रविवार, 28 फ़रवरी 2016

आम बजट: महंगाई कम करने का प्रयास होगा...?






सोमवार उनतीस फरवरी को 2015-16 का बजट पेश होगा. यह वित्त मंत्री  अरूण जेठली का तीसरा बजट होगा. सरकार की ओर से बजट से पूर्व की गई आर्थिक समीक्षा में महंगाई कम रहने की उम्मीद जताई गई है. आर्थिक सर्वे में यह बात आई है कि अगले वित्त वर्ष के दौरान महंगाई दर 4 से 4.5 फीसदी के दायरे में रहेगी और इससे ब्याज दरों में कटौती हो सकती है। ब्याज दरों में कटौती से कर्ज सस्ता हो जाएगा और इसका सीधा फायदा कार,होम और पर्सनल लोन लेने वालों को होगा क्योंकि उन्हें कम ईएमआई देनी होगी। सर्वे में महंगाई कम होने से ब्याज दरों में कटौती की संभावना भले ही जताई गई हो लेकिन इसका सारा दारोमदार भारतीय रिजर्व बैंक पर टिका है। सरकार के पिछले वादे कितने पूरे हुए? इसका आत्मचिंतन करते हुए हम यही कह सकते हैं कि इस बजट में भी कोई खास उम्मीद आमजन को नहीं करना चाहिये?इंकम टैक्स की सीमा बढ़ाने और सर्विस टैक्स में कमी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लिये जा सकते हैं, ऐसी उम्मीद न करना ही बेहतर है. पिछले बजट में युवाओं, किसानों के लिये सुविधाएं दी गई लेकिन कितना जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा? मंहगाई विशेषकर दालों में जो बढौत्तरी हुई है वह असहनशील है.सेना के बजट में फिर वृद्वि की जा सकती है, यह जरूरी भी हैं. हम कह सकते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रू ड आइल की दरों में कमी का फायदा जरूर हुआ किन्तु वह आम लोगों तक पहुंचने की जगह सीधे सरकार के खाते में चला गया.सरकार कितना भी तर्र्क दे लेकिन आम आदमी के घरों की रसोई अभी भी मंहगी ही है.रेलवे के दीर्घकालीन सुविधा बजट की तरह वित्त मंत्री भी इस बार ऐसा ही बजट पेश कर  सकते हैं जो सन्  2020 तक लोगों को इंतजार कराये, उसमें युवाओं को रेोजगार, किसानों को मदद, गरीबों के लिये आवास जैसे कार्यक्रम हो सकते हैं.मध्यमवर्ग को पिछली बार ही जेटली ने कह दिया था कि वे अपना इंतजाम स्वंय करें इसलिये मध्यम वर्ग को किसी  फायदे की उम्मीद अब भी नहीं करना चाहिये. इस बीच डालर के मुकाबले रूपया तीस साल के सबसे नीचे स्तर पर आ गया है.शुक्रवार को एक डालर के मुकाबलेेे रूपये की कीमत गिरकर 68.75 पर आ गया. यह रूपये का 28 अगस्त 2013 के बाद का निचला स्तर है रूपये की कमजोरी के पीछे डालर इंडेक्स में आई तेजी है रूपये की  लगातार कमजोरी से मंहगाई और बढ़ सकती है पिछले कुछ समय से महंगाई दर स्थिर होने के बावजूद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती के मामले में खासी सतर्कता बरती है। जो संकेत आए हैं उसमें सब्सिडी पर कुछ ऐलान संभव है।  पैट्रोलियम, एनर्जी, एग्रीकल्चर ऐसे सेक्टर हैं, जहां पर सब्सिडी का दुरुपयोग होता है। ऐसे में इस बात की संभावना है कि सरकार सब्सिडी में कटौती को लेकर कुछ कड़े फैसलों की घोषणा कर दे। खासकर एलपीजी पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर हो सकता है कि एक तय सीमा से अधिक आय वाले लोगों के लिए इसे खत्म कर दिया जाए या सब्सिडी वाले सिलैंडर में कटौती की जाए। स्थिति ऐसी नहीं है कि टैक्स पेयर्स को ज्यादा छूट दी जाए यानी इसका दायरा बढ़ाया जाए। इसका मतलब है कि सरकार इनकम टैक्स छूट सीमा में बढ़ोतरी करने के मूड में नहीं है। हालांकि इसको लेकर काफी प्रेशर भी है। ऐसे में बजट में अगर सरकार ने इनकम टैक्स छूट दी भी तो वह एक सीमित दायरे में होगा।



सुधारों वाला बजट!-क्या दूरगामी परिणाम निकलेंगे?




रेल यात्रियों को इस बात से संतोष कर लेना चाहिये कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने वर्ष 2016 के बजट में यात्री व माल भाड़े में किसी प्रकार की कोई बढौत्तरी नहीं की लेकिन यात्री यह कैसे भूल पायेंगे कि पिछले बजट के बाद से अब तक पीछे के दरवाजे से यात्रियों पर सुविधाओं के नाम पर पैसा निकलवाने का सिलसिला जारी रहा है साथ ही कुछ सुविधाओं में कटौती की गई तो कुछ सुविधाएं बढ़ाई भी गई. हां यात्रियों को लुभावने वादों को पूरा होते देखने के लिये सन् 2020 का इंतजार करना पड़ेगा. जहां तक छत्तीसगढ़ या देश के दूसरे राज्यों का सवाल है इस बार रेलमंत्री ने चालाकी से ऐसा बजट पेश किया है कि किसी को सुविधाओं को लेकर हंगामा करने का मौका नहीं दिया. चार नई ट्रेनों को देशव्यापी चलाने की घोषणा के अतिरिक्त नई कोई ट्रेन का ऐलान न होना लोगों को विशेषकर पार्टी के अंदर ही गुपचुप गुस्सा दिलाने जैसा हो गया.बहराल सुरेश प्रभु ने जो बजट पेश किया वह अब तक के रेल मंत्रियों से एकदम भिन्न ही दिखाई देता है. अब तक जो बजट पेश होते रहे हैं उसे हम एक आम आदमी की तरह देखें तो उसमें से बहुत कुछ तो राजनीति, कूटनीति और राज्यवाद को ध्यान में रखकर किया जाता रहा है. केन्द्र में अगर बिहार का रेल मंत्री तो बिहार को ज्यादा ट्रेने. तामिलनाडू, बंगाल या कर्नाटक का रेल मंत्री तो उनके राज्य को सर्वाधिक ट्रेने और अन्य सुविधाएं. हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लोग सदैव यही आस लगाये बैठे रह जाते कि कब हमारे क्षेत्र का कोई सांसद मंत्री बनेगा और हमारे प्रांत को रेल सुविधाएं प्राप्त होगीं. इस बार भी छत्तीसगढ़ को आशानुरूप कोई सफलता रेल सेवाओं के विस्तार के मामले में नहीं मिली किन्तु बस हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि 2020 तक बहुत कुछ अच्छी सेवा मिलने लगेगी लेकिन इसमें भी लोग यह सवाल कर सकते हैं कि समय का कौन इंतजार कर सकता है?बजट का विश्लेषण करने वाले दूसरे मायने से इसे समझाते हैं- वे कहते हैं कि बजट की खास बात यही रही कि रेल किराया नहीं बढ़ाया गया है और  इस बजट में कोई छत्तीसगढ़ को अलग से कुछ नहीं मिला लेकिन कुछ घोषणाएं ऐसी हुई हैं जिनका फायदा छत्तीसगढ़ केे यात्रियों को भी अन्य लोगों की तरह मिलेगा जैसे 2020 तक हर पैसेंजर को कंफर्म टिकिट अर्थात इसके लिये फिर इंतजार! पिछले बजट की घोषणाओं में से बहुत सी अब तक पूरी नहीं हुई हैं.रेल यात्रियों के मामले में इस बजट की स्थिति यही  है कि मुम्बई  को छोड़कर सभी में एक समान बंट जायेगा-वह भी एक लम्बे समय के इंतजार के बाद जब अच्छे दिन आयेंंगे तब. मुम्बई लोकल प्लेटफार्म ऊंचा करने के लिये काफी राशि रखी गई है.यह जरूरी भी था. कुछ लुभावनी बात यह है कि वेटिंग में भी कन्फर्म ट्रेन टिकट,139 डायल करके भी टिकट कैंसल करवा सकेंगे। एसएमएस के जरिए कोच और बाथरूम क्लीन करवाए जा सकेंगे. ट्रेनों में जरूरी दवाएं और बच्चों के लिए दूध मिलेगा.हर तत्काल काउंटर पर सीसीटीवी लगे होंगे। शिकायत के लिए नई फोन लाइन (182) शुरू होगी. ट्रेनों में 120 बर्थ सीनियर सिटीजंस के लिए आरक्षित होंगे. महिला यात्रियों के लिए स्टेशनों पर पोर्टेबल शौचालय उपलब्ध कराए जाएंगे। महिलाओं को तीस प्रतिशत आरक्षण. बहुत से मामलों में लोगों को चार साल का इंतजार करना पड़ेगा जैसे  देश की सभी ट्रेनों में 2020 तक बायोटॉयलेट लगेंगे। इनमें राज्य से गुजरने वाली ट्रेनें भी शामिल होंगी। स्टेशनों के सुंदरीकरण पर फोकस। इसके तहत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और रायपुर स्टेशन को शामिल किया जा सकता है। दो साल पहले यहां एअरपोर्ट की तर्ज पर वीआईपी लाउंज बनाने की घोषणा हुई थी।  2 हजार स्टेशनों पर रेल डिस्प्ले नेटवर्क होगा। मनोरंजन के लिए गाडियों में एफएम रेडियो स्टेशन। इसमें साउथ ईस्ट सेन्ट्रल रेलवे के रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और नागपुर स्टेशन को शामिल किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की प्रतिक्रिया में कुछ इसी बात का एहसास होता है जिसमें उन्होने बजट को लोक हितैषी बताते हुए सुधारों वाला बजट कहा है जिसके परिणाम दूरगामी होंगे।

