गुरुवार, 31 मार्च 2016

एप्रिल फूल बनाया तो उनको गुस्सा आया....नये वित्तीय वर्ष का पहला दिन!





''दिन है सुहाना आज पहली तारीख है, खुश है ज़माना आज पहली तारीख है -पहली तारीख अजी पहली तारीख है, बीवी बोली घर जऱा जल्दी से आना, जल्दी से आना शाम को पियाजी हमें सिनेमा दिखाना, हमें सिनेमा दिखाना करो ना बहाना हाँ बहाना बहाना करो ... आजादी के बाद के वर्षो में किशोर कुमार का गाया यह गाना रेडियों पर पहली तारीख को दिन में कई बार बजा करता था, फिर जब अपेे्रेल का महीना आता तो इस महीने की पहली तारीख को मोहम्मद रफी अपने इस अंदाज में गाते थे- अपे्रल फूल बनाया तो उनको गुस्सा आया.... लेकिन अब गानों की वो बहार खत्म हो चुकी है. अप्रेल के महीने की पहली तारीख को लोगों ने एप्रिल फूल बनाना भी बंद कर दिया है. कुछ ही लोग रह गये जो इस पाश्चाथ्य मिथ्य को मानते हैं बहरहाल पश्चिमी देशों में हर साल पहली अप्रैल को एप्रिल फूल डे के रूप में ही मनाया जाता है. कभी ऑल फूल्स डे के रूप में जाना जाने वाला यह दिन, 1 अप्रैल एक आधिकारिक छुट्टी का दिन नहीं है लेकिन इसे व्यापक रूप से एक ऐसे दिन के रूप में जाना और मनाया जाता है जब एक दूसरे के साथ व्यावहारिक मजाक और सामान्य तौर पर मूर्खतापूर्ण हरकतें करते हैं. इस दिन दोस्तों, परिजनों, शिक्षकों, पड़ोसियों, सहकर्मियों आदि के साथ अनेक प्रकार की शरारतपूर्ण हरकतें और अन्य व्यावहारिक मजाक किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य होता है बेवकूफ और अनाड़ी लोगों को शर्मिंदा करना. पारंपरिक तौर पर कुछ देशों जैसे न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में इस तरह के मजाक केवल दोपहर तक ही किये जाते हैं और अगर कोई दोपहर के बाद किसी तरह की कोशिश करता है तो उसे अप्रैल फूल कहा जाता है. ऐसा इसीलिये किया जाता है क्योंकि ब्रिटेन के अखबार जो अप्रैल फूल पर मुख्य पृष्ठ निकालते हैं वे ऐसा सिर्फ पहले (सुबह के) एडीशन के लिए ही करते हैं. इसके अलावा फ्रांस, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान रूस, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्राजील, कनाडा और अमेरिका में जोक्स का सिलसिला दिन भर चलता रहता है. 1 अप्रैल और मूर्खता के बीच सबसे पहला दर्ज किया गया संबंध चॉसर के कैंटरबरी टेल्स (1392) में पाया जाता है.कई लेखक यह बताते हैं कि 16वीं सदी में एक जनवरी को न्यू ईयर्स डे के रूप में मनाये जाने का चलन एक छुट्टी का दिन निकालने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन यह सिद्धांत पुराने संदर्भों का उल्लेख नहीं करता है.भारत में कल आने वाला अपे्रल का दिन लोगों को अपे्रल फूल बनायेगा या कोई हकीकत लेकर आयेगा यह समझने की बात होगी. नई पीढ़ी इस दिन को भूल चुकी है. उसे यह भी नहीं मालूम कि ऐसा कोई दिन भी कभी मनाया जाता था. बच्चों ने भी पहली अप्रेेल को किसी को फूल बनाना छोड़ दिया है. असल में पहली अप्रेल के प्रति आम धारणा है कि एक अप्रैल भ्रम में डालने व मजाक बनाने का दिन है. मगर हकीकत में यह नये वित्तीय वर्ष की शुरुआत का पहला दिन है.इस दिन सरकार नये कायदे-कानूनों के जरिये अपनी आर्थिक व सामाजिक नीतियों को लागू करती है. इस बार भी कई महत्वाकांक्षी व लोककल्याणकारी नीतियों का क्रियान्वयन होना है. केंद्र सरकार इस दिन अपनी महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को पूरे देश में लागू करने जा रही है. अब तक देश के 45 जिलों में यह योजना पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चल रही थी. थोड़ा-सा अधिक प्रीमियम चुकाकर किसान फसल बीमा के अलावा सात अन्य बीमा योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं.  रेल मंत्रालय भी इस दिन से वरिष्ठ नागरिकों के आरक्षण कोटे में पचास फीसदी तक की वृद्धि करेगा, इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं की समस्या को दृष्टिगत रखते हुए शयनयान श्रेणी के डिब्बों में आरक्षण बढ़ा दिया गया है. उन्हें हर तरह की ट्रेनों में लोअर बर्थ मिलेगी.वैसे छोटी बचत करने वाले उपभोक्ताओं को निराशा हो सकती है. नये वित्तीय वर्ष में छोटी बचतों पर दिये जाने वाले ब्याज में कटौती की जायेगी, इसमें पीपीएफ, सुकन्या समृद्धि योजना, किसान विकास पत्र, एनएसएस और डाकघर से जुड़ी कई बचतों के ब्याज में कटौती होगी. एक अप्रैल से लागू की जाने वाली व्यवस्था के अनुसार ब्याज की दरों की समीक्षा हर तीन महीने में की जाएगी. छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ज्यादा ब्याज को कर्ज ब्याज दर में कटौती की राह का सबसे बड़ा रोड़ा माना जाता रहा है. अब बैंक नीतिगत दरों में कटौती का लाभ कारोबारियों को दे सकेंगे?मगर इसका खतरा भी है कि लाभ की उच्च प्रत्याशा के चलते लोग सोने में निवेश करना न शुरू कर दें जो सरकार के वित्तीय घाटे का वाहक न बन जाये. एक अप्रैल से ही पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने नौ राज्यों के 33 जिलों में मिट्टी के तेल पर सीधी सब्सिडी देने का निर्णय किया है.वे तेल खरीदते समय बाजार मूल्य पर भुगतान करेंगे. इसके साथ ही एक अप्रैल से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम दस और राज्यों में लागू हो जाएगा.इसे लागू करने वाले राज्यों की संख्या अब 21 हो जायेगी. हर दृष्टि से अप्रेल के पहली तारीख ने इस बार अपना महत्व बता दिया है.

बुधवार, 30 मार्च 2016

विश्व कप से बस एक कदम दूर...क्या होगा?





2016 के टी 20 वर्ल्ड कप में रविवार 27 मार्च का मैच  सबसे बेहतरीन मैच था. भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हरा दिया और पूरे देश में टी 20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में इस धमाकेदार एंट्री का जश्न मनाया.जश्र देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि वल्ड कप जीतने का जश्न कैसा होगा हालाकि उसे अभी वेस्ट इंडीज से खेलकर फायनल में अपना स्थान बनाना है. बांग्लादेश के खिलाफ कड़ी टक्कर मिलने के बाद से ऑस्ट्रेलिया पर जीत को लेकर तमाम प्रशंसक आशंकित थे, लेकिन कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के प्रदर्शन ने टीम इंडिया को भारतीय दर्शकों के सपने को साकार कर दिखाया. इस जीत के लिए  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विराट कोहली को उनकी बेहतरीन पारी और कप्तान धोनी को बेहतरीन लीडरशिप के लिए बधाई दी.क्रिकेट के प्रति देश में लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगता है कि लोग टीवी के सामने चिपके रहते हैं.कोहली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह अकेले ही ऑस्ट्रेलिया के लिए काफी हैं. इस बात में कितना दम है इसका अंदाज  इसी से लगाया जा सकता है कि मैच के बाद आशीष नेहरा ने विराट कोहली की काफी तारीफ करने में कोई कमी नहीं की. नेहरा का कहना था कि पिछले तीन सालों में कोहली ने आपने आप में बहुत कुछ बदलाव किया है. खेल के साथ-साथ विराट कोहली ने अपनी जीवन शैली में भी काफी बदलाव लाया है.वर्तमान स्थिति मेें वास्तविकता यही है कि भारतीय टीम में मौजूदा दौर में अगर कोई शानदार खिलाड़ी है तो वह विराट ही है  जिसकी बदौलत भारत आज हम एक सम्मानजनक स्थिति में हैं. वर्ल्ड टी-20 में मोहाली में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नॉकआउट मुकाबला खेला गया, जिसमें टीम इंडिया ने 6 विकेट से जीत दर्ज करते हुए सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया। अब सेमीफाइनल में उसका मुकाबला 31 मार्च को मुंबई में वेस्टइंडीज से होगा। मैच के हीरो कोहली की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दबदबे का  वर्णन इसी से कर सकते हैं कि  उन्होंने पिछली चार पारियों में 55 गेंदों में 90 नाबाद, 33 गेंदों में 59 नाबाद, 36 गेंदों में 50 और 51 गेंदों 82 रन नाबाद बनाए हैं.मैच के दौरान 16वें ओवर की पहली ही गेंद पर कोहली ने बड़ा शॉट लगाने की कोशिश की, लेकिन चूक गए,इसके बाद अगली दो गेंदों पर दो-दो रन लिए चैौथी गेंद पर चौका लगाया और अगली दो गेंदों पर फिर दो-दो रन लिए. धोनी-कोहली की रनिंग देखने लायक रही, 16वें ओवर में 12 रन बने 17वें ओवर में 8 रन ही बने। 18वें ओवर में 16 रन विराट ने ठोके, जबकि धोनी ने दो रन लिए, एक बार फिर दोनों की रनिंग शानदार रही। इस ओवर में कुल 19 रन बने. 19वें ओवर में कोहली ने कूल्टर नाइल को लगातार 3 चौके जड़ दिए। इसके बाद अंतिम गेंद पर एक चौका और जड़ दिया. इस ओवर में 16 रन बने. इसके बाद 20वें ओवर की पहली ही गेंद पर कप्तान धोनी ने चौका जमाकर जीत दिला दी. टीम इंडिया को रनगति बढ़ाने में लगातार परेशानी आ रही थी.11वें ओवर में केवल 3 रन ही बने और दबाव बढ़ता रहा। 12वें ओवर में विराट ने मैक्सवेल को छक्का लगाकर कुछ भरपाई की, इस ओवर में युवी-विराट ने 12 रन बटोरे.13वें ओवर में 9 रन आए.14वें ओवर की अंतिम गेंद पर फॉल्कनर ने युवराज को वॉटसन के हाथों कैच करा दिया। इस ओवर में 5 रन आए.भारतीय टीम का खेल जानदार है लेकिन उसे अपने बेटिंग साइड को और मजबूत करने की जरूरत है. अहम मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के ओपनर उस्मान ख्वाजा ने पहली ही गेंद पर चौका लगाया, लेकिन बाकी गेंदों पर कोई रन नहीं बना सके। भारत में घरेलू मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टी-20 के 3 मैच खेले हैं और तीनों में जीत दर्ज की है। यह मैच अक्टूबर, 2007 को मुंबई और अक्टूबर, 2013 को राजकोट में खेले गए थे। दोनों ही मैचों में टीम इंडिया ने पहले बल्लेबाजी की थी। वहीं वर्ल्ड टी-20 2016 में मोहली में बाद में बैटिंग करते हुए 6 विकेट से हराया.टीम इंडिया ने टी-20 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 9 मैच जीते हैं, जिनमें से 5 बार उसे लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत मिली है. टीम इंडिया को घरेलू मैदान पर तीन बार जीत लक्ष्य का पीछा करते हुए मिली हैं.खास बात यह कि विराट कोहली का औसत चेज करते समय सबसे ज्यादा है.मोहाली में टीम इंडिया ने इस मैच को मिलाकर दो टी-20 मैच खेले हैं और दोनों जीत लिए हैं। इससे पहले भारत ने श्रीलंका को 2009 में खेले गए मैच में 4 विकेट से हरा दिया था। आस्ट्रेलिया के बाद भारत का अगला मुकाबला सेमीफायनल में वेस्ट इंडीज से होना है दर्शकों को भारत के खेल पर पूरा विश्वास है. विश्व कप की उम्मीद लगाये बैठे दर्शकों के लिये वेस्ट इंडीज के खिलाफ भारत की जीत अहम मानी जायेगी.वेस्ट इंडीज की टीम वहीं है जो अफगानिस्तान से हार चुकी है.


घर खरीदने के पहले और बाद की रूकावट दूर हुई?

देश की बढ़ती आबादी से न सिर्फ बड़े नगरों बल्कि अन्य सभी नगरों, कस्बों में भी आवास की मांग तेजी से बढ़ा रही है. इसी माहौल में देश में वैध और अवैध आवासीय कालोनियों  का दौर चल पड़ा है जिसे 'बिल्डर बूमÓ कहा जाने लगा है.रोटी,कपड़ा और मकान  हर आदमी की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता है इसमें से एक की भी कमी  होने पर इंसान अधूरा हो जाता है. सर छिपाने के लिये जगह एक परिवार की मूलभूत अनिवार्यता है इस कमी को पूरा करने के लिये वह बहुत कुछ त्याग करने के लिये तैयार हो जाता है. इसका फायदा उठाने वाले भी अब बिल्डर के रूप में सक्रिय हो गये हैंं.. धंधे में धोखाधड़ी, घटिया निर्माण से लोगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है.यह तत्व पहले खाली पड़ी  भूमि को किसी प्रकार अपना बना लेते हैं इसके लिये यह सरकार में बैठे कतिपय नौकरशाहों को एक तरह से खरीद लेते हैं और गरीबों व सरकार की भूमि को ओने पोने भाव में खरीद लेते हैं.अब तक यह स्थिति थी कि लंबे इंतजार के बाद भी लोगों को मकान या प्लाट नहीं मिलते थे, रियल एस्टेट पर माफियाओं का शिकंजा कसता चला गया. इस समस्या पर कुछ फिल्में भी बनने लगी- 'घरोंदाÓ- 'खोसला का घोसलाÓ आदि. रजिस्ट्री के स्थान पर पावर आफ अटार्नी में भी बड़े धोखे के गोरखधंधे हुए. मकानों को बनाने में जानबूझकर देरी लगायी गयी. ज्यादा रुपया मांगने लगे या मकान ही नहीं दिया. ऊपर से शो-बाजी का रंग रोगन कर मकान को अंदर से इतनी घटिया निर्माण सामग्री से बनाया कि मकान खरीदने के बाद लोग जिंदगीभर रोने लगे. कई लोग पीड़ा अब भी सह रहे हैं लेकिन अब आगे आने वाले समय में लोग इस प्रकार की पीड़ा सहन नहीं  करेंगे सराकर ने बड़ा कदम उठाया है.खरीदारों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें कुछ बिल्डरों की धोखाधड़ी से बचाने के लिए रियल इस्टेट रेग्यूलेटरी अथारिटी बनाने का बिल आखिरकार राज्यसभा ने पास कर दिया. इस बिल में यह प्रावधान है कि कोई भी बिल्डर अपने प्रोजेक्ट में दो तिहाई ग्राहकों की मंजूरी के बगैर बदलाव नहीं कर पाएगा. एक प्रोजेक्ट के लिए लिया गया 70 फीसदी पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में नहीं लगेगा और इसे एक अलग एकाउंट में रखना होगा। दो साल में हर प्रोजेक्ट पूरा होना चाहिए, मगर अधिकतम एक और साल की छूट मिल सकती है. विज्ञापन और प्रचार में जो बताया जाएगा, उसे डील में शामिल माना जाएगा. मकान का कब्जा देने में जो देरी होगी, उस पर उतना ही ब्याज देना होगा जितना ग्राहक पर भुगतान में देरी पर लगता है. पहली बार कार्पेट एरिया को परिभाषित कर दिया गया है.बिल में बिल्डर और खरीदार की जवाबदेही तय कर दी  गई है. पूर्व में कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक को भाजपा की मोदी सरकार नेे लगभग 20 संशोधनों के साथ प्रस्तुत किया और अब कांग्रेस के समर्थन से यह राज्यसभा में पारित हो गया. इसमें बिल्डर को समय पर मकान देना होगा, देरी पर खरीददार को बैंक के बराबर ब्याज देना होगा और मकान में खराबी होने पर बिल्डर व एजेन्टों का पंजीकरण रदद् होगा.  दोषी पाये जाने पर बिल्डर को तीन साल तक की सजा भी हो सकती है. रियल एस्टेट का व्यापार कृषि के बाद दूसरा बड़ा व्यापार बन गया है. जी.डी.पी. में इसका 9 प्रतिशत भाग है. हर साल 10 लाख से ज्यादा लोग मकान खरीदते हैं. इसमें लगभग 4 लाख करोड़ का निवेश होता है. करीब 30 बड़े शहरों में 80 हजार रियल एस्टेट कम्पनियां काम कर रही हैं. हर प्रोजेक्ट का पंजीकरण होने से देश में माफियाओं द्वारा अवैध कालोनियों बनाकर भारी शोषण पर बहुत हद तक लगाम लग सकेगा. अभी तक रियल एस्टेट की हर गतिविधि कानूनी दायरे से बाहर चल रही थी, अब सभी कुछ कानून के दायरे में सख्ती से आ गया है. जन-सुविधा व संरक्षण की  दृष्टिï से यह जन-कल्याण का बहुत बड़ा कदम है.


आरक्षण का शनै शनै अंत ही एक विकल्प!



