सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नोट बंदी- ससंद बदी के बाद अब बजट व उत्तर प्रदेश में दाव पेच!

नोट बंदी- ससंद बदी के बाद अब बजट व उत्तर प्रदेश में दाव पेच!
नोटबंदी से अब सब उकता गये हैं,कुछ नया हो जाये,हां बजट की बात की जाये तो इस बार सबका इंतजार उसी पर रहेगा.नोटबंदी-संसद बंदी के बाद जो नया होने वाला है उसमे यूपी का चुनाव और बजट ही है. ऐसी खबरें मिल रही है कि इस बार संभवत: एक फरवरी को पेश होने वाले बजट में सरकार बहुत कुछ करना चाहेगी जिससे नोटबंदी से नाराज जनता खुश भी हो जाये और उत्तर प्रदेश का सिंहासन भी सपा से छीन ले. सरकार इंकम टैक्स में छूट दे सकती है. चार लाख रूपये तक की आमदनी टैकस फ्री हो सकती है.टैक्स स्लेब में भी बदलाव की आशा की जा सकती है.उत्तर प्रदेश की तरफ नजर दौड़ायें तो वहां प्रधानमंत्री पहुुंच गये हैं तो राहुल गांधी भी पूरी तरह सक्रिय हैं. नोटबंदी को तो उन्होंने मुद्दा ही बना लिया. वास्तविकता यही है कि पूरा देश इस समय नोट बंदी और संसद बंदी के चक्कर में है. हो सकता है फरवरीं में यूपी विधानसभा के चुनाव हो जायें, यहां भारतीय जनता पार्टी राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी, के साथ बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समान दावेदारी के साथ सक्रिय है. सपा-कांग्रेस के बीच    गठबंधन की अटकले भी  है. दो साल पहले राज्य में भाजपा को काफी फायदा मिलता दिखा था, जहां इसने 2014 के संसदीय चुनाव में भारी जीत हासिल की थी परन्तु अब हालात बदल चुके है,नोटबंदी अकेला इसका कारण नहीं है. फरवरी में अगर विधानसभा चुनाव होते हैं, तो इसकी घोषणा जनवरी की शुरुआत में कभी भी हो सकती है, इसके तुरंत बाद  आचार संहिता लागू हो जाएगी, जो केंद्र या राज्य सरकार को कोई भी लोक-लुभावन कदम उठाने से रोक देगी.भाजपा को छोड़ अन्य पार्टियों के लिये जनवरी की शुरूआत में चुनाव की घोषणा फायदेमंद नहीं होगी चूंकि आचार संहिता में केंद्रीय बजट जारी करने पर लागू होने की संभावना नहीं है इसका फायदा केन्द्रीय बजट में भाजपा की उत्तर प्रदेश की जनता को लुभाने वाली घोषणाएं हो सकती है. भाजपा के भीतर इस बात को लेकर कशमकश है कि नोटबंदी पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है.आरएसएस और भाजपा की स्थानीय  इकाइयां पहले ही केन्द्र को इससे अवगत भी करा चुकी हैं. इस हालात में भाजपा के पास विकल्प यूपी फतह का श्ुारूआती तौर पर मौका तो केन्द्रीय बजट ही दिखता है.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत छबि भी कुछ खेल यूपी में खेल सकती है. शीतकालीन सत्र पूरी तरह कामविहीन चले जाने व जीएसटी सेवा कर को लागू करने की समय-सीमा टलने के खतरे को देखते हुए भी सरकार जनवरी के दूसरे सप्ताह से संसद का बजट सत्र बुला सकती है. इस बार आम व रेल बजट दोनो  एक साथ  पेश किया जाएगा. नोटबंदी को लेकर अब कुछ नकारात्मक स्वर उठने लगे हैं जबकि ज्यादातर लोग  मुश्किलों को झेलने की मानसिकता मे आ गये  हैं, क्योंकि वे इसे  प्रधानमंत्री द्वारा नेक नीयती के साथ उठाया गया कदम मानते हैं मगर इस नोटबंदी के कारण कुछ खामोश जिंदगियां भी है जो इससे अपने आपको बुरी तरह प्रभावित मानती हैं ऐसे लोग क्या असर डालेंगे कोई इसका अनुमान नहीं लगा सकता.चूंकि देश में  मौन चुनाव हमेशा नया ही कुछ करता रहा है.कारोबारियों का समूह जो पहले एक मतेन था अब उसमें भी बिखराव आ गया है. पेट की मार को बर्दाश्त करने  के लिये कोई तैयार नहीं. ऐसे में यूपी में किस्मत आजमाने अन्य दलों के साथ जुटी केन्द्र की सत्तारूढ पार्टी को उत्तर प्रदेश का चुनाव मुलायम परिवार या मायावती की पार्टी के सामने चूनौतियों का एक पहाड़ है. ऐसे में कारोबारियों को खुश करने के लिये केन्द्र सरकार जीएसटी को सर्वसम्मति से अंतिम रूप देने के लिए जनवरी में अपनी हरसंभव कोशिश करेगी. उत्तर प्रदेश का चुनाव वास्तव में  देश के अन्य राज्यों के लोगों के लिये भी फायदेमंद साबित हो सकता है चूंकि सराकर नोट बंदी से आहत लोगों को खुश करने के लिये टैक्स में कटौती की  घोषणा बजट में कर सकती है. कांग्रेस विशेषकर राहुल गांधी का सारा फोकस किसानों पर है ऐसे में केन्द्र सरकार बजट में कृषि क्षेत्र के लिए पैकेज की घोषणा कर सकती है. रेल बजट को इस बार केंद्रीय बजट में ही शामिल किया जा रहा है, लिहाजा इसमें स्वाभाविक तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा जोर दिया जा सकता है.