गरीबों को पक्की छत के नीचे सुलाने का सपना....छत्तीसगढ़ रोल माँडल!





इस दौर में अगर कोई रोज कमाने खाने वाला यह उम्मीद करें कि वह अपनी झोपड़ पट्टी  छोड़कर एक पक्का मकान बना लेगा तो यह उसके लिये सिर्फ एक सपना जैसा है लेकिन अगर सरकार उसे बहुत सस्ते में  बनाकर देने का वादा करें तो यह शायद उसे ऐसा लगे कि उसे अपना सपना साकार होता दिखने लगे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने छत्तीसगढ़ दौरे में छत्तीसगढ़ के  गरीब वर्ग को एक उम्मीद जगाई है कि वे अपनी झोपड़ पट्टियों से निकलकर पक्के मकानों  में रह सकेंगे.यह मकान होगा 325 वर्गफिट का ई डब्ल्यू एस मकान. इस मकान की कुल कीमत छै लाख रूपय है जिसके लिये  केन्द्र सरकार जहां  1.5 लाख रूपये और राज्य सरकार एक लाख की सब्सिडी दे रहा है किन्तु बाकी पैसा मकान  चाहने वाले गरीब को चुकाना पड़ेगा. सरकार की मेहरबानी ऐसे मकानों को खरीदने  वानों के लिये  मेहरबानी यह भी है कि मकान पचास हजार की लैण्ड व स्टांम्प ड्यूटी  की भी छूट है अर्थात गरीब व्यक्ति तीन लाख में एक पक्का मकान प्राप्त कर सकेगा. प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी  को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा  बनाया गया आवास माँडल बहुत पसंद आया संभव है इसी माँडल पर पूरे देश में गरीबों को एक तरह का मकान व अन्य सुविधाएं प्राप्त होंगी. देश को झुग्गियों से मुक्त करने के लिये यह एक अच्छा सरकारी प्रयास है लेकिन यह भी ध्यान रखने की  बात है कि इस किस्म  की योजनाओं में बहुत से ऐसे तत्वों का प्रयास हो जाता है जो इसकी आड में धंधे बाजी शुरू कर देते हैं.इसके कतिपय उदाहरण हम छत्तीसगढ़ में ही सरकार और कुछ स्वंय सेवी संगठनों द्वारा गरीबो केे लिये शुरू की गई आवास योजनाओं को  देखकर लगा सकते हैं जहां कतिपय लोगों ने एक साथ कई  मकानों को खरीदकर न केवल जमीन हथियाई बल्कि कई मकानों को भी अपने कब्जे में कर लिया और उसे किराये पर उठा दिया. ऐसे लोग गरीबों का हक मारकर आराम से गुपचुप किराया वसूल कर अपने व अपने परिवार  का पेट भर रहे है और गरीब मारा मारा फिर रहा है.
 21 फरवरी को प्रधानमंत्री के रायपुर प्रवास के दौरान नया रायपुर में बनाए जा रहे मकानों का मॉडल दिखाया गया था, मुख्यमंत्री ने पूरी योजना के बारे में  बताया था कि किस प्रकार योजना में सरकारी सब्सिडी दी जाएगी और उसका आबंटन कैसा होगा। योजना आकर्षक लगी व प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री  से कहा था कि विस्तृत योजना उनके दिल्ली पहुंचने के पहले ही भेज दी जाए। छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत प्रस्ताव बनाकर केंद्र को भेजा। प्रस्ताव भेजने के तत्काल बाद छत्तीसगढ़ को स्वीकृति भी मिल गई। योजना के तहत राज्य के 26 शहरों में 1900 करोड़ रुपए की लागत से 27 हजार मकान बनाए जाएंगे। इसी प्रकार मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत 40 हजार मकानों का निर्माण किया जा रहा है-हम आशा करते हैं कि इस योजना का पूरा लाभ सिर्फ और सिर्फ गरीब वर्ग के लोगों को ही मिले.बिचैलियें और गैर जरूरतमंदों को इस योजना से दूर ही रखे वरना ऐसी अच्छी योजनाओं के बुरे हाल का रिकार्ड भी  है। हम यह भी आशा कर सकते हैं कि इस    योजना के मूर्तरूप लेने के बाद धीरे धीरे झोपडपट्टी वाला जीवन समाप्त होगा और एक नये युग में लोग प्रवेश कर सकेंगे. सरकार को चाहिये कि वह नई झुग्गी झोपडिय़ों का निर्माण न  हो सके इस पर भी पूरा ध्यान रखें।

खर्चीले सत्र में हंगामे का साया और सरकार की रणनीति!