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाबा साहेब डा0 भीमराव अंबेडकर राष्ट्र्रीय स्मारक की आधारशिला रखने के मौके पर कहा कि दलितों और दमितों को मिले आरक्षण को कमजोर नहीं किया जाएगा. आरक्षण कमजोर वर्गों को संविधान से मिला अधिकार है और इस अधिकार को कोई नहीं छीन सकता है. सरकार मानती है कि समाज को दुर्बल बनाकर राष्ट्र्र को सबल नहीं बनाया जा सकता. यह बाबा साहेब का सपना था जिसे साकार करने के लिए सरकार वचनबद्ध है लेकिन कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही है.सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण अब अपनी सीमाएं तोड़ कर सर्वजातीय हो गया है. अब मूल प्रश्न कि अछूत माने जाने वाले दलित वर्ग और घने जंगलों व पहाड़ों में रहने वाले आदिवासी और गिरिजन न तो मुखर रहे हैं और न उनपर कोई ध्यान दे रहा है.संविधान में आरक्षण के प्रणेता ने अछूतों व आदिवासियों के लिये 10 साल के आरक्षण की व्यवस्था करायी थी लेकिन यह आरक्षण आज अडसठ साल बाद भी जारी है. मूल व्यवस्था राष्टï्र व समाज की जरूरत थी. लेकिन बीच में मात्र 11 महीने प्रधानमंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर-मंडल की प्रतिद्वंदी राजनीति में मंडल कमीशन के नाम पर 'अन्य पिछड़े वर्गोंÓ को आरक्षण देकर आरक्षण के मूल विचार ध्वस्त कर दिये. पिछड़ों के नाम पर अनेकों जातियों के आरक्षण में आ जाने से बाकी बची जातियों के युवा वर्ग के सामने नौकरी व शिक्षण संस्थाओं में भर्ती के अवसर अपने आप ही कम हो गये. हर जाति की मांग की बाढ़ आ गयी और इसी से मूल आरक्षण बह गया. राजस्थान में एक बड़ा समुदाय मीणा जाति का है. इन्होंने 27 प्रतिशत पिछड़े लोगों को आरक्षण मिल जाने के बाद मीणा जाति के लिये 5 प्रतिशत आरक्षण पा लिया. यही आरक्षण 'जाटोÓ को भी उकसा गया. आर्थिक दृष्टिï से जाट संपन्न किसान वर्ग का है. जाट का मतलब अच्छी जमीन और बड़ा किसान होता है. यही स्थिति गूजरों की है. वे भी मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा में फैले हुए हैं. ये भी किसानों की सम्पन्न जाति है. ये भी आरक्षण मांग रहे हैं. गुजरात में पाटीदार जो पटेल के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं वे भी गुजरात का अति सम्पन्न वर्ग और बड़े किसान हैं.हरियाणा ने हाल ही इतना बड़ा आंदोलन किया कि राज्य सरकार तो छोडिये केन्द्र सरकार तक हिल गई.आरक्षण की मांग उठाने के बाद हार्दिक पटेल रातों रात देश का बड़ा जातीय नेता बन गया.वास्तव में आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिये. जो बहुत गरीब हैं उसका चयन कर उसे समाज में खडे होने लायक बनाकर आरक्षण को आगे आने वाले वर्षो में खत्म कर देना चाहिये.यह बात डा. आम्बेडकर ने  संविधान लिखते समय कही थी लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं मानी आरक्षण आज आग की चिनगारी की तरह कायम है जो कभी भड़क जाती है. आरक्षण की मांग करने  वाले अधिकांश संपन्न है लेकिन जो वास्तव में इसके हकदार हैं वे अपनी आवाज उठाने लायक भी नहीं हैं.इधरअल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमान और जैन समुदाय भी आरक्षण मांग रहा है. बीच में न्यायपालिका भी सुप्रीम कोर्ट स्तर पर इस विवाद की लपेट में आ रही है.आंध्र अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमानों को आरक्षण दिया गया- सुप्रीम कोर्ट ने उसे इस आधार पर रद्द कर दिया कि धर्म के आधार पर आरक्षण अवैध है. इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के लिए आरक्षण देने को रद्द कर दिया है. हाल ही में जाटों ने हरियाणा में खासकर रोहतक नगर में जिस तरह गुंडागिरी का आंदोलन चलाया उससे उस राज्य में सभी गैर जातियां जाटों के विरुद्ध एकजुट होकर उन्हें बहिष्कृत कर रही है. जाति आरक्षण जाति संघर्ष हो गया और अब भारत में वर्ग संघर्ष नहीं जाति संघर्ष का दौर आ गया है. इसका एकमात्र निदान व समाधान यही है कि संविधान में जिन वर्गों को आरक्षण दिया गया वहीं तक सीमित रखा जाए.संविधान  ने वर्ग विशेष को आरक्षण  की अवधि निश्चित की थी लेकिन वोट की राजनीति के चलते यह न केवल कई अन्यों के लिये बढ़ती  गई बल्कि आरक्षण राजनीतिक उज्लू सीधा करने का कारण बन गया. अब भी कुछ नहीं बिगडा है धीरे धीरे कर आरक्षण की आवश्यकता को छान-छान कर निकाल देना चाहिये. पहले जातिगत आरक्षण खत्म किया जाये फिर आर्थिक रूप से बुरी गत में पहुंचे लोगो को छांटकर उन्हें एक समय सीमा तक आरक्षण प्रदान किया जाये वे अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जाये तो उनका आरक्षण खत्म किया जाये. प्राय: सभी आरक्षण को खत्म करना ही बेहतर होगा समाज में समानता लाने के लिये भी यह जरूरी है।

बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक हैं होली!



माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था.अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था. उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी.हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था. प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्व हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा. हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे.आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया. ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है.प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है.
वैर और उत्पीडऩ की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता  हैं .प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं.कुछ लोगों का यह भी मानना   है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था.इधर इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था. होली  का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है. संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं. होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा हैप्त प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी.वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था, उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था.अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा.इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीना आरंभ होता है अत: यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं. होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है. गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं.होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है.प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं,लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती. अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं.रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं. होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी अब आकार लेने लगा है.भारत में होली अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाई जाती है. ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है.बरसाने की लठमा.र होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं, इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है. हम अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां  होली अत्यंत शालीनता पूर्वक मनाने की  परंपरा रही हैं.छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है शहरों  में सवेरे से बच्चे,युवा सब रंगों की  टोली में निकलते हैं और दोपहर बारह एक बजे तक या ज्यादा हुुआ तो दो तीन बजे तक सब कुछ सामान्य हो जाता है. जबकि छत्तीसगढ के पडौसी राज्य मध्यप्रदेश में होली रंगपंचमी तक चलता है.इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।




मंगलवार, 22 मार्च 2016

ेआखिर नक्सलियों को गोला बारूद और रसद कोैन पहुंचा रहा है?





बारूद के ढेर पर है बस्तर -यहां से उठने वाली चीख पुकार और उसके बाद शांत होती जिंदगी यूं कब तक हमे सुननी पड़ेगी?  घटना के बाद निंदा,फिर मुआवजा तथा जवानों की तैनाती क्या यही इस समस्या का हल है? नक्सलियों द्वारा बिछाए गए बारूदी सुरंग की चपेट में आने से पिछले सप्ताह एक और आदिवासी महिला की मौत हो गई उससे एक दिन पहले प्रेशर बम की चपेट में आने से तीसरी कक्षा में पढऩे वाली छात्रा की भी मौत हो गई यह इतना वीभत्स था कि सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गये और जिसने इस भयानक हादसे को देखा होगा वह तो  पता नहीं किस तरह इसे देखने के बाद अपनी शेष जिंदगी काटेगा. सुकमा के भेज्जी थाना क्षेत्र म गोरखा गांव के कोसिपारा की मुचाकी हिड़मे महुआ बीनने जंगल की ओर गई थी।तभी मुचाकी का पैर नक्सलियों की ओर से जवानों को निशाना बनाने के लिए लगाए गए प्रेशर बम पर पड़ते ही उसके चिथड़े उड़ गये.इतने समय के दौरान ऐसा लगता है कि बस्तर के चप्पे चप्पे पर नक्सलियों ने मौत बिछा रखी है जिसमें हमारे जवान फंसते हैं तो कभी बेक सूर ग्रामीण तो कभी वे खुद भी अंजाने में फंस जाते हैैं तो इसमें भी कोई अतिशयोक्ती नहीं होनी चाहिये. इस घटना के पूर्व  मुरलीगुड़ा के पास जिस प्रेशर बम की चपेट में आने से  आठ साल की आदिवासी स्कूली छात्रा मुचाकी अनीता की मौत हुई थी। वह 5 किलो का था.विशेषज्ञ बताते हैं इतनी मात्रा के विस्फोटक से एक बड़ी गाड़ी को आसानी से उड़ाया जा सकता है. गौरतलब है कि इसी जगह पर बारूदी सुरंग बिछी थी जिसकी  चपेट में  आने से सीआरपीएफ का एक जवान भी शहीद हो गया था और एक डिप्टी कमांडेंट कोमा में चला गया. सवाल  यह भी उठता है कि बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों तक यह विस्फोटक कैसे, किसके माध्यम से पहुंच रहे हैंॅ. इतनी पुलिस की नजर बचाकर बीहड़ों में विस्फोटकों का पहुंच जाना, भारी संख्या में मौजूद नक्सलियों के लिये खाने पीने की सारी सुविधांए  पहुेचना यह सब ऐसे सवाल हैैं जो आज तक इतना पैसा खर्च करने के बाद भी बना हुआ है. हम आदमी को सरकार से पूछने का यह अधिकार है कि हमारी जेब से पैसा निकालकर कब तक यूं खून का खेल चाहे वह नक्सलियों का हो या हमारे जवानों का खेला जाता रहेगा? सरकार अगर हमले के बाद निंदा करके या कुछ ओैर  फोर्स बढा़कर इस समस्या को  यूं ही ठण्डे बस्ते में डालती रही तो ऐसा लगता है कि इस समस्या का कोई हल ही नहीं है.इस बात की खुशी है कि सरकार ने इस घटना के बाद कोई देर न करते हुए पीडि़तोंं को पांच पांच  लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की लेकिन  सवाल फिर  भी बना हुआ है कि आखिर  ऐसा हम कब तक करते रहेंगे. वे मारते रहेंगे, हम मरते रहेंगे और उनके भी कई मारे जायेेंगे-यह सब आखिर  कब तक? इसे एक इमरजेसंी  प्राब्लम की तरह क्यों नहीं देखा जा रहा?हम मानते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करने से बहुत से निर्दोष ग्रामीणों का भी अंत होगा लेकिन अभी  तो तुला पर दोनों ही एक समान मौत को गले लगा रहे हैं- ऐसे में सिर्फ यूं खामोश बैठकर तमाशा देखने  से अच्छा यही हैं कि एक ज्वाइंट अभियान  सभी सीमावर्ती राज्यों की बैठक बुलाकर बनाई जाये जिसमें नक्सलियों को पहुंचने वाली रसद  गोला बारूद को सीमा के आसपास ही रोकने व लाने ले जाने वालों को पहले बंद करने की योजना बनाई जाये साथ ही सीमा को चारों तरफ से कुछ समय के लिये सील किया  जाये ताकि बाहर किसी  भी तरह से आने वाले  गोला बारूद और रसद को छिपे नक्सलियों तक पहुंचने न दिया जाये तभी यह संभव होगा कि बीहड़ में छिपे परेशान होकर बाहर निकलेंगे-प्रक्रिया ठीक उसी तरह है जैसे किसी बिल में घुसे सांप को धुआं करके बिल से निकालना. असल प्रशन आज यह नहीं कि गोली कौन चला रहा है और कौन किसे मार रहा है- सवाल तो यह है कि गोली चलाने वालों को जिंदा कौन रख रहा है और कौन उन्हें बारूद और रसद पहुंचा रहा है? एक  बार हम पुलिस के इस  दावे को मान भी ले कि उसके कथित दबाव के आगे नक्सली भारीी तादात में सरेन्डर कर रहे हैं तो फिर यह सवाल उठता है कि उसके बाद भी  उसपर घेर घेरकर हमले कैसे हो रहे हैं? इससे तो यह साबित हो रहा है कि नक्सलियों की तादात पुलिस फार्स से कई गुना ज्यादा हें और  उनके पास कई किस्म के घातक हथियार भी है यहां तक कि विदेशी राष्ट्रों से पहुंचने वाले हथियार भी! सरकार को चाहिये कि वह प्रदेश में सुख शांति और विकास के लिये बस्तर को केन्द्र और आसपास के राज्या की मदद से एक ही बार में समस्या के हल करने की कोशिश करें!



....और 'आधार देश के नागरिकों की विशिष्ट पहचान बन गया...!



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भारत के सभी नागरिको को विशिष्ट पहचान नंबर देने की  नियत से शुरू हुई थी 'आधार योजना!Ó वर्तमान  भाजपा सरकार से जुड़े कई लोगों ने इस योजना का जमकर विरोध किया था- मीनाक्षी लेखी ने इसे 'धोखाÓ करार दिया तो प्रकाश जावडेकर की नजर में यह 'गरीबों के साथ खिलवाड़Ó था, और अनंत कुमार ने कहा था कि 'यह एक ऐसी चीज है जिस पर हमें शर्म आनी चाहिएÓ. अब भाजपा की सरकार ने इसी  आधार विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पास करा लिया. आधार यानी विशेष पहचान. इस याजना को कार्यरूप में परिणित करने के लिय ेजनवरी 2009 में विशेष पहचान प्राधिकरण की स्थापना हुई और जुलाई 2009 में नंदन निलेकणी को इसका प्रमुख बना दिया गया, इसके दो मकसद थे-एक यह कि लोगों के पास एक स्थाई पहचान पत्र हो और दूसरा इसे योजनाओं से जोड़ा जाए ताकि यदि एक व्यक्ति एक बार से ज्यादा किसी योजना का लाभ ले रहा है या नकली हितग्राही बनाए गए हैं, तो उन्हें पहचाना जा सके. यह पहचान पत्र या क्रमांक देने के लिए हर व्यक्ति को अपनी आंखों की पुतलियों और सभी उंगलियों के निशान देने का नियम बनाया गया.गठित प्राधिकरण हमेशा यह कहता रहा कि आधार पंजीयन अनिवार्य नहीं है पर अन्य विभाग अपनी योजनाओं का लाभ देने के लिए इसे एक शर्त के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं हुआ भी यही. राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के तहत खाते खोलने के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया. पेट्रोलियम मंत्रालय ने गैस सेवा के तहत आधार क्रमांक की मांग करना शुरू कर दिया. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में भी इसका प्रावधान हुआ. सस्ता राशन लेने के लिए भी इसे अनिवार्य बनाया गया. वर्ष 2010 में नेशनल आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया विधेयक राज्यसभा में पेश हुआ, इस विधेयक को वित्त विभाग की स्थाई समिति ने खारिज कर दिया पर प्राधिकरण को कोई फर्क नहीं पड़ा. वर्ष 2009-10 में इसके लिए 120 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान था, जो 2010-11 में बढ़कर 1900 करोड़ कर दिया गया. दिसंबर 2012 तक प्राधिकरण इस कार्य के लिये 2300.56 करोड़ रूपए खर्च कर चुका था. हम सब जानते हैं कि बैंक में खाता खोलते समय हम अपना फोटो भी लगाते हैं, आधार पंजीयन के लिए आंखों की पुतली और सभी उंगलियों के निशान इसलिए लिए जा रहे हैं ताकि हर व्यक्ति एक किस्म की सरकारी निगरानी में आ सके.आधार या विशेष पहचान पंजीयन को प्रचारित करने के पीछे नंदन निलकेणी के नेतृत्व वाला प्राधिकरण यह तर्क देता है कि देश में करोड़ों लोगों के पास स्थाई पते और फोटो लगे पहचान पत्र नहीं हैं, आधार इस कमी को पूरा कर देगा. सवाल यह उठा कि पहचान के लिए ऐसे चिन्ह लिए जाने की क्या जरूरत है जो मूलत: अपराधियों की निगरानी के लिए लिए जाते हैं। इस काम के लिए आंखों की पुतलियों और हाथों की उंगलियों के सभी निशान लिए जा रहे हैं. आधार प्राधिकरण का तर्क यह रहा है कि ये दोनों निशान कभी नहीं बदलते हैं जबकि वैज्ञानिक अध्ययन का तर्क दिया गया  कि तीन से पांच सालों में आंखों की पुतलियों के निशान बदल जाते हैं. इसी तरह 5 सालों के बाद उंगलियों के निशान भी बदल जाते हैं. ऐसे में सवाल तो खड़ा होता ही है कि इस पूरी कवायद का मकसद क्या है? वर्ष 2013 में सर्वोच्च अदालत ने अपने एक अंतरिम फैसले में कहा कि आधार को सरकार से किसी तरह का लाभ पाने के लिए अनिवार्य नहीं किया जा सकता. वर्ष 2015 में मामला एक बडे पीठ को सौंपा गया, मार्च 2014 तक साठ करोड़ लोगों को आधार कार्ड जारी किया जा चुका था़़़़़.वर्ष 2016 आते-आते आधार को लेकर भाजपा का नजरिया पूरी तरह बदल गया.सरकार ने आधार (वित्तीय एवं अन्य सब्सीडी, लाभों व सेवाओं का लक्षित हस्तांतरण) विधेयक, 2016 पेश किया. विधेयक को लोकसभा में धन विधेयक के रूप में पेश किया गया, उसे स्थायी समिति को भेजने की मांग ठुकरा दी गई, और विधेयक 11 मार्च 2016 को पारित हो गया. राज्यसभा के साथ हिकारत-भरा बर्ताव किया गया. फिर भी राज्यसभा ने पांच संशोधन किए.यह 16 मार्च को अपराह्न व सायंकाल के बीच हुआ. शाम को लोकसभा की बैठक निर्धारित समय से देर तक चली और उसने सारे संशोधन खारिज कर दिए और विधेयक को उसके मूल रूप में पास कर दिया, सरकार ने इसे संसदीय जीत का दावा किया! अब आधार कार्ड भारत के नागरिक  की पहचान बन गया.....!