रविवार, 18 दिसंबर 2016

कानून बदला किन्तु लोग नहीं बदले!


इंटरनेट पर पोर्न साइट देखते हैदराबाद के पैसठ बच्चो को पकड़कर पुलिस ने उनके पालकों के सिपुर्द किया. यह उस दिन से एक दिन पहले की बात है जब दिल्ली के निर्भया कांड ने चार साल पूरे किये.इसी   दिन चार वर्ष पूर्व निर्भया बलात्कार और निर्मम हत्याकांड ने पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया था ,इसी बर्सी के दिन दिल्ली में नोएड़ा से साक्षात्कार के लिये पहुंची एक बीस साल की लड़की को लिफट देने के बहाने कार में चढाया और उसके साथ रेप किया. कार में ग्रह मंत्रालय की स्लिप लगी थी. इसी दिन अर्थात निर्भया रेप कांड के चार साल होने के दिन ही झारखंड की राजधानी रांची में इंजीनियरिंग कालेज की उन्नीस वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया तथा उसकी गला घोटकर हत्या कर दी गई तथा उसके शव को जलाने का प्रयास किया गया. निर्भया के बाद कानून में बहुत कुछ बदला होगा लेकिन समाज कतई नहीं बदला ,राजधानी दिल्ली में हर रोज छह बलात्कार और देश के विभिन्न राज्यों में पता नहीं कितने? इन मामलों को रोकने की व्यवस्था बनाने के लिए दायर कई पीआईएल पर चार साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट को फाइनल सुनवाई का अवसर नहीं मिला. अभी कुछ माह पूर्व ही यूपी के बुलंदशहर,केरल के तिरूवन्तपुरम में भी जो $कुछ हुआ वह भी समाज में बढ़ रहे ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने कठोर कदम उठाने का संकेत दे गये लेकिन कानून को कठोर बनाने की जिम्मेदारी जिनपर है वे या तो खामोश है या आंख मीचकर बैठे हैं तथा आरोप प्रत्यारोप में लगे हैं. उत्तर प्रदेश की एक जुझारू महिला आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर की पीआईएल पर बहस में इस बात का आग्रह किया गया कि अपराध के बाद दंड देने पर जोर देने की बजाय, अपराध को रोकने की व्यवस्था की जाये. कानून की थकाऊ प्रक्रिया और सरकार द्वारा ऐसे मामलों में विलम्ब पर जवाबदेही कैसे तय की जाये अब इसपर भी बहस की आवश्यकता बन गई है.निर्भया कांड के बाद तीन माह में कानून तो कुछ कड़ा हो गया मगर उसके अपराधियों को न तो उनके असल मुकाम तक पहुंचाया गया और न ही समाज को ऐसा कोई संदेश हमारी व्यवस्था दे पाई ताकि निर्भया की तरह क्रूरता से खत्म की जा रही बच्चियों के भावी जीवन को सुरक्षित कर सकें. निर्भया के बाद उपजे सोशल मीडिया का आंदोलन इतना वृहद, तनावपूर्ण व आक्रोशित था कि उससे कानून और सरकार तो बदल गए पर चार साल बाद भी व्यवस्था जस की तस बनी हुई है जबकि इस दौरान अन्य कई मामलों में कठोर कानून बन गये किन्तु देश में सामाजिक स्तर पर उतर आई इस गंभीर समस्या पर न महिलाओ की ही तरफ से कोई ठोस पहल हुई और न हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े स्तभं की तरफ से. हां होने वाले यौन हमलों पर हर समय चिंता ही प्रकट की जाती रही जो रहरहकर उठती और शांत हो जाती, फिर  तब उठती जब किसी  की आबरू तार तार होकर इस  दुनिया से ही उठ जाती. आखिर कब तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा.? मासूम बच्चियो पर लगातार यौन हमले से  चिंतित मलयालम फिल्मो की अभिनेत्री मीरा जास्मिन ने  सलाह दी थी कि ऐसे पुरूषों को नपुसंक बना दिया जाये. ऐसा सुझाव और भी  कई तरह के सम्मानित लोगों की तरफ से आये हैं.इस दिशा में कदम उठाया जाये तो यह भी  समाज हित मे ही होगा. एक अरब बीस करोड़ की  आबादी में ऐसी विािक्षप्त मानकिसकता वालों की संख्या समाज में एक-दो प्रतिशत से भी कम है आगर इन्हें वाकई में नपुसंक बना  दिया जाये या सर्जिकल आपरेशन कर छोड़ दिया जाये तो समाज को एक कठोर संदेश ही मिलेगा दूसरी बात इतनी बड़ी आबादी और समाज पर कोई असर नहीं पडऩे वाला. हां कानून के प्रति लोगो का विश्वास बढ़ेगा. पीआईएल में छह प्रमुख मांगे शामिल हैं जिन पर भी जल्द निर्णय लिया जाना चाहिये.  देश में 31 प्रतिशत से अधिक सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि दागी हैं, जिनमें से कई के विरुद्ध रेप और अन्य गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं. कतिपय माननीयों द्वारा समाज में अपराध बढ़ाने के साथ आपराधिक लोगों को संरक्षण भी दिया जाता है. इनके विरुद्ध मुकदमों पर फास्ट ट्रैक ट्रायल से इन्हें शीघ्र दंडित करने की जरूरत है.न्याय में देरी अपराधियों को मोहलत देती है.










शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

संसद सेशन शोरगुल-हंगामे में बाईस दिन यूं ही बीत गया



मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में पार्लियामेंट के आठ सेशन हुए हैं. इस बार विंटर सेशन बाईस दिन चला लेकिन प्रोडक्टिवीटी सबसे कम रही. यह अंदेशा तो उसी समय से था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ अक्टूबर को नोटबंदी का ऐलान किया. सब कुछ शायद ठीक चलता यदि सरकार नोटबंदी से पूर्व तैयारी करके चलती. इस निर्णय को लेने के पूर्व सरकार ने शायद यह सोचा भी नहीं कि इसके रिफरकेशन उसके लिये मुसीबतें खड़ी कर देंगी. एटीएम व बैंक तक नये नोट नहीं पहुंचने से लगी लम्बी लाइन और उसमें खड़े होने वाले लोगों की मौत के सिलसिले ने विपक्ष को इतना मौका दिया कि संसद चलने ही नही दी इस बीच और भी ऐसे मामले हो गये जो विपक्ष को एक के बाद एक आक्रामक बनाने में मददगार बनते चले गये. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी  की घोषणा के बाद विदेश चले गये आौर इधर अपना पैसा वापस निकालने के लिये लोग लाइन में लगकर जूझते रहे वहीं कालाधन जमा करने वालों ने एक तरह से बैंकों पर कब्जा जमा लिया. बैंक के कतिपय अधिकारियों व कर्मचारियेां ने मिलकर ऐसी स्थिति निर्मित कर दी जिससे मार्केट में त्राही त्राही मच गई और सड़क पर लाइन में लोग धक्के खाने लगे. विपक्ष ने इसको खूब भुनाया. नोटबंदी पर हंगामे की वजह से जरूरी काम काफी कम हुआ है, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक 16 नवंबर से 9 दिसंबर के बीच लोकसभा में 15प्रतिशत तो राज्यसभा में 19 पतिशत ही प्रोडक्टिविटी रही है अर्थात औसतन 17 प्रतिशत ही कामकाज हो पाया. यह मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में लोकसभा की सबसे कम प्रोडक्टिविटी है.अपोजीशन शुरू में यह मांग करता रहा कि पीएम मोदी सदन में आये और नोटबंदी पर अपना पक्ष प्रस्तुत करें लेकिन मोदी नहीं आये जब आये तो विपक्ष दूसरेी मांगों को लेकर अड़ गया. विपक्ष ने जहां सदन का बायकाट किया वहीं राष्ट्रपति से मिलने भी पहुंंचेॅ.पंश्चिम बंगाल  की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी नोटबंदी के मामले पर ज्यादा उद्वेलित थी उनके कहने पर विपक्ष राष्ट्रपति से भी मिला लेकिन यहां भी कोई बात नहीं बनी. विपक्ष के हंगामे पर जहां वरिष्ठ राजनीतिज्ञ लालकृष्ण आड़वाणी व्यथित व क्रोधित हुए वहीं राष्ट्रपति को भी यह कहना पड़ा कि भगवान के लिये संसद को चलने दे. इस अपील का भी असर विपक्ष पर नहीं पड़ा जब नरेन्द्र मोदी सदन में पहुंचे तो विपक्ष का हल्ला फिर बढ़ गया और वे सदन से बिना बोले ही चले गये फिर जब आये तो विपक्ष का हल्ला बरकरार रहा. नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी दोनों ही यह बोलते रहे कि मुझे सदन में बोलने ही नहीं दिया जा रहा. इस बीच एक गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू के किस्से ने पूरे माहौल को नोटबंदी के साथ-साथ इस मामले को गर्म कर दिया और लोकसभा चलने की थोड़ी बहुत संभावना थी वह भी खत्म हो गई.