पार्लियामेंट का पिछला सेशन हंगामें की भेंट चढ़ गया. कई महत्वपूर्ण बिल अटक गये कोई सरकारी काम नहीं हुआ.हंगामे से देश के खजाने को करोड़ों रूपये की चोट लगी चूंकि संसद की कार्यवाही का हर लम्हा खर्चीला और कीमती होता है. इस बार सरकार की तरफ से एहतियात बरती जा रही है कि संसद में कोई हंगामा न हो.सरकार चाहती है कि बजट सेशन शांतिपूर्ण निपट जाये और अटके बिलों को पास कर दिया जाये. मंगलवार को बजट सेशन का पहला दिन था. राष्ट्रपति के अभिभाषण मेंं भी इस बात की चिंता स्पष्ट झलकी कि सत्र हंगामेदार हो सकता है उन्होने अपने अभिभाषण में भी यह बात कही है कि संसद चर्चा के लिये है हंगामे के लिये नहीं. प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी भी चाहते हैं कि संसद में हंगामा न हो  और कामकाज ठीक से चले. उनका यह कहना ही इसके लिये  काफी है कि देश को बजट सेशन से बड़ी उम्मीद है। दो पार्ट में होने वाले इस सेशन में हंगामा होने के आसार इसलिये भी हैं चूंकि विन्टर सेशन के बाद से अब तक देश में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी है जो विपक्ष को शांत रहने नहीं देगी इसलिये प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों की ंिचंता में दम हैॅ.  विपक्ष जाट आंदोलन और रोहित वेमुला सुसाइड केस पर सत्ता पक्ष को घेरने की कोशिश करेगा यह मामला किसी न किसी रूप में उठेगा जो संसद में हंगामें की वजह बनेगी. प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी  की अचानक पाकि स्तान यात्रा, पाक से वार्ता का रूक जाना जैसे मुद्दे भी संसद में हंगामें व बहस का विषय बन सकते हैें. सरकार की कोशिश अहम बिलों को पास कराने की है लेकिन सरकार ज्वलंत मुद्दों को कैसे रोकेगी?सरकार यह कहकर अपनी सफलता का दावा कर सकती है कि आतंकवाद के खिलाफ हमारी सेना ने शानदार कामयाबी हासिल की है। ऑपरेशन राहत के तहत  चार हजार भारतीयों और डेढ़ हजार विदेशियों को यमन से निकाला। पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हमला जरूर सफलतापूर्वक निष्फल किया गया लेकि न हमारी कतिपय चूक के कारण इस गंभीर आतंकी हमले में हमारे योग्य और  काबिल जवानों तथा अफसरों को हमें खोना पड़ा है. पठानकोट हमले में इंटेलीजेंस की विफलता भी इस सत्र में सरकार के लिये मुसीबत खड़ी कर सकती है.सरकार को घेरने के लिये इस बार भी विपक्ष के पास कई ठोस मुद्दे हैं परन्तु यह सब तभी होगा जब हम फलेश बैक में जाकर यह देख पायेंगे कि विपक्ष को शांत रखने के लिये सरकार की तरफ से क्या रणनीति अपनाई गई हैं यह सब इसी सप्ताह के बाकी दिनों में स्पष्ट होने लगेगा। पार्लियामेंट का सेशन शुरू होने से पहले  सरकार ने विपक्ष को साथ लेकर एक माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है किन्तु यह कहना जल्दबाजी होगी कि सेशन में सब कुछ अच्छा ही होगा. सरकार के पास अपनी सफलता गिनाने के बहुत से बहाने हैंजबकि विपक्ष मंहगाई, रेल भाड़े में वृद्वि जैसे मुद्दों पर भी मुखर हो जाये तो आश्चर्य नहीं.इस सत्र के अंतराल मेंं सोनिया राहुल को जेल भिजवाने का पूरा प्रबंध भी  हो चुका है-क्या विपक्ष इसे भी भूल जायेगा?  सरकार यह कह सकती है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसने सख्ती बरती है किन्तु देश के अनेक भागों में क्राइम भी तो एक समस्या है जिसपर विपक्ष का रूख क्या होगा कहा नहीं जा सकता. सरकार को उपलब्धियां गिनाने का मौका मिला तो सरकार कहेगी बिजली+घर+सड़क सब ओर काम चल रहा है-बहरहाल  हर कोई यही चाहता है कि सबकुछ ठीक ठाक चले सरकार आम जनता के हित मेें अच्छा बजट पेश करें और लम्बित बिलों पर सरकारी मुहर लगे मगर यह सेशन भी पूर्व की तरह यूं ही चला गया तो बहुत कुछ नुकसान देश को होगा वैसे पहले दिन की शंति से  फिलहाल तो ऐसा  ही लग रहा है कि सब कुछ ठीक ठाक ही रेहेगा.

...

इस आरक्षण की आग में तो हम सभी जल गये....!


इस आरक्षण की आग में तो हम सभी जल गये....!

हम मांगते बहुत कुछ हैं लेकिन देते कुछ नहीं लेकिन इस लेन देन में नुकसान सीधा राष्ट्र का होता है चाहे वह आरक्षण की मांग हो या बेतन बढ़ाने  की  अथवा किसी अन्य मांग को लेकर होने वाला प्रदर्शन,आंदालन और फिर हिंसा. हम सदैव  ही देश को नुकसान पहुंचाते आये हैं. इस कडी में  जम्मू कश्मीर में शहीद हुए उस वीर जवान कैप्टन पवन कुमार के अंतिम शब्दों पर भी गौर करें जिसका इस समय के आंदोलनों के दो गढों जेएनयू और हरियाणा से सीधा नाता  है.उसके अंतिम विचार थे -''किसी  को रिजर्वेशन चाहिये तो किसी को आजादी,हमें कुछ नहीं चाहिये भाई बस अपनी रजाई:ÓÓ यह भी इत्तेफाक है कि जाट रेजिमेंट का यह जवान हरियाना का ही रहने वाला था और उसकी पढ़ाई दिल्ली जेएनयू से हुई. देश के जवान अपनी आजादी और वतन की रक्षा के लिये अपने दिल  में इस तरह के मजबूत इरादे संजोकर रखते हैं...और हम उसे यूं स्वाहा कर डालते हैं..वाह! क्या है हमारी सोच,हमारी प्रवृति! -अभी कुछ दिन पहले ही जब हम और आप घोड़े बेचकर सो रहे थे तब हमारे कुछ भाई सियाचीन में अपने वतन के खातिर माइनस डिग्री से भी कम तापमान पर सर्द हवा और तूफान  झेलते हुए बर्फ के नीचे दबकर शहीद हो गये. इन वीर यौद्वाओं का स्मरण सिर्फ इसलिये कि जब भी कोई राष्ट्र के विध्वंस के लिये अपना हाथ उठाये तो भगवान के लिये कम से कम एक बार इन जवानों के त्याग और बलिदान को जरूर याद कर ले। रहा अपने स्वार्थ के खातिर मांगों के सिलसिले का ,जो कभी खत्म नहीं होता- अपनी सुख सुविधाओं में और इजाफे के लिये ऐसे कृत्य पर उतर आते हैं जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता.यह चाहे अभी  का जाट आंदोलन हो या और कोइ्र्र अन्य मसला-देश की संपत्ति को खाख करने में कौन सी बहादुरी है? अकेले वर्तमान जाट आरक्षण आंदोलन को ले तो इसमें  करीब बीस हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की राष्ट्रीय संपत्ति स्वाहा हुई.आंदोलन आज या कल खत्म हो जायेगा हो सकता है सरकार बात भी  मान ले लेकिन क्या ऐसी मांगों और आंदोलनों का कोई अंत है? जो नुकसान हुआ इसकी भरपाई कैसे होगी? यह भी सवाल बार बार उठता है कि आखिर आरक्षण क्यों?और यह क्यों बार बार उठता है हम पूछ सकते हैं कि सरकार बनाने बिगाडऩे के नाम पर होने वाले इस जातिगत आरक्षण को कब तक यूं जारी रखा जायेगा? क्यों नहीं  इस आरक्षण शब्द को ही जड़ से काट दिया जाता? आरक्षण के नाम पर देश न जले इसके लिये यह जरूरी है कि सरकार कोई न कोई कदम जल्दी उठाये वरना ऐसे आरक्षणें की आग न  केवल हरियाणा तक सीमित रहेगी बल्कि देश की प्राय: हर जातियों से उठेगी, जिसे पूरा कर पाना किसी के बस का नहीं रह जायेगा. दूसरी बात मांगों को मनवाने  के लिये ऐसे आंदोलनों  को उसके शुरूआती दौर में ही अनुरोध या कड़ाई से खत्म करना ही आज समझदारी है. जब तक सख्ती से नहीं  निपटा जायेगा तब तक ऐसे आंदोलन अपना रूप दिखाते रहेगें. राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले ऐसे आंदोलनों को राजद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिये साथ ही ऐसे उपद्रवी तत्वों पर कठोर धाराओं के तहत मुकदमा दायर किया जाना चाहिये. सजा के तौर पर उन स्थलों पर जहां उपद्रव हुए है लोगों पर भारी टैक्स के साथ-साथ सारे सरकारी विकास कार्यो पर रोक भी लगाई जा सकती है जब तक ऐसा संदेश नहीं मिलेगा ऐसे आंदेालन होते रहेंगे और राष्ट्र की संपत्ति यूं ही धूं धंू कर सबके सामने जलती रहेेगी.

