गुरुवार, 30 जून 2016

खतरे बहुत हैं!....दो साल की सैनिक शिक्षा अनिवार्य करने में क्या हर्ज?





विश्व के कई देशों में प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को सैन्य शिक्षा दी जाती है और स्कूली शिक्षा पूर्व होने पर सेना में सेवा देने का अवसर प्राप्त होता है लेकिन हमारे देश में जो शिक्षा दी जाती है वह रोजगार मूलक भी नहीं है देश के करोड़ो नवजवान ऐसी शिक्षा की डिग्री-डिप्लोमा लेकर बेरोजगार बैठे हैं, इसलिए दूसरे देशों की सैन्य शक्ति हमसे अधिक है। ऐसे देशों के खिलाफ उसके पड़ोसी देश कुछ बोलने से भी घबराते हैं. आज हमारी आवश्यकता  विश्व के  उन देशों की तरह सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनने की है इसके साथ-साथ हमें अपनी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करना जरूरी है.इसमें दो मत नहीं कि हमारे देश की स्थल, वायु व जल सेना किसी से कम नहीं किन्तु आज हम जिस तरह  चारों और पडौसी दुश्मनों  और आतंकवाद से घिरे हुए है उस हिसाब से हमारी सैन्य शक्ति उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये. देश में जनसंख्या की बढौत्तरी के साथ-साथ शिक्षित व अशिक्षित दोनों किस्म के बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढौत्तरी हो रही है.एक  शक्तिशाली फौज के साथ-साथ देश में अशिक्षित व अनुभवहीन अशक्तिशाली युवाओं की फैाज अपनी सेना के बराबरी पर खड़ी है=अगर भारत चीन युद्व के दौरान की स्थिति निर्मित हो जाये तो हमारे पास सेना के लिये ट्रेण्ड युवको का अकाल पड़ जाये. भारत-चीन व भारत पाक युद्व की स्थिति के दौरान कई नौजवानों ने सेना में अपनी सेवा दी साथ ही तत्कालीन सरकारों ने भावी युवाओं को अनुशासित करने व हथियारों की ट्रेनिगं देने के लिये एनसीसी  को स्कूल कालेजों में अनिवार्य कर दिया जिसे बाद में जाकर ढीला कर दिया गया. या कहे इसे आप्श्रनल कर रद्दी की टोकनी में डाल दिया गया. आज युवाओं में मोटर सायकिल पर जोर से हार्न बजाकर घूमने व स्टंट करने हीरों गिरी करने के सिवा कुछ नया करने का उत्साह ही नहीं है. स्कूल कालेजों में फिजिकल एजुकेशन उतना कुछ नहीं कर पा रही है जितनी की देश को आवश्यकता है . नौजवानों में देश के प्रति जोश भरने, देश के प्रति जिम्मेदार बनने के लिये अब यह जरूरी महसूस होने लगा है कि हम अपनी बड़ी आबादी के एक बड़े हिस्से को रचनात्मक व देश के कामों में लगायें. रोजगार परख शिक्षा के अभाव मे कई युवा भटक रहे हैं इन्हें काम पर लगाने का एक ही रास्ता है कि सरकार अपने रक्षा बजट में बढौत्तरी कर स्कूल कालेजों से निकलने वाले सभी बच्चों को कंपलसरी देश सेवा के कामों में लगायें.इनमें जो स्टूडेंट कालेजों से निकल रहे हैं उन्हें आगे की नौकरी पाने के लिये सैनिक शिक्षा का कम से कम दो साल के कोर्स को अनिवार्य किया जाना चाहिये. इससे हमें दो फायदे होंगे.हम अपनी  सेना के साथ-साथ एक ऐसी फौज भी तैयार कर सकेंगे जो कभी हमारे समक्ष युद्व थोपे जाने की स्थिति में कारगर साबित होंगे. इन युवाओं को सेना के तीनों अंगों की ट्रेनिगं के साथ तैयार किये जाने की जरूरत है.आज हालात यह है कि हजारों युवाओं में से कुछ ही सेना के लिये फिट हो पाते हैं. एक तरह से सेना में जवान और अफसरों का अकाल पड़ा हुआ है. इस स्थिति से निपटने के लिये यह जरूरी हो जाता है कि उच्च शिक्षा के बाद कोईभी किस्म की नौकरी पाने के लिये कम से कम दो साल की सैनिक शिक्षा को अनिवार्य किया जाये. यह अनिवार्यता छात्र व छात्रा दोनों के लिये होना चाहिये. सेना का उपयोग हम अक्सर युद्व के लिये ही करते हैं कभी आपात स्थितियों में भी सेना का उपयोग होता है.ऐसे में युवाओं को ट्रेण्ड कर  देश के लिये एक पेरा मिलट्री तैयार करने व उनका कभी न कभी देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाआमें और अन्य विपत्तियों के लिये भी किया जा सकता है. देश में महिलाएं भी फाईटर प्लेन उड़ाने लगी हैं. महिलाओं में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की इच्छा है वे भी हर वो कुछ कर दिखाने के लिये  तैयार हैं जो पुरूष करते हैं तब हम उनका उपयोग बड़े पैमान पर क्यों न करें? जिस देश की सुरक्षा जीतनी मजबूत होगी उसकी ताकत उतनी ही बढ़ेगी. इन क्षेत्रों की विकास में बिलकुल भी राजनीति नहीं होनी चाहिए. देश के सभी पार्टियों के राजनेताओं का स्वर भी एक होना चाहिए.हमारा देश धर्मनिरपेक्ष, गुटनिरपेक्ष देश है और हम विश्व के सभी देशों के साथ है लेकिन हमें उन देशों को नहीं भूलना चाहिए जो हमें आजादी के दौर  से मदद करते आ रहे हैं।




बुधवार, 29 जून 2016

और कितने लोगो की बलि लेगा सरकार का डा. आम्बेडकर अस्पताल?



चरोदा की रहने वाली 75 वर्षीय खोरबाहरिन बाई को रायपुर के डीके अस्पताल उर्फ मेकाहारा उर्फ डा. आंबेडकर अस्पताल में भर्ती करने लाया गया था, देर रात हायपरटेंशन का इलाज कराने उसके परिवारजन बड़ी उम्मीदों के साथ लेकर आये थे लेकिन महिला ने इलाज के अभाव में बरामदे में दम तोड़ दिया चूंकि यहां के मेडीसिन विभाग ने यह कहते हुए भर्ती करने से मना कर दिया कि भर्ती के लायक नहीं है.इसके बाद महिला व उसका पति दिनभर अस्पताल में भटकते रहे,रात 9 बजे के आसपास किचन के सामने बरामदे में महिला गश खाकर गिर गई और मौके पर ही मौत हो गई. पहला सवाल यह कि यह अस्पताल किसके लिये बना है? क्यों यहां  मरीजों की उपेक्षा की जाती है? बार बार यहां होने वाली अतिगंभीर घटनाओं को सरकार क्यों नजरअंदाज करती है? पूरे छत्तीसगढ़ और आसपास के राज्यों से आने वाले मरीज इस अस्पताल में बहुत उम्मीदों के साथ पहुंचते हैं कि यहां कम पैसे में उनका इलाज हो जायेगा लेकिन यहां पहुंचने पर न केवल उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है बल्कि वे यहां से जाते समय भारी जख्म लेकर जाते हैं. डीके या मेकाहारा उर्फ मेडिकल कालेज हास्पिटल रायपुर अथवा डा. आम्बेडकर छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है इसके प्रतिद्विन्दी के रूप में सेंट्रल गवर्नमेंट ने अपना अस्पताल एम्स टाटीेबंद में खडा कर दिया है जो भी कुछ- कु छ इसी अस्पताल के नक्शेंकदम पर चल रहा है. यहां की अव्यवस्था और रोगियों की भारी तादात को कम करने की दिशा में कोई खास कदम इस अस्पताल के प्रशासन ने अब तक नहीं उठाया है इसी का परिणाम है कि आम्बेड़कर अस्पताल में मरीजो के पहुंचने की बाध्यता हो गई है. सरकार की लापरवाही का नतीजा है कि एक के बाद एक बड़े बड़े हादसे होने के बाद भी डा.आम्बेड़कर अस्पताल के प्रबधंन में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन वर्षो से नहीं हुआ है. हादसे होने के बाद भी यहां प्रबधंन के लोग अपनी पहुंच और चापलूसी के कारण टिके हुए हैं. इस अस्पताल के कई जिम्मेदार अधिकारी चिकित्सक सरकार से नजर बचाकर प्रायवेट अस्पताल में अपनी आमद देकर अलग कमाई करते है. रोगियों को अस्पताल से ही अपने इन ठिकानों पर पहुंचने की हिदायत भी दी जाती है. डा.आम्बेडकर अस्पताल में हादसों की एक लम्बी फेहरिस्त है. यह सब इस अस्पताल को चलाने वाली सरकार के आला अफसरों व मंत्रालय सभी की जानकारी में हैं किन्तु किस तरह नजर अंदाज किया जाता है यह इसी से पता चलता है कि यहां हुए अधिकांश हादसों में किसी प्रकार की कार्रवाही बड़े अफसरों पर नहीं हुई मसलन एम आरआई के लिये ले जा रहे एक मरीज के ऊपर मशीन गिर गई,उसे दिल्ली रिफर किया गया, दिल्ली में पन्द्रह दिन तक उपचार चला लेकिन रायपुर के इस अस्पताल में मौजूद किसी बड़े अधिकारी को इस बड़ी दुर्घटना के लिए किसी प्रकार जिम्मेदार नहीं ठहराया गया न ही करोड़ों रूपये के मशीन के ध्वस्त होने पर उसके लिये किसी पर एक्शन लिया गया. सरकारी  संपत्ति को नुकसान करने वाला यह शायद विश्व का पहला अस्पताल बन गया है.अस्पताल के जच्चाखाने से कोई भी दूसरे का बच्चा चोरी कर ले जा सकता है सुरक्षा के सारे उपाय यहां ध्वस्त है. रात में डाक्टर सो जाते हैं मरीज तड़पता रहता है किसी की कोई सुनवाई नहीं होती.आये दिन किसी न किसी मुद्देे को लेकर होने वाली हड़ताल ने इस अस्पताल की छवि को बिगाडक र रखा है-हड़ताल से होने वाली तकलीफो का खामियाजा मरीजों व उनके परिवार को भुगतना पड़ता है.अस्पताल में सरकार दवाई सप्लाई की जाती है ताकि गरीब मरीजों के परविारों पर बोझ़ न पड़े लेकिन दवाइयां अस्पताल में मौजूद रहने के बाद भी उन्हें दवाई बाहर से मंगवाने मजबूर किया जाता है. मरीजों को परोसा जाने वाला खाना बस नाम का है गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं, इस व्यवस्था को देखने वाला भी कोई नहीं.मरीज परिवार खुद अपने रिश्तेदारों पर लाद कर ले जाते हैं चूंकि यहां स्टेचर का इंतजाम नहीं के बराबर है. स्टेचर  मौजूद भी हो तो यह वार्डबाय की दवा पर निर्भर रहता है. चिकित्सक भगवान की तरह अस्पताल में प्रकट होते हैं वैसे उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं है.कहने को अस्पताल पहुंचते ही सामने लिखा है मैं आई हेल्प यू लिखा है लेकिन हेल्प करने वाले अपनी बातो में मस्त रहते हैं-क्या ऐसे हालात में भी सरकार इस अस्पताल के प्रबधंन में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करना चाहेगी?




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सेंट्रल कर्मचारियों की तो नैया पार हो गई लेकिन बाकी का क्या?



