शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

अस्पताल भगवान भरोसे तो मरीज की जिदंगी भी भगवान भरोंसे!



कहने को तो डीके अस्पताल से मेकाहारा और बाद में डा. भीमराव आम्बेडकर अस्पताल प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है.राज्य के आसपास के राज्यों से भी गरीब लोग यहां पहुंचते हैं लेकिन इसके करम ऐसे हैं कि लोगों को इसकी हरकतों पर कभी शर्म और कभी तरस आता है.हाल ही इस अस्पताल ने ऐसी हरकत कर डाली कि छत्तीसगढ़ को शर्म से सिर झुकाना पड़ा. सिर्फ एक हजार रूपयें के लिए शव को 3 घंटे तक रोके रखा.शव उस समय छोड़ा गया जब आसपास के मरीजों ने पैसा एकत्रित कर पीडि़त गरीब परिवार को दिया.अब तक ऐसे बर्ताव के किस्से कतिपय निजी अस्पतालों से ही सुनने को मिलते थे  अब इस प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल भी इस श्रेणी में शामिल हो गया. आखिर कौन है इसके लिये जिम्मेदार? अस्पताल में होने वाली प्राय: हर ऐसी गलतियों को नीचे से लेकर ऊपर लेवल तक छिपाने की एक परंपरा चली आ रही है और इस अस्पताल को चलाने वाले करता धरता ऐसे हर मामले में पतली गली से निकल जाते हैं- वे इस बात का हर संभव प्रयास करते है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे.तीन घंटे तक शव को रोके रखने का जो विवरण हमें प्राप्त हुआ है वह इतना घिनौना है कि हमें अपने आप पर भी शर्म आती है कि जिनको सरकार इस अस्पताल को चलाने के लिये मोटी-मोटी तनखाह देती है उनकी नाक के नीचे भी लोग इस प्रकार की हरकत करते हैं तथा उन्हें अपनी करनी पर कोई पछतावा भी नहीं होता.छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी डा. अंबेडकरअस्पताल में पिछले सप्ताह की शुक्रवार को एक मरीज का शव 3 घंटे केवल इसलिए रोक दिया गया क्योंकि मरीज के रिश्तेदारों के पास अस्पताल का बिल चुकाने के लिए एक हजार रुपए नहीं था. मृतक के बेटे ने अपने दोस्तों से पैसे उधार लिये,अस्पताल में भर्ती दूसरे मरीजों के रिश्तेदारों ने भी उनकी हालत देखकर मदद की. तीन घंटे में हजार रुपए इक_ा हुए, तब शव परिजनों को सौंपा गया,हम यह बता देना चाहते हैं कि इस तरह  की अमानवीय हरकत करने वाला अंबेडकर अस्पताल राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में पहला अस्पताल बन गया है, जिसने पैसों के लिए शव रोके  रखा. कतिपय निजी अस्पतालों में तो गरीबों के साथ तो क्या अच्छे अच्छो के साथ भी  ऐसा होता आया है. जब तक पैसा पूरा नहीं भरा जाता शव को उठाने नहीं दिया जाता.इसे भी विडम्बना ही कहा जायेगा कि इस अस्पताल में  होने वाली प्राय: घटनाओं को प्रशासन व सरकार में बैठे लोग कभी गंभीरता से नहीं लेते. एक चौकड़ी सी बन गई है जो गिल्टी लोगों को बचाने का प्रयास करती है, हर मामले  में वे सफल भी हो जाते हैं.प्रदेश में सरकार के इस बड़े अस्पताल में पिछले कम से कम पांच वर्षो में हुए बडे बड़े स्केण्डल में से ऐसे सभी मामलों में लिप्त लोगों को बड़े तरीके से क्लीन चिट दे दी गई.वास्तविकता यही है कि राजधानी में गरीब व मध्यम वर्गीय लोगो की  सेवा के लिये बनाये गये इस अस्पताल में यह घटना हुई जिसने सरकारी अस्पतालों के पूरे सिस्टम को आज कठघरे में खड़ा कर दिया. निजी अस्पतालों में पैसा कमाने की एक बड़ी  मशीन  है- 'वेंटीलेटरÓ मरीज जितने  दिन वेंटीलेटर पर रहेगा उसका बिल उतना ही ज्यादा बनेगा.अस्पताल प्रबंधन के बिना कोई नहीं जानता कि वेंटीलेटर पर रखा व्यक्ति जिंदा है या मर गया हैं. बिल बढ़ाने के लिये अक्सर  वेंटीलेटर सबसे बड़ा उपाय रहता है. निजी अस्पतालों में भारी बिल को सहन नहीं कर पाने के कारण ही लोग सरकारी अस्पतालों की शरण में जाते हैं यहां पहुंचने के बाद मरीज के परिजनों को किस तरह के मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है अम्बेेडकर अस्पताल की यह घटना उसकी एक मिसाल है. जिस व्यक्ति का शव रोका गया,उसे पांच दिन पहले यहां भर्ती किया गया था. परिजन बताते हैं कि गुरुवार की शाम तक उनकी हालत बेहतर थी, रात होते ही स्थिति बिगड़ी और शुक्रवार सुबह तक शुगर पांच सौ से अधिक हो गया। उसके बाद उनकी स्थिति कंट्रोल में नहीं आई और 11 बजे मौत हो गई.इस अस्पताल का शाम होते ही यह हाल है कि यहां ढूडों तो भी कोई डाक्टर दिखाई नहीं देता-सरकारी अस्पतालों में स्मार्ट कार्ड से फ्री इलाज करने का नियम है- गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों का भी फ्री इलाज किया जाता है. इसके अलावा सामान्य मरीजों से हर जांच के लिए न्यूनतम फीस ली जाती है,इसमें बेड चार्ज से लेकर कमरे का किराया सब शामिल रहता है उसी के अनुसार इस मरीज को भी  रखा गया था, इसीलिए उसके बेटे को इलाज का बिल बनाकर पैसे मांगे गए इस अस्पताल के कई पुराने किस्से यूं ही हैं जिसमें स्वस्थ मरीज अचानक अस्पताल प्रबंधन की  सही सुश्रषा के बगैर मौत के क गार पर पहुंच जाता है.्रबाहर से इस बड़े शहर में मरीज को लेकर आने वालों की स्थिति एक ऐसे व्यक्ति की  तरह हो जाती है जिसका कोई नहीं... अस्पताल की सारी व्यवस्था भगवान भरोसे है तो मरीज की जिंदगी भी भगवाने भरोसे... इंसान के अतुुलनीय जीवन का रक्षक ऊपर वाले  के बाद नीचे का अस्पताल है अगर वही ऐसा हो जाये तो  फिर ऐसे अस्पतालों का औचित्य ही समझ में नहीं आता!



नाबालिग यह कहां जा रहे हैं?...इनका तो पहला कदम ही गलत!




इससे पूर्व कि आपराधिक प्रवृत्ति की और बढ़ते नाबालिगों के बारे में कुछ कहे हम एक किस्सा सुनाते हैं-एक बच्चे के पैदा होने के बाद से लेकर युवा और जवान होते तक उसकी मां ने उसे वह सब कुछ दिया जो वह मांगता था. कई मसलों पर उसके परिवार वाले भी विरोध करते कि इतना लाड़ प्यार न करों  कि वह बिगड़ जाये किन्तु मां कहां अपने लाडले के खिलाफ कुछ सुनने वाली थी. लड़का धीरे धीरे बड़ा हुआ तो उसकी मांग भी बढने  लगी स्कूल जाने की जगह आवारा बच्चों के साथ घूमने लगा.बीड़ी सिगरेट शराब की लत लग गई. मां को यह सब मालूम था फिर भी वह अवाइड करती रही. लड़का जब घर से पैसा नहीं मिलता तो चोरी करने लगा. उसे भी मां ने नहीं  रोका फिर वह लड़ाई झगडे भी करने लगा अच्छा खासा गुण्डा बन गया मां ने फिर भी कुछ नहीं कहा अंतत: उसने एक का खून कर दिया और जेल में ठूस दिया गया,अदालत ने उसे फांसी  की सजा सुना दी.फांसी पर चढ़ाने के पूर्व जब उससे अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा कि मैं एक बार अपनी मां से मिलना चाहता हूं-उसे मिलने दिया गया. मां जब पहुुंची तो उसने  अपनी मां को अपने  पास बुलाया और उससे लिपट गया और इतनी जोर से मां के कान को काटा कि उसे खीचकर हटाना पड़ा. जब उससे पूछा गया कि तुमने ऐसा क्यों किया तो उसका जवाब था आज मैं जिस स्थिति में हूं उसकी पूरी जिम्मेदार मेरी यह मां हैं अगर मेरी मां बचपन से मुझे मारती और हर जिद पूरी नहीं करती तो शायद आज मैं ऐसा नहीं बनता. इस दास्तान के जरिये हम यही बताना चाहते हैं कि बुनियाद घर से रखी  जाती है अगर बुनियाद हिल गई तो मकान का हश्र क्या होता है किसी को बताने की जरूरत नहीं.कुछ समय से प्राय: हर राज्य और शहर में चोरी, रोड-रेज, छेडख़ानी, बलात्कार, हत्या जैसे संगीन अपराधों में नाबालिगों की बढ़ती संख्या डराने वाली है.आपराधिक घटनाओं में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता समाज और देश दोनों के लिए नुकसानदेह है. देश का भविष्य युवाओं पर निर्भर करता है, लेकिन जब उसी वर्ग का एक हिस्सा अपराध की राह पर आगे बड़ रहा हो, तब यह सोचने वाली बात है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और हम किस प्रकार के भविष्य की नींव रख रहे हैं? ऐसा नहीं है कि इसमें केवल आर्थिक रूप से कमजोर या गरीब लड़के शामिल हैं, बल्कि ऐसी घटनाओं में संपन्न वर्ग के लड़के भी शामिल हैं.हो सकता है कि गरीब घरों के लड़के पैसों के अभाव की वजह से इस ओर प्रेरित हुए हों, लेकिन अमीर घरों के लड़के तो अहंकार के कारण अपराध के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कानून उनका क्या बिगाड़ लेगा और पैसे के बल पर वे बच जाएंगे. नाबालिगों की इस स्थिति के लिए माता-पिता भी कम जिम्मेवार नहीं हैं, जो अपने बच्चों की हर वाजिब-गैर वाजिब मांग और जिद को बचपन से ही पूरा करते रहते हैं,बिना यह सोच-विचार किए कि इसका परिणाम क्या होगा और इससे हम अपने बच्चों की कैसी मानसिकता बना रहे हैं. नतीजा, नाबालिग बच्चे अपने माता-पिता की बात तक नहीं सुनते.टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों को समय से पहले वयस्क बना दिया है.राजधानी रायपुर और  छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में  सड़कों पर खुलेआम चौदह-पंद्रह वर्ष के लड़के बिना हेलमेट के स्कूटी-बाइक तो तेज रफ्तार में चलाते ही हैं, बड़ी-बड़ी गाडिय़ां भी तेजी से चलाते हैं.यह बताने की जरूरत नहीं कि अधिकांश बाइक एक्सीडेंट नाबालिगों की बिगड़ी हुई मानसिकता का ही नतीजा है इन्हें रोकने वाला कोई नहीं,डेडी-मम्मी पहले भी अपने बच्चों की कारगुजारियों पर परदा डालने की ही कोशिश करते हैं दूसरी ओर इन्हें कानून का भी भय नहीं है.नाबालिगों में बड़ती आपराधिक प्रवृत्ति को रोकने के लिए पारिवारिक, सामाजिक और प्रशासनिक सभी स्तरों पर सजग होने की आवश्यकता है. इसमें भी माता-पिता की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. माता-पिता को बच्चों की छोटी-छोटी गलत हरकतों को नजरअंदाज करने की बजाय उन पर ध्यान देने और ऐसा करने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाना चाहिए.स्कूलों में नियमित रूप से बच्चों की काउंसलिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए और इसमें पुलिस का भी सहयोग लिया जाए.

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

आगे के वर्षो में लाखों लंबित पड़े मुकदमों का निपटारा हो पायेगा!




भारत की अदालतों में लाखों लंबित पड़े मामलों और न्यायपालिका की मुश्किलों का जिक्र करते हुए मुख्य न्यायाधीश प्रधानमंत्री की मौजूदगी में भावुक हो गए.भारत में न्यायपालिका की निंदा अकसर इस बात को लेकर होती है कि बहुत सारे मुकदमे बिना फैसले के पड़े हुए हैं और अनेक मामलों में फैसला होने में कई साल लग जाते हैं. स्वाभाविक है कि इसके कारण जनता में गुस्सा है, जबकि इसके पीछे बहुत सारी वजहें है जिनका लोगों को पता नहीं होता है. न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर होती है. चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने  न्यायपालिका का बचाव करते हुए सरकारों को कटघरेें मेेें खड़े करते हुए सवाल उठाए हैं.आज भी देश में 10 लाख लोगों पर सिर्फ 15 जज हैं .जस्टिस ठाकुर के अनुसार 1987 में लॉ कमीशन ने जजों की संख्या बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन आजतक ऐसा नहीं हो पाया है। भारतीय  संविधान लागू होने से पहले जजों की भूमिका बहुत सीमित थी। उनके पास रिट संबंधी अधिकार नहीं थे, न ही सरकार या सरकारी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर आपत्ति करने का अधिकार था,इसलिए उस जमाने में जजों की संख्या कम रखी गई थी।  जब 1950 में संविधान ने पहली बार नागरिकों को मूल अधिकार दिए और जजों को कार्यपालिका के काम की समीक्षा के नए अधिकार दिए, तब से न्यायपालिका के काम का दायरा बहुत बढ़ गया.वास्तविकता यह है कि सरकार अपना काम ईमानदारी और होशियारी से करे, तो ज्यादा रिट' याचिकाएं दायर नहीं होंगीं, कई जगह कार्यपालिका में बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार और कई बार कानून को ठीक से नहीं समझने की वजह से भी रिट का दायरा बढ़ा है. बड़ी संख्या में बार में काबिल लोग नहीं आ रहे. एक वजह ये भी है कि पहले जब बार से कम ही संख्या में काबिल लोगों की जरूरत होती थी, तो वो आसानी से मिल जाते थे लेकिन जब बड़ी संख्या में बार में काबिल लोग नहीं आ रहे हों, तो  जजों के पदों पर नियुक्त करने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे काबिल लोग नहीं मिल पाते हैं इन सब की वजह से, अब यह विवाद है कि सरकार जजों की नियुक्ति में कुछ दखल चाहती है, जो कि स्वाभाविक रूप से न्यायपालिका को मंज़ूर नहीं है साथ ही विवाद यह भी है कि उच्च न्यायालयों के जजों के लिए कॉलेजियम ने बहुत सारी सिफारिश की हैं लेकिन उनको भरा नहीं जा रहा है,सरकार उनकी नियुक्ति नहीं कर रही है. ण्क कारण यह भी हो सकता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह दु:ख ज़ाहिर किया. यह एक गंभीर संकट है और इसका एक समाधान तो यह है कि अगर कहीं भी, न्यायपालिका के किसी हिस्से में भ्रष्टाचार शुरू होता है तो उसकी तुरंत जांच करानी चाहिए और दोषी लोगों को दंड दिया जाना चाहिए.दूसरी बात यह है कि अब तक ऐसी परंपरा चलती आ रही है कि उच्च न्यायालय का जज बनने के लिए, जब तक किसी की उम्र 40-45 साल नहीं हो जाती है, तब तक उस पर विचार नहीं किया जाता है. एक काबिल जज सारा कानून जानता है और इसलिए वो एक साधारण जज के मुकाबले चार गुना तक ज्यादा कार्यकुशल हो सकता है.विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे काबिल जज तभी मिलेंगे, जब  काबिल वकीलों को पहले ही जज नियुक्त कर लेंगे, क्योंकि बाद में जब उनकी वकालत चलने लगती है, तो उनकी जज बनने में दिलचस्पी नहीं रहती है. पीएम नरेंद्र मोदी ने कोर्ट की छुट्टियों में कटौती की सलाह दे डाली इस पर जस्टिस ठाकुर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान जज मनाली नहीं जाते हैं, वह संवैधानिक बेंच के फैसलों को लिखते हैं जब एक साइड तैयार होता है तो दूसरा नहीं होता, बार से पूछिए क्या वह तैयार हैं. भारत में एक जज साल में औसतन 2600 केस देखता है, वहीं अमेरिका में एक जज महज़ 81 केस सुनता है. चीफ जस्टिस की शिकायत पर पीएम ने आश्वासन देते हुए कहा है कि उनकी सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार कर रही है अब देखना  है कि आगे न्यायपालिका में कितना बदलाव सरकार  की तरफ से होता है.

एलईडी क्या किसानों के घरों में रौशनी कर पायेगी?