गांव भी अब होंगें शहर जैसे...प्रधानमंत्री की छत्तीसगढ़ यात्रा




हमें याद है पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की वह बात जो उन्होंने रायपुर आकर गांवों के सबन्ध में कही थी- 'गांवों में सुविधाएं शहर जैसी होनी चाहिये.Ó उनके इस बयान के बाद छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों को आदर्र्श  गांवों के  रूप  में चुना और वहां ऐसा प्रयास भी शुरू हुआ लेकिन उनके राष्ट्रपति पद से हटने और उनके देहावसान के बाद भी न इन तथाकथित गांवों को उनकी कल्पना का गांव बनाया गया और न ही उन्हेंं गांवों जैसी सुविधाएं मुहैया कराई गई अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आशाएं फिर जागी है उन्होने रायपुर में गांवों को स्मार्ट बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का देशव्यापी शुभारंभ किया है हम आशा करते हैं कि राजनांदगांव जिले के कुरूभाटा गांव से शुरू की गई यह योजना अपने सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचेगी,इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री की मंशा देश का विकास,उन्नति तथा ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाना, ज्यादा से ज्यादा युवाओं को काम धंधे में लगाना है. अब्दुल कलाम भी यही चाहते थे कि गांव को  ज्यादा से ज्यादा व शहरी लोगों की तरह की सुविधाएं मिले-जब तक हमारा गांव उन्न्तत नहीं होगा.ग्रामीण बच्चों को अच्छी स्वास्थ्य व उच्च शिक्षा नहीं मिलेगी  तब तक गांवों की दिशा और दशा में सुधार होना संभव नहीं है. प्रधानमंत्री के इस कार्यक्रम व वादे तथा सपने को निभाने की जिम्मेदारी राज्य शासन की है. वह कितना ध्यान छत्तीसगढ़ के गांवों की ओर लगाती  है यही तय करेगा कि कार्यक्रम की गति क्या होगी। -प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह स्पष्ट कर दिया कि अरबन और रूरल को मिलाकर रूर्बन बन गया है अतं: यह मतलब लगाया जा सकता है कि सरकार शहर और गांव में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करना चाहती.मोदी सरकार  की मंशा गांव गांव मे पहुंचने  की  है वह  अपने आपकों दिल्ली के बदं कमरों से बाहर निकलने के प्रयास में है इसमें उसे कितनी  सफलता मिलेगी यह आगे आना वाला  समय बतायेगा. प्र्रधानमंत्री अपने स्वच्छता अभियान  के तहत घर घर में शौचालय कार्यक्रम से भी खुश नजर आयें..धमतरी जिले के ग्राम कोटभर्री निवासी वयोवृद्ध महिला 104 वर्षीय कुंवर बाई ने पीएम  के कार्यक्रम से प्रेरित होकर अपने घर की बकरियां बेचकर शौचालय बनवाया. पीएम बनने के बाद नरेन्द्र मोदी का छत्तीसगढ़ आगमन  दूसरी बार था. उन्होंने उक्त वृद्वा के मां के चरण छूकर यह भी संदेश दिया कि वे इस कार्यक्रम को कितनी अहमियत देते हैं. प्रधानमंत्री की इस छत्तीसगढ़ यात्रा से  भविष्य में गांवों के विकास और उन्हें आदर्श गांव के रूप में विकसित करने में राज्य सरकार के प्रयास में और गति आने की संभावना है.नई राजधानी में इलेक्ट्रॉनिक मैनुफैक्चरिंग कलस्टर का शिलान्यास आगे आने वर्षो में इस अंचल को आधुनिकता के क्षेत्र में आगे बढऩे के साथ सैकड़ों नौजवान युवकों को रोजगार के अवसर भी प्रदान करेगा.प्रधानमंत्री के रायपुर आगमन  पर विपक्ष ने अपनी उपस्थिति दर्शाने का प्रयास जरूर किया किन्तु वह इसमें सफल नहीं हो सका.

छत्तीसगढ़ को खेल के क्षेत्र में एक और बड़ी सफलता!


छत्तीसगढ़ को खेल के क्षेत्र में एक और बड़ी सफलता!
यह इस अंचल के विकास और प्रगति का प्रतीक है कि राज्य बनेने के चंद वर्षो बाद ही इस अंचल की अन्य बड़ी व्यावसायिक गतिविधियों के साथ खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई  है पिछले साल रायपुर के इंटरनेशनल हाकी स्टेडियम में विश्व हाकी  प्रतियोगिता के सफल आयोजन ने विश्व में अपना नाम स्थापित किया उसके पहले नया रायपुर के इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में आईपीएल मैच का भी सफल आयोजन हुआ जिससे विश्व में यह संदेश गया कि हर परिस्थिति में रायपुर खेलों के लिये फिट है. यहां आये खिलाडिय़ों ने छत्तीसगढ़ के दर्शकों की भी खूब प्रशंसा की है. एक समय था जब छत्तीसगढ़ में सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छे खिलाड़ी निकलते थै लेकिन उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर सिक्का जमाने का मौका नहीं  मिल पाता था लेकिन अब परिस्थितियंा बदल गई है.  इंटरनेशनल  क्रिकेट स्टेडियम, इंटरनेशन  हाकी स्टेडियम, इंटरनेशनल स्विमिंग पूल और इंडोर स्टेडियम देश विदेश में अपनी साख जमा चुका है. इसके साथ साथ व्यावसायिक क्षेत्र में बड़े बड़े फाइव स्टार होटलों और आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पतालों ने बाहर से खिलाडियों को रायपुर में आकर जोर आजमाइश करने प्रेरित किया है.छत्तीसगढ़ क्रि केट संघ अब  बीसीसीआई का पूर्ण सदस्य बन गया है इसके लिये करीब आठ साल  का समय लगा. खूब मेहनत की तभी जाकर हम बीसीसीआई के पूर्ण सदस्य बन सके सदस्यता मिलने के कई फायदे हैं.छत्तीसगढ़ क्रि केट संघ 2008 से अब तक बोर्ड से एसोसिएट मेंबर के तौर पर जुड़ा हुआ था लेकिन अब बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) ने पूर्ण सदस्यता प्रदान कर दी है। मुंबई में  बोर्ड की जनरल मीटिंग में यह फैसला हुआ। पूर्ण सदस्यता हासिल करे बगैर हम छत्तीसगढ़ में अंतरराष्ट्रीय मुकाबले नहीं करा सकते थे,पूर्ण सदस्यता मिलते ही अब हर साल छत्तीसगढ़  को 20 करोड़ रुपए मिलेंगे। राज्य को अपनी रणजी टीम बनाने की पात्रता हासिल हो गई है। राज्य के एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में हर साल बड़े मुकाबले हो सकेंगे। छत्तीसगढ़ ने 2008 में भारतीय क्रिकेट संघ का एसोसिएट सदस्य बनने  के बाद यहां अंडर-16, अंडर-19, अंडर-23 और अंडर-25 के एसोसिएट मुकाबले कराए. राज्य को 2013 में पहली बार आईपीएल टी-20 की मेजबानी दी गई, फिर 2014 में चैंपियंस ट्रॉफी और 2015 में फिर आईपीएल मैचों की मेजबानी मिली, बिना पूर्ण सदस्यता के टी-20 टूर्नामेंट की मेजबानी हासिल करने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बना था,इतना ही नहीं टूर्नामेंट के बाद राज्य को बीसीसीआई की ओर से बेस्ट पिच और बेस्ट मैदान का भी पुरस्कार मिला था.  क्रिकेट में तो  हमने बड़ी सफलता हासिल की अब यहां के कर्ताधर्ताओं को अन्य प्रतियोगिताओं के लिये खिलाडियों को तैयार करने के लिये प्रयास शुरू करने चाहिये.फुटबाल,कबड्डी,तीरदंाजी जैसे खेल के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ से अच्छे और प्रतिभावान खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं. यहां अब इंडोर और आउट डोर दोनो खेलों के लिये  प्रर्याप्त स्टेडियम हो गये.हाकी, क्रिकेट और बूढापारा में इंडोर खेलों के लिये स्टेडियम के बाद अब खल रही है एक अच्छे  फुटबाल के मैदान की. रायपुर के ईदगाह भाठा के पुराने मैदान को एक इंटरनेशनल फुटबाल मैदान के रूप में विकसित किया जा सकता  है. यहां वर्षो तक राष्ट्रीय फु टबाल आकर्षण का केन्द्र रहे है. अब यह स्टेडियम स्थल यूं ही पड़ा है ओर प्रतियोगिताएं भी अनियमित हो गई है सरकार  को इस मैदान को अपने हाथ में ेलेकर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम विकसित करने की दिशा में प्रयाय करना चाहिये.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

कोर्ट परिसर की घटना लोकतंत्र के लिये नासूर बन सकती है...