सेंट्रल कर्मचारियों की तो नैया पार हो गई लेकिन बाकी का क्या?
सेंट्रल कैबिनेट ने बुधवार को केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के लिये सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी. बढ़ा हुआ वेतन 1 जनवरी 2016 से लागू होगा,इस वृद्धि के ऐलान के बाद 50 लाख सरकारी कर्मचारी और 58 लाख पेंशनधारियों के हाथों में ज्यादा पैसा आएगा, इस बढौत्तरी  से सरकारी खजाने पर करीब एक लाख करोड़ से ज्यादा का भार पड़ेगा.  इस वेतन वृद्धि से रीयल एस्टेट सेक्टर और ऑटोमोबाइल सेक्टर में उछाल आएगा. आरबीआई ने अप्रैल में कहा था कि अगर आयोग की रिपोर्ट को ऐसे ही लागू किया गया तो 1.5 फीसदी महंगाई बढ़ जाएगी याने आम वर्ग पर  बोझ और बढ़ जायेगा. इससे पहले सातवें वेतन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकारी कर्माचारियों की बेसिक सैलरी में 14.27 फीसदी बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी, साथ ही आयोग ने एंट्री लेवल सैलरी 7,000 रुपये प्रति महीने से बढाकर 18,000 रुपये प्रति महीने करने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा है. सरकारी कर्मचारियों को 6 महीने का एरियर भी मिलेगा.पेंशन बोगियो को इससे भारी फायदा होगा. सेंट्रल के कर्मचारी भाग्यशाली है कि उनके  वेतन भत्तो का ख्याल रखने के लिये के न्द्र में बैठी सरकार है लेकिन उन लाखों बेरोजगारों व अन्य संगठित मजदूरो तथा डेलीवेजेस पर काम करने वालों का क्या होगा जो भटक रहे हैं तथा जिनके वेतन में बढौत्तरी करने के बारे में पूछने वाला कोई माई बाप नहीं है. सरकार को उम्मीद है कि उसके कर्मचारियों की वेतन वृद्वि का लाभ उन्हें उन्हीं के पैसे से वापस मिलेगा अर्थात वेतन बढऩे के बाद उनसे इंकम टैक्स के रूप मे और ज्यादा पैसा वसूला जायेगा. कर्मचारी बहुत पैसा मकान खरीदने और आटोमोबाइल में लगायेंगे याने मंहगी कारे खरीदेंगे. इससे सरकार को लाभ ही होगा.सातवें वेतन  आयोग की सिफारिशेां को लागू करने से जहां बहुत से कर्मचारी खुश हैं तो कई नाराज भी रेलवे कर्मचारियों ने तो वेतन वृद्वि की सिफारिश में उनकी मनमर्जी नहीं चलने के कारण हड़ताल पर जाने का ऐलान तक कर दिया है. कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने प्रारंभिंक सेलरी अटठारह हजार रूपये से बढ़ाकर  छब्बीस हजार रूपये करने की मांग की थी लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया. सेन्ट्रल कर्मचारियों के वेतन में वृद्वि के बाद अब राज्यों से भी यह मांग उठने लगेगी कि उन्हेें भी सातवें वेतन आयोग के तहत वेतन का भुगतान किया जाये याने सरकार ने एक तरफ आयोग की सिफारिशों को तुरन्त लागू कर कर्मचारियों को खुश किया तो दूसरी तरफ एक नई समस्या को भी मोल ले लिया.सरकार ने एक तरफ कर्मचारियों को वेतन के मामले में खुश करने की कोशिश की है लेकिन परफोरमेंस और टारगेट को लेकर अब कर्मचारियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.कर्मचारियों को यह पहले ही कह दिया गया है कि उन्हें अब अपना परफोरमेन्स और  एफीशयन्सी दिखाना होगा साथ ही अपने दिये लक्ष्य या टारगेट को भी पूरा करना होगा वरना उन्हें नौकरी छोड़कर घर बैठना पड़ेगा-कहने का तात्पर्य अच्छे दिनों का सपना है तो दूसरी तरफ खाई भी है. रेलवे की तरफ डिफें स भी खुश नहीं है जबकि अन्य सुरक्षा बलों में भी वेतन विभिन्नता को लेकर नाराजी है.सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बढौत्तरी के बाद अब नेताओं की बारी है-यह तो जल्द हो जाता लेकिन पीएम के विरोध के चलते यह रूक गया किन्तु सेलरी बढ़ाने की मांग करने वाले माननीय चुप नहीं बैठने वाले.  देश में वेतन विसंगती वर्षो से बनी हुई है.सेंट्रल स्टेट व प्रायवेट में एक ही तरह की नौकरी करने वालों के वेतन व भत्तों में काफी विभिन्नता है यही नहीं सुविधाओं में भी काफी फरक है. कुछ ऐसा भी होना चाहिये कि सार्वजनिक क्षेत्र व प्रायवेट क्षेत्र में एक तरह का काम करने वाला भी उतना ही वेतन, भत्ता प्रोवीडेंट फंड,ग्रेच्युटी, पेंशन, बीमा छुटटी आदि  प्राप्त कर सके जितना दूसरे कर्मचारी प्राप्त करते हैं.नौकरशाहों  का एक बड़ा हिस्सा आठ घंटे भी मुश्किल से काम करता है. पुलिस से लेकर कई महकमे के लोग 14-15 घंटे काम करते हैं.सरकार से बाहर के लोग सरकार की साइज़ को लेकर बहुत चिन्तित रहते हैं, वे इतना ही भारी बोझ हैं तो उनको क्यों नहीं हटा  दिया जाता? वेतन बढौत्तरी पर सवाल यह भी उठ रहा है कि तमाम सरकारी विभागों में लोग ठेके पर रखे जा रहे हैं,ठेके के टीचर तमाम राज्यों में लाठी खा रहे हैं. क्या इनका भी वेतन बढ़ रहा है...? कर्मचारियों का विभाजन आज देश में हो चुका है. सरकारी सेक्टर,सार्वजनिक सेक्टर, प्रायवेट के रूप में कर्मचारी बंट चुके हैं. सरकारी सेक्टर का कर्मचारी शहनशाह है,ज्यादा पैसे पाता है, गाडिय़ां बंगले सब है लेकिन प्राइवेट सेक्टर में किसी चपरासी, बाबू या नर्स को जो मिलता है, उससे कई गुना ज़्यादा सरकार अपने चपरासी,ड्र्रायवर,बाबू नर्स को दे रही है. प्राइवेट वालों की नौकरी की शर्ते भी दमतोडृ है.  उन्हें क्यों कम वेतन दिया जा रहा है? उनके काम का समय क्यों तय नहीं है उन्हें पीएफ , पेश्ंान मंहगाई भत्ता जैसी सुविधांए ैक्यों नहीं दी जा रही?

बुधवार, 15 जून 2016

क्या कानून के डंडे से पर्यावरण सुधर सकता है?जनजागृति भी जरूरी!





पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण पर चर्चा हर जगह है, फिर भी न तो कोई दोषी पाया जाता है न किसी को सजा मिलती है.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का ही उदाहरण ले लीजियें यहां प्रदूषण इतना ज्यादा है कि इस राजधानी की गिनती देश के सातवें प्रदूषित शहरों की सूची में है.ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट आइंस्टीन ने कहा था- दो चीजें असीमित हैं-एक ब्रह्माण्ड- दूसरा मानव की मूर्खता! मनुष्यों ने अपनी  मूर्खता के कारण अनेक  समस्याएं पैदा की हैं, इनमें पर्यावरण- प्रदूषण अहम है. हम किसे दोषी ठहराएं? क्या किसी को दोषी ठहराना या दंड देना ही समाधान है? चूंकि दंड संहिता से ही सुधार होता तो अब तक अदालतों से दंडित लाखों लोगों के उदाहरण द्वारा सारे प्रकार के अपराध ही बंद हो चुके होते पर हम देखते हैं, ऐसा हुआ नहीं. वास्तव में इसके लिये जरूरी है जन-जागृति. प्रकृति का प्रत्येक कार्य व्यवस्थित एवं स्वाचालित है, उसमें कहीं भी कोई दोष नहीं है हमने अपनी अविवेकी बुद्धि के कारण अपने आपको प्रकृति का अधिष्ठाता मानने की भूल कर दी है. मानव द्वारा की गई भूलें प्रकृति के कार्य में व्यवधान डालती हैं ओर ये व्यवधान सभी को नुकसान पहुंचाते हैं. कारखानों से निकलने वाला धुआं, दूषित जल और गंदगी सब मानव निर्मित ही तो हैं.मानव पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण उपभोक्ता है,अपने नैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक विकास की उच्चतम उपलब्धियां मानव उसी समय प्राप्त कर पाएगा जबकि वह प्राकृतिक सम्पदा का विवेकपूर्ण उपयोग करेगा. जन संख्या में भारी वृद्वि, भोगवाद की संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग, युद्ध, परमाणु परीक्षण, औद्योगिक विकास आदि के कारण नई-नई पारिस्थिति उत्पन्न हो रही हैं. इन समस्याओं को उत्पन्न न होने देने की जिम्मेदारी मनुष्य की है उसका प्रमुख उद्देश्य भी यही होना चाहिए. पृथ्वी को इस संकट से बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित रखने के साथ ही पर्यावरण को सुरक्षित करने हेतु ढेरों कानून राष्ट्र्रीय, अंतर्राष्ट्र्रीय, स्थानीय स्तर पर भी बनाए जा चुके हैं फिर भी प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता,वायु प्रदूषण नियंत्रण कानून 1981 के उल्लंघन हेतु कठोर कारावास की सजा के प्रावधानों के बावजूद राष्ट्र्र में सैकड़ों शहर के वायुमंडल पर प्रदूषण का स्तर क्रांतिक स्तर तक पहुँच चुका है, और पहुँच रहा है, जल प्रदूषण नियंत्रण एवं निवारण अधिनियम 1976 में अर्थदंड एवं कारावास के प्रावधानों के बावजूद कई नदियां जहरीली हो चुकी है. प्लास्टिक वेस्ट पर कानून में भी भारी अर्थदंड के बावजूद प्लास्टिक कचरों के ढेर बढ़ रहे हैं.म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट (नगरीय ठोस अपशिष्ठ) कानून में भी कठोर दंड के बावजूद महानगरों में गंदे कचरों के पहाड़ प्रकट हो चुके हैं.हमने यह पाया है कि इस दायित्व के निर्वहन के लिए जिम्मेदार समाज के महत्वपूर्ण घटक भी अपनी जिम्मेदारी को कानून द्वारा सरकार पर थोप देना ही पर्याप्त मानते हैं किन्तु कानून के उल्लंघन के लिए किसी एक आदमी को कितनी भी बड़ी सजा क्यों न दे दी जावे, उससे ऐसा कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं होता, जिससे कि सफलतापूर्वक प्रदूषण नियंत्रित किया जा सके। चीन की राजधानी बीजिंग में प्रदूषण के भयावह स्तर केे कारण आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी.स्कूल, कालेजों की भी छुट्टी करनी पड़ गई. यद्यपि हमारे देश  में ऐसी परिस्थितियां अभी तक निर्मित नहीं हुई हैं, किन्तु हम सभी को ज्ञात है कि कहां कितना प्रदूषण हो रहा है और जन-सामान्य में इसका क्या दुष्प्रभाव है. शासकीय प्रयासों के द्वारा, व्याप्त प्रदूषण के स्तर पर काफी कमी आई है, किन्तु हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि यदि केवल कानूनी प्रयासों के स्थान पर सामूहिक सामंजस्य एवं आपसी समझ के द्वारा प्रयास किए जाते तो प्रदूषण के स्तर पर और ज्यादा अच्छे से नियंत्रण करना सम्भव हो पाता. जितना श्रम, साधन, धन एवं समय हम सब प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण के कानूनी मार्ग में व्यय करते हैं, उसका एक चौथाई भी हमने सामूहिक, सामाजिक सामंजस्य के द्वारा किए होते तो इतनी बुरी स्थिति कभी भी नहीं बनती.गंभीरता से देखें तो पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी आधार हवा, पानी और मिट्टी तीनों पर ही खतरा मंडरा रहा है और खतरा भयंकर, विनाशकारी है यह सभी  को भलीभांति समझकर आगे बढऩा चाहिये.