 देश,राज्य या परिवार की उन्नती उसकी साख व आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है-जितनी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी उतना ही देश, राज्य व घर प्रगति के सौपान को पार करेेगा प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय उजाला योजना के माध्यम से प्रदेश के गांवों के हर परिवार को एलईडी लैंप से रोशन करने का बीड़ा अपने कंधों पर लिया है.सरकार का यह कदम बिजली की खपत कम करने उठाया गया माना जा रहा है, इसके पीछे और भी कोईउद्देश्य हो सकता है लेकिन हम उस ओर जाना चाहिये. ऊपरी  तौर पर यही कहेंगे कि सरकार की यह योजना प्रशंसनीय है लेकिन गांव के किसानों का घर तब रोशन होता है जब उस परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो। एलईडी बल्ब दे देने मात्र से घर रोशन होगा यह नहीं कहा जा सकता, उन्हें और अन्य तरीको से भी संपन्न व मजबूत बनाने की जरूरत हैै. बच्चों को अच्छी शिक्षा, उनके स्वास्थ्य, स्कूल ड्र्रेस और कुछ स्कालरशिप जैसी सुविधाएं देने की भी जरूरत है. सरकार को सबसे पहले किसानों व  गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति को इतना मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिये कि उसका परिवार ठीक से चल सके. किसान अगर सही तरह से अनाज उत्पन्न नहीं कर सकेगा तो वह राज्य व परिवार को क्या खिला पायेगा? सरकार ने गरीब परिवारों  के लिये कई योजनाएं शुरू की है जिनमें बच्चों को स्कूलों में मध्यान्ह भोजन,यूनिफार्म, सायकिल और अब उन्हें जूते बांटने की भी योजना है.इससे कई बच्चों को लाभ जरूर होगा मगर योजनाएं बनने के बाद जरूरत मंदों तक कैसे पहुंच रही है- किसको इसका फायदा हो रहा है इन सबकी  मानिटरिंग सही ढंग से होना भी जरूरी है. पूर्व के अनुभव बताते हैं कई योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार हुआ है और जरूरतमदों तक सरकारी मदद नहीं पहुंच पाई है..बाढ,ओला, सूखा की स्थिति से निपटने के लिये गांवों में स्थाई योजनांए बनाने की जरूरत है तभी किसान अपनी इस ओर जाने वाली चिंताओं से मुक्त होकर खेती किसानी केकाम को मन लगाकर कर सकेगा. किसानों की आर्थिक स्थिति वास्तव में  इतनी चिंताजनक है कि उसका बखान नहीं किया जा सकता. सरकार बनने के पहले जो लुभावने वादे पार्टियां गांव में रहने वाले किसानों और गरीबों से करती है उनमें से अधिकांश को पूरा नहीं किया जाता अथवा बिचौलिये डंडी मार ले जाते हैं फलत: किसान व अन्य जरूरतमंद कर्ज और अन्य परेशनियों मे डूबते चले जाते हैं. किसानों को बोनस देने के मामले मे अभी भी सरकार के पसीने छूट रहे हैं. सरकार ने किसानों का धान समर्थन मूल्य पर खरीदने व प्रति क्विंटल 300 रूपये बोनस देने का वादा किया था, यदि सरकार अपना वादा सही तरह से निभाती तो किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती और घर भी रोशन होता. उजाला योजना के तहत प्रदेश के15 लाख से अधिक परिवारों को तीन तीन एलईडी बल्ब मुफ्त तथा 20 लाख से अधिक एपीएल परिवारों को 5 नग शुल्क के साथ देने का लक्ष्य रखा गया है.. किश्तों में भी बल्व देने का निर्णय लिया गया है. प्रदेश में लगभग डेढ़ लाख एलईडी बल्व वितरण करने का काम शुरू कर दिया गया है चर्चा यह चल रही है कि सरकार के पास एलईडी बल्ब देने के लिए पैसा हैं परंतु किसानों को बोनस देने की मामले में सरकार को सांप सूंध रहा है? लोग यह भी  कहते हैं कि एलईडी बल्व देने के लिए केन्द्र सरकार से रूपए आसानी से मिल जाता है परंतु किसानों को बोनस देने के मामले में सरकार क्यों हाथ खड़ा कर देती है? किसान यही कह रहा हैं कि उन्हें इस मामले में पूरी तरह गुमराह किया जा रहा है. बोनस देने का वादा केन्द्र का है,या राज्य का इसी मे उलझकर किसान अब मौत को गले लगाने मजबूर है.वास्तविकता यही है कि किसानों को बोनस देना है या नहीं देना है इसे राज्य सरकार तय करेगी. एक और ग्राम उदय से भारत उदय शुरू हुआ हैं जिसपर लाखों रूपये खर्च किए जा रहे हैं वहीं इस योजना को सफल बनाने गांव में किसानों की बैठक, किसानों की सभा की जा रही है वहीं यह किसान ेबोनस की  बाट जोह रही है। किसानों अपने दर्द को सुनाते हुए यह भी कहते हैं कि सरकार से हमने जब अपने खेतों में खड़ी फसलों को बचाने के  लिए पानी मांगा तो सही समय पर पानी नहीं दिया जिससे उन्हें इस वर्ष भारी नुकसान उठाना पड़ा  कहीं कहीं तो स्थिति यहां तक निर्मित हो गई कि किसानों ने धान का एक दाना भी नहीं काटा। देश सहित प्रदेश भी आज सूखे के स्थिति से जूझ रहा है.अभी सभी को महंगाई के साथ-साथ गर्मी से भी राहत की जरूरत है. कई गांवों में पीने व निस्तारी पानी का भी भारी संकट हैं उससे भी निजात दिलाने की जरूरत है. सरकार के ऊपर और भी कई गहन जिम्मेदारियां हैं!

हां हम विश्वास कर सकते हैं, इस साल बारिश अच्छी होगी!




हमारा मौसम विभाग कितना सटीक है वह हमें  इस साल अर्थात कम से कम दो महीने बाद पता चलेगा वैसे गलत भविष्यवाणी के कारण हम अपने मौसम विभाग को कोसते रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक के उसके दावों पर नजर डाले तो  वह जो कहता है वही  हो रहा ह है इसलिये अब हम दावे के साथ तो नहीं  हां विश्वास के साथ यह कह ही सकते हैं कि इस वर्ष मानूसन बेहतर होगा. इस साल औसत छह प्रतिशत अधिक बारिश होने का अनुमान है मौसम विज्ञानी  लगे रहे हें. भारी गर्मी  पडऩे से भी  इस संभावना को बल मिल रहा है कि   देश में 104 से 110 प्रतिशत के बीच बारिश हो सकती है, यानी इस साल मानसून औसत 106 प्रतिशत पर रह सकता है.मौसम विभाग ने पिछले एक दशक से लगभग सही  सही अनुमान लगाया है सिर्फ एक दो प्रतिशत ही इधर उधर हुआ है. सन् 2005 में उसने कहा था- 98 प्रतिशत बारिश होगी और बारिश हुई 99 प्रतिशत एक प्रतिशत ज्यादा.  2006 में 93 प्रतिशत की जगह 100 प्रतिशत, 2007 में 95 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2008 में 99 प्रतिशत की  98 प्रतिशत, 2009 में 96 प्रतिशत की जगह 78 प्रतिशत, 2010 में 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2011 में भी 98 प्रतिशत की जगह 102 प्रतिशत, 2012 में 99 प्रतिशत की जगह 93 प्रतिशत, 2013 में 98 प्रतिशत की जगह 106 प्रतिशत, 2014 में 93 प्रतिशत और बारिश हुई 89 प्रतिशत  2015 में 93 प्रतिशत की जगह 86 प्रतिशत बारिश हुई. अब तक अल नीनों  की स्थिति थी अब यह कमजोर  होने लगा है बारिश अच्छी होने का एक कारण यह भी है. प्रशांत महासागर के कतिपय स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है, ऐसी स्थिति में अल नीनो से विपरीत घटना होती है जिसे लॉ-नीना कहा जाता है. लॉ नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है. मसलन, 2009 में अल नीनो के कारण कम बारिश हुई, जबकि 2010 व 2011 में ला नीना से अच्छी बारिश हुई.,. दूसरी तरफ 1997 में अल नीनो प्रभाव के बावजूद देश में अच्छी बारिश हुई. मानसूनी हवाएं मई के दूसरे सप्ताह में हिंद महासागर में उत्पन्न होती हैं और बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान निकोबार द्वीपों में दस्तक देती हैं। मानसूनी हवाएं बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ती हैं और हिमालय से टकरा कर वापस लौटते हुए उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को भिगोती हैं. एक जुलाई तक मानसून देशभर में छा जाता है.देश के अनेक क्षेत्रों में जो जल संकट हैं उसका समाधान अच्छे मानूसन से ही संभव है. हालांकि हम वर्षा के पानी  का  बेहतर परंपरागत प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं इस कारण  ढांचा एक तरह से  ध्वस्त हो गया तथा समस्याएं बढ़  गई. कम बारिश के क्षेत्रों में ही नहीं, जहां ज्यादा बारिश होती है वहां भी पानी की समस्या से लोगों को जूझना पड़ता है जिसका समाधान पानी के बेहतर प्रबंधन से ही संभव है. इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है पर प्रबंधन तभी न होगा, जब बारिश हो. पर्याप्त वर्षा से नदियों, झीलों या हर प्रकार के जलाशयों-तालाबों में पानी भर जाता है, भूजल का स्तर भी ठीक हो जाता है यानी इससे जल-चक्र का नियमन होता है. यदि मानूसन अच्छा नहीं रहा तो भूजल का भी स्तर गिर जाता है और उसे निकालने के लिए काफी खर्च करना पड़ता है. वास्तव में बारिश से सबसे ज्यादा प्रभावित हमारी कृषि होती है और यह कई प्रकार से होती है. असिंचित क्षेत्र में बारिश ही सिंचाई का एकमात्र साधन है और फसल लहलाने का आधार भी. लेकिन जहां सिंचाई के साधन हैं वहां भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है कमजोर मानसून के कारण खाद्यान्न पैदावार वर्ष 2014-15 (जुलाई से जून) में घट कर 25 करोड़ 20 लाख टन रह गई जो उसके पिछले वर्ष 26 करोड़ 50 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर थी.अगर पैदावार अच्छी है तो उसमें लागत कम है तो इसका असर महंगाई पर पड़ता है,यानी महंगाई कम होगी। इससे पूरी अर्थव्यवस्था को ताकत मिलती है इससे अर्थव्यवस्था की गति तेज होगी।ब्याज दर घटेगी.भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि अगर मानसून अच्छा हुआ तो हमारी विकास दर आठ प्रतिशत के आसपास रह सकती है अर्थात  विकास की गति भी मानसून पर निर्भर है.मौसम विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि किस प्रदेश में कब मानूसन आएगा, इसके अनुसार केरल में मानसून एक जून को आएगा तो हैदराबाद और गुवाहाटी में पांच जून को, मुंबई तथा रांची में दस जून को, दिल्ली उनतीस जून तक पहुंचेगा. इन संकेतों से साफ है कि छत्तीसगढ़ में भी मानसून अपने निर्धारित समय पर दस्तक दे देगा, इससे किसानों को अपनी फसलों के लिए पूर्व तैयारी का संदेश मिल गया है.

रविवार, 24 अप्रैल 2016

काली कमाई खदान की रेंज से 'खाखी कैसे गायब रहती है?




 इसमें दो मत नहीं कि छत्तीसगढ़ की एसीबी एक के बाद एक काली कमाई के धनकुबेरों को खोज खोज के बाहर निकाल रही है लेकिन आम लोगों में कई प्रश्न इन छापों के बाद उत्पन्न होते हैं जिसका जिक्र हम आगे करेंगे, पहले यह बता दे कि पिछले एक शनिवार को छोड़कर उस शनिवार एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई, रायपुर और कोरबा में अफसरों के क ई ठिकानों पर एक साथ ताबड़तोड़ छापे मारकर कई करोड़ की काली कमाई का भंडाफोड़ किया था बिलासपुर में तो छापा पडऩे के बाद पीएमजीएसवाय के ईई ने भ्रष्टाचार के 40 लाख बचाने के लिए पूरे पैसे पिलो में भरा और बाहर फेंक दिया- हम यह बता दे कि एसीबी छत्तीसगढ़ सरकार का एक उपक्रम हैं जो सिर्फ पुलिस वालों को मिलाकर बनाया गया है, इस विभाग के अधिकारियों को शिकायत मिलती है तो बाहर सेे और टीम लेकर छापे की कार्रवाही होती है शनिवार इस विभाग का पसंदीदा दिन है अधिकांश  छापे के लिये इसी दिन को चुना जाता है अंक भी शायद यह चुनकर रखते हैं पिछले छापे में आठ अधिकारियों की अलग अलग टीम थी इस बार जब छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, अम्बिकापुर, कोरिया और रायगढ़ समेत कई जिलों में  छापा पड़ा तो भी 9 अधिकारियों की टीम ने 13 अलग-अलग ठिकानों पर शनिवार की सुबह दस्तक दी.संदेह नहीं कि छापेमारी में करोड़ों की काली कमाई उजागर हो सकती है.इस बार छापा शिक्षा, विपणन ,सिंचाइ्र,खाद्य विभाग के अफसरों तथा पटवारी के ठिकानों पर पड़ा.हम यह पहले भी  कह चुके हैं कि छत्तीसगढ़ में जिस प्रकार कोयले, हीरे,सोना  बाक्साइट, एलूमीनियम आदि की खदाने हैं ठीक उसी प्रकार काली कमाई केे कुबेरों का बड़ा खदान है कोयले की खदान में तो सौ साल से ज्यादा का कोयला नहीं हो सकता लेकिन इन कुबेरो के पास कई पीडियों के लिये धन सुरक्षित है. एसीबी के छापों की बात करें तो वे अपने हिसाब से तो सब ठीक कर रहे हैं लेकिन लोगों की नजर में सब ठीक ठाक नहीं चल रहा. सवाल यह उठा रहे हैं?  पहली बात तो यह कि राज्य बनने  और राज्य बनने के बाद के पूर्व के वर्षो में एसीबी  के जितने  भी छापे पड़े हैं, वह सब ऐेसे लोगों के ठिकानों पर पड़े है जहां के लोगों के बारे में सार्वजनिक  तौर पर लोगों को मालूम है कि यह पैसा कमाते हैं किन्तु जिस विभाग से एसीबी के लोगों ताल्लुख है अर्थात खाखी उसपर उसकी नजर क्यों नहीं पड़ती? क्या  यह विभाग पूर्णत: दूध का धुला साफ सुथरा है कइयों की अकूट संपत्ति और भ्रष्ट आचरण तो किसी से छिपा भी नहीं है.दूसरी सबसे महत्पपूण्र्ण बात यह कि एसीबी अपने छापों की कार्रवाही की सूचना तो तत्काल  मीडिया तक किसी न किसी माध्यम से पहुंचा देती है लेकिन कार्रवाही का फालोअप क्या हुआ यह क्यों छिपाकर  रखा जाता है?. या तो आप कार्रवाही के बाद खूब प्रचार प्रसार के बाद फाइलों को लटकारक रख देतेे हैं या फिर कोई कार्रवाही न कर पाने के काराण आप  अपनी कार्यशैली का खुलासा करना ही नहीं चाहते. कई अफसर, बाबू, पटवारी  जिनपर कार्रीवाही होती  है वे भ्रष्ट आचरण के बाद भी विभाग में ही  क्यों बने रहते हैं? क्यों नहीं इनकी सेवाएं तत्काल खत्म कर दी जाती? जब सरकारी पैसा चुराया गया है तो उनपर चोरी का जुर्म भी लगाकर क्यों नहीं जेलों में ठूसा जाता? क्यों उनकी संपत्ति जप्त कर इसका सार्वजनिक  विवरण पेश किया जाता?. हम कह सकते हैं कि इन सब सवालों का जवाब इस विभाग के पास यही  होगा कि कानून के दायरें में जो बाते हैं वही हम कर रहे हैं? सरकार को इस बात की  सिफारिश तो की जा सकती है कि ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाही कर उसे सार्वजनिक किया जाये ताकि दूसरे लोगों में भी  डर बना रहेे. आज की स्थिति में जब किसी के यहां छापा पड़ता है तो कुछ समय के लिये उसके सामने तो अंधेरा छा जाता है लेकिन अन्य लोगों के सामने वह हीरो और पैसे वाला व्यक्ति के रूप में प्रसिद्व हो जाता है.अब यह बात किसी से छिपी  नहीं है कि सरकार के प्राय: हर विभाग- चाहे उनमें से कुछ में तो भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश नहीं है फिर भी लोग रेत से तेल निकालने का काम कर रहे हैं ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार को एसीबी जैसी  संस्था को ज्यादा से ज्यादा ताकतवर बनाये.जिसकों सीबीआई की  तरह अधिकार प्राप्त हो तथा इसमे ऐसे अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति की  जाये जिनका सरकारी काम करते हुए रिकार्ड कभी खराब न रहा हो. पुलिस के अलावा अन्य  विभागों के कर्मचारियों को भी इसमें डेपुटेशन पर रखा जाना चाहिये जो अपने विभाग के बारे में पूर्ण जानकारी रखते हो.इस मौके पर  हम मध्यप्रदेश के पूर्व राज्यपाल केएम चांडी के उस बयान को इंगित करना चाहते हैं जिसमें उन्होंने कहा था ''भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी सेवक को जत्काल सेवा से बर्खास्त कर देना चाहिये तथा सरकार को उसकी पूरी संपत्ति भी तत्काल जप्त कर लेना चाहिये.ÓÓ

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों पर राज्य सरकारों का रूख क्या होगा?



सरकारी जमीन और सरकारी सड़क दोनों ही पूरे देश की सरकारों के लिये मुसीबत बनी  हुई है.जहां निजी भूमि पर कुछ दबंग अपनी जोर आजमाइश करते हैं वहीं कुछ लोग ऐेसे भी हैं जो अपनी धन दौलत के बल पर जमीन को अपने कब्जे में करने लगे हैं. कांक्रीट के बढते जंगल के बीच आज सबसे मुसीबत बेजर कब्जर है विकसित होते शहरों की सड़को के आजू बाजू बेजा कब्जों की समस्या.  कब्जेधारियों के रहते सड़कों की चौड़ाई कम होती जा रही है तथा यह ट्रैफिक के लिये गंभीर समस्या बन रही है. बेजा कब्जे की नइ्र्र -नई टेक्नीक रोज अस्तित्व में आती है तथा लोग इसमें कामयाब भी हो रहे हैं और फिर जब इन्हें हटाने पहंचते हैं तो संगठित होकर विरोध भी करते हैं.करीब सात साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने खाली जमीन पर कब्जा कर अवैध रूप से बनाए गए पूजा-स्थलों के खिलाफ सख्त दिशा-निर्देश जारी किया था तब अदालत ने कहा था कि सड़कों, गलियों, पार्कों, सार्वजनिक जगहों पर मंदिर, चर्च, मस्जिद या गुरद्वारा के नाम पर अवैध निर्माण की इजाजत नहीं दी जा सकती लेकिन इतने साल बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल सुनिश्चित नहीं हो सका है तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? धर्म और आस्था ऐसा संवेदनशील मसला है कि इससे जुड़ी कोई भी बात दखल से परे मान ली जाती है, भले उसमें किसी व्यक्ति या समूह का निहित स्वार्थ हो इसलिए अदालत की इस टिप्पणी का आशय समझा जा सकता है कि क्या हम अपने आदेश किसी कोल्ड स्टोरेज में रखने के लिए देते हैं! अब फिर सुप्रीम कोर्ट ने इससे संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि सार्वजनिक जगहों और फुटपाथ पर गैरकानूनी तरीके से जो धार्मिक ढांचे बनाए गए हैं, वह आस्था का मामला नहीं है; कुछ लोग इसकी आड़ में पैसा बना रहे हैं; फुटपाथ पर चलना लोगों का अधिकार है और भगवान उसमें कतई बाधा नहीं डालना चाहते! माना जाता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उस पर अमल होगा, मगर हकीकत यह है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपनी ओर से इस मामले में आदेश का पालन करना जरूरी नहीं समझा. शायद यही वजह है कि अदालत ने इस बार सख्त रवैया अख्तियार करते हुए संबंधित पक्षों को आखिरी मौका देने की बात कही है. इसके बाद सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को अदालत में पेश होना पड़ सकता है।धर्म और आस्था ऐसा संवेदनशील मसला है कि इससे जुड़ी कोई भी बात दखल से परे मान ली जाती है, भले उसमें किसी व्यक्ति या समूह का निहित स्वार्थ छिपा हो बल्कि इसे तब भी सही ठहराने की कोशिश की जाती है जब उससे देश के कानूनों का उल्लंघन होता हो. देश भर में बनाए गए अवैध पूजा-आराधना स्थलों के बारे में यही सच है.अमूमन हर शहर या मुहल्ले में सड़कों के किनारे लोग बिना इजाजत के धार्मिक स्थलों का निर्माण कर लेते हैं. इसमें न सिर्फ सड़कों के किनारे फुटपाथों या दूसरी खाली जगहों पर कब्जा जमा लिया जाता है, रास्ते अवरुद्ध होते हैं, बल्कि इससे आस्था की संवेदना भी बाधित होती है मगर इससे उन लोगों को शायद कोई मतलब नहीं होता जो धार्मिकता के नाम पर उन पूजा-स्थलों का संचालन करते हैंजाहिर है, मकसद न सिर्फ जमीन, बल्कि उन स्थलों पर भक्तों की ओर से चढावे के तौर पर आने वाले धन पर भी कब्जा करना होता है.विडंबना है कि हमारे देश में जो भी चीज आस्था या धार्मिकता से जोड़ दी जाती है, उसके गलत होने के बावजूद लोग उस पर कोई सवाल उठाने से बचते हैं। इसी सामाजिक अनदेखी की वजह से धार्मिक स्थलों के नाम पर देश भर में जमीन कब्जाना आज एक तरह का कारोबार बन चुका है. समझा जा सकता है कि इस धंधे में लगे लोगों की नजर में साधारण लोगों की आस्था या संवेदना की क्या कीमत होगी। मगर यह समझना मुश्किल है कि निजी मकान बनाने से संबंधित हर जानकारी रखने और अवैध होने पर कार्रवाई करने को तत्पर रहने वाला सरकारी तंत्र सार्वजनिक जगहों पर होने वाले ऐसे निर्माण को किस आधार पर खुली छूट दे देता है. यह आस्था के नाम पर न सिर्फ जनमानस के साथ छल, बल्कि खुलेआम पर कानूनों का भी उल्लंघन है.सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण पालन करते हुए सभी  शहरों में आस्था स्थल विभिन्न स्थानों से हटवाकर सिर्फ एक ही स्थान पर जैसा भिलाई इस्पात संयत्र के सेक्टर छै में किया गया है वैसा निश्चित कर देना चाहिये. गली कूचे व सड़को के किनारें के आस्था स्थलों से न सिर्फ भक्तों का ध्यान बंटता है बल्कि पूरी व्यवस्था को भी  चुनौती मिलती है.


