रविवार, 29 मई 2016

Mere bhai bahan

Mera parivar

कच्चा तेल सस्ता, कंपनिया माला- माल, जनता बेहाल!




देश की आर्थिक स्थिति में उतार चढ़़ाव का एक बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल हैै. इसके भाव बढे नहीं कि बाजार में चढ़ाव शुरू हो जाता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि एक बार डीजल पेट्रोल के भाव बढऩे के बाद वस्तुओं के भावों में जो वृद्वि होती है वह फिर नीचे नहीं उतरती. कहने का मतलब बढाने वाले बढ़ा देते हैं उन्हें उसका फायदा उन्हेें होता रहता है पिसता है वह गरीब प मध्यमवर्गीय जिसकी जेब से पैसा कटता है.सरकार का कोई नियंत्रण इस मामले में नहीं होने की वजह से ही ऐसा होता है.होना तो यह चाहिये कि हर किस्म की वस्तुओं पर सरकार अपनी निगरानी रखे और यह पता लगाती रहे कि जब पेट्रोल डीजल के भाव ऊपर-नीचे होते हंै तब बाजार की क्या प्रतिक्रिया होती है- ऊपर होने पर तो भाव ऊपर चढ़ा दिये जाते हैं लेकिन नीचे आते हैं तो कोई प्रतिक्रिया बाजार में नहीं होती अर्थात बढा हुआ कारोबार ही चलता रहता है.अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गिरते तेल की कीमतों की वजह से पिछले दो वर्षो में तेल विपणन करने वाली कंपनियों को जहां रिकार्ड मुनाफा हो रहा है, वहीं वे घरेलू बाजार में डीजल और पेट्रोल की कीमतें कम कर जनता को फायदा नहीं पहुंचा रही हैं-इस संबन्ध में उनका कहना है कि इन ईंधनों पर केन्द्र और राज्य सरकारों ने कर बढ़ा दिया.केन्द्र ने एक्साइज ड्यूटी  का डंडा अडा रखा है तो राज्य वेट से मुनाफा अपने खाते में कर रही है. जनता को तेल के भावों में कटौती का कोई फायदा नहीं हो रहा. देश में तेल विपणन करने वाली सबसे बड़ी कंपनी इंडियन ऑयल कारपोरेशन (आईओसी) ने हाल ही दावा किया है कि  कंपनी को वर्ष 2015-16 के दौरान शुद्ध लाभ 10,399 करोड़ रुपये रहा जो कि अभी तक का सर्वाधिक मुनाफा है, इससे एक साल पहले कंपनी को 5,273 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। इस साल रिकार्ड तोड़ मुनाफे की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी, खर्च में कटौती, बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन पाना आदि कारण बताया जा रहा है लेकिन जनता को इस फायदे का क्या लाभ? सरकारी तेल कंपनी हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) का बीते वर्ष  शुद्ध लाभ 3,863 करोड़ रुपये रहा, जो कि एक  वर्ष पहले की इसी अवधि के मुकाबले 41 फीसदी ज्यादा है. एक वर्ष पहले उसका शुद्घ लाभ 2,733.26 करोड़ रुपये रहा था. पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतें कम क्यों नहीं हुईं? इसके तीन कारक बताये जा रहे हैं- पहला, यहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय मूल्य के आधार पर तय होती हैं. दूसरा कि कच्चे तेल की परिवहन लागत पहले जितनी ही है. तीसरा  कच्चे तेल की कीमत घटने के बाद केन्द्र और राज्य सरकारों ने इन ईंधनों पर कर की दरों में वृद्धि कर दी है.फायदे में आई कंपनी उत्साही है और वे नई योजनाओं को अंजाम देने की फिराक में है. याने कारोबारी आगे बढ़ रहे हैं और आम लोग पीछे हैं,उन्हें कोई फायदा किसी स्तर पर  दूर दूर तक नहीं दिख रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में एचपीसीएल का सिलेंडर बॉटलिंग प्लांट लगेगा इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के गोंडा में भी एक ऐसा ही प्लांट लगाने की तैयारी हो रही है. एचपीसीएल नेे रसोई गैस सिलेंडर की बोटलिंग के छह नए कारखाने लगाने का निर्णय लिया है. इनमें से दो प्लांट उत्तर प्रदेश के वाराणसी और गोंडा में होगा, इसके अलावा पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर के पास पानागढ़, भोपाल, पातालगंगा और पटना में एक -एक प्लंाट लगाया जाएगा. उम्मीद की जा रही  है कि अगले साल तक इन प्लांटों का निर्माण हो जाएगा, सवाल अब भी बना हुआ है कि कंपनियां तो हर स्थिति में भारी फायदा उठा रही है लेकिन जनता को कब तक इंतजार करना पड़ेगा. उसे त्वरित या तत्काल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटत का फायदा क्यों नहीं पहुंच रहा. योजनाएं तो बनती रहती है बनेंगी भी मगर लोगों को जब तक उसका तत्काल  फायदा नहीं होगा इन दीर्घकालीन योजनाओं का कोई मायने नहीं रखता चूंकि समय के साथ आबादी भी बढ़ रही है और इस आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करना भी कोई कठिन खेल नहीं हैं. अत: जो फायदा हो रहा है उसका विभाजन योजनाओं के साथ साथ जनता के बीच भी होना चाहिये.  


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शनिवार, 28 मई 2016

माननीयो की सेलरी दो गुनी करने की सिफारिश पर पीएम का वीटो!




ससंद में भले ही हर दिन किसी ेन किसी मसले पर हंगामा हो लेकिन जब माननीयों के अपने हित की बात आती  है तो सब एक मत हो जाते हैं -यही हो रहा है सासंदों के वेतन के मामले में-सांसद चाहते हैं कि उनकी सैलरी और अलाउंस में  दो गुना अर्थात 100 प्रतिशत का इजाफा कर दिया जाये. एक पार्लियामेंट्री कमेटी ने इसकी सिफारिश भी कर दी लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता के दर्द को समझा है तथा उन्होनें इसकी प्रक्रिया का विरोध किया है उनके अनुसार माननीयों को अपनी सैलरी पैकेज के बारे में खुद फैसला नहीं करना चाहिए वे चाहते हैं कि इसके लिये एक नया रास्ता देखा जाये. मोदी ने कहा है कि कोई और बॉडी तय करे...उनके अनुसार सांसदों की सैलरी का फैसला पे कमीशन या उस जैसी कोई और बॉडी करे, जो वक्त के हिसाब से इसमें बढ़ोतरी करती रहे। मोदी का सुझाव है कि सांसदों की सैलरी को प्रेसिडेंट, वाइस प्रेसिडेंट या कैबिनेट सेक्रेटरी जैसी पोस्ट की सैलरी में होने वाली बढ़ोतरी से लिंक कर देना चाहिए- पीएम के मुताबिक, सांसद इस पर खुद फैसला ना करें, बल्कि इन टॉप पोस्ट्स पर बैठे लोगों की सैलरी बढ़ाने का जब कभी कोई पे कमीशन फैसला करे, वही कमीशन सांसदों की सैलरी पर भी गौर करे.अभी सासंदो की सेलरी का फैसला सांसदों की ही एक कमेटी करती है स्वाभाविक है कि ऐसी कमेटी का निर्णय पहले से ही तय होता है-कौन नहीं चाहेगा कि उनकी सेलरी न बढ़े और जब अपने ही हाथ में उस्तरा है तो जैसा चाहे बना लो कोई फर्क नहीं होता. इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ. ज्यादातर सांसदों का मानना है कि खर्च और महंगाई बढऩे के कारण सैलरी बढ़ाने की जरूरत है- पिछले दिनों राज्यसभा में सपा मेंबर नरेश अग्रवाल ने यह मुद्दा उठाया था. कुछ माननीयों का कहना है कि उनकी सैलरी कम से कम कैबिनेट सेक्रेटरी से ज्यादा हो. कुछ की मांग है कि इसे दोगुना किया जाए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मामले की नजाकत को समझकर ही इस निर्णय पर अपना ऐतराज जताया है. माननीयों की सेलरी, एलाउंस आदि बढ़ाने  के लिये  जो ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी बनाई गई थी उसके चेयरमैन गोरखपुर से बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ हैं- उन्होंने केंद्र को इस मुद्दे पर सुझाव दिया था जिसे  फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास मंजूरी हेतु भेजा गया. यह कमेटी न केवल सांसदों की सैलरी, बल्कि उनके फोन बिल, ट्रेवलिंग, डेली अलाउंस, मेडिकल फैसेलिटीज जैसे खर्चों को लेकर भी चर्चा करती है. - पार्लियामेंट्री कमेटी ने माननीयोंं की सैलरी 50 हजार से एक लाख रुपए हर महीने करने की सिफारिश की है- कॉन्स्टिट्यून्सी अलांउस भी 45 हजार से 90 हजार करने की बात कही गई है. अगर ये सभी सिफारिशें मान ली जाती हैं तो सांसदों का कम्पनसेशन पैकेज एक लाख चालीस हजार रुपए महीने से बढ़कर दोगुना यानी 2 लाख 80 हजार रुपए हर महीने हो जाएगा.- कमेटी ने पेंशन में भी 75 फीसदी की बढ़ोतरी का सुझाव दिया है.-ये भी सिफारिश है कि एक तय वक्त के बाद सैलरी का रिवीजन किया जाए- ज्वाइंट कमेटी ने भले ही सैलरी बढ़ाने को लेकर रिपोर्ट दी है लेकिन अभी तक इस बारे में पीएमओ में कोई चर्चा नहीं हुई है- पीएमओ और फाइनेंस डिपार्टमेंट ने इस बारे में अभी कोई बात नहीं की है।- पिछली बार सांसदों की सैलरी 2010 में बढ़ाई गई थी.सिर्फ पांच साल में अगर दो गुनी सेलरी बढ़ा दी जाये तो अगले चुनावों  में नौकरी के लिये दौडऩे वाले लाखों बेरोजगारों की भीड़ वहां से हटकर पार्टियों की  टिकिट पाने की होड़ में लाइन पर खड़ी हो जायेगी इसलिये माननीयों को अपने वेतन में इस तरह की बढौत्तरी  की मांग  से बचना चाहिये.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सुझाव में दम है जब उन्होंने दखल अंदाजी की है तो निश्च्ति है कि अब जो भी निर्णय होगा बड़े सोचसमझकर और जनता के हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जायेगा.

स्वास्थ्य की तरह अन्य विभागों के रिक्त पदों पर भी तो नियुक्ति हो सकती है!



गांवों मे  झोला छाप डाक्टरों से  मुक्ति की दिशा में हाल ही एक ठेासे कदम मुख्यमत्री डाक्टर रमन सिंह ने उठाया उसके बाद से अब ऐसी संभावना बन गई है कि गांवो में लोगों को बेहतर इलाज प्राप्त हो सकेगा लेकिन एक प्रशन अब भी बना हुआ है कि शहरों की ओर भागम दौड के चलते क्या चिकित्सक गांवों में पांव जमाकर अपनी सेवा दे सकेंगे? प्रदेश सरकार ने ग्रामीण और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को पूरा करने के लिये यह कदम उठाया है कि बगैर साक्षात्कार के ही डॉक्टरों की नियुक्ति करने का आदेश जारी किया. स्वास्थ्य विभाग ने प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने 200 नियमित डॉक्टरों की भर्ती के लिए विज्ञापन भी निकाला और इन पदों के लिए 800 आवेदन आए. इन आवेदनों का परीक्षण जब पूरा हुआ तो 609 आवेदनों को सही पाया गया और मुख्यमंत्री ने सभी पात्र डॉक्टरों को बगैर साक्षात्कार के सीधे नियुक्त करने का निर्देश दे दिया।.पूरे छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों के 539 पद रिक्त है जिन्हें शासन को भरना था लेकिन मुख्यमंत्री के इस आदेश के बाद 609 डॉक्टरों की प्रदेश में अब शीघ्र ही नियुक्ति हो जाएगी. इस आदेश से स्वास्थ्य विभाग की परेशानी एक झटके में सुलझ गई!सरकार चाहे तो क्या अन्य विभागों विशेषकर शिक्षा विभाग में इसी तरह  कमी को भी पूरा नहीं कर सकती?आज ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायधीश ने एक इंटरव्यू मे कहा है कि पूरे देश में नब्बे हजार जजों के पद रिक्त पड़े हैं. केन्द्र सरकार चाहे तो यह पद भी एक झटके में पूरे देश के इंटेलीजेंट स्कालर छात्रों के आवेदप मंगाकर भर सकती है लेकिन इन सबके लिये इच्छा शक्ति की जरूरत है. जहां तक छत्तीसगढ़  के शासकीय स्कूलों में शिक्षकों की कमी का सवाल  हे इसका अंदाज इसी से लगा सकते हैं कि  छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा 21 अप्रैल को 12वीं का परीक्षा परिणाम  घोषित किया गया जिसमें प्रदेश के मात्र 73.4 फीसदी छात्र-छात्राएं ही उत्तीर्ण हुए हैं वहीं 10वीं बोर्ड की   परीक्षा का परिणाम 55 फीसदी रहा.यह प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों की कमी के कारण है. प्रदेश के शासकीय स्कूलों का परीक्षा परिणाम बेहद निराशाजनक रहा वही निजी स्कूलों का परीक्षा परिणाम शासकीय स्कूलों की अपेक्षा शत-प्रतिशत देखा गया. सरकार इससे कितनी निराश है इसका अंदाज इसी से लगता है कि शिक्षा मंत्री केदार कश्यप व सचिव सुब्रत साहू को आनन फानन में शासकीय स्कूलों के प्राचार्यों की बैठक लेनी पड़ी व  जमकर फटकार भी लगानी पड़ी.मंत्री ने  चेतावनी दे डाली कि  स्कूलों के परीक्षा परिणाम ऐसे आए तो प्राचार्य पर कड़ी कार्रवाई होगी। बैठक में निराश प्राचार्यों ने स्कूलों में लंबे समय से शिक्षकों की कमी का रोना रोकर मंत्री को अवगत कराया अब सवाल यह भी उ ठ रहा है कि ऐसी चेतावनी का असर स्कूल क्या होग. उन्हें पढ़ाई से ज्यादा परिणाम की चिंता रहेगी कि कैेसे भी  ज्यादा से ज्यादा बच्चों को पास कर अपनी चमड़ी कैसे भी बचायें. प्राचार्य परीक्षकों से कहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को केसे भी पास करें चाहे वह बच्चा इस लायक है या नहीं? जिस तरह स्वास्थ्य विभाग में  बगैर साक्षात्कार व बिना कोई परीक्षा लिए डॉक्टरों की नियुक्ति आदेश दिया उसी तरह प्रदेश में डीएड, बीएड में बैठे डिप्लोमाधारी को पात्र घोषित कर भर्ती विज्ञापन निकालकर उसके आवेदनों की जांच कर सीधे नियुक्ति नहीं दी जा सकती? देश में शासकीय नौकरियों के लिए योग्यता का मापदंड निर्धारित किया गया है। डॉक्टर बनने के लिए एमबीबीएस, अधिवक्ता के लिए एलएलबी, इंजीनियर के लिए बीई, बीटेक होना सुनिश्चित किया गया है तो दो-दो वर्षों तक शासकीय संस्थानों में शिक्षक बनने प्रशिक्षण कर चुके प्रशिक्षकों की नियुक्ति  भी तत्काल  दी जा सकती है. दो-दो वर्षों तक प्रशिक्षण के पश्चात भी प्रदेश सरकार टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) का मापदंड क्यों निर्धारित करके रखी है. प्रदेश सरकार पिछले कई वर्षों से शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करके स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति करते आ रहा हैं जिसमे बिना प्रशिक्षण लिए उम्मीदवार कोचिंग के माध्यम से अच्छे अंक लाकर शिक्षक पसत्रता परीक्षा पास तो हो जाते हैं, लेकिन शिक्षक बनकर जब स्कूल पहुंचते है तो अध्यन-अध्यापन का सही तरीका देखने को नहीं मिलता और स्कूलों की पढ़ाई ढर्रे में चलती रहती है, परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद फिर शिक्षा मंत्री को प्राचार्यों की क्लास लेनी पड़ती है। आखिर मंत्री को प्राचार्यों की क्लास लेने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? प्रदेश में शिक्षा मंत्री लगातार सभी जिलों का दौरा कर रहे हैं और सिर्फ शासकीय स्कूलों में पढ़ाई का स्तर अच्छा रहे और परीक्षा परिणाम बेहतर आए इसके लिए बैठक ले रहे हैं शासकीय स्कूलों का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत रहे यह स्कूूलों की पढ़ाई व पढऩे  व न पढऩे वाले छात्रों पर निर्भर है. शिक्षक अच्छे से पड़ाये और छात्र अच्छे से पढ़े ताो सभी स्कूल का परिणाम शत प्रतिशत होगा मगर क्या सरकारी स्कूलों में ेऐसा होता है? डॉक्टरों की तरह शिक्षकों की कमी का समाधान एक आदेश पर हो सकता है इसी तरह अन्य विभागों में भी कमी को पूरा किया जा सकता है और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जा सकता है।