जंगली जानवरों को लेकर दो मंत्रालयों में जंग...आखिर क्या है माजरा?



क्या जंगली जानवर वास्तव में आबादी के लिये खतरे बनते जा रहे हैं? केन्द्र में दो मंत्रालयों के बीच इस मुद्दे को लेकर हो रही टकराहट से तो कुछ ऐसा ही आभास होता है लेकिन इन कारणों पर भी विचार किया जाना चाहिये कि जंगल में रहने वाले जानवर गांव व शहर में रहने वालों के लिये क्यों मुसीबत बन रहे हैं? हकीकत हम जो समझते हैं वह यही है कि औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण  और विकास के नाम  पर्यावरण को नष्ट कर तेजी से कांक्रीट के जंगलों का विकास कर रहे हैं. क्या यह भी एक कारण नहीं हो सकता? जंगल में कुछ बचा ही नहीं है कि जानवर वहां चैन से रह सके. अवैध शिकार के अलावा जंगल में आग,पानी की समस्या, इंसनी शोर और अन्य कई ऐसे कारणों से जंगली जानवरों का गांव व शहरों की तरफ बढऩा जारी है. आजादी के कुछ वर्षो तक देश में जंगली जानवरो के शिकार पर रोक -टोक नहीं थी .इसके बाद के वर्षो ने जंगली जानवरों के शिकार पर पूर्ण पाबंन्दी लगा दी - यहां तक कि हिंसक जानवरों के साथ- साथ उन छोटे मोटे जानवरों को भी मारने पर पाबन्दी लगाई गई जो इंसानों से भी घुले मिले हैं और जगलों से भागकर कभी भी शहर की तरफ चले आते हैं. शिकार पर पाबंन्धी  इसलिये लगाई गई चूंकि कम होते जानवरों की रक्षा की जा सके. यह कदम उचित भी था. पर्यावरण को बनाये रखने के लिये जंगल-व जगंली जानवर दोनों की आवश्यकता है लेकिन अगर जानवर जनता को नुकसान पहुंचाये तो सरकार को तो उसपर संज्ञान लेना ही पड़ेगा. इस कड़ी में कई जगह ऐसी  स्थिति निर्मित हो गई हैं जहां जंगली जानवरों के कारण लोगों के जानमाल का नुकसान हो रहा है तथा फसल को भी नुकसान पहुंचा हैं ऐसे में केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जावडेकर ने पिछले साल जून महीनें कहा था कि  किसानों और स्थानीय आबादी को नुकसान पहुंचाने वालीे नीलगाय और जंगली सुअर जैसे जानवरों को मारने के लिए कुछ वक्त तक की इजाजत दी जाएगी.लेकिन इस मुद्दे पर केन्द्र के दो मंत्री जावडेकर और बाल विकास मंत्री मेनका गंाधी आमने सामने आ गये. मेनका गांधी कई सालों से जानवरों के संरक्षण में लगी है उनका संबन्ध एनीमल राइटस एक्टीविस्ट से भी है अत: उनका इस मामले को लेकर गर्म हाना स्वाभाविक है.मेनका गांधी को लगता है कि यह केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की जानवरों को मारने की हवस है....उनका यह भी दावा है कि  'एनवायरन्मेंट मिनिस्ट्री हर स्टेट को पत्र लिखकर कह रही है कि आप बताओ किसको मारना है, हम इजाजत दे देंगे, बंगाल में कह दिया कि हाथी को मारो,हिमाचल मेें कह गये कि बंदरों को मारो, गोवा में कह दिया कि मोर को मारो. चंद्रपुर में जहां इतना अलर्ट है वहां  जंगली सुअर मार रहे हैं. दूसरी ओर वाइल्डलाइफ डिपार्टमेंट कहता है कि हम नहीं मारना चाहते, यह करने के लिये आप हमारे पीछे मत पडियें. यह पहली बार हुआ है कि मिनिस्ट्री जंगली जानवरों को मारने की इजाजत दे रही है।Óजावडेकर के तर्क में भी दम लगता है कि जानवरों की संख्या का 'वैज्ञानिक प्रबंधनÓ होता है और 'खूंखारÓ घोषित किए जानवरों को मारने की इजाजत विशेष इलाकों और समयावधि के लिए होती है, 'मौजूदा कानून के तहत जब किसान बहुत अधिक समस्याओं का सामना करते हैं और उनकी फसलें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तब राज्य सरकार प्रस्ताव भेजती है तभी मिनिस्ट्री जानवरों को मारने की इजाजत देती हैं. यह अनुमति राज्य के एक विशेष इलाके और समयावधि के लिये होती हैं।Ó हिमाचल में उत्पाती बंदर को नष्ट करने का आदेश है. केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन के जरिये  हिमाचल प्रदेश में बंदरों को छह महीने के लिए हिंसक जानवर घोषित किया यह कदम केंद्र को राज्य के अधिकारियों से कई बार शिकायतें मिलने के बाद उठाया गया. बंदरों की वजह से राज्य के टूरिज्म पर भी असर पड़ रहा था.अब स्थिति यह है कि हिमाचल में बंदर नुकसान पहुंचा रहे हैं तो छत्तीसगढ़,उड़ीसा, पश्चिम बंगाल में हाथियों का आतंक है. छत्तीसगढ़ में तो भालू और सांपों का भी  हमला बदस्तूर जारी है.सरकार ने हाथियों को मारने की परमीशन नहीं दी है साथ ही ऐसा भी कुछ नहीं किया गया है कि हाथियों व भालू से लोग अपने जानमाल की रक्षा कर सके. 

बिजली कंपनी ने गर्मी में परेशान किया अब बारिश में भी....कहां गये दावे!


छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनी ने गर्मी के दौरान छत्तीसगढ़वासियों को मेंटनेंस के नाम पर बिजली सप्लाई बंदकर भारी यातना दी थी तथा दावा किया था कि वे ऐसा प्रबंध कर रहे हैं कि लोगों को मानसून के दौरान कोई तकलीफ न हो लेकिन मानसून अभी पूरी तरह से छाया भी नहीं कि कंपनी के सारे दावे खोखले साबित होने लगे.कंपनी ने दावा किया था कि बारिश के दौरान बिजली गुल होने पर विभाग ने कर्मचारियों को अलर्ट रहने व सुधार करने दौड़ पडऩे का निर्देश दिया है लेकिन यह सारी बाते खोखली साबित हुई है. पूरे छत्तीसगढ़ से जो खबरे मिल रही है वह यही दर्शा रही  है कि थोड़़ी से बारिश होते ही बिजली गुल हो जाती है तथा कई कई घंटे तक बिजली के  वापस आने का लोग इंतजार करते हैं.भीषण गर्मी के दौरान विद्युत कंपनी ने बकायदा अखबारों में विज्ञापन जारी कर व एसएमएस के जरिये बिजली कई घंटों तक बंद रखने की सूचना दी थी. यह बंद इसलिये किया गया चूंकि बारिश आने पर लोगों को तकलीफ न हो.इस दौरान लाइन और ट्रांसफार्मर का रखरखाव तथा मरम्मत का काम कथित तौर पर किया गया.  दावा है कि  विभागीय कर्मचारी तीन शिफ्ट में काम करते हैं, लेकिन तेज आंधी और बारिश के दिनों में स्थिति से निपटने के लिए सभी कर्मचारियों को एक ही शिफ्ट में काम करने को कहा गया मगर यह व्यवस्था है भी कि नहीं यह लोग आसानी से समझ नहीं पा रहे हैं चूंकि उन्हें बिजली  गुल होने के बाद भी इस विभाग से सही रिस्पाँस नहीं मिल रहा .शहरी क्षेत्र के अलावा ग्रामीण अंचलों में भी ट्रांसफार्मर्स को  दुरस्त करने के नाम पर कई घंटे बिजली गुल रखकर लोगों को परेशान किया गया था.अभी बारिश की शुरूआत हैै किन्तु उपभोक्ताओं की शिकायतों के ढेर से ऐसा लगता है कि पूरा मानसून आते आते बिजली विभाग घुटने टेक देगा. कर्मचारियों की कमी को पूरा करने की दिशा में कदम न उठाना भी इस अव्यवस्था के पीछे एक कारण बताया जा रहा है. कंपनी के जो कॉल सेंटर काम कर रहे हैं उसकी हकीकत यही है कि यहां फोन नहीं उठाया जाता.इस वजह से बिजली उपभोक्ता इससे खासे परेशान हैं. कंपनी दावा करती है कि  सभी कॉल सेंटर के कर्मचारियों को निर्देशित किया गया है कि उपभोक्ताओं के फोन उठायें और बिजली गुल होने की सूचना, फील्ड में काम करने वाली टीम को तत्काल दे लेकिन काल सेंटर या किसी अधिकारी से बात नहीं हो पाती.फोन का हमेशा एंगेज टोन में मिलना आम बात है. विद्युत कंपनी ने इस वर्ष अपे्रल से बिजली की  दरों में अनाप शनाप वृद्वि की थी यह कहते हुए कि दूसरे राज्यों के मुकाबले यहां बिजली सस्ती है लेकिन सुविधाएं अपने उपभोक्ता को कैसे दे रही है वह गर्मी के मौसम में तड़पते लोग ही बयां कर सकते हैं. बरसात के दिनों में बादल की एक गर्जना पर बिजली कंपनी की सारी हेकड़ी निकल जाती है. दूसरी ओर सीना तानकर यह दावा करती है कि विद्युत उपलब्धता की दृष्टि से आने वाले 4-5 वर्षों तक विद्युत आधिक्य राज्य छत्तीसगढ़ बना रहेगा इस हेतु छत्तीसगढ़ राज्य शासन सहित विद्युत वितरण कंपनी ने अनेक विद्युत उत्पादकों के साथ दीर्घ अवधि अनुबंध किये हैं। इसके अनुसार आगामी तीन वर्षों में सिलसिलेवार सेन्ट्रल सेक्टर, निजी विद्युत उत्पादक एवं अक्षय ऊर्जा उत्पादन के बूते करीब 3656 मेगावाट की वृद्धि विद्युत उपलब्धता में होगी इसके बावजूद क्यों ऐसी स्थिति बन रही है?  देश के सबसे गरीब राज्य छत्तीसगढ़ में सस्ती बिजली के दावों  में कितनी सत्यता है यह दूसरे गरीब राज्यों से तुलना करने पर लगाया जा सकता है. .पूरे देश की तुलना करने पर छत्तीसगढ़ में बिजली की दर सबसेे ज्यादा निकलती है क्योंकि छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति औसत आय देश में दूसरे नंबर पर सबसे कम है.बिजली की लगातार उपलब्धता के लालच में लोगों ने विद्युत कंपनियों की बहुत सी खामियों को नजर अंदाज कर दिया लेकिन जब विद्युत सेवा बुरी हालत में पहुंच रही है तो उनका आक्रोश कं पनी के रखरखाव की तो पोल खोल ही रहा है साथ ही अब बिजली दरों में बारह प्रतिशत के इजाफे पर भी सवाल उठाया जाने लगा है. घरेलू बिजली की दरों में अधिकतम 13 प्रतिशत तथा कृषि पम्पों की बिजली दरों में 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. छत्तीसगढ़ को  देश का  प्रथम जीरो पॉवर कट स्टेट माना जाता है लेकिन यहां रखरखाव व  मौसमी  मार से होने  वाली कटौती को इस आंकडों से दूर रखा गया है. जिस हिसाब से रखरखाव व मौसमी मार पर कटौती की जाती है उसे जोड़कर देखा जाय तो छत्तीसगढ़ में विद्युत कटौती  सबसे ज्यादा है. छत्तीसगढ़ की अधिकतम विद्युम मांग 4000 मेगावाट तक पहुंच रही है, जबकि विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त विद्युत की उपलब्धता प्रदेश में 4612 मेगावाट है.