खेती-किसानी कहीं बीते दिनों की बात होकर न रह जाये? संकट में है किसान!



खेत कांक्रीट के जंगल में परिवर्तित हो गये हैं-ऐसे में अब किसान रह ही कितने गये हैं? हम अपने आसपास ही देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जहां खेत थे वहां अब आलीशान सीमेंट और कांक्रीट के मकान बन गये हैं दूसरी बात धीरे धीरे खेती का रकबा कम होता जा रहा है. किसानों पर लगातार मुसीबत के पहाड़ टूटकर गिरते जा रहे हैं-कहीं उसकी फसल ओले से नष्ट हो रही है तो कहीं सूखे से तो कहीं बाढ़ और अन्य प्राकूतिक विपदाओं से किसान  उतनी ही भूमि पर खेती कर सकता हैैं जितनी उसके पास है लेकिन अब उस कृषि भूमि का अधिकांश हिस्सा शहरी संस्कृति की तरफ बढ़कर कांक्रीट के जंगल में बदलती जा रही है ऐसे में अन्नदाता क्या करें? बिना अनाज उत्पादन की भारी जनसंख्या का पेट कैसे भरा जायेगा यह आगे के वर्षो में उत्पन्न होना स्वाभाविक है. बैंक से कर्ज लेकर खेती करने वाले हजारों लाखों  किसानों पर इस बार दोहरी मार पड़ी है. एक तो बैंक से लिए गए ऋण को चुकता करने की चिंता, दूसरी ओलावृष्टि या सूखे के रूप में प्रकृति का  कोप.हाल ही हुई बारिश और ओलावृष्टि से लगभग 50 फीसदी फसल गंवा चुके मेहनतकशों के सामने क्या करें क्या न  करें की स्थिति आ गई है। वास्तविकता यही  है कि एक सीजन की प्राकृतिक आपदा के चलते आने वाले कई महीनों तक दाल-रोटी की मुश्किलें खड़ी होने वाली हैं। इस बार छत्तीसगढ़ में जरूरत के अनुसार बारिश नहीं हुई, ठण्ड भी  पड़ी ही नहीं अब  मार्च के महीने में अलग-अलग हिस्सों में कई दिनों से बारिश के साथ ओले गिर रहे हैं। मंगलवार को भी कई जगहों पर अंधड़ के साथ हल्की से मध्यम बारिश और गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ीं। इसके कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है। हालत ये है कि बोई हुई फसल तो बर्बाद हुई ही, जो पैदावार हो रही है, उसका भी दाम नहीं मिल रहा। जशपुर में टमाटर, महासमुंद में तरबूज की फसल पूरी तरह खराब हो गई है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर,  बसना, मोहला, मैनपुर, सीतापुर, रामानुज नगर, माना एयरपोर्ट, राजिम, कुरुद, पाटन, बालोद, गुंडरदेही, डौंडीलोहारा, सराईपाली, मस्तूरी और सोनहत आदि जगहों में हल्की से मध्यम बारिश ने कहर नहीं ढाया किन्तु बारिश से फसल को हर तरह से नुकसान पहुंचा है. खुले में रखी फसल बर्बाद होने के साथ साथ खेत में खड़ी फसल को भी नुकसान पहुंचा है.मौसम में आया परिवर्तन किसानों के लिये जहां चिंता का विषय है वहीं हर वर्ग के लिये यह चिंता की बात है कि इसके चलते वस्तुओं के दामों में भारी वृद्वि आयेगी.आम बजट के बाद जहां राहत की आशा की गई थी वहीं अब यह शंका बढ़ गई है कि सरकार डीजल पेट्रोल के भाव बढ़ाने के बाद अब और भी वस्तुओं के भावों में वृद्वि करेगी. इसका असर किसानों पर तो होगा ही साथ ही अन्य वर्ग के लोगों को भी झकजोर कर रेख देगा. ओले से प्रभावित जिलों के लिये सरकार ने पच्चीस पच्चीस लाख रूपये का ऐलान तो किया है किन्तु इसकी  मानिटरिंग भी जरूरी है कि जरूरतमंद किसानों तक यह राशि पहुंचेगी अथवा नहीं? सरगुजा, कोरिया, बलरामपुर, मुंगेली में जबरदस्त ओले गिरे हैं। इनके लिए सरकार ने सात करोड़ जारी किए थे.सरकार की इस सहरदयता ही है कि उसने समय रहते लोगों की  मदद की किन्तु इसका मकसद तभी पूरा होगा जब कृषक या अन्य जरूरतमंद लोग इसका लाभ उठा पायेंगे.इधर पत्थलगांव क्षेेत्र में टमाटर, महुआ को भारी क्षति हुई है कर्ज लेकर टमाटर की खेती करने वाले किसानों की  चिंता स्वाभाविक हैं.
बेमौसम बरसात ने उन पर दोहरी मार की है.फसल गलने लगी है। 70-80 रुपए प्रति कांवर में भी टमाटर कोई नहीं उठ रहा है। लुड़ेग, काडरो, मुड़ागांव, रेहड़े, बागबहार में ओले गिरने के कारण फसलों को भारी नुकसान हुआ है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा टमाटर की खेती पत्थलगांव में ही होती है। टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए बीमा योजना भी नहीं है. ओलावृष्टि ने वनोपज संग्रहण करने वाले किसानों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है। महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज के अलावा अन्य वनोपजों को  भी भारी नुकसान हुआ है। किसान जहां फसल खोकर चिंतित हैं वही उसकी परेशानी  बैंक से लिए गए ऋण को चुकता करने की भी है,यह सब ठीक है कि सरकार किसानों के लिये  कई योजनाएं चला रही है. कृषि यंत्र, बीज समेत अन्य लाभ अनुदानित रूप से मिलता है, इसी के तहत आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को सरकार किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए बैंकों से कर्ज देती है। एक साल के अंदर किसान कर्ज जमा कर देते हैं तो उन्हें मात्र चार प्रतिशत ब्याज देना पड़ता है. एक साल से अधिक समय होने पर सात और दो साल से अधिक समय गुजरने पर 14 प्रतिशत ब्याज लिया जाता है। एक साल के बाद सरकार यह मान लेती है कि संबंधित कृषक खेती के बजाए किसी अन्य कार्य में पैसे को लगा रहा है. मौसम की मार सह रहे किसान बैंक से लिए कर्ज को जमा करने में अक्षम हो रहे हैं। 

साफ स्टेशनों की दौड़ में भी हम पिछड़ गये....!


साफ स्टेशनों की दौड़ में भी हम पिछड़ गये....!

स्मार्ट सिटी बनने के लिये छत्तीसगढ़ के शहर भी शामिल थे लेकिन राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के कोई भी शहर इस प्रतियोगिता में जीत नहीं पाये. उलटा जब स्वच्छता के मामले में रिजल्ट खुला तो उसमें भी हमारा नम्बर छठवें क्रम में दिखाई दिया. इसमें किसी को बताने की जरूरत नहीं पड़ी कि क्यों हम छठवे क्रम में आये. गंदगी तो हमारे हर मोहल्ले में हंैं जिसके लिये हम स्वंय ही जिम्मेदारी हैं.हमें अब इस बात पर संतोष कर लेना चाहिये कि देशव्यापी दौड़ में छत्तीसगढ़ का बिलासपुर देश का तीसरा सबसे साफ स्टशेन  बनकर उबरा है.जबकि राजधानी रायपुर का रेलवे स्टेशन देश के सबसे गंदे स्टेशनों की सूची में आ गया है. देश के स्वच्छ 75 ए-1 श्रेणी के रेलवे स्टेशनों में रायपुर का स्थान 66वां है यानी गंदे स्टेशनों की टॉप टेन सूची में यह 9वें नंबर पर! सबसे साफ सुथरे स्टेशनों में जोनल मुख्यालय बिलासपुर का स्थान गुजरात के सूरत और राजकोट के बाद तीसरा है टॉप 10 की सूची में गुजरात का ही वडोदरा स्टेशन आठवें नंबर पर रहा वहीं मुगलसराय (उप्र) तथा पुणे सबसे गंदे स्टेशनों में हैं रेलवे की यह रिपोर्ट सफाई के मामले में महीनेभर में रायपुर के लिए दूसरा करारा झटका माना गया।हम यह बताना चाहते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत जारी रिपोर्ट में रायपुर सबसे गंदे शहरों में शामिल होकर अपनी योग्यता खो चुका है। ए श्रेणी के स्टेशनों में भी रायपुर मंडल का प्रदर्शन खराब है इस श्रेणी में यहां के तीन स्टेशन दुर्ग, राजनांदगांव और भिलाई पावर हाउस शामिल हैं तीनों स्टेशन का नंबर 332 स्टेशनों में दो सौ के नीचे हैं, जबकि बिलासपुर मंडल का चांपा 31वें नंबर पर है, लेकिन वहीं का रायगढ़ 215वें स्थान पर है. देश में माल भाढे में देश को  सर्वाधिक आय देने वाले छत्तीसगढ़ को इस बुरी  गत के लिये हम किसे दोषी माने?सीधे तौर पर रेलवे जिसने सुविधाओं के मामले में राज्य बनने से पहले  से उपेक्षित रखा और राज्य बनने के बाद भी उपेक्षित है. संसाधनों की तो धीरेसीरे सप्लाई हो रही है साथ ही सुविधओं के विस्तार में भी भारी कंजूसी  बरती  जा रही है. स्टेशनों सदैव अप टू डेट तभी किया जाता है जब रेलवे का कोई बड़ा अधिकारी या नेता दौरा करता है उसके बाद स्टेशन में लोगों को नाक में रूमाल रख कर घूमना पड़ता है तथा स्टेशनों में याित्रयों के सामान से चलने फिरने  तक की जगह नहीं होती. रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने गुरुवार को आईआरसीटीसी और टीएनएस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किए सर्वेक्षण के नतीजे जारी किए सर्वेक्षण में 16 जोन के 407 रेलवे स्टेशनों को लेकर लोगों से स्वच्छता से जुडे विभिन्न मानकों पर प्रश्न पूछे गए 60 करोड़ रुपए सालाना की आय वाले ए-1 श्रेणी के 75 रेलवे स्टेशनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का स्थान 65वां रहा रायपुर 66वें और मुजफ्फरपुर, भोपाल, कानपुर सेंट्रल, सियालदह और गुवाहाटी सूची में इसके बाद हैं यात्रियों के बीच कराए गए सर्वे में स्टेशनों को मिले अंक के आधार पर स्टेशनों को पांच अलग-अलग स्तर पर रखा गया है ए-1 श्रेणी में लेवल-1 में केवल तीन स्टेशन हैं, जिसमें बिलासपुर शामिल है रायपुर लेवल-4 में शामिल है 75 में से 18 स्टेशन इस लेवल में है ए श्रेणी के स्टेशनों में चांपा लेवल-2 में है 332 स्टेशनों में लेवल-2 में केवल 69 स्टेशन ही स्थान बना पाए हैं रायगढ़ लेवल-3 में है, इस श्रेणी में सबसे ज्यादा 136 स्टेशन हैं प्रदेश के बाकी तीनों स्टेशन लेवल-4 में है .हमारी कोशिश रहती है कि स्टेशन स्वच्छ रहे इसमें हम काफी हद तक सफल भी हुए हैं जो रिपोर्ट जारी हुई है, वह किन मापदंडों के आधार पर बनी है, इसकी जानकारी नहीं है  लेकिन यह हम जरूर जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के शहरों व स्टेशनों को स्वच्छता का सर्वोत्तम खिताब हासिल करने के लिये अभी बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगें चूंकि हम अभी किसी प्रतियोगिता में शामिल होने लायक कहीं भी खड़े हो ही नहीं पाये हें. राज्य बनने के बाद हमने शून्य से अपनी यात्रा  शुरू की हे ओैर अब पन्द्रह साल  बाद अचानक हमें प्रतियोगी  के रूप में शामिल कर दिया जाये तो हमें कोई  श्रेणी मिलने का सवान ही नहीं खड़ा होता. छत्तीसगढ़ रेलवे को राजस्व देने  के मामले  में शुरू से अग्रणी रहा हे लेकिन इसके हिसाब से न हमारे स्टेशनों का उन्नयन हुआ और न यात्री सुविधाओं का, जिसमें सफाई और अन्य मामले भी शामिल  हैैं जो कुछ हमें मिला वह सब छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अपने बलबूते पर अत: यह कहना कि हम अपना सौदर्य नहीं बढ़ा सके, ताकत नहीं बढ़ा सके तो यह सारी बाते एकदम बेमानी है


यहां तो ऐसे कई माल्या है, अब क्या करेगी बैंक?




बैकों ने सफेद पोश लोगों को चुनचुनकर पैसा लुटाया अब एक माल्या भाग गया तो कई अन्य सामने आने लगे. देश के खजाने को चूना लगाने वालों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसकी जानकारी सरकार को भी है ओर बैंकों को भी परन्तु दोनों ही नि:सहाय होकर इस गुंताड़बुन में हैं कि केैसे भी इन डिफाल्टरों से पैसा वूसल हो जाये.प्राय: सभी बड़े लोन लेकर बैंक के डिफाल्टर सूची में नाम बनाने वाले आज ऐशों आराम की जिंदगी बिता रहे हैं और बैेंक है कि उनके पीछे पढऩे की जगह उन बेचारें दो तीन पांच दस लाख रूपये लेने वालों की सिर्फ एक किश्त नहीं पटने पर उनकी संपत्ति तक कुक्र्र करने के लिये कोर्ट में केस दायर कर उन्हें तंग कर रही है. जबकि इन  छोटे छोटे डिफाल्टरों की करतूतों पर पर्दा डालकर उन बड़े डिफाल्टरों की करतूतों को एक तरह से छिपा दिया गया है. आगे आने  वाले दिनों मेें जब पूरे मामले की जांच पड़ताल होगी तो बात शायद बंगलादेश की उस सादबर चोरी की तरह होगी जिसमें हाइकर्स ने करोड़ो डालर का एक ही समय में वारा न्यारा कर दुनिया की सबसे बड़ी चोरी का रिकार्ड बना दिया. देश में विजय माल्या एक अकेला बिसनेसमेन नहीं है जो बैेंक का पैसा हजम कर ऐशों आराम की जिंदगी बसर कर रद्दा हैं उसमें कई ऐसे सफेद पोश लोग हैं जो बैंक के लिये सरदर्द बने हुए है-मोसर बेयर इंडिया, महुआ,इंडियन  टेक्रोमेक,आईसीएसए इंडिया, डेक्कन क्रानिकल, पिक्सोन मीडिया प्रायवेट लिमिटेड़, सूर्या फार्मा,मुरली इंडस्ट्रीज,वरूण इंडस्ट्रीज जैसी  कंपनियां है जिनपर 646 करोड़ से लेकर डेढ हजार या उससे ज्यादा करोड़ रूपये तक का लोन हैं.पचास से ज्यादा बडे लोन डिफाल्टर हैं जो बैेंकों का पैसा हजम करके बैंक के लिये सरदर्द बने बैठे हैं.4056.28 बिलियन अर्थात करीब 40,528करोड़ रूपये का लोन  बैंक कैसे वसूल कर पायेगा यह अब भी साफ नहीं हो पाया है. विजय माल्या की फरारी के बाद बैकों ने कुछ ऐसे एहतियाती कदम उठाये है जो यह दावा करते  हैं कि माल्या जैसे डिफाल्टर अब बाजार से पैसे नहीं जुटा सकेंगे.डिफॉल्टर्स को रोकने के लिए सेबी ने अपना नियम बदल दिया है कहने  का मतलब यह कि दूध का जला अब छाछ भी फूक फूक कर पीने लगा है सेबी ने अब विलफुल डिफॉल्टर यानी जानबूझकर बैंक का कर्ज नहीं चुकाने वालों के लिए सख्त कदम उठाने का ऐलान कर दिया ताकि फिर कोई माल्या जैसा व्यवसायी या उद्योगपति  देश के हजारों करोड़ रुपए डुबोकर भाग न जाए. नए नियमों के तहत अब ऐसे डिफॉल्टर न तो शेयर या बांड के जरिए पब्लिक से पैसे जुटा सकेंगे और न ही किसी लिस्टेड कंपनी के बोर्ड में शामिल हो सकेंगे, साथ ही किसी दूसरी लिस्टेड कंपनी का कंट्रोल भी अपने हाथों में नहीं ले सकेंगे. ऐसे विलफुल डिफॉल्टरों को म्यूचुअल फंड या ब्रोकरेज फर्म खोलने की इजाजत भी नहीं होगी. उधर रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन ने भी जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वाले बकाएदारों को परिभाषित करने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन करने की बात कही है. आरबीआई के मुताबिक सारे बैंकों का जो पैसा फंसा हुआ है, वो कुल कर्ज का 11.5प्रतिशत हैं यह रकम करीब 8 लाख करोड़ रु. है। रिजर्व बैंक के नियम के मुताबिक किसी विलफुल डिफॉल्टर को बैंक कर्ज नहीं देता पर ये लोग इक्विटी या डेट मार्केट से पैसे जुटा लेते हैं लोग इनके झांसे में भी आ जाते हैं इसलिए पूंजी बाजार में इन पर रोक की जरूरत थी,अब नया नियम लागू होने  के बाद कोई ऐसा नहीं कर पाएगा. देश में 2,500 विलफुल डिफॉल्टर हैं और  इनके पास सरकारी बैंकों का 64,335 करोड़ का कर्ज है। सरकारी बैंकों के कुल एनपीए का एक तिहाई सिर्फ 30 लोगों के पास है,एक साल पहले इन पर करीब 95 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। दिलचस्प बात तो यह कि सरकारी बैंक 2012 से 2015 के बीच 1.14 लाख करोड़ रु. के कर्ज राइट ऑफ कर चुकी  हैं। यानी बैंकों को इसकी वसूली की उम्मीद नहीं.क्या सरकार जनता की कड़ी मेहनत का पैसा इन डिफाल्टरों से वापस अपने खजाने में वापस ला सकेगी?शायद ऐसा कुछ नहीं होगा. अगर उनकी मौजूद संपत्ति को नीलाम करने की प्रक्रिया अपनाई जाये तो संंभव है यह पैसा खजाने में कुछ हद तक जमा होगा लेकिन इसकी हिम्मत कौन करेगा?

