शनिवार, 30 जुलाई 2016

छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराध....क्यों दुष्टों का पनाहस्थल बना हुआ है राज्य?


अरूणाचल पर सुप्रीम फैसला...अब सवाल नबाम तुकी के बहुमत हासिल करने का!

उत्तराखंड के बाद अरुणाचल प्रदेश पर  सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से मोदी सरकार की अच्छी खासी किरकिरी हुई है. यहां कांग्रेस की सरकार को फिर से बहाल करने का आदेश दिया है.यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी पुरानी सरकार को स्थापित करने का फै सला दिया है.गवर्नर द्वारा बुलाए गए विधानसभा सत्र को तक सुको ने असंवैधानिक करार दिया  है. कोर्ट ने सवाल उठाया  है कि क्या राज्यपाल कानून व्यवस्था को ताक पर रखकर ऐसे फैसले ले सकते हैं?राज्यपाल के निर्णय पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने विधानसभा सत्र बुलाने के अलावा 9 दिसंबर के बाद की कार्रवाई को भी असंवैधानिक माना है.अदालत के इस फैसले के बाद राज्य में नबाम तुकी सरकार बहाल हो गई. अरुणाचल प्रदेश के स्पीकर नबम रेबिया ने सुप्रीम कोर्ट में ईटानगर हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें 9 दिसंबर को राज्यपाल जेपी राजखोआ के विधानसभा के सत्र को एक महीने पहले 16 दिसंबर को ही बुलाने का फैसले को सही ठहराया था, इसके बाद 26 जनवरी को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और कांग्रेस की नबम तुकी वाली सरकार परेशानी में आ गई क्योंकि 21 विधायक बागी हो गए, इससे कांग्रेस के 47 में से 26 विधायक रह गए। इससे पूर्व भाजपा को उत्तराखंड में लगे झटके के बाद यह दूसरा झटका है, जो राज्यों में विपक्षी सरकारों के विद्रोही विधायकों के सहारे सरकार बनाने की भाजपा की कोशिशों को लगा है. दोनों ही राज्यों में इस हार के लिए खुद भाजपा जिम्मेदार है. उत्तराखंड की ही तरह अरुणाचल  में भी कांग्रेसी विधायकों के टूटने से कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई थी. ऐसे में, संयम का परिचय देते हुए, सांविधानिक मर्यादाओं का पालन करते हुए आगे बढऩा ज्यादा समझदारी होती इसके बजाय भाजपा ने जल्दबाजी कह और राज्यपाल का दुरुपयोग करके स्थिति बिगाड़ ली। भाजपा बार-बार यह तर्क देती रही है कि कांग्रेस ने कितनी ही बार संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करके राष्ट्रपति शासन लगाया  लेकिन भाजपा को यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस द्वारा दुरुपयोग के उदाहरण उसके अपने दुरुपयोग को सही नहीं ठहरा सकते. कांग्रेस ने जब ऐसा दुरुपयोग किया था, तो वह दौर अलग था, तब गठबंधन सरकारे हुआ करती थी,  क्षेत्रीय पार्टियों को केंद्रीय राजनीति में इतनी महत्वपूर्ण जगह नहीं मिली थी. क्षेत्रीय पार्टियां आमतौर पर अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल की सख्त विरोधी रही हैं, क्योंकि इसका नुकसान उनकी राज्य सरकारों को भुगतना पड़ा है। इस मायने में राजनीतिक माहौल अब अलग है.अदालत ने एक तरह से इस मामले में राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र के अधिकार को अत्यंत सीमित कर दिया था,इसी से पिछले काफी वक्त से राजनीतिक वजहों से राष्ट्रपति शासन लगाने की घटनाएं लगभग बंद हो गई थीं, भाजपा की मौजूदा सरकार ने दो साल में ही दो राज्य में राजनीतिक आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाकर एक ऐसी प्रवृत्ति को फिर चलन में ला दिया, जो अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है. कुछ-एक मामलों में  केंद्र ने राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की पहल भी की है, लेकिन अरुणाचल और उत्तराखंड  दोनों मामलों से वह यह सीख सकती है कि सांविधानिक मर्यादाओं का पालन करना कितना जरूरी है.सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर केन्द पुनर्विचार याचिका लेकर जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा छै महीनों के दौरान लिये सारे फैसलों को भी रद्द कर दिया है. अब विपक्ष केन्द्र से उनके इस्तीफे की मांग भी करने लगा है. सुप्रीम
कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है. विलंब से आए इस निर्णय को लागू करने के बाद कुछ अड़चनें आ सकती है जैसे सवाल उठ रहा है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी अब बहुमत हासिल कर पाएंगे...? गैरकानूनी सरकार बनाने के लिए जवाबदेह गवर्नर क्या देंगे त्यागपत्र...?  सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा, जहां संख्याबल बीजेपी के साथ है, सवाल यहां यही बना हुआ है कि क्या अरुणाचल प्रदेश में संख्या बल की राजनीति ही जीतेगी...?

प्रशांत सागर में चीन की जासूसी... चीन की महत्वाकांक्षा क्या है? ?

इन दिनों भारत, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका का एक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास जापान के पास पश्चिमी प्रशांत सागर में किया जा रहा है, जिसमें अमेरिकी विमानवाहक जहाज जॉन सी स्टेनिस भाग ले रहा है.जॉन सी स्टेनिस के कमांडर का कहना है कि एक चीनी जासूसी जहाज ने उनका पीछा किया। उनके मुताबिक, चीनी जहाज दक्षिण चीन सागर से उनके पीछे आया और आठ-दस मील की दूरी पर बना रहा. चीन का कहना है कि वह अपने कानूनी अधिकार और नौवहन की स्वतंत्रता के तहत काम कर रहा है. दक्षिण चीन सागर एक तरफ से चीन और बाकी तरफ से वियतनाम, ताइवान, फिलीपींस, इंडोनेशिया, जापान वगैरह देशों से घिरा हुआ है. यह अपेक्षाकृत छोटा समुद्र पश्चिमी प्रशांत सागर की ओर खुलता है और यह चीन के लिए पश्चिमी प्रशांत की ओर जाने का रास्ता है.चीन दक्षिणी प्रशांत सागर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है और इलाके के सारे देशों से समुद्री अधिकार क्षेत्र को लेकर उसका झगड़ा है. झगड़े की वजह सामरिक और व्यापारिक वर्चस्व के अलावा यह भी है कि इस क्षेत्र में तेल के भारी भंडार होने की संभावना है.चीन इस क्षेत्र में सबसे ताकतवर देश है, इसलिए बाकी देश उसकी महत्वाकांक्षा से डरे हुए हैं. इन देशों का कहना है कि इस क्षेत्र में और इसमें मौजूद तमाम द्वीपों पर चीन अपना हक जता रहा है और कुछ कृत्रिम द्वीप भी बना रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का उल्लंघन है. चीन यह भी कहता है कि वह अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा है. चीन की महत्वाकांक्षा को नियंत्रित करने के लिए तमाम आसियान देश साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर रहे है, इसी बीच चीन और आसियान देशों के विदेश मंत्रियों की एक बैठक भी हुई, जिसमें दक्षिण चीन सागर को लेकर विचार-विमर्श किया गया.सम्मेलन के बाद एक साझा बयान जारी किया गया, जिसमें चीन का नाम लिए बगैर इस क्षेत्र में अपनी ताकत दिखाने की उसकी प्रवृत्ति की आलोचना की गई थी, लेकिन कुछ ही देर बाद यह बयान वापस ले लिया गया और कहा गया कि सभी विदेश मंत्री अपना-अपना बयान जारी करेंगे.जापान और चीन के बीच भी समुद्री सीमा को लेकर विवाद है. पूर्वी चीन सागर में जापान के पास कई छोटे-छोटे द्वीप हैं, जिन्हें जापान चीन के खिलाफ अपनी रक्षा पंक्ति की तरह इस्तेमाल करता है और उन पर उसने रडार व अन्य यंत्र लगा रखे हैं। चीन इन द्वीपों पर भी अपना दावा जताता है। उसका मुकाबला करने के लिए इस क्षेत्र के तमाम प्रजातांत्रिक देश मिलकर जो कोशिश कर रहे हैं, उसमें भारत भी उनके साथ है. चीन का विवाद वियतनाम के साथ भी है और भारत जहां दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज के लिए वियतनाम की मदद कर रहा है, वहीं उससे ब्रह्मोस मिसाइल बेचने का एक समझौता भी किया है। इसी रणनीति का हिस्सा अमेरिका, भारत और जापान का संयुक्त नौसैनिक अभ्यास है.जापान का कहना है कि चीनी जासूसी जहाज उसकी समुद्री सीमा में प्रवेश कर गया था। हो सकता है कि चीन का इरादा जासूसी करने से ज्यादा अपनी नाराजगी जताने का हो, लेकिन एक-दूसरे की समुद्री सीमा में घुस आने की शिकायतें इस क्षेत्र के तमाम देशों और चीन के बीच लगातार चलती रहती हैं। देखना यह है कि ये विवाद कहां तक जाएंगे, क्योंकि चीन की आक्रामकता बढ़ रही है। इस क्षेत्र का सामरिक और आर्थिक महत्व बढऩे ही वाला है। निकट भविष्य में भले ही कोई युद्ध न हो, लेकिन ज्यादा टकराव की खबरें सुनने को मिलेंगी. दूसरी ओर चीन- भारत के बीच सीमा विवाद कभी भी विस्फोटक रूप धारण कर ले तो भी आश्चर्य नहीं. इसके संकेत बार बार मिलते रहते हैं. चीन की किसी बातों पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता.

छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराध....क्यों दुष्टों का पनाहस्थल बना हुआ है राज्य?
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित प्रेदेश के सभी  बड़ी शहर यहां तक कि कस्बे भी इन दिनों अपराधियों के लिये  स्वर्ग बने हुए हैं. स्थानीय अपराधियोंं की बात छोडिय़े बाहरी अपराधियों ने भी रायपुर को छिपने का अपना अच्छा ठिकाना बना लिया है. बाहर से आये अपराधी कोई न छोटा मोटा बिजनेस शुरू करने का नाम पर यहां आते हैं फिर अपने और साथियों को यहां बुलवा लेते हैं. कई ऐसे भी है जो पडोसी देश के रहने वाले हैं जिन्हें तुरंन्त फुरन्त सारी सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाती है जिसमे बिजली गैस कनेक्शन से लेकर और सारी मूलभूत सुविधाएं शामिल है.अपराधी तत्व यह भी जानते हैं कि पैसा देने से यहां कुछ भी काम हो जाता है तो इसे प्राप्त करने के लिये पैसा भी वे पानी की तरह बहाते हैं राजधानी रायपुर में सड्डू से हीरापुर जरवाय नंदनवन तक के पूरे इलाके में कई ऐसे लोगो की बसाहट चर्चा का विषय है.भारी संख्या में बाहरी तत्वों के प्रवेश पर किसी प्रकार की लगाम नहीं होने के चलते यहां अपराधों की बाढ़ आ गई है. इसका खामियाजां यहां रहने वालों को भुगतना पड़ रहा है. बीते दिनों में हुई कई गंभीर किस्म की घटनाओं से तो शहर में लोगों को बाहर निकलने में भी डर लगने लगा है. कानून और व्यवस्था की स्थिति एकदम चौपट हो चुकी है. सभ्य लोग जो कभी रास्ता चलते किसी से टकरा जाने पर भी उत्तेजित होकर भिड़ जाते थे वे आजकल के अपराधियों से इतने भयभीत हो चुके हैं कि कोई अपशब्दों का प्रयोग कर दे तो भी शांत भाव से मुस्कराकर चल देते हैैं चूंकि उन्हें भय रहता है कि कहीं कटार व पिस्तौल निकालकर उसका काम तमाम न कर दें. स्थानीय  स्तर पर भी कम उम्र के नौजवान बेरोजगारों के बड़े बड़े गेंग शहर में मौका देखकर वारदात को अंजाम दे जाते हैं. जिसपर पुलिस की कोई पकड़ नहीं है-कुछ चोरी लूटपाट और नशें का व्यापार करते हैं तो कुछ बड़ी बड़ी बड़ी वारदातों से रोज सुर्खियों में आ रहे हैं. बहरहाल बहुत दिनों या कहें बहुत सालों से राजधानी व आसपास के शहरों में पुराने चड्डी बनियान गिरोह का नाम सुनाई नहीं दे रहा था लेकिन अब लगता है कि उनका भी दुर्भावगमन इस राज्य में हो चुका है तथा उन्होंने शिवनाथ एक्सप्रेस में लूट, ट्रेन पर पथराव कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है.बिल्हा से चकरभाठा स्टेशन के बीच बनियान गिरोह न गत शुक्रवार रात ढाई घंटे के भीतर दो ट्रेनों में लूट की यात्रियों को इस बात की खुशी रही कि आरपीएफ स्कार्टिंग पार्टी ट्रेन में थी जिसके ट्रेन से उतरते ही डकैतों ने उनपर भी  पथराव किया. इससे दो यात्रियों के सिर पर चोटें आईं.हमारे प्रदेश के लोग बहुत सहनशील है वे जुल्म सहन कर लेते हैं लेकिन शिकायत नहीं करते=कुछ इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. सर फटकर खून बहने के बाद भी लोगों ने सोचा कौन शिकायत करके पुलिस और अदालत के चक्कर लगाये? वैसे भी  रिपोर्ट लिखा देेंगें तो क्या पुलिस उनको जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई कर देगी? पुलिस को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिये भी सरकार को कुछ करना चाहिये.अगर कोई किसी पुलिस क्षेत्र में लुट जाता है, किसी को कोई परेशानी अपराधियों से होती है तो इसकी जिम्मेदारी उस क्षेत्र के पुलिस व वहां तैनात अधिकारियों पर तय होना चाहिये. राजधानी रायपुर में पिछले कुछ दिनों के दौरान सीरियल उठाईगिरी या सरे आम सड़क पर लूट की वारदाते हुई हैं. संदेह है कि यह काम बाइक पर हेलमेट लगाकर तेज गाड़ी चलाने व विचित्र आवाज के हार्न बजाते घूमने वाले लड़कों की कारस्तानी हो सकती है.. रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव जैसे शहरों में  महिलाओं के गले से सरे आम चैन स्नेचिंग की घटनाएं होती रहती हैं.गिरोह पकड़े भी जाते हैं किन्तु पुलिस की निगरानी  व  सख्त गश्त के बगैर इनपर  नियंत्रण नहीं पाया जा रहा है. चोरी, लूट की तो इतनी घटनाएं हो रही है कि उसका कोई हिसाब नहीं है. कई लोग अपने ऊपर होने वाले जुर्म की शिकायते लेकर थानों में नहीं पहुंचते: ऐसा ही कुछ महिलाओं के साथ भी हो रहा है जिनके साथ मनचलों व बदमाशों द्वारा होने वाले दुव्र्यवहार की शिकायते थानों तक नहीं पहुंच रही है. कानून के लचीलेपन के कारण भी लोग अपने ऊपर होने वाले जुर्म को सहकर चुप  बैठने के लिये मजबूर हैं.
























कश्मीर में अलगाववादी सोच का बढ़ता दायरा.


पिकनिक या मस्ती में होने वाली परीक्षाएं....करोडों छात्रो के भविष्य के साथ खिलवाड!

हरे-भरे मैदान या पेड़ों की छांव में अकेले बैठकर या जगह-जगह ग्रुप बनाकर पढ़ाई करना या परीक्षा देना दोनों ही अच्छी बात हैं लेकिन परीक्षा क्या ऐसी ही ली जाती है?  झारखंड में धनबाद जिले के आरएस मोर कॉलेज में शनिवार को झारखंड एकेडमिक काउंसिल की ओर से आयोजित 11 वीं की परीक्षा में तो कुछ ऐसा हो गया कि पूरे देश का ही घ्यान वर्तमान शिक्षा प्रणाली और उससे उपजे परीक्षार्थी या पास हाने वाले विद्यार्थियों की काबिलियत पर ही सवाल खड़ा कर गया. यहां 600 स्टूडेंट्स को एक साथ बैठाने की व्यवस्था की गई. शनिवार को अंग्रेजी और हिंदी की परीक्षा थी, न सिर्फ धनबाद बल्कि झारखंड के कई और जिलों में इस तरह से परीक्षा करवाने की बात कही गई है. बिहार में नकल और फर्जी टॉपर्स के मामले पर छिड़ी बहस अभी खत्म नहीं हुई है. वहां ऐसे ही कई परीक्षार्थियों को जो टापर्स बनाया गया व  गिरफतार किया गया वह देश के  सामने है.एकेडमिक करप्शन का यह ताजा उदाहरण है जिसमें  धनबाद  कॉलेज की तीन फैकल्टी (साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स) के सभी 1664 स्टूडेंट परीक्षा देने पहुंचे थे. इतने छात्रों के एक साथ आने से बैठने की व्यवस्था चरमरा गई व परीक्षा शुरू होने की घंटी बजते ही टीचर कॉमन रूम में चले गए.नकल  ऐसी चली कि आप अकेले बैठें या चार-पांच साथियों के साथ, किसी को कोई ऐतराज नहीं था.सबने कापी  पुस्तकों और जानकार छात्रों से बातचीत कर आराम से बिना किसी रोक टोक के खुशी खुशी परीक्षा दी.आरएस मोर कॉलेज में एक साथ 600 स्टूडेंट्स को ही बैठाने की व्यवस्था है. एक ही दिन तीनों संकायों के 1664 स्टूडेंट्स की परीक्षा हुई तो बाकी स्टूडेंटंस को कहां बिठाया जाय इसका प्रबंध पहले ही प्रबंधन ने क्यों नहीं किया?यह सवाल तो उठता ही है. धनबाद के आलावा राजधानी रांची और जमशेदपुर में भी एकेडमिक काउंसिल की परीक्षा के दौरान सामूहिक नकल कराने का मामला सामने आया है.यह एक ऐसा मामला है जो संपूर्ण शिक्षा प्रणाली पर ही प्रशनचिंन्ह लगाता है. सवाल उन छात्रों का भी है जो सालभर खूब मेहनत करके पढ़ते हैं और इस व्यवस्था के चलते वे अपने कैरियर को खत्म कर देते है.यह अकेले बिहार का मामला भी नहीं है संपूर्ण देश ऐसी ही व्यवस्था की गोद में फलफूल रहा है जहां मध्यप्रदेश का व्यापम और बिहार के टापर्स जैसी घटनाएं हर साल होती है.छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है यहां जो घटनाएं हुई वह किसी से छिपी नहीं, चाहे वह पोराबाई का मामला हो, लोहाड़ीगुडा में प्रदेश के मंत्री केदार कश्यप की पत्नी शांतिबाई का मामला हो या 16 फरवरी 2015 को छत्तीसगढ़ में हुए प्रशन पत्र लीक कांड का मामला. इन सबसे भी आज तक परीक्षा लने वालों ने कोई सबक नहीं सीखा.  छत्तीसगढ़ में 15 फरवरी को आयोजित कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की भर्ती परीक्षा का मामला आज भी लोगों की जुबान पर है जबकि मध्यप्रदेश के व्यापम की जांच प्रक्रिया सीबीआई की जांच के दायरे में है. लाखों करोडों की संख्या में बच्चे हर साल  परीक्षा देते हैं. आधे से ज्यादा हिस्सा नकल, पहुंच और पैसे के बल पर अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं जबकि ईमानदारी ओर निष्ठा से पढ़ाई कर आगे बढऩे वाले बच्चों के साथ आगे अपने भविष्य पर तलवार ऐसे लोगों के कारण लटक जाती है. सरकारे ंमामला उजागर होने के बाद जांच समितियां बिठा देती है. सारी  प्रक्रिया में इतनी देर हो जाती है कि तब तक कोई दूसरा कांड हो जाता है.नकल व परीक्षा में गड़बडिय़ों के लिये कोचिंग क्लासेस और ऐसे ही टूयूशन करने वाले भी बहुत हद तक जिम्मेदार है जो अपने संस्थान की साख को कायम करने के लिये पेपर लीक करवाते हैं .पूर्व में जब मामला उजागर हुआ था तब दिल्ली में संचालित एक कोचिंग संस्थान भी संदेह के दायरे में आया था. यह कोचिंग एसएससी के एक पूर्व अधिकारी द्वारा संचालित किया जा रहा था.गली गली आज कोचिंग सेेंटर खुले हुए हैं जिनपर सरकार का किसी प्रकार कोई नियंत्रण नहीं हैंं-ऐसे कई हरकतों से नकल और प्रशनपत्र लीक का सारा मामला उलझा पड़ा है  जिसपर कोई ठोस कदम नहीं उठाने से करोड़ों छात्रों का भविष्य दाव पर लगा हुआ है.


कश्मीर में अलगाववादी सोच का बढ़ता दायरा...