बुधवार को दिल्ली के पटियाला कोर्ट परिसर में हुई हिंसा ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, इससे पहले तक यह छुटपुट घटनाओं तक सीमित था लेकिन इस बार इसने जो मोड़ लिया उसने सुप्र्रीम कोर्ट को भी  ङ्क्षचतित कर दिया.। संपूर्ण मामले की  जड़ जेएनयू में घटित पाकिस्तान समर्थक व अलगाववादी नारे हैं जो बाद में चलकर दो राजनीतिक दलों के छात्र गुटों की राजनीति में समा गया, जिसमें वकीलों के गुट भी कूद पड़े. इस पूरे मामले को हवा मिली-देशद्रोह के आरोप में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफतारी से.असल में देखा जाये तो यह सब जेएनयू में छात्र संघ चुनाव के बाद ही  शुुरू हो गया था चूंकि  यहां मुकाबला एबीवीपी और एआईएसएफ के मुकाबला हुआ था जिसमें एआईएसएफ जीत गई थी- कन्हैया को गिरफतार कर 2 मार्च तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया लेकिन उसके पहले कोर्ट परिसर में दोनों घुटों के वकील न केवल भिड़े बल्कि आरोपी कन्हैया को पीटा भी-सुप्रीम कोर्ट ने तुरन्त संज्ञान लिया और कोर्ट की सुनवाई न के वल रूकवाई बल्कि कन्हैेया के सुरक्षा का पूख्ता प्रबंध करने का भी आदेश दिल्ली पुलिस को दिया.  दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन्स के बावजूद पटियाला हाउस में अराजकता फैलने तथा सुरक्षा बिन्दुओं की जांच हेतु सुप्रीम कोर्ट ने पांच सीनियर एडवोकेट नियुक्त किया. कुछ दिन पूर्व मद्रास हाईकोर्ट के जज द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना से कानून की ढहती दीवारों की भयावह तस्वीर सामने आई थी इसके बाद इस दूसरी घटना में इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े कर दिये। राष्ट्र्रवाद के नाम पर गुनहगारों को व्यापक मीडिया कवरेज से भविष्य में उनके राजनीतिक उत्कर्ष की अभिलाषा शायद पूरी हो जाए, लेकिन ऐसे मामलों में बढ़ोतरी लोकतंत्र के लिए नासूर साबित हो सकती है। जेएनयू में देशविरोधी नारों के विरुद्ध राजनीतिक दबाव के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई तथा केंद्रीय गृहमंत्री के हस्तक्षेप के बाद गिरफ्तारी होने से पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल तो खड़े होते ही हैं। पटियाला हाउस परिसर में पत्रकारों तथा अन्य लोगों की पिटाई के वीडियो सामने आने के बाद भी कोई एफआईआर या गिरफ्तारी न होने से पुलिस द्वारा सरकार के इशारे पर काम करने का जवाब भी मिलता है।  सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेशों में स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा बेवजह गिरफ्तार करने के तरीकों पर रोक लगनी चाहिए। हिरासत में लेने का मकसद पुलिस की जांच है, जिसके आधार पर चार्जशीट फाइल होती है। अदालत द्वारा सजा मुकर्रर करने के बाद ही व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, लेकिन अब हिरासत में लेकर दंडित करने का प्रचलन बढ़ गया है। ऐसे मामले अदालतों में नहीं टिकते और अंत में व्यक्ति छूट जाता है, लेकिन बेवजह हिरासत से नक्सलवाद और अराजकता पनपती है, जो जेलों के बोझ को भी बढ़ाती है। अदालत में यह मामला भी यदि अंत में छूट गया तो फिर गैरकानूनी हिरासत तथा मानवाधिकार हनन की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?यह भी इस पूरे एपीसोड़ में स्पष्ट हो गया कि दूसरों को न्याय दिलाने वाले काले कोट धारियों ने पहले लखनऊ में हिंसा की और फिर पटियाला हाउस अदालत परिसर में लोगों की पिटाई की। आगे के दिनों में सुप्रीम कोर्ट का रूख क्या होगा इसपर सबकी निगाहें टिकी हुई है.

विद्युत उपभोक्ता- दर बढऩे से पहले सकते में!




छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग की बैठक  के बाद अब लोगों में भय है कि आगे आने वाले समय में बिजली वाले उनकी जेब से फिर पैसा निकालेंगे.ऐसी संभावना है कि विद्युत दरों में दस प्रतिशत तक बढौत्तरी हो सकती है वैसे  मांग तो उनतीस प्रतिशत की की गई थी लेकिन बात शायद दस प्रतिशत पर अटक गई है. सवाल उठता है कि क्या आम उपभोक्ता यह बढौत्तरी बर्दाश्त करने की स्थिति में हैं? शायद विद्युत कंपनी को इससे कोई लेना देना नहीं कि कौन क्या  कह रहा हैं,और कहां से लाकर उनकी जेब भरेगा. कंपनी ने ठान लिया है कि वह एक झटका तो उपभोक्ताओं को शीघ्र देगा ही.बात पिछले पांच साल  की जरूरत को देखते हुए की गई थी.बिजली कंपनी के खर्चो और राज्य सरकार की तरफ से मिलने वाले अनुदान  के आधार पर बिजली की दर तय होना है. यह पन्द्रह प्रतिशत से ऊपर का नहीं होगा मगर अभी से भारी अनाप शनाप विद्युत बिल अदा कर रहे बिजली उपभोक्ताओं पर आने वाले दिन जो गाज गिरेगी वह शासद आम उपभोक्ता सहन करने की स्थिति में नहीं होगा.। यूं तो राज्य पावर कंपनी ने उनतीस प्रतिशत बढौत्तरी का प्रस्ताव किया था  लेकिन दावा-आपत्तियों की सुनवाई के बाद प्रस्ताव का अधिकतम आधा ही स्वीकार किया जायेगा. विद्युत मंडल हमेशा यही तर्क देता रहा है कि हम अपने उपभोक्ताओं को दूसरे राज्यों के मुकाबले कम पैसे में बिजली देते हैं लेकिन वे यह नहीं मानते कि जिन राज्यों की वे बात करतें हैं उनमें से अधिकांश को दूसरे राज्यों से बिजली खरीदनी भी पड़ती है जबकि हमारे राज्य में ऐसा नहीं हैं हम खुद अपने संयत्रों से अपने संसाधनों से बिजली का उत्पादन करते हैं ओर अपने उपभोक्ताओं को बिजली की पूूर्ति करते हैं. यह इस अंचल के लोगों का हक है कि वह अपने संसाधनों से उत्पन्न बिजली को एक वाजिब मूल्य पर प्राप्त करें. बार बार विद्युत दर में वृद्वि करने वाली विद्युत कंपनियां सुविधाओं के नाम पर क्या देती है? बहुत से क्षेत्रों में आज भी चौबीस घंटे बिजली नहीं रहती. आंधी-तूफान में और थोड़ी देर बारिश हुई तो बिजली गुल तब कई समय तक लोग अंधेरे में रहते हैं और उसे सुधारने में भी कई समय लगता है.मेेंटेनेंस के नाम पर गर्मी के सीजन में कई घंटों तक बिजली नहीं रहती. छत्तीसगढ़ का विद्युत मंडल शुरू से ही समृद्व और पैसे वाला रहा है तथा हमेशा लाभ में ही रहा है दूसरा सरकार  की तरफ से भी उसे इतना पैसा मिलता है कि वह अपने उपभोक्ताओं को कम दाम पर बिजली सुलभ कर सके लेकिन एकदम से अगले पांच वर्षो की योजना बनाकर उपभोक्त ाओं पर जबर्दस्त हमले की बात समझ में नहीं आती. यह बात पिछले चुनावों के दौरान साफ हो चुकी है कि राज्य के बहुत से गांवों में अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है फिर आखिर पैदा होने वाली बिजली की खपत कहां हो रही है?क्यों नहीं बड़े चोरी करने वाले लोगों के कनेक्शन पर प्रहार किया जाता?क्यों नहीं देनदारों से सख्ती से वसूल किया जाता?बिजली उत्पादन का एक  बहुत बड़ा हिस्सा यूं ही चला जाता है उसकी भरपाई करने के लिये कोई ठोस पहल करने की जगह आम उपभोक्ताओं पर बिल का बोझ डालना कितना वाजिब हैं? मंडल अपने उपभोक्त ाओं को  जो बिल देता है वह कोई  समझ नहीं पाता-बिल सीधें- सीधे यह नहीं बताता कि आपने  इतनी बिजली खर्च की आप इतना पैसा दीजियें।  करीब दो फिट लम्बे बिल में इतने सारे टैक्स सुरक्षा निधि और न जाने क्या क्या मिलाकर ऐसा भ्रम पैदा कर दिया जाता है कि उपभोक्ता गुस्से से लालपीला होने के कुछ कर नहीं पाता.मंडल पहले अपने उपभोक्त ाओं की समस्याओं का  निदान करें फिर बिल में बढौत्तरी पर फैसला ले। 