मंगलवार, 15 मार्च 2016

गुरू की तपोभूमि में राहुल के कदम!







गुरू घासीदास की तपोभूमि गिरोधपुरी कांग्रेस की गुटबाजी का रणक्षेत्र बनकर क्या संदेश दे गई? यह तो भविष्य ही बतायेगा लेकिन राहुल गांधी गिरौधपुरी की इस धार्मिक नगरी की यात्रा में अपने आपकों राजनीति से बचाकर निकालने में सफल रहे. गिरौदपुरी में उन्होंने पदयात्रा की, जैतखंभ के दर्शन किए लेकिन कांग्रेसियों के बीच जमकर बवाल हुआ, अपमान हुआ,कहा-सुनी हुई और अपशब्दों का जमकर प्रयोग भी हुआ.छत्तीसगढ़ में जबर्दस्त गुटबाजी में उलझी कांग्रेस का यह रूप  जिसने भी देखा उसने यही  कहा कि क्या यह लोग इसी तरह फिर पार्टी को खड़ा करेंगे?राहुल गांधी की यात्रा को सफल बनाने यद्यपि कांग्रेसियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी मगर अपने गुटबाजी की संस्कृति को रेखाकिंत कर मूल एजेण्डे को धराशायी करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी.गिरोधपूरी में निर्मित हुए माहौल को सिलसिलेवार जोड़कर देखे तो अतीत की कुछ घटनाएं अपने आप पोल खोलकर रख देती है कि गुटबाजी का यह खेल छत्तीसगढ़ में परंपरागत ढंग से यूं ही चलता आ रहा है लेकिन अब इसका रूप काफी विकृत हो चला है जिसमें कुछ ऐसी मिलावट हो गई है जिसको सहन कर पाना शायद अबके वरिष्ठो के लिये संभव न हो.जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश के साथ जुड़ा हुआ था तब भी गुटबाजी थी और इसका कई सिरा या कहे लगाम वीसी शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल,अर्जुन सिंह, दिग्विजय ङ्क्षसंह जैसी बड़ी हस्तियों के हाथ में हुआ करती थी और इनके तीर जिस निशाने को भेदना चाहतें है वह इन हस्तियों की उंगलियां ही तय करती थी. पुराने लोग  गिरौधपुरी की घटना को देख व सुनकर अतीत की याद कर इस घटना को लेकर शायद जरा भी विचलित नहीं हुए होंगें चूंकि इसका तो एक इतिहास रहा है जब इशारों पर गाली गलौच मारपीट तोडफ़ोड़ सब शुरू हो जाती थी तथा कोई भी बडा नेता सारी मर्यादाओं को तोड़कर उसकी चपेट में आ जाता था.स्वंय दिग्विजय सिंह भी उस समय लपटे में आ गये थे जब छत्तीसगढ़ का नया मुख्यमंत्री चुनने के लिये वीसी शुक्ल के फार्म हाउस गये थे. मैं और मेरा परिवार की राजनीति ने भी छत्तीसगढ़ में कांगेे्रस को काफी नुकसान पहुंचाया है. इसी गुटबाजी का नतीजा था कि वीसी शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल जैसी हस्तियों को पार्टी के अंदर-बाहर का खेल खेलना पड़ा. अरविन्द नेताम, संत पवन दीवान जैसे लोग भी गुटबाजी का शिकार होकर कभी इधर कभी उधर की राजनीति में समा गये.असल बात तो यह है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस मजबूत होकर भी शक्तिविहीन है उसके पीछे उसकी झगडालू प्रवृत्ति है-कोई आगे बढ़ रहा है तो उसकी टांग खीचों के चक्कर में पिछले चुनावों में जीतकर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा.यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस के सारे निर्णय दिल्ली में हाईकमान के इशारे पर ही होता है किन्तु प्रदेश स्तर के नेता तो दिल्ली में पहुंचने वाले नेताओं के सामने भी अपना गुस्सा निकालकर अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार लेते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आगमन के समय तक बड़े बड़े नेताओं ने अपना असली चेहरा दिखाने में कोई कमी नहीं की थी. धार्मिक नगरी गिरौधपुरी में आयोजित कार्यक्रम के लिये संगठन के लोगों ने अजीत जोगी को न्यौता दिया था, वे वहां पहुंचे भी  मगर शायद झगड़े की शरूआत उस पोस्टर से हुर्ई जिसमें सिर्फ राहुल गांधी, भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और रुद्र गुरु की फोटो लगी थी किन्तु अजीत जोगी की फोटो नहीं थी। जैसे ही अजीत जोगी अपने समर्थकों के साथ हैलीपैड के पास पहुंचे, समर्थकों ने जोगी के पक्ष में नारेबाजी शुरू कर दी और पदयात्रा मार्ग में लगे पोस्टरों को फाड़ दिया यह शायद इसलिये भी हुआ होगा चूंकि अजीत जोगी समर्थकों को लगा कि उन्हें यहां वेटेज नहीं दिया गया.गिरौदपुरी में एक दूसरे के खिलाफ नारेबाजी के साथ अपशब्दों का प्रयोग भी हुआ.हेलिपैड पर राहुल का स्वागत करने वालों की सूची में जोगी और उनके समर्थकों का नाम नहीं होना ही इस हंगामे की वजह माना गया है. जोगी और सतनामी समाज के धर्म गुरु रुद्र गुरु के बीच तू-तू, मैं-मैं यह दर्शाता है कि अब कांग्रेस में सीनियर जूनियर का भी कोई ख्याल नहीं रखता.बात यहां तक पहुंची कि रुद्र गुरु ने आरोप लगाया कि जोगी ने उन्हें अपशब्द कहे,अब इसका जवाब सतनामी समाज देगा. राहुल के कार्यक्रम के लिए अजीत जोगी को भी बाकायदा एआईसीसी से बुलावा था बावजूद इसके जोगी का नाम स्वागत करने वालों की सूची में नहीं होना गुटबाजी को साफ उजागर करता है.यह भी सोची समझी राजनीति का हिस्सा हो सकता है कि  गिरौदपुरी में बने हेलीपैड से भीतर जाने लगे तो उन्हें एसपीजी के लोगों ने रोका इस समय भी जोगी समर्थकों ने वहां नारेबाजी शुरू की. पदयात्रा के बाद राहुल ने जैतखंभ पहुंचकर गर्भगृह में दर्शन किए. दर्शन करने के बाद वे सतनामी समाज के धर्म गुरु विजय गुरु से मिलने उनके घर गए ,वहां बंद कमरे में राहुल ने उनसे मुलाकात की. सतनामी  समाज को अपने साथ मिलाये रखने में कांग्रेस की रणनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है. सतनामी समाज अपना एक प्रतिनिधि राज्य सभा में चाहता है. राहुल गांधी यद्यपि  पत्रकारों से कुछ नहीं बोले लेकिन इतना जरूर कह गये कि वे सामाजिक व धार्मिक यात्रा पर यहां आए हैं, इसलिए कोई राजनीतिक बात नहीं करना चाहते. यह संकेत देता है कि गुटबाजी की पूरी खबर के बाद भी वे यही दिखाना चाहते थे कि वे सबसे अंजान हैं.












सुविधा के नाम से बैंक काट रहे हमारी जेब!



हजारों लोगों को प्रतिदिन बैकों से कई तरह के काम रहते हैं लेकिन परेशानियां भी कोई कम नहीं! प्रायवेट और पब्लिक या सार्वजनिक बैंक बचत खातों में फंड कम होने, चेक रिटर्न होने, फोटो और साइन वेरीफिकेशन जैसे करीब 50 तरह के काम लोगों के बैंकों से पड़ते हैं उपर चार्ज भी ग्राहकों से ठोक बजाकर दम से लिया जा रहा हैं. फिक्स डिपॉजिट, चालू खाता, लोन अकाउंट के लिए चार्ज लेने के नियम अलग हैं.सार्वजनिक बैंकों की तुलना में निजी बैंक अधिक चार्जेस (ग्राहक शुल्क) वसूलते हैं. आम खाता धारकों के प्रति बैंकों का रवैया सख्त रहता हैं,जबकि कॉर्पोरेट अकाउंट्स खोलने, लोन लेने और वसूलने तक में कई सहूलियतों का दावा किया जाता हैं.दिलचस्प तथ्य यह है कि बैंकों के सख्त नियम होने के बावजूद वर्ष 2015 में ही सार्वजनिक बैंकों के विभिन्न कॉर्पोरेट अकाउंट्स के 88,552 करोड़ रु. के लोन डूब गए. लोन वसूली न हो पाने के पीछे कौन जिम्मेदार है? यह सब जानते हैं,हर साल ब्याज वसूली नहीं होने के कारण करीब साठ हजार करोड़ रूपये का नुकसान उठाना पड रहा है. अपनी गलती के लिये बैंक आम उपभोक्ताओं पर यूजर चार्जेस थोपता हैं.  नियम यह कहता है कि आम ग्राहकों को भी कॉर्पोरेट की तरह ही सुविधा दी जाये लेकिन बैंक सामान्य ग्राहकों को रियायत नहीं देते, वहीं कंपनियों से लोन वसूलने में छूट देते हैं।आम आदमी को कॉर्पोरेट की तुलना में महंगा लोन मिल रहा है वहीं जब कॉर्पोरेट हाउस लोन की ईएमआई नहीं चुका पाते हैं तो फिर नयी बैलेंसशीट और कागजों के आधार पर वे लोन चुकाने की अवधि, किस्त की राशि आदि को फिर से तय कर लेते हैं साथ ही कंपनी काम कर सके इसके लिए भी अतिरिक्त लोन दे देते हैं. अंत में जब यही लोग लोन नहीं चुकाते हैं तो फिर एक मुश्त भुगतान की बात आती है जिसके तहत कभी-कभी तो पूरा ब्याज माफ कर दिया जाता है दूसरीओर आम आदमी के लिए भी नियम होने के बावजूद  लोन लेने वाले व्यक्ति की कार, मकान, दुकान कुर्क करने की नौबत बहुत जल्द ही आ जाती है. छोटी-छोटी सेवाओं में होने वाली गलतियों के लिए बैंक आम आदमी  की फजीहत कर डालता है उससे पैसा वसूलता है तथा उसके दिल में बैेंक के प्रति दुर्भावना भर देता है.वास्तविकता यह है कि जिस तरीके से सरकारी व निजी बैंक आम लोगों की जेब काट रहे है उससे तो यही लगता है कि आगे आने वाले समय में कई लोग बैंक से रिश्ता तोड़ लेंगेजो खबरे आ रही हैं वह काफी चौका देने वाली हैं. बैंक हमारा पैसा जमा करने की एवज में हमसे इतना ज्यादा पैसे की वसूली करता है कि जमा रकम का एक बड़ा हिस्सा यूं ही बैंक के खाते में चला जाता है यह चाहे  मनी ट्रांसफर का मामला हो या एटीएम से हमारे खाते में जमा रकम से पैसा निकालने का अथवा चेक से लेन देन का.बैंक के किसी भी कामकाज में बस हाथ लगा दो तो आपका पैसा कटने लगता है.अगर हम अपने खाते में किसी कारणवश पैसा नहीं भर पाते तो उसका भी बड़ा खामियाजा हमें भुगतना पड़ता है.पांच वर्ष में ग्राहकों से लिए जाने वाले चार्जेस की संख्या दोगुनी हो गई.कहने का तात्पर्य यह है कि बैंक ग्राहकों से कतिपय सुविधाओं के नाम पर एक बड़़ी राशि ले रहा हैं-इस  सम्बन्ध मे बैेंक का तर्क यह है कि हम जब सुविधा दे रहे हैं तब हमें उन सुविधाओं के लिये भी तो पैसा काटना ही पड़ेगा.वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने हाल ही में कहा था कि देश में विभिन्न बैकों द्वारा दिए जाने वाले लोन में से करीब आठ लाख करोड़ रुपए का लोन स्ट्रेस में है मतलब कि जिसकी वसूली में परेशानी आ रही है यूजर चार्जेस लेने के मामले में बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और बैंकिंग कोड्स ऑफ स्टैंडर्ड बोर्ड ऑफ इंडिया (बीसीएसबीआई) के निर्देशों का भी उल्लंघन करते हैं.  एसएमएस के लिए बैंक हर तीन महीने के दौरान  5 से 30 रुपए चार्ज वसूल करता है. बैंक अपने कार्यो के लिये  पैसा ले उसमें किसी  को ऐतराज नहीं होना चाहिये लेकिन  ऐसे काम जिसमें कोई मेहनत ओर खर्च ही न  हो उसपर भी लोगों से पैसा काट ले तो बात समझ में नहीं आती. ठीक  है एसएमएस का चार्ज लगता है लेकिन बैंक ऐसे एसएमएस भी ग्राहको को भेजता है जिसकी जरूरत उपभोक्ताओं को नहीं होती फिर क्यों ऐसे एसएमएस भेजकर पैसे की वसूली की जाती है? बैेक के सुविधा देने के दावे को हम मान भी ले तो हर सुविधा, हर बिन्दू पर पैसे का सिद्वान्त आम लोगों पर लादने का ओचित्य क्या है? क्यों नहीं  बैंकों की इस मनमानी पर कोई संस्था नियंत्रण रखती? लोन देते तक ग्राहक को इतनी  लालच से लाद दिया जाता हे कि वह बेंक की  इस मेहमाननवाजी के लिये उसके पैरो तले तक पडने तैयार हो जाते है लेकिन बाद में जरा सी चूक हुई तो उनका गुस्सा भी किसी राक्षस से कम नहीं होता. यह सब सिर्फ ऐसे लोगों  के लिये रहता है जो बेचारे जरूरतमंद व जिनकी आय बहुत कम हैं. माल्या जैसे लोग हो तो फिर उनके लिये तो सब माफ....देश में बैंक व्यवसाय कुछ इसी प्रकार आगे बढ़ रहा है!

इंसान- इंसान का दुश्मन, हाथी भालू भी दुश्मन बनें!




जंगली जानवरों की क्रू रता का इलाज क्या है? छत्तीसगढ़ के लोग इस समय दोहरे या कहे तिहरे आतंक का सामना कर रहे हैं- एक तरफ बस्तर  के आदिवासी क्षेत्र में नक्सलवाद के रूप में इंसानी आतंक है तो दूसरी तरफ रायगढ़, जशपुर, महासमुन्द में जंगली जानवरों ने आंतक मचा रखा है. शहरी क्षेत्रों में चोर उचक्के और लुटेरों व असामाजिक तत्वों के आंतक से लोग परेशान है. इंसानी आंतक के लिये तो हम पुलिस को कोस सकते हैं लेकिन जानवरों की तरफ से होने वाली हिंसा के लिये कौन जिम्मेदार है? शायद इसके लिये भी इंसान ही जिम्मेदार है, जिसने इन जानवरों के घरों को उजाड़ दिया. भारी तादात में जंगल कटने से नाराज जानवरों की बुद्वि में यही आ रहा है कि इसके लिये इंसान ही दोषी है.जशपुर में जहां हाथियों का आंतक है तो पत्थलगाव और अन्य कई इलाको में सर्पो का और अब शेर  तेन्दुए के बाद  एक नये आंतक का फैलाव महासमुन्द में हुआ है. यहां भालू ने इंसानों पर हमला करना शुरू कर दिया है. महासमुंद जिले के नवागांव पहाड़ी में शनिवार को एक ही दिन भालू ने डिप्टी रेंजर समेत तीन लोगों को नोच-नोचकर मार डाला. हालाकि घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की ज्वॉइंट टीम ने भालू को मार गिराया किन्तु इस घटना ने कई प्रशन उजागर कर दिये कि आखिर ऐसा क्यों  हो रहा है? हाथी-भालू यहां तक कि तेन्दुआ सभी अब इंसान के कट्टर दुश्मन होते  जा रहे हैं.नवागांव का रहने वाला शत्रुघ्न दीवान (35) सुबह चार बजे महुआ बीनने जंगल की ओर गया था,वहीं का रहने वाला धनसिंह दीवान (65) सुबह 8 बजे लकडी बीनने निकला था ,दोपहर तक दोनों के शव जंगल में दो-ढाई सौ फुट के फासले पर अलग-अलग पडे मिले.चश्मदीदों के मुताबिक भालू ने गुरिल्लों की तरह घात लगाकर हमला किया और दोनों को मार डाला.घटना की सूचना के बाद वन विभाग व पुलिस का अमला भालू की खोज में जंगल की ओर रवाना हुआ. इसी दौरान भालू ने फिर हमला किया और वन विभाग के डिप्टी रेंजर केडी साहिल (60) को भी मार डाला,तब तक वहां मौजूद टीम ने फायरिंग कर भालू को भी मौत के घाट उतार दिया लेकिन करीब छह घंटे की मशक्कत के बाद शवों को रिकवर किया जा सका यह बताया जा रहा  है कि जंगली जानवर भी संगठित होकर इंसानों से दुश्मनी पर उतर आये चूंकि वन विभाग की टीम और गांववाले जब भी शवों की तरफ बढ़े भालू हमला कर देते,कुछ ही महीनों पहले एक खबर महासमुन्द से आई थी कि वहां एक मदिर में भालू हमेशा पहुंचते हैं और  इंसानों से प्रसाद आदि ग्रहण कर चले जाते हैं वे किसी  को कुछ नहीं करते, अचानक अब यह नया कैसे हो गया? बहरहाल भालू की बात को किनारे लगाकर देखे तो हाथी की भूमिका भी छत्तीसगढ़ व उडीसा में दुश्मनों की तरह है. पिछले साल के अक्टूबर से लगातार हाथियों के हमले हो रहे हैं. एक पचास वर्षीय व्यक्ति की कुचलकर हत्या के बाद भी प्रशासन हाथ पर धरे बैठे रहा,  हां लोग रात में ड्रम बजाकर व शोर मचाकर यह कोशिश जरूर करते हैं कि हाथी उनके पास तक न पहुंचे. हाथियों के उत्पात ने कई गांवों की नींद खराब कर दी है. जशपुर इलाके के दो सौ गांवों के करीब पांच सौ घरों के लोग हाथियों से परेशान हैं. वे उनकी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं घरों को तबाह कर देते हैं तथा सामने इंसान दिखे तो पहले सूण्ड से उठाते हैं, फेंकते हैं और फिर पैरों से कुचलकर मार डालते हैं.  सालभर निर्दोषों की हत्या,फसल व संपत्ति को नुकसान का सिलसिला चलता रहा है विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल कटने और उनके भोजन के लाले पडऩे का जिम्मेदार वे इंसानों को मानते हैं तथा उनपर अपनी खीज निकालते हैं. जशपुर जिले का बगीचा,कुनकुरी और फरसबहार इस समय हाथियो से सर्वाधक प्रताडि़त इलाके हैं.करीब डेढ़ सौ हाथियों का झुण्ड पूरे इलाके में तबाही व दहशत फैलाये हुए हैं. देश के दूसरे कई राज्यों में भी हाथियों के समूह है जिनमे से कइयों को इंसानों ने अपने काम में लगा रखा है. कहते हैं दंतेल हाथी अकेले रहता है तभी वह लोगों पर हमला करता है लेकिन यहां तो पूरा का पूरा कुनबा साथ में रहता है और लोगों के घर व संपत्ति को बरबाद कर रहा है.कोदराम की मृत्यु से सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार संरिक्षत जनजाति की रक्षा भी इसी प्रकार कर रही है? वन अमला हेल्प लाइन की बात करता है लेकिन यह हेल्प लाइन कैसे काम करते हैं किसी को बताने की जरूरत नहीं.हाथियों के उत्पात की यह समस्या अकेले छत्तीसगढ़ के जशपुर में ही नहंी है बल्कि कई क्षेत्रों में है इससे निपटने सरकार का प्रयाय शून्य है जब कोरीडोर बनेगा तब की बात अलग है किन्तु ऐसा कोई कोरीडोर अब तक अस्तित्व में नहीं आया है साथ ही सरकार इस गंभीर मामले पर हर तरह से खामोश है.हाथी, भालू, शेर चीता या अन्य कोई भी जंगली जानवरों से होने वाली मौत के लिये सरकार बहुत हद तक जिम्मेदार है चूंकि वन  विभाग के लोगों की लापरवाही से यह जानवर आवासीय क्षेत्रों में घुसते और इंसान को अपना शिकार बनाते हैं.