यह दो साल... अभी तो ट्रेलर था, आगे देखे क्या होता है...!



दो साल पहले केंद्र में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तब यह उम्मीद की जा रही थी कि देश की अर्थ व्यवस्था जल्द ही पटरी पर आ जाएगी,महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा, काला धन वापस आ जायेगा-कई बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा लेकिन चाहकर भी सरकार कई प्रमुख बदलाव लाने में असफल रही, अपने कार्यकाल के दो वर्षो  में सरकार न तो वस्तु सेवा कर (जी.एस.टी.) बिल संसद में ला सकी और न ही भूमि अधिग्रहण बिल पास करा सकी. संसद में नाकाम होने पर भूमि अधिग्रहण बिल को केंद्र सरकार ने राज्यों के हवाले कर दिया लेकिन उसका फायदा जो उद्योगों और उद्यमियों को मिलना चाहिए था, नहीं मिल रहा.एस.ई.जैड. के कई प्रोजैक्ट जमीन नहीं मिलने की वजह से अटके पड़े हैं. सरकार की भी तमाम योजनाएं जमीन न मिल पाने से जमीन पर नहीं उतर पा रही हैं. प्रधानमंत्री की अति महत्वाकांक्षी योजना 'मेक इन इंडियाÓ तक ठीक ढंग से नहीं चल पा रहीै. आर्थिक क्षेत्र में बदलाव के लिए जी.एस.टी. को सबसे अहम बताया जा रहा है लेकिन सरकार इस पर तमाम राज्यों के साथ एकराय नहीं बना पाई और संसद में भी विपक्ष को साधने में नाकाम रही है, जिसके चलते यह बिल अब तक संसद के पटल तक भी नहीं पहुंच सका है.जी.एस.टी. पास नहीं होने से उद्योग और कारोबारी दुनिया में एक संशय की स्थिति बनी हुई है.देश की अर्थव्यवस्था अभी भी पटरी पर नहीं आ पा रही है. वर्ष 2016-17 के बजट में केंद्र सरकार ने 7.6 फीसदी जी.डी.पी. ग्रोथ, 1.1 फीसदी कृषि उत्पादन में वृद्धि, 7.3 फीसदी औद्योगिक, 9.2 फीसदी सर्विस सैक्टर में बढ़ौतरी की उम्मीद की है.फैक्ट्रियों और विभिन्न उद्योगों में काम कर रहे मजदूरों, श्रमिकों को बेहतर वेतन, पैंंशन और सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने को केंद्र सरकार श्रम कानून को बेहतर बनाना चाहती है. केंद्र सरकार की ओर से पिछले दो साल में शुरू की गई कई योजनाएं अभी जमीन पर आनी बाकी हैं हां कुछ योजनाओं को अच्छी सफलता मिल रही है जिनमें प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्वच्छ भारत योजना और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी.बी.टी.) प्रमुख हैं जबकि प्रधानमंत्री का अति महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया कार्यक्रम अभी भी अपेक्षित स्वरूप नहीं ले पा रहा है,यही हाल आवासीय योजना और स्मार्ट सिटी का है.  देशभर से शौचालय निर्माण के लिए करीब 60 लाख आवेदन आए 24 लाख आवेदन पर काम किया जा रहा है अब तक देशभर में 13 लाख से ज्यादा शौचालय निर्माण कराए जा चुके हैं इसके अलावा सरकार एक लाख से ज्यादा सामुदायिक शौचालयों का भी निर्माण करवा रही है यूनिक आईडैंटिफिकेशन नंबर (आधार) को मोदी सरकार ने वित्त विधेयक बनाकर  इसे कानूनी रूप दे दिया इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ को भी आधार से जोड़ दिया.हर रोज 10 से 15 गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है.केंद्र सरकार की करीब 42 योजनाओं से मिलने वाले लाभ और सबसिडी को इस योजना के तहत अभ्यर्थी के खाते में सीधे भेजने की व्यवस्था दी गई है, मेक इन इंडिया के तहत पिछले दो साल के भीतर विदेशी निवेश में 44 फीसदी का इजाफा हुआ है जो करीब 63 बिलियन डॉलर पहुंच चुका है.प्रधानमंत्री आवास योजना, डिजिटल इंडिया पिछले साल 1 जुलाई को लांच हुईै, ्रआवासीय सुविधा के साथ ही दफ्तर, स्कूल, चिकित्सालय समेत बाकी सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों,परिवहन की विशेष व्यवस्था के साथ ही हर वक्त बिजली मुहैया रहे, स्मार्ट सिटी योजना के तहत देश के 22 शहरों का चयन पहले फेज ओैर  13 शहरों का चयन  दूसरे फेज में किया गया लेकिन अभी यह प्रारंभिक स्टेज पर ही है. जनधन योजना का मकसद सामान्य से सामान्य व्यक्ति को बैकिंग सुविधा से जोडऩा और सरकारी लाभ सीधे उनके खाते में मुहैया कराना है. पिछले साल जुलाई तक के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में 17 करोड़ से भी ज्यादा बैंक अकाऊंट प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खोले जा चुके थे. एक हफ्ते में एक करोड़ 80 लाख से ज्यादा बैंक खातें खोले जाने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड भारत सरकार के नाम दर्ज है.उपलब्धियां है तो असफलताएं भी हैं जिसे फिलहाल तो मजबूरी कहकर टाला जा सकता है.



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नेपाल अच्छा मित्र था, वह ड्रेगन की चाल में कैसे फंसा....?




 यह एक विड़म्बना ही है कि हमारे आसपास कोई हमारा अच्छा और भरोसेमंद दोस्त नहीं है. हम नेपाल को अपना अच्छा पडौसी समझते थे लेकिन जो दूरियां उससे हाल के महीनों में बड़ी है वह हमें चिंतित करती है. चीन, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका सब हमारें पडौसी देश है लेकिन आज की स्थिति में हम किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकते. भारत और नेपाल के बीच संबंधों की शुरूआत 1950 में नेपाल के तत्कालीन शासकों के साथ भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि द्वारा हुई थी जिसके अंतर्गत दोनों देशों के बीच पारस्परिक व्यापार और प्रतिरक्षा संबंधों को परिभाषित किया गया था, इसमें कहा गया था कि, ''कोई भी सरकार किसी विदेशी आक्रामक द्वारा एक-दूसरे की प्रतिरक्षा को पैदा किया जाने वाला खतरा बर्दाश्त नहीं करेगी और दोनों ही देशों के बीच संबंधों में कटुता पैदा करने वाले कारणों के बारे में एक-दूसरे को सूचित करेगी।ÓÓ समझौते के बाद दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत हुए थे तथा भारत ने नेपालियों को अपने देश में भारतीयों के समान ही शैक्षिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में प्राथमिकता वाला दर्जा देने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की थी जिस पर भारत आज भी कायम है.कुछ समय तक तो दोनों देशों के बीच सब ठीक-ठाक चल रहा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में नेपाल की यात्रा की और अप्रैल 2015 में नेपाल के भीषण भूकंप में भारत ने सक्रिय सहायता भी की. इसके बाद  दोनों देशों के संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंचे थे परंतु नवम्बर 2015 में नेपाल द्वारा अपना नया संविधान लागू करने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव व कटुता की शुरूआत हो गई.भारत-नेपाल सीमा पर अवरोध पैदा हुए जिससे नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रुक गई और चीन समर्थक तत्वों ने इसका लाभ उठाते हुए भारत विरोधी भावनाओं को भड़काना शुरू कर दिया. इस बीच नेपाल ने भारत पर दबाव बनाने के लिए चीनी कार्ड खेल दिया और बीजिंग ने भी नेपाल को जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति करके नेपाल के दिल में जगह बना ली.चीन से हाथ मिलानें के बाद हमारे संबन्ध उनसे ठीक रहेंगे इसकी क ल्पना भी नहीं की जा सकती. नेपाल के लोगों में भारत विरोधी भावनाएं मजबूत हुई हैं जिनका इस्तेमाल प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए किया है. ओली पद ग्रहण के बाद भारत यात्रा की प्रचलित प्रथा तोड़ कर पहले चीन यात्रा के इच्छुक थे परंतु हमारे यहां से चौतरफा दबाव पडऩे के बाद उन्हें अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा और वह चीन से पहले भारत यात्रा पर आने के बाद 27 मार्च को चीन की 7 दिनों की यात्रा पर गए और वहां चीन के साथ अनेक समझौते किए. इसी बीच एक नाटकीय घटनाक्रम में  नेपाल सरकार ने अपनी राष्टï्रपति विद्या देवी भंडारी की भारत यात्रा अचानक रद्द कर दी और फिर भारत में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को भी वापस बुला लिया.अब यह स्थिति बन गई है कि हम नेपाल सरकार के किस आचरण पर विश्वास करे. यू.पी.ए. सरकार के अधिकांश कार्यकाल के दौरान नेपाल ने नई दिल्ली में अपना राजदूत नहीं भेजा था. नेपाल की भारत विरोधी भावनाओं का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारत ने वहां काठमांडू में ट्रोमा सैंटर का निर्माण करवाया था जो 2010 में बन कर तैयार भी हो गया परंतु नेपाल सरकार ने सिर्फ इसलिए इसका अधिग्रहण करने से इन्कार कर दिया क्योंकि भारत सरकार इसका नाम 'भारत-नेपाल मैत्री ट्रोमा सैंटरÓ जैसा कोई नाम रखना चाहती थी, जो नेपाल को मंजूर नहीं था और 4 वर्ष बाद नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने तक नेपाल ने इसका अधिग्रहण नहीं किया और वह भी तब जब भारत ने इसके नामकरण से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया.राजग के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ओली के बीच संबंधों के नई करवट लेने की आशा पैदा हुई थी लेकिन बाद के घटनाक्रम ने पासा पलट दिया. शायद नेपाल में आए भूकंप से हुई क्षति की भरपाई करने में असफल रहने पर ओली भारत विरोधी पैंतरा अपना रहे हैं.नेपाल  अभी चीन की कठपुतली बनकर कूटनीतिक चाल चल रहा है जो भारत-नेपाल संबन्धों को और बिगाडऩे की ही भूमिका अदा कर रहा है.

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एनआईए की साख पर दाग! निष्पक्ष एजेंसी कौन सी?