बुधवार, 20 अप्रैल 2016

बुलेट ट्रेन से पहले...स्वच्छता,सुरक्षा, सुविधा पर कौन ध्यान देगा?




स्पेन से बुलेट ट्रेन कल इंडिया पहुंच जायेगी लेकिन छत्तीसगढ़ एक्सपे्रस के यात्री परेशान हैं कि उनकी ट्रेन में इतनी गंदगी है कि उसमें बैठना तो क्या घुसना भी मुश्किल है. रेलवे अब भी कुछ न कुछ बहाना बनाकर जहां यात्रियों से ज्यादा पैसे वसूलने की तैयारी में हैं वही जिन सुविधाओं की बात कर रही है वह इतनी बदतर है कि लोगों का विश्वास ही रलवे पर से उठने लगा है. अभी कुछ दिन पहले ही जहां एक ट्रेन की बोगी में चूहा मरने के बाद निकली बदबू से हंगामा हुआ था तो छत्तीसगढ़ से चलने वाली ट्रेन ने तो रेलवे की  स्वच्छता के सारे दावों की पोल ही खोलकर रख दी.यात्रियों का तो यहां तक कहना है कि पूरे छत्तीसगढ़ जोन में कई ट्रेनों में साफ-सफाई हो ही नहीं रही है. शिकायत पर तत्काल कार्रवाही के दावे भी खोखले साबित हो रहे हैं.सफाई के मामले में रेलवे जितना दोषी है उससे कई गुना ज्याद यात्री भी दोषी है जिनके आचरण के कारण ही ज्यादातर कोचों में गंदगी बिखरी पड़ी रहती है. कूपे में कोई गुटखा, पान, स्नेक्स आदि खाकर फेंक देता है तो सीटों के बीच भी में मिट्टी और धूल तक को कोई साफ करने वाला नहीं रहता. कोच के अटेंडर से इसकी शिकायत करने के बाद भी वह अपनी असमर्थता प्रकट कर देता है.सफाई का हाल कुछ यूं हैं तो आरक्षित व सामान्य यात्रियों की सुरक्षा का भी कोई सही इंतजाम अभी तक नहीं हो पाया है. प्रचार बहुत किया जा रहा है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिये हेल्प लाइन और फोर्स आदि लगी है लेकिन न किसी को सुरक्षा मिल रही है और न ही किसी कि सुनवाई हो रही है. यह इसी से स्पष्ट हो रहा है कि एक महिला को लूटने वाले पर किसी प्रकार की कार्रवाही नहीं हुई ऊपर से महिला को उससे डरकर ट्रेन से कूदना पड़ा. यह महिला अस्पताल में जीवन और मृत्यु से गुजर रही है. अपराधी अपराध करते समय किसी से पूछकर नहीं करते लेकिन ऐसा न हो इसक ी व्यवस्था ट्रेनों में करने की जिम्मेदारी रेल्वे की है. रेलवे कानून बनाकर उन्हें उनकी किस्मत पर छोड़ देता है. जैसे सेल्फी का मामला है- सेल्फी लेने  वाला रेलवे को बताकर थोडी लेगा-कानून बन गया कि चलती ट्रेनों में मोबाइल से सेल्फी खींचना अपराध है इस अपराध को देखने  वाले कितने आरपीएफ के जवान डिब्बों में तैनात रहेंगे, यह भी रेलवे को स्पष्ट करने की जरूरत है. ठीक है एक दो सपड़ में आयेंगे- जुर्माना भी भरेंगें जेल भी जायेंगे लेकिन क्या हर समय ऐसे लोगों पर निगरानी रहेगी? क्या रेलवें ने अपनी हर ट्रनों में सीसीटीवी लगा रखा है? यह सही है कि सेल्फी लेने की वजह से दुर्घटनाएं  हो रही है कि न्तु इसके साथ- साथ कई तरह के अपराध भी हो रहे हैं. असल  में आज की परिस्थिति यही कह रही है कि यात्रियों की पूर्ण सुरक्षा के लिये हर ट्रेन मे सीसीटीवी होनी चाहिये तथा हर ट्रेन में सुरक्षा के लिये पर्याप्त स्टाफ व अधिकारी भी होने चाहिये.सेल्फी पर कदम उठाने का निर्णय सराहनीय है मगर कथनी और करनी  में अंतर भी नहीं होना चाहिये चूंकि  मुंबई-हावड़ा एक्सप्रेस से 4 अप्रैल को राजनांदगांव निवासी रजनीश कुमार ,15 अप्रैल को कवर्धा निवासी श्याम कुमार की  लोकल ट्रेन मेें दुर्ग से रायपुर आते समय सेल्फी खीचने के चक्कर में हादसा हो चुका है.दूसरी तरफ रेलवे बुलेट ट्रेन की बात कर रही है जो कहीं भी आम आदमी के लिये न होकर सिर्फ खास आदमी के लिये बन रही है.एक बुलेट ट्रेन रोज 88 हजार से 1.18 लाख लोगों को सफर कराएगी तब जाकर रेलवे बुलेट ट्रेन का लोन चुका पाएगी। क्या इस गरीब देश में गरीब यात्रियों के बीच यह संभव हो पायेगा?एक बुलेट ट्रेन 200 किलोमीटर प्रतिदघंटे की रफतार से दौडऩे वाली- कल आने  वाली है-कितना पैसा हमें देना पड़ेगा और क्या यह सफल  होगा? यह सब अभी गर्त में हैं चूंकि अब तक हमारे देश की तो कोई भी गतिमान ट्रेन इंडियन टे्रेकों पर डेढ़ सौ किलोमीटर से ऊपर नहीं दौड पाई है. अहमदाबाद की एक रिपोर्ट के अनुसार मुंबई और अहमदाबाद के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन अगर रोजाना 100 फेरे लगाए तो ही आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद होगी. रेलवे को कर्ज और ब्याज समय पर चुकाने के लिए परिचालन शुरू होने के 15 वर्ष बाद तक 300 किलोमीटर की यात्रा के लिए टिकट का मूल्य 1500 रूपया निर्धारित करना होगा और प्रतिदिन 88,000-118,000 यात्रियों को ढोना होगा-क्या यह संभव है? जापान ने 15 वर्ष का कर्ज अवकाश दिया है इसलिए रेलवे के लिए राजस्व की चिंता 16वें वर्ष से शुरू होगी.अभी जब बुलेट ट्रेन नहीं चल रही है तब जो किराया आम आदमी दे रहा है वह इतना ज्यादा है तो उसके लिये बुलेट ट्रेन तो संभवत: उसी प्रकार है जैसे चांद पर सफर कराने ले जाने की बात-हम अगर बुलेट ट्रेन  मंगाकर चला भी लेंगे तो क्या रेलवे मांग के अनुसार यात्रियों को जुटा पायेगा? चूंकि किराया इतना ज्यादा है कि उसे यात्रियों को फेरे ज्यादा बढ़ाने के बाद भी  आकश्रित करना आसान नहीं होगा.






सोमवार, 18 अप्रैल 2016

घटनाओं के बाद क्यों बनती है पुलिस वाचाल!




एक दिन में पांच महिलाओ के गले से चैन लूटने का एक नया रिकार्ड कायम हुआ है छत्तीसगढ़ के सिर्फ दो शहरो में।ं इनमें चार के गले  से चैन निकालने में लुटेरे सफल रहे तो एक में सफलता नहीं मिली. एक दिन के दौरान कुछ ही घंटो में इतनी घटनाओं को पुलिस की नाक के नीचे अंजाम देना लुटेरों के साहस का एक अद्भुुत नमूना ही कहा जायेगा-अगर पिछले चैन स्नेचिंग के इतिहास तरफ नजर दौड़ाये तो एक ही समय में इतनी बारदातें कभी नहीं हुई.हां आज खबर हैं इस घटना के पूर्व ग्वालियर में भी ऐसा कुछ हुआ जबकि इससे पूर्व चैन स्नेेचरों ने रायपुर भिलाई, दुर्ग राजनांदगांव में ऐसा करने में  दो महीने का समय लगाया. इस दौरान दो दर्जन से ज्यादा महिलाओं के गले से चैन लूटने का प्रयास हुआ है और सभी में सफल रहे हैं. इन  मामलों में दो लुटेरों को पकड़े जाने के बाद लोगों को काफी राहत मिली थी कुछ को उनका लूटा सोना वापस मिला लेकिन कुछ अभी भी थानों के चक्कर  लगा रहे हैं उसी प्रकार की घटना के अचानक शुरू हो जाने से महिलाओं में सोना पहनकर निकलना एक दहशतभरी बात हो गई हैं छत्तीसगढ़ में चोर-लुटेरे कितने शातिर हैं उसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि दुर्ग से लेकर रायपुर तक वे एक के बाद एक पांच वारदात करते चले गये लेकिन कहीं पुलिस के हाथ नहीं लगे.अपराधियों के स्मार्टनेस का अदंाज इससे भी लगता है कि वे मोटर सायकिल में यातायात नियमों का पूरा पालन करते हुए हेलमेट की अनिवार्यता का पूरा पालन करते हुए वारदात को अंजाम दे रहे हैं.पूर्व के लुटेरों की तरह इन लुटेरों ने भी वैसी ही वारदात की है जैसा उनके पूर्वजों ने  की थी. दुर्ग शहर में पहली वारदात की, उसके बाद बिना किसी खाखी बाधा के राजधानी में एक के बाद एक सीरियल चैन स्नेचिगं कर पुलिस को गंभीर चुनौती दे डाली.अचानक इस नये गिरोह के पैदा होने  से पुलिस का चिंतित होना स्वाभाविक है.लुटेरों ने बुधवार  की शाम दुर्ग में 5 बजे पहली वारदात की,उसके बाद संभवत वही लुटेरे हाइवे से शाम 7 बजे टिकरापारा पहुंचे और एक महिला की चेन खींची, फिर करीब 7.15 बजे तेलीबांधा और 7.30 बजे फाफाडीह में महिलाओं से चेन लूटकर फरार हो गए. इसके बाद करीब 8.15 बजे खमतराई में भी पांचवीं चेन लूटने का प्रयास किया, हलांकि इस बार वे सफल नहीं हो पाए.रायपुर और दुर्ग पुलिस दावा कर रही है कि उन्हें लुटेरों का हुलिया मिला है.पुलिस की  कड़ी नाकेबंदी के बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा.अपराधी वारदात किसी को बताकर नहीं करते लेकिन हमारी  पुलिस उनके द्वारा घटित घटना की छानबीन डंका बजाकर करती है.अपराधियों के गिरफतारी के पूर्व उसकी पब्लिसिटी करने में भी  कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. ओपन किताब की तरह है हमारे पुलिस की जांच प्रणाली! ''जो चाहे पुस्तक खोल के देख ले कि हम क्या कर रहे हैं-जैसे सीसीटीवी में हुलिया मिल गया, हमें मालूम है वे किधर भागे हैं, हमने एक टीम फलाने शहर के लिये रवाना की है, हमें उस गिरोह पर शक है आदि जो भी गतिविधियां होती है या तो पुलिस वाले खुद सार्वजनिक करते हैं या फिर मीडिया उसे अपने ढंग से अवतरित कर अपराधियों को मौका देती है कि वे भाग जायें.आज भी  देखिये यह बता दिया कि हमें शक है कि बाहरी जातगत गिरोंह है जो यह वारदात कर रहा हैÓÓ पुलिस क्या समझती है अपराधी अखबार नहीं पड़ते या टीवी नहीं देखते? यह आज से नहीं कई सालों से चला आ रहा  है. यहां तक बता दिया जाता है कि अपराधी इस दिशा में उस शहर की ओर भागा होगा-पुलिस के यह बहादुरीपूर्ण बयान अपराधियोंं को भागने में काफी हद तक मदद पहुंंचातेे हें. इस किस्म की वारदातों के परिप्रेक्ष्य में पुलिस को जहां अपनी कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है वहीं कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जो इस प्रकार की अंधी वारदातों को रोक सके. मसलन प्राय: सभी सार्वजनिक क्षेत्रों मे सीसीटीवी लगाना बहुत उपयोगी होगा. आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों का संबन्ध मोहल्ले के अन्य लड़कों  से जरूर होता है. पूर्व में पुलिस के लोग कतिपय ऐसे तत्वों से मिलकर उनसे अपने विरोधियों की पूरी जानकारी एकत्रित करते थे तथा उन्हीं की मदद से वे पकड़े भी जाते थे.पहले शहर में तथा रेलवे स्टेशन व सार्वजनिक स्थलों पर जेब कतरों व छोटी छोटी लूट की वारदात को अंजाम देने  वालों का बोलबाला रहता था अब ऐसे लोग या उनके चेले चपेटो ने अपने तरीकों को मोटर सायकिल-कार व अन्य मंहगी  वाहनों के साथ मोबाइल के जरिये काफी हाईटेक कर लिया है.हमें उम्मीद है कि राजधानी पुलिस इस गिरोह को भी तुरन्त अपने शिकंजे में कसेगी क्योंकि छत्तीसगढ़ की जनता को उस पर विश्वास है कि उसने एक माह पहले ही यूपी के दो शातिर चेन लुटेरों को गिरफ्तार कर अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया था. इस गिरोह ने रायपुर, दुर्ग-भिलाई में 16 घटनाओं को अंजाम दिया था.इनका एक साथी फरार है। पुलिस इस आधार पर भी जांच कर रही है.हम यह पहले भी कह चुके  है कि पुलिस को इस समय बेखौफ मोटर सायकिल में घूमने वाले कतिपय लफूटों पर सघन निगरानी  की जरूरत है जो कभी भी कोई बड़ी वारदात को अंजाम देकर भाग निकलते हैं.



जरूरी वस्तुओं के दामों में इजाफा, दाल फिर रूलाने की तैयारी में!



जरूरी वस्तुओं के दामों में इजाफा, दाल फिर रूलाने की तैयारी में!

आवश्यक वस्तुओं के भावों में हो रही बेतहाशा वृद्वि सभी वर्ग के लिये चिंता का विषय बन गया है. गरीब ेसे लेकर उच्च वर्ग तक सभी के लिये यह परेशानी की बात है कि वस्तु जिसमें रोजमर्रा उपयोग मे आनी वाली वस्तुएं भी शामिल हैं के भावों में दिन प्रतिदिन बढौत्तरी हो रही है. इसमें सबसे ज्यादा चिंता का विषय तो उन पैकेज वाली वस्तुओं के दाम है जिनके भावों में पिछले दो तीन माह के दौरान लगभग लगभग दो गुनी वृद्वि कर दी गई है. कंपनियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के दामों पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण कहीं से भी नहीं है. उपभोक्ता इन वस्तुओं को जैसे साबुन, तेल, ब्लेड आदि को कंपनियों द्वारा निर्धारित मनमानी कीमतों पर खरीदना मजबूरी हो गई है. किराना व थोक दुकानदार स्वंय यह बता रहे हैं कि कीमतों में अचानक वृद्वि हुई है गर्मी के  दौरान इस बार वस्तुओं में जिस प्रकार बढौत्तरी की गई है वह एक रिकार्ड है. बच्चों को उपयोग में आने वाले हर फूड आइटम के भावों में अनाप शनाप वृद्वि कर दी गई है. अब इस बात की सूचना मार्केट में पहुंच गई हैै कि दालों के भाव में बेतहाशा वृद्वि होने वाली है-इस खबर के वायरल होने के बाद जमाखोर सक्रिय हो गये हैं और दाल को दो सौ रूपये तक में बेचने की तैयारी कर ली है. उड़द दाल की खुदरा कीमत के बारे में कहा यह जा रहा है कि यह दो सौ पचास रूपये प्रतिकिलों तक पहुंच जायेगा. वित्त मंत्री  अरूण जेठली ने  अपने 2016-17 के बजट में इडली -दोसा सस्ता किया था लेकिन जब उडद दाल की कीमत ढाई सौ रूपये तक पहुंच जायेगी तो यह स्वाभाविक है कि आम आदमी के खाने वाली इस वस्तु की कीमत भी बढ़ा दी जायेगी फिर इस बजट का लाभ किसे मिलने वाला? दाल व्यापारी कह रहे हैं कि स्टॉक करके रखने पर जेल भेजे जाने के डर से व्यापारियों के पास दाल का स्टॉक नहीं है. पिछले साल दालों की कीमत 200 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक हो गई थी, इस बार भी दाल इसी या इससे ज्यादा की कीमत में बिक सकती है. अभी हाल यह है कि दाल के भाव में तेजी से बढ़ौतरी दर्ज की जा रही है, कारोबारियों के पास दाल का स्टॉक नहीं होने की वजह से दाल के दाम में अभी 20-25 फीसदी और तेजी आ सकती है. दाल के उत्पादन में भी उम्मीद के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हुई है वहीं स्टॉक रखने पर भारी जुर्माने व जेल जाने के डर से दाल आयातकों ने दाल का आयात भी पिछले साल के मुकाबले कम किया है.यहां यह बता दे कि देश में लगभग 185 लाख टन दाल का उत्पादन होता है जबकि घरेलू खपत 220 लाख टन के आसपास है. हर साल भारत को लगभग 35-37 लाख टन दाल का आयात करना पड़ता है. दाल के थोक कारोबारी बता रहे हैं कि दालों में तेजी का रुख बना हुआ है. अरहर दाल का थोक भाव अभी 145-150 रुपये प्रति किलोग्राम तक चल रहा है वहीं उड़द दाल के थोक दाम 175 रुपये प्रति किलोग्राम, मसूर दाल के थोक दाम 80 रुपये प्रति किलोग्राम तो चना दाल के थोक भाव 57 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गए हैं.चना दाल का यह रिकार्ड भाव है. पिछले साल दाल की कीमत 200 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक होने के बाद सरकार ने आयातकों के यहां भी छापेमारी की कार्रवाई की इसलिए इस बार वे डर से सीमित मात्रा में दाल का आयात कर रहे हैं. मार्च महीने में चने की नई फसल आती है और इस दौरान चने की दाल में नरमी का रुख होता है, लेकिन अभी चने की दाल की थोक कीमत 57 रुपये प्रति किलोग्राम तक है, पिछले साल सरकार ने दाल का बफर स्टॉक बनाने की बात की थी ताकि कीमत पर नियंत्रण रखा जा सके, लेकिन सरकार के बफर स्टॉक से अब तक दाल की आपूर्ति नहीं हुई है. दाल जहां रूलाने वाली है वहीं रोजमर्रा की अन्य वस्तुओं के दाम भी सारी हदों को पार कर रहे हैं. सरकार का नियंत्रण खाद्य पदार्थो तक ही न होकर हर उपभोक्ता वस्तुओं तक होना चाहिये.  मार्केट की स्थिति का आकलन एसी  के बंद कमरों में सिमटकर रह जाता है.यही वजह है कि पैक्ड आइटम कै भावों में मनमानी वृद्वि की जा रही है. उपभोक्ता जिसके पास पैसा है वह हर  वस्तु किसी भी स्थिति में खरीद सकता है लेकिन एक कम आय वाला कैसे इस मंहगाई से निपटे? 