हर्षद,तेलगी,केतन,सत्यम, ललित-माल्या, और कितने ?


अब तक दस था, अब ग्यारह हो गया!-हम बात कर रहे हैं देश में हुए बड़े घोटालों की, जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को झकजोर कर रख दिया. जो पैसा हमने अपने देश के विकास और उन्नती के लिये संजोकर रखा था उसे धोखेबाज या ठग खा गये-अरबों रूपये का चूना हमारे खजाने पर लगाकर कुछ जेलों में पड़े सड़ रहे हैं तो कुछ विदेशों में मौज मस्ती की जिंदगी जी रहे हैं. दस स्केण्डल पहले से थे अब विजय माल्या का एक और फ्राड इसमें जुड गया. पहला बड़ा स्केडंल देश में सन् 2004-9 के बीच  कोयला घोटाला के रूप में उजागर हुआ जिसमें भारतीय खजाने को करीब 1,86,000 करोड़ रूपये का पलीता लगा.मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या इससे कई गुना ज्यादा करीब 10,60,000 करोड़ रूपये का है.इसके बाद आया हवाला कांड: इसे खुली राजनीतिक लूट कहा गया, जिसने भी खजाने को अच्छा खासा झकजोर दिया.तीसरे नम्बर पर स्टाक मार्केट की बारी थी  जिसमें हर्षद मेहता ने जाली बेैंक रसीदों के मार्फत भारतीय बैंकों को चार हजार करोड़ रूपये का चूना लगाया. चौथे नम्बर पर बोफोर्स सौदे में घोटाला था जिसमें कई करोड़ रूपयें  का लेन देन हुआ. आंतरिक सुरक्षा  से जुड़े इस मामले में खूब राजनीतिक हल्ला मचाया लेकिन ऐसी चोटे केंसर की तरह हमारे शरीर में यूं ही पड़ा रहता है. पांचवे क्रम पर  था बिहार का चारा घोटाला, जिसमें भी करोडों रूपये की चपत देश के खजाने को लगी. छठवे क्रम पर सत्यम कांड.करीब चौदह सौ करोड़ रूपये का यह घोटाला था. इसके बाद अब्दुल करीब तेलगी ने जाली स्टैम्प पेपरों के जरियेे देश के खजाने को बीस हजार करोड़ रूपये की चपत दी. राष्ट्र मंडल घोटाले का प्रमुख आरोपी लंदन में छिपा है करीब 70 हजार करोड़ रूपये के इस घोटाले पर भी कार्रवाही बस हवा-हवा है. टूजी स्पेक्ट्रम में 1.76 लाख करोड़ रूपये का चूना सरकार को लगा.और अब विजय माल्या ने नौ हजार  करोड़ रूपये का घोटाला कर टाप टेन के बाद टाप इलेवन मे अपना स्थान बना लिया.चूंकि टाप टेन के बाद का यह ग्यारहवा मामला है इसपर चर्चा भी गरम  है. सीबीआई के  'लुक आउटÓ नोटिस को ठेंगा दिखाते हुए शराब कारोबारी और राज्यसभा सांसद विजय माल्या विदेश भाग गये.हम और आप अगर एक दो लाख लोन लेने के  बाद एक भी किश्त देने  से भूल जाते तो यही बैंक जिनका पैसा माल्या लेकर उड गये वह आपके द्वार पुलिस लेकर पहुंच जाते लेकिन माल्या को यही लोग हवा में पतंग की तरह उडते हुए जाते देखने के बाद भी उसकी डोर को ख्रीच नहीं पाये और वह पतंग दूसरे देश में जा गिरी. अब नौ हजार करोड़ गवाकर सिर पर हाथ धरे बैठे हैैं.माल्या पर देश की सबसे अकड़बाज बैंक भारतीय स्टेट बैंक सहित देश के सत्रह बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज बकाया है.सुप्रीम कोर्ट ने माल्या को नोटिस जारी कर उनसे बैंकों की याचिकाओं पर दो हफ्ते में जवाब मांगा है लेकिन इतने भर से डूबी हुई रकम वापस मिलने की उम्मीद पालना खुद को धोखे में रखना ही कहा जाएगा.अपनी बेलगाम शाहखर्ची, रंगीली फितरत और चकाचौंध भरी जीवनशैली के चलते माल्या ऋणदाताओं-निवेशकों को हकीकत से बेखबर रखने में कामयाब होते रहे. जब उन्होंने शराब कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट में अपनी हिस्सेदारी पांच सौ पंद्रह करोड़ रुपए में बहुराष्ट्रीय कंपनी डियाजियो को बेची और उसका चेयरमैन पद छोडऩे पर राजी हुए तभी आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि वे सबकुछ समेट कर भागने की फिराक में हैं, तब भी उन्हें कर्ज देने वाले बैंक नहीं चेते, मगर अब उनके विदेश भाग जाने पर लकीर पीट रहे हैं.विजय माल्या का मामला देश में उदारीकरण के दौरान व्यावसायिक घरानों की लूट के प्रति हमारे समूचे वित्तीय तंत्र की बेहिसाब उदारता की एक बेहद अफसोसनाक मिसाल है. किंगफिशर एअरलाइंस बढ़ते घाटे के कारण लगातार डूबती रही लेकिन जाने-माने बैंकों ने इसके बहीखातों की गहन पड़ताल किए बगैर हजारों करोड़ का ऋण उदारतापूर्वक दे दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि आखिर इतना कर्ज दिया ही क्यों था.क्या किसी कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और भविष्य की योजनाएं परखे बगैर कथित 'ब्रांड वैल्यूÓ या तामझाम पर रीझ कर ऋण-वर्षा कर देने को उचित ठहराया जा सकता है? जब यह तथ्य जगजाहिर हो चुका था कि किंगफिशर पर बकाया कर्ज की वसूली जनवरी 2012 से नहीं हो रही है, तो ये सब चार साल तक क्यों सोते रहे? अब जाकर इन्हें मनी लांड्रिंग या विदेशी मुद्रा विनिमय कानून के तहत मामले दर्ज करने या किसी विशेष रकम की निकासी पर रोक लगाने की सुध अब आई है जब माल्या पकड़ से दूर जा चुका हैं. माल्या  विदेश  में है-राष्ट्र मंडल खेलों का विलन ललित मोदी भी विदेश में है और हमारे  देश की  करोड़ों की ब्लेक मनी भी विदेश में है. कई वादे हमसे किये जाते रहे हैं.यह सारा पैसा हमारे देश की जनता की मेहनत का है अगर चंद लोग इसे यूं ही बर्बाद करते हैं तो यह देशद्रोह से कम नहीं  है. क्या हम अपनी सरकार से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह यह पैसा निकालकर हमारे देश की उन्नती और विकास में लगायेगें या फिर यूं ही हमें मृग तृष्णा की तरह इसकी खोज कराते रहेंगें?

शनिवार, 12 मार्च 2016

Joseph

गुरुवार, 10 मार्च 2016

एशिया में क्रिेकेट पर हमारा डंका ....क्यों न अन्य खेलों पर भी?



बंगला देश की धरती पर भारत माता की जय लगने का यह दूसरा अवसर हमें उस समय हमें मिला जब हमने उस देश की धरती पर एशिया कप पर कब्जा कर लिया, इससे पूर्व एक बार और हमें ऐसा मौका मिला था जब बंगला देश की धरती पर भारतीय सेना ने पाकिस्तान सेना को धूल चटाकर भारत माता की जय के नारे लगाये थे. क्रिकेट में विश्व कप पर जीत हमारे लिये एक चैलेंज था जो धोनी की टीम ने पूरा करके दिखाया.अब हमारा दूसरा पड़ाव विश्व कप की ओर होना चाहिये वह क्रिकेट ही नहीं अन्य देशी व विदेशी खेलों में हमारे खिलाडिय़ो को उसी प्रकार तैयार करना होगा.बांग्लादेश के गेंदबाजों ने खिताबी जंग में भारतीय बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का चांस नहीं दिया और मुकाबले को अंत तक ले गए।  हम एक ऊंचे शिखर पर पहुंंच गये. फाइनल मैच में बारिश ने शुरुआत में मजा किरकिरा कर दिया था, लेकिन खेल खत्म होते-होते मुकाबला कांटे का होता चला गया। भारत को अंतिम 18 गेंदों में 24 रन बनाने थे जबकि क्रीज पर शिखर धवन और विराट कोहली खेल रहे थे, लेकिन 13वें ओवर की चौथी गेंद पर धवन 60 रन बनाकर आउट हो गए। क्रीज पर जम चुके धवन इसी ओवर की चौथी गेंद पर आउट हुए। उनके आउट होने से बंगला देश की टीम के गेंदबाजों में जोश आ गया और जब लगा कि वे भारतीय बल्लेबाजों पर अंकुश लगाने की कोशिश करेंगे तो भारतीय कप्तान धोनी ने दांव चला और युवराज सिंह, हार्दिक पांड्या या सुरेश रैना में से किसी को ऊपर भेजने के बजाए खुद को प्रमोट करते हुए नंबर चार बल्लेबाज के तौर पर खुद बल्लेबाजी के लिए आ गए। एशिया कप भारत ने जीत लिया। सबसे ज्यादा 6 बार यह कप जीतने का रिकॉर्ड भी हमने अपने नाम कर लिया। धोनी की कप्तानी में भारत ने दूसरी बार यह खिताब जीता है।  बांग्लादेश ने शेर-ए-बांग्ला नेशनल स्टेडियम में भारत के सामने 121 रन का लक्ष्य रखा था। जवाब में टीम इंडिया ने शिखर धवन (60) और विराट कोहली (41) की शानदार इनिंग की मदद से 13.5 ओवरों में 2 विकेट के नुकसान पर टारगेट हासिल कर लिया।  भारत को अंतिम 2 ओवरों में जीत के लिए 19 रन और बनाने थे। एक ओर कोहली थे तो दूसरी ओर कप्तान धोनी मौजूद थे। धोनी 2 गेंद पर 3 रन बनाकर खेल रहे थे। टूर्नामेंट के सबसे सफल गेंदबाज अल-अमीन हुसैन जब 14वां ओवर डालने उतरे तो उनकी पहली ही गेंद को धोनी ने मिडविकेट के बाहर छह रनों के लिए भेज दिया। इस छक्के ने मेजबान दर्शकों को निराश कर दिया जिससे पूरे स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया। इसी ओवर की चौथी गेंद को धोनी ने कवर बाउंड्री की दिशा में खेलकर जिससे उनके खाते में 4 रन और जुड़ गए। चौके से भारत अब लक्ष्य से 5 रन दूर था जबकि उसके पास अभी 7 गेंदें और बची थी, लेकिन धोनी देरी से खत्म होने जा रहे मैच को खत्म करने में देरी नहीं करना चाहते थे और पांचवीं गेंद पर भी छक्का जड़कर टीम को खिताबी जीत दिला दी एशिया कप जीतने के बाद कप्तान एमएस धोनी का चार्म फिर लोट आया है. इस मैच  के जरिये ओपनिंग जोड़ी  का फार्म देखने को मिला जबकि बालर्स ने भी एक अच्छा काम्बीनेशन बनाया. अब तक भारतीय टीम में ंजो आलराउण्डर्स की कमी दिखाई दे रही थी वह पूरी होती दिखाई दी. बंगला देश केा पराजित कर भारत ने एशिया कप फिर जीत  लिया है इससे पूर्व 1984,88,90-91,95और 2010 में भी एशियाकप पर कब्जा कर चुकी है. एशिया कप में भारत की जीत के बाद टीम इंडिया के खेमे में उत्साह है। टी20 वर्ल्ड कप से ठीक पहले रिकॉर्ड जीत से खिलाडयि़ों के साथ कप्तान खुश हैं, सारा देश खुश  है हम भारत के  इस लोकप्रिय बन चुके खेल के आगे भी विश्व  कप में विश्च कप में विजय की कामना करते हैं लेकिन साथ में खेल को प्रश्रय देने वालों से चाहेंगे कि वे देश में अन्य विष्व स्तरीय खेलों के बारे में भी सोचे जो हमें विश्व में अपना नाम बनाये  रखने में मदद  करता हैं. व्यक्तिगत खेल के अलावा हाकी, कबड्डी और फुटबाल को भी इसी श्रेणी में लाकर खडा करने के लिये प्रयास को और तेज किया जाये. अगले ओलंपिक खेलों मे भारत के नाम का डंका बजा ऐसा प्रयास हर स्तर पर होना चाहिये.