रविवार, 12 जून 2016

इस हड़ताल ने तो पचास लोगों की जान ले ली! कौन जिम्मेदार?




किसी हड़़ताल को लेकर पचास से ज्यादा लोगों को प्राण गंवाना पड़ा हो यह छत्तीसगढ़ में पहला मामला है.प्रदेश में संजीवनी एक्सप्रेस और महतारी एक्सप्रेस के पायलट (ड्राइवर) टेक्नीशियन अपनी मांगों को लेकर कई दिनों से हड़ताल पर हैं, इसके चलते जनहित में चलरही एम्बुलेंस सेवा पूरी तरह से ध्वस्त है. पिछले कुछ वर्षो से मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने का एक अच्छा और सुगम माध्यम बनी इस सेवा पर मानो ग्रहण लग गया है. अचानक कर्मचारियों ने अपनी  मांगें जोड़कर सेवा जहां अपने व सरकार  के बीच संबन्धों की खाई बना दी है वहीं सरकार ने हठधर्मिता दिखाते हुए उनकी किसी मांग को स्वीकार करने से इंकार कर दिया. दोनों के बीच चले द्वंद का असर अब दिखाई देने लगा है. मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचा न पाने के कारण  लोगों ने रास्ते में ही दम तोडऩा शुरू कर दिया हैं.  रायपुर-बिलासपुर हाईवे पर सिमगा के पास एक टीवी कैमरामैन राकेश चौहान (24) और उनकी मां की सड़क हादसे में मौत भी इसी वजह से हुई. अगर समय पर उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया जाता और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करा दी जाती तो संभव है उन्हें जीवन दान मिल जाता. छत्तीसगढ़ में इससे पूर्व बहुत सी हड़तालें हुई और कई दिनों तक चली लेकिन किसी की मौत नहीं हुई. वास्तव में यह  हडताल मौत का खेल  के रूप में बदल चुका है, जिसने अव्यवस्था और जिद के चलते  50 लोगों की जिंदगी छीन ली है.हड़ताल अभी भी शासन और कर्मचारियों की जिद के आगे जारी है हड़ताल तोडऩे के  लिये लगाया गया एस्मा, गिरफतारी का  खेल भी कोई असर करता नहीं दिख रहा. ऐसे में अभी और कई लोगों की जिंदगी दाव पर है.संजीवनी सेवा 25 जनवरी 2014 को शुरू हुई थी जो 108 नम्बर पर चालू की गई थी.240 गाडिय़ां एम्बुलेंस के रूप में चलती है. जबकि महतारी  योजना अगस्त 2013 में 102 नम्बर पर 300 गाडिय़ों के  साथ उपलब्ध रहती है. योजना के तहत कर्मचारियों को कान्ट्रेक्ट बेसिस पर एक साल के लिये रखा गया था जो बाद में बढ़ता रहा और अब कर्मचारियों ने सरकारीक रण की मांग को  लेकर हड़ताल कर दी. कर्मचारियों द्वारा रखी गई किसी मांग को सरकार ने स्वीकार नहीं किया. जबकि इससे होने वाली जनता की तकलीफो के निदान का भी कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं किया. हड़ताल खिच रही है..कर्मचारी और सरकार दोनों ही अड़े हुए हैं.नतीजतन, सही समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण प्रदेश भर में अब तक करीब 50 जानें जा चुकी हैं.हडताल  से पहले तक कोई हादसा हो जाय या कोई अचानक गंभीर रूप से बीमार पड जाए तो 108 नंबर पर फोन लगाकर कहीं भी एंबुलेंस (संजीवनी एक्सप्रेस) बुलाई जा सकती थी, लोग इसके आदी भी हो गये हैं. गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाने के लिये 102 नंबर डायल कर महतारी एक्सप्रेस की मदद ली जाती रही. इस सेवा के कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं.पांच और तीन साल से चल रही संजीवनी एक्सप्रेस वास्तव में संजीवनी साबित हुई है लेकिन हड़ताल ने सब किरकिरा कर रखा है. हड़ताल के बीच ऐसे कई हादसे हुए जिसमें एंबुलेंस सर्विस मिली होती तो जिंदगियां बचाई जा सकती थीं.जिन घटनाओं का विवरण इस हड़ताल के दौरान मिला है वह इतना वीभत्स है कि व्यवस्था पर ही गुस्सा छलक पड़ता है कि उसने ऐसी स्थिति से निपटने पूर्ण तैयारी क्यों नहीं  की.? हम पूर्व के हडतालों के दौरान भी आवश्यक सेवाओं की हड़ताल पर यह बात कह चुके हैं कि इन सेवाओं में कर्मचारियों को लेने से पूर्व लिखित अनुबंध कर लिया जाना चाहिये कि वे किसी भी हड़ताल में शामिल नहीं होगें. आवश्यक सेवाओं में हड़ताल के चलते किसी की मौत हो जाती है तो ऐसे मामलों में एफआईआर उस क्षेत्र के जिम्मेदार कर्मचारी पर लगाया जा सकता है लेकिन ऐसा सरकार करती नहीं.हड़ताल  से रोजाना 800 लोग प्रभावित हो रहे हैं-कभी भी बीमार पडऩे पर लोगों को संजीवनी व गर्भवती महिलाओं को 102 सेवा लेने की आदत सी पड़ गई है. हड़ताल ऐसे ही चलते रहा तो लोगों की आदत कहीं छूट न जाये?

भारत-अमरीका घनिष्टता-मोदी ने विश्व को बता दिया कि भारत क्या है?




अमरीका के साथ घनिष्टता के जो बीज अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने बोए थे, मनमोहन सरकार के दिनों में अंकुरित हुए, वे अब पुष्पित-फलित हो रहे हैं. इस प्रक्रिया में मोदी के व्यक्तित्व का योगदान  जरूर है. शायद मोदी ने अमरीका को अपनी जिद बना ली थी- जिस मोदी से अमरीका किसी समय नफरत करता था,उन्हें वीजा देने से  मना किया आज उसी मोदी को अमरीका पलक पावड़े बिछाकर स्वागत कर रहा है.उनके भाषणों पर तालियां पिट रही है. अमरीकी ससंद में मोदी के आवाज की गूंज है,उनके एक एक लब्ज को सुनने लोग बेताब हैं, इतना ही नहीं लोग खड़े होकर उनकी इज्जत कर रहे हैं. यहां यह उल्लेखनीय  है कि मोदी के अमरीकी संसद में भाषण के दौरान लोगों ने न केवल तालियां बजाई,वाह वाह किया बल्की बार बार खड़े होकर उनका समर्थन किया. यह भारत  के लिये गर्व की बात है कि उसके प्रधानमंत्री को इतनी इज्जत दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश और उसके राष्ट्रपति ने दी.हम स्पष्ट तौर पर कह सकते हैंं.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं में यह यात्रा सबसे सार्थक रही. ओबामा  के बुलावे पर अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकाल की यह आखिरी मुलाकात विश्व इतिहास में सदैव याद की जायेगी. एक बार राजीव  गांधी का भी अमरीकी  संसद में इसी  तरह स्वागत हुआ था. नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा के दौरान कोरी भाषणबाजी और नाटकबाजी नहीं हुई बल्कि काम की बात हुई. हमारे देश के पडौस में पल रहे आतंकवाद को जिस तरीके से उन्होंने पेश किया वह वास्तव में काबिले तारीफ है.अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ उनके व्यक्तिगत समीकरणों ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं को मजबूर किया कि वे भारत के बारे में खुली घोषणा कर दें. इस पूरे एपीसोड़ को सफल  बनाने का श्रेय एक तरह से हम अपने विदेश सचिव जयशंकर को भी दे सकते हैं वे अमरीका में राजदूत भी रह चुके हैं.नरेन्द्र मोदी की यह यात्रा देश के आर्थिक सामाजिक व परमाणु क्षेत्र में उपलब्धियों से भरा पड़ा हैं. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति से कहलवा दिया कि परमाणु सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का अमेरिका डटकर समर्थन करेगा, 'प्रक्षेपास्त्र तकनीक नियंत्रण संगठनÓ (एमटीसीआर) की सदस्यता भी भारत को मिल गई है आगे इसकी अधिकारिक घोषणा होना है.भारत की सदस्यता पर दुनिया के कुछ देशों को आपत्ति है- उस आपत्ति को जताने की अंतिम तिथि 6 जून को पूरी हो गई. दिलचस्प तथ्य यह कि 34 में से एक भी देश भारत के विरुद्ध नहीं गया.इस उपलब्धि  के बाद भारत को सर्वश्रेष्ठ मिसाइल और तकनीकों को खरीदने और अपने सुपरसोनिक क्रूज और ब्राह्मो मिसाइल बेचने की सुविधा मिल जाएगी. यह सुविधा अमेरिकी समर्थन के बिना संभव नहीं थी.  भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदा जो सन् 2008 में हुआ था  अब उसके तहत आंध्र में छह परमाणु-भट्टियों पर काम शुरु हो जाएगा लेकिन 'परमाणु सप्लायर्स ग्रुपÓ की सदस्यता चीन के अडंगे से ही अटक सकता है बाकी कोई इसका विरोध नहीं कर रहा लेकिन अकेले पड़े चीन के बोल भी अब  बदलते नजर आ रहे हैं. मोदी और ओबामा ने जलवायु संबंधी पेरिस समझौते पर सहमति व्यक्त की है. सैन्य-सुविधाओं के लिए सहयोग समझौता भी तैयार है. विदेश मंत्रालय के अफसरों ने सही राह तैयार की हैै. बराक ओबामा का कार्यकाल इस साल  के अंत में चुनाव के बाद खत्म हो जायेगा. नये प्रशासन के आने के पूर्व हुए अहम फैसले  संबन्धों को और पगाढ़ बनाने में कामयाब होंगे. ऐसी आशा की जा सकती है.भारत-अमरीका संबन्धों को लेकर विश्व स्तरीय प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है. भारत का एक बड़ा पडौसी  चीन है. वह सोचता है कि अमरीका भारत को उसके खिलाफ हथियार बनाना चाहता है. इसी प्रकार पाकिस्तान भी अब यह सोचने लगा है कि अमरीका उसकी जगह भारत को ज्यादा तहजीब दे रहा है. कुछ देश यह भी  सोचते हैं कि अमरीका भारत को अपने सैन्य हथियार बेचने के लिये मित्र बना रहा है. बहरहाल जो भी स्थिति बने फिलहाल प्रधानमंत्री की  इस विदेश नीति ने तो देश में हलचल मचा ही दी है.

कांग्रेस को सोमवार शुभ नहीं रहा...साथी बिखर गये!