हिजबुल मुजाहिदीन के युवा कमांडर बुरहान मुस्तफा वानी के मारे जाने के विरोध में जितनी बड़ी हिंसा हुई वह पिछले पच्चीस छब्बीस वर्षो में हुई सबसे बड़ी हिंसा और सबसे बड़ी शवयात्रा है-यह इंगित कर रही है कि कश्मीर में अलगाववादी अपनी पैठ तेजी से जमा रहे हैं और एक विषम स्थिति केन्द्र व राज्य सरकार के लिये पैदा कर रहे हैं.सह भी सोचने वाली बात हैं कि जो व्यक्ति सेना की किसी गफलत या मनमानी की वजह से नहीं मारा गया और जिसपर दस लाख रुपए का इनाम घोषित था उसके प्रति किस तरह की हमदर्दी लोग दिखा रहे हैं. यह भी महत्वपूर्ण व चिंता का विषय है कि ऐसे व्यक्ति की मौत पर हमारा पडौसी दु:ख और चिंता व्यक्त कर रहा है. इस व्यक्ति की शव यात्रा में शामिल होने हजारों लोग जुटे और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पों पर उतर आए.सुरक्षा बलों के ठिकानों पर तोड़-फोड़ की और आग लगा दी. इस पर काबू पाने में की गई गोलीबारी में ग्यारह लोग मारे गए और सौ से ज्यादा घायल हो गए.आखिरकार अमरनाथ यात्रा रोक दी गई, पूरी घाटी में कर्फ्यू लगाना पड़ा.इस समय सरकार के समक्ष सबसे कठिन काम अमरनाथ यात्रियों को सुरक्षित अपने ठिकानों तक पहुंचाना है इसमें बहुत हद तक सफलता भी मिली है.कऱीब 23000 यात्रियों को बालटाल और पहलगाम के बेस कैम्प से जम्मू भेज दिया गया है. ये सभी यात्री दर्शन कर वापस आ रहे थे और बेस कैम्पों में फंसे हुए थे.कऱीब 2000 गाडियों में हजारों यात्रियों को रात को जवाहर टनल क्रॉस करवाया गया इस दौरान सुरक्षा बलों ने पूरे हाइवे में तैनाती की थी. इसके अलावा रामबान बेसकैम्प में फंसे करीब 1000 यात्रियों को बालटाल बेस कैम्प पहुंचाया गया.अभी तक सेना की ज्यादतियों के विरोध में घाटी के लोग ऐसी हिंसा पर उतारू होते देखे जाते रहे हैं. किसी आतंकवादी के मारे जाने पर ऐसा जनाक्रोश लंबे समय से नहीं फूटा.बुरहान की शव यात्रा में कम से कम दो अलगाववादी धड़े शामिल हुए और एक बार फिर कश्मीर की आजादी के नारे लगाए गए, पाकिस्तान का झंडा फहराया गया तो क्या इससे  यह समझा जाये कि कश्मीर एक बार फिर नए सिरे से चरमपंथी तरीके से अपने हकों के लिए लडऩे पर उतारू है! पिछले कुछ सालों में जिस तरह के जख्म कश्मीर ने आतंकवादी के नाम पर झेले थे और वहां शांति के लिए आमराय बननी शुरू हुई थी, चरमपंथ से उनका भरोसा डिगा था, क्या वह फिर से वहां वापस लौट रहा है? जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने युवाओं के भटकाव और उनके मारे जाने पर अफसोस जाहिर किया है मगर सवाल है कि युवाओं के भटकाव को रोकने के लिए जो प्रयास पहले किए गए, उनका असर क्यों नहीं हो पा रहा. क्यों वे चरमपंथी गतिविधियों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं कश्मीर में युवाओं के गुमराह होने की बड़ी वजह रोजगार के अवसरों का न होना है, जिसके लिए पिछले दस-वर्षो में काफी प्रयास किए गए, उसका सकारात्मक नतीजा भी दिखाई देने लगा था मगर अभी जिस तरह से वहां कश्मीर की आजादी के नारे लगने शुरू हुए हैं और पाकिस्तान का झंडा लहराया जाने लगा है, उसने यही जाहिर किया है कि वजहें और भी हैं. पाकिस्तान से कश्मीर में आतंकवाद को मिल रही मदद छिपी नहीं है, उसके चलते घाटी के कुछ अलगाववादी संगठन युवाओं को गुमराह करने में सफल होते रहे हैं मगर जब से कश्मीर में नई सरकार बनी है, युवाओं में अलगाववादी मानसिकता गहरी होती गई है यह केवल रोजगार की कमी की वजह से या सेना की ज्यादतियों के चलते पैदा हुई मानसिकता नहीं है,इसमें एक प्रकार की धार्मिक कट्टरता है, यह कट्टरता इस्लाम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन रहे माहौल की वजह से भी पैदा हुई है. जब पूरी घाटी में हजारों लोग इस तरह अलगाववादी नारे लगाते हुए निकल पड़े तो सोचने की जरूरत है कि इस मानसिकता को, इस प्रतिरोध को सेना के बल पर नहीं दबाया जा सकता.इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
हम अपने ही देश में एक दूसरे  को क्यों नहीं पहचान पाते?
यह कितना दुर्भाग्यजनक है कि एक ही देश में रहने वाले एक दूसरे को नहीं पहंचानते कि वह अपने देश का है या दूसरे देश का! यह आज की बात नहीं, कई सालो से चला आ रहा है कि अपने ही देश में रहने वाले एक दूसरे को सही ढंग से नहीं जान पाये. केरल, आन्ध्रप्रदेश,कर्नाटक में रहने वाला जब मध्यभारत में आया तो उसे लोग मद्रासी या अण्णा कहकर पुकारने लगे जबकि इन प्रांतों में रहने वाले न तो मद्रासी कहलाते हैं न अण्णा, दक्षिण से आने वाले हर शख्स को मद्रासी और मध्यभारत या अन्य किसी प्रदेश से दक्षिण पहुंचने वाले को हिन्दी-पंजाबी-गुजराती-बंगाली से पुकारा जाने लगा. वही उत्तरी राज्यों के लोगों को भारतीय होने के बाद भी चीनी, नेपाली, जापानी जैसे बनाकर  पेश किया जाने लगा.हम न अपनी भौगोलिक स्थिति को पूरी तरह समझ पाये और न ही सामाजिक व्यवस्था और वातावरण को समझ पाये कुछ ऐसा ही हुआ जब  मणिपुरी युवती  दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुुंची.कथित तौर पर उससे बदसलूकी हुइ्र्र. इस युवती ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा  कि एक आव्रजन अधिकारी ने उससे पूछा कि क्या वह सचमुच भारतीय है और सबूत के तौर पर उसे भारत के राज्यों की संख्या गिनाने को कहा, उसके साथ और भी कुछ मजाक किए गए, जो साफ है कि उसके पूर्वोत्तर भारत की होने की वजह से थे.अक्सर यह बात एक दूसरे राज्यों  से आने-जाने वालों के साथ होती ही है. कोई उत्तर भारत से दक्षिण पहुंचने वाले को समोसा कहकर पुकारता है तो कोई दक्षिण भारत से पहुंचने वालों को इडली समोसा और गुजरात से पहुंचने वालो को ढोकला आदि, बहरहाल यह सबकुछ एक दूसरे की संस्कृति , सामाजिक व्यवस्था भाषा को न जानने के कारण होता है. कुछ मामले जैसा इस मणिपुरी युवती के साथ हुआ शायद इसके पीछे और दूसरे कारण भी रहे होंगे जो आब्रजन अधिकारियों ने मजाक या युवती को हरास करने के लिये किया हो. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उसकी फेसबुक पोस्ट को लेकर ट्विटर पर टिप्पणी की है और इस मामले में गृह मंत्री राजनाथ सिंह से बात करने का वादा किया है. गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने भी इस मामले में कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है. रिजिजू खुद पूर्वोत्तर भारत से आते हैं. यह इंसान की फितरत है कि वह अपने साथ तो उदार व्यवहार चाहता है, पर दूसरों के प्रति अनुदार हो जाता है. जो भारतीय विदेशों में हैं, वे आम तौर पर वहां के उदारवादी नेताओं और पार्टियों के समर्थक होते हैं, जैसे अमेरिका में बसे बहुसंख्यक भारतीय डेमोक्रेटिक पार्टी और ग्रेट ब्रिटेन में बसे हुए भारतीय लेबर पार्टी के समर्थक हैं, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वहां वे अल्पसंख्यक हैं और वे ऐसी राजनीतिक शक्तियों का समर्थन करते हैं, जो धर्म या नस्ल के आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादा उदार और समानता की राजनीति के पक्षधर हैं लेकिन अपने देश में हम यह बराबरी नहीं चाहते. हमारे देश में धार्मिक या नस्लीय आधार पर भेदभाव के शिकार विदेशी ही नहीं, भारतीय नागरिक भी होते हैं. अक्सर हमारे देश में व्यावहारिक अवधारणा बहुत संकुचित होती है.उत्तर भारतीयों के लिए भारत और भारतीय संस्कृति का आधार उत्तर भारतीय हिंदू समाज है, जबकि दक्षिण भारतीयों के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है. पूर्वोत्तर भारत के लोग इस अवधारणा में अंटते ही नहीं हैं, और चूंकि वे जनसंख्या के लिहाज से अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनके साथ बराबरी और सम्मान का व्यवहार करना जरूरी नहीं माना जाता.हम कितना ही कहें कि अनेकता में एकता हमारी विशेषता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अपने से अलग रंग-रूप या संस्कृति के लोगों को हम अपना नहीं मान पाते. पूर्वोत्तर भारत से आए लोगों के साथ बदसलूकी और हिंसा की घटनाएं आए दिन सुनने में आती हैं, दिल्ली में तो पिछले सालों में अनेक ऐसी घटनाएं सिर उठा चुकी है. एक छात्र की तो हत्या तक कर दी गई थी इसके बाद पूर्वोत्तर के छात्रों ने अच्छा खासा हंगामा किया था. र कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आधुनिकता के बढऩे के साथ जो दुराग्रह घटने चाहिए थे, वे दरअसल बढ़ रहे हैं.

















झटका स्मृति को तो प्रमोशन,,,,


झटका स्मृति को तो प्रमोशन जावडेकर को और खिचाई जेठली की....!
    मोदी मंत्रिमंडल का दूसरी बार गठन हुआ तो कुछ नया -नया सा हुआ, मंत्रिमंंडल में कुछ टेलेंटेड और क्षेत्र के जानकार लोगों को शामिल किया गया तो कु छ निष्क्रिय लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया.धर्म और जातिवाद का कोई खेल यहां काम न आया.  मोदी ने पहले ही अपने मंत्रियों को सचेत करते हुए कहा था कि निष्क्रियता त्यागे वरना मुसीबत में पड़ जाओगे.भले ही उनका गुस्सा बड़े पैमाने पर नहीं निकला किन्तु विवादों में घिरी स्मृति ईरानी से शिक्षा मंत्रालय छीनकर उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की स्वच्छता पर मुहर जरूर लगवा ली. मीडिया के लिये स्मृति का शिक्षा मंत्रालय से हटाना और अरूण जेठली के पर कतरना दोनों ही महत्वपूर्ण खबर बनी. स्मृति ईरानी को अब मोदी सरकार में कपड़ा मंत्री बनाया है.मोदी ने इस बार एक तरह से अगले चुनावों की रणनीति तैयार की है. आने वाले चुनावों के लिये विभिन्न राज्यो से विशेषकर यूपी से ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया जबकि छत्तीसगढ़ को इस बार भी कोई प्रतिनिधित्व अपने मंत्रिमंडल में नहीं दिया. छत्तीसगढ़ की उपेक्षा का सिलसिला पिछले कई सालों से यूं ही चलता आ रहा है.बहरहाल मंत्रिमंडल पुर्नगठन में स्मृति ईरानी को मिले बड़े झटके को सभी तरफ गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि दो साल पहले लोकसभा चुनाव में हार के बावजूद स्मृति को शिक्षा मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण जिम्मा मिला था. स्मृति ईरानी पर मंत्री बनते ही सबसे पहले चुनावी शपथ पत्र में डिग्री की गलत जानकारी देने का आरोप लगा. स्मृति 2014 में ही दूसरी बार विवादों में घिर गईं. जब उनके मंत्री बनने के तुरंत बाद यूजीसी के आदेश पर दिल्ली यूनिवर्सिटी को ग्रेजुएट डिग्री कोर्स की मियाद चार साल करने का फैसला वापस लेना पड़ा.हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी को लेकर भी स्मृति ईरानी के मंत्रालय की खूब किरकिरी हुई. वेमुला की खुदकुशी को लेकर विपक्ष ने स्मृति पर संसद को गुमराह करने का आरोप लगाया. देशविरोधी नारेबाजी विवाद में दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी डीयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी का विवाद भी खूब गरमाया. जमानत पर छूटने के बाद कन्हैया ने स्मृति पर जमकर निशाना साधा. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी के दर्जे पर सवाल उठाकर भी स्मृति ईरानी विरोधियों के निशाने पर आ गई थीं.आईआईटी कैंटीन विवाद से भी स्मृति ईरानी का नाता रहा. तब शिक्षा मंत्रालय ने आईआईटी संस्थानों को शाकाहारी छात्रों के लिए अलग हॉस्टल बनाने का निर्देश जारी किया था. आईआईटी मद्रास में दलित छात्रों के गु्रप आंबेडकर पेरियार पर मोदी सरकार की आलोचना को लेकर बैन लगाने पर भी स्मृति ईरानी की खूब आलोचना हुई थी. होहल्ला मचने पर ये बैन हटा था.इसके अलावा आईआईटी मुंबई बोर्ड के अध्यक्ष पद से परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर का इस्तीफा, जर्मन भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाने का विवाद और क्रिसमस की छुट्टी के दिन गुड गवर्नेंस डे रखने का विवाद भी स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान सामने आया. इन विवादों को लेकर मोदी सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर रही थी. प्रकाश जावडेकर ही मोदी मंत्रिमंडल के इकलौते ऐसे चेहरे हैं जिन्हें पदोन्नति मिली. जावडेकर को पर्यावरण मंत्रालय में राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार से कैबिनेट मंत्री बना दिया गया हैं.. प्रकाश जावडेकर बतौर पर्यावरण मंत्री स्वतंत्र प्रभार प्रकाश जावडेकर ने उन परियोजनाओं पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जो प्रधानमंत्री मोदी के दिल के बेहद करीब थी. फिर चाहें गंगा सफाई की बात हो, जलवायु सम्मेलन हो या स्वच्छ भारत की, पेरिस में हुए जलवायु सम्मेलन में विश्व को सोलर एलायंस का कॉन्सेप्ट समझाया जिसे पहली बार में 120 देश सदस्य बनने को तैयार हो गए और इसका मुख्यालय भी भारत में ही बना. गंगा सफाई मे तथा स्वच्छ भारत के सपने में जुटे-जावडेकर ने सफाई के लिए पांच पॉलिसी बनाई जिसमें ईवेस्ट यानी मोबाइल, कंप्यूटर जैसे कचरे से लेकर कंस्ट्रक्शन वेस्ट मैनेजमेंट यानी मेट्रो-घर बनाने-तोडऩे में निकलने वाले मलबे को ठिकाने लगाने की नीति शामिल है. वन काटने के एवज में किसी प्रोजेक्ट से मिलने वाले पैसे के इसेतमाल के लिए बिल लोकसभा से पारित कराया गया.जावडेकर को प्रमोशन है जबकि वित्त मंत्री जेठली जो पहले से मीडिया के निशाने पर थे मोदी के लिये भी कतिपय मामलों में किरकिरी बने...उन्हें भी अब संभलने का संकेत दिया गया है.