मुंबई में २६/११ के आतंकवादी हमलों के बाद तत्कालीन सरकार ने आतंकवादी हमला मामलों की जाँच के लिए राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) बनाई थी, तब यह माना  गया कि यह एजेंसी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करेगी लेकिन शायद ऐसा हुआ नहीं. इस एजेंसी ने जितने मामलों की जाँच अपने हाथ में ली उसमें से ज्यादातर में जाँच इतनी लंबी खिंच गई कि आरोपियों को न केवल राहत मिली बल्की इसके जाल से निकलने का मौका भी मिल गया. २००८ में महाराष्ट्र के मालेगाँव मामले में आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट ने इसकी पुष्टि कर दी. पहले उसने समझौता ट्रेन बम धमाके के मामले में कर्नल पुरोहित को क्लीन चिट दी और अब साध्वी प्रज्ञा को मालेगाँव बम धमाका मामले में कोई सबूत नहीं होने के चलते क्लीन चिट दे दी. इससे पहले एनआईए ने जब समझौता बम धमाका और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए विस्फोट मामले में आरोपी स्वामी असीमानंद को जमानत के खिलाफ अपील नहीं करने की बात कही थी तभी लगने लगा था दकि अगला नंबर प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित का होगा. भगवाधारियों की जब गिरफ्तारी हुई तब यह मामला दुनिया के अखबारों की सुर्खियोंं में था तब आतंकवाद का एक नया स्वरूप दुनिया के सामने आया था, अब क्लीन चिट की खबर ने भी दुनिया को सुॢखयों में रखा है..   साध्वी प्रज्ञा के जेल से बाहर आने के बाद जो माहौल बनेगा निश्चित ही वह हिंदूवादी ताकतों को एक जुट करेगा. देश की प्रतिष्ठित जाँच एजेंसी एनआइए के लिये यह सोचने का विषय है कि सिर्फ गवाहों या चश्मदीदों के बयानों के आधार पर ही मामले को इतना गंभीर क्यों बना दिया जाता है जो बाद में गवाहों के कथित रूप से पलटने के बाद कमजोर हो जाता है- इससे जाँच एजेंसी की छवि भी प्रभावित होती है. एक के बाद एक धमाकों के चलते एनआईए ने  ताबड़तोड़ मामजे दर्ज किये लेकिन आरोपपत्र दायर करने में बहुत ज्यादा समय लगा जिसके चलते मामले के आरोपी राहत पाने में सफल रहे. यह बात भी सामने आ रही है कि  एनआईए की ओर से दूसरे आरोपपत्र में पूर्व के रुख से पलटना निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है. कांग्रेस सरकार के समय सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की उपमा दी गयी थी उसी प्रकार एनआईए के लिए कांग्रेस ने नमो इंवेस्टिगेटिव एजेंसी की उपमा दी है.विपक्ष यह भी आरोप लगा रहा  है कि केंद्र में सरकार बदलने के बाद संघ परिवार की शह पर सरकार ने साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को बचाने का काम किया है.जब साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार किया गया था तब भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. कुछ समय पहले एनआईए की एक वकील ने भी एक अधिकारी पर यह आरोप लगाया था कि उसने उन्हें आरोपियों के प्रति नरमी बरतने को कहा था. एनआईए के आरोपपत्र में इस बात का भी उल्लेख है कि इस मामले की जाँच में महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे ने गड़बड़ की थी और कर्नल पुरोहित के खिलाफ कई आरोप गलत थे.आरोपपत्र में कथित रूप से एनआईए ने इस बात के सबूत होने का दावा किया है कि कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी के समय एटीएस ने ही उनके घर पर आरडीएक्स रखा था. रिपोर्टों के मुताबिक महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारियों ने एनआईए के इस दावे का प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि यदि एनआईए का कहना सही है तो क्यों उसने कर्नल पुरोहित को क्लीन चिट नहीं दी? यहां यह बता दे कि एटीएस के प्रमुख दिवंगत हेमंत करकरे ही वह पहले शख्स थे जिसने भगवा  आतंकवाद से जुड़े मामले में गिरफ्तारी की थी उस समय विपक्ष में रही भाजपा ने करकरे की निष्पक्षता पर सवाल उठाये थे और कहा था कि वह कांग्रेस के करीब हैं और उसके इशारे पर ही यह कार्रवाई कर रहे हैं. भाजपा के इन आरोपों को तब और भी बल मिला था जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह दावा किया था कि मुंबई हमले से कुछ घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन कर बताया था कि उनको हिंदुत्ववादी ताकतों से खतरा था. कुछ मुस्लिम संगठनों ने अब इस मामले में कानूनी रास्ता अख्तियार करने का निर्णय किया है और संदेह जताया है कि एक वर्ग विशेष से जुड़े लोगों को राहत पहुँचाने का काम किया जा रहा है। इस मामले में संघ परिवार की काफी सधी हुई प्रतिक्रिया आई है जिसने सिर्फ इतना कहा है,हमारे पास कुछ भी नया कहने को नहीं है हमने शुरू में ही कहा था कि मामले में इन लोगों को गलत तरीके से फंसाया गया है और अब हमारी बात सही साबित हुई है।




अत्याचारों पर यह चुप्पी कैसी? क्यों रिएक्ट करना छोड़ दिया लोगों ने!






 हममें असंवैधनहीनता कितनी घर कर गइ्र्र है हम किसी खास घटना पर रिएक्ट ही नहीं करते, मूक दर्शक बने सब देखते हैं और मूक ही बने रहते हैं.वास्तविकता यही है कि हमारे आसपास कोई भी बड़ी से बड़ी घटनाहो जाये, हम ऐसा शो करते हैं कि हमने कुछ न देखा ,न सुना-हां- बनते जरूर हैं कि अरें! हमें तो पता ही नहीं चला.फिल्मों ने इस मामले में जरूर जारूकता दिखाई है,कई फिल्मे ऐसी घटनाओं पर बनी है लेकिन समाज अब तक ऐसी घटनाओं पर रिएक्ट करने लायक नहीं हो पाया, चाहे वह सड़क पर कोई व्यक्ति किसी के वार से कराह रहा हो या किसी  महिला के साथ सरे आम छेड़छाड़ की जा रही हो या कोई किसी को लूटकर भाग रहा हो-अथवा कोई ट्रेन में किसी असहाय के साथ दुव्र्यवहार कर रहा हो-हम इतना साहस भी नहीं कर पाते कि ऐसे विरोधी ताकतो का मुकाबला करें.हमारे समाज व कानून ने मनुष्य को कुछ ऐसा बना दिया कि वह चाहते हुए भी किसी प्रकार का एक्शन नहीं ले पाता. यू पी, बिहार हो या देश का अन्य कोई भी भाग, इस प्रकार की निष्क्रियता  से समाज भरा पड़ा है. लोगों में इतनी हिम्मत भी नहीं रह जाती कि अपने या अपने सगे संबन्धी पर हुए अन्याय का प्रतिरोध कर सकें. आपको याद होगा बिहार में जिस बच्चेे को एक बाहुबली के बेटे ने सरे आम गोली मार दी थी उसके पिता की प्रतिक्रिया थी कि -हमें मालूम है आगे क्या होगा-कुछ दिन वह जेल में आराम  से रहेंगे फिर छूटकर आ जायेगें.पीडि़त  घटना के बाद अगर किसी के खिलाफ बयान देता है तो वह अपनी सुरक्षा के प्रति भी चिंतित हो जाता है जब निर्णय देने वाले जज तक की जिंदगी ऐसे मामलों में खतरे में पड़ रही हो तो आम आदमी के बारे में सोचा जा सकता है कि वह किस हालात में मुकदमों को फेस करता होगा. सामने वाला जब छूटकर आयेगा तो उससे बदला लेगा.यह भावना हर परिवार में भर जाती है. ऐसी संभावनाओं के कारण हर  मदद करने का इच्छूुक यह सोचते हुए पीछे हट जाता हैे कि कौन इस लफड़े में पड़े? पूरे देश में इस प्रकार की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है, इसी का परिणाम है कि पडौस में भी कोई सहायता के लिये पुकारे तो भी लोग वहां पहुंचकर किसी पचड़े में पडने से बचने की कोशिश करते हैं लेकिन अगर कानून सख्त होता और प्रत्यक्ष गवाह को संरक्षण मिलता तो संभव है कि कई समस्याओं का हल मिल जाता. आज स्थिति यह है कि किसी का दु:ख सुनकर खुद दुखी हो जाते हैं, कभी डंडा और झंडा लेकर प्रदर्शन करने के लिए भी खड़े हो जाते हैं,अपने आपको दिखाने की कोशिश भी करते हैं कि हम सब एक सभ्य समाज का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में जब ऐसी घटना हमारे आसपास होती है तो शायद हम आगे आकर उसे रोकने की कोशिश नहीं करते उस वक्त पीडि़त का दु:ख हमको दिखाई नहीं देता है। केरल के एर्नाकुलम जिले के पेरूम्बवूर में एक कानून की विद्यार्थी की हत्या हो गई, एक छात्रा जो आगे जाकर वकील बनना चाहती थी, अपनी मां के सपनों को साकार करना चाहती थी  लेकिन उसका सपना पूरा नहीं हो पाया-चीखती रही  चिल्लाती रही पडौसियों ने सुना भी लेकिन कोई मदद के लिये नहीं पहुंचा अंतत: क्रूरता की बलि चढ़ गई.पुलिस कुछ समय के बाद वहां पहुंचती है लेकिन अपने मोबाइल की लाइट से घटनास्थल की रिकॉर्डिंग करके ले जाती है-जरा सोचिए अगर यह घटना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के साथ होती तो क्या पुलिस इस तरह का व्यवहार करती? शायद नहीं। एक तरफ जहां समाज, प्रशासन का यह रवैया है तो वहीं पुलिस और डाक्टर भी ऐसा कुछ कर डालते हैं जो इन दो पेशों पर से लोगों का विश्वास उठा देता है.असामाजिक तत्वों के व्यवहार पर पुलिस कम्पलेंट के बावजूद पुलिस का किसी  प्रकार कोई एक्शन न लेना जहां व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास उठाता है वहीं चिकित्सकों की लापरवाही भी दबंगों  से इन दोनों मेहकमों की साठ गांठ की पोल खोलता है. केरल के इस निम्र्रम हत्याकांड में पोस्ट मार्टम किसी बड़े डाक्टर द्वारा करे जाने की जगह पोस्ट ग्रेजुएट छात्र से कराया गया.प्राय:हर मामले को राजनीतिक नजरिये से देखने का असर यह हो रहा है कि लोगों का विश्वास अब पुलिस और कानून पर से उठने लगा है. किसी बड़े के लिये कोई कानून और छोटे के लिये दूसरा कानून.





डाक्टरी 'व्यवसायÓ पर सुको का जबर्दस्त प्रहार!



भारतीय मेडिकल कौंसिल को सन् 2010 मेंं इसलिये बंद करना पड़ा था चूंकि इसके अध्यक्ष घूस लेते पकड़े गये थे. अब सर्वोच्च न्यायालय ने डॉक्टरी के धंधे पर जबर्दस्त प्रहार किया है. उसने अपने एक फैसले में कहा है कि यह पवित्र कार्य अब 'धंधाÓ बन गया है, जिसका लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है। कौंसिल डॉक्टरी शिक्षा के मानदंड कायम करती है, डॉक्टरों की डिग्रियां तय करती है और देश की चिकित्सा-व्यवस्था पर नियंत्रण रखती है. कौंसिल ने पिछले पांच-छह वर्षों में भी अपने काम में कोई सुधार नहीं किया है- एक संसदीय कमेटी की जांच रिपोर्ट में भी कौंसिल की कारस्तानियों की कड़ी भर्त्सना की गई रपट इस साल मार्च में आई उसके पहले 2014 में एक विशेषज्ञ समिति ने भी इस कौंसिल की काफी खिंचाई की थी लेकिन सरकार ने कोई ठोस-कार्रवाई नहीं की मजबूर होकर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मेडिकल कौंसिल को लगभग भंग कर दिया है ,पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में उसने एक कमेटी बना दी है, जो तब तक काम करती रहेगी, जब तक कि कोई नया मेडिकल आयोग नहीं बन जाता.सर्वोच्च न्यायालय ने इस कौंसिल के अधिकार छीनने का जो फैसला दिया है, उसमें साफ-साफ कहा है कि देश में मेडिकल की पढ़ाई का स्तर एकदम गिर गया है और यह कौंसिल भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है.देश में 400 मेडिकल कॉलेज हैं,उनमें से कितने ही ऐसे हैं, जिनमें से पढ़कर निकले हुए डॉक्टर प्राथमिक चिकित्सा करने लायक भी नहीं होते.ऐसा इसीलिए होता है कि मेडिकल कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की भर्ती का पैमाना एक-जैसा नहीं होता. हर कॉलेज और हर राज्य अपने-अपने ढंग से भर्ती-परीक्षाएं लेता है और अपनी सुविधा के मुताबिक प्रवेश दे देता है. इन भर्तियों में अब लाखों नहीं, करोड़ों रु. का लेन-देन होता है. छात्र की योग्यता का कोई मतलब नहीं पैसा ही सबकुछ है जो छात्र डॉक्टर बनने के लिए एक-दो करोड़ रु. 'केपिटेशनÓ के तौर पर देगा, वह डॉक्टर बनने पर पहला काम क्या करेगा? वह मरीजों से पैसा वसूलेगा,डॉक्टरी का धंधा फिर मूलत: सेवा का नहीं, वसूली का रह जाता है.डॉक्टरी की पढ़ाई यदि सस्ती और स्वभाषा में हो तो देश के ग्रामीण, गरीब और वंचितों को भी डाक्टर बनने का मौका मिलेगा और डॉक्टरों की कमी भी खत्म हो जाएगी. जिन छात्रों को 'केपिटेशन फीसÓ नहीं देनी पड़ती, जो अपनी योग्यता से भर्ती होते हैं, उनकी परेशानी भी कम नहीं है. उन्हें एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए 80 लाख से एक करोड़ रु. तक फीस देनी पड़ती है. क्या मध्यम वर्ग का कोई भारतीय अपने बेटे या बेटी की मेडिकल की पढ़ाई पर हर माह डेढ़-दो लाख रु. खर्च कर सकता है? जो योग्य और ईमानदार डॉक्टर होते हैं, वे भी रोगियों को ठगने के लिए मजबूर हो जाते हैं, वे अपनी फीस दिखावटी तौर पर कम या ठीक-ठाक रखते हैं लेकिन वे दो लोगों से अपनी सांठ-गांठ बना लेते हैं- एक तो मेडिकल टेस्ट करने वाली प्रयोगशालाओं से और दूसरे, दवा निर्माता कंपनियों से! पहले वे मरीजों को अनाप-शनाप टेस्ट लिख देते हैं. जांच के नाम पर मरीज़ों से सैकड़ों-हजारों रु. ठग लिये जाते हैं,उनमें से डॉक्टर साहब का कमीशन उनके पास अपने आप पहुंच जाता है फिर डॉक्टर साहब मरीज़ के लिए दवाइयों पर दवाइयां पेल देते हैं. छोटे से मर्ज के लिए मंहगी से मंहगी दवाई! लंबे समय तक लेते रहने की हिदायत के साथ! दवा-कंपनी और दवा-विक्रेता की पौ-बारह होती रहती है. उनके यहां से भी कमीशन अपने आप चला आता है.भोले मरीजों को इस भूल-भुलैया का सुराग तक नहीं लग पाता, वे समझते हैं, डॉक्टर साहब कितने अच्छे हैं!
डॉक्टरी की पढ़ाई में 'केपिटेशन फीसÓ को तो अदालत ने अपराध घोषित कर ही दिया है लेकिन खास पढ़ाई में भी बुनियादी सुधार की जरूरत है- अदालत ने यह भी ठीक किया कि सारे भारत में मेडिकल की भर्ती परीक्षा को एकरूप कर दिया, अब अलग-अलग कॉलेजों और राज्यों में न सिर्फ एकरुपता आ जाएगी बल्कि भ्रष्टाचार भी घटेगा. पैसे लेकर कोई कालेज सीटें बेच नहीं सकेगा लेकिन यह नई पद्धति तभी सफल होगी, जबकि प्रश्न-पत्रों की गोपनीयता बनी रहे और परीक्षा-पुस्तिकाओं की जांच में धांधली न हो.

कार्यपालिका, विधायिका सुस्त हो तो न्यायपालिका दखल तो करेगी ही!