नशेकी लत यूं और कितने परिवारों की खुशियां छीनेगी?


बोलचाल की भाषा में बात करें तो हर प्राणी को ईश्वर ने एक जिंदगी दी है, उसे उसी के अनुसार जीना है.उसी की मर्जी से उसे अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचना है लेकिन आज ऊपर वाले कीमर्जी के खिलाफ हर व्यक्ति अपनी जिंदगी जी रहा है.व्यक्ति या प्राणी जो जीवन जीता हैं उसमे कभी खुशी कभी गम की स्थिति रहती है.इसके पीछे कारण यही है कि हम सभी उनके नियमों के खिलाफ जीने की तमन्ना रखने लगे हैं.इसका परिणाम यह निकल रहा है कि प्राय: हर रोज किसी न किसी को इसका खामियाजा भरना पड़ता है.प्रतिदिन हमारे सामने घटित होने वाली  घटनाओं से तो यह साफ नजर आने लगा है कि ईश्वरीय शक्ति के विरूद्व जाकर जो लोग रास्ता तय करने की कोैशिश करते हैं वे न केवल खुद गर्त में जाकर गिरते हैं बल्कि कई अन्य लोगों को भी इसकी चपेट में ले लेते हैं. वास्तविकता यही है कि मनुष्य आज नशे में जी रहा है.किसी को यह नशा दौलत का हैं तो किसी को अपने पद व प्रभाव का तो कोई  ऐसा भी है जो गम को दूर करने और अत्यन्त खुशी को व्यक्त करने के लिये नशे में डूब जाता है- शराब और ड्रग का नशा मनुष्य को किसी भी सूरत में फायदा नहीं पहुंचाता बल्कि मनुष्य को इससे नुक्सान ही पहुंचाता है कभी तो यह अपनों से भी दूर कर देता है.देश में करीब दो लाख करोड़ रूपयें की शराब लोग हर साल पी जाते हैं इसमें पुरूष भी हैं और महिला भी, लेकिन पुरूषों का प्रतिशत ज्यादा है.हर साल चार लाख के करीब लोग सड़क हादसों मे मारे जा रहे हैं.नशावृत्ति के कारण कई परिवार टूट रहे हैं. नशा इतना भयंकर है कि इसमें सब कुछ तबाह हो जा रहा  है.अब अंतागढ़ की उस मेटाडोर दुर्घटना को ही ले लीजिये- नारायणपुर के गुरिया गांव में दुल्हन को विदा कर बाराती दुर्ग कोंदल विकासखंड के पास गुडफेल के लिये निकले थे, अनियंत्रित मेटाडोर एक पेड़ से टकराई और उसके बाद पलट गई.सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही ने दस व्यक्तियों को तो एक ही समय मे इस दुनिया से उठा लिया वहीं पैतीस अन्य को बुरी तरह जख्मी कर दिया.दुर्घटना के बाद शादी की खुशिया अचानक गम में  बदल गई.मेटाडोर के चालक के बारे मे बताया जाता है कि वह बुरी तरह नशे में था.यह पहला मौका नहीं है जब नशे में गाड़ी चलाते हुए कई जिदंगियां एक साथ खत्म हुई है. मेटाडोर का ड्राइवर नशे की हालत में वाहन चला रहा था इसकी जानकारी सारे बारातियों को थी, यहां तक कि बारातियों में से भी कई नशें में रहे होंगे लेकिन यह भी सवाल उठता है कि इस आयोजन में शामिल होने वाले किसी बड़े बुजुर्ग ने गाड़ी रवाना होने के पूर्व नशें में लडख़डाते ड्रायवर को गाड़ी चलाने से रोका क्यों नहीं? अगर वे चाहते तो उसे रोककर किसी दूसरे को स्टियरिंग सम्हालने को कह सकते थे. दूसरी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र की पुलिस क्या कर रही थी? इतने लोगों से भरी मेटाडोर वह भी नशें में दुत्त ड्रायवर कई लोगों की जिंदगी  से सड़क पर खेलता रहा और किसी पुलिसवालों ने इस क्षेत्र में उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की.इससे यह भी अंदाज लगाया जा सकता है कि इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पुलिस अपने कर्तव्य के प्रति कितनी जागरूक  है? नशे में चूर ड्रायवर के कारण् 11 लोगों की जिंदगी एक ही झटके में मौत के आगोश में समा गई. जनप्रतिनिधि जिनके पास  इस देश और समाज को सही दिशा में आगे ले जाने की ताकत  है उन्हें इस दिशा मे सोचना चाहिये कि शराब बंदी नहीं होने से हर साल कितने जीवन यूं ही नष्ट हो रहे हैं वहीं कितने परिवार बर्बाद हो रहे हैं. इस दुखद दुर्घटना मे मृतकों को श्रद्वांजलि और घायलों के प्रति संवेधना के अलावा हम भी इस मामले में कुछ न करने की स्थिति में हैं.देश के कई राज्यों में इस दुर्घटना ने फिर एक बार साबित कर दिया कि नशे का दूसरा नाम मौत हैं-नशेड़ी ड्रायवर अचानक ग्यारह लोगों की मौत लेकर आया  ओर चला गया. जीवन भर की खुशी पल भर में खत्म हो गई. प्रकृति हमें इस दुनियां में उसके बताये नियमों के आधार पर जीने का अधिकार देता  है लेकिन जहां उसका उल्लघंन होता है वहां ऐसी घटनाएं जन्म लेती  है. सरकारें अपना खजाना भरने के लिये  शराब बिक्री करवा रही है जबकि उसे वोट देकर बनाने वाली जनता स्वंय उससेे  मांग का रही है कि हर किस्म के नशें पर पूर्ण प्रतिबंध लगायें क्यो नहीं जनता के लिये,जनता की चुनी हुर्ई सरकार उसका कहना मान रही. सरकार तत्काल  नशें पर प्रतिबंध लगायें ताकि  देश में किसी मां की गोद सूनी न हो, बहन का भाई न बिछड़़े, किसी का सिंदूर न उजड़े.  दुख व्यक्त कर चंद राशि देने से परिवार का गया व्यक्ति वापस नहीं आ जाता।

रेस्क्यू आपरेशन... और वीवीआईपी की घटनास्थल पर दस्तक!





यह पहला विवाद नहीं है जब कोई वीवीआईपी या वीआईपी के तत्काल दुर्घटना स्थल पहुंचने से रेस्क्यू आपरेशन के प्रभावित होने की बात कही गई हो. केरल के मंदिर में आगजनी के बाद अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व राहुल गांधी के पहुंचने पर वहां बवाल खड़ा हो गया कि उनके पहुंचने से राहत कर्मियों का ध्यान बंट गया तथा राहत कार्य प्रभावित हुआ. इससे पूर्व हरियाणा के खुले बोर में एक बच्चे के गिरने के बाद चले रेस्कयू आपरेशन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री हुड्डा के पहुंचने के बाद भी इसी प्रकार की  बात हुई थी-और भी कई हादसे देशभर में ऐसे हुए हैं जहां वीवीआईपी या वीआईपी के पहुंचने से रेस्कयू कार्य प्रभावित होने की बात कही गई. इसमें दो मत नहीं कि किसी भी रेस्कूय कार्य के दौरान बड़े नेताओं के पहुंचने से आप्रेशन में कुछ बाधा तो उत्पन्न होती ही है लेकिन इस मामले में जहां तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है,यहां मोदी डाक्टरों की एक पूरी टीम भी साथ लेकर गये थे-ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ. मोदी अकेले पहुंचते तो यह संभव था कि आप्रेशन में बाधा पहुंचती लेकिन अचानक बना उनका यह दौरा एक खास मकसद को लेकर था जिसमें पीडि़तों को तत्काल मदद पहुंचानी थी. हादसों में पहली प्राथमिकता पीडि़त को बचाने को लेकर ही रहती है ऐसे में अगर कोई वीवीआईपी आ जाता है तो रेसक्यू कार्य में लगे सारे अफसरों व कर्मचारियो का ध्यान पीडि़तों को छोड़कर वीवीआईपी की तरफ बंट जाता है.केरल के कोल्लम मंदिर मेंं अग्रिकांड के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी  दोनों का कार्यक्रम बना और वे वहां पहुंच भी गये. सारे रेस्क्यू  स्टाफ का डायरेक्शन पीडि़तों की और से मुडकर इन वीवीआईपी लोंगों की तरफ चला गया. केरल के हेल्थ चीफ ने सीधे सीधे कह दिया कि मोदी के आने से राहत कार्य प्रभावित हुआ और उन्हें धक्का तक दिया. केरल के अधिकारी साफ तौैर पर कह रहे हैं कि कोल्लम हादसे के बाद तिरुअनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में भर्ती घायलों से मिलने पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी और कांग्रेस वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी समेत कई वीवीआईपीज का दौरा अनुचित था. यहां मंदिर में आग लगने की वजह से 113 लोगों की मौत हो गई, जबकि बहुत सारे लोग झुलस गए थे. इन लोगों को मेडिकल कॉलेज के बर्न आईसीयू वॉर्ड में भर्ती किया गया था. हेल्थ चीफ के अलावा केरल के डीजीपी ने भी  इस मुद्दे पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा था कि सुरक्षा कारणों की वजह से वे नहीं चाहते थे कि मोदी दौरा करें, लेकिन पीएम की ओर से जोर देने की वजह से उन्हें सारे इंतजाम करने पड़े.अफसरों की  इन  सब बातों के बावजूद मोदी और राहुल गांधी  अस्पताल पहुंचे थे, यहां भर्ती आठ में से सात पेशंट बेहद नाजुक हालत में थे. डायरेक्टर ऑफ हेल्थ सर्विसेज का तो यहां तक कहना था  कि जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे इन लोगों के शरीर 60 से 90 फीसदी तक जल गए थे जब मोदी पहुंचे तो उनके साथ धक्का मुक्की हुई. सिक्युरिटी वालों से बहस करने के बाद डायरेक्टर ऑफ मेडिकल एजुकेशन और डन्हें अपने कमरों में लौटना पड़ा.यह चिकित्सक अब यह भी कह रहे हैं कि एक ऐसे अस्पताल, जहां जले हुए शरीरों और झुलसे मरीजों का जमावड़ा लगा हो, वीवीआईपीज का आना अनुचित था। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यहां के चिकित्सकों को नरेन्द्र मोदी का आना खटका या उनके साथ डाक्टरों की टीम का दिल्ली से पहुंचना खटका?शायद इन चिकित्सकों को ऐसा लगा कि उनकी क्षमता का आंकलन कम कर दूसरे चिकि त्सको को साथ लेकर पहुंचा गया. इस  बीच वे यह भी कह रहे हैं कि अगर मोदी हादसे के कुछ घंटों के भीतर आने की बजाए दो या तीन दिन बाद आते तो हमें कोई समस्या नहीं थी, वे एक ऐसे वक्त में पहुंचे जिसे हम पीडि़तों को बचाने के लिए 'सुनहरा वक्तÓ मानते हैं.बहरहाल यह मामला यहां राजनीतिक रंग ले गया लेकिन अक्सर होने वाले ऐसे हादसों के बारे में  जिसमें वीवीआई पी पहुंचते हैं उसमें कुछ तो कार्य प्रभावित होता ही है. अगर ऐसे हादसों में स्पाट निरीक्षण कर पीडि़तों को मदद पहुंचाना है तो यह काम देर से भी किया जा सकता है.

रविवार, 17 अप्रैल 2016

नशेकी लत यूं और कितने परिवारों की खुशियां छीनेगी?



बोलचाल की भाषा में बात करें तो हर प्राणी को ईश्वर ने एक जिंदगी दी है, उसे उसी के अनुसार जीना है.उसी की मर्जी से उसे अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचना है लेकिन आज ऊपर वाले कीमर्जी के खिलाफ हर व्यक्ति अपनी जिंदगी जी रहा है.व्यक्ति या प्राणी जो जीवन जीता हैं उसमे कभी खुशी कभी गम की स्थिति रहती है.इसके पीछे कारण यही है कि हम सभी उनके नियमों के खिलाफ जीने की तमन्ना रखने लगे हैं.इसका परिणाम यह निकल रहा है कि प्राय: हर रोज किसी न किसी को इसका खामियाजा भरना पड़ता है.प्रतिदिन हमारे सामने घटित होने वाली  घटनाओं से तो यह साफ नजर आने लगा है कि ईश्वरीय शक्ति के विरूद्व जाकर जो लोग रास्ता तय करने की कोैशिश करते हैं वे न केवल खुद गर्त में जाकर गिरते हैं बल्कि कई अन्य लोगों को भी इसकी चपेट में ले लेते हैं. वास्तविकता यही है कि मनुष्य आज नशे में जी रहा है.किसी को यह नशा दौलत का हैं तो किसी को अपने पद व प्रभाव का तो कोई  ऐसा भी है जो गम को दूर करने और अत्यन्त खुशी को व्यक्त करने के लिये नशे में डूब जाता है- शराब और ड्रग का नशा मनुष्य को किसी भी सूरत में फायदा नहीं पहुंचाता बल्कि मनुष्य को इससे नुक्सान ही पहुंचाता है कभी तो यह अपनों से भी दूर कर देता है.देश में करीब दो लाख करोड़ रूपयें की शराब लोग हर साल पी जाते हैं इसमें पुरूष भी हैं और महिला भी, लेकिन पुरूषों का प्रतिशत ज्यादा है.हर साल चार लाख के करीब लोग सड़क हादसों मे मारे जा रहे हैं.नशावृत्ति के कारण कई परिवार टूट रहे हैं. नशा इतना भयंकर है कि इसमें सब कुछ तबाह हो जा रहा  है.अब अंतागढ़ की उस मेटाडोर दुर्घटना को ही ले लीजिये- नारायणपुर के गुरिया गांव में दुल्हन को विदा कर बाराती दुर्ग कोंदल विकासखंड के पास गुडफेल के लिये निकले थे, अनियंत्रित मेटाडोर एक पेड़ से टकराई और उसके बाद पलट गई.सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही ने दस व्यक्तियों को तो एक ही समय मे इस दुनिया से उठा लिया वहीं पैतीस अन्य को बुरी तरह जख्मी कर दिया.दुर्घटना के बाद शादी की खुशिया अचानक गम में  बदल गई.मेटाडोर के चालक के बारे मे बताया जाता है कि वह बुरी तरह नशे में था.यह पहला मौका नहीं है जब नशे में गाड़ी चलाते हुए कई जिदंगियां एक साथ खत्म हुई है. मेटाडोर का ड्राइवर नशे की हालत में वाहन चला रहा था इसकी जानकारी सारे बारातियों को थी, यहां तक कि बारातियों में से भी कई नशें में रहे होंगे लेकिन यह भी सवाल उठता है कि इस आयोजन में शामिल होने वाले किसी बड़े बुजुर्ग ने गाड़ी रवाना होने के पूर्व नशें में लडख़डाते ड्रायवर को गाड़ी चलाने से रोका क्यों नहीं? अगर वे चाहते तो उसे रोककर किसी दूसरे को स्टियरिंग सम्हालने को कह सकते थे. दूसरी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र की पुलिस क्या कर रही थी? इतने लोगों से भरी मेटाडोर वह भी नशें में दुत्त ड्रायवर कई लोगों की जिंदगी  से सड़क पर खेलता रहा और किसी पुलिसवालों ने इस क्षेत्र में उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की.इससे यह भी अंदाज लगाया जा सकता है कि इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पुलिस अपने कर्तव्य के प्रति कितनी जागरूक  है? नशे में चूर ड्रायवर के कारण् 11 लोगों की जिंदगी एक ही झटके में मौत के आगोश में समा गई. जनप्रतिनिधि जिनके पास  इस देश और समाज को सही दिशा में आगे ले जाने की ताकत  है उन्हें इस दिशा मे सोचना चाहिये कि शराब बंदी नहीं होने से हर साल कितने जीवन यूं ही नष्ट हो रहे हैं वहीं कितने परिवार बर्बाद हो रहे हैं. इस दुखद दुर्घटना मे मृतकों को श्रद्वांजलि और घायलों के प्रति संवेधना के अलावा हम भी इस मामले में कुछ न करने की स्थिति में हैं.देश के कई राज्यों में इस दुर्घटना ने फिर एक बार साबित कर दिया कि नशे का दूसरा नाम मौत हैं-नशेड़ी ड्रायवर अचानक ग्यारह लोगों की मौत लेकर आया  ओर चला गया. जीवन भर की खुशी पल भर में खत्म हो गई. प्रकृति हमें इस दुनियां में उसके बताये नियमों के आधार पर जीने का अधिकार देता  है लेकिन जहां उसका उल्लघंन होता है वहां ऐसी घटनाएं जन्म लेती  है. सरकारें अपना खजाना भरने के लिये  शराब बिक्री करवा रही है जबकि उसे वोट देकर बनाने वाली जनता स्वंय उससेे  मांग का रही है कि हर किस्म के नशें पर पूर्ण प्रतिबंध लगायें क्यो नहीं जनता के लिये,जनता की चुनी हुर्ई सरकार उसका कहना मान रही. सरकार तत्काल  नशें पर प्रतिबंध लगायें ताकि  देश में किसी मां की गोद सूनी न हो, बहन का भाई न बिछड़़े, किसी का सिंदूर न उजड़े.  दुख व्यक्त कर चंद राशि देने से परिवार का गया व्यक्ति वापस नहीं आ जाता।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

मौसम वालों ने कह दिया अच्छी बारिश होगी? भीषण गर्मी में हम झूम उठे!