छत्तीसगढ़ तपने लगा..भ्रीषण जल संकट की आहट



छत्तीसगढ़ तपने लगा..भ्रीषण जल संकट की आहट



मार्च की शुरूआत है... और अभी पीने व निस्तारी की समस्या ने पूरे छत्तीसगढ़ को घेर लिया है। आगे आने वाले दिनों में पानी  का संकट किस भीषणता की ओर पहुंंच जायेगा इसका अनुमान अभी से लगाया ंनहींजा सकता है. पारा बढ़ता चला जा रहा है- पोखर तालाब, नदी सब सूखने लगे हैं.पानी के बिना प्राणी जगत के बारे में सोचना गलत है. लोगों को अगर पानी भरपूर मिले तो उसे बर्बाद करने में कोई गुरेज नहीं करते.हम अपने नदियों, तालाबों, कुओं और बावडिय़ों को मारकर बोतलबंद पानी के सहारे जीने की आदत डाल रहे हैं. पानी का किफायती इस्तेमाल कभी भी हमारी परवरिश का हिस्सा नहीं रहा। हमारी दिनचर्या के प्रत्येक हिस्से में पानी कहीं न कहीं मौजूद रहता है। औद्योगिक क्रांति की दहलीज पर आगे बढ़ चुके छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकांश भाग असल में ग्रामीण परिवेश के आदि रहे हैं, जहां पीने के पानी से लेकर निस्तार तक के लिए लोग नदियों, कुंओं पर निर्भर हुआ करते थे, तकरीबन हर दो-तीन मकानों के बीच एक कुंआ हुआ करता था. गांव से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर बावडियां होती थीं, जिसका पानी पशुधन की प्यास बुझाने और निस्तार के काम आता था. आजकल पानी की जिक्र छिड़ते ही दो घटनाएं सहसा याद आ जाती हैं,एक पिछली गर्मियों की है, जब रायपुर रेलवे स्टेशन पर रेल प्रशासन और बोतलबंद पानी उत्पादक एक कंपनी की मिलीभगत से अप्रैल और मई की भीषण गर्मी में सारे वॉटर कूलर को बंद कर दिया गया, परेशान मुसाफिर अपनी प्यास बुझाने के लिए बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हो गए, अखबारों में खबर छपी, खूब हंगामा हुआ और इस बदइंतजामी पर रोक लगी. पानी के लिये लड़ाई हर जगह आम बात है लड़ाई के साथ-साथ हत्या  के प्रयास और हत्या जैसी घटनाओं ने भी  पानी की महत्ता को सिद्व किया है.यह भी स्पष्ट है कि इस धरती के हर प्राणी के लिए पानी निहायत ही जरूरी है इसके बिना जीवन संभव नहीं बावजूद इसके, साफ-स्वच्छ पीने के पानी तक लोगों की पहुंच आसान नहीं है तो इसके लिये किसे जिम्मेदार ठहरायें?  जिनके पास आर्थिक सामर्थ्य है, वे कहीं बोतलों में तो कहीं बड़े-बड़े कैन में पानी खरीद लेते हैं उनके लिए निजी टैंकर का पानी भी उपलब्ध है। जिनकी सामर्थ्य नहीं है, उन्हें कुदरत के इस मुफ्त संसाधन तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हर साल गर्मी आते ही छत्तीसगढ़ के तकरीबन हर जिले में पानी के लिए मारामारी का यही नजारा देखने को मिलता है। लोग सरकार को, प्रशासन को कोसते हैं और बारिश आते ही सारी तकलीफें भूलकर फिर पानी बहाने लग जाते हैं। लेकिन साफ पेयजल के लिए इंतजार अब दो माह तक ही लंबा नहीं रहेगा। हम भूल गए कि धरती के 70 फीसदी हिस्से पर पानी होने के बाद भी उसका सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही इंसानी हक में है। नतीजतन स्थिति यह है कि जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। छत्तीसगढ़ ही नहीं भारत के अन्य राज्यों औेर समूचे एशिया में यही स्थिति है. वास्तविकता यह भी है कि सरकारी सप्लाई पर आधारित पानी की उपलब्धता का हमारे दिल में शायद ही कोई सम्मान है शायद यही  कारण है कि हम आगे के दर्द की कल्पना किये बगैर आज अपने दैनिक जीवन में  लगातार पानी बर्बाद करते हैं कहीं टपकते नल के साथ तो कहीं गुसलखाने और रसोईघर से निकले पानी को यूं ही गवाकर हम घटते जा रहे बेशकीमती संसाधन के प्रति अनादर जताते हैं क्योंकि पानी का किफायती इस्तेमाल कभी भी हमारी परवरिश का हिस्सा नहीं रहा। आने वाले एक दशक में उद्योगों के लिए पानी की जरूरत 23 फीसदी के आसपास होगी तब खेती के लिए पानी के हिस्से में और कटौती करने की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण के चलते गांवों के मुकाबले शहरों को पानी की दरकार कहीं ज्यादा होगी। बढ़ते तापमान और जल प्रबंधन की खामियों के चलते सिकुड़ती जल संरचनाओं से गर्मी में इतना पानी भाप बनकर नहीं उड़ पा रहा है कि बारिश अच्छी हो, इसी के साथ वनों के घटने,कांक्रीट की सड़के और कांक्रीट के आवासीय जंगल से भी पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ रहा है।  औद्योगिक ईकाइयां कई घनमीटर साफ पानी का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन मशीनों को ठंडा रखने के लिए इससे तीन गुना ज्यादा घनमीटर पानी इस्तेमाल में लाया जाता है, इस तरह कई लाख या करोड़ घनमीटर पानी उद्योगों को जा रहा है, अब यदि खेती के लिए उपलब्ध पानी में कटौती की जाए तो खाद्य संकट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। जंगलों में अवैध कटाई व खनन गतिविधि से वन्य जीवों के कुदरती रहवास व संसाधनों को भी खतरा पैदा हो गया है याने पानी की बर्बादी  से इंसान ही  नहीं जानवर भी संकट में हैं बेवजह की ईको टूरिज्म गतिविधियों और जंगल के भीतर पर्यटक आवास केंद्रों की स्थापना से भी तापमान बढ़ा है। बांध बनाकर नदियों का रास्ता रोकने जैसी तरकीबों का भी तकनीकी खामियाजा लोगों को बाढ़ के रूप में झेलना पड़ रहा है। बरसात अच्छी हो तो भी पानी का सभी जगहों पर एक समान वितरण न होने से ज्यादातर इलाके प्यासे ही रह जाते हैं. भविष्य कितना कठिन है यह हमें उस समय देखना चाहिये जब पानी को यूं ही बर्बाद करते हैं- यह बताने की जरूरत नहीं कि जिंदगी कितनी कठिन हो जायेगीसरकारी मशीनरी कोभी अब चेत जाना चाहिए। उसे पानी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, जो वह नहीं दे रही है।

इडली, दोसा सस्ता, समोसा,जलेबी,चाय क्यों नहीं?




  मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने इस बार आम लोगों के नाश्ते का विशेष ख्याल रखा है-इडली दोसा, पनीर को सस्ता कर दिया. मजा आ जाता यदि समोसा कचोड़ी जलेबी और चाय भी सस्ती हो जाती. जब रोटी दाल आम लोगों के हाथ से बाहर हो रही है तब कम से कम लोगों के चाय नाश्ते में बहुत बड़ी राहत ही कहा जायेगा.  बहरहाल हम इतने पर ही संतोष  कर लेते हैं .इडली दोसा,पनीर,घी, खोवा मोबाइल, स्टील  आइटम,सायकिल की कीमत कम कैसे होगी? इस प्रश्न  का उत्तर सीधा है कि सरकार ने अपने बजट में वेट को कम कर दिया. सरकार अगर सभी वर्ग को पूर्ण राहत देना चाहती तो पेट्रोल, डीजल पर भी वेट कम कर सकती थी, इससे पेट्रोल के दाम और गिर सकते थे किन्तु ऐसा नहीं किया. डॉ रमन सिंह ने बुधवार को विधानसभा में अपने कार्यकाल का दसवां बजट प्रस्तुत किया. इतने सालों तक बराबर बजट पेश करने के लिये मुख्यमंत्री वास्तव में बधाई के पात्र हैं. छत्तीसगढ़ की जनता ने उन्हें अभूतपूर्व स्नेह दिया है शायद इसी से अभिभूत होकर उन्होंने इस बार लोगों को एक के बाद एक बड़े तोहफे से लाद दिया. बजट में उन्होंने स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि पर फोकस किया है यह होना भी चाहिये था, कुल बजट 73 हजार 996 करोड़ का है। बजट से एक दिन पूर्व एक समारोह में मुख्यमंंत्री ने कहा था कि छत्तीसगढ़़ का सरगुजा फलों के मामले में एक दिन कश्मीर-हिमाचल की तरह नाम कमायेगा. बजट में कृषको का विशेष घ्यान रखा  गया है आशा की जा सकती है कि रवि और खरीफ फसल के साथ कृषकों को फलों की खेती के लिये प्रेरित किया जायेगा ताकि आगे आने वाले वर्षो में किसी भी प्राकृतिक मुसीबत में कृषकों को दूसरे विकल्प के रूप में फलों की खेती तो कम से कम उपलब्ध रहे..हमे गर्व है अपने राज्य पर कि हम देश में सबसे कम ऋण लने वाला अकेला प्रदेश बन गये है-हम इस मामले में इस बाबत भी भाग्यशाली है कि हमारा प्रदेश खनिज संपदा से भरपूर है अभी कुछ ही दिन पूर्व राज्य ने सोने की खदान नीलाम हुई हैॅ. किसानों के लिये फसल बीमा योजना के लिए 200 करोड़,बीज अनुदान के लिए 150 करोड़ का प्रावधान कर कृषकों के दर्द को कम करने का प्रयास किया है. छत्तीसगढ़ में बच्चों की शिक्षा को और कारगर बनाने का प्रयास भी बजट में किया गया है. छात्राओं के लिए स्नातक तक की शिक्षा निशुल्क करने से अब छात्राएं ग्रेजुएशन की तरफ नि:संकोच बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सकेंगी.प्रदेश में विकास की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की  गरज से मुख्यमंत्री ने बजट में सड़के, रेल  पातें बिछाने आदि के कार्य को बजट में शामिल किया है.पिछले बजट की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार हेतु बजट में काफी बड़ी रकम का प्रबंध किया है. गंभीर बीमारी होने पर पत्रकारों को 20 हजार की अतिरिक्त मदद, सीनियर सिटीजंस को 30 हजार की अतिरिक्त मदद,भोजन के लिए अस्पतालों में 100 रुपए प्रति प्लेट, संबन्धित लोगों को काफी राहत देगी वहीं नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चार नई बटालियन का गठन व चार हजार जवानों की भर्ती से इस समस्या को खत्म करने में कितने हद तक कामयाबी मिलेगी यह देखना दिलचस्प होगा.सुकमा, बीजापुर जैसे आदिवासी क्षेत्र में एजुकेशन सिटी व जगदलपुर, मुंगेली शहरों में स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तथा सरगुजा में  साइंस सेंटर- इन  शहरों के विकास में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है. राजधानी रायुपर के मामले में सबकुछ आधा अधूरा सा है. राजधानी रायपुर के लिए पिछले साल बजट में की गई घोषणाओं में से ज्यादातर सालभर बाद भी कागजों से बाहर नहीं निकला हैं. कई प्रोजेक्ट के लिए विभागों ने शासन को प्रस्ताव ही नहीं दिया तो कई योजनाओं पर कागजी खाना-पूर्ति होकर रह गई। कहीं बजट का रोड़ा आ गया तो कहीं पर मामला तकनीकी वजहों में अटक गया। ज्यादातर वे ही घोषणाएं पूरी हुई हैं जिनपर शासन को नीतिगत निर्णय लेना था। साल 2016 की शुरुआत में जरूर कुछ योजनाओं पर काम शुरू हुआ है लेकिन उनके पूरे होने में भी कम से कम चार से छह महीने का वक्त लगेगा। इस बार का बजट पेश हो गया किन्तु पिछले बजट में की गई कुछ ही घोषणाओं पर काम शुरू हो पाया है। कुछ काम जरूर हो चुके हैं किन्तु  इनसे शहर की तस्वीर में कोई बदलाव नहीं आया है गंदगी के मामले में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर देश में छठवें स्थान पर है इस कलंक को दूर करने कोई ठोस प्रयास बजट में नहीं है. रायपुर, बिलासपुर व दुर्ग में 15 करोड़ की लागत से वर्किंग वुमन होस्टल की घोषणा की गई थी। किसी भी शहर में यह योजना सालभर में भी फ्लोर पर नहीं आ सकी है। रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक का चौड़ीकरण पुराने रायपुर शहर की सबसे ज्वलंत समस्या है इसपर बजट में कोईउल्लेख नहीं दिखा. यह मामला बजट के अभाव में ही कई सालों से अटका पड़ा है।

आंदोलनों को क्यो लम्बा खिचने दिया जाता है?




कभी पटवारी तो कभी कोटवार! तो कभी आंगनबाड़ी, कभी संविधा शिक्षक तो कभी सफाई क,र्मी,मीटर रीडर...औैर अब रोजगार सहायकों का सत्याग्रह!. आंदोलन करने वालों का दायरा धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है.सरकार ने भी बड़ी चालाकी से आंदोलन करने वालों के लिये राजधानी के बूढ़ापारा में एक जगह भी निश्चित कर दी है जैसे कह रहे हो तुम वहीं रहो जो करना है करों हमने अपने कान में रूई लगा रखी है. आंदोलनकारी मांगे मनवाने के लिये तरीके भी अलग अलग इजाद कर रहे हैं.कभी पूरे परिवार को साथ लेकर तो कभी सर मुडाकर तो कभी बदन से सारे कपड़े उतारकर तो कभी भैस लेकर तो कभी घासलेट का डिब्बा हाथ में लेकर उमड़ पड़ते हैं. सवाल यह उठता है कि इन सबकी नौबत आती क्यों हैं? हम मानते हैं कि सत्याग्रह, आंदोलन ,धरना प्रदर्शन सब हमारा संवैधानिक अधिकार है. धरना, प्रदर्शन,आंदोलन, सत्याग्रह यह सब तब शुरू होता है जब सामने वाला अर्थात समस्या को हल करने वाली अथारिटी मामले  को उलझा दे. इस अडियलपन के पीछे हो सकता है उनको किसी  के द्वारा अर्थात प्रशासनिक लोगों के द्वारा ही बताई गई कोई मजबूरी हो. पहले आंदोंलनों का फैलाव  प्रायवेट कंपनियों का ज्यादा होता था चूंकि वे अपने कर्मचारियों को सुविधाएं कम देते थे तथा वेतन से ज्यादा काम कराते थे,कंपनियां अब पटरी पर आ गई हैं उन्होनें बहुत हद तक अपनी स्थिति सुधार ली है वे अपने कर्मचारियों की हडताल से होने वाले नुकसान  को महसूस करने लगे.हडताल  की वजह से कई  कंपनियों मे तालेबंदी हुई और कुछ मालिकों को तो राजा से रंक बना दिया गया. सारा अनुभव पाकर कंपनियों ने अपनी व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन किया. कर्मचारियों को खुश रखने उत्पादन बढ़ाने के लिये उन्होंने न केवल अच्छी तनखाह देना शुरू किया बल्कि समय समय पर त्यौहार और अन्य मौकों पर उन्हे गिफट देकर भी उपकृत किया . कर्मचारियों के आवास, उनकी  चिकित्सा, व बच्चो की पढ़ाई और अन्य अनेक प्रकार की सुविधाएं देने से प्रायवेट कंपनियों में यह स्थिति बन गई कई कंपनियों में लोग उनके परिवार के सदस्य की तरह हो गये. पिछले सालों में गुजरात से एक खबर आई थी कि एक हीरा व्यवसायी ने अपनी कंपनी के लोगों को दीवाली के मौके पर कार और फलेट तक भेंट किये. अगर ऐसा कुछ किसी मध्यम वर्ग के साथ हो जाता है तो वह जिंदगीभर के लिये उन्हीं का होकर रह जाता है. हम इसका जिक्र यहां इसलिये कर रहे हैं चूकि सरकार को भी यह समझना चाहिये कि वह भी एक कपंनी की तरह है, उसे अपने कर्मचारियों को उतनी ही खुशी  देनी पड़ेगी जो निजी कंपनियां अपने कर्मियों को देती हैं. काम की दक्षता के अनुसार वेतन भत्तो का भुगतान करने में क्या हर्ज है? अक्सर सरकारी कर्मचारियों के आंदोलनों में उतरने  के लिये सरकार में बैठे नौकरशाह जिम्मेदार हैं जो कर्मचारियों को  ठीक से टेकल नहीं कर पाते. बीच बचाव के नाम पर तनाव पैदा करते हैं और मामला आंदोलन,धरना,सत्याग्रह और न जाने क्या क्या तक में पहुंच जाता है. अगर आंदोलनों को प्रारंभिक चरणों में ही बातचीत के जरिये किसी निष्कर्ष पर पहुंचा दिया जाये तो ऐसी नौबत ही नहीं आये. छत्तीसगढ़ में पिछले  वर्षो के दौरान आंदालनों की बाढ़ आ गई है. कोटवार, पटवारी, आंगनबाड़ी  संविधा शिक्षकों, मीटर रीडरों,कम्पयूटर आपरेटरों  का आंदोलन कई महीनों तक चलता रहा जिससे सरकारी कामकाज बहुत बुरी तरह पभावित रहा. कई आंदोलन जहां बिना किसी निष्कर्ष के खत्म हो जाता है तो कई में फैसले ऐसे होते हैं जिसके बारे में हमें सोचने मजबूूर होना पड़ता है कि यही दिमाग पहले लगा दिया जाता तो इतने दिनों तक आंदोलन नहीं चलता. चिकित्सा क्षेत्र तथा शहर की सफाई में लगे कर्मचारियों की हड़ताल से कई कई दिनों तक जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. निचले स्तर के कर्मचारियों का आंदोलन -वेतन तथा संबन्धित मांगों को लेकर होता है, जिसे त्वरित बातचीत से निपटाया जा सकता है लेकिन अडियलपने के कारण यह लम्बा खिचता चला जाता हैॅ लेकिन बड़े मुद्दे जैसे आरक्षण और किसानों की समस्या जैसे आंदोलनों का फैसला सरकार में बड़े स्तर पर लेने का होता है-ऐसे आंदोलन सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है अगर सरकार ने टेक्टिस से मामले का सुलझा लिया तो ठीक वरना ऐसी ही स्थिति बनेगी जैसी गुजरात में पटेलों के आंदोलन से बनी और हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन से बनी.  इन आंदोलनों ने यह भी तो सााबित कर दिया है कि ऐसे आंदोलनों से सरकारी पैसे का किस हद तक नुकसान होता है. छोटे से छोटै आंदोलन में जहां समय की  बर्बादी  हो रही हैं वहीं  बड़े आंदोलन कई करोड़ों रूपये की संपत्ति को फूकने  का काम करते हैं.



सोमवार, 7 मार्च 2016

समय का पालन करने में हम कितने सक्षम?