कार्यपालिका और विधायिका पर बहस एक आम बात है किन्तु हमारी मौजूदा संसदीय लोकतांत्रिक पद्धति के तीसरे खंबे न्याय पालिका पर बहस नगण्य है जितनी है वह प्रकृति में अकादमिक है और केवल सेवा निवृत्त न्यायाधीशों, वकीलों के संगठनों और गिने चुने राजनेताओं तक सीमित है. आमजन उससे बहुत दूर है, विगत कुछ समय से न्याय व्यवस्था पर खुली बहस की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई है.संसदीय लोकतंत्र में न्याय पालिका की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन उसकी कार्यप्रणाली में अनेक कमजोरियाँ और कमियाँ भी हैं जिन्हें दुरूस्त किया जाना आवश्यक है जिससे न्याय व्यवस्था की दक्षता को उन्नत बनाया जा सके.
कुछ लोग यह राय प्रकट करते हैं कि न्यायपालिका की आलोचना से न्यायव्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठ सकता है जो कि अत्यन्त खतरनाक स्थिति होगी किन्तु जनतांत्रिक मूल्य इस राय से सहमत होने की अनुमति प्रदान नहीं करते.किसी भी व्यवस्था की आलोचना के बिना उसकी कमियों, कमजोरियों और दोषों को दूर किया जाना संभव नहीं है और ये कमियां, कमजोरियां तथा दोष ही व्यवस्था में जन-विश्वास को समाप्त कर देते हैं.न्याय प्रणाली में जन विश्वास को केवल कमियों, कमजोरियों और दोषों को दूर करने और सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली के द्वारा ही अर्जित किया जा सकता है.वर्तमान में न्यायपालिका और विधायिका के बीच संबन्ध कुछ ठीक नजर नहीं आ रहे हैं. दोनों में टसल अब कई मुद्दो को लेकर हो गई है जबकि विधायिका में बैठे लोग लोकतंत्र की दुहाई देते हुए न्यायपालिका पर दोषारोपण कर रहे हैं. कोई कह रहा है कि जजों को अपना पेशा छोड़कर चुनाव मैदान में उतरना चाहिये तो कोई न्यायपालिका के बढ़ते दायरे से नाराज है. हाल के दिनों में न्यायपालिका के कथित निर्देशो को विधायिका अपने अधिकार क्षेत्र की बात कहकर न्यायपालिका पर उसके कार्यो में हस्तक्षेप की बात कह डाली.केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी न्यायपालिका के बढ़ते दायरे पर नाराजगी जताई है उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इमारत धीरे धीरे गिराई जा रही है। इससे पहले गडकरी ने भी तंज भरे लहज़े में जजों को इस्तीफा देकर चुनाव लडऩे की नसीहत दी थी. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कार्यपालिका और विधायिका में न्यायपालिका के बढ़ते दखल पर चिंता जताते हुए चेताया कि टैक्स और वित्तीय मामले भी अदालतों के हवाले नहीं किए जाने चाहिए. जेटली ने सूखे के लिए राहत कोष पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाए.सुप्रीम कोर्ट ने सूखे को लेकर राज्य सरकारों को फटकार लगाई थी और केंद्र को सूखे पर एसटीएफ बनाने का निर्देश दिया थर.अदालत के इस रवैये को सरकार अपने अधिकारों में दख़ल मान रही है. राज्य सभा में बजट पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री ने इसके दूरगामी परिणामों के बारे में आगाह किया. इस बहस के दौरान कांग्रेस की यह मांग थी कि जीएसटी मामले में अगर केंद्र और राज्य के बीच मामला फंसता है तो जज इस पर फैसला सुनाए, इस पर जेटली ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह लोकतंत्र पर एक तरह से हमला होगा.हाल के दिनों में तमाम मुद्दों पर पीआईएल के ज़रिए अदालती दखल बढ़ा है. दिल्ली के पर्यावरण का सवाल, कारों की बिक्री और टैक्सियां चलाने का सवाल और राज्यों में राष्ट्रपति शासन तक का सवाल अदालती गलियारों में निपटाया जाता रहा है। जब कांग्रेस ने जीएसटी विवाद निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत ट्राइब्युनल बनाने की मांग की तो जेटली ने इस पर भी चेतावनी दी. उनके अनुससार कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.जीएसटी मामले में विवाद को लेकर काउंसिल कह सकती है कि दो वरिष्ठ मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री मिलकर राजनीतिक तौर तरीके से इस मुद्दे को सुलझा सकते हैं। यह कानूनी मसला नहीं है कि कितना फीसदी बंगाल को जाए और कितना फीसदी हमारे पास रहे. दूसरी और बड़ी  विपक्षी पार्टी कांग्रेस  अदालत के सामने विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी करने से बचने की बात करती है, हालांकि संसद में कांग्रेस के सदस्यों को मेजे थपथपाते हुए भी देखा गए याने विधायिका अपने कथित अधिकार क्षेत्र में किसी  प्रकार का हस्तक्षेप बर्दाश्त करने कतई तैयार नहीं है. न्यायपालिका पर जनता का विश्वास है हमारी न्यायपालिका विश्व स्तर की है उसपर किसी को उंगली डठाने का अधिकार नहंीं चाहे वह विधायिका ही क्यों न हो. अगर जनता के काम को विधायिका और कार्यपालिका दोनों नजर अंदाज करें तो उसका कोई  तो रखवाला होना ही चाहिये.न्यायपालिका अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वाह कर रही है.

नशा ही दुर्घटनाओं की जड़ है,कठोर कदम जरूरी!



संपूर्ण विश्व में नशे में ड्रायंिवंग एक समस्या बनकर उभरी है. हाल के दिनों मे छत्तीसगढ़ में हुई दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया जाये तो अधिकांश का कारण नशा ही  हैै-या तो हम शराब और अन्य नशीली वस्तुओं पर पूरी तरह पाबदंी लगाये या फिर ऐसा करने वालों पर सतत निगरानी रख उन्हें दङ्क्षंडत करें.ऐसे लोग न स्वंय आत्म हत्या कर रहे हैं या फिर दूसरों की हत्या कर रहे हैं यहां तक कि सामूहिक हत्या भी!  ताजा  उदाहरण बलरामपुर का है जहां नशें में धुत्त बस ड्रायवर ने बाइक सवारों को बचाने के चक्कर में पुल से नीचे गिरा दिया. कम से कम सत्रह लोगों की यहां मौत हुई. इससे पूर्व भी ऐसी कई घटनाएं हुई  हैं जो अखबारों की सुर्खियां बनकर विलीन हो गई. दुर्घटनाओ के वैसे कई कारण है लेकिन पहला कारण ड्रायवर का नशे मे होना है जो एक विश्वव्यापी समस्या बनी हुई है. नशे में ड्राइविंग करने से अब तक कितने लोगों की जान जा चुकी है इसका कोई हिसाब नहीं है. हर पल कोई न कोई बड़ी दुर्घटना होती है तथा इसमे प्रमुख वजह ड्रायवर का नशे में गाड़ी चलाना है. देश के बड़े शहरों में ऐसी घटनाएं हर रोज़ देखने व सुनने  को मिल रही हैं। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ लगातार मुहिम चलाती रही है लेकिन, सख्त नियम-कानून के बावजूद लोग कानून की धज्जियां उड़ाने में देर नहीं लगाते और अपनी जान के साथ साथ दूसरों की जान भी खतरे में डाल देते हैं। हाल ही में सरकार द्वारा जारी किए गए एक आंकड़े में ये पाया गया है कि करीब 400 लोग हर रोज सड़क हादसे में अपनी जान गंवाते हैं। ये आंकड़ा वाकई दिल-दहलाने वाला है.हर रोज हो रहे इन हादसों में कई ऐसे मामले भी होते हैं जो शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से होते हैं।  शराब पीकर गाड़ी चलाना किस हद तक खतरनाक हो सकता है यह प्राय: सभी लोग  जानते हैं सरकार ने ऐसे लोगों से निपटने के कानून भी बनाए हैं किन्तु क्यों नहीं रूक रही है ऐसी दुर्घटनाएं? वास्तविकता यह है कि शराब में मौजूद अल्कोहल की वजह से इंसान अपने होश खो देता है ऐसे में शराब पिए हुए व्यक्ति का रिएक्शन टाइम धीमा हो जाता है जिसकी वजह से सड़क पर किसी खतरनाक परिस्थिति में ड्राइवर गाड़ी पर नियंत्रण नहीं रख पाता. शराब पीकर गाड़ी चलाने से आपको तो खतरा है ही, साथ में उन लोगों को भी खतरा है जो सड़क पर चल रहे हैं या गाड़ी चला रहे हैं. चिकित्सको का कहना है कि खून में अल्कोहल की मात्रा  ज्यादा पाई जाती है तो इससे आपकी आंखों की रोशनी पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.बॉडी का रिएक्शन टाइम धीमा हो जाता है.शराब पीकर गाड़ी चलाने के मामलों पर रोक लगाने के लिए भारत में कानून बनाये गये हंै। कानून के मुताबिक अगर किसी ड्राइवर के खून में अल्कोहल की मात्रा  तय सीमा से ज्यादा पाई गई तो उसे जेल हो सकती है या जुर्माना लगाया जा सकता है,पहली बार शराब पीकर गाड़ी चलाते पाये जाने पर ड्राइविंग लाइसेंस पर कोई खतरा नहीं है लेकिन, अगर ये हरकत लगातार जारी रही तो अगली बार पकड़े जाने पर ड्राइविंग लाइसेंस कैंसिल भी किया जा सकता है.दिल्ली में बात दूसरी है वहां नए नियम के मुताबिक अगर कोई शराब पीकर गाड़ी चलाते पकड़ा गया तो पहली बार में ही उसका ड्राइविंग लाइसेंस कैंसिल किया जा सकता है. छत्तीसगढ सरकार ने सन् 2015 में  नशें में गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ कई बंदिशों का ऐलान किया था जिनमें हाइवे से शराब दुकानों को हटाने और नशें में गाड़ी चलाने वालों पर कार्यवाही की बात कही गई थी.सरकार के फैसले कितने  कारगर हुए दसका अंदाज उन दुर्घटनाओं को देखकर लगाया जा सकता है जो लगातार घटित हो रही हैं.राज्य के सभी शहरों में सड़कों पर लगे खतरनाक होर्डिंग्स, राजमार्गों एवं मुख्य मार्गों की शराब दुकानों को हटाने, सड़कों पर वाहन खड़े करने वालों, तेज रफ्तार में और शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोगों पर कठोर कार्रवाई,सड़कों पर घूमने वाले जानवरों को पकडऩे का निर्णय सब आज तक क्रियान्वित  ही नहीं हो पाया.हाइवे पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिये संकेतक और जरूरी उपाय किये गये हैं लेकिन शराब खोरों से कैसे बचे इसपर कोई पहल का न होना यही सबसे बड़ी मुसीबत है.सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस के एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता में देश की सड़कों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सड़क सुरक्षा समिति का गठन किया है। यह समिति सड़कों पर लोगों की सुरक्षा के लिए केन्द्र और राज्य शासन द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के क्रियान्वयन पर नजर रखती है. समिति के निर्देशों के अनुरूप परिवहन विभाग के सचिव हर तीन महीने में राज्य द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदमों और की गई कार्रवाई की जानकारी समिति को देती है इसके बाद भी  देश में कहीं भी  नशे में गाड़ी चलाने और इससे होने  वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश नहीं लगा है

नक्सलियों से निपटने अब आयेगी महिला सीआरपीएफ!




नक्सली समस्या से निपटने  के लिये रोज नये नये प्रयोग हो रहे हैं लेकिन समस्या है कि हल होने की जगह उलझती ही जा रही है. आम आदमी की जुबान पर बस एक ही सवाल है कि आखिर क्या होगा इसका अंत? सरकारी तौर पर एक और जहां यह वादे किये जा रहे हैं कि बडे बड़े नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं तो वहीं नक्सली अपनी ठोस सक्रियता का दावा भी तुरन्त दिखा देते हैं.बड़े नक्सली हमले  के बाद सरकार समस्या से निपटने कई दावे करती है उसके बाद फिर कोई बड़ी वारदात होने  पर नये सिरे से पहल होती है. हाल के महीनों में सरकार की कार्यवाही में ड्रोन, हवाई पट्टी जैसी बाते सामने आई तो अब खबर आ रही है कि सरकार सारी  पुरानी परंपरा को तोड़कर देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ की 560 से ज्यादा महिला कमांडों को नक्सल प्रभावित इलाकों में भेजने की तैयारी कर रही है सरकार मानती है कि नक्सल समस्या देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है.नक्सलियों के बीच महिला नक्सली भी भारी तादात में मौजूद है और अब इन दोनों से लडऩे के लिये महिला सीआरपीएफ की मौजूदगी क्या गुल खिलायेगी यह आगे देखना महत्व रखता है. नक्सलियों के खिलाफ अभियान का हिस्सा बनने की इस सरकारी महत्वाकांक्षी योजना में शामिल होने के लिए 567 महिलाओं ने पिछले सप्ताह राजस्थान के अजमेर में अपना प्रशिक्षण पूरा किया. सीआरपीएफ की मंशा इस पूरे बैच को नक्सल प्रभावित इलाकों में 'कंपनी फॉर्मेशनÓ के तरीके से तैनात करने की है इसका अर्थ है कि एक समय में 100 जवानों की तैनाती होगी. छह मई को जिन महिलाओं ने अजमेर में प्रशिक्षण पूरा किया है, उन्हें नक्सल प्रभावित इलाकों में जिम्मेदारी सौंपने के उद्देश्य से प्रशिक्षित किया गया हैं, उन्हें सेवाकाल के प्रारंभिक सालों में ही सबसे कठिन अभियान की जिम्मेदारी सौंपी जा रही हैं शुरुआत में इन महिलाओं की एक कंपनी नक्सल इलाकों में तैनात की जाएगी. एक तरफ  सरकार गंभीर रूप से महिला सीआरपीएफ को उतारने की तैयारी  कर रही है वहीं  बस्तर में तैनात जवानों पर बस्तर की कतिपयय ग्रामीण  महिलाओं का गंभीर आरोप है कि उनके साथ दुव्र्यवहार किया जा रहा है.पुलिस के आला अफसर इसको यह कहका नकारते हैं कि पुराने मामलों को ही बार बार दोहराया जाता है. इधर सुरक्षाबलो पर यह भी आरोप लगा है कि वे गांव के लोगों को धमकाते हैं कि अगर नक्सलियों को खाना दोगे तो उनका घर जला देंग. छत्तीसगढ़ के तीन गांवों में सुरक्षा बलों के फर्जी मुठभेड़ करने और आदिवासी महिलाओं से सामूहिक बलात्कार की वारदात की खबरें आ चुकी है जिसपर कुछ कार्यकर्ताओं ने एक स्वतंत्र जांच पर आधारित रिपोर्ट जारी की थी.स्टेट ऑफ़ सीज़ नाम की यह रिपोर्ट वुमेन अगेन्स्ट सेक्सुअल वॉयलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन, कमेटी फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रैटिक राइट्स और कोऑर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रैटिक राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन की ओर से जारी की गई.पिछले दो महीनों में वकीलों ईशा खंडेलवाल, शालिनी गेरा समेत पत्रकार मालिनी सुब्रह्मण्यम और आंदोलनकारी बेला भाटिया ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ पुलिस और उनके समर्थन से काम कर रहे संगठनों की प्रताडऩा से तंग आकर उन्हें बस्तर छोडऩा पड़ा है.नक्सली समस्या से निपटने  फिलहाल सरकार के पास एक ही उपाय यहां दिखाई देता है दबाव, मुठभेड़ और आत्मसमर्पण- वार्ता की सारी  संभावनाएं दब चुकी है.हालाकि कई बार नक्सलियों से बातचीत करने और कोई समाधान निकालने की कोशिश की है लेकिन ऐसा हो  ही नही ंपाया है कि दोनों एक मंच पर आकर बात करें जबकि मुठभेड़,गोलीबारी और मारने मरने  का सिलसिला लगातार जारी है. साल 2015 में 162 मुठभेड़ों में 43 लोग मारे गए थे जबकि अक्तूबर 2015 से फरवरी 2016 में मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की संख्या 31 है. इस बात के पुख्ता प्रमाण है कि पुरूष नक्सलियों के साथ महिला नक्सली  भी वारदातों में शामिल रहती है वे मुठभेड और अन्य कई गंभीर किस्म की वारदातों में पुरूष नक्सलियों के साथ रहती है.कुछ दिन पहले सत्ताईस नक्सलियों के साथ आत्मसमर्पण करने वालों में भी तीन महिला नक्सली थी.कुछ मुठभेड़ों में कुख्यात महिला नक्सलियों को मार गिराया भी गया है इस परिप्रेक्ष्य में अब महिला सीआरपीएफ की भूमिका बस्तर में क्या होगी यह देखना दिलचस्प होगा.