एक दिन में चार झटके से कांग्रेस पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में हार के बाद अब पार्टी में नेताओं की बगावत आम हो चली है। साथ ही कई दिग्गज नेता पार्टी का दामन छोड़ रहे हैं। महाराष्ट्र्र छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और यूपी  से एक ही दिन कांग्रेस के लिए  बुरी खबर आई.पांच राज्यों की विधानसभा में पराजय के बाद अब पार्टी नेताओं ने बगावत का झंडा थाम लिया है.दिग्गज नेताओं के पार्टी  छोडऩे से पार्टी के अंदर मायूसी है लेकिन बाहर इसे दिखाया नहीं जा रहा. पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत ने सोमवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया लेकिन कल राहुल गांधी ने उन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण देकर उनके मामले को हल्का करने का प्रयास किया है. वास्तविकता यही है कि लोकसभा चुनावों में सत्ता गंवाने के बाद  संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए मुश्किलें बड़े तूफान की तरह आई हैं. सोमवार को कांग्रेस के लिए चार बुरी खबरें आईं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति से सन्यास लेने का एलान भी कर दिया. कामत महाराष्ट्र से आते हैं और अगले साल मुंबई में निकाय चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका था. कामत को गांधी परिवार का विश्वस्त माना जाता है, उनका इस्तीफा राजनीतिक गलियारों में हैरानी भरा रहा. पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजे संदेश में कामत कहते हैं कि कई महीनों से मैंने महसूस किया कि मुझे नए लोगों को आगे आने के लिए पीछे हट जाना चाहिए.क्या कामथ के कांग्रेस छोडऩे  या सन्यास लेने के  पीछे वास्तव में यही कारण है?हकीकत यह है कि मुंबई इकाई से साइडलाइन किए जाने के चलते वे नाराज थे. पार्टी में सुधार के लिए उनकी ओर से दिए गए सुझावों की अनदेखी की गई. राहुल गांधी की मुंबई कांग्रेस प्रमुख संजय निरूपम से नजदीकियों ने कामत को सबसे ज्यादा दुख पहुंचाया. यह भी कहा जा रहा है कि वे राज्य सभा के लिए महाराष्ट्र से उम्मीदवारों के चयन से भी नाखुश थे. इधर, छत्तीसगढ़ में लगभग 12 साल से सिंहासन से बाहर विपक्ष  में बैठी कांग्रेस सोमवार के ही दिन एक और झटका खा गई. वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम अजित जोगी ने अपनी नई पार्टी बना ली अपने पैतृक गांव मरवाही में जोगी ने इस बात का एलान किया. इस दौरान उनके बेटे अमित जोगी, पत्नी रेणु और कई कांग्रेस नेता मौजूद थे हालांकि पार्टी का नाम अभी तय नहीं हुआ है.इस दौरान जोगी ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि अब राज्य के निर्णय दिल्ली से नहीं होंगे। उत्तर पूर्व में असम में सत्ता गंवाने के बाद अब त्रिपुरा में भी कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई है पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के साथ गठबंधन के मुद्दे पर वरिष्ठ नेता और विधायक जितेन सरकार ने पार्टी छोड दी. उन्होंने स्पीकर को इस्तीफा सौंप दिया बता दें कि बंगाल में लेफ्ट से गठबंधन के चलते त्रिपुरा में कई और कांग्रेस नेता भी नाराज हैं इस कड़ी में लेटेस्ट खबर यही  है कि दस विधायक कांग्रेस छोड तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये हैं. कांग्रेस का अब तक राज्य सभा में जोर था लेकन चुनाव के बाद राज्यसभा में भी यह संख्या घट जाएगी.उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसी  हैं.  पार्टी ने यहां जीत हासिल करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी है। लेकिन कार्यकर्ता एकजुट नहीं दिख रहे हैं प्रशांत कुमार को यहां राहुल  गांधी  ने कांग्र्रेस को  जिताने का जिम्मा सौंपा हैं इसको लेकर कांग्रेसियों का एक बड़ा वर्ग नाराज चन रहा है. यहां पर प्रियंका गांधी को पार्टी में लाने की मांग लंबे समय से चल रही है, अब अल्पसंख्यक मोर्चे ने प्रस्ताव पारित किया है कि राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाए इसमें कहा गया कि यह काम जल्द से जल्द पूरा हो ताकि लोगों के दिमाग में भ्रम ना रहे। इसी बीच पार्टी की राज्य इकाई ने खुद को इस प्रस्ताव से दूर कर लिया है.कांग्रेस को अपना ढांचा फिर से तैयार  करने की जरूरत है. पुरानी सोच  में जहां  बदलाव लाना होग वहीं पार्टी में अनुशासन हीनता और गुटबाजी पर लगाम देनी होगी. नये लोगों को लाना होगा ऐसा व्यक्ति जो कांग्रेस को फिर से खड़ा कर सकें वरना आगे स्थिति और बिगड़ सकती है.

राजनीतिक पैतरेबाजी...क्या कांग्रेस का पूर्ण सफाया होगा?




'कांग्रेस मुक्त भारत क्या मोदी का यह नारा कामयाब होगा? कुछ चुनावो में पराजय और हाल के चुनाव में कांग्रेस से सत्ता छीनने के बाद तो लोगों को लगने लगा है कि मोदी आगे के वर्षो में अपने नारे को कामयाब करने में बहुत हद तक सफल होगेंंॅ. असल में कांग्रेस परिवारवाद और अपने ही साथियों की गुटबाजी के  जाल में इतनी उलझ चुकी है कि वह अपना वजूद ही खोती जा रही है. डेढ़ सौ वर्ष पुरानी  कांग्रेस में अभी भी दम है लेकिन उसे बहुत हद तक परिवारवाद को किनारे रखना होगा तथा अपने  युवकों को आगे करना होगा तभी वह इस संकट से उभर सकेगा वरना आगे आने वाले वर्षो में उसे और बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं. अभी हाल के चुनाव में देखते- देखते उसके हाथ से दो राज्य को जहां निकल भागे वहीं छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में उसे दो टुकड़ों में बटना पड़ा. आंतरिक गुटबाजी और उससे उत्पन्न होने वाले विवाद को केन्द्र की कांग्रेस शुरू से ही हल्के में लेती रही है वहीं विवादों का निपटारा उचित समय पर नहीं कर पाने के कारण संकट केंसर का रूप लेता गया. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बंटने का शायद यही एक कारण है. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन था अगर आंतरिक कलह और भीतरघात की राजनीति नहीं होती तो शायद यह राज्य उसके हाथ में होता. बहरहाल  कांग्रेस मुक्त भारत बनाने भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.वर्तमान में कांग्रेस की देश में सिर्फ सात राज्यों में  सरकार चल रही है. जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार चल रही है वहां से भी आने वाले समय में भाजपा की सरकार बनाने के प्रयास में भाजपा जुट गई है. छत्तीसगढ़ में हाल ही अजीत जोगी के कांग्रेस से बाहर होने के बाद राजनीति गरमाई हुई है यहां हालाकि भाजपा अपने  विकास और डा. रमनसिंह के सुशासन से संतुष्ट है लेकिन अजीत जोगी के निर्णयों पर वह पूरी निगाह गढ़ाये हुए हैं वहीं कांग्रेस यह बताने का प्रयास कर रही है कि  अजीत जोगी के बाहर होने से वह और मजबूत हुई है लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अंदर से यह मानकर चल रहे हैं कि अजीत जोगी उनके लिये मुसीबत खड़ी कर सकते हैं. आगे आने वाला समय यह तय करेगा कि छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय पाॢटयों का भविष्य क्या होगा?. वैसे हम अविभाजित मध्यप्रदेश में यह अच्छी तरह देख चुके हैं कि कम से कम छत्तीसगढ़ में तो कभी क्षेत्रीय पार्टी अपना वर्चस्व नहीं बना पाई. इस बीच आम आदमी पार्टी दिल्ली  में अपनी सरकार की सफलता का दावा कर  पंजाब,हरियाना और छत्तीसगढ़ में भी अपना  पैर जमाने प्रयासरत है-छत्तीसगढ़ में हालाकि अब तक आप ऐसा कुछ नहीं कर पाई है जिससे उसका अस्तित्व लोगों के बीच नजर आने लगे लेकिन जो पार्टी यहां अस्तित्व  में हैं उसने रमन मुक्त छग का नारा देकर अपने अभियान का  ढंका बजा दिया है. आम आदमी पाटी ने  1 मई से 30 मई तक पूरे प्रदेश में रमन मुक्ति यात्रा निकाली और लोगों को सरकार की खामियां गिनाई. 31 मई को आम आदमी पार्टी द्वारा निकाली गई रमन मुक्ति यात्रा की समीक्षा की गई.आने वाले दिनों में भी आम आदमी पार्टी रमन मुक्ति यात्रा के द्वितीय चरण का शंखनाद करेगी.दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में भाजपा के पूर्व सांसद सोहन पोटाई, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम भाजपा की सरकार को आऊट सोर्सिंग सरकार मानते हैं.उन्होंने  आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की जंग छेड़ रखी है.रमन सराकर के लिये अजीत जोगी के साथ यह ग्रूप भी एक सरदर्द बन गया है. प्रदेश में भाजपा  जनप्रतिनिधियों के व्यवहार पर जहां कतिपय मामलों को लेकर आक्रोश में है वहीं नौकरशाहों के कारनामों से भी लोगों में रोष है. कुछ दिन पूर्व  गीदम नगर पंचायत क्षेत्र के जनपद अध्यक्ष ने एक गरीब सब्जी बेचने वाली पर कहर बरसाया उसने गरीब महिला की रोजी रोटी पर लात मारी, जिसके विरोध में उस क्षेत्र में व पूरे प्रदेश में नारेबाजी व विरोध प्रकट किया गया वहीं नौकरशाही अपनी मर्यादा भूलकर मनमाने तरीके से कार्य कर रही है इसका नमूना अंबिकापुर के रामानुजगंज में डॉ. जगदीश सोनकर के द्वारा अस्पताल के निरीक्षण के दौरान देखने को मिला वहीं प्रदेश सरकार द्वारा 27 अप्रैल से 26 मई तक लोक सुराज अभियान चलाया गया, लोकसुराज दलों को बंधकर बनाकर आम जनता द्वारा रोष प्रकट किया गया, इससे यही अर्थ निकला गया कि  प्रदेश में शासन प्रशासन का कार्य सुचारू रूप से नहीं चल रहा है-यह उस समय स्पष्ट हुआ जब मुख्यमंत्री ने कई विभागों में अधिकारियों का तबादला कर दिया.  

शनिवार, 4 जून 2016

नदियों का लोप होता जा रहा... छोटी नदियां,निस्तारी तालाब अब कहां?