समय का पालन करने में हम कितने सक्षम?
इंडियन स्टेंडर्ड टाइम!, अब यह हमारे कामकाज के तरीके पर भी दिखाई देने लगा है. जो काम या योजनाएं हाथ में लेते हैं वह कभी समय पर पूरी नहीं होती- कभी कभी तो इतना डिले होता है कि उसकी लागत ही दुगनी हो जाती है. एक तरह से लेट लतीफी का पूरा ट्रेण्ड चल पड़ा है.अगर आप किसी योजना को हाथ में लेते हैं, तो उसे पूरा करने का दमखम भी होना चाहिये वरना ऐसी योजनाओं को हाथ में लेना ही नहीं चाहिये. बात छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की कुछ योजनाओं पर करें तो सारी बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है कि लेट लतीफी की वजह से विकास कार्य कितना बाधित हो रहा है. एक तो मंजूरी मिलने में देर फिर लालफीताशाही और नौकरशाही के चक्कर में डिले और ऐसे होते हुए पूरी योजना की कोस्ट दुगनी से तीनगुनी या उससे ज्यादा तक हो जाती है. यह फिर अंडर ब्रिज का मामला हो या ओवर  ब्रिज का अथवा किसी सड़क के चौड़ीकरण का अथवा किसी स्टेडियम के निर्माण का, सभी में प्रक्रिया तत्काल की जगह महीनों तक डिले ही चलती है. जब मालूम रहता है कि इस योजना को हमे लागू करना है तो उसमें सोचने की बात क्या है. बजट का पैसा तक मिल जाने के बाद भी योजनांए लम्बित होकर पडी रहती है. एक योजना का जिक्र हाल ही हुआ है जिसमें वीआईपी रोड़ की चौड़ाई बढ़ाने का प्रस्ताव है.दूसरा रायपुर के शारदा चौक से लेकर तात्यापारा तक रोड़ चौड़ीकरण का है.दोनों ही योजनाएं महत्वाकांक्षी व जनहित की है-यह सभी को मालूम है कि इसपर तत्काल  कार्य किया जाना चाहिये विलम्ब से पहले से ज्यादा नुकसान होगा फिर भी जबर्दस्त विलम्ब किया जा रहा है.प्राय: हर योजना को कुछ न कुछ प्रशासकीय खामियां और अर्थाभाव का बहाना बनाकर रोककर एक आदत सी बना डाली गई है. सरकार जो काम कराती है, उसमें सरकारी विभाग ही जब अडंगा बनकर सामने आता हैं तो मामला उस पब्लिक के लिये असहनीय हो जाता है जिसके पैसे से यह सब काम होना है. वीआईपी  रोड़ की चौड़ाई बढ़ाने का लाभ पूरे छत्तीसगढ सहित देश को मिलेगा.हवाई अड्डे तक जाने व आने के लिये इस मार्ग का उपयोग लोग करते हैं. इस मार्ग के निर्माण की स्वीकृति सरकार से प्राप्त होते ही इसका निर्माण कर दिया जाना चाहिये था किन्तु दो विभागों के झगड़े में यह मामला छह माह से फंसा हुआ है. टेंडर अटका है और काम शुरू नहीं हो रहा. टेंडर को विभागीय स्वीकृति मिलने में क्यों देरी हो रही है यह पता लगाने का प्रयास किसी स्तर पर नहीं हुआ बस मामला अटका हुआ है. शारदा चौक से तात्यापारा तक के मार्ग का मामला भी कुछ ऐसा ही है -अगर यह कार्य आमापारा  चौक से तात्यापारा तक के साथ साथ पूरा हो जाता तो आज यह रोड़ पूरे शहर की ट्रेफिक समस्या का निदान कर देता साथ ही जनता की जेब से करोड़ां रूपये भी बच जाता लेकिन राजधानी रायपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में सैकड़ों ऐसी योजनाएं हैं जो सरकार की स्वीकृति के बावजूद नौकरशाही और सुस्त व्यवस्था के जाल  में अथवा आपसी  झगड़े में उलझी पड़ी है.अगर वर्तमान स्थिति में कोई योजना छै माह से एक साल से भी लम्बित हो जाती है तो इसका मतलब है उस योजना का मंहगाई में उलझ जाना. लागत खर्चा समय के साथ साथ बढ़ता है इस बात का ख्याल किसी भी योजना में नहीं रखा जाता अत: यह जरूरी  है कि सरकार कोई भी योजना को पूरा करने के लिये जो समय सीमा निर्धारित करती है उसपर कड़ाई बरते. यह जिम्मेदारी तय करें कि अगर निर्धारित अवधि में कार्य पूरा नहीं होता तो इसका खामियाजा भी ऐसे लोगों को दंङ्क्षडत कर वसूला जाये.




रविवार, 6 मार्च 2016

बजट- गरीबों पर मेहरबानी तो मिडिल क्लास पर मार!




आम बजट मिडिल क्लास को निराश करने वाला है तो उच्च वर्ग के लिये भी कोई खुशी देने वाला नहीं. गरीब और किसान को खुश करने का प्रयास जरूर किया गया है लेकिन किसान से ज्यादा फायदा गरीब को मिलता नजर आ रहा हैं.पिछले बजट की तरह इस बजट के पेश होने के पूर्व इंकम टैक्स पे करने वालों में से कई को यह उम्मीद थी कि उन्हें इस बार स्लेब में  छूट मिल सकती है लेकिन कोई छूट इस वर्ष के बजट में भी नहीं मिली. एक तरह से यह बजट किसानों और गरीबों पर केन्द्रित है,मिडिल  क्लास को तो एकदम किनारे कर दिया गया है.ऊपर से सर्विस टैक्स में वृद्वि और जीपीएफ का पैसा निकालने पर टैक्स वसूली ने सभी को हिलाकर रख दिया है.बजट में किसान से ज्यादा फायदा गरीब वर्ग को मिलेगा क्योंकि जिन योजनाओं का जिक्र किया गया है वह उन्हें तत्काल  मिल सकता है लेकिन किसानों के लिये ऐसा नहीं है.इस कड़ी में हम पिछले सप्ताह रेल मंत्री द्वारा प्रस्तुत कतिपय योजनाओं का जिक्र करते हुए यह कहना चाहेंंगे कि उन योजनाओं को पूरा करने में लम्बा वक्त लग सकता है. सरकार ने दोनों बजट पेश करने में इसी तकनीक को अपनाया है कि लोग इंतजार  करते रहें किन्तु इस बात का ध्यान नहीं रखा कि  'समय किसी का इंतजार नहीं करता.Ó जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है मनरेगा के तहत छत्तीसगढ़ में अच्छा काम हुआ है इसके तहत अच्छी राशि बजट में स्वीकृत की गई है.बजट में अडतीस हजार पांच सौ करोड़ रूपयें के प्रावधान से इस बात की संभावना बलवती हुई है कि छत्तीसगढ़ को इसका अच्छा फायदा मिलेगा. सरकार 2.87 लाख करोड़ रूपयें ग्रामीण पंचायतो को बांटेगी. ग्राम पंचायतों के अधिकार में भी वृद्वि की बात कही गई है. हर गांव मं बिजली का फायदा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों को मिल सकता है. छत्तीसगढ़ के कई गांवों में अब तक बिजली नहीं पहुंची है.बजट मेंं गरीब वर्ग का विशेष ध्यान रखा गया है. कुकिंग गैस के दायरे में सैकड़ों छोटे -छोटे गरीब परिवारों को लाने से इसका फायदा उन्हें मिलेगा.बजट एक नजर में देखने से मंहगाई के और बढऩे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.कई मामलों में सरकार की चुप्पी यही दर्शाती है कि मंहगाई को कम करने का कोई प्लान सरकार के पास नहीं है.हालिया उदाहरण है स्वच्छ भारत अधिभार. सरकार ने यह सेस नवंबर में लगाया. जनता की जेब से फऱवरी तक 1,917 करोड़ रुपए निकल कर सरकार की तिजोरी में चले गए. इसी तरह से बीते दिसंबर में किराया बढ़ा दिया गया.कच्चे तेल की अंतरराट्र्रीय क़ीमतों में आई भारी गिरावट से हो रही बचत का 70-75 फ़ीसद हिस्सा (डीज़ल और पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाकर) सरकार ने ख़ुद अपनी तिजोरी में रख लिया जबकि इसका 25-30 फ़ीसद हिस्सा पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में कम करके जनता को दिया जा रहा है.अगर क़ीमतें और कम की जातीं तो इससे महंगाई भी कम होती. ट्रांसपोर्ट लागत में डीज़ल की क़ीमतों का अहम हिस्सा होता है.भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स पिछले 15 महीनों से नकारात्मक रहा है. लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ रहा है.सरकार ने ये सब तो नहीं बताया था बजट में कि ऐसा करेंगे. अब बताइए, बेचारे आम आदमी के लिए बजट हुआ ना बेमतलब का.120 करोड़ से ज़्यादा लोगों के इस मुल्क में 97 फ़ीसदी लोग आयकर या इनकम टैक्स नहीं देते हैं.अप्रत्यक्ष कर आम आदमी के लिए उत्पादन कर, सेवा कर जैसे या इस तरह की दूसरी ड्यूटी महत्व रखती है. इससे उसके इस्तेमाल की चीज़ें सस्ती या महंगी होती हैं.यह समझने की बात है कि हर वित्त मंत्री बताता है कि देंगे क्या, पर ये सब छुपा जाते हैं कि लेंगे क्या? मसलन उत्पादन कर सरकार ने बार-बार बढ़ाया.पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच अप्रत्यक्ष करों से वसूली कऱीब 33 फ़ीसदी बढ़ी. ऐसा नहीं कि इस दौरान देश में उत्पादन बढ़ा हो. सरकार ने ख़ुद बताया कि देश में उत्पादन कम हुआ है.पिछली बार भी बताया था लेकिन बाद में हुआ क्या? बजट में वित्त मंत्री ने कहा था कि महात्मा गांधी ग्रामीण रोजग़ार योजना (मनरेगा) बजट में भले कम पैसे का प्रावधान किया हो. लेकिन बाद में पैसे की कमी नहीं होगी. हुआ क्या? राज्यों ने जब पैसा माँगा तो सरकार ने दिया आधे से भी कम. नतीजा मज़दूरों को सूखा प्रभावित इलाक़ों में भी लंबे समय तक मज़दूरी नहीं मिली. मज़दूर अब इस योजना से भागने लगा है. बजट में यह तो नहीं बताया था. मज़दूरों और गाँवों में काम करने वाले कहते हैं कि यूपीए-2 और एनडीए दोनों इस योजना को मारना चाहते हैं.बजट की हक़ीक़त पता लगती हैं आठ-दस महीने बाद. उसके पहले बजट में जो प्रावधान करते हैं, उसे ख़र्चते नहीं हैं नए-नए बहानों तरीक़ों से पैसे जनता से निकालते रहते हैं.

राजनीति के मकडजाल में नया क्रांतिकारी!




 पिछले गुरुवार की रात जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद कन्हैया कुमार  तमाम विश्वविद्यालयों के परिसरों में छात्रों के बीच अभिभूत हो गए. एक नये नाम ने भारतीय राजनीति में भी खलबली मचा दी. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसे लेकर भारी गहमा गहमी थी, जो कन्हैया कुमार के भाषण के बाद कुछ- कुछ एक तरफा हो चला. वास्तविकता यही है कि कन्हैया ने अपनी रिहाई के बाद के पचास मिनिटों तक देशाभक्ति का झरना-सा बहा दिया, उसके तार्किक भाषण से लोगों को भी शायद पता चल गया होगा कि एक छात्र की नैतिक सुरक्षा में जेएनयू के प्रोफेसर तक सड़क पर क्यों निकल आए थे? कन्हैया का उदय उसके कथित देशद्रोही नारों से हुआ. यह कहा गया कि जेएनयू में लगे देशद्रोही नारे में उसकी आवाज भी थी उसी को लेकर उसे जेल भेजा गया और बाहर आकर देश के राजनीतिक धरातल में एक नये क्रांतिकारी की तरह पेश  हुआ- उसकी एंट्र्री भले ही सरकार को पसंद नहीं आई हो लेकिन विपक्ष ने तो उसे हाथों हाथ ले लिया यहां तक कि आगे आने वाले चुनावों के लिये भी पेक्ट करना शुरू कर दिया.देश में कहने-बोलने में बढ़ते भय के बीच जेएनयू मामले के इतना बढ़ जाने के कई कारण हो सकते हैं। आगे-पीछे सारी बातें पता चलेगी, लेकिन इस मामले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सांप्रदायिकता,भ्रष्टाचार, काला धन और ऐसे दूसरे मुद्दों पर सोच-विचार के लिए एक बड़ा मौका पैदा कर दिया. जेएनयू में कन्हैया के भावपूर्ण नेतृत्व में घंटे भर के इस अपूर्व आयोजन में वाद्ययंत्रों की ज़रूरत नहीं पड़ी. आयोजन के फौरन बाद सोशल मीडिया पर कन्हैया का क्रांतिगीत ट्रेंड होने लगा. अब जल्द ही पलटकर इस बात पर भी ध्यान जाएगा कि जेएनयू  मामले का आगा-पीछा है क्या...? इसमें वक्त जितना भी लगे। हकीकत कुछ यह भी सामने आई कि कन्हैया प्रकरण के जरिये कुछ दिनों के लिए तार्किकों के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया गया था कि उनके बोलते ही वे अविश्वसनीय लगने लगें.फिर भी अकादमिक स्तर पर कुछ जटिल बातों पर चर्चाएं शुरू होना स्वाभाविक है.लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत की पहचान अब तक नहीं हो पाई है। गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव, अटल, मनमोहन और मोदी के अपने-अपने दौरों में लोकतंत्र के विकास-अविकास के मामले में क्या हुआ, इसका कोई निर्विवाद लेखा-जोखा बन नहीं पाया है.आजाद भारत के शुरुआती दशकों में जब अभिव्यक्ति की चरम-परम स्वतंत्रता का दौर था, तब भी आज़ादी के बारे में या समानता के बारे में और उसे हासिल करने के बारे में हानिरहित उपायों को ढूंढते ही रहे। इसी तलाश में वाद-विवाद और संवाद होते हैं.वाद-विवाद की पहली ज़रूरत अभिव्यक्ति की आज़ादी होती है. बुद्धिजीवी वर्ग के सामने यह बिल्कुल नई चुनौती है. खासतौर पर तर्कशास्त्रियों पर यह जिम्मेदारी आन पड़ी है कि बहुत कम समय लगा साफ करें कि बौद्धिकता या बौद्धिक कर्म या विचार-विमर्श किसी भी रूप में आतंकवाद हो भी सकता है या नहीं. हम कभी  कभी आदमी की कद काठी देखकर उसका आंकलन सही नहीं कर पाते क्या इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ?यह आगे आने वाले समय में पता चल पायेगा बहरहाल यह एक राजनीतिक विस्फोट है जो अब तक कहीं दबा पड़ा था जो अचानक फूट गया है इसका प्रभाव भी बाद में ही दिखाई देगा.

नक्सलियों की बौखलाहट या मुठभेड़ का बदला?


डेढ़ दर्जन  ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या की घटना के बाद बस्तर का वह अंदरूनी इलाका अबूझमाड़ फिर  चर्चा में हैं जहां बताया जाता है कि नक्सलियों ने इसी  क्षेत्र को अपना गढ़ बना रखा है. अभी  कुछ दिनों से पुलिस ने सर्चिंग अभियान को कुछ तेज कर रखा है. सी5मान्ध्र में बड़े नक्सलियों के दिख्रने के बाद पुलिस और नक्सलियों के बीच  मुठभेड़ हुई. इस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने दावा किया कि नक्सलियों के बड़े लीडर जिनपर काफी बड़ा इनाम  रखा गया था इस मुठभेड़ में मारे गये. इस मुठभेड़ के कुछ ही  घंटों बाद अबूझमाड़ के ग्रामीण क्षेत्र से  करीब सोलह लोगों को उठाकर उनकी हत्या कर दी गई. पुलिस इसे नक्सलियोंं की बौखलाहट बता रही है लेकिन  शायद हकीकत यही  है कि नक्सलियों ने यह कृत्य बदले की कार्रवाही के रूप में की है. अबूझमाड़ के गांवों नेतानार,आलबेड़ा,परपा,कुंदला, मठभेड़ा, यह कुछ गांव है जहां से नक्सलियों ने ग्रामीणों को पुलिस की जासूसी  करने का आरोप लगाकर ले गये तथा उनकी हत्या कर दी. पुलिस के लिये यह शायद एक संदेश भी है कि उसने  जो अभियान  अबूझमाड़  में घुसने  का चलाया है वह नक्सलियों को  पसंद नहीं हैं. आईजी नक्सल की राय इसके ठीक विपरीत है वे कहते हैं कि नक्सली पुलिस की लगातार कार्रवाई से नक्सली झल्ला गये हैं. क्या वास्तव में पुलिस की निरंतर कार्रवाही से अबूझमाड़ क्षेत्र में छिपे नक्सली घबरा गये हैं और दूसरे ठिकानों की तलाश कर रहे हैं. क्या पुलिस की लगातार दबिश का ही यह परिणाम है कि ग्रामीणों को उठाकर उनकी  हत्या कर दी गई? नक्सली प्राय: पुलिस को अपना दुश्मन मानते हैं और उनकी ताक में रहते हैं इस बीच हुए एनकाउन्टर का बदला ही  यह हो सकता है वरना ग्रामीणों को नाराज करके अबूझमाड़ को मांद बनाकर रहना शायद नक्सलियों के लिये आसान नहीं है. नक्सलियों ने की 16 लोगों की हत्या, पुलिस ने एनकाउंटर का बदला बताया सारी हत्याएं एक साथ न होकर पिछले सात दिनों में हुई है अबूझमाड़ के 6 गांवों में नक्सलियों ने 16 आदिवासियों को मौत दी  है.  बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे कन्फर्म किया जबकि इस क्षेत्र से मिलने वाली खबरों में कहा गय है कि हत्याओं को लेकर आदिवासी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं। पुलिस ने  जो खौफनाक चित्रण  इस हत्याकांड का दिया वह यही बता रहा है कि उन्हें गोद-गोदकर भयानक मौत दी गई है. नक्सलियों ने आदिवासी गांव वालों को चाकू गोद-गोदकर मारा। पुलिस को शक है कि सोलह से ज्यादा लोगों का कत्ल  किया जा सका है. इधर  पुलिस के व्यवहार को लेकर भी पिछले कुछ समय से बस्तर क्षेत्र में उंगलियां उठ रही है. आंकड़े और बढ़ सकते हैं। पुलिस पर जहां फर्जी  मुठभेड़ के आरोप लग रहे हैं वहीं  पुलिस पर आदिवासी  महिलाओं से दुव्र्यवहार का भी आरोप लगाया गया है. दूसरी ओर कुछ दिन पूर्व बाहर से आये मीडिया भी  बस्तर प्रशासन के रवैये से नाराज दिखाई दे रही है.कुछ ने तो यहां प्रशासन पर सहयोग न करने का भी आरोप लगाया है.एक तरह से नक्सल समस्या का हल  कहीं निकलता नजर नहीं आ रहा है बल्कि यहां मुठभेड़, अपहरण,हत्या आत्मसमर्पण,बरामदगी और आरोप प्रत्यारोप का खेल  चल रहा है- एक तरफ से फायरिगं के बाद सर्चिंग फिर मुठभेड़ और  खून खराबा इसी तक सीमित होकर रह गया है.




