशी खिलाडियों के परफॉर्मेंस के आधार पर बनाई थी अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या साई ने भारतीय संभावनाओं को बढ़ाकर पेश किया?

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सरकारी कामों में पब्लिक दखल,क्या कर्मचारी सुरक्षित हैं?


अक्सर सरकारी दफतरों में यह आम बात हो गई है कि किसी न किसी बात को लेकर कर्मचारियों से बाहरी लोग आकर उलझ पड़ते हैं. इसमें दो मत नहीं कि कतिपय सरकारी कर्मचारी भी अपने रवैये से लोगों को उत्तेजित कर देते हैं किन्तु सभी इस तरह के नहीं होते. सरकारी काम लेकर पहुंचने वाले प्राय: हर व्यक्ति में सरकारी सेवक से गलत व्यवहार करने का ट्रेण्ड चल पड़ा है. देरी से होने वाले काम, सरकारी तोडफ़ोड, सरकार के बिलो केे भुगतान में देरी, रेलवे में बिना टिकिट के दौरान टी ई से झगड़ा और ऐसे ही कई किस्म के मामले उस समय कठिन स्थिति में पहुंच जाते हैं जब सरकारी सेवक अकेला पड़ जाता है और मांग करने वाले या सेवा लने वाले ज्यादा हो जाते हैं फील्ड में काम करने वाला पुलिस वाला भी कभी कभी ऐसे जाल में फंस जाता है कि कभी कभी तो उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. मुठभेड़ या फिर अन्य आपराधिक मामलों को छोड़ भी दिया जाये तो आंदोलन के दौरान कई निर्दोष सिपाही या उनके अफसर भीड़ की चपेट में आकर अपनी जान से हाथ धो बैठते है जिसका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ता है.सरकारी काम को लोग ने उन कर्मचारियों का व्यक्तिगत मामला समझने की भूल कर डाली है शायद इसके पीछे एक कारण सरकारी कामों में भारी ढिलावट और पैसे कमाने का लालच है इसके चलते लोग कर्मचारियों से भिड़ जाते हैं. काम के दौरान सरकारी कर्मचारियों से दुव्र्यवहार या उनपर हाथ उठाना दोनों गैर कानूनी है तथा इसपर कठोर सजा का भी प्रावधान है लेकिन कानून की परवाह न करने वालों की तादात बढती जा रही है.दफतरों में काम लेकर पहुंचने वाला हर व्यक्ति अपने काम का तुरन्त समाधान चाहता है,वे बात करते करते ही बाबुओं या अधिकारी से उलझ पड़ते है. थोड़ा प्रभावशाली या किसी नेता का खास हो तो फिर बात ही मत पूछिये सीधे वह बिना स्लिप दिये अफसर के कमरे में तक पहुंच जाते  और बिना कहे कुर्सी पर भी बैठ जाते हैं.पब्लिक से डीलिगं वाले  प्राय: हर दफतरों में यह एक आम बात हो गई हैं और इसपर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है.कुछ हद तक  सरकार स्वंय इस स्थिति के लिये जिम्मेदार है. सरकार  के समानांतर चलने  वाली  प्रायवेट कं पनियों में काम करने वाले कर्मचारियों और सरकारी कर्मचारियों के व्यवहार की अगर तुलना करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सरकारी कर्मचारियों की बनस्बत प्रायवेट कंपनियों में काम करने वालों का व्यवहार ज्यादा उदार,सरल  व संवेदनशील होता है. सर्वाधिक परेशानी आम नागरिकों को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से होती है जहां कर्मचारी अपने आपकों देश का कर्ताधर्ता से कम नहीं समझते.पब्लिक डीलिंग और पब्लिक बिहेवियर का एक मामला भोपाल की उस घटना में देखने का मिलता है जिसमें महज 1038 रुपए के एक बिजली बिल को लेकर हुए विवाद में एक कांट्रेक्टर ने अपने भतीजे के साथ मिलकर जूनियर इंजीनियर(जेई) का मर्डर कर दिया. बुधवार को दोनों आरोपी बिल ज्यादा आने की बात कहकर क्लर्क से झगड़ रहे थे, शोर सुनकर जेई कमलाकर वराठे 25 साल चैंबर से बाहर निकले पूछा तो दोनों उनसे भिड़ गए वे सद्व्यवहार करते हुए उन्हेंअपने साथ केबिन में ले गये लेकिन बात बिगड़ गई और दोनों ने उन्हें इतना पीटा कि उनकी मौत हो गई.यह सरकारी सेवक तो इस दनिया से चला गया लेकिन उसका छोटा परिवार जिसके लिये वह यह नौकरी क रता था किसके सहारे अपना जीवन यापन करेंगा? यद्यपि बजरिया पुलिस ने आरोपियों को अरेस्ट कर लिया साथ ही सरकारी व्यवस्था में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश तथा कर्मचारियों की सुरक्षा के सबंन्ध में कई सवाल भीी्रखड़े कर दिये. गलतियां दोनों तरफ है और इसका हल भी  निकाला जाना जरूरी है.वैसे देखा जाये तो सरकारी व प्रायवेट दोनों कामों में अब आनलाइन समस्या निदान की भरमार हो गई है इससे पब्लिक का सरकारी व प्रायवेट कंपनियों से आमना सामना बहुत हद तक कम हो गया है फिर भी बहुत से ऐसे काम हैं जिनसे  सरकारी कर्मचारियों से पब्लिक का सीधा संबन्ध होना जरूरी है जिसमें इलेक्ट्रिक व टेलीफोन बिलों से सबंन्धित मामलों के अलावा बहुत से ऐसे मामले  हैं जिनके लिये सरकारी कर्मचारियेां से संपर्क करना जरूरी हो जाता है.ऐसे में भोपाल जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकार को अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिये कुछ प्रयास करना जरूरी है जिससे ऐसी घटनाएं कहीं फिर न हो.