छत्तीसगढ़ से लेकर कर्नाटक तक ट्रेन में यात्रा करों तो कम से कम तीन या चार राज्यों से होकर गुजरना पड़ता है -छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र आंन्ध्र और कर्नाटक  इन राज्यों की प्राय: सभी नदियां इस समय सूखी है. खेतो में सन्नाटा है और किसानों की स्थिति बेहाल है. वास्तविकता आज यही है कि देश की दो तिहाई छोटी नदियां सूख गई हैं और दिनों-दिन देश के नक्शे से गायब भी होती जा रही हैं.छोटी नदियों का सूखना बड़ी नदियों के लिए खतरे की घंटी है.कई छोटी नदियां नालों में तब्दील हो गई हैं. वर्षो से हम  देखते आ रहे हैं कि गांव-कस्बो से गंदे पानी के लिए निस्तारी तालाब हुआ करते थे, जिससे पानी दूसरे तालाब में पहुंचता था ,दूसरे तालाब में कपड़े धोने आदि का काम किया जाता था वहीं तीसरा तालाब ऐसी जगह बनते थे, जहां धरती का पेच छूटा हुआ हो यानि जहां पर धरती में पानी रिसकर जा सकता था इस तरह दो तालाबों से होता हुआ पानी तीसरे तालाब में और तीसरे तालाब से झरनों और छोटी नदियों का जन्म होता था. देश की 9.8 प्रतिशत नदियां तालाबों और झीलों से जन्मी हैं, इसलिए छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए इनका रिश्ता तालाबों से दोबारा जोडऩे की जरूरत अब महसूस की जा रही है, इसके लिए हमें पोखरों को ठीक करना होगा, उनके अतिक्रमण को समाप्त करके उनका पोषण करना होगा.वैसे सभी राज्यों में छोटी नदियों की स्थिति खराब है, लेकिन गुजरात के बाद तमिलनाडु में भी स्थिति गंभीर है,वहां अधिकांश छोटी नदियां सूखकर समाप्त हो गई हैं और बाकी बची नदियों से जहरीले गंदे नाले मिलाकर उन्हें समाप्त किया जा रहा है.नदी को लेकर हमारी न कोई स्पष्ट नीति है और न ही कानून है. नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक नीति बनाए जाने की जरूरत है, साथ ही नदियों को लेकर कानून बनाया जाना चाहिए.यह सच है कि मैदानी इलाकों में छोटी नदियों पर संकट ज्यादा है, दरअसल, मैदानी इलाकों में शहरीकरण होने और जनसंख्या बढऩे का प्रभाव इन नदियों पर पड़ा है. पहले पहल तो इन नदियों का पानी लोगों ने बोरवेल आदि लगाकर सोख लिया फिर उस पानी को गंदा करके दोबारा छोड़ा तो यह नाले में तब्दील हो गई,यही छोटी नदियां बाद में बड़ी नदियों को प्रदूषित करती हैं. छोटी नदियों से आम आदमियों का जुड़ाव है लेकिन जब से पानी का शोषण करने वाली इंजीनियरिंग और तकनीक बदली है तबसे हमने धरती में से पानी खाली कर दिया.हर नदी जिसमें पानी बहता था, वह सूखकर मर गई. अब नदियां लोगों के हाथों में नहीं बल्कि सरकारों के हाथों में हैं और वह बहुत तेजी से तथाकथित विकास की नीति की भेंट चढ़ रही हैं लेकिन यदि समाज जाग जाए और अपनी ताकत पहचान ले तो नदियां पुनर्जीवित हो सकती हैं.नदी जोड़ो परियोजना समाधान निकाल  सकती है बाढ़ रुकेगी और सूखा समाप्त होगा लेकिन इसको लेकर राज्यों के बीच टकराव नहीं होना चाहिये. देश में इस समय नदियों के पानी को लेकर तीन बड़ी लड़ाइयां चल रही हैं। सतलज-यमुना-व्यास, कृष्णा-कोयना-कावेरी और गोदावरी को लेकर राज्यों के बीच संघर्ष जारी है. पानी की इन लड़ाइयों का बीते 40 सालों में कोई समाधान नहीं निकल पाया है. आज कोई भी राज्य यह कहने को तैयार नहीं है कि उसके राज्य में आवश्यकता से अधिक पानी है, ऐसे में किसी दूसरे राज्य को पानी कैसे मिलेगा।? इसलिए नदियों को नदियों से जोडऩे के साथ समाज से समाज को जोडऩे की जरूरत है.  बहरहाल देश की छोटी नदियां भले ही थोड़ी दूरी तय करने के बाद बड़ी नदियों में समा जाती हों, लेकिन उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है। 

जंगली जानवर फसल का नुकसान करेंगे तो मिलेगा मुआवजा!



छत्तीसगढ़ के कोरबा में हाथियों से कुचलकर अब तक पांच लोग मारे गये हैं-कल ही एक वृद्वा को जो महुआ बीनने गई थी हाथी ने कुचलकर मार डाला यह सिलसिला पूरे छत्तीसगढ़ में लगातार जारी है वहीं संपत्ति को नुकसान का तो कोई आंकलन ही नहीं है.असल में हाथियों की  चपेट में वे लोग आते हैं जो अन्न उत्पादन में लगे हैं उनके खेतों को उजाडऩे पहुंचे जानवरों से वे भिड़ जाते हैं तथा उसी में उनकी मौत होती है. किसान को अन्न उत्पादन से लेकर उसे बेचने तक हर कदम पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है. अच्छी भली फसल को देखते देखते जहां मवेशी चट कर जाते हैं तो दूसरी ओर जंगली जानवर भी किसानों के दुश्मन बन जाते हैं. हाथी  व अन्य जंगली जानवर जिस तरह फसलों की बरबादी करते हैं वह असहनीय है. जगली जानवरों से किसानों को बचाने के लिये सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं उसके तहत उन किसानों को शीघ्र राहत मिल सकती है जिनकी फसल जंगली हाथियों द्वारा रौंदकर खराब कर दी जाती है या फिर नीलगाय या अन्य किसी जंगली जीव बर्बाद कर देते है। ऐसी दशा में किसान फसल के नुकसान की भरपाई सरकार से हासिल कर पाएंगे लेकिन व्यक्तिगत रूप से हाथियों के हमले से बचाने का कोई प्रयास अब तक नहीं किया गया है बहरहाल सरकार की नई पहल पर्यावरण मंत्रालय की ओर से हुई  हैं. सुविधा को अमल में लाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने इसी महीने एक औपचारिक प्रस्ताव कृषि मंत्रालय को भेजा है. पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कृषि मंत्रालय को भेजे गए इस प्रस्ताव में कहा गया है कि जल्द से जल्द इस प्रावधान को भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अधीन शामिल किया जाए ताकि किसानों को वन जीवों के कारण होने वाली फसल नुकसान की भरपाई भी हासिल हो सके.प्रस्ताव में यह कहा गया है कि किसानों को राहत तय समय के भीतर मुहैया कराई जानी चाहिए.आज की स्थिति में किसानों की फसल को रौंदने में मौसम के साथ साथ मवेशी व जंगली जानवर किस प्रकार भूमिका अदा करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है इसी कड़ी में सरकार का यह कदम अब किसानों को कितना फायदा पहुंचायेगा यह इस प्रस्ताव के नियम बन जाने के बाद भी पता चलेगा. पर्यावरण मंत्रालय का वन्यजीव प्रभाग भी प्रधानमंत्री फसल बीमा स्कीम में शामिल हो सकता है. वहीं, पर्यावरण मंत्रालय के  प्रस्ताव पर कृषि मंत्रालय का रुख सकारात्मक दिखाई दे रहा है.,वह इस प्रस्ताव के बाद फसल बीमा की मौजूदा गाइडलाइनों में बदलाव की तैयारी कर रहा है. नए नियम और मानकों को तय करने के लिए बीमा कंपनियां क्या कहती है यह देखना भी दिलचस्प होगा. पर्यावरण मंत्रालय मानता है कि लगातार जंगली जमीनों के लैंड-यूज बदले जाने से वन जीवों और आबादी के बीच संघर्ष में बढ़ोतरी हुई है खासतौर से हाथियों के लिए जंगलों में मौजूद करीब 70 फीसदी से ज्यादा रास्ते संरक्षित इलाके से बाहर आते हैं इसकी वजह से हाथी न सिर्फ रास्ता बदलकर आबादी की ओर रूख कर जाते हैं बल्कि फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान भी पहुंचाते हैं. यही वजह है कि कई बार आबादी और हाथियों के बीच संघर्ष भी होता है। अनुमान के मुताबिक इस बढ़ते संघर्ष के कारण हर साल 400 लोगों और 100 हाथियों की मौत हो जाती है. यह नुकसान दोनों तरफ है, वहीं जंगली जीवों के कारण फसलों का नुकसान अनुमानित 200 से 400 करोड़ रुपये तक होता है. यह कोई कम रकम नहीं है. हमें जंगली जानवरों को भी बचाना है और अपनी आबादी तथा फसल को भी ऐसे में प्रयास यही होना चाहिये कि सरकार ऐसी कोई योजना को सामने लाये जो बिना किसी डेमेज के कंट्रोल हो जाये. पर्यावरण मंत्रालय की जो पहल है वह फौरी तौर पर जो दिखाई देती है वह सिर्फ किसानों की फसल को किसी प्रकार बचाकर उसेे मदद पहुंंचाने की है लेकिन  इसके साथ ही  जंगली जानवरों के आबादी वाले क्षेत्रों में न पहुंचं इसके लिये भी कोर्ई प्रयास तत्काल उठाने की जरूरत है देश के कई भागों में जंगल से आने वाले हाथी एक बड़ी समस्या है विशेषकर पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में है सरकार को कोई ठोस योजना की पहल वर्तमान में लिये जा रहे प्रस्ताव के साथ करना चाहिये।

जवानों की तत्परता से ही पुलगांव में बड़ा डेमेज टला!



पुलगांव में देश के सबसे बड़े आयुध डिपो में लगी आग की जांच के लिए हालाकि अब एसआईटी गठित हो गई है और इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ तौर पर कहा जा सकेगा कि घटना केै से  हुई.लेकिन महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सेना से जुड़े लोग ही यह कह संदेह व्यक्त कर रहे हैं कि इस कांड के लिये किसी साजिश से भी इंकार नहीं कर सकते. इस भीषण अग्रिकांड में हमारे आयुध कारखाने को तो भारी नुकसान पहुंचा है साथ ही जांबाज अफसरों की भी इस दुर्घटना में मौत हुई है. जवानों ने एक बार फिर जांबाजी का परिचय दिया है, खुद आग के शोलों में समा गए लेकिन पूरे हथियार (आयुध) डिपो को तबाह होने से बचा लिया. यार्ड में आग लगने के बाद सेना के अधिकारी और जवान तुरंत सतर्क हो गए थे. यह आग शोला न बन जाए इसलिए उसपर काबू पाने के लिए पहले दो अधिकारियों समेत जवानों की पहली टीम ने मोर्चा संभाला था लेकिन, आग बुझाने के दौरान ही धमाके शुरू हो गए और यह टीम गोला बारूद के धमाकों में समा गया. इस भीषण अग्निकांड के पीछे सुरक्षा की दृष्टि से हुई लापरवाही को अनदेखा नहीं किया जा सकता। 7000 एकड़ में फैला यह डिपो संभवत: एशिया के सबसे बड़े आयुध डिपो में से एक है जहां ढेर सारा बारूद, हथियार और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का भंडारण होता है. सेना के ऐसे संवदेनशील स्थानों पर भी अगर आग की ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं तो वहां के सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रश्नों के घेरे में आती है. मुम्बई-दिल्ली रेलमार्ग पर पुलगांव हालाकि एक छोटा सा स्टेशन है इसके आसपास देश का इतना बड़ा आयुध संग्रह है यह भी बहुत कम लोगोंं को पता है. इस आयुध डिपो से ही युद्ध की स्थिति में जवानों को हथियारों की सप्लाई होती है. हालांकि, सेना की मुस्तैदी से इस आग पर काबू पा लिया गया मगर इस अग्निकांड में सेना के दो बड़े अफसर, एक जवान व 13 दमकल कर्मी शहीद हो गए. इन जांबाजों के कारण ही आग की लपटें दूसरे शैडों तक नहीं पहुंच पायीं. आयुध डिपों में आग लगने की ऐसी घटना पहली नहीं है.अतीत में भी आग की ऐसी घटनाएं जान व माल के नुकसान की वजह बनी हैं. सन् 2000 में भरतपुर में भी इसी तरह की आग लगी थी, जिससे देश को 393 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. पश्चिम बंगाल स्थित पानगढ़ के आयुध डिपो में तो आग से लगभग 332 मीट्रिक टन बारूद स्वाहा हो गया था फिर अनन्तनाग स्थित खांडरू ऑर्डिनेंस डिपो की भीषण आग को कौन भुला सकता है जहां 19 लोग मारे गये थे और 100 के करीब घायल हो गये थे,आर्थिक नुकसान हुआ, सो अलग.लगता है हमने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा! इसीलिए इनकी ऐसी पुनरावृत्ति हो रही है जिस पर सरकार के रक्षा मंत्रालय को गहराई से सोचना होगा तथा सुरक्षा के ठोस उपाय करने होंगे,जो गोला-बारूद हमारी सुरक्षा के लिए है वही हमारे जवानों की मौत का कारण बन रहे है.  देश में सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन सेना को हथियार, गोला-बारूद सप्लाई करने वाले आयुध डिपो तक आधुनिकीकरण की सोच नहीं पहुंच पाई है इन डिपोस में आग बुझाने के यंत्र पुराने ढर्रे के हैं वैसे ही पुराने शैड तथा कई साल पहले वाले सुरक्षा मानक हैं, इस दुर्घटना के बाद इस
समय सबसे बड़ा सवाल  यह उठ रहा है कि क्या देश के इस सबसे बड़े आयुध डिपो में भीषण आग को महज एक दुर्घटना मानकर हल्के से लेना चाहिये? वह भी तब जब हमारेे आसपास दुश्मनों और मीरजाफरों की पूरी टीम मौजूद हो? हाल के महीनों में ही पठानकोट एयर बेस में आतंकियों ने घुसकर तबाही मचाई थी. यहां न केवल हमारे जांबाज अफसर व जवान शहीद हुए थे बल्कि हमारे एयरबेस को भी काफी नुकसान हुआ था.इसमें जो तथ्य सामने आये वह यही इंगित करते हैं कि कुछ लोगों की मिलीभगत से इस पूरे हमले को अंजाम दिया गया था ऐसे में इस प्रकार की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता. आग फैलती तो भयानक तबाही होती. दस हजार एकड़ में फैले हथियार डिपो में एक बंकर से दूसरे बंकर की दूरी सौ से डेढ़ सौ मीटर है. बंकरों के बीच ज्यादा दूरी होने के कारण भारी दुर्घटना टल गई.इसमें हमारे  जवानों व अफसरों की भूमिका की जितनी तारीफ की जाये कम है.