'गंदगीÓ का कलंक लगा, अब इसे कैसे साफ करें?


   'गंदगीÓ का कलंक लगा, अब इसे कैसे साफ करें?

 हम स्मार्ट सिटी की दौड़ में नहीं जीत पायें वहीं अब गंदगी का दाग भी माथे पर लग गया! आखिर कौन जिम्मेदार है इसके लिये? कौन से कारण है जिसके चलते छत्तीसगढ़ का कोई शहर स्मार्ट सिटी और स्वच्छता की दौड़ में अग्रणी नहीं बन सका? सफाई जैसे मुद्दे में पिछडऩा साफ तौर पर हमारी घरेलू कमजोरी को ही दर्शाता है- एक नजर में राज्य बनने के पहले से अब तक की तुलना में हमारे राज्य के सारे शहर न केवल विकास के मामले में अग्रणी है बल्कि विकास के सौपान को भी पार कर चुके हैं किन्तु स्वच्छता के मामले में पिछडऩे के पीछे क्या कारण हो सकता है?स्वाभाविक है कि हमने स्वच्छता  पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं किया.  पडौसी राज्य मध्यप्रदेश की कम से कम तीन सिटी को केन्द्र से स्मार्ट सिटी का दर्जा मिलना यह दर्शाता है कि उसका काम हमसे अच्छा है-लेकिन यह भी सही है कि हमें मध्यप्रदेश के शासन से मुक्ति मिले अभी सिर्फ पन्द्रह साल ही हुए है और उस दौरान हमने अपने  राज्य का जो विकास किया वह अतुलनीय है, जबकि मध्यप्रदेश को अपना विकास दिखाने में पूरे साठ साल से ज्यादा का समय लग गया. यह सही है कि हमने विकास के नाम पर अपने शहरों की स्वच्छता पर इन वर्षो में बहुत कम ध्यान दिया, हमने अपनी पुरानी  सफाई व्यवस्था में कोई ज्यादा बदलाव  नहीं किया और न ही प्रदेश को पर्यावरण की दृष्टि से स्वच्छता प्रदान करने  का प्रयास किया. अंडर ग्राउडं ड्रेनेज सिस्टम भी छत्तीसगढ़ के किसी शहर में विकसित नहीं हो सका इसके चलते हम स्वच्छता के क्षेत्र में पिछड़ते चले गये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हम अपने नागरिकों को स्वच्छता का सही पाठ सिखाने में भी पिछड़ गये, गंदगी फैलाने वालों पर बहुत हद तक सक्वती बरतनी थी उसे हम अपनी  सहरदयता के कारण नहीं कर पाये लेकिन अब हमे आगे के वर्षो में इस गंभीर हालातों का समाधान निकालना होगा।  अगर हम ऐसा नहीं कर पाये तो और पिछड़ते चले जायेंगे. स्वच्छता के मामले में पिछडऩे का मतलब यही निकाला जा सकता है कि हमने इस दिशा में कुछ किया ही नहीं, राज्य बनने  के बाद हमारी दृष्टि में या हमारे आंकलन में छत्त्ीसगढ़ के प्राय: सभी शहरों में पूर्व की अपेक्षा अच्छी सफाई व्यवस्था है किन्तु यह आंकलन राष्ट्रीय स्तर  पर  खरा  नहीं उतर रहा है, अब एक त्वरित व दीर्घकालीन  महत्वाकांक्षी स्वच्छता अभियान की जरूरत है, जिसमें भूमिगत नाली, वेस्ट मेनेजमेंट और आधुनिकतम मशीनों की मदद से शहरों की सफाई के बारे में कोई निर्णय लेने  की जरूरत है. शहरों से निकलले वाले गंदे पानी और कचरे का कैसे और किस तरह से उपयोग हो,इस पर भी कोई योजना बनाने की जरूरत है।  शहरों से लाखों टन कचरा रोज निकलता है-आज की स्थिति में सब एक जगह डम्प हो जाता है उसका उपयोग बिजली बनाने, खाद बनाने में किया जा सकता है उसी प्रकार  नालियो से निकलने वाले पानी का उपयोग आसपास के गांवों में खेती व कल कारखानों के उपयोग के लायक बनाने पर भी तेजी से विचार करने की जरूरत है.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ही नहीं अब न्यायधानी बिलासपुर और आसपास के सभी बड़े शहरों और विकसित हो रहे ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छता अभियान के मामले में एक ही छत के नीचे लक्ष्य निधा्र्ररित कर लाने की जरूरत हे तभी हम गंदगी के इस कलंक को धो सकेंगे! अंत में एक महत्वपूर्ण बात यही कहा जा सकता है कि गंदगी के लिये हम सब जिम्मेदार है-हमे खुद जब तक अपनी जिम्मेदारी तय नहीं करेंगे तब तक स्वच्छता के किसी भी अभियान का कोई मायाना नहीं रह जायेगा!  महत्वपूर्ण मुद्दा अभी  स्वच्छता का है-छत्तीसगढ़ की  राजधानी रायपुर को कम से कम उसके विकास के साथ देश का नम्बर एक नहीं तो दूसरे या तीसरे दर्जे का शहर होना चाहिये था लेकिन वह देश के छठवें गंदे शहर की  श्रेणी मे शामिल हुआ-छत्तीसगढ़ में दुर्ग शहर की स्थिति रायपुर से बेहतर है कम से से कम इसी पर गर्व कर सकते हैं लेकिन अगर इसी पर संतोष कर बैठ जाये तो भी काम नहीं चलने वाला। सफाई रखने की जिम्मेदारी अकेले प्रदेश के नगर निगमों की  नहीं है हम स्वंय जब तक गंदगी के खिलाफ मोर्चा नहीं सम्हालेंगे तब तक अपने शहर को साफ नहीं रख पायेंगे.सरकार को भी शहर को गंदा करने वालों के खिलाफ महाराष्ट्र की तरह सख्त होनेा पड़ेगा जहां थूकने पर भी कठोर सजा का प्रावधान है. सार्वजनिक नलों, सड़कों पर लघुशंका करने वालों पर  भी जुर्माने व सजा का प्रावधान जरूरी है. गंदगी और सफाई पर देशव्यापी सर्वे होने के बाद हमने शहर की सफाई व्यवस्था का जायजा लिया तो यह बात सामने आई कि पूर्व के वर्षो की अपेक्षा शहर की सड़कों व नालियों की सफाई व्यवस्था अच्छी व दुरूस्त है सफाई कर्मचारी व उनको देखने वाला ऊपरी अमला सतत निगरानी रख रहा है लेकिन जो लोग शहर को गंदा करने के आदी हैं उनके व्यवहार में किसी प्रकार का परिवर्र्तन नहीं आया ढाक के तीन पात वाली कहावत पर वे आज भी कायम है. घर के सामने कहीं भी कचरा फैला देने, कहीं भी थूक देने ओर कहीं भी खड़े होकर लघुशंका करने से लोग बाज नहीं आये हैं.शायद यही कारण है कि स्वच्छता के मामले में देश के दस लाख की आबादी के उऊपर वाले  53 शहरों व 22 राजधानियों के सर्वे में छत्तीसगढ़ की राजधानी का नम्बर 68वें स्थान पर आया है जबकि देश के गंदे शहरों में राजधानी छठवें क्रम पर है. उड़ीसा जैसे राज्य में उसकी राजधानी स्वच्छता के मामले में पिछले रिकार्ड 32 के रिकार्ड को कम कर चौबीसवे पायदान पर पहुंच सकता है तो आज की स्थिाति में छत्तीसगढ़ के शहरों के पिछडऩे का कोई कारण नहीं बनता बस हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है. जब हम अपने घर को साफ रख सकते हैं तो ऐसा कोई दूसरा कारण नहीं  है कि हम चाहेेंंगे तो अपना शहर भी सुधरे-स्वंय साफ रखे और बाहर से आने वाले हमारी सड़कों नालियों को गंदा करते हैं तो उन्हें भी समझायें. सरकारी स्थर पर भी यह पहल जरूरी है कि वह शहरों को प्रदूषित करने वाले संस्थानों पर लगाम लगाये.