 

सोमवार, 1 अगस्त 2016

...दुष्कर्मियों की कब तक होती रहेगी खातिरदारी?



बुलंदशहर में कार से जा रही मां-बेटी से हाईवे पर गैंगरेप, तीन आरोपी अरेस्ट और पूरा थाना सस्पेंड:...वाह क्या जिम्मेदारी निभाई! उस परिवार पर क्या बीत रही है- जिनको इस कांड के जालिमों ने जन्मभर का दर्द दिया, यही न कि पीडि़तों में से कोई न कोई इस अपमान को वहन न कर पाये और अपने आप को आग के हवाले कर दें, फांसी पर झूल जायें या जहर पी ले. हमारें कानून की  खामियां और न्याय मिलने में देरी का ही सबब है कि आज पूरे देश में ऐसे दरिन्दें छुट्टे घूम रहे हैं और किसी न किसी परिवार के सुख चैन को रोज छीन रहे हैं. बुलंदशहर यू पी एनएच-91 के 200 मीटर के हिस्से में गैंगरेप की शिकार मां-बेटी की गले की चेन जैसी कई चीजें खेत में पड़ी मिलीं- यहां एनएच-91 के करीब 35 साल की मां और उसकी 14 साल की नाबालिग बेटी को दरिन्दों ने निर्वस्त्र कर नोैच डाला. 12 लोगों ने जो दरिन्दगी का खेल खेला वह अतीत बन गया और उसके बाद अब अपराधियों को थाने में बिठाकर पूछताछ की जा रही है. बीच बीच में चाय भी पिलाई जा रही है.नाश्ते का भी इंतजाम होगा.अफसरों को रेप की  घटना बुरी लगी, उन्होनें पूरा थाना बदल दिया सब सस्पेण्ड! यह सस्पेण्ड नामक सजा वही हैं जिसमें सस्पेण्ड होकर कुछ दिन तक घर में सवेतन छुट्टी मनाता है-यह सब लोग कुछ दिनों बाद दूसरे थानों  में नजर आयेंगे. सस्पेडं या लाइन अटैच पुुलिस का एक ट्रेड मार्क बन गया है इस कार्यवाही के सिवा हमारे जिम्मेदार अधिकारी कोई बड़ा कदम  उठा भी नहीं सकते-नियम उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता. अधिकारी की बात छोडियें सरकार में बैठे लोग भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि  कानून इसके आगे सिर्फ धीरे चलने की एक प्रक्रिया है जो वर्षाे से ऐसे हीनियस क्राइम के मामले में यूं ही रेंग रही है. आगे आने वाले दिनों में गेंग रेप के आरोपी और पकड़े जायेंगे. कानून उन्हें अदालत में पेश करेगी, पेशी पर पेशी होते- होतेे देश में ऐसे कई बलात्कार हो जायेंगे..कितनी ही अबलाएं लुट जायेंगी कितने ही स्कूल में पडऩे वाली खिलौने से खेलने व पुस्तके पढऩे के दिनों में मां बनकर गोद में अवांछित बच्चे को लेकर अपनी मां से पूछेगी- मां गुडिया या गुड्ढा कैसा लग रहा है?-या  यह भी पूछेगंी कि मैरे  साथ ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसे वाक्ये हुए हैं, .आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा.? दिल्ली का निर्भया कांड हो या और वह मामला जिसमें एक पन्द्रह साल की लड़की को आग के हवाले कर दिया गया तथा अन्य अनेक  मामले जिनका जिक्र करने की जरूरत नहीं, सब सबके सामने हैं हम कब तक अपराधियों को क्षमा की संस्कृति पर जिंदा रखेंगे. वे हमारे चेहरों पर थप्पड़ मार रहे हैं, थूक रहे हैं... और हम कब तक महात्माओं के वचनों का पालन करते रहेंगे? आज से वर्षो पूर्व भारत की राजधानी में एक अमीर परिवार के दो बच्चों जिसमें एक भाई बहन थे का रंगा बिल्ला नाम के अपराधियों ने रेप व मर्डर किया था तब इसी देश की पुलिस ने फटाफट कार्रवाई कर कुछ ही दिनों में दोनों अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया था.वे अमीर थे उन्हें न्याय मिल गया किन्तु जो गरीब हैं, मध्यम वर्गीय हैं उन्हें दरिन्दे रौंध रहे हैं मार रहे हैं फिर भी हमारा कानून क्यों कठोर नहीं हो रहा? हमारे देश में वर्तमान सरकार के बहुत से वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ मंत्री है जिन्होंने विपक्ष में रहकर देश में दुष्कर्मो की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कठोर से कठोर सजा की मांग कर आंदोलन किया और संसद में तक धूम मचाई अब उसी विपक्ष के लोग सरकार में हैॅ. क्या सरक ारों के समक्ष भी ऐसी कोई बाध्यताएं आड़े आ जाती है जिसमें अपरराधियों को बख्शने या क्षमाधान करने की मजबूरी आ जाती है? इस तरह की संस्कृति का ही परिणाम है कि ऐसे तत्वों के हौसले बुलंदी पर है जो फांसी की सजा प्राप्त करने के बाद भी जेल के भीतर से अपने सुख सुविधाओं की मांग कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मेरठ रेंज में हुई इस ताजा घटना ने पूरे देश को फिर से हिलाकर रख दिया है. अब तो हाईवे पर फै मली सहित यात्रा करना भी मुश्किल हो गया. इस घटना के तीन आरोपियों  को अरेस्ट कर लिया गया है, पीडित परिवार ने इनकी पहचान भी कर ली है. इसके बाद क्या रखा है? तुरन्त फुरन्त में सजा दो और फाइल बंद....वरना यह अपराधी भी जेल की सलाखों के पीछे से अपने कमरे में और सुख सुविधाओं की मांग करेंगे तथा सरकार का खर्चा बढ़ायेंगे. कानून को अपराधी के बारे में पुख्ता सबूत मिलने के बाद तुरन्त थाने में ही न्यायाधीश के सामने ेपेश कर तत्काल उसे अपने किये की सजा का प्रावधान नहीं किया गया तो ऐसे मामलों का निपटारा करते- करते हमारी न्यायपालिका भी थक जायेगी .एक अरब  इक्कीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में ऐसे तत्वों की संख्या मुश्किल से दो से लेकर पांच प्रतिशत होगी-ऐसे तत्व कम हो जायेंगे तो यह धरती हिलने वाली तो नहीं?. निर्भया कांड से लेकर अब तक नये कानून का स्वरूप भी इन अपराधों को रोकने में कामयाब नहीं हो पायें हैं. हम अब भी अपराध के बाद सस्पेड़ करने, मुआवजा देने,कडी निंदा करने और अन्य प्रक्रियाओं में ही उलझे हैं.कठोर से कठोर कार्रवाही का एक तो उदाहरण र्दो!