प्रभु की ट्रेन सेवा-हाथी के दांत खाने के कुछ दिखाने के कुछ!




इसमें  दो मत नहीं कि रेलवे ने सतही तौर पर बहुत ऐसे काम किये हैं जो यात्रियों व जनता के बीच किसी न किसी रूप में चर्चित हैं किन्तु जो सुविधाएं दी जा रही है उसकी क्वालिटी कितनी ठीक है यह न रेलवे के लोग देख रहे हैं और न रेल  मंत्रालय और न ही रेलवे मिनिस्टर. एक थर्ड एसी की सीट पर दो तीन लोग आरएसी टिकिट पर सोते नजर आये तो इसे क्या कहना चाहिये? इसी प्रकार जो रेल मंत्रालय डिस्कवरी जैसे विश्व स्तरीय चैनल पर लाखों रूपये खर्च कर  खाना बनाने के तरीके को दिखाता है उसकी  हकीकत अगर लोग जान जाये तो शायद खाना खाना ही छोड़ दे. राजधानी जैसी  ट्रेन में जो खाना परोसा जा रहा है वह सिर्फ एक भूखे व्यक्ति को संतुष्ट कर सकता है, कि सी पर्यटक व दूरस्थ यात्रा करने वाला इसे या तो वापस कर दे या कूड़े में फेक दे. किसी प्रकार का टेस्टी खाना न परोसा जाता है ओर न मांगने पर दिया जाता है. भारी भरकम टिकिट लेकर यात्रा करने वाले यात्री सिर्फ इस गर्मी के मौसम में एसी की ठंडी  हवा का मजा ले सकते है उसके सिवा कोई अन्य सुविधाएं रेलवे से प्राप्त हो जाये इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिये. हां किराये के मामले में लगातार संशोधन हो रहे हैं चूंकि यह रेलवे के हित की बात हैं. रेलवे मंत्रालय ने हाल ही कुछ राहत टिकिटों के मामले में दी है जैसे एक ट्रेन में कन्फर्म नहीं हुआ टिकट, तो दूसरी में रिजर्वेशन का विकल्प... रेलवे ने आरक्षित श्रेणी में सफर करने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए सोमवार से हावड़ा, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और सिकंदराबाद को जोडऩे वाले पांच प्रमुख मार्गों में वैकल्पिक ट्रेन आरक्षण सेवा विकल्प का विस्तार किया है. रेलवे की विकल्प नाम की इस सुविधा के तहत यात्रियों द्वारा आरक्षित किए गए टिकट की पुष्टि (कन्फर्म) नहीं होने की स्थिति में उन्हें अन्य ट्रेन में आरक्षण का विकल्प मुहैया कराया जाएगा. इस सुविधा के तहत प्रतीक्षा सूची में शामिल यात्री अपने यात्रा टिकट की पुष्टि के लिए 'विकल्पÓ सेवा चुन सकते हैं.एक तरफ रेलवे  कई तरह की सुविधाओं का प्रचार प्रसार करता है वहीं यात्रियों में से अधिकांश को तो यह तक पता नहीं होता कि स्टेशन में ट्रेने कहां खड़ी है और उन्हें उस ट्रेन  में चढऩे के लिये स्टेशन में किस किस प्रकार के पापड़ बेलने पड़ेंगे. अक्सर बड़े बड़े शहरों में प्लेटफार्म दूर दूर बने हैं वहां तक दौड़ते भागते जब तक यात्री पहुंचता है तब तक टे्रेन या तो छूट चुकी होती है या फिर छूटने वाली. यात्रियों से कहा जाता है कि उन्हें विमान जैसी सुविधा दी जायेगी लेकिन जो ट्रेन में मिलनी वाली सुविधा अभी लोगों को नहीं मिल रही है तो विमान जैसी सुविधा की बात ही कु छ ओर है. बहरहाल टिकिट कन्फर्र्मे वाली विकल्प सेवा जो शुरू की गई है वह भी भेदभाव से भरपूर है. राजधानी, शताब्दी और दूरंतो ट्रेनों में सफर करने वालों के लिये यह सुविधा नहीं है. ऐसा क्यों किया जाता है? रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने  इस साल के रेल बजट में इस योजना की घोषणा की थी, इसलिए इस सेवा को शुरू किया गया यह सेवा केवल मेल, एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों में क्रियान्वित की जा रही है, जबकि राजधानी, शताब्दी और दूरंतो ट्रेनों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं होगी।यह मेहरबानी जरूर की गई ह ैकि यात्रियों से अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा इसके तहत विकल्प सेवा चुनने वाले यात्री वैकल्पिक आरक्षण मिलने के बाद अपनी यात्रा में संशोधन नहीं कर सकेंगे। जबकि इस सेवा के लिए यात्रियों से किसी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क वसूल नहीं किया जाएगा और न ही उन्हें दोनों ट्रेनों के किराये में अंतर वाली धनराशि वापस की जाएगी.ट्रेनो में सीनियर सिटीजन आज भी बुरे हालातों में हैं उनमें से कइयों को आज भी मिडिल और अपर बर्र्थ ही एलाट की जा रही है.


गुरुवार, 26 मई 2016

यह दो साल... अभी तो ट्रेलर था, आगे देखे क्या होता है...!



खे क्या होता है...!दो साल पहले केंद्र में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तब यह उम्मीद की जा रही थी कि देश की अर्थ व्यवस्था जल्द ही पटरी पर आ जाएगी,महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा, काला धन वापस आ जायेगा-कई बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा लेकिन चाहकर भी सरकार कई प्रमुख बदलाव लाने में असफल रही, अपने कार्यकाल के दो वर्षो  में सरकार न तो वस्तु सेवा कर (जी.एस.टी.) बिल संसद में ला सकी और न ही भूमि अधिग्रहण बिल पास करा सकी. संसद में नाकाम होने पर भूमि अधिग्रहण बिल को केंद्र सरकार ने राज्यों के हवाले कर दिया लेकिन उसका फायदा जो उद्योगों और उद्यमियों को मिलना चाहिए था, नहीं मिल रहा.एस.ई.जैड. के कई प्रोजैक्ट जमीन नहीं मिलने की वजह से अटके पड़े हैं. सरकार की भी तमाम योजनाएं जमीन न मिल पाने से जमीन पर नहीं उतर पा रही हैं. प्रधानमंत्री की अति महत्वाकांक्षी योजना 'मेक इन इंडियाÓ तक ठीक ढंग से नहीं चल पा रहीै. आर्थिक क्षेत्र में बदलाव के लिए जी.एस.टी. को सबसे अहम बताया जा रहा है लेकिन सरकार इस पर तमाम राज्यों के साथ एकराय नहीं बना पाई और संसद में भी विपक्ष को साधने में नाकाम रही है, जिसके चलते यह बिल अब तक संसद के पटल तक भी नहीं पहुंच सका है.जी.एस.टी. पास नहीं होने से उद्योग और कारोबारी दुनिया में एक संशय की स्थिति बनी हुई है.देश की अर्थव्यवस्था अभी भी पटरी पर नहीं आ पा रही है. वर्ष 2016-17 के बजट में केंद्र सरकार ने 7.6 फीसदी जी.डी.पी. ग्रोथ, 1.1 फीसदी कृषि उत्पादन में वृद्धि, 7.3 फीसदी औद्योगिक, 9.2 फीसदी सर्विस सैक्टर में बढ़ौतरी की उम्मीद की है.फैक्ट्रियों और विभिन्न उद्योगों में काम कर रहे मजदूरों, श्रमिकों को बेहतर वेतन, पैंंशन और सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने को केंद्र सरकार श्रम कानून को बेहतर बनाना चाहती है. केंद्र सरकार की ओर से पिछले दो साल में शुरू की गई कई योजनाएं अभी जमीन पर आनी बाकी हैं हां कुछ योजनाओं को अच्छी सफलता मिल रही है जिनमें प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्वच्छ भारत योजना और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी.बी.टी.) प्रमुख हैं जबकि प्रधानमंत्री का अति महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया कार्यक्रम अभी भी अपेक्षित स्वरूप नहीं ले पा रहा है,यही हाल आवासीय योजना और स्मार्ट सिटी का है.  देशभर से शौचालय निर्माण के लिए करीब 60 लाख आवेदन आए 24 लाख आवेदन पर काम किया जा रहा है अब तक देशभर में 13 लाख से ज्यादा शौचालय निर्माण कराए जा चुके हैं इसके अलावा सरकार एक लाख से ज्यादा सामुदायिक शौचालयों का भी निर्माण करवा रही है यूनिक आईडैंटिफिकेशन नंबर (आधार) को मोदी सरकार ने वित्त विधेयक बनाकर  इसे कानूनी रूप दे दिया इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ को भी आधार से जोड़ दिया.हर रोज 10 से 15 गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है.केंद्र सरकार की करीब 42 योजनाओं से मिलने वाले लाभ और सबसिडी को इस योजना के तहत अभ्यर्थी के खाते में सीधे भेजने की व्यवस्था दी गई है, मेक इन इंडिया के तहत पिछले दो साल के भीतर विदेशी निवेश में 44 फीसदी का इजाफा हुआ है जो करीब 63 बिलियन डॉलर पहुंच चुका है.प्रधानमंत्री आवास योजना, डिजिटल इंडिया पिछले साल 1 जुलाई को लांच हुईै, आवासीय सुविधा के साथ ही दफ्तर, स्कूल, चिकित्सालय समेत बाकी सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों,परिवहन की विशेष व्यवस्था के साथ ही हर वक्त बिजली मुहैया रहे, स्मार्ट सिटी योजना के तहत देश के 22 शहरों का चयन पहले फेज ओैर  13 शहरों का चयन  दूसरे फेज में किया गया लेकिन अभी यह प्रारंभिक स्टेज पर ही है. जनधन योजना का मकसद सामान्य से सामान्य व्यक्ति को बैकिंग सुविधा से जोडऩा और सरकारी लाभ सीधे उनके खाते में मुहैया कराना है. पिछले साल जुलाई तक के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में 17 करोड़ से भी ज्यादा बैंक अकाऊंट प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खोले जा चुके थे. एक हफ्ते में एक करोड़ 80 लाख से ज्यादा बैंक खातें खोले जाने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड भारत सरकार के नाम दर्ज है.उपलब्धियां है तो असफलताएं भी हैं जिसे फिलहाल तो मजबूरी कहकर टाला जा सकता है.



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वोटर की सोच में बदलाव, सबकों पूर्ण बहुमत पसंद.....