सोशल मीडिया दोस्त है तो दुश्मन भी, बच्चो का ध्यान पुस्तको से हटा!

एक सर्वे में एक चिंतनीय बात सामने आई है कि सोशल  मीडिया बच्चों और युवाओं को काफी नुकसान पहुंचा रहे है. सर्वे में जो बाते सामने आई है अगर उसका विश£ेषण किया जाये तो बात साफ है कि सोशल  मीडिया से हमारी दोस्ती हमें अपनों से बहुत हद तक दूर करती जा रही है. बच्चे तो बच्चे बड़े भी इसकी चपेट मे आ रहे हैं. सोशल मीडिया से बच्चों की मित्रता ने उन्हेें अपने स्कूल व परिवार से दूर करना शुरू कर दिया है. समाज में घटित होने वाली कई किस्म की घटनाओ के पीछे सोशल मीडिया को ही दोषी ठहराया जा रहा है.बच्चों में पुस्तके पढऩे की आदत लगभग खत्म हो गई है उनको पुस्तकों से नफरत होने लगी है. इसके पीछे सोशल मीडिया है जो पुस्तकों के प्रति उनके आकर्षण को छीनकर अपनी ओर ले जा रही है. बच्चों के पढऩे की आदत कम हो रही है. चाहे वह यूं ही मिलने वाला समय हो या कोई्र छुटटी का दिन अथवा गर्मियों की छुट्टियां बच्चे व युवा अपना समय मनोरंजक पुस्तकें पढ़कर बिताने की जगह अब सोशल नेटवर्किग साइट्स पर चैट करना अधिक पसंद कर रहे हैं.वास्तविकता यह है कि किताबें न पढऩे की वजह से बच्चों की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता में कमी आ रही है जो उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है. मनोरोग विभाग द्वारा हाल के दिनों में किए गए एक सर्वेक्षण में 1350 बच्चों को शामिल किया गया इसमें उनकी सामान्य दिनचर्या में सोशल साइट्स के प्रभाव संबंधी 20 बिंदुओं पर प्रश्न किया गया उसमें पाया गया कि सोशल साइट्स का प्रयोग बच्चे करते हैं उसमें से अधिकांश का कहना यह था कि उन्हें ज्ञान अजिर्त करने के लिए  सोशल साइट्स पर निर्भर रहना पड़ता है. कुछ मामलों में इसे अच्छी आदत कहा जा सकता है, लेकिन लगातार किताबों से दूरी बच्चों की कल्पनाशीलता को कम कर रही है.अच्छी सोशल साइटस पर जाते जाते बच्चे व युवा दोनो ही भटक जाते हैं और दूसरी साइटस पर अपना मनोरंजन करने लगते है जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं रहता. बच्चे ज्यादातर फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और ट्विटर, व्हाटस अप जैसी सोशल साइट्स पर अपनी उम्र छिपाकर आईडी बना रहे हैं. 14 से 17 साल की उम्र तक के बच्चों से सोशल मीडिया संबंधी उनकी आदतों के बारे में जानकारी हासिल करने पर यह पाया गया है कि 40 प्रतिशत बच्चे 17 साल की उम्र से पहले ही स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.जानकारी एकत्र करने के प्रति छात्रों की जिज्ञासा बढ़ी है, लेकिन इसके लिए वह शत प्रतिशत सोशल साइट्स पर ही निर्भर है. किताबें पढऩे या कहानी सुनते समय विचारों में एक तरह की आभासी दुनिया बनती है जो रचनात्कता को बढ़ाती है. संचार के नए माध्यमों से यह कम हो रही है. सोशल साइटस से  देखकर ज्ञान प्राप्त करने  और पुस्तके पढ़कर ज्ञान अर्जित करने में बहुत अंतर है. मोबाइल और कम्पयूटर, टीवी पर लगातार नजरे गढ़ायें बैठे रहने से बच्चो की आंखों पर भी प्रभाव पड़ रहा है. कम उम्र में  बच्चों को चश्मा लगाने की नौबत आ रही है. पिचयासी प्रतिशत बच्चे आज सोशल साइटस से जुड़े हैं यह सिर्फ एक बड़े महानगर का आंकड़ा है-जुडऩे के पीछे कारण भी स्कूलो में सोशल साइट्स के बारे में बच्चो के बीच हाने वाली चर्चा है. वे आपस में एक दूसरे से पूछते हें और अपनी आईडी बनाकर आपस में जुड जातेे हैं फिर शुरू होता है चेटिंग का सिलसिला. हम मानते है कि आपस में बच्चो व बड़ो दोनों के जुडने मेल मिलाप का सोशल मीडिया एक अच्छा माध्यम है लेकिन यह कभी कभी दु:खुद परिणाम भी देता है. यह बताने की जरूरत नहंीं कि देश विदेश में होने वाले बहुत से अपराध में सोशल मीडिया की भागीधारी से ज्यादा होती जा रही है.देश में रोज होने  वाले कई किस्म के अपराधों में सोशल मीडिया का नाम कहीं न कहीं से जुड ही जाता है.सूचना और जानकारी का अच्छा तंत्र होने के बावजूद सोशल मीडिया उपयोग के मामलों में बच्चो पर निगरानी रखने की भी जरूरत है.




अमरीका में बंदूक ों का खेल-हिंसा के लिये अस्त्र की खुली छूट जिम्मेदार!

अमेरिका में  9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका में आतंकवाद का डर भी समा गया है और जो समाज कभी अपने खुलेपन और आजादी के लिए जाना जाता था, उसमें हर व्यक्ति शक्की, चौकन्ना और डरा हुआ है.हाल ही पुलिस के हाथों दो अश्वेतों की मौत पर विरोध-प्रदर्शन चल रहे थे, तभी एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान डलास में पांच पुलिसकर्मियों की अंधाधुंध गोलीबारी से मौत ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं.यह विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था और तभी कुछ इमारतों की छतों से पुलिस पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू हो गई.इस गोलीबारी में शामिल एक हमलावर की तो मौत हो गई, लेकिन कुल कितने हमलावर थे, उनकी पहचान क्या है, उनका उद्देश्य क्या था, यह साफ नहीं हुआ है.इस दुखद हत्याकांड से जो पुलिस विरोधी माहौल था, वह उसके प्रति सहानुभूति के माहौल में बदल गया, क्योंकि कई पुलिस वालों ने अपनी जान पर खेलकर आम नागरिकों का बचाव लिया।चाहे दो अश्वेत नागरिकों की पुलिस के हाथों मौत हो, या अब इन पांच पुलिस वालों की हत्या, इनमें एक सूत्र जो समान है, वह अमेरिका में बंदूकों की आम उपस्थिति और उनका इस्तेमाल है। यह एक स्वाभाविक बात है कि अगर समाज में इतनी बंदूकें होंगी, तो उनके इस्तेमाल होने की आशंका भी बढ़ेगीचूंकि हर आदमी के पास बंदूक होने की आशंका होती है, इसलिए पुलिस वाले भी डरे हुए और चौकन्ने होते हैं, जिसकी वजह से जरा सा संदेह होने पर वे गोली चला देते हैं,जैसे एक अश्वेत नौजवान, जो पुलिस की गोली से मारा गया, अपना पहचान पत्र जेब से निकाल रहा था, और पुलिस वाले को लगा कि वह पिस्तौल निकाल रहा है, और उसने गोली चला दी. अमरीका में यह पहली घटना नहीं है अक्सर यहां कोई न कोई सिरफिरा बंदूकों का इ इस्तेमाल कर किसी न किसी को मौत के घाट उतार देता है इसमें जहां स्कूली बच्चों को भी शामिल कर लिया जाता है तो अमरीका के राष्ट्रपति तक ऐसे लोगों की चपेट मे आकर मारे जा चुके हैं. वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बंदूकों पर नियंत्रण के पक्ष में हैं, लेकिन बंदूकों पर नियंत्रण को संसद की मंजूरी मिलना फिलहाल तो असंभव लगता है.अमेरिकी राइफल्स एसोसिएशन देश की सर्वाधिक मजबूत संस्थाओं में से है और वह बंदूकों पर नियंत्रण के सख्त खिलाफ है.यह देश में एक बड़ी लाबी के रूप में काम करता है. हथियार उद्योग बंदूकों पर नियंत्रण नहीं चाहता और अनुदार राजनेता भी यह मानते हैं कि बंदूकों पर नियंत्रण नहीं होना चाहिए.उनका तर्क यह है कि बंदूक रखना हर अमेरिकी नागरिक का सांविधानिक अधिकार है. उनका तर्क यह भी है कि अगर बंदूकों पर नियंत्रण होगा, तब भी अपराधियों के पास तो बंदूकें होंगी ही, ऐसे में सिर्फ आम नागरिक बंदूकों से वंचित रह जाएंगे. अमेरिका में भारी और अंधाधुंध गोलीबारी कर सकने वाले हथियार रखने पर कुछ हल्की-फुल्की पाबंदियां हैं, लेकिन उनका कोई खास असर नहीं है. इस गोलीबारी में भी हमलावरों ने खतरनाक किस्म की बंदूकें इस्तेमाल की थीं और इसके पहले भी अमेरिका में जितने बड़े हत्याकांड हुए, उनमें हत्यारों ने बड़ी और खतरनाक किस्म की बंदूकें ही इस्तेमाल की थीं।अमेरिका में इस हत्याकांड के बाद बंदूकों पर नियंत्रण को लेकर फिर से बहस शुरू होगी और उसमें वही जाने-पहचाने तर्क दोहराए जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं है कि बंदूकों पर नियंत्रण की बिल्कुल उम्मीद नहीं है। लगातार हो रहे सर्वेक्षणों से यह साफ दिखाई पड़ता है कि अमेरिका में बंदूकों के खिलाफ जनमत बढ़ता जा रहा है.अमेरिकी यह बात अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि बंदूकों की वजह से उनका जीवन सुरक्षित नहीं, बल्कि असुरक्षित हो रहा है और अन्य विकसित देशों के मुकाबले उनके देश में अपराध बहुत ज्यादा हो रहे हैं. जिन घटनाओं की वजह से विरोध-प्रदर्शन हुए और उसके बाद पुलिस वालों की हत्या, दोनों ही अमेरिकी जीवन में बढ़ती हिंसा और संदेह को दिखाते हैं.अगर प्रतिबंध लग भी जाये तो कोई यह नहीं कह सकता कि अमरीका में बंदूकों से होने वाली हत्यायें कम होंगी? भारत में भी आप देख सकते हैं गैर कानूनी हथियार रखने पर कड़ी पाबंदी है लेकिन अवैध हथियारों को तो लोगों के पास जखीरा है. हमारें यहां कड़े कानून के बावजूद हथियार रखने वाले ज्यादा हैं.यह सब पुलिस वालों की नाक के नीचे चलता है.


शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

गांवों में चिकित्सा सेवा का विस्तार हो तभी झोला छाप खत्म होंगे...




 देश में कार्यरत सत्तावन प्रतिशत डॉक्टरों के पास मेडिकल की डिग्री नहीं है और वे मरीजो का इलाज कर रहे हैं. यह चौका देने  वाला रहस्योद्घाअन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपने हालिया रिपोर्ट में किया  है इससे यह बात तो साफ है कि भारत में मरीजों का इलाज कैसे होता है?. स्वास्थ्य सेवाओं पर नजर रखने वालों के लिये यह रिपोर्ट इतनी चौकाने वाली नहीं होगी चूंकि वे  इस हकीकत को जानते हैं. भारत के चिकित्सा संगठनों और समाजसेवी संस्थाएं इस सबंन्ध में कई बार सरकार को यह अवगत भी करा चुकी है लेकिन किसी प्रकार की कड़ी कार्रवाई नहीं होने के कारण आज भी यह स्थिति बनी हुई  है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो यह कहा है कि बारहवीं पास लोग डाक्टरी के पेशे में लगे हैं लेकिन छत्तीसगढ जब मध्यप्रदेश के साथ जुड़ा हुआ था तब एक गांव में एक आठवीं पास को गांव का हर इलाज यहां तक कि आप्रेशन भी करते पाया गया  था. विश्व स्वस्थ्य संगठन की रिपोर्ट में  यह भी कहा गया है कि खुद को एलोपैथिक डॉक्टर कहने वाले 31 फीसदी लोगों ने सिर्फ 12वीं तक पढ़ाई की है डब्ल्यूएचओ ने 2001 की जनगणना पर आधारित रिपोर्ट जून में जारी की थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण भारत में लोगों का इलाज कर रहे पांच में एक डॉक्टर ही इलाज के लिए उपयुक्त डिग्री या योग्यता रखता है. भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस रिपोर्ट पर कहा कि झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई का जिम्मा राज्य की चिकित्सा परिषदों पर है और उन्हें ही उस पर कार्रवाई करनी चाहिए सवाल यह डठता है कि एमसीआई जैसी संस्था के अनुरोध पर भी ऐसे लोगों पर कार्रवाहीन हीं होती तो यह समझा जाना चािहये कि राज्यों की सरकारे व केन्द्र  सरकार दोनों ही अपनी गलती छिपाने के लिये वर्तमान व्यवस्था को बनाये रखना चाहती है ताकि वे अपनी कमी को छिपायें रख सके. सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के अनुसार, अन्य पद्धतियों से इलाज करने वाले एलोपैथिक दवाओं से उपचार नहीं कर सकते. वैसे  एमसीआई 57 प्रतिशत  मेडिकल प्रैक्टिशनर्स के पास एमबीबीएस या बीडीएस की डिग्री न होने के आंकडेे की पुष्टि करने से इस आधार पर इंकार करती है कि  समयांतराल में स्थितियां काफी बदली हैं. एमसीआई के हिसाब से देश में नौ लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं. एमसीआई के इस आकडे पर भी सवाल उठता है कि क्या इतने कम डाक्टरों से देश की एक अरब बीस या पच्चीस करोड़ लोगों वाले देश का इलाज किया जा सकता है? दिल्ली मेडिकल काउंसिल ने पिछले साल 200 अपात्र मेडिकल प्रैक्टिशनर्स के खिलाफ  केस दर्ज कराकर कार्रवाई की थी. राष्ट्रीय स्तर पर एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक डॉक्टरों का आंकड़ा एक लाख की आबादी पर 80 डाक्टर और नर्सों का 61 था. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में वैश्विक लक्ष्यों को पाने की राह में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. देश को लाखों डॉक्टरों की जरूरत है, लेकिन हर साल देश में सिर्फ 30 हजार डॉक्टर विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी कर बाहर आते हैं. यह नहीं कि देश में चिकित्सक बनने के लिये छात्रों की कमी है मगर देश में इसके लिये सुविधाओं की कमी के साथ-साथ जो चिकित्सक पढ़ लिखकर तैयार होते हैं वे गांवों में जाकर मरीजों का इलाज करने के लिये कतई तैयार नहीं है. शहरों की गली गली में चिकित्सालय और चिकित्सक भरे पड़े हैं इनमें से कोई भी गांव में जाकर मरीजों का इलाज करने के लिये तैयार नहीं है. इसका परिणाम यह हो रहा है कि े ग्रामीण दूर दूर तक जहां चिकित्सा सुविधा उपलब्ध  है वहां पहुंचने के लिये भारी जोखिम उठाते हैं.प्राथमिक तौर पर वे झोला छाप डाक्टरों की मदद लेते हैं.उसके बाद जो होता है वह असली डाक्टरों के लिये भी मुसीबत खड़ी कर देने वाला होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन  की चिंता के अनुरूप  देश में एक तो झोला छाप चिकित्सको पर पूर्ण प्रतिबंध की जरूरत हैं वहीं नये चिकित्सकों के लिये भी अनिवार्य किया जाना चाहिये कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कम से कम दो वर्ष का समय गांवों में सेवा करें. इसके अलावा गांवों में चिकित्सालय खोलने के लिये निजी चिकित्सकों प्रोत्साहित करे.

चुनाव से पहले पार्टियों में मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने की नई परंपरा



राजनीतिक पार्टियों का हाल भी इन दिनों मौसम की तरह हैं पता नहीं कब बदल जाये. उत्तरप्रदेश और पंजाब चुनाव में जहां पार्टियोंं के धुरन्धरों की नाक में दम कर दिया है वहीं आयाराम-गयाराम के जमाने की पुन: वापसी ने भी फिर हलचल पैदा कर दी है.भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को  प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़ाने  के बाद देश में इस ढंग की एक नई परंपरा राज्यों में चल पड़ी है. भाजपा ने राज्यों में भी इस नई परंपरा की आजमाइश की और उसने असम में मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर पहली फतह पाई उसके बाद अब आने वाले चुनावों में पार्टियों ने  इस परंपरा पर चलने की तो लगता है शपथ ले ली है यूपी में ऐसा पहला उम्मीदवार चुनाव से बहुत पहले घोषित कर दिया गया यहां कांग्रेस ने इसकी पहल की. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अपना उम्मीदवार घोषित किया गया. भाजपा और अन्य दल पशोपेश में है कि उन्हें भी अब इस परंपरा से चलना होगा लेकिन यह निश्चित है कि जो भी  पहले उम्मीदवार की घोषणा कर चुनाव में उतरेगा उसे सफलता मिलने के चांसेस भी बढ़ जाते हैं चाहे वह मुख्यमंत्री पद का व्यक्ति हो या विधायक या अन्य कोई पदाधिकारी. मतदाता को सोचने  समझने  व परखने का मौका लम्बे समय के दौरान मिल जाता है.उम्मीदवार को मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क करने का समय भी मिल जाता है. यूपी के बाद पंजाब में भी मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लडऩे का अंदाज शुरू हो सकता है इसकी भनक नवजोत सिंह सिद्दू के भाजपा से नाता तोडऩे के बाद लगने लगा है.सिद्दू के आप में शामिल होने की बात लगभग तय है.लगता हैै देर सबेर उनकी पत्नी जो भाजपा की विधायक है वह भी अपने पति की राह पर चल पड़ेगी जबकि कीर्ति आजाद की पत्नी पहले ही भाजपा का दामन छोड़ चुकी है आम आदमी पार्टी (आप) इस चुनावी मौसम में बीजेपी के तीन कद्दावर नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश में लगी है. आप नेता कुमार विश्वास ने इस ओर इशारा कर भी दिया है कि कीर्ति आजाद, शत्रुघ्न सिन्हा और नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा से अलग होकर आप के साथ मिल सकते हैं. सिद्दू ने तो पार्टी छोड़ ही दी है जबकि कीर्ति आजाद और शत्रु पहले से  ही भाजपा के विरोध में चल रहे हैं. ऐसे में आगे आने वाले राज्यों के चुनाव में एक दिलचस्प स्थिति की कल्पना हम कर सकते हैं.सिद्दू चाहते हैं कि उन्हे पंजाब का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाकर आप पंजाब में चुनाव लड़े लेकिन क्या आप अपने पुराने सदस्यों को नाराज करके पार्टी को मुश्किल में डालेगी? अगर आप सिद्दू को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करती है तो उसके लिये पंजाब में चुनाव लडऩा ही मुश्किल मे पड़ जायेगा चूंकि पंजाब में एक तरह से अंदरूनी तोडफ़ोड़ शुरू हो जायेगी.यह केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं शायद इसी कारण उन्हें कल  बयान देना पड़़ा कि हमने अभी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. आप की रणनीति यह रह सकती है कि सिद्दू को यह कहकर पार्टी मे लाये कि उन्हें स्टार प्रचारक बनाया जायेगा और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री घोषित किया जायेगा.आप के नेता कुमार विश्वास तो यह मानते हैं कि अकेले सिद्दू ही नहीं पूर्व बॉलीवुड स्टार शत्रुघ्न सिन्हा  भी आप से जुड़ जायेंगे.आप चुनाव से पूर्व अपना परिवार बढाने में किसी प्रकार की कमी नहीं करेगा इस कड़ी में भाजपा में असंतुष्ट बैठे पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद और उनकी पत्नी पूनम आजाद सहित कई अन्य जिसमें अलग अलग पार्टियों से असंतुष्ट शामिल है वे भी आप का दामन थाम सकते हैं.पंजाब की तरह उत्तर प्रदेश की राजनीति भी इस समय पूरे राजनीतिक उबाल पर है.भाजपा उपाध्यक्ष के विवादास्पद बयान से यूूपी में जहां बेकफुट पर हैं वहीं कई राज्यों में मात खा चुकी  कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस बार पूरी जोरआजमाइश के मूड में लगती है. ब्राम्हण चेहरे के रूप में सत्तर पार  कर चुकी शीला दीक्षित के माध्यम से कांग्रेस यूपी की सत्ता पर काबिज होने की फिराक में है इसमें वह कितना सफल हो पायेगी यह तो आने वाला समय बतायेगा लेकिन यहां हर पार्टी को यह समझना होगा कि उनके सामने जो भी चुनाव में अपना दाव खेलेगा उसके सामने  तीन धुरन्धर होंगे यहां समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी,भाजपा कांग्रेस उसके बाद आप भी  मैदान में कमर कसकर सामने होंगे अर्थात कम से कम चार भावी मुख्यमंत्री यूपी चुनाव मेें आमने सामने होंगे.