हम खुश है कि इस भरी गर्मी में मौसम विभाग और स्कायमेट ने यह दावा कर दिया है कि इस बार मानसून सीजन में अच्छी बारिश होगी. मौसम विभाग का कहना है कि  इस साल भरपूर बारिश अर्थात 106 प्रतिशत तक होगी जबकि एक दिन पहले ही स्कायमेट ने 105 प्रतिशत बारिश का अंदाजा जताया था. मौसम विभाग ने कहा कि इस बार सभी जगह खूब बारिश होगी. सूखा झेल रहे मराठवाडा में तो सामान्य से ज्यादा की उम्मीद जताई है हालाकि अभी मई जून में मॉनसून के दो अनुमान और आएंगे लेकिन ये पहली बार है जब पहले अनुमान में ही 100 प्र्रतिशत से ज्यादा बारिश की उम्मीद जताई गई है.सवाल यहां यह उठ रहा है कि क्या हम इस अनुमान से खुश हो जायें चूंकि अभी नया मौसम आने में दो से ढाई महीने  बाकी है. दूसरी बात यह कि मौसम विभाग की बातो पर हम कितना भरोसा करें? पूर्व के अनुभव बताते हैं कि वे जब भी अच्छे बारिश की बात करते हैं तो अच्छा सूखा पड़ता है और जब सूखें की बात करते हैं तो गीला होता है.पारा जब ऊंचाइयों पर हो और गर्मी के मारे लोगों की हालत पतली हो तो कोइ्र्र उन्हें बोल दे कि ले भाई थोड़ा ठण्डा पानी ले ले तो सामने वाले को बड़ी राहत मिलती है-क्या स्कायमेट और हमारा मौसम विभाग इस समय सूखे व भीषण गर्मी से लोगों को राहत दिलाने के नाम पर कुछ ऐसा तो नहीं कह रहा? हमारी मौसम प्रणाली आज तक ईश्वर के भारी तमाशें पर कोई सटीक भविष्यवाणी नहीं कर पाई है.हम अपने देश की बात करें तो हमारा आधा हिस्सा सूखे की चपेट में छटपटा रहा है.महाराष्ट्र के लातूर मेंं मंगलवार को ट्रेन से पानी पहुंचाया गया ऐसा इस देश में पहली बार हुआ है.जब किसी क्षेत्र के लोगों की प्यास बुझाने के लिये ट्रेन के डिब्बों में पानी दूसरे प्रांतों से भरकर भेजा गया.पानी मिलने से इंसान कितना खुश होता है इसका अंदाज लातूर में ट्रेन पहुंचने के बाद के दृश्य को देखकर लगाया जा सकता है जहां सौ से पौने दो सौ लोग वाटर ट्रेन के स्वागत के लिए रातभर से पटरियों और प्लेटफॉर्म पर जमा रहे- जैसे ही सूचना मिली कि ट्रेन आने वाली है, तो किसी ने कहा हार-फूल, नारियल-मिठाई ले आओ. थोड़ी ही देर में सारा सामान आ भी गया. ट्रेन के आते ही लोगों ने इंजन के सामने नारियल फोड़ा, पानी टैंकरों पर फूल चढ़ाए कुछ ने पानी एक्सप्रेस के साथ सेल्फी भी ली,कलेक्टर ने ट्रेन ड्राइवर और गार्ड को माला पहना कर उनका स्वागत किया.पानी का स्वागत कर लातूर के लोगों ने पूरे देश को बता दिया कि हमारे जीवन में जल का कितना महत्व है लेकिन क्या हमारी सरकार अब इस स्थिति को कभी न आने दे इसके लिये कोई प्रयास करेगी?कहां गई नदियों को जोडऩे की योजनाएं, कहां गये वे रेन हार्वेस्टिंग के प्लान?और कहां  गईअन्य सिचंाई योजनांए और अन्य गर्मी में पानी उपलब्ध रहने के प्लान?  क्या देश के अन्य अनेक भागों में भी ट्रेन के जरिये लातूर की तरह पानी पहुंचाया जायेगा? यह संभव नहीं है.अगर ऐसा हुआ तो रेलवे को अन्य सारे काम छोड़कर इसी दिशा में सोचना पड़ेगा इसलिये यह जरूरी है कि हम मानसून की भविष्यवाणियों और अन्य सूचनाओं को दूर रख पानी का उतना ही उपयोग करें जितनी हमारे दैनिक जीवन में जरूरत हो. बारिश तो उतनी ही होगी जितनी होना है इसलिये हमें इस दिशा में सोचना होगा कि ऊपर से धरती पर जितना पानी गिरता है उसका संचय हम कैसे करें? देश के कइ हिस्से जब सूखें से जल रहेहैोते हें तब दूसरे स्थान पर  बाढ़ आई हुई होती है कितना लीटर पानी यूं ही बह जाता है.जनसंख्या में बेतहाशा वृद्वि,कांक्रीट के भवन, कांक्रीट की सड़के और प्रदूषण  इन सभी ने हमारी मुसीबते और बढा दी है.अगर मौसम विभाग का अनुमान  सही है तो  इस साल 94 प्रतिशत संभावना इस बात की है कि 96 फीसदी से ज्यादा बारिश होगी.  एक प्रतिशत  आशंका सूखे की है जबकि सिर्फ एक फीसदी संभावना इस बात की है कि इस साल देश में 90 प्रतिशत से कम बारिश हो. इससे कम पानी को मौसम विभाग सूखा मानता है. फिलहाल जो  स्थिति है उसके अनुसार  देश के 10 बड़े भूभाग वाले राज्यों मध्यप्रदेश, महाराष्टï्र, छत्तीसगढ़, ओडीसा, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, राजस्थान, झारखंड व उत्तर प्रदेश में जल अभाव व सूखे की स्थिति हो गयी है. गर्मी कुछ देर से आयी, लेकिन एकाएक तेजी से आ गयी. कहीं-कहीं गर्मी शुरू होने से पूर्व वर्षा व ओले भी गिरे है लेकिन यह भी इतना नहीं कि उससे जल संकट दूर हो जाये. इस साल गर्मी सामान्य से 1-2 डिग्री ज्यादा और तेज पड़ेगी और उसके कारण आने वाले समय में बरसात बहुत अच्छी हो जाने की संभावना बताई इस गर्मी  से तो राहत दे ही रही हैभीषण गर्मी में सब खुश!.


गैंग में अपराधी! क्या निपट पायेगी छत्तीसगढ़ पुलिस इनसे?





रायपुर के कोर्ट परिसर में संदिग्धों से लोहे का पंच और गांजा मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है-रायपुर का वह बचपन अब जवां हो चुका है, जिसके बारे में हम अक्सर अपने कालमों में लिखकर पुलिस व सरकार दोनों का ध्यान दिलाते रहे हैं कि हसअगर इनपर नियंत्रण नहीं किया गया तो आगे आने वाले समय में यह मुसीबत बनकर खडी हो जायेगी. मीडिया यह संकेत करती रही है कि  किसी आयोजनों के लिये नाबालिगों के एक बड़े वर्ग द्वारा चंदे के रूप में दुकानों,परिवारों से होने वाली वसूली का धंधा कोई  अच्छा संकेत नहीं दे रहा. बच्चे से जवानी की ओर बढते यह कदम वास्तव में लडख़ड़ा रहे हैं. एक तरह से कार्यक्रमों की  आड़  में चंदे की वसूलीय अपराध की दुनिया में प्रवेश का पहला कदम है और इस प्रथा ने साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ में यह बुराई तेजी से पनपी. बच्चो से जवानी की ओर बढने वाला  एक बड़ा वर्ग न स्कूल जाता हैं और न परिवार के लोगों के किसी  कार्य में हाथ बटाता हैं ऐसे पल बढ़ रहे बच्चों पर न किसी की लगाम है और न इन्हेें कि सी से कोई लेना देना है. इन्हें कुछ लोग अपने इशारे पर नचाते हैं-ऐसे बच्चे बड़े होकर अब एक रैकेट के रूप में बदल चुका हैं. ऐसा होना जहां इन बच्चों के परिवार की लापरवाही का नतीजा है बल्कि पुलिस भी इसके लिये  बहुत हद तक जिम्मेदार हैं.उसने ऐसे बच्चों के खिलाफ किसी प्रकार के कदम नहीं उठाये. अब इनके पास इधर उधर से मारा हुआ पैसा है-फालतू घूमने के लिये बाइक है.कुछ तो स्टंट मारते हुए शहरों में बेपरवाह घूमते हैं. कुछ गैर कानूनी धंधों में लगे हैं. कभी इनका उपयोग राजनीतिक पार्टियों के प्रचार व अन्य कामो के लिये भी किया  जाता है.इन्हें उस समय जब यह बढ़ रहे थे किसी ने रोकने का प्रयास नहीं किया.. मौदहापारा तो एक ट्रेलर है अगर पुलिस अब भी सक्रिय नहीं हुई तो ऐसी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जायेगा  इसकी  एक भनक तो हमें कोर्ट में हाल ही मारे गये छापें में स्पष्ट दिखाई दी. मौदहापारा जैसी घटनाओं के लिये कई मोहल्ले तैयार हो चुके हैं जो आने वाले  समय में   पुलिस के लिये चुुनौती है. पूर्व के वर्षो में कभी गेंगवार जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई लेकिन अब ऐसा होने लगा है. पुलिस अगर ईमानदारी से इस मामले  में काम करे तो उसे कई ऐसी बातो का पता चलेगा जो राजधानी को अपराध के जकडे जाल से निकालने में मदद करेगा मगर इससे  पुलिस को अपने अंदर भी झांकने की जरूरत है कि उसके भीतर भी  ऐसे कितने लोग छिपे हैं जो इन  तत्वों को पनपने  में मदद करते हैं.पुलिस की हाल की पहल स्वागत योग्य है- उसने   अपनी सक्रियता बढ़ाने का ऐलान कर दिया है-इससे थोड़ा बहुत नियंत्रण अपराधियों पर हो जाये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये.छत्तीसगढ़ का रायपुर और दुर्ग इस  समय सबसे ज्यादा अपराध में झुलस रहा है इसमें बाहर से आने वाले  कुछ अपराधी तत्व  तो है ही सबसे ज्यादा इनवोल्वमेंट कम आयु के युवक हैं जो पूरी तरह से नियंत्रण के बाहर है.वास्तविकता यही है कि राजधानी रायपुर के मौदहापारा में गेंगवार की  स्थिति के बाद एक युवक की मौत से पुलिस को  यह एहसास हुआ है कि आगे चलकर यह स्थिति खतरनाक होगी. शहरभर में ऐसे बदमाशों को ढूंढने पर पुलिस को ऐसा लगा कि स्थिति विस्फोटक कगार पर है. हर किस्म के नशे की लत, घर पर नियंत्रण से बाहर और शहरों में लफूटगिरी से ऐसे तत्वों ने अलग ही दुुनिया बसा ली है. नाबालिगों की अपराध की तरफ का रास्ता अपने घर से शुरू होता है जहां से वे पैसा चुुराते हैं फिर मोहल्ले की तरह बढ़ते हैं जहां से वे किसी के बाहर पड़े वस्तुओं को  बेचकर जेब खर्च का पैसा बनाते हैं फिर उससे मोबाइल, नशें की वस्तुएं आदि खरीदकर दोस्तों के बीच ऐश की जिदंगी शुरू करते हैं पुलिस को इसके लिये मोहल्ले के लोगों से सहयोग की जरूरत है जो  अच्छी तरह जानते हैं कि कौन क्या कर रहा है? फिलहाल पुलिस को तलाश है अपराधी और नशे के धंधे में लिप्त लोगों की.उसे इस बात का एहसास काफी समय बाद हुआ कि ऐसे ही  तत्वों की वजह से अक्सर शहर का माहौल खराब हो रहा है. बाहरी अपराधियों से भी ऐसे तत्वों की सांठगांठ से इंकार नहीं किया जा सकता. इन्हें गांजा, शराब, स्मेक,हेरोइन आदि की  सप्लाई ज्यादातर बाहरी लोगों से होती है.18 से 25 साल के लफंगों का गिरोह -एक-दो नहीं बल्कि कई गैंग बनकर शहर में सिर उठा चुके हैं.जिला बदर या तड़ीपार इसका समाधान नहीं लगता क्योंकि इतने बड़े रायपुर में वर्ष 2013 में मात्र पचास और 2014 में मात्र सात अपराधियों के खिलाफ ही जिला बदर की कार्रवाही की गई वैसे भी इसकी प्रक्रिया इतनी लम्बी है कि काफी वक्त लग जाता है. ऐसे में पुलिस की कोई भी कार्यवाही उन्हें इनके गोड फादरों के कारण परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. मौदहापारा गोलीकांड के बाद ऐसे बदमाशों के खिलाफ अब बड़ी और सख्त कार्रवाई होगी  इसकी हम आशा करते हैं.












सोमवार, 11 अप्रैल 2016

रसूकदारों की जिद...बेबस प्रशासन....भक्तों की मौत!


यह बात समझ में नहीं आती कि एक हादसा हो जाने के बाद भी लोग सबक क्यों नहीं लेते? यह शायद इसलिये कि मनुष्य में वह स्वभाव विद्यमान है कि जो उसे कहा जाये  इसे नहीं करना तो वही करता है-देश में होने वाले अधिकांश हादसों के पीछे एक यही लाजिक विद्यमान है.केरल में  कोल्लम के पास स्थित  पुत्तिंगल देवी मंदिर में लगी भीषण आग में 112 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 383 गंभीर रूप से घायल हैं. मंदिर में आतिशबाजी की  मनाही थी किन्तु रसूकधार लोगों ने प्रशासन  की कोई बात नहीं मानी और  फटाके बाजी से भयानक आग लग गई तथा कई भक्त मारे गये.जो खबरें आई वह चौका देने  वाली है- कोल्लम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ए शाइनामोल और एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ए शानवाज ने मंदिर में आतिशबाजी की इजाजत नहीं दी थी इसके बाद स्थानीय  संगठनों ने धमकी दी और आरोप लगाया कि सांप्रदायिक मकसद के चलते आतिशबाजी की परमीशन नहीं दी गई, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ए शाइनामोल और एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट दोनों मुस्लिम हैं इसके चलते शनिवार दोपहर तक असमंजस की स्थिति थी, लेकिन मंदिर प्रशासन ने राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल कर लिया।मंदिर प्रशासन को भरोसा था कि आतिशबाजी में कोई बाधा नहीं डालेगा, क्योंकि अभी केरल में चुनाव का समय चल रहा है. स्थानीय लोगों के लिए यह भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है, इसके बाद बताया जा रहा है कि मंदिर प्रशासन ने आतिशबाजी कराने का फैसला ले लिया. प्रशासन की ओर से आतिशबाजी पर जो बैन लगाया गया था, उसका पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी. शनिवार रात को जब आतिशबाजी की गई, तब बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात भी थे. आयोजकों ने पुलिस से गुजारिश की थी कि परंपरा के लिए थोड़ी बहुत आतिशबाजी की इजाजत दे दी जाए याने मनामुना के कैसे भी आतिशबाजी  की ढील ले ली गई या कहे कि सारा काम फर्जी तौर पर चला. कमिश्नर कि बातों से भी इस बात का अहसास होता है कि- हमने आयोजकों से परमीशन लेने की बात कही तो उन्होंने कहा कि उनके पास प्रशासन की मंजूरी है, जब उनसे लिखित आदेश दिखाने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया और आतिशबाजी शुरू कर दी.पूरा खेल चंद लोगों की जिद के आगे एक बड़े हादसे में परिवर्तित हो गया.हर दूसरे मामलों की तरह अब इसमें राजनीति गर्माई हुई है.हादसे की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को दिया गया है, इसके साथ ही आतिशबाजी से जुड़े कॉन्ट्रेक्टर के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया ह ैजिन पांच लोगों ने आतिशबाजी की उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया है.इस संपर्ण हादसे में प्र्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार संज्ञान लिया यह काबिले तारीफ है. घटना की खबर पाते ही मोदी ने  हालात का जायजा लिया, उनके साथ 15 बर्न स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम भी गई थी.ऐसा देश में शायद पहली बार  हुआ जब ऐसी  किसी घटना के बाद प्रधानमंत्री स्वंय अपने  साथ डाक्टरों की टीम को लेकर घटनास्थल पर पहुंचे. इसका असर भी  तत्काल देखने को मिला. लोगों को हर तरफ से मदद मिलनी शुरू हो गई. मोदी के कुछ गुणों मे यह गुण भी शामिल है वे मानवता के इस धर्म को अच्छी तरह समझते हैं. उन्होंने इस त्रासदी को दुखद और अकल्पनीय करार दिया. पीएम ने केरल की सरकार को हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया है.कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी घटनास्थल का दौरा किया. केरल में हुए इस हादसे ने देश में अब तक  हुए ऐसे हादसों पर सवाल खड़े कर दिये हैं आखिर इन सबके लिये जिम्मेदार कौन है? निर्दोष लोगों को मौत
देने वाले ऐसे कार्यक्रमों के आयोजकों को कडी़ सजा देने के लिये सरकार को कुछ कठोर कदम उठाने ही होंगे.इससे पूर्व देशभर में ऐसे कई बड़े हादसे कतिपय लोगों की लापरवाही की वजह से हुए हैं जिसमें इस घटना की  तरह कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है, इसमें चाहे वह शबरीमला का मामला हो या बिहार की घटना अथावा कोई अन्य. बड़े आयोजनों की जानकारी कई महीनों पूर्व स्थानीय प्रशासन  व सरकार के लोगों को रहती है. केरल के शबरीमला में भी अभी  कुछ माह पूर्व ऐसा बड़ा हादसा हो चुका है फिरभी प्रशासन ने  एहतियाती  कदम नहीं उठायें यह चिंताजनक है.जब आतिशाबाजी गैर कानूनी ढंग से शुरू की गई  तो उसे रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया  गया?हादसों के बाद उत्पन्न होने वाले अनेक प्रश्न इस हादसे के बाद भी मौजूद है किन्तु अब सरकार को भी कुछ ऐसे कदम उठाये जाने चाहिये जो अकाल मौतों पर किसी  प्रकार अंकुश लगा सके.

काली कमाई के कुबेर-''बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये?


ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में काली कमाई का खजाना दबा पड़ा है जब भी एसीबी के छापे पड़ते हैं हम यही कहते आये हैं कि यहां जितना खोदोगे उतना माल मिलता जायेगा, इस बडे छापे ने उस दावे पर फिर मुहर लगा दी लेकिन जनता को पुराने अनुभवों के आधार पर संदेह है कि इन काले धंधे से कमाई करने वालों पर कुछ ऐसा होगा कि दूसरो को सबक मिलेगा? एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने शनिवार को रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई, रायपुर और कोरबा में 8 अफसरों के 12 से ज्यादा ठिकानों पर एक साथ ताबड़तोड़ छापे मारकर 15 करोड़ से ज्यादा की काली कमाई का भंडाफोड़ किया. बिलासपुर में तो छापा पडऩे के बाद पीएमजीएसवाय के ईई ने भ्रष्टाचार के 40 लाख बचाने के लिए पूरे पैसे पिलो में भरा और बाहर फेंक दिया यह तो एसीबी वालों की नजर तेज थी नहीं तो अफसर महोदय इन छापामारों के जाते ही गली से फिर नोट उठाकर लाकर रख लेते.छापामार अभियान का शुरूआती दौर शुभ था कि इतना कैश उन्हें एक साथ मिल गया. वैशाली नगर के उषा हाइट्स के फोर्थ फ्लोर में यह सब हुआ. एसीबी छत्तीसगढ़ सरकार का एक उपक्रम हैं जो पुलिस वालों को मिलाकर बनाया गया है, इस विभाग के अधिकारियों को शिकायत मिलती है तो बाहर सेे और टीम लेकर छापे की कार्रवाही होती है.भ्रष्टाचार के अलग अलग बड़े मामले उजागर होने के बाद सरकार ने पिछले कुछ माह पूर्व काली कमाई करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाही करने का नियम बनाया किन्तु लगता है अफसरों को कानून से कोई डर नहीं है इसके पीछे भी कारण यही लगता है कि पिछले छापों में किसी पर भी आज तक कोई बड़ी कार्रवाही नहीं हुई बल्कि छापे के बाद कालाधन कमाने वाले अफसर या तो पुन: नौकरी में रीइन्स्टेट या पदोन्नत कर लिया गया या फिर उनके मामलों को इतना ढीला कर दिया गया कि बाकी के हौसले बढ़ गये. शनिवार सुबह एसीबी की टीम ने अलग-अलग विभाग के अफसरों के घर रेड डाली.इनमें फूड, इरीगेशन और एजुकेशन डिपार्टमेंट के 8 अफसरों के 12 से ज्यादा ठिकानों पर छापे की कार्रवाही हुई ह.ै एसीबी के डीएसपी लेवल के 100 से ज्यादा अफसरों की टीम बनी थी. शुरूआती दौर की जांच पड़ताल में पता चला कि इन नौकरशाहो ने छत्तीसगढ़ की जनता की जेब से करीब 15 करोड़ रूपये गुप्त तरीके से निकालकर अपने व अपने पूरे  खानदान को कई सालों तक  घर बैठे खाने -पीने का पूरा इंतजाम कर रखा था. सवाल आम लोगों की तरफ से यह उठ रहा है कि ऐसा करने वालों के साथ एसीबी क्या करने वाली है? क्या सिर्फ मामलों को उजागर करना ही उनका मकसद है या फिर उन्हें जेल के सीकचों के पीछे भेजा जायेगा? ऐसे लोगों को नौकरी से तत्काल देना और संपत्ति को जप्त कर लेना ही फिलहाल इस मामले का एक इलाज है. होना तो यही चाहिये लेकिन कानूनी प्रक्रिया इतनी ढोलम पोल है कि ऐसा कुछ होता नहीं. अब हर आदमी यही चाहता है कि चोरी करने वाले के साथ एक चोर के जैसा व्यवहार होना चाहिये.चोर व चोर की काली कमाई खाने वाला परिवार भी इससे सबक ले कि जनता का पैसा खाने का नतीजा क्या होता है चाहे वह सरकार की कथित रूप से सेवा करने वाला असिस्टेंट डायरेक्टर हो या डायरेक्टर.इस बार छापा पड़ा तो बहुत सी बातों का खुलासा हुआ.यह पता चला कि आम इंसान को राशन पानी की व्यवस्था करने वाले नागरिक आपूर्ति निगम का अफसर भी चोरी करने में लगा है तो बच्चोंं को ज्ञान बांटने वाला यूनिवॢसटी का कर्ताधर्ता में इन बच्चों का खून चूसकर अपना घर भर रहा है.छापे की कार्यवाही में एसीबी की टीम ने खाने में अलग अलग व्यंजन को परोसनेे की तरह छापे मारी में अलग अलग क्षेत्र के महानुभावों को अवार्ड देने की तरह चुना. ं खाना खिलाने वाला विभाग--नागरिक आपूर्ती, तो पानी पिलाने वाला जलसंसाधन विभाग, युवाओं को शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले रजिस्ट्रार भी एसीबी का अवार्ड पाने में  कामयाब हो  गये.ऊपर से देखों तो इन महानुभावों की मासिक सेलरी दिखावे के लिये है असल  ठाठ बांट की जिंदगी को देखने लायक हैं. आम आदमी के पास घर चलाने के लिये कभी  चालीस रूपये नहीं होते तो यह छापे के डर पर चालीस लाख रूपये सड़क पर फेक देते हैं?ं जनता को ही यह तय करना चाहिये कि ऐसे लोगों के साथ क्या सलूक किया जाये?

भयंकर सूखा...पानी के लिये त्राहि-त्राहि



बिन पानी सब सून-जल  ही जीवन है,जल हैं तो कल है- देश के दस राज्य इन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में हैं,हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोगों के सामने खाने  पीने  के लाले  पड़ रहे हैं. भीषण सूखे की मार सह रहे लोग गांव छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में जाने  मजबूर हो गये हैं. इस स्थिति से निपटने की  जिम्मेदारी  राज्य और केन्द्र सरकारों की है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता.संकट की इस घड़ी में कुछ करने की जगह सरकारें आंखे मूंदे हुए हैं लेकिन जिसका कोई नहीं उसका खुदा या भगवान है कि तर्ज पर राज्य व केन्द्र सरकार को  सरकार को पिछले  दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ी  फटकार लगाई हैं 'स्वराज अभियानÓ की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और एनवी रमण की पीठ ने कहा है कि पारा पैंतालीस डिग्री के पार पहुंच रहा है और लोगों के पास पीने का पानी नहीं है।उन्हें मदद पहुंचाने के लिए कुछ तो करिए! सूखे से निपटने के लिए अदालत ने राज्यों को पर्याप्त कोष जारी न करने पर केंद्र की खिंचाई करते हुए उसे हलफनामा देकर यह बताने का भी निर्देश दिया कि सूखाग्रस्त राज्यों में मनरेगा पर किस तरह अमल किया जा रहा है। इसमें दो मत नहीं कि पिछले दो साल में कम बारिश के कारण महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जबर्दस्त सूखे की मार झेल रहे हैं।महाराष्ट्रे लातूर का जो परिदृश्य अखबारों में देखने को मिल रहा है उससे वहां की भयानकता का अंदाज लगाया जा सकता है. पीने के पानी के लिये दंगे की स्थिति निर्मित हो रही है तथा लोग पलायन करने मजबूर हो गये हैं.  योगेंद्र यादव की अगुआई वाले 'स्वराज अभियानÓ ने सुप्रीम कोर्ट में जारी अपनी याचिका में सूखा-पीडि़त राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न उपलब्ध कराने के साथ ही अदालत से राहत और पुनर्वास के उपाय करने का अनुरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट की फटकार से सरकार के कान मेंं जू रेंगेगी  कि नहीं यह तो नहीं कह सकते लेकिन लगभग आधे देश के समक्ष उपस्थित गंभीर संकट से  आगे आने वाले दिनों में मौत के आंकड़े आने लगे तो आश्चर्य नहरं करना चाहिये.  वैसे भी महाराष्ट्र सेलगे आंन्ध्र और तेलंगाना में गर्मी इतनी  बढ़ चुकी है कि वहां लू लगने से लोगों की  जान जाने लगी हैं.सूखे और बाढ़ की कहानी  इस देश के लिये कोई नई बात नहीं है. मौसम ने साथ दिया तो अच्छी  बारिश और उसके बाद बाढ़ के हालात और फसलों को नुकसान और अगर बारिश नहीं हुई तो सूखा-यह देश को चलाने वाले  अच्छी तरह जानते हैं फिर भी दतने वर्षो बाउ श्राी इस हालात से निपटने का स्थाई प्रबंध अडसछ वषो्र्र बाद भी क्यों नहीं किया जाता यह प्रश्न सदैव बना रहता है.परिणाम सामने  है. कई राज्यों में हालात बेकाबू हो चले हैं और लोग पानी के लिए हिंसा पर भी उतारू होने लगे हैं. महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में तालाबों और नलों के आसपास धारा 144 लगानी पड़ी है। कई स्थानों पर लोग पानी पर शस्त्र लेकर पहरा डाले  बैठै हैं.कोई  पानी चुरा न ले जाये इसके लिये लोग रखवाली कर रहे हैंॅ. नासिक जिले में गोदावरी नदी का घाट पिछले 139 सालों के इतिहास में पहली बार सूख गया है. छत्तीसगढ़ मेंं सूखे के हालात उपस्थित होने लगे  हैं.गांवों में तालाब, कुए सूख गये हैं पानी के  लिये घरों से काफी दूर जाना पड़ रहा है.छत्तीसगढ़ में अपेै्रल महीने के पहले दिन से ही पारा चढऩा शुरू हो गया और यह पहला सप्ताह बीतते बीतते  पैतालीस उिग्री  को पार कर गया. यही हाल रहा तो छत्तीसगढ़ के शहरों में भी  पानी के लिये लोगों को संघर्ष करना पड़ेगा.टेंकरों से पानी की सप्लाई होते ही  पानी  के लिये किस प्रकार मारा मारी  चलती है कि आगे आने वाले दिने छत्तीसगढ़ के लिये भी कितने  खतराक होंगे इसका अंदाज लगाया जा सकता है.सरकार को  सूखे से निपटने के लिए जल संरक्षण के साथ जल प्रबंधन की भी समग्र रणनीति बना कर उस पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करने की जरूरत है। वर्षा जल संचय, भूजल परिवर्धन, नदी-तालाब संरक्षण, वनीकरण से लेकर जलशोधन की नई तकनीकें इसमें सहायक हो सकती हैं।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

बस्तर में अब आगे हवार्ई लड़ाई के संकेत!




नक्सलवाद को छत्तीसगढ़ से जड़मूल खत्म करने सरकार एक से एक प्रयोग कर रही है इस कड़ी में आगे आने वाले समय  में नक्सलियों पर आसमान से वार शुरू हो जाये तो आश्चर्य नहीं करना. इस बात के  संकेत अब मिलने लगे हैं. अब तक नक्सलियों को समझाने बुझाने और मुठभेड़ कर उनके ठिकानों को ध्वस्त करने का प्रयास सराकरी तौर पर किया जाता रहा है लेकिन अब हवा में निगरानी रखने के लिये हवाई पट्टी के रास्ते नकसलियों के मुकाम तक पहुंचने की तैयारी हो रही  है- इसका आभास भी होने लगा है- पुलिस और वायुसेना का संयुक्त प्रशिक्षण अभी  कुछ दिन पूर्व हुआ था. अब छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के भीतर हवाई पट्टी बनाने की खबर ने सभी को चौका दिया है-नक्सलियों में जहां इससे गुस्सा हैं वहीं केन्द्र सरकार की मंज़ूरी मिल जाने से प्रदेश  सरकार ने भी अब कमर कस ली है.देश के किसी टाइगर रिज़र्व में हवाई पट्टी की मंज़ूरी का यह पहला मामला है.वन विभाग भी यह कहने में संकोच नहीं कर रहा है कि पट्टी का इस्तेमाल माओवादियों के खिलाफ़ चलाए जा रहे ऑपरेशन में किया जाएगा.सरकार जहां अपने निश्चय के प्रति दृढ है तो वहीं उसके लिये चुनौती भी है कि वह किस प्रकार इस अहम कार्य को अंजाम देगी. राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की 37वीं बैठक में इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के बफऱ क्षेत्र में इस हवाई पट्टी के निर्माण को मंज़ूरी देने के बाद हर कोई यह मानता है कि बस्तर के विकास के लिये और नक्सल उन्न्मूलन  के लिये उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण कदम है किन्तु समस्या यही है कि प्राय: हर रोज नक्सली उत्पात औा बमों से गूंजने वाले इस क्षेत्र में बाघों के जंगल में सरकार इस काम को कैसे पूरा करेगी? 39.604 हेक्टेयर क्षेत्र में बनने वाली इस हवाई पट्टी के लिये ऐसे वक्त में मंज़ूरी मिली है, जब राज्य बनने के बाद पहली बार पिछले महीने ही वन विभाग के कैमरा ट्रैप में इस इलाक़े में बाघ की तस्वीर क़ैद की गई है.वहीं मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सरकार इस हवाई पट्टी का निर्माण बस्तर में वायु सेना के हमलों के लिए कर सकती है. इन संगठनों का कहना है कि ऐसा होने पर लाखों निर्दोष आदिवासी मारे जाएंगे.बस्तर में पिछले कई सालों से माओवादी आंदोलन के कारण सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच ख़ूनी संघर्ष होते रहे हंै.दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भारत में औसतन प्रति एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस की संख्या 139 के आसपास है लेकिन बस्तर के सात जि़लों में यह आंकड़ा 1774 से भी अधिक है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अफग़़ानिस्तान में चल रहे युद्ध के दौरान 2011 में वहां 73 लोगों पर एक जवान की तैनाती थी लेकिन बस्तर में 56 लोगों पर सुरक्षा बल के एक जवान की मौजूदगी है. टाइगर रिजर्व के भीतर हवाई पट्टी निर्माण को मंज़ूरी के बाद इस संख्या के और अधिक बढऩे की संभावना व्यक्त की है.सरकारी सूत्रों  के दावे में  भी यह साफ झलकता है कि क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ गतिविधि को और बढ़ाना मुख्य उद्देश्य है.यह काम  सुरक्षाबलों को अधिक से अधिक मदद पहुंचाकर किया जायेगा. सरकार की इन कोशिशों पर मानवाधिकार  संगठन संदेह व्यक्त करते हैं कि पट्टी  बनाने के पीछे महज़ सुरक्षाबलों को मदद पहुंचाने भर का मामला नहीं है बल्कि यह संकेत दे रहा है कि इससे बस्तर में अब संघर्ष और तेज होगा.पीयूसीएल और मानवाधिकार संस्थाओं को संदेह है कि सराकर द्वारा बनाई जा रही हवाई पट्टी बस्तर के आम लोगों के लिए नहीं होकर पिछले कुछ सालों में जिस तेज़ी से अर्धसैनिक बलों की टुकडयि़ां इस इलाक़े में तैनात की गई हैं वह सेना द्वारा हेलिकॉप्टरों से हमलों का पूर्वाभ्यास किया गया है उसको कार्यरूप में परिणित करने  का एक उपक्रम है. दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि इस तरह के हमलों में सर्वाधिक गऱीब और मज़बूर लोग मारे जाते हैं. ऐसा कहने वालों को आशंका है कि  बस्तर की यह हवाई पट्टी लाखों निर्दोष आदिवासियों के लिये जानलेवा साबित हो सकती है.दूसरी ओर पुलिस के एक आला अधिकारी इस आशंका पर  अपना  तर्क देते हंै कि अपने ही लोगों के खि़लाफ़ हवाई हमला करने की इजाज़त भारतीय क़ानून नहीं देता. इसलिए इस तरह की आशंकाओं में कोई दम नहीं हैं.हवाईपट्टी बनाने की अनुमति के बाद  यह सवाल भी गरमा गया है ेकि सरकारी तौर पर की जाने वाली गतिविधियों से वन्य प्राणियों  का क्या होगा? बस्तर में अब एक नया  आंदोलन सामजिक संगठनों की तरफ से शुरू हो जाये तो आश्चर्य  नहीं करना चाहिये.कुछ लोग तो यह भी कहने लगे है कि  वन्यजीव और जंगल की अनदेखी कर इस तरह टाइगर रिज़र्व के भीतर हवाई पट्टी बनाने का सरकारी फ़ैसला क़ानून के खिलाफ़ है.

शराब को नीतिश की बाँय-बाँय, छत्तीसगढ़ से कब होगी विदाई...

शराब को नीतिश की बाँय-बाँय, छत्तीसगढ़ से कब होगी विदाई...?

चुनाव के दौरान नीतिश कुमार ने वादा किया था कि वे जीते तो बिहार में शराब  पर रोक लगा देंंगें.सत्ता सम्हालने के बाद उन्होंने अपने इस वादे को पूरा किया तो विरोध करने वाले भी सामने आये लेकिन बिहार की महिलांए बहुत खुश हैं.नीतिश का यह कदम आर्थिक-सामाजिक हितो को ध्यान में रखकरउठाया गया है.शराब पर  पाबंदी के इस कदम का विपक्ष के नेता सुशील कुमार मोदी ने भी स्वागत किया है.मुख्यमंत्री का यह कदम उनके गांधीवादी और संवैधानिक आदशों के चलते उठाया गया कदम माना जायेगा. बिहार सरकार को शराब से चार हजार करोड़ रूपये का राजस्व मिलता रहा है किन्तु उन्होने इसकी  परवाह नहीं की. शराब पर रोक से बिहार के सामाजिक व आर्थिक उन्नयप में काफी बदलाव आने की संभावना है लेकिन नीतिश कुमार के सामने असली चुनौती तो अब है. बिहार में शराब बंदी लागू करने से पहले सरकार ने शराब की बोतलों को बुलडोजरों के जरिये एक साथ खत्म कराया जबकि चोरी छिपे व्यापार करने वाले और तस्कर अब इस प्रतिबंध की आड़ में मुनाफा कमाने का प्रयास जरूर करेंगे. सरकार ने प्रतिबंध लगाने के साथ नियमों को भी काफी कड़ा किया  है इसलिये इस बात की संभावना  बहुत कम  है कि तस्करी बड़े पैमाने पर होगी-कौन दस साल जेल की हवा खाना चाहेगा? वैसे नीतिश की यह बात अच्छी है कि वे जो ठान लेते हैं उसे करने में भी उतने ही पक्के हंै.जब वे पिछली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होने राज्य में भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति जप्त करने का कठोर कानून बनाया. इस कानून के चलते कई नौकरशाहों को अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ा. संपत्ति जप्त कर सरकारी खजाने में जमा किया. उनके इस अभियान का देश के कुछ अन्य राज्यों ने भी समर्थन किया मध्य प्रदेश में भी कानून बना और छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कानून को काफी तगड़ा किया अब क्या हम उम्मीद करें कि छत्तीसगढ़ सरकार भी शराब बंदी कानून को अपने प्रदेश में भी लागू करेगी? बिहार की तरह छत्तीसगढ़ भी  पिछड़ा राज्य है यहां भी गरीब, श्रमिक ,मध्यम और उच्च परिवारों का एक बड़ा वर्ग शराब की लत में उसी प्रकार डूबा हुआ है जैसा पहले लाटरी में डूबा करता था.कई घरों को लाटरी ने उस समय बरबाद कर दिया था अब वहीं स्थिति शराब और नशीली दवाओं को लेकर है. सरकार ने अपना खजाना भरने के लिये गली मोहल्ले में सब जगह देशी विदेशी शराब देने की छूट दे रखी है.इससे सरकार का खजाना तो भर रहा है लेकिन कई परिवार टूट रहे हैं. मेहनत का पैसा शराब में उड़ा देने से वे न अपने बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं और न अपने को आर्थिक रूप से मजबूत कर पा रहे हैं. नीतिश कुमार ने जो निर्णय लिया है उसे छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को तो  बहुत पहले से लागू कर देना चाहिये था. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद विकास के हर सौपान को पार करने में कामयाब रहा है लेकिन उसके अपने लोग जिसके लिये यह राज्य बना और जिनका आर्थिक और सामाजिक विकास होना चाहिये था वह शराब व नशाखोरी की लत के कारण धीमा पड़ गया है.बिहार ने  एक बड़ा अदुभुत प्रयोग किया है उसके इस निर्णय की सफलता या विफलता यह साबित करेगा कि दूसरे प्रदेश इसका कितना अनुसरण करेंगे. वैसे सरकार यदि अपने पर अड़ गई तो कोई भी काम असफल नहीं होता इसलिये जब नीतिश मन में ठान कर निकले है तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि नशाबंदी  के मामले में बिहार को भारी सफलता मिलेगी इसके शुरूआती दौर को देखे तो बड़ी विचित्र स्थिति भी बन रही है-पाबंदी से रोज पीने वाले परेशान हो रहे हैं. जब शाम को शराब नहीं मिली तो लोग बीमार होने लगे,कई को तो इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती तक कराना पड़ा, कुछ पागलों जैसा बर्ताव करने लगे, घर में रखा साबुन खाने लगे आदि. आर्मी कैंटीन में भी शराब प्रतिबंधित की गई है. शराब के लिए रिटायर फौजियों ने भी हंगामा किया.  बहरहाल बिहार देश का चौथा ड्राई-स्टेट बन गया है! इससे पहले गुजरात, नगालैंड और मिजोरम में शराब पूरी तरह प्रतिबंध है बिहार में किसी को शराब बेचने का लाइसेंस अब नहीं मिलेगा।



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दस्तावेज बता रहे हैं-कालाधन विदेशों में मौजूद है...!