  समय के साथ- साथ अब देश के वोटरों की सोच में भी बदलाव आता जा रहा है. अब तक वोटर बिखरे हुए थे अब संगठित होने लगे हंैै.यह बात देश के पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद पूरी तरह स्पष्ट हो गया है. जनता अब किसी एक पार्टी पर विश्वास करेगी और किसी एक ही पार्टी को पूर्ण बहुमत से सत्तासीन भी करेगी। चुनाव परिणाम में यह भी स्पष्ट हो गया है कि जनता पहले से ज्यादा जागरूक और सोच समझकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रही है, वोटर चाहे वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी से ताल्लुख रखता हो किसी क्षेत्रिय पार्टी के चक्कर में फंसता नहीं  दिख रहा. लोक लुभावन नारे,लालच, मीठी चुपड़ी बाते व झूठे वादे करके सत्ता हासिल  करना अब एक कठिन होता  जा रहा हैै. पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में वोटर्स के जनाधार ने यह बात साफ कर दी है. 294 विधानसभा सीट वाले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को वोटर्स ने 211 सीट देकर पूर्ण बहुमत दिया है वहीं तमिलनाडू की 234 विधानसभा क्षेत्र वाली विघानसभा में जयललिता की अन्नाद्रमुख पार्टी को एकतरफा 134 सीट का जनाधार यह बता रहा है कि जो काम करेगा अब उसे वोट मिलेगा. इस बार असम का चुनाव परिणाम सबको चौका देने वाला रहा यहां जनता ने भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी दलों असम गण परिषद व  बोडो पीपुल्स फ्रंट को 126 में से 86 सीट देकर  पहली बार सत्ता सौंपी. राज्य में 15 वर्षों से सत्ता में काबिज कांग्रेस की तरूण गोगई  सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया. कांग्रेस को इस राज्य से न केवल सत्ता खोनी पड़ी बल्कि एक शर्मनाक स्थिति का भी सामना करना पड़ा. यही हाल केरल में हुआ जनता ने कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार को सत्ता से बेदखल करते हुए माकपा नीत वाम मोर्चा एलडीएफ को 140 सीटों में से 85 सीट देकर राज्य में अपने बल बूते सरकार बनाने का न्यौता दे दिया। चारों राज्यों की तुलना में सबसे कम 30 सीटों वाले केन्द्र शासित राज्य पाण्डुचेरी में जनता ने कांग्रेस गठबंधन द्रमुख को 17 सीटें दी है. इस तरह पांचों राज्यों में जनता ने एक ही पार्टी पर विश्वास करते हुए पूर्ण बहुमत दिया है. इस चुनाव में त्रिशंकु प्रणाली देखने को नहीं मिली और न ही सरकार बनाने के लिए सीटों के लिए लेन देन की नौबत आई.यहां यह उल्लेखनीय है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वहां के वोटर्स ने देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को नकार दिया और अंरविंद  केजरी वाल की नर्ई आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया था. आम आदमी पार्टी दोनों पार्टियों को पटकनी देकर आज सत्ता में काबिज हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतिश कुमार एवं उनके सहयोगी दलों को जनता ने भारी बहुमत देकर जीत दिलाई थी. लोकसभा चुनाव में भी यह नजारा देखने मिला था जब भारतीय जनतापार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया.  छत्तीसगढ़ में भी भाजपा अपने बलबूते  पूर्ण बहुमत पर आई. मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान ऐसे  कई राज्य हैं जहां जनता ने इस बार एक पार्टी व उसके सहयोगी दल पर विश्वास किया है. देश के कुछ राज्यों को छोड़ दे तो बाकी राज्यों में पूर्ण बहुमत की स्थिति रही है. इस चुनाव से यह भी स्पष्ट हो गया कि जिन राज्यों में क्षेत्रिय पार्टी मौजूद हैं उन राज्यों में देश की दोनों बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस को वहां की क्षेत्रिय पार्टियों के साथ गठबंधन के बिना सत्ता नहीं मिलेगी क्यों कि क्षेत्रिय पार्टी उस राज्य के हित में कार्य करती है, यह पाॢयां जनता के लिए कार्य करती है और जनता उस पार्टी पर ज्यादा भरोसा करती है देश की सभी छोटी बड़ी पार्टियों को इस बात को समझना होगा नहीं तो भविष्य में कांग्रेस पार्टी की जो हालत है उसी तरह के हालात से उन्हें भी  गुजरना होगा. क्या इन चुनाव परिणामों से पार्टियां कुछ सीख पाएंगे? चुनाव सुधार की दिशा में कदम उठाने वालों को भी इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि देश में बदलते माहौल में बार बार चुनाव न हो इसके लिये पूरे देश में एक ही बार में पांच साल के लिये सारे चुनाव एक साथ करायें ताकि जनता पर चुनाव खर्च का बोझ न पड़े और बार बार चुनाव के झंझट से भी लोग बच सकें.

सोमवार, 9 मई 2016

फांसी की सजा पर फिर सवाल,बस दुनिया के तेरह देशों में फांसी !




विश्व के मात्र तेरह देश इस समय जघन्य अपराध करने वालों को सजाएं मौत देती हैं,इनमें पाकिस्तान तीसरे नम्बर पर है कि न्तु यहां फांसी असल अपराधी की जगह ऐसे लोगों को देने का आरोप मानव अधिकार संगठनों ने लगाया है जो वास्तव में इसके पात्र नहीं है.2014 में फांसी देने वाले दस प्रमुख देशों में भारत का नाम था चूंकि 2014 में भारतीय अदालतों ने 64 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी अब पाकिस्तान मुजरिमों को फांसी पर लटकाने वाले देशों में तीसरे स्थान पर हो गया है. अंतरराष्ट्र्रीय मानवाधिकार संगठन  एमनेस्टी इंटरनेशनल पाकिस्तान में दी जाने वाली फांसियों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहता है कि पिछले साल पाकिस्तान में 324 लोगों को  फांसी दी गई इनमें ज्यादातर ऐसे अपराधी शामिल थे जिनका आतंकवाद से कोई वास्ता नहीं था.पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमले के बाद से 351 लोगों को पाकिस्तान में फांसी दी गई उनमें केवल 39 लोग ऐसे थे जो आतंकवाद से जुड़े थे या उनका संबंध आतंकी संगठनों से था,मानवाधिकार संगठन यह दावा कर रहा हैं कि पाकिस्तान में मानसिक रोगी, युवा अपराधी और ऐसे कैदी जिनपर अत्याचार किया गया या उन्हें पूरे रूप में न्याय नहीं मिल पाया वो फांसी पाने वालों में शामिल थे.दूसरी और भारत के बारे में फांसी पर सवाल उठा है-यहां फांसी की सजा पाने वालों में अधिकतर गरीब-कम पढ़े लिखे हैं -सेंटर ऑन द डेथ पेनाल्टी की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है जिसमें यह भी कहा गया है कि चौरासी प्रतिशत फांसी की सजा पानेे वालों का पहला अपराध था उसी के लिये  उन्हें फांसी पर लटकाया गया.भारत में जघन्य अपराध के लिए फांसी की सजा पाने वालों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में है, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर है वैसे आबादी के अनुपात में देखें तो देश की राजधानी दिल्ली पहले पायदान पर है. फांसी की सजा पाने वालों में 84 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार अपराध किया. इनमें अधिकतर गरीब और कम पढ़े लिखे हैं तथा उनकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं रही है। 20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में बंद फांसी की सजा पाए 373 कैदियों और उनके परिवारवालों से बातचीत के आधार पर तैयार रिपोर्ट में कई रहस्योद्घाटन हुए हैं जो यह बताते हैं कि फांसी की सजा पाए 74.1 फीसदी कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं, इनमें 76 फीसदी अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह से हैं.फांसी की सजा कितनी उचित है इस बात पर सवाल उठा है.फांसी  की सजा पाने वाला तो इस दुनिया से चले जाते है लेकिन भुगतता उसका परिवार है यह बात साफ हुई है कि इन कैदियों में 73 ऐसे थे जो अपने परिवार के लिये कमाने वाला एकमात्र सदस्य था, जबकि 59 परिवार में कमाने वाले मुख्य सदस्य थे.दुनिया के 13 देश ऐसे हैं जहां धर्म के नाम पर भी लोग फांसी पर लटकाये जाते हैं यहां ईशनिन्दा करने या धर्मपुस्तकों का अपमान पर भी सरेआम गोली मार दी जाती है, ईरान में ईशनिन्दा के अपराध में सरेआम क्रेन से लटका कर मार डाला जाता है, ये आदेश शरिया अदालतें जारी करती हैं ऐसी फांसी जनता की मौजूदगी में होती है ताकि लोगों में कानून के लिए डर बना रहे, इसी प्रकार पाकिस्तान में ईशनिन्दा पर सरेआम जलाकर मार डाला जाता है यहां पवित्र कुरान से साथ छेड़छाड़ पर पत्थरों से कुचल दिया जाता है मलेशिया में ईशनिन्दा और ईश्वर के खिलाफ अपशब्द बोलने वालों की खैर नहीं यहां धर्मपुस्तकों के साथ छेड़छाड़ भी खासा गुनाह है नाईजीनिया में ईश निंदा करने वाले को सरेआम गोलियों से भून दिया जाता है ताकि दूसरे लोग ईशनिन्दा से डरें ,सऊदी अरब में भी शरिया अदालतें चलती हैं यहां ईश निन्दा और कुरान से छेड़छाड पर सरेआम फांसी दी जाती है.मालदीव भी इसी श्रेणी में आता है यहां तो लोग भूलकर भी भगवान के खिलाफ कुछ नहीं कह सकते,कतर भी उन इस्लामिक देशों में शामिल है जहां ईशनिन्दा पर फांसी पर लटका दिया जाता है. समुद्री लुटेरों के चलते चर्चा में रहने वाले सोमालिया में भी ईशनिन्दा करने वाले को कानूनन सजा ए मौत का प्रावधान है. सूडान में खुदा का अपमान करने वाले या इस्लाम के खिलाफ बोलने वाले को पत्थर मारकर मार दिया जाता है, इसे संगसार कहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात में  ईशनिंदा के अलावा ईश प्रतीक जैसे कुरान के साथ छेड़छाड़ पर भी मार डाला जाता हैयमन में यहां मौत की सजा पाने वाले शख्स को सावर्जनिक स्थान पर उल्टा लिटाकर गोली मार दी जाती हैअफगानिस्तान में भी नास्तिक और ईश निन्दा करने वाले को सरेआम मौत की नींद सुला दिया जाता है मौरिशानिया में भी नास्तिकों को मौत की सजा दी जाती है।
















पैसा कमाने वाली बैकों की लचर सेवा-लचर एटीएम, लचर सुरक्षा!



देश की विशेषकर छत्तीसगढ़ में मौजूद राष्ट्रीयकृत बैंकें जनता का कितना भला करती हैं यह तो वे ही बता सकते हैं लेकिन हम जो आंखों से देखते हैं और महसूस करते हैं वह यही है कि यह बैंक अपने उपभोक्ताओं के प्रति खरा नहीं उतर रहे हैं- बैेंक ों को अपने हित व अपनी कमाई की ज्यादा चिंता है. उपभोक्ता जाये भाड़ में -हम तो अपनी चाल चलेंगे- के सिद्वान्त पर चल रहे हैंं जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है. यह तो किसी अच्छे इंसान  की उपज थी जिसने पैसा निकालने और भरने की मशीन बना दी वरना आज बैंक और  तानाशाह बैंकों के रूप में जाने जाते.आप में से कई लोगों छत्तीसगढ़ के एटीएमों से पाला पड़ा होगा और आपने उसकी कार्यप्रणाली पर कोसा भी होगा, ऐसे में से ही एक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एनआईटी के सामने लगा है एक एटीएम है और दूसरा डिपोजिट मशीन जो इतनी पुरानी व घटिया हो गई है कि इसे क बाड़ी भी न खरीदे-अक्सर इसको खराब है के कार्डबोर्ड से बंद कर दिया जाता है.यही हाल कचहरी ब्रांच में स्थापित पैसा जमा भरने की मशीन का है. एटीएम व सेविंग  मशीन दोनों अक्सर खराब रहती है.कचहरी  चौक जहां संपूर्ण छत्तीसगढ़ पैसा निकालने भरने उमड़ पडता है उसमें गार्ड सोते रहते हैं और मशीन  पर अक्सर बोर्ड लगा रहता है कि आप पडंरी कपड़ा मार्केट के मशीन की सेवा ले. यह उदाहरण है स्टेट बैंक द्वारा दी जाने वाली सेवा के बारे में जबकि इसी सप्ताह मंगलावार-बुधवार की दरम्यानी रात  सरगुजा जिले के बतौली स्थित एसबीआई की ब्रांच में चोरों ने धावा बोलकर करीब एक करोड़ की चोरी को अंजाम दिया. बैंक के पिछले हिस्से में चैनल गेट का ताला तोड़कर चोर भीतर घुसे और गैस कटर की मदद से तिजोरी को काटकर करीब 17 लाख रुपए नकद और गोल्ड लोन के एवज में रखे सवा तीन किलो सोने के जेवर चुरा ले गए.स्टेट बैॅंक में इतना रूपया होने के बाद भी सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था न होना बैंक प्रबंधन की लापरवाही को ही प्रदर्शित करता है. स्थानीय प्रशासन के बार बार कहने के बावजूद स्टेट बैंक सहित अन्य सभी बड़े बैंको का प्रबंधन ग्राहकों से अनाप शनाप राशि वसूलने  के बाद भी न सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करता है और न ही ग्राहक को संतुष्ट कर देने वाली सेवा प्रदान करता है. बहुत से एटीएम ऐसे हैं जिसके दरवाजे तक लोग निकाल ले गये. जब कोई देखने वाला नहीं तो चोरों की चांदी होना स्वाभाविक है.प्राय: सभी बैंकों के एटीएम में एकसाथ कई लोग पहुंच जाते हैं और पूरा ट्रांसेक्शन देखते रहते हैं फिर ऐसे में साइबर क्राइम न हो तो क्या होगा? सुरक्षा की पोल खुलने के बाद अब बैंकों में यह आदेश भी पहुंचने वाला है कि  एटीएम पर वारदात हुई तो बैंक मैनेजर पर भी कार्रवाई होगी मगर इसकी  संभावना भी कम ही नजर आती है. एटीएम पर सुरक्षा के लिए बैंक भी उतना ही जिम्मेदार है जितनी पुलिस. अधिकांश एटीएम पर शाम होते ही एटीएम के शटर गिर जाते हैं यही वजह है कि एटीएम अपराधियों के निशाने पर है. एटीएम पर 24 घंटे गार्ड की तैनाती होनी चाहिए जोकि नहीं है। एटीएम मशीन स्थापित करते समय बैंक मशीन के केबिन में तमाम संसाधन स्थापित करता है.मशीन के केबिन में सीसीटीवी कैमरा भी लगाया जाता है, यूं कहें कि दिन में एटीएम पर गार्डों की तैनाती होती है, मगर रात्रि को कोई गार्ड नहीं होता है. मशीन में लाखों रुपये कैश रहता है. वारदात होने की स्थिति में बैंक सुरक्षा का ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ देते हैं। छत्तीसगढ़ में बहुत सालों से थानों के एसएचओ को स्पष्ट निर्देश हैं कि वे अपने अपने क्षेत्र में देखें किस बैंक के एटीएम पर गार्ड हैं या नहीं,यदि नहीं तो संबंधित बैंक मैनेजर को स्पष्ट बता दे हैं कि वह सुरक्षा के मद्देनजर गार्ड की तैनाती करें.इस आदेश का कितना पालन हुआ है यह भी  देखने  की बात है.असल बात तो यह है कि बैंक के अधिकारी और कर्मचारी दोनों अपने  आपको किसी सुपर पावर से कम नहीं समझते यही वजह है कि चाहे बैंक लुट जाये या तिजोरी को कोई उठा ले जाये उन्हें कोई फरक नहीं पड़ता और न ही उनपर कोई सख्त कार्रवाई होती है.







एक झटके में आई बला.....और सत्रह लोगों को ले गई!