यौन हिंसा पर क्षमा की घृणित संस्कृति, क्यों इसे संरक्षण दिया जा रहा?




यूनिसेफ की  एक शीर्ष अधिकारी ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से जुड़ी क्षमा की घृणित संस्कृति पर चिंता व्यक्त करते हुए उसकी निंदा की है और इस क्रूरता को खत्म करने के लिए तत्काल कार्रवाई करने को कहा है हालाकि उन्होंने सिर्फ एक राज्य की दलित युवती के साथ उन्हीं पांच युवको द्वारा दोबारा कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार मामले का जिक्र किया है जो रोहतक में चर्चित हुआ  लेकिन भारत में अब ऐसा आम हो गया है जिसपर कठोर कदम उठाने की बजाय राजनीतिक रोटी सेकी जा रही है और क्षमादान दिया जा रहा है.मामले को कोर्ट के हवाले कर तुरन्त फुरंत में उसका निपटारा करने की जगह राजनीति से जुड़े कतिपय लोग ऐसी घटनाओं को अपने  मकसद तक पहुंचने की नीयत से देखने लगे हैं. यूएन अधिकारी ने जिस मामले का  जिक्र किया है वह  तीन साल पहले के उस बलात्कार का है जिसमें दलित लड़की से पांच युवकों ने दुष्कृत्य किया और जमानत पर छूटकर आने के बाद दुबारा उसका अपहरण कर रेप किया. इस मामले में अभी जांच चल रही है और पुलिस अब यह भी कह रही है कि लड़की के आरोप की सत्यता को परखा जा रहा है चूंकि युवती द्वारा बताये गये लोकेशन में गडगड़ी हैै बहरहाल हम भी मानते हैं कि बच्चियों और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से जुड़ी माफी की घृणित संस्कृति को समाप्त किया जाना चाहिये तथा ऐसे क्रूर मामलों में तो किसी प्रकार की राहत अपराधी को मिलनी ही नहीं चाहिये. रोहतक गैंगरेप का मामला हो या महाराष्ट्र के कल्याण,ठाणे अथवा केरल का सिर्फ गुस्सा काफी नहीं, ऐसे मामलों को समाज को बांटकर देखने की जगह मानवता के नाते महिलाओं पर होने वाला अत्याचार स्वीकार करना चाहिये. जिस क्रूरता से घटानाएं राज्यो में घटित हो रही है वह सरकार चलाने वालों को सोचने के लिये मजबूर करती है कि क्या मौजूद व हाल ही बनाया गया कानून  ऐसे मामलों के लिये काफी हैॅ.? दिल्ली के  क्रूररतम निर्भया कांड में फांसी की सजा मिलने के बाद भी अपराधी जेल में रहकर ऐशोआराम की सुविधा की मांग कर रहे हैं वहीं ऐसी घटनाओं से प्रेरणा लेकर महाराष्ट्र और अज्य राज्यों में अपराधी एक के बाद एक ऐसा दुष्कर्म कर रहे हैं जो संपूर्ण मानवता को ही हिलाकर रख  रहे हैं. हम यहां उस दुष्कर्म की बात करेंगेे जो अहमतनगर के कर्जत तहसील की छात्रा के साथ हुआ.मामला ज्यादा पुराना नहीं इसी महीने की 13 जुलाई का है जब नौंवी में पढऩे वाली छात्रा अपने घर से थोड़ी दूर शाम को अपने दादा के घर मसाला लेने गई थी, जब बहुत देर बाद भी वो नहीं लौटी तब परिजनों ने उसे ढूंढना शुरू किया, घर से थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ के नीचे उसकी बुरी तरह क्षत-विक्षत लाश मिली.एक आरोपी लड़की के परिजनों को देखते ही भाग खड़ा हुआ याने इस घटना को प्र्रत्यक्ष देखने वाले लोग भी हैं.बाकी तीन आरोपी इस आरोपी के बताये जाने से पकड़ लिये गये.पीडि़तों को ज्याय मिलने की जगह यहां खूब राजनीति चली और पुलिस कार्रवाही पर भी आक्षेप लगे. कानून को अपना काम करने देने की जगह क्यों राजनीति बिखेरी जाती है.?इस मामले में चूंकि सारा मामला एक तरह से लोगों के सामने हुआ इसमे सजा भी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर उसी तत्काल दी जानी चाहिये थी. ऐसे मामलों में तो कानून ऐसा होना चाहिये कि किसी प्रकार की अपील होने की गुंजाइश ही न रहे. दुनियाभर की 12 करोड़ लड़कियों में से हर 10 में से एक लड़की यौन हिंसा का सामना करती है और इनमें से अधिकतर लड़कियों के साथ 15 से 19 साल की उम्र के बीच ऐसा होता है. इस क्रूरता को खत्म करने के लिए और हिंसा के पीडि़तों को न्याय एवं सुरक्षा देने के लिए कठोरतम कार्रवाई की जरूरत है. यह एक क्राइम है और क्राइम का सियासत और जातिगत समीकरण को दखल देने की  क्या जरूरत?.केरल में एक नाबालिग दलित लड़की से लगभग एक दर्जन लोगों नेदो महीने तक रेप किया मुख्य आरोपी ऑटो ड्राइवर ने अपने एक दोस्त के साथ  बारी-बारी से रेप किया और सेलफोन पर रिकॉर्डिंग कर ली.लड़की को वीडियो दिखाया और धमकाया कि किसी को बताने पर वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया जाएगा लड़की से कई लोगों ने कम से कम 10 बार रेप किया.उसके प्राइवेट प्रार्टस में सिगरेट से जलाने के निशान भी दिखे. केरल में ही  30 साल की एक अन्य दलित छात्रा से कथित बलात्कार और उसकी हत्या का मामला बुधवार को संसद में भी उठा.समाज बताये ऐसे दुष्टों को क्या सजा दें?






सोशल मीडिया दोस्त है तो दुश्मन भी, बच्चो का ध्यान पुस्तको से हटा!






एक सर्वे में एक चिंतनीय बात सामने आई है कि सोशल  मीडिया बच्चों और युवाओं को काफी नुकसान पहुंचा रहे है. सर्वे में जो बाते सामने आई है अगर उसका विश£ेषण किया जाये तो बात साफ है कि सोशल  मीडिया से हमारी दोस्ती हमें अपनों से बहुत हद तक दूर करती जा रही है. बच्चे तो बच्चे बड़े भी इसकी चपेट मे आ रहे हैं. सोशल मीडिया से बच्चों की मित्रता ने उन्हेें अपने स्कूल व परिवार से दूर करना शुरू कर दिया है. समाज में घटित होने वाली कई किस्म की घटनाओ के पीछे सोशल मीडिया को ही दोषी ठहराया जा रहा है.बच्चों में पुस्तके पढऩे की आदत लगभग खत्म हो गई है उनको पुस्तकों से नफरत होने लगी है. इसके पीछे सोशल मीडिया है जो पुस्तकों के प्रति उनके आकर्षण को छीनकर अपनी ओर ले जा रही है. बच्चों के पढऩे की आदत कम हो रही है. चाहे वह यूं ही मिलने वाला समय हो या कोई्र छुटटी का दिन अथवा गर्मियों की छुट्टियां बच्चे व युवा अपना समय मनोरंजक पुस्तकें पढ़कर बिताने की जगह अब सोशल नेटवर्किग साइट्स पर चैट करना अधिक पसंद कर रहे हैं.वास्तविकता यह है कि किताबें न पढऩे की वजह से बच्चों की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता में कमी आ रही है जो उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है. मनोरोग विभाग द्वारा हाल के दिनों में किए गए एक सर्वेक्षण में 1350 बच्चों को शामिल किया गया इसमें उनकी सामान्य दिनचर्या में सोशल साइट्स के प्रभाव संबंधी 20 बिंदुओं पर प्रश्न किया गया उसमें पाया गया कि सोशल साइट्स का प्रयोग बच्चे करते हैं उसमें से अधिकांश का कहना यह था कि उन्हें ज्ञान अजिर्त करने के लिए  सोशल साइट्स पर निर्भर रहना पड़ता है. कुछ मामलों में इसे अच्छी आदत कहा जा सकता है, लेकिन लगातार किताबों से दूरी बच्चों की कल्पनाशीलता को कम कर रही है.अच्छी सोशल साइटस पर जाते जाते बच्चे व युवा दोनो ही भटक जाते हैं और दूसरी साइटस पर अपना मनोरंजन करने लगते है जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं रहता. बच्चे ज्यादातर फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और ट्विटर, व्हाटस अप जैसी सोशल साइट्स पर अपनी उम्र छिपाकर आईडी बना रहे हैं. 14 से 17 साल की उम्र तक के बच्चों से सोशल मीडिया संबंधी उनकी आदतों के बारे में जानकारी हासिल करने पर यह पाया गया है कि 40 प्रतिशत बच्चे 17 साल की उम्र से पहले ही स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.जानकारी एकत्र करने के प्रति छात्रों की जिज्ञासा बढ़ी है, लेकिन इसके लिए वह शत प्रतिशत सोशल साइट्स पर ही निर्भर है. किताबें पढऩे या कहानी सुनते समय विचारों में एक तरह की आभासी दुनिया बनती है जो रचनात्कता को बढ़ाती है. संचार के नए माध्यमों से यह कम हो रही है. सोशल साइटस से  देखकर ज्ञान प्राप्त करने  और पुस्तके पढ़कर ज्ञान अर्जित करने में बहुत अंतर है. मोबाइल और कम्पयूटर, टीवी पर लगातार नजरे गढ़ायें बैठे रहने से बच्चो की आंखों पर भी प्रभाव पड़ रहा है. कम उम्र में  बच्चों को चश्मा लगाने की नौबत आ रही है. पिचयासी प्रतिशत बच्चे आज सोशल साइटस से जुड़े हैं यह सिर्फ एक बड़े महानगर का आंकड़ा है-जुडऩे के पीछे कारण भी स्कूलो में सोशल साइट्स के बारे में बच्चो के बीच हाने वाली चर्चा है. वे आपस में एक दूसरे से पूछते हें और अपनी आईडी बनाकर आपस में जुड जातेे हैं फिर शुरू होता है चेटिंग का सिलसिला. हम मानते है कि आपस में बच्चो व बड़ो दोनों के जुडने मेल मिलाप का सोशल मीडिया एक अच्छा माध्यम है लेकिन यह कभी कभी दु:खुद परिणाम भी देता है. यह बताने की जरूरत नहंीं कि देश विदेश में होने वाले बहुत से अपराध में सोशल मीडिया की भागीधारी से ज्यादा होती जा रही है.देश में रोज होने  वाले कई किस्म के अपराधों में सोशल मीडिया का नाम कहीं न कहीं से जुड ही जाता है.सूचना और जानकारी का अच्छा तंत्र होने के बावजूद सोशल मीडिया उपयोग के मामलों में बच्चो पर निगरानी रखने की भी जरूरत है.