पूरी दुनिया में कुछ ऐसा हो गया कि अब सब कुछ ठीक नहीं रहा.मोसेक  के दस्तावेजों में छुपे कारोबारी गोरखधंधे के खुलासे ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. पत्रकारिता जगत के अब तक के इस सबसे बड़े भंडाफोड़ ने दो सौ देशों के राष्ट्राध्यक्षों, राजनेताओं, अधिकारियों, कारोबारियों, फिल्म अभिनेताओं और खिलाडयि़ों के चेहरों से नकाब उतार दिया है और इन आशंकाओं तथा धारणाओं की फिर पुष्टि की है कि पूंजीवाद के वित्तीय क्रियाकलापों में बहुत कुछ स्याह है और समाज के लिए खतरनाक भी. जहां तक भारत का सवाल है यह पहले से ही आशंका थी कि भारत के कई लोगो का काला धन विदेशों में किसी न किसी ढंग से इन्वेस्ट ह.ै मोसेक के दस्तावेजों से यह बात और साफ हो गई है कि कई भारतीय सफेद पोश हस्तियां इस काले धंधे गोता लगा रहे हैं. दस्तावेजों में 500 से ज्यादा भारतीयों के नाम हैं. यह अभियान इंटरनेशनल कंर्सोटियम ऑफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आइसीआइजे) के नेतृत्व में चलाया गया था, जिसमें इंडियन एक्सप्रेस भी शामिल था. कुल मिलाकर एक करोड़ पंद्रह लाख के आसपास फाइलों को खंगाला गया था, जिनमें से 36,000 फाइलें भारतीय रिपोर्टरों की नजरों से गुजरीं. 78 देशों की 109 मीडिया कंपनियों के पत्रकारों ने दस्तावेजों की जांच की. पनामा की कानूनी फर्म मोस्साक फोंसेका जिसकी 35 देशों में शाखाएं हैं, दुनिया के पैसे वालों को टैक्स बचाकर पैसा रखने में मदद करती है. इस कंपनी ने कर अधिकारियों से पूंजी को छुपाने में विश्व भर के कई बड़े नेताओं और चर्चित हस्तियों की कथित रूप से मदद की. भारत सरकार ने 'पनामा लीक्सÓ में शािमल भारतीय नामों की जांच के लिए मल्टी एजेंसी ग्रुप का गठन कर दिया है किन्तु सवाल यही उठ रहा है कि क्या टैक्स का जो पैसा  विदेशों में खपाया गया है वह कभी भारत के खजानों में वापस आयेगा? वास्तविकता यही है कि दुनिया के मौजूदा वित्तीय ढांचे का एक बड़ा हिस्सा कर चोरी, नियमों के उल्लंघन, अपराध और आतंकवाद पर टिका है और विकासशील देशों का बहुत सारा काला धन इसी तरह विकसित देशों की वित्तीय पूंजी का निर्माण करता है. 1977 से 2015 तक 40 वर्षों के भीतर एक करोड़ 10 लाख दस्तावेजों का यह खुलासा ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, बहामाज, सिसली और पनामा जैसे कर चोरों के स्वर्ग को चिह्नित करता है, लेकिन वहां ऐसा होता है यह सीक्रेट नहीं है। दस्तावेजों के लीक होने से दुनियाभर में तहलका मचना स्वाभाविक है. पनामा की कानूनी फर्म मोस्साक फोंसेका जिसकी 35 देशों में शाखाएं हैं, दुनिया के पैसे वालों को टैक्स बचाकर पैसा रखने में मदद करती है. इस कंपनी ने कर अधिकारियों से पूंजी को छुपाने में विश्व भर के कई बड़े नेताओं और चर्चित हस्तियों की कथित रूप से मदद की. स्विस बैंक में कालेधन पर कार्रवाही की  कोशिशें अभी जारी है ऐसे में मोसेक लीक कांड ने जनता को यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि  क्या देश का पैसा यूं ही विदेशों की सेवा के लिये लगा रहेगा इधर एक अन्य मामला ब्रांड बाबाओं के कारोबार का उजागर हुआ है जिसमें 900 करोड़ का कारोबार है. देश के बजट में इतना पैसा नहीं लगता होगा जितना ब्राडं बाबा लोगों के पास है. इससे पूर्व देश में आस्था ट्रस्टों और केन्द्रो में भरी हुई अपार धन का खुलासा हुआ था. कतिपय लोगों नौकरशाहों से समय समय पर निकलने वाले छापे से यह साफ पता चलता है कि देश के खजाने में मौजूद रहने वाला पैसा कैसे लोगों की तिजोरियों मैं कैद है.पनामा टैक्स लीक को किनारे कर  देेखे तो भी  भारतीयो के पास आज भी जो धन है उसका खुलासा सही ढंग से नहीं हुआ है. एक तरफ गरीबी और खुदखुशी का दौर है तो दूसरी ओर चंद लोग देश को लूटने का काम कर रहे हैं- यह सिर्फ और सिर्फ सरकार के ही  बस का रोग है कि वह यूं छिपी हुई संपत्ति को जनता की ओर प्रत्यावर्तित करें.टेक्स लीक कांड़ के बाद सरकार ने त्वरित  पहल करते हुए जांच का काम शुरू कर  दिया है लेकिन ऐसी  जांच  समितियों को हम कई अन्य मामलों में भी देख चुके हैं.





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सेलरी बढौत्तरी-सवाल नैतिकता और नीयत का...!




 प्रत्यके व्यक्ति का यह बुनियादी हक है कि वह अधिक से अधिक संसाधनों को जुटाए और अपनी जिंदगी को बेहतर करने के लिये हर संभव उपाय करे. हमारा संविधान भी इस बारे में किसी तरह का कोई बंधन नहीं लगाता. किसी भी परिधि में इस बात की पूरी छूट है,पर सवाल नैतिकता व नीयत का है. मामला परिस्थिति का भी है-इस बात पर किसी को विरोध नहीं होना चाहिये कि किस फलाने पेशेवर व्यक्ति का वेतन कितना हो और उसकी  तनखाह में कितने की बढौत्तरी की जानी चाहिये. पिछले वर्षो के दौरान हम  विधानसभाओं में अपने वेतन के लिए उदारमना विधायकों को देखते रहे हैं, उनसे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जहां अपनी बात आती है वहां माननीय वैसा रुख नहीं अपनाते, चाहे विपक्ष ही क्यों न हो ! सही है, वैसा रुख अपनाएं ही क्यों? लेकिन जिन राज्यों के आर्थिक हालात ठीक नहीं होने की बात कही जाती हैं जहां कभी बाढ़ आने,पाला पडऩे, सूखे के भयंकर हालात हों,जहां किसान आत्महत्या कर रहे हो और जहां का आम जन किसी न किसी तरह की मुश्किल में गुजारा कर रहा हो, वहां ऐसी उदारता क्यों नहीं दिखाई जाती? अगर हम छत्तीसगढ  की बात करें तो यहां ़केवल अमित जोगी ने ही विधायकों की सेलरी वूद्वि का विरोध किया था. उन्होनें भी  पहले विधायकों की सेलरी में वृद्वि की मांग की परन्तु अचानक वे बदल गये. दूसरा ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया जहां माननीयों ने अपनी 'अभूतपूर्व बढ़ोत्तरीÓ का विरोध किया हो. वर्तमान दौर में तीन राज्यों ने अपनी विधानसभाओं में वेतन बढ़ोत्तरी का प्रस्ताव रखा और उसे मंजूर भी कर लिया गया. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्य में सुविधा और सैलरी में आमूलचूल बढ़ोत्तरी की गई है.मध्यप्रदेश में अब मुख्यमंत्री का वेतन तकरीबन दो लाख रुपये हो जाएगा. सामान्य विधायक भी अब लखपती होंगे कहने का मतलब यह कि किसी को अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है तो वह अब चुनाव लडऩा ही बेहतर समझेगा चूंकि पूरे पांच साल और उसके बाद भी पेंशन के रूप में एक अच्छी राशि के साथ घर बैठे ही अच्छे दिन देखने को मिलेंगें, राजनीतिक और भौगोलिक नजरिए से मध्यप्रदेश-छत्तीस्रगढ़ के बीच रक्त संबन्ध है.इसी क्रम में नया बना राज्य तेलंगाना भी है.निश्चित ही इन तीनों राज्यों ने विकास के आयामों को छुआ है. खासकर आधारभूत विकास में अब इन राज्यों में सड़क, बिजली और ऐसे ढांचे ऊपरी तौर पर दिखते हैं, लेकिन इस बात पर अब भी बड़ी बहस है कि यह विकास अब गांवों के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचा है.इस नजरिए से देखा जाए तो राज्यों को अभी बहुत दूर की यात्रा तय करना है ऐसे में इन राज्यों के माननीयों ने ऐसा कौनसा पहाड़ उखाड़ लिया कि उनको बहुत ही अच्छे दिन की ओर ढकेल दिया.  इस साल मानसून की बेरुखी से हालात अच्छे नहीं हैं. पिछले साल भी केन्द्र सरकार ने मानसून और वैश्विक आर्थिक मंदी का हवाला देते हुए राज्य के आवंटित बजट में भारी कटौती की थी। इसका सीधा असर यह हुआ था कि राज्यों की सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं में भारी कटौती की गई थी और इस साल भी लगभग वैसी ही परिस्थिति है, मानसून साथ देगा या नहीं किसी  को नहीं पता और वैश्विक मंदी की आवाजें भी फिर से  सुनाई दे रही हैं तो क्या यह विरोधाभास नहीं है कि एक तरफ तो सामाजिक कल्याण की योजनाओं में कटौती कर दी जाए और दूसरी तरफ माननीय अपना वेतन अपने ही हाथों बढ़वा लें.व्यापार  करने वाले से कोई उसकी नैतिकता पर सवाल नहीं करता उसे पता है कि
उसका अंतिम लक्ष्य मुनाफा ही है,इन पेशों में यही एक बारीक अंतर है, अंतर की सीमा नैतिकता की रेखा ही करती है और जब मामला नेतागिरी का हो तब तो हर कोई सवाल उठाता ही है,इतिहास में इसकी सीखे हैं लेकिन कोई अपने दायरे को कितना बड़ा और क्यों करता है उसे भी सोचा जाना चाहिए.यह जरूर है कि ऐसा न तो सोच पाते हैं और न कर पाते हैं, जाहिर सी बात है कि इसमें एक अनिश्चितता है, भविष्य का डर है पर क्या यह इस डर का हल है?यदि हल मान भी लिया जाए तो क्या हम इसके बाद एक राजनैतिक शुचिता की उम्मीद कर सकते हैं. सवाल आपके परफोरमेंस का भी  है.आपने जनता के बीच लोकप्रियता बनाकर पांच वर्ष तक राजयोग प्राप्त कर लिय लेकिन क्या आप में से कितने लोग चुनाव के बाद अपने क्षेत्र में अपने  उन गरीब लोगों से मिले हैं जो आज भी बदहाली की जिंदगी जी रहे हैं उनके उत्थान के लिये क्या योजनाएं हैं आपके पास? क्या उन परिवारों के किसी एक को भी आपने इस लायक बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें?ऐसे बहुत से ज्वलंत सवाल है जो आपके निर्णयों से उत्पन्न होते हैं!


सोमवार, 4 अप्रैल 2016

अपनी सुरक्षा आप स्वंय करें, हेलमेट जरूर पहने!



एक व्यक्ति के सिर पर दूसरा सिर लगाना उतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं-जी हां मै बात कर रहा हूं हेलमेट की...छत्तीसगढ़ पुलिस, छत्तीसगढ़ सरकार और यहां तक कि उन सिर वालों केे माता पिता को भी अपने बच्चों को दूसरे का सिर लगाकर जाने के लिये प्रेरित करने के लिये कितनी जद्योजहद करनी पड़ती है यह हम उन राज्यों में जहां हेलमेट की अनिवार्यता छत्तीसगढ़ से पहले से है,वहां इसे लोगों को पहनाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी यह बताना आश्चर्यजनक ही नहीं बल्कि दिलचस्प भी है बहरहाल देश के प्राय: हर राज्य में दुपहिया सवार को दूसरा सिर पहनाने के लिये कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़े उसका उदाहरण है तामिलाडू जहां हेलमेट पहनने  संबंधी जागरकता पैदा करने के लिए भगवान गणेश और मृत्यु के देवता यम की मदद लेनी पड़ी. कांचीपुरम में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय ने एक फ्लेक्स बोर्ड लगाया जिसमें भगवान गणेश यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि आपको मेरी तरह सिर नहीं मिलेगा, हेलमेट पहनिए और अपने सिर की रक्षा कीजिए. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान गणेश ने भगवान शिव को उनकी पत्नी पार्वती से मिलने नहीं दिया था जिसके बाद भगवान शिव ने गुस्से में आकर अपने पुत्र गणेश का सिर काट दिया था लेकिन बाद में उन्होंने एक हाथी का सिर प्रत्यारोपित कर दिया था. मदुरै में आरटीओ अधिकारियों ने भी हेलमेट की महत्ता दर्शाने के लिए एक दिलचस्प तरीका चुना,वहां कुछ लोग भगवान यम का वेश बनाकर मुख्य स्थानों पर नुक्कड़ नाटक करते रहे.मदुरै उच्च न्यायालय ने हेलमेट न पहनने के कारण हुई मौतों पर चिंता जाहिर की थी जिसके बाद सरकार ने घोषणा की थी कि  दोपहिया वाहन चालकों और वाहन पर पीछे बैठने वालों के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य होगा। अदालत ने सरकार को इस संबंध में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने को कहा था जिसके मद्देनजर अधिकारियों ने ऐसी मुहिम शुरू की जो सबका ध्यान अपनी ओर खींचने लगी.महाराष्ट्र में मुंबई की जनता को बगैर हेलमेट के मोटरसाइकिल चलाना मंहगा पड़ता है. बिना हेलमेट के बाइक चलाने पर पुलिस सीधे जेल का रास्ता दिखा देती है. सरकार ने सभी आरटीओ को आदेश दिया हैं कि जो भी नया लाइसेंस बनेगा चालक को एक बांड भी भरना पड़ेगा. इस बांड के तहत चालक को हर हाल में हेलमेट पहनकर ही मोटरसाइकिल चलानी होगी.मुंबई में हर साल सैकड़ों लोगों की जान सड़क दुर्घटना में चली जाती है। मोटरसाइकिल चालकों के हेलमेट नहीं पहनने के कारण ऐसी मौतें ज्यादा होती हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकार ने आरटीओ को आदेश दिया है कि लाइसेंस देने से पहले बांड भरवाए जाए कि चालक हेलमेट पहन कर ही मोटरसाइकिल चलाएगा. बॉम्बे हाईकोर्ट भी इस संबंध में आदेश दे चुकी है छत्तीसगढ़ के पडौसी राज्य मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में एक दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने पर दबंगों द्वारा बारात पर पथराव किया गया,इसमें कई लोगों को चोट आई. बारात की सुरक्षा में पुलिस तैनात की गई,घोड़ी पर बैठे दूल्हे को हेलमेट लगाना पड़ा. विदेश की बात करें तो बर्मिंघम में अपने साथी बल्लेबाज क्रिस रोजर्स के चोटिल होने के बाद आस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क आखिरकार नई तरह के हेलमेट का उपयोग करने के लिए तैयार हो गए.  इस हेलमेट को फिलिप ह्यूज की मौत के बाद तैयार किया गया. पूर्व आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज ह्यूज के सिर में एक प्रथम श्रेणी मैच के दौरान बाउंसर से चोट लग गई थी और जिसके कारण बाद में उनकी मौत हो गयी थी.ह्यूज की  मौत के बाद हेलमेट बनाने वाली प्रमुख कंपनी मासुरी ने नई तरह के हेलमेट को  तैयार किया जो अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराता है। ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज फिलिप ह्यूज की बाउंसर से मौत के सदमे से उबर रही ऑस्ट्रेलिया और भारत की टीमें उस समय सकते में आ गई जब पहले टेस्ट के तीसरे दिन भारत के कार्यवाहक कप्तान विराट कोहली के हेलमेट पर तेज गेंदबाज मिशेल जॉनसन का बाउंसर लग गया। इस बाउंसर के लगते हुए यकायक ह्यूज की याद ताजा हो गई. दक्षिण के सुपरस्टार कमल हासन ने े दोपहिया वाहन सवारों के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य किए जाने का समर्थन किया है. हासन ने लोगों से वाहन चलाते समय हेलमेट पहनने और सुरक्षित रहने का अनुरोध किया है. हासन को फिल्म पापनाशम में दोपहिया वाहन की सवारी के शूटिंग दृश्य में हेलमेट नहीं पहनने के लिए हासन को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.यह तो हुई हेलमेट की  अनिवार्यता और उसकी उपयोगिता की बात अगर छत्तीसगढ़ शासन ने यह नियम बनाया है तो यह उनके हित के लिये नहीं है. छत्तीसगढ़ की सड़के हर साल हजारों लोगों के खून से लाल होती हैं. कई घरों के लाल उनसे छिन जाते हैं. कई युवतियां विधवा हो जाती हैं. एसी हर स्थिति से निपटने के लिये हर दुपहिया चालक दूसरा सिर लगाकर चले तो किसी का क्या बिगड़ जायेगा. अपनी सुरक्षा आप स्वंय करें हेलमेट जरूर लगायें!