एक बड़ी आबादी वेश्यावृत्ति, भीख मांगने, बंधुआ मजदूरी करने मजबूर!


यह एक दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि एक अरब  तीस करोड़ की आबादी वाली हमारी इस धरती में करीब एक करोड़ तिरासी लाख पचास हजार लोग बंधुआ मजदूरी, वेश्यावृत्ति, भीख जैसी आधुनिक गुलामी के शिकंजे में बुरी तरह जकड़े हुए हैं- दुनिया में आधुनिक गुलामी से पीडितों के मामले में हमारा देश सबसे आगे हैं.सरकार का  ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर होने के बावजूद इस समस्या का लगतार उग्र रूप  धारण करना सामाजिक सोच रखने वालों को चिंता में डाल देता है.देश में चुनाव के दौरान कुछ लोगों को यह जरूर याद आ जाते हैं लेकिन चुनाव के बाद इन्हें कोई नहीं पूछता जबकि अगले चुनाव तक यह संख्या और बढ़़ती जाती है.पूरी दुनिया  में ऐसे गुलामों की तादाद तकरीबन चार करोड़ 60 लाख है दूसरी  ओर भारत दुनिया के 10 दौलतमंद देशों की लिस्ट में तो है किन्तु औसत भारतीय काफी गरीब है.धनाढृय व्यक्ति कुल 5,200 अरब डालर की संपत्ति अपने पास समेटे हुए हैं-भारत की गिनती दुनिया के 10 सर्वाधिक धनवान देशों में होती है मगर इसकी एक वजह यहां की बड़ी आबादी का होना भी है.प्रति व्यक्ति आधार पर औसत भारतीय 'काफी गरीबÓ है.  विश्रेषण करने से कई महत्वपूर्ण बाते सामने आती हैं-धनाढ़ृयता के मामले में भारत सातवें पायदान पर है तो अमरीका को पहला दर्जा हासिल है.सर्र्वाधिक चौका देने वाली रिपोर्ट वाक फ्री फाउण्डेशन की है जिसमें कहा गया है कि भारत की एक अरब 30 करोड़ की आबादी में से एक करोड़ 83 लाख 50 हजार लोग गुलामी में जकड़े हैं. उत्तर कोरिया में इसकी व्यापकता सबसे ज्यादा है. आधुनिक गुलामी सभी 167 देशों में पाई गई है, इसमें शीर्ष पांच देश एशिया के हैं। भारत इसमें शीर्ष पर है. देश को आजाद हुए अडसठ साल से ज्यादा का समय हो गया लेकिन इस गंभीर समस्या को  सरकार  व नेताओं ने कभी गंंभीरता से नहीं लिया शायद इसीलिये गरीबी व अपराध का आधुनिक रूप लगातार बढ़ता जा रहा है. एक विस्फोटक स्थिति निर्मित  हो रही  है जिसके निदान के  लिये सभी तरफ से उसी प्रकार प्रयास करने की जरूरत है जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता सम्हालने के बाद देश में शौचालय और स्वच्छता के लिये व्यापक अभियान चलाया. देश को वैश्यावृत्ति और अन्य गरीबी जन्य रोग से मुक्त करने के लिये व्यापक रूप से कदम उठाने की जरूरत है.देश के धनाढ्यों से सरकार इस समस्या के हल में कितनी मदद ले सकता है इसपर भी विचार किया जाना चाहिये-इसमें यह भी संभव है कि अति घनाढय़ों लोगों के जिम्मे प्रति हजारों में कुछ को गोद लेकर उनके जीवन में सुधार हेतु प्रयास कराया जाये. आधुनिक गुलामी में शोषण के उन हालातों को रखा गया है जिसमेें धमकी, हिंसा, जोर-जबरदस्ती, ताकत का दुरूपयोग या छल-कपट के चलते लोग नहीं निकल सकते हैं . देशव्यापी अभियान  इस सिलसिले में चलाने की जरूरत है ताकि ऐसे लोगों को गुलामी कराने वालों के चंगुल से निकाला जा सके इसमें स्थानीय प्रशासन, पुलिस प्रशासन मानवाधिकार में लगे लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.पूरे मामले को मानवीयता के नजरिये से देखने की जरूरत है.हालाकि फौरी तौर पर देखने से समस्या का कोई समाधान नहीं निकला है शायद यही कारण है कि आंकड़े में हम विश्व में सबसे ज्यादा गुलाम है किन्तु अगर सरकारी तौर पर इस समस्या को हल करने सरकार द्वारा कदम उठाये जाने की बात करें तो उसने इस समस्या से निबटने के लिए उपाय करने की दिशा में खासी तरक्की की है।  '' मानव तस्करी, गुलामी, बंधुआ मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति और जबरन शादी को अपराध घोषित किया जा  चुका  है. भारत सरकार बार बार अपराध करने वालों को ज्यादा कठोर सजा के प्रावधान के साथ अभी मानव तस्करी के खिलाफ कानून कड़ा कर रही है. यह पीडितों को सुरक्षा और बहाली समर्थन की पेशकश करेगी इसमें कहा गया है कि आर्थिक तरक्की के साथ भारत में श्रम संबंधों से लेकर ज्यादा जोखिम वाले लोगों के लिए सामाजिक बीमा की प्रणाली तक कानूनी और सामाजिक सुधार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम किए जा रहे हैं.असल में  गुलामी पर प्रतिबंध लगाने के लिए कठोर कानून बनाने की जरूरत  है. गुलामी खत्म करना नैतिक, राजनीतिक, तार्किक और आर्थिक रूप से मायने रखता है।


जून शुरू हुआ- बुरी खबर लेकर- सेस लागू,सर्विस टैक्स फिर बढ़ा



आम आदमी की जुबान पर आजकल देश के आर्थिक हालात पर सवाल है-देश का बजट मार्च में बनता है और इसमें जो बढौत्तरी घटोत्री होती है वह उसमें दर्शा दिया जाता है लेकिन इन्हे लागू करने के लिये कम से कम एक दो महीने का इंतजार होता है इस दौरान कीमतो में इतना इजाफा हो जाता है कि एक आम आदमी की कमर टूट जाती है वह चाहे यात्रा के मामले में हो या रसोई के मामले में  अथवा ड्राइंग रूम में रखे टेलीफोन के मामले में सभी का किराया, भाड़ा या टैक्स इतना बढ़ा दिया जाता है कि आदमी का मानसिक हालात बिगडऩे  लगता हैं.  रेलवे व आम बजट की घोषणा के बाद से अब तक प्राय: हर वस्तुओं के भावो में भारी इजाफा हुआ है. वेट -सर्विस टैक्स के नाम पर इतनी  बढौत्तरी शुरू के दौरान की गई कि लोग सामान लेने में डरने लगे चूंकि उनकी कमाई का आधा हिस्सा तो इसी में निकल जाता है. लोग यात्रा करने में भी डरने लगे कि इससे उनके रहन सहन का मासिक बजट बिगड़ जायेगा. सरकार ने सुविधाएं बढ़ाने के नाम पर रेल किरायें में बढौत्तरी पीछे के दरवाजे से कर दी. सुविधाएं...जिसके नाम पर मंहगाई बढ़ाई जा रही है,का कोई अता पता नहीं लोग वैसे ही लटककर सफर कर रहे हैं छतो पर यात्रा हो रही है.महिलाएं पूर्णत: असुरक्षित है, लोग अपनी रक्षा स्वंय करों के आधार पर ट्रेन में घक्के खाते हुए चढ़ रहे हैं. ट्रेन का खाना जहां घटिया है वहीं ट्रेनों में आज भी चूहे दौड़ रहे है. यह तो ट्रेन और बसों का हाल है जिसमें कोई प्रचारी सुधार के अलावा कोई जमीनी सुधार नहीं दिख रहा वहीं बाजार  का हाल सबसे बुरा है जहां रसोई की हर वस्तु मंहगी है रोटी से लेकर दाल, सब्जी और अन्य सभी वस्तुए भारी मंहगाई के दौर से लोगों को सुलभ हो रही है. बचपन से एक कहावत सुनते आए हैं- दो जून की रोटी मिल जाए, यही बहुत है. दो जून अर्थात सुबह-शाम की रोटी लेकिन आज एक जून से हमारी यही 2 जून की रोटी महंगी हो गई है. आज से सभी सेवाओं पर आधा फीसदी कृषि कल्याण सेस लागू हो गया,इससे सर्विस टैक्स अर्थात सेवा कर 14.5प्रतिशत से बढ़कर 15प्रतिशत हो गया. आम उपभोक्ता वस्तुओं- मोबाइल, डीटीएच, बिजली, पानी आदि का यूटिलिटी बिल, रेस्टॉरेंट में खाना, रेल-हवाई टिकट, बैंकिंग, बीमा आदि सेवाएं फिर महंगी हो जाएगी.ऐसा लगता है कि मंहगाई हमारा छाया की तरह पीछा कर रही है.नई सरकार से मंहगाई पर लगाम कसने की जितनी उम्मीद की गई थी वह अब लोगो को कचोटने लगा है.मोदी सरकार ने बजट के दौरान 0.50प्रतिशत कृषि कल्याण सेस लाने का ऐलान किया था,इसके जरिए वो कृषि और किसानों की स्कीम्स के लिए 5 हजार करोड़ रुपए जुटाना चाहती है कई लोगों की  जेब हल्की कर निकलने से किसानों का कितना भला होगा?और आम आदमी इसके बीच कितना पिसेगा यह भी एक  प्रश्न बन गया है.सरकार के इस कदम से शादी-ब्याह महंगे होंगे. बैंक ड्राफ्ट, फंड ट्रांसफर, एसएमएस अलर्ट, फिल्म देखना, पॉर्लर सर्विस, स्पा, सैलून जैसी सेवाएं महंगी हो जाएंगी। सर्विस टैक्स के 18 प्रतिशत  तक बढने की संभावना व्यक्त की गई है.- सर्विस टैक्स किस तेजी से बढा है इसका अदंाज इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 1 साल के दौरान इसमें 2.64प्रतिशत तक का इजाफा हुआ. 1 साल में तमाम सेस से 1.16 लाख करोड़ रुपए कमाइ जहां सरकार कर रही है वहीं सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल में घट बढ़ का फायदा भी अपने खाते में कर जनता को कोईफायदा नहीं दिया. पिछले साल जनता को देने वाले  पेट्रोल-डीजल का पेसा जो करीब 21,054 करोड़ रूपये होता है उसमेें से एक पैसा भी जनता को राहत के तौर पर नहीं दिया उसे सरकार ने अपने खजाने में डाल दिया जबकि सरकार के लोगों ने अपने रहन सहन और अपव्यय के तरीके में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया. अब पेट्रोल-डीजल में बढौत्तरी का भी सिलसिला शुरू हो गया.एक दो महीने के भीतर ही दो बढौत्तरी हो चुकी है. आगे आने वाले समय में इसमें और बढौत्तरी हो जाये तो आश्च्रर्य नहीं करना चाहिये. वास्तविकता यह है कि आम आदमी पर सालाना 25प्रतिशत  की दर से सर्विस टैक्स में बढौत्तरी हो रही है. एक जून से 10 लाख से ज्यादा की कार पर एक प्रतिशत लग्जरी टैक्स लग जायेगा. कैश खरीदी पर एक प्रतिशत  टीसीएस एक जून से दो लाख से अधिक कीमत का माल या सेवा की नकद खरीद पर संबंधित व्यापारी आपसे बिल अमाउंट पर एक प्रतिशत टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (टीसीएस) जमा करवाएगा।




जवानों की तत्परता से ही पुलगांव में बड़ा डेमेज टला!