छत्तीसगढ़ में कमीशनखोरी,भ्रष्टाचार पर रोक की एक पहल...



छत्तीसगढ़ में कमीशनखोरी,भ्रष्टाचार पर रोक की एक पहल...
 ऐसा लगता है कि सरकार को यह बात अब समझ आने लगी है कि उसके अफसर और कर्मचारी क्यों मालामाल  होते जा रहे हैंं। कम से कम हाल ही जारी एक आदेश से तो यही लगता है कि विभाग को वह सिरा मिल गया है जहां से भ्रष्टाचार की शुरूआत होती है-वास्तविकता यही है कि भ्रष्टाचार के कई कारणों में से एक यह भी है कि विभागों के लिये निर्माण हेतु वस्तुओं व उपकरणों की बाजार से खरीदी होती है उसकी खरीदी आउट वे जाकर बाजार से हाती है जबकि  अधिकाशं  वस्तुएं सरकार के केन्द्रीय भंडारगृह में मौजूद रहती है जो सरकार स्वंय गुणवत्ता व का  वाजिब दाम के आधार पर सीधे  कंपनी से खरीदती है इसके बावजूद विभाग के लोग इसकी खरीदी ठेकेदारों के  मार्फत या  स्वंय होकर बाजार से करते हैं इससे अधिकारियों-ठेकेदारों की तो जेब भर जाती है लेकिन सरकार के खजाने और जनता की जेब पर डाका पड़ता है.नये आदेश के अनुसार अब प्रदेश में कम से कम नगरी निकायों के लोग तो बाजार से सामान नहीं खरीद सकेंगे उन्हें केन्द्रीय भंडारण की शरण में जाना पड़ेगा-राज्य सरकार इस पहल से प्रदेश के नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगा सकेगा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन नगरीय प्रशासन के उस आदेश से संभावना बलवती हुई है कि ऐसा करके भ्रष्टाचार पर अंकुश की एक सीढ़ी तो पार ही कर लेगा.नये आदेश में कहा गया है कि विभाग में सप्लाई होने वाली समस्त सामग्री व उपकरण केन्द्रीय भंडारण से ही खरीदे जाये। बिजली की बचत करने के उद्देश्य से नगरीय निकायों के लिए एलईडी के तमाम् तरह के प्रोडक्ट की सप्लाई की जा रही है। इसमें एलईडी के छोटे बल्ब से लेकर हाईमास्क एलईडी बल्ब की भी सप्लाई की जा रही है, जो मार्केट के दर से कम और गुणवत्तायुक्त हैं। अब नगरीय निकाय के बिजली विभागों में केन्द्रीय भण्डार से ही उक्त लाइट की खरीदी होगी।.सरकारी आदेशानुसार निकायों को सरकार द्वारा अपने गोदाम मे भरकर रखे गये उन  वस्तुओं की खरीदी करनी होगी जो अब तक बाजार से खरीदी जाती रही है  सरकार के केन्द्रीय भण्डार की सूची में सीमेंट, छड़, डामर, पेंट, सफाई सामग्री सहित करीब दो सौ समान है। सूची में सामान की गुणवत्ता/क्वालिटी, दर एवं संख्या निर्धारित कर दी गई है। इससे अब हम समझ सकते हैं कि विभागीय अफसर व ठेकेदारों को उसी दर पर ही सामग्री की खरीदनी करनी पड़ेगी जो दर सरकार द्वारा तय है। विभागीय अधिकारी व कर्मचारी मनमानी पूर्वक कहीं से  भी  बिना क्वालिटी या सही दाम का पता लगाये बगेैर लीपापोती करने के लिये सामान खरीद कर लाते रहे हैं। फिलहाल यह आदेश नगरी निकाय के लिये दिखता है किन्तु सरकार को चाहिये कि वह अपने सभी विभागो में वस्तुओं की खरीदी के मामले में इसी नियम की शुरूआत करें ताकि भ्रष्टाचार पर जमीनी तौर पर अंकुश लग सके।



भिलाई के नेवई में यह कैसा विश्वास?