प्रभाव के चलते पुलिस व्यवस्था का अपना दर्द!





क्या प्रभावशाली वर्ग अपने खिलाफ किसी भी कार्रवाई से बाहर होना अपना अधिकार मानता है? अपराध नियंत्रण में पुलिस की भूमिका को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति अब हर जगह बनती जा रही है.जहां भी कोई अपराध गठित होता है लोग यह कयास लगाना शुरू कर देते हैं कि इसका हश्र क्या होगा अर्थात इसे तुरन्त बेल मिल जायेगी या कुछ दिन जेल में रहकर छूट जायेगा-यह सब उसके प्रभाव उसके आर्थिक हालात आदि को देखकर लगाया जाता है वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी लोग है जो बेचारे कहीं फंस गये तो कहीं के नहीं रह जाते उन्हें तो जमानतदार भी नहीं मिलते. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपराध रोकने और कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर पुलिस की मनमानी और लापरवाही होती है, लेकिन इसका विरोध करने का सिलसिला कुछ ऐसी हद तक पहुंच रहा है कि पुलिस के लिए अपना रूटिन काम करना भी मुश्किल होता जा रहा है. देश के कुछ राज्यों में तो स्थिति इस सीमा तक बिगड़ती नजर आ रही है कि पुलिस ने कई मामलों में गैरकानूनी गतिविधियों की ओर ध्यान देना तक बंद कर दिया है, क्योंकि किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने पर अगले ही पल ऊपर से फोन आने के साथ ही स्थानीय नेता या जनप्रतिनिधि तक आरोपी को छुड़वाने और कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मी को ही सजा दिलाने पुलिस थाने पहुंच जाते हैं. हाल के दिनों में राजधानी रायपुर सहित कई स्थानों पर ऐसे उदाहरण सामने आये हैं जिनमे ऐसे हस्तक्षेप हुए हैं और पुलिस के लोग कार्रवाही के शिकार बने हैं.सड़क दुर्घटनाएं रोकने के लिए सड़कों पर यातायात नियंत्रित किया जाता है.हेलमेट नहीं लगाने से पुलिस वालों का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन जो लोग दुर्घटना में मरते हैं उनके घरवालों को तो तकलीफ होती है इसी लिये पुलिस अपना काम करती है कि जो हेलमेट न पहने उसपर कार्यवाही कर उसे लाइन पर लाये लेकिन प्राय: हर दूसरा आदमी अपना रौब गांठता है ऐसे में धूप  में खड़ा गर्म होने वाला सफेद वर्दीधारी भड़के नहीं तो और क्या करेगा?  आए दिन ट्रैफिक पुलिस द्वारा रोके जाने पर या चालान करने पर पुलिसवालों को धमकी देना और छोटी सी बात पर भी वर्दी उतरवा देने की धमकी देना भी अब रोजाना की घटनाओं में शामिल हो चुका है। पुलिसवाले भी अब इन घटनाओं के इतने आदि हो चुके हैं कि वे चालान भी तब ही करते हैं जब उन्हें अंदाज हो जाता है कि जिसे वे पकड़ रहे है वह दिखने में ही कमजोर और प्रभावहीन लग रहा है. जिले के पुलिस अधिकारी और उनसे ऊपर के अधिकारी भी मानते हैं कि बिना बात की राजनीतिक दखलअंदाजी से उनके काम करने के तरीके पर बहुत गलत असर पड रहा है. यही नहीं, पुलिस कर्मियों का मनोबल इतना गिर चुका है कि अपराधों को सुलझाने में उनकी रूचि भी कम होती जा रही है. पुलिसकर्मियों के हतोत्साहित होने से अब  इस बात की चिंता भी बढऩे लगी है कि आने वाले दिनों में कभी भी सार्वजनिक तौर पर पुलिसकर्मियों का असंतोष सामने आ सकता है,नियमों के बावजूद मोटरसाइकिल पर तीन सवारी अब सामान्य बात हो चली है,सड़कों पर  स्टंट आजकल की पीढ़ी का जन्म सिद्व अधिकार बन गया है. सड़क पर या सार्वजनिक स्थानों पर दुर्व्यवहार की शिकायत करने पर पुलिसवाले मामले का संज्ञान लेने के बजाए संबंधित लोगों को आपस में ही सुलह करने की सलाह देतेे हैं. छत्तीसगढ़ मे रौब दिखाने के लिये गाड़ी में नम्बर के साथ अपना पद नाम लिखाना, झंडा लगाना एक आम बात है. ऐसी गाड़ी को रोककर कोई्र पुलिसवाला क्यों मुसीबत बुलाना चाहेगा? कुछ ऐसे मामले भी हैं जिसमेंं पुलिस का हस्तक्षेप नहीं होने के कारण लोग अपनी सुरक्षा के लिए अपने दम पर ही निपटने की प्रवृति अपनाने लगे हैं अभी अपने पास आत्म-रक्षा के लिए हथियार रखने का चलन कुछ ही लोगों तक सीमित है, लेकिन ऐसी स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता जब लोग अमेरिका की तरह बंदूकें रखने की स्वतंत्रता की मांग करने लगें। अमेरिका में ऐसा कानून वहां के लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ  हैं. राजधानी रायपुर के मौदहापारा में घटित गेंग वार ने यह भेद तो खोल दिया कि यहां अवैध हथियार और ड्रग का बिजनेस दोनों ही काम कर गया.पुलिस को मालूम था कि रायपुर में ऐसे गेंग काम कर रहे हैं जो शहर की शांति को भंग कर सकते हैं लेकिन कार्यवाही कौन करें? राजनीतिक, प्रशासनिक व प्रभावशाली पहुंच के कारण पुलिस हाथ डालकर क्यो अपना कैरियर खराब करें?


रौशनी पर मंहगाई....बिजली का बिल या गले का फंदा?



रोजमर्रा की भाषा में बात करें तो हमें रोज कई प्रकार के लेन -देन के लिये हमें पहले बिल दिया जाता है फिर हम उसका भुगतान करते हैं किन्तु छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल द्वारा जारी किया जाने वाला बिजली का बिल इन सब बिलों में अनोखा है-करीब सोलह इंच लम्बे इस बिल को न तो कोई समझ सका है और न  समझ पाता है. वास्तविकता यही है कि यह किसी भी आम आदमी के न तो पल्ले पड़ता है और न पड़ सकता है. यहां तक कि पड़े लिखे लोगों के भी पल्ले नहीं पड़ता. बिजली बिल हर माह पहुंचता है. किसी माह बराबर आता है तो किसी माह उसमें दुनियाभर का मीटर चार्ज,सर्विस टैक्स,फिक्सेड डिपाजिट और फलाना ढिकाना मिलाकर उपभोक्ता का ब्लड प्रेशर बढा देता हैं. बिल ऐसा लगता है जैसे गले में डालने के लिये फंदा भेज दिया हो.अगर किसी के घर में  एक मीटर हो तो सोलह इंच लम्बा एक फंदा और अगर किसी के घर में दस मीटर लगा हो तो सोलह- सोलह इंच के दस फंदे पहुंच जाते हैं. यह आज से नहीं वर्षो से यूं ही चला आ रहा है. मशीन से घर पर बिल देने से पहले एक कापी के कागज साइज का छोटा बिल आता था उसे तो लोग कुछ पड या समझ भी लेते थे किन्तु अभी का बिल सुविख्यात हिन्दी और अंगे्रजी के विशेषज्ञों द्वारा तैयार कर तकनीकी क ठोर भाषा का प्रयोग कर परोसते हैं. शायद इसलिये भी कि कोई इसे आसानी से समझकर विद्युत मंडल के दफतर न पहुंच जाये. बात सही भी है जब किसी को समझ में आये तब तो वह विवाद करें! विद्युत भगवान के इस बिल के आगे लोगों के सामने बस एक ही चारा रहता है कि वह चुपचाप विद्युत नियामक आयोग का बिल दोनों हाथों से ग्रहण करें और चुपचाप जितने का बिल आया है उसे नेट से या विद्युत नियामक आयोग की दुकान लगाये बैठे लोगो के हाथ में थमाकर पैसा पटा दे. हां चिल्हर जरूर साथ में रखे नहीं होने पर उसे भी या तो काटकर वहीं रख लिया जाता है या फिर जोड़कर दूसरे बिल में दे दिया जाता है.इस तरह अद्भुत विद्युत बिल जारी करने वाले विद्युत मंडल ने एक अप्रेल से फिर बिजली की दरें बढ़ा दी है यह ज्यादा बिजली उपभोग करने वाले उद्योगपतियों के लिये राहत देने वाला है तो उन गरीब लोगों के लिये मुसीबत खड़ी कर देने वाला है जो  शून्य से लेकर सौ यूनिट का उपयोग भी मुश्किल से करते हैं.हमारे प्रदेश में बिजली का उत्पादन इतना होता है कि हमें किसी से कटोरा लेकर मांगने नहीं जाना पड़ता, हम दूसरो को देते हैं और उनसे इसकी  एवज में पैसा भी वसूल करते हैं. कोयला हमारा, पानी हमारा संयंत्र हमारे और श्रम शक्ति हमारी- सब कुछ हमारा-हम स्वंय विद्युत उत्पादन करते हैं.  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही गर्व से यह घोषणा की थी कि हम बिजली किसी से लेने वाले नहीं देने वाले हैैं-हमे इस बात पर गर्व करना चाहिये लेकिन क्या बिद्युत मंडल का नियामक आयोग इस प्रदेश के लाखों करोड़ों लोगों के दर्द को महसूस करता है? इस अंचल के वासियों के लिये सिर्फ  रोशनी ही एक आवश्यकता नहीं है. तन ढकने के लिये कपड़े और सिर छिपाने के लिये छत के साथ उसे  हर महीने एक बहुत बड़ी रकम अन्य आवश्यक उपभोक्ता मदो पर भी खर्च करनी पड़ती है.ऐसी चीजो के दाम भी आज रौशनी से भी दुगनी है. विद्युत मंडल हर महीने की 22 और पच्चीस के बीच बिल पटाने का आदेश देता है्र नहीं पटाओ तो बडों की बिजली तो नहीं कटती लेकिन छोटे विद्युत उपभोक्ता जरूर उसकी चपेट में आ जाते हैं.. एक आम आदमी जो महीने में दस से बीस हजार रूपये कमाता है वह किस प्रकार सबसे बड़ी आवश्यकता बिजली का दर्दभरा मंहगा बिल पटायें? उसके सर  पर यह अकेला बिल  नहीं  रहता. घर का किराया, बच्चों की  फीस, टेलीफोन -मोबाइल के बिल, कपडे,स्वास्थ्य,गैस, पेट्रोल ओर न जाने ऐसे बिलो की समस्याएं भी रहती है. विद्युत विनायक ने अपनी  बात कहते हुंए और अपनी समस्याएं रखते हुए लोगों के सामने अपनी बढ़ी हुई चौदह प्रतिशत की दर को रख दिया लेकिन उसने लोगों के दर्द को न समझने की कोशिश की और न ही दूसरे स्त्रोतो से अपने  खर्चे का उपाय खोजने की कोशिश की.विद्युत अधिनियम 2002 की धारा 62के अंतर्गत बिजली की दरों का निर्धारण कर दिया गया है. चौदह प्रतिशत की बढ़ी हुई दरें अप्रेल फूल के दिन से लागू भी हो गई है.विद्युत नियामक आयोग ने दरों का निर्धारण करते समय प्रस्तावित सिद्वान्तों के अनुसरण की दुहाई दी है लेकिन क्या वास्तव मे छत्तीसगढ़ की गरीब जनता इस बडे हुए बोझ को अन्य बड़े हुए बोझ के साथ सहन करने को तैयार है? विद्युत मंडल वास्तव मे इस प्रदेश का सबसे कमाऊ विभाग है उसे ऐसे समय जबकि भीषण सूखे और अकाल की स्थिति व मौद्रिक संकट की स्थिति का समय है थोड़ा बहुत रहम आम लोगों पर करना था.

सभी चुनाव एक साथ कराने में क्या हर्ज? पहल करें मोदी जनता साथ देगी!




इसमें दो मत नहीं होना चाहिये कि देश में अगर सभी चुनाव को एक साथ एक ही समय में पांच वर्ष के लिये करा दिये जाये तो पैसे की बचत होगी साथ ही सरकार भी  सही ढंग से चल सकेगी. इलेक्शन को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राय के बाद इसपर बहस चलना स्वाभाविक है..अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी देश में एक साथ सभी चुनाव कराने की प्रस्ताव रखा था. उनका भी मानना था कि बार बार होने वाले चुनाव से सरकारी खजाने पर बहुत ज्यादा दबाव  पड़ता है.अगर एक ही बार मे सभी चुनाव पांच वर्ष के लिये करा लिये जाये तो चुनाव पर होने वाले व्यय व समय की बर्बादी दोनों  से बचा जा सकेगा. नरेंद्र मोदी ने भी19 मार्च को भारतीय जनता पार्टी की एक मीटिंग में इसकी पैरवी की है. मोदी ने मीटिंग में मौजूद पार्टी मेंबर्स से कहा था कि देश भर में निकाय और असेंबली इलेक्शन करीब हर साल होते हैं. ये सभी इलेक्शन एक साथ कराए जा सकते हैं. पार्टी का कहना है कि इस आइडिये से देश का वक्त और पैसा बचेगा.प्रधानमंत्री  की इस राय के बाद बीजेपी में भी यह राय है कि पंचायत से लेकर संसद तक के सभी चुनाव साथ होने चाहिए.अलग-अलग वक्त पर चुनाव होने से प्रोजेक्ट्स की रफ्तार थम-सी जाती है. एक-साथ चुनाव होने से टैक्सपेयर्स के पैसे की बचत भी होगी.प्रधानमंत्री और पार्टी की एक राय के बाद इस व्यवस्था को कायम करने में दिक्कत होने के  बाद भी ज्यादा दिक्कत नहीं आना चाहिये. कई संसदीय कमेटियों और लॉ कमीशन ने भी इसके पक्ष में अपनी राय दी है. बजट सत्र से पहले हुई ऑल पार्टी मीटिंग में सरकार की ओर से इस आइडिये को रखा गया था, जिसका कुछ बड़ी पार्टियों ने सपोर्ट किया है. अगर सब  पार्टियां मिलकर यह निर्णय लेती है तो वास्तव में देश और जनता दोनों का भला होगा. हम तो यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्रियों का चुनाव भी प्रत्यक्ष प्रणाली से  होना चाहिये-आखिर हम शहरों में मेयर का चुनाव भी तो प्रत्यक्ष प्रणाली से सीधे सीधे कराते हैं इससे चुनाव जीतने  वाले व्यक्ति के प्रति आम लोगों का विश्वास और बढ़ेगा.आजादी के कई वर्षो तक चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था कायम रही है. किन्तु धीरे धीरे राजनीतिक उठा पटक  के चलते यह व्यवस्था ध्वस्त हो गई.मिली जुली सरकारे गिरने  व मध्यावधि चुनाव के कारण  पूरे देश में एक तरह की लोकतांत्रिक अव्यवस्था ने वर्चस्त कायम कर लिया.  लोकसभा के चुनाव किसी एक तिथि पर तो विधानसभा के चुनाव दूसरी तिथि पर और उसके बाद कई अन्य चुनावों ने तो देश की व्यवस्था को ऐसा बना दिया है कि जब देखों तब चुनाव का माहौल बना रहने लगा इससे लोग काम छोड़कर चुनाव प्रचार और प्रत्याशियों के आगे पीछे रहने लगे. शिक्षकों को पढ़ाई छोड़कर चुनाव में लगना पड़ता है. सरकारी कर्मचारियों का कामकाज भी सालभर प्रभावित होता रहता है. अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी मंशा के अनुरूप इस व्यवस्था को कैसे कायम करेगी? चुूंकि इस समय सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि सभी निकायों के एक साथ एक ही  समय में चुनाव कराने के लिये संपूर्ण
चुनाव को फिर से व्यवस्थित करना पड़ेगा- आज अगर एक राज्य का चुनाव अभी हो रहा है तो वह पांच साल बाद ही होगा. इस बीच और भी ऐसे कई राज्य आ जायेगें जिनके चुनाव होने हैं. लोकसभा की बात को तो हम मान सकते हैं कि वह पांच साल में एक बार ही हो जाये लेकिन  राज्यों का क्या होगा उन्हें कैसे पटरी पर लाया जायेगा. चलिये एक बात मान लेते हैं कि राज्यों के अंदर मौजूद नगर निकाय और पंचायतो को एक साथ भंग कर एक साथ कराया जा सकता है लेकिन निर्वाचित विधानसभाओं को तो बीच में भंग कर सामूहिक रूप से उसे पटरी पर लाना बहुत कठिन काम होगा हां यह जरूर किया जा सकता है कि लोकसभा के साथ-साथ होने वाले सभी विधानसभाओं को पहले पटरी पर लाया जाये फिर जितनी विधानसभांएं इन चुनावों के साथ अपने चुनाव कराना चाहती है वे भी इसमें जुड़े यह काम भी बड़ा जटिल ही है.चुनाव लोकतंत्र का आधार स्तम्भ हैं.आजादी के बाद से भारत में चुनावों ने एक लंबा रास्ता तय किया है।1951-52 को हुए आम चुनावों में मतदाताओं की संख्या 17,32,12,343 थी, जो 2014 में बढ़कर 81,45,91,184 हो गई है. 2004 में, भारतीय चुनावों में 670 मिलियन मतदाताओं ने भाग लिया (यह संख्या दूसरे सबसे बड़े यूरोपीय संसदीय चुनावों के दोगुने से अधिक थी और इसका घोषित खर्च 1989 के मुकाबले तीन गुना बढ़कर $300 मिलियन हो गया. यह चुनाव आयोग भी जानता है कि मतदाताओं की विशाल संख्या को देखते हुए चुनावों को कई चरणों में आयोजित करना आवश्यक है लेकिन बार बार चुनाव का तो कोई अर्थ ही नहीं निकलता. प्रधानमंत्री  की राय अनुसार अब ऐसा प्रबंध करना ही होगा कि सारे देश में एक बार में चुनाव पांच पांच साल के लिये व्यवस्थित किया जाये ताकि बार बार खजाने  से निकलने वाले पैसा और समय की बर्बादी  दोनों को रोका जाये.