पुलगांव में देश के सबसे बड़े आयुध डिपो में लगी आग की जांच के लिए हालाकि अब एसआईटी गठित हो गई है और इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ तौर पर कहा जा सकेगा कि घटना केैसे घटित हुई.लेकिन महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सेना से जुड़े लोग ही यह कह संदेह व्यक्त कर रहे हैं कि इस कांड के लिये किसी साजिश से भी इंकार नहीं कर सकते. इस भीषण अग्रिकांड में हमारे आयुध कारखाने को तो भारी नुकसान पहुंचाया  है साथ ही जांबाज अफसरों की भी इस दुर्घटना में मौत हुई है. जवानों ने एक बार फिर जांबाजी का परिचय दिया है, खुद आग के शोलों में समा गए लेकिन पूरे हथियार (आयुध) डिपो को तबाह होने से बचा लिया. यार्ड में आग लगने के बाद सेना के अधिकारी और जवान तुरंत सतर्क हो गए थे. यह आग शोला न बन जाए इसलिए उस पर काबू पाने के लिए पहले दो अधिकारियों समेत जवानों की पहली टीम ने मोर्चा संभाला था लेकिन, आग बुझाने के दौरान ही धमाके शुरू हो गए और यह टीम गोला बारूद के धमाकों में समा गया. इस भीषण अग्निकांड के पीछे सुरक्षा की दृष्टि से हुई लापरवाही को अनदेखा नहीं किया जा सकता। 7000 एकड़ में फैला यह डिपो संभवत: एशिया के सबसे बड़े आयुध डिपो में से एक है जहां ढेर सारा बारूद, हथियार और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का भंडारण होता है. सेना के ऐसे संवदेनशील स्थानों पर भी अगर आग की ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं तो वहां के सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रश्नों के घेरे में आती है. मुम्बई-दिल्ली रेलमार्ग पर पुलगांव हालाकि एक छोटा सा स्टेशन है इसके आसपास देश का इतना बड़ा आयुध संग्रह है यह भी बहुत कम लोगोंं को पता ह. इस आयुध डिपो से ही युद्ध की स्थिति में जवानों को हथियारों की सप्लाई होती है. हालांकि, सेना की मुस्तैदी से इस आग पर काबू पा लिया गया मगर इस अग्निकांड में सेना के दो बड़े अफसर, एक जवान व 13 दमकल कर्मी शहीद हो गए. इन जांबाजों के कारण ही आग की लपटें दूसरे शैडों तक नहीं पहुंच पायीं. आयुध डिपों में आग लगाने की ऐसी घटना पहली नहीं है.अतीत में भी आग की ऐसी घटनाएं जान व माल के नुकसान की वजह बनी हैं. सन् 2000 में भरतपुर में भी इसी तरह की आग लगी थी, जिससे देश को 393 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. पश्चिम बंगाल स्थित पानगढ़ के आयुध डिपो में तो आग से लगभग 332 मीट्रिक टन बारूद स्वाहा हो गया था फिर अनन्तनाग स्थित खांडरू ऑर्डिनेंस डिपो की भीषण आग को कौन भुला सकता है जहां 19 लोग मारे गये थे और 100 के करीब घायल हो गये थे,आर्थिक नुकसान हुआ, सो अलग.लगता है हमने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा! इसीलिए इनकी ऐसी पुनरावृत्ति हो रही है जिस पर सरकार के रक्षा मंत्रालय को गहराई से सोचना होगा तथा सुरक्षा के ठोस उपाय करने होंगे,जो गोला-बारूद हमारी सुरक्षा के लिए है वही हमारे जवानों की मौत का कारण बन रहे है.  देश में सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन सेना को हथियार, गोला-बारूद सप्लाई करने वाले आयुध डिपो तक आधुनिकीकरण की यह सोच नहीं पहुंच पाई है इन डिपोस में आग बुझाने के यंत्र पुराने ढर्रे के हैं वैसे ही पुराने शैड तथा कई साल पहले वाले सुरक्षा मानक हैं, इस दुर्घटना के बाद इस समय सबसे बड़ा सवाल  यह उठ रहा है कि क्या देश के इस सबसे बड़े आयुध डिपो में भीषण आग को महज एक दुर्घटना मानकर हल्के से लेना चाहिये? वह भी तब जब हमारेे आसपास दुश्मनों और मीरजाफरों की पूरी टीम मौजूद हो? हाल के महीनों में ही पठानकोट एयर बेस में आतंकियों ने घुसकर तबाही मचाई थी. यहां न केवल हमारे जांबाज अफसर व जवान शहीद हुए थे बल्कि हमारे एयरबेस को भी काफी नुकसान हुआ था.इसमें जो तथ्य सामने आये वह यही इंगित करते हैं कि कुछ लोगों की मिलीभगत से इस पूरे हमले को अंजाम दिया गया था ऐसे में इस प्रकार  की  संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता. आग फैलती तो भयानक तबाही होती। दस हजार एकड़ में फैले हथियार डिपो में एक बंकर से दूसरे बंकर की दूरी सौ से डेढ़ सौ मीटर है। बंकरों के बीच ज्यादा दूरी होने के कारण भारी दुर्घटना टल गई.इसमें हमारे  जवानों व अफसरों की भूमिका की जितनी  तारीफ की जाये कम है.



और कितने जवाहरबाग मौजूद हैं देश में?




पहले भिंडरावाले,फिर आशराम बापू फिर रामपाल और अब रामवृक्ष यादव.....इसके अलावा माओवाद और आंतक का चेहरा.. तस्कर, अंडर वल्ड़ और गुण्डे असामाजिक तत्व.....इसके बाद भी और न जाने कितने-कितने लोग? हमारी धरती के टुकड़े करने के षडय़ंत्र में लगे हैं देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों कौ क्यों प्राप्त है राजनीतिक व ब्यूरोक्रेटस का समर्थन.? यह मथुरा का जवाहरबाग हो या छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ या बोडोलैण्ड- इतने दिनों से जो षडय़ंत्र पुलिस व  सरकार की नाक के नीचे चलता रहा उसे क्यों छोटे पौधे से एक बड़े विकराल वृक्ष के रूप में पनपने दिया?  एक छोटा आदमी जुर्म करता है तो उसे कई पुलिसवाले पीट पीटकर अदमरा कर देते हैं लेकिन देश के खिलाफ आवाज उठाने, हथियार जमा करने, आपत्तिजनक भाषण देने वालों को पनपने दिया जाता है और जब यह बड़ा खतरनाक रूप ले लेता है तो जिम्मेदार लोग सारा तमाशा देखते हैे तथा बहादुर पुलिस जवानों को बलि का बकरा बनाकर मैदान  में उतार दिया जाता है. आतंक के इस गढ़ को रौंधते- रौंधते पुलिस के योग्य अफसरों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा. मथुरा के जवाहर बाग में आंतक की एक बड़ी फौज दो साल से तैयार होती रही किन्तु अब जब इस टीम ने अपना असली रूप दिखाया तो जिम्मेदार खाखी वर्दी का बयान आ रहा है कि हमें हथियारों के बारे में तो पता था मगर सोचा नहीं था कि वो हमला कर देंगे-इस  जिम्मेदार अफसर से किसी ने यह नहीं  पूछा कि जब आपकों मालूम था कि यहां हथियारों का संग्रह हो रहा है तो आपने कार्यवाही क्यों नहीं कराई?क्यों आप कोर्ट  के आदेश का इंतजार करते रह?े.यह तो हमारे न्याय प्रणाली की  सतर्कता है कि उसने समय रहते देश में उत्पन्न हो रही बड़ी समस्या को तत्काल निपटाने का संज्ञान लिया वरना इस घटना में न जाने और भी कितने लोग मारे जाते? जो रिपोर्ट जवाहरबाग की  घटना के बाद सामने आ रही है वह चौकाने वाली है. इस कांड के विलन रामवृक्ष यादव की अपनी सेना, जेल और कड़े कानून  थे : जवाहर पार्क से बरामद दस्तावेजों में पता चलता है कि कैसे 260 एकड़ क्षेत्र में  एक गणराज्य चलाया जा रहा था, जहां अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान पुलिस और करीब 3,000 कब्जेधारियों के बीच हुए भीषण संघर्ष में 24 लोगों की जान चली गई. दस्तावेज बताते हैं कि स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह के तहत अतिक्रमणकारियों का नेतृत्व करने वाले शख्स ने कैंप के निवासियों को मारने की योजना बना रखी थी, ताकि पूरा इल्जाम पुलिस पर लगे, यहां तक की उसने गोला-बारूद की खरीद तक की थी. रामवृक्ष यादव के कैंप में उसकी एक निजी सेना थी, इकाइयों में विभाजित थी, जिनका रोजाना सुबह और शाम रोल कॉल का आयोजन किया जाता था अर्थात भारत गणराज्य में अधिकारिक तौर पर स्थापित आर्मी के अलावा या कहे उससे लडऩे के लिये एक अन्य आर्मी... कैंप में मौजूद करीब 3,000 लोगों को देख, ऐसा लगता मानो इन्हें यहां रहने के लिए मजबूर किया गया. हर निवासी का एक रिकॉर्ड  नंबर उनके रिहायशी पते, फोन नंबर, तस्वीर और अन्य सभी जानकारियां सावधानिया इस बात को इंगित करती हे कि यह कोई छोटा  मोटा मामला नहीं बल्कि देश की संपूर्ण व्यवस्था को झकजोर कर देने वाला एक सुनियोजित षडयंत्र था.  दस्तावेजों से यह भी  साफ है कि लोगों को कैंप से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। कैंप से बाहर जाने वालों को एग्जिट और एंट्री पास दिए जाते थे।बाहर जाने वालों को वापसी के लिए रिश्तेदारों या परिचितों को बतौर ज़मानत यहां लाना होता था.सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह खेमा भी कहीं माओवादियों से तो नहीं मिला हुआ है? ेचूंकि इसमें कुछ लोग छत्तीसगढ़ के भी  मिेले हैंं्.पुलिस यह तो मान रही है कि यह एक साधारण धार्मिक अतिवाद नहीं है,.