सोमवार, 18 जुलाई 2016

ANTONY JOSEPH'S FAMILY INDX

History of Mattappallil -
 Madukkakuzhy family

ANTONY JOSEPH”S
FAMILY. INDEX
 A family with its own tradition and values,started many decades ago from a place called EdamattomPallattu in Kottayam districtin Kerala.They have a well settled position not only in India but also abroad. The members of this family are not only in different parts of India but also in many developed countries like United States of America ,Rome,South Arabia multiplying the family's honour and fame with their professional expertise in the field of education,politics , journalism etc. In this note we go through a rough idea of the family history. Since we don't have any knowledge about many members of the old generations, we regret to skip off the details about them.Now with the help of the eldest member of this family ie J M Thomas (Thomachen)of Kottayam,we get a picture about the members of our family and how it branched.We belong to Edamattam Pallattu family. The family starts with two avakashi sisters of Pallattu family of Edamattom , in Kottayam . The eldest sister was married to Abraham of Ambara Moolechalil who stayed at Pallattu family Edamattom. The youngest sister was married to Thommen, younger brother of Abraham and stayed at Kuruvinal Kunnel, ie. The two sisters of Pallattu family were married by two brothers of Ambara Moolechalil family.Thus the two families came into existence. The Kuruvinal Kunnel Thommen didn't have sons for two -three generations and as a result their family asset remained the same. Abraham had six sons.They started living at different places ---Pallattu , Elanjimattom , Kizhake Puthiyadom , Padijara Puthiyadom,. Pullikkatharae , and Kelamattom. The youngest of all the six brothers -Itty Ipe , lived at Kelamattom Mattappallil (The place is in Vellakumadom Parish) .He had three sons by name- Pappen , Thommen, and Mathai. Pappen (Vadakke velikattu Mattappallil) married twice. In the first marriage he had a son Mathai and in the second marriage three sons---Kunju ,Kunjuouseph and Kunjuvarkey. Mathai married from Kuttikattu .He had four sons-Kunju(died in early ages). Thommen,Devasia and Mathai( Pappen). Devasia settled at Vellaramkunnu( in Periyar).Mathai settled at Peruvanthanam. Thommen had two sons-Mathai and Joseph ,of them Mathai settled in Koruthode, and Joseph at Mukkuttoothara. Second son of Itty Iype- Thommen married from Kappallumakkal Mattappallil of Poovaranni. He had a son and daughter.The son Thommen married Annama of Thondanadu in Paika and stayed in her house .Daughter is married to Kunjeppu of Ezhathupuzha,Karimala. Thommen had four sons- Joseph Anto,Thomas, and Abraham .They are staying at Paika. Third son of Itty Iype-Mathai stayed at Kelamattom Thekkae Mattappallil .He had married twice. His first wife was from Elayachaniyil, Bharanaganam. His second wife is from Puthuprampil , Kanjirapally. In his first marriage he had two sons.-Chacha and Thommen and one daughter. Chacha had two sons- Joseph and Mathai and five daughters.His wife was from Ambara Athikarathil.His son Joseph stayed at Kanjiyar. He too had married twice. His first wife was from Chilambikunnel and second wife was from Pulickathundiyil of Kanjirapally. The only son from first marriage of Joseph lived at Kappayampadiyil. In his second marriage he had eight children.Roseli,Tessy,Mariamma,Susamma,Jameskutt y,Kennedy,Alex and Ittaliya. Chacha's second son Mathai stayed at Eddakkunnam and is now in Malabar. Mathai (son of Itty Iype,Thekkae Mattappallil) 's second son Thommen(from1st marriage )stays at Seethathode and has one son. Mathai's (Itty Iyp's third son) , second marriage from Puthuparampil, Kanjirapally gave him one son Kunjuouseph and four daughters. Kunjuouseph stayed at Madukkakuzhy,Thampalakadu. His sister Thresiamma was married to Chilambil of Elikulam. They are now at Kurachundayil ,Kozhikode. Second sister Kunjuali died having no children. Third one , Annamma was married to Keeramchira of Peruvanthanam.The fourth sister Mariamma was married to Pathikkal of Anickadu. Kunjuouseph, s/oMathai 's second marriage, s/ o Itty Ipe (3rd son), s/ o Abraham Pallattu ( 6 the son who stayed at Kelamattom Mattappallil) married Mariamma of Kunnumpuruth , Thampalakadu and stayed at Madukkakuzhyil kara. They had 3 sons and 8 daughters. 1, Ousepachen Madukkakuzhyil, was a planter who married Kunjamma of Manjadi ,Chirakadavu and stayed at Peruvanthanam. He has two sons and two daughters. Pappachen worked as a teacher who married Marykutty of Kanjooparampil,Nedumudi. They have two sons - Jose, Antoachen, and four daughters. Thomachen was in government service department. He married Amminni of Koothrapally house, Changanacherry. They have five sons- Roy,Georgekutty, Appachen, Siby, Tomy. Daughters- Theyyama married to Monichen of Elanjickal ,Alapuzha . They have two sons and two daughters. Marykutty married to Devasiachen of Kavalam Kochpurackal . They have two sons and one daughter. 2, Kunjuthomachen Mattappallil, (J.M Thomas) worked as a high school teacher and retired as the head master of Holy Family High School Kottayam.His wife Mariamma was the daughter of Ittoop Mampilli Editor of Malabar Herald,Fort Cochin . They have one son and three daughters. Prem is an electrical engineer working with the government of USA who married Molly of Thanchenkary, Chenganacherry . She is a doctor who also works in America .They have a son Nithin and a daughter Nitha. They are settled in Chicago U. S. A. Daughters-Reema retired as the professor in mathematics from St. Dominics college , Kanjirapally. She is married to Babychen (Sebastian) of Athirampuzha Kochpurackal family .He retired as the senior manger from South Indian Bank. They have a daughter Rintu and a son Sachin. They are now at Vazhakkala, Ernakulam. Tessy retired from Cochin University (CUSAT) as the professor in electronics.she is m arried to Jimmichen (Ignatius) of Edayadil family of Nedumkunnam. He is the manger in the law department of the Catholic Syrian Bank. They have two daughters,Tuttu and Tijina, and a son Jijun. They stay at Edappally ,Cochin. Jyothis retired as the Dean of the college of engineering Trivandrum. She was the professor in civil engineering. She is married to Jose (C C Joseph) of Parappur Chittilappally family.He is working as a senior scientist in V S S C Trivandrum . They have a daughter Joemol and a son Jojin. They are settled at Pongmodu ,Trivandrum. 3, Antony Madukkakuzhyil,(Appachen ) married Gracy of Mavelikara and was working as an officer in Weights and MeasurementDepartment and settled at Raipur in Madhya Pradesh. They have four sons and a daughter. Baby (Joseph) , a journalist, married Mercy Hemalata daughter of E M Pareira and is settled at Raipur .He has three children, one son and two daughters. Son Rajesh and daughters,Seema andNeeta . Babu(Mathew), security officer in Coal India, married Mary Augustine ,sister of Mercy Hemalata.They are settled at Nagpur.Their children are Princely and Nimmy . Raju works at Public Works Department.He has two daughters Rini and Mini . Ravi (Thomas)is doing business and has a son Rohit and a daughter Rubi . Jacky, the only daughter of Appachen is married to Vinay Elias who belongs to a Punjabi Christian family, and is settled in Jabalpur.They have a daughter Dipti and a son Sunny . Daughters of Kunjuouseph -Mariamma family are 1, Kunjumammi was married to Chackochen of Kulangaramuriyil in Chirakadavu.They have eight children,three boys and five girls of whom one is a nun in the clarist congregation. 2,. Kunjumariamma was married to Pailoochen of Urampackal ( Njalathuvayalil) of Kanimala. They have ten children.Out of ten children,two sons are priest and one daughter is a nun in the S H congregation. 3, Kunjuanna was married to Kochu (Varkey) of Kochumuriyil, Cheruvally . They have five sons . Appachen,Joseph,Antoy,Thomachen, and James(Thankachen ).Joseph is a capuchin priest now serving at Bharanaganam Assisi Ashram . 4, Aleykutty was married to Kochu(Pailoochen's brother) of Urampackal family in Kanimala. They have twelve children.One daughter is a nun in the CMC congregation. 5,. Thresiamma was married to Mathaikunju of Angadyil,Manimala . They have six children. One son Joseph(Ousepachen) is a cuppuchin priest and a daughter is a nun in the clarist congregation. 6, Achamma was married to Kuttapan of Vayalinkkal(Vadakkumpuruthu ) of Elamkulam . They have two sons, Baby and Raju who is a bachelor. 7, Pennamma was married to Kochu of Vattakkuzhy family in Vazhoor.They have seven children. Two sons,Jose and Johnny are staying at Chempalam, Iddukki. Eldest son,Baby (Abraham) retired from Federal Bank and stays at Ponnkunnam.Tomy is settled at Ettumanoor,in Kottayam district.They have three daughters Ruby,Mercy, and Rosamma. 8, Claramma, eight daughter,was a nun in the clarist convent at Bharanaganam. She was the Head mistress of the convent school for many years and also the Mother Superior of the clarist convent. Sr.Crucifix played a role in the formation of the library of Sr. Alphonsa. Details of Kunnumpuruth Mariamma --------- Thommam came from Angamali and settled at Thampalakadu, Kunnumpuruth ..He had six sons and they all stayed there with the following family names - --Kunnumpuruth, Kathanattu ,Vettath ,Thekkumthottathil ,Vadasserry ,Vattakkat respectively.The one who stayed at Kunnumpuruth had three sons and four daughters.Thomas stayed at Vazhapallil ,Chackochen at Kunnumpuruth house, and Devasiaat Thumpel .Eldest of the daughters was given in marriage to Ottaplackal of Chirakadavu.Second daughter was married to Njalathuvayalil of Kanjirapally .Third person was married to Mannamplackal Kochu Kunnumpuruth ( Karakkamattom ) of Chirakadavu .The youngest daughter Mariamma was married to Kunjuouseph of Kelamattom Mattappallil (Thampalakadu Madukkakuzhy) . Kunjuouseph died on 26thDec.1963 at the age of 83,at Ousepachen 's residence at Peruvanthanam and Mariamma died at the residence of Thomachen at Kottayam. Thus the Kunjuouseph -Mariamma branch of Mattappallil -Madukkakuzhy family have eleven children with sixty three grandchildren and many more great grandchildren. At present only two members Mariamma ,wife of Thomachen Kottayam and daughter Achamma ,Elamkulam are alive . Appachen of Kulangaramuriyil , Pappachen Theyyamma,and Thomachen of Madukkakuzhy, Peruvanthanam, Mary, and Sr.Maria Dasi of Urampackal, have passed away.
 Edited by REEMA. July 2016.

भूतो की खोज ओर विश्व में फैलता स्पर्म का व्यापार!