हममे एक बहुत बुरी आदत है या कहे हमारा स्वभाव ही कुछ ऐसा हो गया है कि हम किसी पर भी बहुत जल्द विश्वास कर लेते हैं और उसके झांसे में आकर अपना बहुत कुछ खो देते हैं. छत्तीसगढ़ में तो यह एक आम बात हो गई है कि हम कभी चिंट फंड वालों के चक्कर में पड़ जाते हैं तो कभी किसी  तांत्रिक  के तो बेगा के! कोई हमें लालच देकर सोना-चांदी दुगना कर रफा हो जाता है तो कभी आंखों के सामने ही सारा माल लूट लेता है। आखिर कब तक हम ऐसे स्वार्थ सिद्व करने वाले झूठे फरेबियों के चक्कर में फंसते रहेंगे? छत्तीसगढ़ में यह सिलसिला अन्य राज्यों के मुकाबले पिछले कई वर्षो से चल रहा है लेकिन इसका कोई समाधान निकलने की जगह यह मसला ओैर ज्वलंत होता जा रहा हैं.टोनही टोटका को रोकने के लिये हाल के वर्षो में सरकार की तरफ से प्रयास जरूर हुए हैं किन्तु इसपर पूर्ण रूप से काबू नहीं पाया जा सका है. इसका प्रमुख  कारण जो हम देखते हैं वह है अशिक्षा,अज्ञानता और ऐसे लोगों के खिलाफ प्रचार प्रसार की कमी। किसी की बातों पर  तत्काल विश्वास करने की हमारी मानसिकता के चलते यह समस्या एक विकराल रूप में मौजूद है-अब राजधानी रायपुर के निकट भिलाई के ग्राम नेवई का उदाहरण ले- यहां  तंत्र मंत्र के नाम पर दो बहने रेप का शिकार हो गई। दोनों बहनों का कहना है कि उन्हें घटना का पता तब चला जब आधे घंटे बाद होश आया। बताया यह जा रहा है कि तांत्रिक ने दोनों बहनों को खुले मैदान में नशीला पदार्थ खिलाकर रेप किया और फरार हो गया। पुलिस को अभी आरोपी नहीं मिले हैं। ऐसे कितने ही मामले हैं जो अचानक एक बड़े हादसे के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और हम असावधानी ओैैर लापरवाही के कारण जिंदगीभर हाथ मलते रह जाते हैंं।कुछ दिन पूर्व छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े चिकित्सालय डा.अम्बेडकर अस्पताल से एक नवजात शिशु को कोई महिला आसानी से सबके सामने उठाकर ले गई ओर मां बाप हाथ मलते रह गये. यहां लालच काम कर गया. ऐसे ही कई मामले हैं जो समाज को सिर्फ इसलिये भटका रहा हैं चूंकि एक बड़ा वर्ग अज्ञानता अंधविश्वास और तुरंत किसी पर भरोसा कर लेने के भंवरजाल में फंसा है। भिलाई के नेवई थाने के तहत जो घटना हुई उसमें दुुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि इस तरह के हादसे होने  में परिवार के लोगों का किसी के प्रति अकूट भरोसा काफी हद तक है. ऐसे  लोगों को जाने बगैर उन्हें परिवार में  बेरोकटोक आने-जाने की  छूट देना व परिवार के साथ  समय बिताते समय लापरवाही बरतना भी इन घटनाओं को घटित होने देने का एक प्रमुख कारण माना जा सकता है. भिलाई की कथित घटना  मे आरोपी  तांत्रिक को इतनी छूट देकर रखा गया था कि वह दिनभर उन्हीं के घर रहता था। उसने पहले दोनों बहनों पिता का विश्वास अर्जित किया, परिवार से घुलमिल गया तथा  समय-समय पर उनका  काम भी करके दिया । घटना के दिन भी उसने घटना को तरीके से अपने मकसद को अंजाम  दिया-युवतियों के पिता  की अनुमति से ही तांत्रिक दोनों बहनों को यह कहकर अपने साथ ले गया कि कुछ तांत्रिक क्रिया करनी है, वह लड़कियों को अपने साथ ले जा रहा है.जबकि ऐसी घटनाएं कुछ समय पूर्व इस गांव के आसपास हो चुकी है यह सब जानते हुए भी लोगों को ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जाना नसमझी नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?  नेवई गांव से जुड़ी यह दूसरी बड़ी घटना है। पहली घटना पांच साल पहले हुई थी  जिसमें तांत्रिक ईश्वरी यादव ने दो बच्चे की बलि दी थी। उसने जब दूसरे बच्चे की बलि दी तो इसका खुलासा हुआ कि तीन माह पहले उसने सात साल की बच्ची की भी बलि दी थी।  इस मामले में ईश्वरी, उसकी पत्नी किरण यादव सहित पांच अन्य लोगों को फांसी की सजा मिली लेकिन यह संदेश अब तक आम लोगों तक पहुंच जाना चाहिये था कि ऐसे लोगों से  दूर रहो।  कानून, अदालत सब अपना काम बखूबी  निभा रहे हैं लेकिन इसका परिणाम जो निकलना चाहिये वह नहीं निकल पा रहा है शायद यही कारण है कि ऐसी घटनाएं  कठोर कानून के चलते भी रूकने का नाम नहीं ले  रही है.





इतनी पुलिस! फिर भी आम आदमी सुरक्षित क्यों नहीं?


इतनी पुलिस! फिर भी आम आदमी सुरक्षित क्यों नहीं?
वेलेंटाइन डे पर महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से राजधानी में छै सौ जवानों की तैनाती का क्या औचित्य था जबकि उसकी नाक के नीचे सिर्फ दो लुटेरों ने सरे राह एक महिला के गले से सोने की चैन खींच ली और हमारी प्रदेश की पुलिस बस मोटर सायकिले रोकती रही...! छत्तीसगंढ़ के शहरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा जिसमें राजधानी रायपुर, न्यायधानी बिलासपुर, दुर्ग, शामिल है इन दिनों खास किस्म की परेशानी से जूझ रहा है। महिलाएं सोना पहनकर सडक पर निकलने में डर रही है. इस साल जनवरी से लेकर अब तक महिलाओं के गले से सोने की चैन  खीचकर भागने की करीब एक दर्जन घटनाएं हो चुकी है.पच्चीस जनवरी की दोपहर सवा बारह बजे समता कालोनी में पहली लूट की घटना दर्ज की इसमे एक महिला कल्पना तिवारी को लूट लिया गया. इसके बाद लगातार घटनाओं का सिलसिला जारी रहा और शनिवार तथा रविवार के बीच  मात्र सोलह घंटे  से भीे कम समय में लुटेरों ने सर्वोदय नगर हीरापुर कालोनी की निर्मला राजू को एम्स के पास सडक पर अपना शिकार बनाया जिसमें कीमती सोने का हार उन्हें घायल कर खीचकर ले गये.दूसरी और राजधानी तथा आसपास के शहरों में  घरों के बाहर खड़ी वाहनों को आग लगाने का सिलसिला पिछले कम से कम दो साल से चल रहा है लेकिन हाल ही इसने फिर जोर पकड़ लिया. फायर गेंग की  सक्रियता  ने लोगों की नींद खराब कर रखी है.पुलिस के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं .रायपुर और भिलाई नगर में तो एक सप्ताह के भीतर वाहनों में आगजनी की दो वारदतों में एक दर्जन से ज्यादा कीमती वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. इस मामले में भी अब तक किसी अपराधी को पुलिस शिकंजे में नहीं ले सकी है. दोनों ही तरह के मामले  अपने आप में गंभीर है जो लोगों में भय पैदा कर रहा है और  पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है. अब तक हुई चेन स्नेचिंग की दर्जनों घटनाओं की  तरह पुलिस को रविवार सवेरे हुई वारदात में भी  बस इतना ही क्लू मिला है कि काली बाइक में सवार दो युवकों ने घटना को अंजाम दिया। दोनों युवक हेलमेट लगाये हुए थे.प्राय: हर घटना के बाद घंटों सड़कों पर पुलिस सड़क पर खड़ी रहती है ओर आने वालों की  जांच करती है फिर सबकुछ खत्म कर अगली  वारदात का इंतजार करती है। राजधानी रायपुर में 25,जनवरी  को जहां चेन  पुलिंग की तीन वारदात हुई वहीं 27 जनवरी को तीन  वारदात हुई। 28 जनवरी को दुर्ग में एक महिला का चेन पार किया गया.26 जनवरी को जब भिलाई में वारदात हुई उसी दिन पडौसी राज्य महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में भी ऐसी ही वारदात हुई। पुलिस का अंदाज है कि नागपुर का कोई गेंग सक्रिय है लेकिन किसी  की भी  गिरफतारी न होना तो यही दर्शाता है कि अपराधी पुलिस   व जनता दोनों से तेज तर्रार है जो वारदात पे वारदात करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसमें दो मत नहीं कि घटना के तुरन्त बाद पुलिस की सक्रियता काबिले तारीफ हैं लेकिन इस सक्रियता पर ग्रहण उस समय लग जाता है जब खोजबीन में कुछ हाथ नहीं लगता. रायपुर के पुलिस अधीक्षक ने शनिवार को एक पत्र में दावा किया था कि लूट की सभी घटनाओं की जांच के लिये क्राइम ब्रांच  की टीम बनाई गई  है-उनका यह भी कहना है कि सभी शहरों के सीसीटीवी  फुटेज के आधार पर अपराधियों की गिरेबान पर शीघ्र हाथ डाला  जायेगा लेकिन उनकी इस घोषणा के बाद ही दूसरे दिन रविवार को राजधानी में सुबह दिनदहाड़े निर्मला राजू के गले से चैन  खीचने की घटना को अपराधियों की तरफ से पुलिस को चुनौती  नहीं तो और क्या समझे?