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स्मार्ट कार्ड से इलाज पर इन्श्योरेंस कपंनी की तलवार!


स्मार्ट कार्ड से इलाज पर इन्श्योरेंस कपंनी की तलवार!
 सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाओं पर इस बार हमला किया है- इन्श्योरेंस कंपनियों ने एक फरमान जारी कर अस्पतालों से कहा है कि वह स्मार्ट कार्ड से  टीबी, मलेरिया व किडनी फेल मरीज को उनसे (इन्श्योरेंस कंपनियों)से  अनुमति लिये बगैर भर्ती न करें.अब तक डेंगू, टीबी, मलेरिया, अस्थमा, हायपर टेंशन और किडनी फेल के मरीज को स्मार्ट कार्ड दिखाने पर तत्काल प्रायवेट अस्पतालों में भर्तीकर इलाज किया जाता था लेकिन अब नया आदेश प्रायवेट अस्पतालों को इन्श्योरेंस कंपनी वालों से पहुंचा है, जिसमें कहा गया है कि अगर वे स्मार्ट कार्ड धारी मरीज को भर्ती करना चाहते हैं तो पहले उनसे अनुमति ले, उसके बाद ही इलाज शुरू करें अर्थात अब से अनुमति लेने तक मरीज अस्पताल के दरवाजे पर यूं ही इलाज के लिये तड़पता रहेगा. इंश्योरेंस कंपनी ने ऐसी 52 बीमारियों की सूची जारी की है, जिसके इलाज के पहले अस्पताल प्रबंधन को अनुमति लेनी होगी. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को इश्योरेंस कंपनी का यह आदेश बिल्कुल पसद नहीं आया है. स्मार्ट कार्ड से इलाज की मानीटरिंग के लिए इंश्योरेंस कंपनी ने हर पंजीकृत अस्पताल में पहले से अपना प्रतिनिधि बिठा रखा है, ये प्रतिनिधि इलाज कराने वाले मरीजों पर नजर रखते हैं,इनके परिजनों से पूछते हैं कि अस्पताल प्रबंधन ने कहीं उनसे पैसा तो नहीं लिया, साथ ही अस्पताल से ही टोल फ्री नंबर पर अधिकारियों से बात कराते हैं इतनी कड़ी निगरानी की जा रही है तो नया फरमान जारी करने की क्या जरूरत पड़ी? स्वाभाविक  है कि कोई भी ऐसे फरमान को पसंद नहीं करेगा. इंश्योरेंस कंपनी के बाद अस्पतालों में मरीज को मिलने वाली इस महत्वपूर्ण सुविधा पर एक तरह से विराम लग जायेगा. मरीज जहां क्या करें क्या न करें कि स्थिति में आ जायेगा वहीं दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन भी अपने यहां पहुंचे मरीज के इलाज में ऊ हा पोह की स्थिति में आ जायेगा. आदेश मिलने के बाद से अस्पतालों में यह हालात निर्मित होने शुरू भी हो गये हैं.अब प्रतिक्रिया स्वरूप   डाक्टर और अस्पताल प्रबंधन इंश्यारेंस कंपनी के फरमान के खिलाफ खुलकर सामने आ गये हैं.डेंगू, मलेरिया, टीबी, किडनी मेल, मस्तिष्क ज्वर, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस समेत जिन 52 बीमारियों के इलाज के पहले कंपनी से अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है, वह गलत ह,ै वैसे मरीज गंभीर स्थिति में इलाज के लिए पहुंचते हैं, उस समय उन्हें तुरंत भर्ती करना जरूरी होता है। ऐसी दशा में मरीजों को भर्ती करने के लिए अनुमति लेते तक तो उस मरीज के जीवित रहने की ंसंभावना कम हो जाती है. वास्तविकता यह है कि अपने आपको सुरक्षित करने के लिये कंपनियों ने यह कदम उठाया है ,इसमें उन्होने मरीजों के जीवन संघर्ष का कोई ख्याल नहीं रखा. प्राइवेट अस्पताल हो या सरकारी अस्पताल कहीं भी मरीज को उसकी हालत  देखकर तुरंत भर्ती करना होता है. स्मार्ट कार्ड के बारे में तो इलाज शुरू करने के बाद पूछा जाता है. इंश्योरेंस कंपनी ने तो तुरंत आनन फानन में यह आदेश निकाल दिया उसने कहीं इस बात का ध्यान नहीं रखा कि इसके रिफरकेशन क्या होंगे.इन्श्योंरेंस कंपनी का आदेश  बारह घंटे के भीतर ही  मिल जायेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है-एक मरीज की जिंदगी हर पल कीमती  होती है इस दौरान लोग अस्पताल को स्मार्ट कार्ड दिखयेगा? डाक्टर इलाज करेगा या कंपनी के आदेश का इंतजार करेगा या मरीज को भगवान भरोसे छोड़ दिया जायेगा? कुछ भी कहे कपनियों को सिर्फ अपने व्यवसाय की ङ्क्षचता है इसके लिये वे चाहे तो जितने लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़़ कर सकते हैं. राज्य सरकार ने लाखों लोगों को स्मार्ट कार्ड जारी किया है. इस आदेश के विरूद्व तत्काल कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो लाखों लोगों की जान सासंत में पड़ जायेगी. इंश्यारेंस कंपनी ने मरीजों की हिस्ट्री देखकर 12 घंटे के भीतर अनुमति देने का निर्णय लिया है। डाक्टरों के अनुसार इतना समय बहुत ज्यादा है। मरीजों के इलाज के लिए इतना लंबा समय इंतजार नहीं किया जा सकता। मरीजों को तुरंत इलाज देना जरूरी होता है।जचकी के बाद मांगी जा रही सोनोग्राफी इंश्योरेंस कंपनी अब डिलीवरी के बाद महिलाओं की सोनोग्राफी रिपोर्ट भेजने को कह रही है। डॉक्टरों का तर्क है कि कई बार महिलाएं लेबर पेन के साथ आती है। ऐसे में उनकी सोनोग्राफी करने के बजाय सीधे लेबर रूम में लेकर जाते हैं। सोनोग्राफी टेस्ट नहीं किया जाता। ऐसे में कंपनी को सोनोग्राफी की रिपोर्ट नहीं भेजी जा सकती। हाल ही में कंपनी ने डिलीवरी के ऑपरेशन का फोटो खींचकर भेजने का फरमान जारी किया था। डॉक्टरों के विरोध के बाद कंपनी को यह फरमान वापस लेना पड़ा था। हर अस्पताल में कंपनी का प्रतिनिधि स्मार्ट कार्ड से इलाज की मानीटरिंग के लिए इंश्योरेंस कंपनी ने हर पंजीकृत अस्पताल में अपना प्रतिनिधि बिठाकर रखा है। ये प्रतिनिधि इलाज कराने वाले मरीजों पर नजर रखते हैं। इनके परिजनों से पूछते हैं कि अस्पताल प्रबंधन ने कहीं पैसा तो नहीं लिया। साथ ही अस्पताल से ही टोल फ्री नंबर पर अधिकारियों से बात कराते हैं। प्र्राइवेट अस्पताल के संचालकों का कहना है कि जब इतनी कड़ी निगरानी की जा रही है तो नया फरमान जारी करने की क्या जरूरत है।

मिडिल क्लास को कुछ तो लाभ मिलेगा!


मिडिल क्लास को कुछ तो लाभ मिलेगा!
यद्यपि सोमवार को संसद में पेश 2016-17 के बजट से मिडिल वर्ग के लोगों को खुशी नहीं हुई है किन्तु किसानों और गरीबों को दिये गये तोहफों के साथ इस दर्जे के लोगों को भी कुछ सुविधाएं प्राप्त होंगे जो उनके रोजमर्रे के लिये काफी उपयोगी साबित होगी. सीधे सीधे गरीब वर्ग को मिलने वाले लाभ जैसे गैस, मकान आदि में छूट की तरह की सुविधाएं नहीं मिल पाई लेकिन  घर पर ब्याज में छूट, सस्ती दवा समेत ऐसी करीब पन्द्रह सौगाते ऐसी हैं जिसे शहरी मध्यमवर्ग के खाते में यूं ही डाल दिया है.बजट के बाद  तीन रूपये से ज्यादा की कमी भी मध्यम वर्ग को कुछ तो फायदा पहुंचायेगी लेकिन इसमें कुछ और कमी की जा सकती थी. इसमें दो मत नहीं कि बजट को कम से कम पांच वर्ग में बांट दिया गया है-एक वह है जो उच्च वर्ग की श्रेणी में आता है तो दूसरा है मध्यम वर्ग, तीसरा गरीब, चौथा युवा और पांचवां है किसान.पिछले बजट में जहां उच्च वर्ग व युवाओं को कतिपय सहूलियते देकर वित्त मंत्री को  गरीब, मध्यम और किसान के कोप का भाजन बनना पड़ा वहीं इस बजट में उच्च, मध्यम तथा युवा वर्ग को काफी हद तक किनारे कर गरीब और किसानों को फोकस कर बजट पेश किया. इसमें मध्यम वर्ग को तो  किसी प्रकार की  खास रियायत  देने में कंजूसी की ,रही सही कसर पीएफ मामले में कर्मचारियों की जेब को छूकर उनका भी कोप ले लिया. पीएफ के मामले तो सरकार अब भी उलझन में हैं. बहरहाल सरकार किसानों के लिए क्रॉप इंश्योरेंस स्कीम लेकर आई इसके अलावा गरीबों के लिए 1 लाख रुपए सालाना का हेल्थ इंश्योरेंस भी बजट में रखा गया है. 1.5 करोड़ गरीबों को दो साल में रसोई गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है अगर यह लक्ष्य सही ढंग से पूरा हो जाता है तो देश में वर्षो से चली आ रही चूल्हा  प्रथा का बहुत हद तक अंत हो जायेगा.गरीब घरो की महिलाएं अभी भी  गैस चूल्हे के बारे में नहीं जानती उन्हें इस हेतु प्रशिक्षित भी किया जाना शुरू हो गया है. इससे इस योजना पर संदेह की गुंजाइश कम ही है.देश में  3000 सस्ती दवाओं के केंद्र खुलने का लाभ प्राय: हर वर्ग को होगा.राष्ट्र्रीय डायलिसिस सेवा का एलान भी किया गया है.यह योजना भी सभी के लिये लाभकारी है.बजट के तहत  हर सरकारी जिला अस्पताल में डायलिसिस होगा। युवओं के लिये यह अच्छी खबर है कि नया इम्प्लॉई होने की स्थिति में उनकी सैलरी से पहले 3 साल पीएफ नहीं कटेगा। इम्प्लॉई का पीएफ कॉन्ट्रिब्यूशन भी सरकार ही देगी। इसके अलावा ईपीएफ का दायरा बढ़ाया जाएगा।1 मई 2018 तक देश के सभी गांवों को बिजली का लक्ष्य रखा गया है. 50 लाख से कम कीमत में पहला घर खरीदने वालों को सरकार की ओर से ब्याज में सालाना 50000 रुपए अतिरिक्त ब्याज छूट,80जीजी के तहत हाउस रेंट छूट की सीमा 24 हजार से बढ़ाकर 60 हजार रुपए,पांच लाख से कम इनकम वालों के लिए सेक्शन 87 ए के तहत टैक्स सिलिंग 2000 से बढ़ाकर 5000 रुपए,दालों की कीमत स्थिर रखने के लिए 900 करोड़ खर्च करेगी सरकार.यह सब कुछ ऐसे निर्णय हैं जो बहुत लोगो को प्रभावित करेगी. मजदूरों के काम के घंटे और छुट्टी तथा 1 लाख रुपए प्रति परिवार के साथ लॉन्च की जाएगी हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम, 62 नए नवोदय स्कूल का लाभ कई  लोगों को प्राप्त होगा. 1500 स्किल डेवलपमेंट सेंटर के लिए 17000 करोड़ रुपए, अलॉट किए गए है. एससी-एसटी एजुकेशन हब बनाने के लिए भी बडे स्तर पर होने वाला प्रयास गरीबों के साथ साथ मध्यम वर्ग को भी बहुत हद तक लाभ पहुंचायेगा.




मंगलवार, 1 मार्च 2016

ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा...क्यों बेबस है रेलवे पुलिस?






इसमे संदेह नहीं कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से रेलवे को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में ऐड़ी चोटी एक कर रहे हैं. यात्री ज्यादा से ज्यादा अच्छी आधुनिक सुविधाओं का उपयोग कर सके  इसके लिये उन्होंने सरकारी प्रयास में कोई कमी नहीं छोड़ी है. उनकी मंशा भी ट्रेनों में यात्रा करते समय वातावरण घर जैसा लगे इसका ख्याल रखा जा रहा है इस कड़ी में ट्रेनों में पूर्ण साफ सफाई रहे, ट्रेने समय पर आना- जाना करें और यात्रियों को पूर्ण पूर्ण सुरक्षा मिले जिससे यात्री अपने गंतव्य तक पहुंच जाये लेकिन क्या नोकरशाही या प्रशासनिक व्यवस्था इसे हकीकत में बदलने का प्रयास कर रही है? ऐसा लगता है कि इसमें बहुत बड़ी बाधा हमारे कतिपय यात्रियों के आचरण से भीे है जो इसे सफल नहीं होने दे रही. यात्रा के दौरान यात्री ट्रेन को राष्ट्र की संपत्ति न समझ इसे किसी ऐसी वस्तु समझ कर उपयोग कर फेक रहे हैं जिसका बाद में  कोई उपयोग नहीं है. यात्रा दूसरों के लिये भी सुविधाजनक व सुगम हो सकें इसके लिये यह जरूरी है कि यात्री  ट्रेन का उपयोग यात्रा के दौरान दूसरे लोगों की सुविधा का ध्यान रखकर उपयोग अपने घर की वस्तु समझ करें। राष्ट्रीय संपत्ति के प्रति लोगों में जो जज्बा कुछ विदेशी राष्ट्रों में हैं उसे यहां कायम करने  की जरूरत है. टायलेट को गंदा कर छोड़ देना, बोगी से उतरने से पहले बुरा हाल कर देना, रेलवे संपत्ति को चुराकर ले जाना जैसी बाते कतिपय लोगों की फितरत बन गई है. एक यात्रा पर  जाने वाले यात्री के  बाद दूसरा आता है तो उसे नाक बंद कर ही बोगी में प्रवेश करना पड़ता है. कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी  दिल्ली के बीच एक ऐसी आधुनिक सुविधा संपन्न ट्रेन को विदा किया जो शायद इस देश में पहली बार पटरियों पर उतरी. स्वाभाविक है कि इस ट्रेन में ऐसे लोग ही पहले यात्रा करने चढे होंगे जो साफ सुथरे अच्छे कपड़े पहने  व पैसे वाले हो लेकिन ट्रेन के चलने के बाद जो तस्वीरें मीडिया ने  दिखाई वह यहीं इंगित करती है कि हमारे देश में अभी कतिपय लोगों को ऐसी  सुविधाएं उपलब्ध कराने के पहले अलग से ट्रेनिगं मिलनी चाहिये. अपने सहयात्रियों को तो लोग पहले दुश्मन समझकर ही गाडियों  पर चढ़ते है और फिर कहीं अपनी सीट पर कोई धोखे से भी बैठ गया तो उसे भला बुरा करने उसके साथ मारपीट करने यहां तक कि उसे ट्रेने से धक्का देकर नीचे फेकने जैसी हरक त कर बैठते हैं. एक ताजा मामला रेल बजट पेश करने के चौबीस घंटे के भीतर रेलवे के सुरक्षा के दावे की सारी पोल खोल रहा है-बिलासपुर/रायपुर. दुर्ग-अंबिकापुर एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सफर कर रही महिला यात्री को बोगी में ही सफर कर रहे 6 युवक पूरी रात अपनी हरकतों से परेशान करते रहे। परेशान होकर पति ने हेल्पलाइन नंबर 182 में मदद मांगी। आरपीएफ स्कार्टिंग पार्टी ने मौके पर पहुंचकर आरोपियों को कब्जे में लिया पर छेडख़ानी के बजाय आरोपियों के खिलाफ शांति भंग करने का अपराध दर्ज कर कार्रवाई की । जब ऐसे मामलों में यात्रियों को पक्की व ठोस सुरक्षा मुहैया नहीं होगी तो लोगों का ट्रेनों में यात्रा पर से विश्वास उठ जायेगा. अक्सर होता है. असल में लम्बी दूरी की ट्रेनें एक बड़े शहर  के रूप में कई यात्रियों को लेकर आगे बढ़ती है इन यात्रियों को पूर्ण सुरक्षा के लिये न केवल सशस्त्र गार्ड की तैनाती  होनी चाहिये बल्कि एक पुलिस थाने की व्यवस्था गार्ड के डिब्बे के साथ-साथ होनी चाहिये. ऐसे पूरे मामले के निपटारे के लिये मजिस्ट्रेटों की भी तैनाती जरूरी है तभी इस प्रकार के मामलों से यात्रियों को बचाया जा सकेगा.