दिल्ली में एक पढ़ा लिखा इंसान भूतों की खोज करते-करते रहस्यमय ढंग से मौत की गोद में समा गया. उसकी खोज अधूरी  रह गई कि इंसान का मरने के बाद क्या होता है?दूसरी ओर दुनिया अंतरिक्ष से आ रहेअजूबों (एलियंस) की खोज में वर्षो से लगी है कि आखिर यह हैं क्या! इन  अजूबों को खोज निकालने के  लिये ब्रिटेन के मशहूर कॉस्मोलॉजिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने रूस के अरबपति यूरी मिलनर के साथ मिलकर अभी तक का सबसे बड़ा अभियान शुरू किया है जिसमें वे 10 साल के दौरान 10 करोड़ डॉलर खर्च करेंगें.यह दुनिया अजीब है जो रहस्यों से भरी पड़ी है अभी बहुत सी खोज होना बाकी है लेकिन मनुष्य ने बहुत सी  बातो का पता लगा लिया है. रोबोट का निर्माण कर लिया है जो मनुष्य की तरह काम करता है तो दूसरी ओर भेड़ व अन्य पशुओं के क्लोन से नये जानवर भी पैदा किये जा रहे हैं वहीं इसंान को भी मरने के कगार पर पहुंचकर नया जीवन दिया जा रहा है जिसमें किसी की खोपड़ी ही बदलकर सीमेंट की खोपड़ी लगा दी तो किसी के गले का ऊपरी हिस्सा ही पूरा बदलकर नया कर दिया गया. विश्व के इस बदलते रूप में इंसान तरह तरह की जिज्ञासाओं को जहां जानने का प्रयास कर रहा है तो दूसरी ओर मृत व्यक्ति की याद को सदा अपने सीने में संजोये रखने का प्रयास भी लोग यदा कदा करते हैं ऐसा ही एक किस्सा हाल ही भारत में भी सुनने को मिला जिसमेें एक महिला ने अस्पताल से अपने मृत पति के स्पर्म की ही मांग कर डाली ताकि वह गर्भधारण कर उसके मूत पति के बच्चे की मां बन सके. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) में हैरान कर देने वाला यह मामला उस समय सामने आया जब एक विधवा ने डॉक्टर्स के सामने अपने मृतक पति के स्पर्म की मांग रख दी. युवक की अस्पताल लाते समय मौत हो गई थी. महिला की शादी कुछ सालों पहले ही हुई थी, लेकिन उसके कोई बच्चा नहीं है. महिला के सास-ससुर ने भी उसकी मांग का समर्थन किया लेकिन उसकी यह मांग पूरी नहीं हो सकी क्योंकि हमारे देश में मरने के बाद शरीर से स्पर्म निकालने को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं जबकि मरने के बाद भी लोगों की किडऩी और अन्य अवयव निकाल लिये जाते हैं.मनुष्य की मौत के 24 घंटे तक शुक्राणु जीवित रहते हैं.अब इसपर भी बहस छिड़ गई है कि क्यों न मृतक परिवार  की इस मांग को भी पूरा कर दिया जाये? डॉक्टरों का कहना है कि इसे देश में लागू किये जाने में कोई हर्ज नहीं है. इंसान की याद तो जीवित रहती है फॉरेंसिक एक्सपर्टस ने  भी  यह स्पष्ट किया है कि 'स्पर्म को निकालना बहुत साधारण प्रक्रिया है. यह पांच मिनट में हो सकती है, लेकिन इसको लेकर कुछ नैतिक और कानूनी अड़चनें हैं. मौत के बाद 24 घंटे तक शुक्राणु जीवित रहते हैं.विश्व में कई जगह ऐसा होता है.इसरायल में पति के मर जाने के बाद पत्नी अपने पति के स्पर्म का इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन एक साल के भीतर ही पत्नी के लिए उसका इस्तेमाल करना लाजमी है.अगर एक साल के भीतर पत्नी की मौत हो जाती है तो उसके पति के स्पर्म को इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है. चीन सरकार ने अपने देश के लोगों से स्पर्म डोनेट करने की अपील की है. सरकार ने यह अपील स्पर्म बैंक में स्पर्म की भारी कमी आने के बाद की है. सरकार की ओर से जारी संदेश में 20 से 45 साल के लोगों से स्पर्म डोनेट करने को कहा गया है. राजनीतिक और सांस्कृतिक कारणों से देश के स्पर्म बैंक में कमी देखने को मिली है. सरकार की नई पॉलिसी के मुताबिक, चीन में हर दंपति को दूसरा बच्चा पैदा करने की भी अनुमति मिल गई है, जिसके बाद से स्पर्म डोनेशन में खासी कमी आई है. अब सरकार इसके लिए नए रिक्रूट तलाश रही है. डोनर्स को अट्रैक्ट करने के लिए स्पर्म बैंक कई तरह के ऑफर भी लेकर आ रहे हैं. कुछ ने 1000 डॉलर देने का विज्ञापन दिया तो कुछ ने गोल्ड आईफोन का भी लालच दिया है. कुछ बैंकों ने तो इसे देशभक्ति से जोड़ दिया है. वैसे वैज्ञानिकों ने दुनिया के सबसे पुराने स्पर्म का जीवाश्म खोज निकाला है. रॉयल सोसायटी बायॉलजी लेटर्स में छपी स्टडी के मुताबिक अंटार्कटिका के सुदूर इलाके में मिला यह जीवाश्म 5 करोड़ साल पुराने क्लाईटेलाटा (केंचुए की तरह का जीव) के ककून यानि कृमि के अंदर पाया गया.यह संभवत: सबसे पुराना जीव स्पर्म है, जो कृमियों की उत्पत्ति और जीवन के विकास के कई राज खोल सकता है. वैज्ञानिकों को यह ककून एक दीवार के अंदर गड़ा मिला.भारत सहित दुनियाभर  में  स्पर्म देने  ओर बेचने का खेल चल पड़ा है वहीं इसके चक्कर में लोगों की जान भी जा रही है. चीन के एक स्पर्म डोनर ने दस दिन  में चार बार स्पर्म बैंक को शुक्राणु दान किया और उसकी मौत हो गई.झेंग के परिवार ने बैंक से 648,545 डॉलर का हर्जाना मांगा.कोर्ट ने परिवार के दावे को खारिज करते हुए कहा कि झेंग इतने परिपक्व थे कि वो अपना निर्णय खुद कर सकें.




Family index

https://www.dropbox.com/s/vu7v591ugpyzdk9/Document%20%281%29-4.pdf?dl=0

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

सोशल मीडिया दोस्त है तो दुश्मन भी, बच्चो का ध्यान पुस्तको से हटा!





एक सर्वे में एक चिंतनीय बात सामने आई है कि सोशल  मीडिया बच्चों और युवाओं को काफी नुकसान पहुंचा रहे है. सर्वे में जो बाते सामने आई है अगर उसका विश£ेषण किया जाये तो बात साफ है कि सोशल  मीडिया से हमारी दोस्ती हमें अपनों से बहुत हद तक दूर करती जा रही है. बच्चे तो बच्चे बड़े भी इसकी चपेट मे आ रहे हैं. सोशल मीडिया से बच्चों की मित्रता ने उन्हेें अपने स्कूल व परिवार से दूर करना शुरू कर दिया है. समाज में घटित होने वाली कई किस्म की घटनाओ के पीछे सोशल मीडिया को ही दोषी ठहराया जा रहा है.बच्चों में पुस्तके पढऩे की आदत लगभग खत्म हो गई है उनको पुस्तकों से नफरत होने लगी है. इसके पीछे सोशल मीडिया है जो पुस्तकों के प्रति उनके आकर्षण को छीनकर अपनी ओर ले जा रही है. बच्चों के पढऩे की आदत कम हो रही है. चाहे वह यूं ही मिलने वाला समय हो या कोई्र छुटटी का दिन अथवा गर्मियों की छुट्टियां बच्चे व युवा अपना समय मनोरंजक पुस्तकें पढ़कर बिताने की जगह अब सोशल नेटवर्किग साइट्स पर चैट करना अधिक पसंद कर रहे हैं.वास्तविकता यह है कि किताबें न पढऩे की वजह से बच्चों की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता में कमी आ रही है जो उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है. मनोरोग विभाग द्वारा हाल के दिनों में किए गए एक सर्वेक्षण में 1350 बच्चों को शामिल किया गया इसमें उनकी सामान्य दिनचर्या में सोशल साइट्स के प्रभाव संबंधी 20 बिंदुओं पर प्रश्न किया गया उसमें पाया गया कि सोशल साइट्स का प्रयोग बच्चे करते हैं उसमें से अधिकांश का कहना यह था कि उन्हें ज्ञान अजिर्त करने के लिए  सोशल साइट्स पर निर्भर रहना पड़ता है. कुछ मामलों में इसे अच्छी आदत कहा जा सकता है, लेकिन लगातार किताबों से दूरी बच्चों की कल्पनाशीलता को कम कर रही है.अच्छी सोशल साइटस पर जाते जाते बच्चे व युवा दोनो ही भटक जाते हैं और दूसरी साइटस पर अपना मनोरंजन करने लगते है जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं रहता. बच्चे ज्यादातर फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और ट्विटर, व्हाटस अप जैसी सोशल साइट्स पर अपनी उम्र छिपाकर आईडी बना रहे हैं. 14 से 17 साल की उम्र तक के बच्चों से सोशल मीडिया संबंधी उनकी आदतों के बारे में जानकारी हासिल करने पर यह पाया गया है कि 40 प्रतिशत बच्चे 17 साल की उम्र से पहले ही स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.जानकारी एकत्र करने के प्रति छात्रों की जिज्ञासा बढ़ी है, लेकिन इसके लिए वह शत प्रतिशत सोशल साइट्स पर ही निर्भर है. किताबें पढऩे या कहानी सुनते समय विचारों में एक तरह की आभासी दुनिया बनती है जो रचनात्कता को बढ़ाती है. संचार के नए माध्यमों से यह कम हो रही है. सोशल साइटस से  देखकर ज्ञान प्राप्त करने  और पुस्तके पढ़कर ज्ञान अर्जित करने में बहुत अंतर है. मोबाइल और कम्पयूटर, टीवी पर लगातार नजरे गढ़ायें बैठे रहने से बच्चो की आंखों पर भी प्रभाव पड़ रहा है. कम उम्र में  बच्चों को चश्मा लगाने की नौबत आ रही है. पिचयासी प्रतिशत बच्चे आज सोशल साइटस से जुड़े हैं यह सिर्फ एक बड़े महानगर का आंकड़ा है-जुडऩे के पीछे कारण भी स्कूलो में सोशल साइट्स के बारे में बच्चो के बीच हाने वाली चर्चा है. वे आपस में एक दूसरे से पूछते हें और अपनी आईडी बनाकर आपस में जुड जातेे हैं फिर शुरू होता है चेटिंग का सिलसिला. हम मानते है कि आपस में बच्चो व बड़ो दोनों के जुडने मेल मिलाप का सोशल मीडिया एक अच्छा माध्यम है लेकिन यह कभी कभी दु:खुद परिणाम भी देता है. यह बताने की जरूरत नहंीं कि देश विदेश में होने वाले बहुत से अपराध में सोशल मीडिया की भागीधारी से ज्यादा होती जा रही है.देश में रोज होने  वाले कई किस्म के अपराधों में सोशल मीडिया का नाम कहीं न कहीं से जुड ही जाता है.सूचना और जानकारी का अच्छा तंत्र होने के बावजूद सोशल मीडिया उपयोग के मामलों में बच्चो पर निगरानी रखने की भी जरूरत है.