उन्हें इतना भी मजबूर न करें कि वे फांसी पर चढ़ जायें!
बाल सुधार की दिशा में उठाए गए उपायों और प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में  कम उम्र के बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. देश में रोजाना औसतन ऐसे आठ से दस बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं.राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों से यह कड़वी हकीकत सामने आई है. सामाजिक माहौल में बदलाव, माता-पिता का रवैया और उम्मीदों का बढ़ता दबाव ही इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है. आत्महत्या को नम्बर के हिसाब से देखा जाये तो मध्य प्रदेश का नम्बर पहला है उसके बाद तमिलनाडु पश्चिम बंगाल  का नंबर है. मध्य प्रदेश में हुई  घटनाओं में लड़के लड़कियां दोनों शामिल हैं. बच्चों में बढ़ती इस प्रवृत्ति की कई वजहें हैं. एक दशक पहले के मुकाबले मौजूदा दौर में बच्चे अपने आसपास के माहौल और हालात से जल्दी अवगत हो जाते हैं.  ज्यादातर बच्चे कम उम्र में इन हालातों से उपजे मानसिक दबाव को नहीं सह पाते.मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कम तादाद और स्कूली स्तर पर काउंसलरों की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से बच्चों के पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने के ज्यादा विकल्प नहीं होते. इसके अलावा कामकाजी अभिभावक बच्चों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते.ऐसी परिस्थितियों में बच्चों में हताशा लगातार बढ़ती रहती है. कई बच्चे इससे निपटने में नाकाम होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं. परीक्षा में नकल करते पकड़े जाने की स्थिति में बच्चों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहियें किन्तु ऐसा होता है और इसका हश्र आत्महत्या के रूप में परिवर्तित हो जाता है. एकल परिवारों में बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिल पाती. ऐसे परिवारों को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए.बच्चों को स्थायी तौर पर तनाव की स्थिति में रखने के लिए मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के साथ माता-पिता भी जिम्मेदार हैं.माता-पिता के पास बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए समय की कमी और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव ही मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार हैं. कुछ माता-पिता अपने अधूरे सपनों को साकार करने का बोझ बच्चों पर थोप देते हैं. ऐसे में बच्चों पर शुरू से ही मानसिक दबाव बन जाता है. ऐसे दबाव उसे कामयाब नहीं होने देते. नाकामी की हालत में वह हताश होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है.परिस्थितियां अब ऐसी  हो गई कि बच्चों पर बेवजह मानसिक बोझ थोपने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है. माता-पिता को भी अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा. इसके अलावा स्कूलों में भी काउंसलरों की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए. माता-पिता को छोटी उम्र से ही बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने की बजाय उनको अपना करियर चुनने की आजादी देनी चाहिए. इससे उन पर अनावश्यक दबाव नहीं पैदा होगा. हम अपने बच्चों को नाकामी का सामना करना नहीं सिखाते. इससे बच्चे सहज ही अपनी नाकामी नहीं पचा पाते.बच्चों पर पढ़ाई या करियर को लेकर अभिभावकों या स्कूलों की ओर से अनावश्यक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए. वैसी स्थिति में बच्चों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.बच्चों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति का  मामला देश में उस समय उठा जब कोटा के कोचिंग संस्थानों में तनावग्रस्त बच्चों ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाया.देश के सभी शहरों तथा कस्बों तक में शिक्षा की ऐसी दुकानें खुली हुई हैं, जो 'जीनियस के निर्माण का दावा करती हैंÓ और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें डॉक्टरी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई में एडमिशन की गारंटी देती हैं.वर्तमान में यह कोचिंग का सुपरमार्केट हो गया है. देशभर में शोहरत के साथ यहां कोचिंग के लिए पहुंच रहे छात्रों द्वारा आत्महत्या की अधिक खबरें भी आने लगी हैं.  अधिकतर अपने घरवालों से दूर रहकर भयानक तनाव के बीच तैयारी करते हैं. कोचिंगों के नियमित टेस्ट में नीचे लुड़कना बच्चों के लिए जानलेवा साबित होता है. परिजन बच्चे के सर पे सपनों की एक पोटली लाद कर कोचिंग भेजते हैं, तो बच्चा उसे साकार करना चाहता है. लेकिन, सफलता के इस मापदंड में सभी सफल होंगे, यह असंभव है.भारत के संपन्न राज्यों के शिक्षित युवा इतनी बड़ी तादाद में मृत्यु को गले लगा रहे हैं, जो दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक है. और यह पहला अवसर नहीं है, जबकि हम इस कड़वी हकीकत से रूबरू हो रहे हैं.



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फिर वही शराब.....! इस बार भी शराब एक साथ सत्रह लोगों को लेकर गई-बलरामपुर में करीब 60 पैसेंजर्स को लेकर जा रही बस के शराब खोर ड्रायवर ने एक साथ सत्रह पैसेंजर्स को मौत के घाट उतार दिया.. दलधोआ घाट में बुधवार रात पुल से नीचे बस  गिरी,इसमें 14 पैसेंजर्स तो वहीं मर गये जबकि तीन अन्य अस्पताल में पहुंचाने के बाद मृत घोषित किये गये. शराब में धुत्त ड्रायवर का संतुलन बिगड़ गया और दुर्घटना हो गई, पूर्व से ही लडखडाती बस के सामने बाइक सवारों को देख ड्रायवर और डर गया तथा उन्हें बचाने की कोशिश में तीन बार पलटने के बाद  पुल से नीचे जा गिरी. महिन्द्रा ट्रेवल्स की बड़ी बस रायपुर जा रही थी. यह एक ऐसी  दुर्घटना है जिसने एक बार फिर छत्तीसगढ़ में शराब व शराब पीकर वाहन चलाने वालों को  चर्चित कर दिया अब इस संबन्ध में के कोई ठोस निर्णय की जरूरत है.  शराब पीकर गाड़ी चलाकर कई लोगो को मारने की यह पहली घटना नहीं है इससे पूर्व बारातियों को ले जा रही एक वाहन इसी ढंग से पेड़ से जा टकराई थी और कई लोग मारे गये थे. इधर  धमतरी के एक ही परिवार के लोगों की मौत का सदमा अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि एक बार फिर एक ऐसी दुर्घटना ने सुर्खियों में स्थान बना लिया जिसके चलते कई परिवारों में गम का माहौल निर्मित हो गया.जगदलपुर  में भी अभी कुछ दिन पहले पायल बस सर्विस की बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. इसमें भी यात्री भरे थे. हम रोज फोर लाइन सिक्स लाइन सड़कों की बात करते हैं और उन्हीं सड़कों पर ऐसी दुर्घटाएं भी हो जाती है जो यह सोचने के लिये विवश करती है कि क्या यह सडके ठीक नहीं बनी है या चलाने  व इसपर दौडऩे दौड़ाने  वालों में कोई खोट है.असल बात तो ड्रायवरों की लापरवाही है जो शराब में धुत्त होकर सबकुछ भूल जाते हैं और लोगों की जिंदगी को दाव पर लगा देते हैं. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने इस दुर्घटना में मारे गये परिवारों को पच्चीस पच्चीस हजार रूपये मदद की घोषणा की है. हालाकि यह एक तात्कालिक राहत है, जिन परिवारों को इस दुर्घटना से पारिवारिक क्षति हुई है उसका खामियाजा इन पैसों से पूरा नहीं हो सकता.जो लोग अपने घर हंसी खुशी पहुंचने का इंतजार करते बैठे थे उन्हें अचानक आये हादसे ने असल में जिदंगीभर के लिये रोने मजबूर कर दिया.होना तो यह चाहिये कि जो बसे चलाई जाती है उसके प्रबधंन की यह जिम्मेदारी होनी  चाहिये कि वह उस बस को रवाना होने के पूर्व उसकी पूरी तकनीकी जांच कर ले तथा जो चालक गाड़ी लेकर जा रहा है उसकी मानसिक व शारीरिक जांच भी कराये तथा पूर्ण विश्वास के बाद ही उसे रवाना करें. नशे की हालत में होने की स्थिति में किसी भी प्रकार बस को ले जाने की अनुमति न दी जाये. हालाकि इस बार दुर्घटना की खबर सुनते ही आसपास के गांव वालो व कलेक्टर के  मौके पर तुरन्त पहुंचने से केज्युल्टी और होने से बच गई तथा कई घायलों को तुरन्त अस्पताल पहुंचाया जा सका. दुर्घटना कहीं भी घट सकती है लेकिन दुर्घटना होने के बाद मदद तत्काल मिले तो कई जिदंगी बच सकती है सरकार की तरफ से कई एम्बुलेंस सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है इन्हें या तो शहरों के आसपास कही खड़ा कर दिया जाता है या फिर किसी ऐसे स्थान  पर होती है जहां से घटनास्थल काफी दूर हो. असल में यह व्यवस्था जिसमें पूर्ण चिकित्सा सुविधा से लैस हो ऐसी जगह पर हानी चाहिये जहां से पहुंचने में दूरी न हो अर्थात एक थाने से दूसरे तीसरे  थानों की दूरी में भी यह व्यवस्था की जा सकती है.हालाकि इस दुर्घटना के बाद संजीविनी एक्सपे्रस की दौड़ काफी  फायदेमंद रही है वरना केजुअल्टी और ज्यादा होती।






उन्हें इतना भी मजबूर न करें कि वे फांसी पर चढ़ जायें!


उन्हें इतना भी मजबूर न करें कि वे फांसी पर चढ़ जायें!
बाल सुधार की दिशा में उठाए गए उपायों और प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में  कम उम्र के बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. देश में रोजाना औसतन ऐसे आठ से दस बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं.राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों से यह कड़वी हकीकत सामने आई है. सामाजिक माहौल में बदलाव, माता-पिता का रवैया और उम्मीदों का बढ़ता दबाव ही इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है. आत्महत्या को नम्बर के हिसाब से देखा जाये तो मध्य प्रदेश का नम्बर पहला है उसके बाद तमिलनाडु पश्चिम बंगाल  का नंबर है. मध्य प्रदेश में हुई  घटनाओं में लड़के लड़कियां दोनों शामिल हैं. बच्चों में बढ़ती इस प्रवृत्ति की कई वजहें हैं. एक दशक पहले के मुकाबले मौजूदा दौर में बच्चे अपने आसपास के माहौल और हालात से जल्दी अवगत हो जाते हैं.  ज्यादातर बच्चे कम उम्र में इन हालातों से उपजे मानसिक दबाव को नहीं सह पाते.मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कम तादाद और स्कूली स्तर पर काउंसलरों की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से बच्चों के पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने के ज्यादा विकल्प नहीं होते. इसके अलावा कामकाजी अभिभावक बच्चों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते.ऐसी परिस्थितियों में बच्चों में हताशा लगातार बढ़ती रहती है. कई बच्चे इससे निपटने में नाकाम होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं. परीक्षा में नकल करते पकड़े जाने की स्थिति में बच्चों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहियें किन्तु ऐसा होता है और इसका हश्र आत्महत्या के रूप में परिवर्तित हो जाता है. एकल परिवारों में बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिल पाती. ऐसे परिवारों को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए.बच्चों को स्थायी तौर पर तनाव की स्थिति में रखने के लिए मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के साथ माता-पिता भी जिम्मेदार हैं.माता-पिता के पास बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए समय की कमी और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव ही मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार हैं. कुछ माता-पिता अपने अधूरे सपनों को साकार करने का बोझ बच्चों पर थोप देते हैं. ऐसे में बच्चों पर शुरू से ही मानसिक दबाव बन जाता है. ऐसे दबाव उसे कामयाब नहीं होने देते. नाकामी की हालत में वह हताश होकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है.परिस्थितियां अब ऐसी  हो गई कि बच्चों पर बेवजह मानसिक बोझ थोपने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है. माता-पिता को भी अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा. इसके अलावा स्कूलों में भी काउंसलरों की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए. माता-पिता को छोटी उम्र से ही बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने की बजाय उनको अपना करियर चुनने की आजादी देनी चाहिए. इससे उन पर अनावश्यक दबाव नहीं पैदा होगा. हम अपने बच्चों को नाकामी का सामना करना नहीं सिखाते. इससे बच्चे सहज ही अपनी नाकामी नहीं पचा पाते.बच्चों पर पढ़ाई या करियर को लेकर अभिभावकों या स्कूलों की ओर से अनावश्यक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए. वैसी स्थिति में बच्चों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.बच्चों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति का  मामला देश में उस समय उठा जब कोटा के कोचिंग संस्थानों में तनावग्रस्त बच्चों ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाया.देश के सभी शहरों तथा कस्बों तक में शिक्षा की ऐसी दुकानें खुली हुई हैं, जो 'जीनियस के निर्माण का दावा करती हैंÓ और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें डॉक्टरी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई में एडमिशन की गारंटी देती हैं.वर्तमान में यह कोचिंग का सुपरमार्केट हो गया है. देशभर में शोहरत के साथ यहां कोचिंग के लिए पहुंच रहे छात्रों द्वारा आत्महत्या की अधिक खबरें भी आने लगी हैं.  अधिकतर अपने घरवालों से दूर रहकर भयानक तनाव के बीच तैयारी करते हैं. कोचिंगों के नियमित टेस्ट में नीचे लुड़कना बच्चों के लिए जानलेवा साबित होता है. परिजन बच्चे के सर पे सपनों की एक पोटली लाद कर कोचिंग भेजते हैं, तो बच्चा उसे साकार करना चाहता है. लेकिन, सफलता के इस मापदंड में सभी सफल होंगे, यह असंभव है.भारत के संपन्न राज्यों के शिक्षित युवा इतनी बड़ी तादाद में मृत्यु को गले लगा रहे हैं, जो दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक है. और यह पहला अवसर नहीं है, जबकि हम इस कड़वी हकीकत से रूबरू हो रहे हैं.



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जंगलों में आग...प्राकृतिक या कृत्रिम-सावधानी की जरूरत!



वैसे तो विश्व के जंगलों में आग सामान्य सी बात है. अभी कुछ ही महीनों पहले-अमरीका के जंगलों में भीषण आग लगी थी लेकिन भारत के उत्तराखंड से लेकर कई अन्य राज्यों तक में फैले जंगलों में इस भीषण गर्मी के दौरान आग लगने की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया. आग की भीषणता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि आग बुझाने  के लिये वायुसेना और थल सेना दोनों का सहारा लेना पड़ा. एक साथ कई जंगलों में आग की घटना ने यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि कहीं आग किसी ने जानबूझकर तो नहीं लगाई.? कई हैक्टर के जगल जलकर राख हो गये जगंली जानवर भी काफी तादात में जलकर मर गये होंगे. वास्तविकता यही है कि इस साल लगी आग ने पहाड़ के लोगों और वन्यजीवों पर कहर बरपा दिया. यह जानना जरूरी है कि हमारी वन संपदा को कौन खाक कर रहा है. कहीं इसके लिये पा्रकृतिक घटनाओंं की जगह मानव तो जिम्मेदार नहीं है? सोशल मीडिया पर जंगलों में दहक रही इस आग के लिए लकड़ी माफियाओं को जिम्मेदार माना जा रहा है क्योंकि हर साल वन विभाग द्वारा गिरे या सूखे पेड़ की निलामी की जाती है.आग लगाने से बड़ी संख्या में वन संपदा को नुकसान पहुंचता है और वन माफिया को इससे फायदा होता है वहीं समाजशास्त्री और पर्यावरणविदों का कहना है कि शीतकालीन बर्षा न होने से जमीन में नमी नहीं है इस कारण जंगलों में आग लग रही है.पहाड़ी इलाकों में ही नहीं हमारे छत्तीसगढ़ तथा अन्य  कई जंगलों में गिरी पत्तियों को जलाने के लिए आग लगाई जाती है, लेकिन यह आग लोग नियंत्रित रूप से लगाते हैं. उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग के लिए वहां रह रहे लोगों की जिम्मेदार मानना गलत है. वन विभाग को पहले से ही ऐसी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए था,अब जब स्थिति विभाग के नियंत्रण से बाहर हो गई तो वह वहां रह रहे लोगों पर आरोप लगा रहे हैं. ऐसा तर्क देने वाले कह रहे हैं कि राज्य के जंगलों में लगी आग का मुख्य कारण इस साल विंटर रेन न होना है, जिस कारण जमीन में बिल्कुल नमी नहीं है और आग लगातार बढ़ती चली गई वहीं इस साल मार्च से गर्मी तेज पड़ रही है जिससे जंगलों में पतझड़ ज्यादा हो गया है,यह जल्दी आग पकड़ता है. वन संपदा को आग से बचाने के लिए पुराने तरीकों को ढ़ूंढना होगा, जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी अहम है पहले जंगलों में फायर लाइन बनाई जाती थी, जिससे आग जंगल में नहीं फैलती थी स्थानीय लोगों द्वारा सूखी लकड़ी और पत्तों को हटा दिया जाता था। इससे गर्मी के मौसम में जंगल में आग फैलने का डर नहीं रहता था. इसके साथ ही वन कानून को भी चुनौती देने की जरूरत है. वन विभाग द्वारा वन कानून पर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि भविष्य में फिर ऐसी स्थिति न हो. जंगल की पत्तियां हाटाकर उनसे रोजगार उत्पन्न करना चाहिए, इनको एकत्र करवाकर खाद बनानी चाहिए. एक तरफ विश्व पर्यावरण को बचाने के लिये एक होकर ट्रीटी कर रहा है और दूसरी तरफ हमारें देश के  जंगल आग से धधक रहे हैं. आग से हजारों हैक्टेयर वन क्षेत्र खाक हो गये. जंगल में ये आग क्यों और कैसे लगी इसपर  विचार जरूरी है.जंगल में ज्यादातर आग की घटनाएं गर्मी के मौसम में सामने आती हैं.प्राकृतिक रूप से जंगलों में आग लगने का एक बड़ा कारण आसमानी बिजली है, जिसके कारण आग सूखे पत्तों और झाडयि़ों से होती हुई पूरे जंगल को चपेट में ले लेती है कहा जाता है कि धरती पर हर सेकेंड में औसतन सौ बार आसमानी बिजली गिरती है और पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका में जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण है  आसमानी बिजली गिरना.गर्मी बढ़ जाने से जंगल में पड़े सूखे पत्ते और जमीन पड़ी सूखी लकडियां खुद ही आग पकड़ लेती हैं यह घरों में ईंधन के रूप में प्रयोग में लाई जाती है, जिससे इनमें आसानी से आग लग जाती है। जंगलों में अधिकतर आग मौसम और हवा के बहाव की गति से लगती है। हवा में ऑक्सिजन होती है जो आग लगने का सबसे बड़ा कारण है. जंगलों में लगने वाली आग के पीछे ज्यादातर इंसान ही होते हैं. जंगल से गुजर रहे लोग खाना पकाने के लिए आग जलाने के बाद उसे सही सही ढंग से बुझाना भूल जाते हैं तो वह आग हवा के कारण पूरे जंगल में फैल जाती है.मानवों द्वारा जंगलों में आग लगने की घटना ज्यादातर सावधानी न बरतने के कारण होती हैं, बीड़ी सिगरेट पीकर फेंक देते हैं जो पूरे जंगल को खाक कर देती है. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जान बूझकर जंगलों में आग लगाते हैं अब आगे शायद पता चले कि यह आग प्राकृतिक थी या कृत्रिम?

मेडिकल प्रेवेश परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला!


अब सभी सरकारी, निजी कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में राष्ट्र्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा के जरिए ही दाखिले दिए जा सकेंगे.अभी तक अलग-अलग कॉलेज और विश्वविद्यालय अपने ढंग से प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते आ रहे थे, इस तरह विद्यार्थियों को हर प्रवेश परीक्षा के लिए अलग-अलग तैयारी करनी पड़ती थी. हर प्रवेश परीक्षा का आवेदन करने के लिए फीस भी अदा करनी पड़ती थी. इस तरह विद्यार्थियों पर पैसे और परीक्षा का तनाव अधिक बना रहता था.करीब छह साल पहले अध्यादेश जारी किया गया था कि देश भर के चिकित्सा संस्थानों में दाखिले के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा का प्रावधान होगा मगर कुछ निजी और अल्पसंख्यक संस्थाओं को आपत्ति थी कि यह शर्त उन पर थोपी नहीं जानी चाहिए मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी यह दलील खारिज कर दी इसके बाद चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश को लेकर चला आ रहा द्वंद्व आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से खत्म हो गया. अलग-अलग परीक्षाएं लेने और निजी कॉलेजों में प्रबंधन का कोटा निर्धारित होने के कारण उनमें ऐसे विद्यार्थियों के प्रवेश की गुंजाइश रहती थी, जिनके माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं इससे कमजोर आर्थिक स्थिति वाले अनेक होनहार विद्यार्थियों को दाखिले से वंचित होना पड़ता था.अब यह अच्छी बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए यह भी कह दिया है कि अगर इस पर किसी को कोई शिकायत या आपत्ति है तो वह किसी दूसरी अदालत में अपील नहीं कर सकता, इस मामले में हाईकोर्ट दखल नहीं दे सकते.सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश से बेवजह मुकदमा दायर कर प्रवेश प्रक्रिया को बाधित करने की संभावना भी समाप्त हो गई है. चिकित्सा संस्थानोंं में दाखिले को लेकर मची होड़ का सबसे बड़ा कारण है कि एमबीबीएस और बीडीएस करने के बाद युवाओं को उस तरह रोजगार की तलाश में नहीं भटकना पड़ता, जिस तरह दूसरे विषयों की पढ़ाई करने वालो को भटकना पड़ता है इसलिए जिन लोगों के पास पैसा है, वे निजी संस्थाओं में डोनेशन आदि देकर अपने बच्चों का दाखिला कराने का प्रयास करते हैं, देश भर में करीब चार सौ मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें महज बावन हजार विद्यार्थियों को ही जगह मिल पाती है जबकि इसके लिए हर साल लाखों विद्यार्थी प्रवेश परीक्षाएं देते हैं इनमें धन बल पर प्रवेश पाने वाले छात्र छात्राएं योग्य विद्यार्थियों का हक छीन लेते हैं, स्पष्ट है कि इस  विभिन्नता को लेकर बहुत से लोगों में असंतोष था. मिली जुली प्रवेश परीक्षा से निजी संस्थानों की मनमानी पर रोक लग सकेगी. इंजीनियरिंग आदि में दाखिले के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा प्रणाली लागू है, फिर चिकित्सा संस्थानों को इससे क्यों अलग होना चाहिए? मेडिकल चिकित्सा की पढ़ाई दूसरे सामान्य विषयों की तरह नहीं होती, उसमें अयोग्य विद्यार्थियों को किसी तरह प्रशिक्षण देना एक तरह से खतरे को न्योता देना है.मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत से युवा निजी स्तर पर रोगियों का इलाज करने का फैसला करते हैं,जो पैसे वाले होते हैं, वे निजी चिकित्सालय तक खोल लेते हैं.एक अकुशल चिकित्सक लोगों की सेहत क्या सुधारेगा? यह एक स्वस्थ समाज की निशानी नहीं हो सकती,ऐसे में चिकित्सा संस्थानों को भी इस बिंदु पर सोचने की दरकार है कि उन्हें सिर्फ अपनी कमाई के बारे में नहीं, अच्छे चिकित्सक तैयार करने पर जोर देना चाहिए। मिली जुली  प्रवेश परीक्षा प्रणाली को स्वीकार करने और दाखिले में पारदर्शिता बनाने में उन्हें किसी तरह की झिझक क्यों होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से हम समझते हैं किअ  आगे आने वाले समय में देश को अच्छे डाक्टर मिलेंगे जो समाज की अच्छी सेवा कर सकेंगे.
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पैसा किसने खाया! अगस्ता सौदे की काली कमाई किसके खजाने में?



 इटली के उच्च न्यायालय में एक पत्र के माध्यम से अगस्ता वेस्टलैंड  सौदे को लेकर  बिचौलिये क्रिश्चियन मिशेल ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस सौदे की ''मुख्य लाभार्थीÓÓ हैं। हालांकि मीडिया से बातचीत में मिशेल ने कहा है कि वह कभी किसी गांधी से नहीं मिला। इतालवी अदालत में अगस्ता वेस्टलैंड मामले में जो फैसला आया है उसमें कांग्रेस के पांच शीर्ष राजनीतिज्ञों और पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस.पी. त्यागी का नाम बताया जा रहा है। कथित रूप से फैसले में चार बार सिग्नोरा गांधी का नाम आया है। इतालवी भाषा में सिग्नोरा का अर्थ श्रीमती होता है। हालाँकि फैसले में किसी भी कांग्रेस नेता के रिश्वत लेने की बात नहीं कही गयी है लेकिन दस्तावेजों में यह बात जरूर कही गयी कि इस करार को पूरा करवाने के लिए सोनिया गांधी, अहमद पटेल, आस्कर फर्नांडिस जैसे बड़े नेता माहौल बना सकते थे। इस करार पर बातचीत वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी जिसे 2010 में तब मंजूरी प्रदान की गयी जब वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी देश के रक्षा मंत्री थे। अगस्ता वेस्टलैंड मामले को लेकर देश का राजनीतिक माहौल  गरम है कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस के लिए दूसरा बोफोर्स साबित हो सकता है भाजपा इस मामले में इटली की एक अदालत के फैसले के आधार पर सीधे सोनिया गांधी पर हमला कर रही है और आरोप लगा रही है कि घूस का पैसा सोनिया और कांग्रेस के कई नेताओं तक पहुँचा है जबकि सोनिया गांधी ने रिश्वत लेने के आरोपों से उन्हें और उनकी पार्टी को जोडऩे के प्रयासों को पूरी तरह से 'आधारहीनÓ करार देते हुए कहा है कि इस मुद्दे पर 'घेरे जानेÓ को लेकर वह 'भयभीतÓ नहीं हैं। सोनिया ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह चरित्र हनन की रणनीति के तहत काम कर रही है और असल मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है।कांग्रेस यह मानने कतई तैयार नहीं है कि  उसके नेताओं ने रिश्वत  ली, भाजपा का आरोप  है कि कांग्रेस नेताओं ने रिश्वत ली जबकि इटली की अदालत में साबित हुआ है कि मिशेल को इस काम के लिए 4.4 करोड़ यूरो यानि 330 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई. अब सवाल उठ रहा है कि जब रिश्वत का पैसा कंपनी ने दिया है तो वह किसे दिया? किसी को तो दिया ही गया होगा. माना जा रहा है कि रिश्वत की रकम मिशेल द्वारा कराये गये काम की अपेक्षा बहुत ज्यादा थी आरोप है कि मिशेल ने जिन भारतीय अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया उनको रिश्वत की रकम में से हिस्सा दिया। इंटरपोल ने 2015 में भारत के आग्रह पर मिशेल के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था। मिशेल के खिलाफ इटली में भी गिरफ्तारी वारंट निकला हुआ है.बताया जा रहा है कि वह दुबई में है।जहाँ उसने एक साक्षात्कार में कहा है कि उसने भारतीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मामले की पूरी जानकारी दी है, उसने प्रस्ताव दिया है कि यदि उसे भारत में गिरफ्तारी नहीं होने का आश्वासन मिले तो वह पूछताछ के लिए उपलब्ध हो सकता है। पूरा विवाद तब सामने आया था जब 2011-12 के दौरान इटली की अदालत में भारतीय नेताओं, नौकरशाहों और वायुसेना अधिकारियों को दलालों द्वारा 360 करोड़ रुपये की रिश्वत देने के आरोप लगे। इस मामले में फरवरी 2013 में फिनमेकानिका के सीईओ ओरसी और अगस्ता वेस्टलैंड के मुख्य कार्यकारी ब्रूनो स्पैग्नोलिनी इटली में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके बाद भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अगस्ता वेस्टलैंड को सभी भुगतान रोक दिये,इसके कुछ ही दिन बाद सीबीआई ने पूर्व भारतीय वायुसेना प्रमुख एस.पी. त्यागी और उनके तीन भतीजों, ओरसी तथा स्पैग्नोलिनी समेत नौ लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। जनवरी 2014 में रक्षा मंत्रालय ने अगस्ता से किया गया सौदा रद्द कर दिया और उसकी एडवांस बैंक गारंटी को भुना लिया। कुछ समय बाद इटली की अदालत ने ओरसी तथा स्पैग्नोलिनी को हेराफेरी के लिए दो साल की सजा सुनाई लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप हटा दिये। इस मामले ने इस साल अप्रैल में तब नई करवट ली जब मिलान की अपीलीय कोर्ट ने फैसला बदलते हुए ओरसी तथा स्पैग्नोलिनी को चार-चार साल की सजा सुनाई इसके बाद से ही  देश की राजनीति गरम हैं-संसद में सारी काम की बाते छोड़कर इसी  पर बहस चल रही है. हश्र क्या होगा कोइ्र्र नहीं जानता. भारतीय घपलों में बहुत कम ही  ऐसा होता है-उसका रिएक्शन यही  है किअन्य मामलों की तरह यह भी  यूं ही भारतीय आकाश और धरती पर गूंजता रहेगा फिर कोई दूसरा  सामने आयेगा तो इसे सब भूल जायेगें तब दूसरे के पीछे पड़ जायेंगे जैसा होता आया है होता रहेगा.



शनिवार, 7 मई 2016

My Father and Mother

मेरे माता पिता यही है. मैरे आदर्श...मुझे जीवन दिया आज सिर्फ उनकी स्म्रतियां शेष रह गई है.

रविवार, 1 मई 2016

रवि थॉमस