रिजिजू मोदी सरकार के पहले मंत्री हैं जिनपर भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगा. कांग्रेस ने वोटिंग के तहत सदन में चर्चा की मांग की जबकि सरकार इस पर राजी नहीं हुआ. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर चर्चा न करने का आरोप लगाते रहे.16 नवंबर को पार्लियामेंट का विंटर सेशन शुरू हुआ था। यह आज16 दिसंबर तक चला.सेशन शुरू होने से करीब एक हफ्ते पहले ही पीएम ने नोटबंदी का एलान किया था, लिहाजा सरकार अपोजिशन के निशाने पर रहा, मंत्री किरण रिजीजू पर '50 करोड़ रुपए के अरुणाचल बिजली घोटालेÓ में शामिल होने के आरोप ने सदन की कार्रवाही को ठप्प कर दिया. इस सेशन में कई जरूरी बिल पेश होने थे लेकिन हंगामे की वजह से यह मुमकिन नहीं हो सका। सिर्फ दो ही बिल पास हो सके. इनमें एक टैक्सेशन अमेंडमेंट बिल था, दूसरा राइट्स ऑफ पर्सन्स डिसएबिलिटी बिल-2014. टैक्सेशन अमेंडमेंट बिल भी इसलिए पास हुआ, क्योंकि यह फाइनेंस बिल था, जिसे राज्यसभा से पास होना जरूरी नहीं था। संसद के इस सेशन में बाईस बैठके होनी थीं इनमें जीएसटी पर तीन बिल पास होने थे एक सेंटर का जीएसटी बिल, दूसरा इंटीग्रेटेड जीएसटी बिल और तीसरा जीएसटी से राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई तय करने वाला बिल. कुल 9 बिल पेश होने थे, इनमें सरोगेसी (रेग्युलेशन), नेवी ट्रिब्यूनल बिल-2016, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बिल, डिवोर्स अमेंडमेंट बिल-2016 और स्टेटिस्टिक्स एग्रगेशन अमेंडमेंट बिल-2016 भी शामिल थे सेशन के दौरान दो बिल पर लोकसभा में चर्चा होने के आसार थे, जो राज्यसभा से पास हो चुके हैं इन बिल्स में मेंटल हेल्थ केयर बिल-2016 और मेटरनिटी बेनीफिट्स अमेंडमेंट बिल-2016 शामिल था सरकार की  मंशा 15 नए बिल भी पेश होने की भी थी जो पेश नहीं कर सकी.



रविवार, 11 दिसंबर 2016

एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?

एक महीना लाइन में कैसे बीत गया,पता ही नही चला...?
हां यह ठीक है कि नोट बंदी के बाद का एक महीना लाइन में लगते -लगते कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. आज एक महीना बीत चुका है. नवंबर महीने की इसी आठ तारीख को केंद्र सरकार ने  पांच सौ  और हजार रूपये के नोटों का चलन बंद कर देश के हर वर्ग को चौका दिया था. नोटों का चलन  बंद होने से आम और खास सभी किस्म के लोग इसकी चपेट में आ गये. उस समय से बैंको के कामकाज में जहां अंतर आया, एटीएम के सामने अभूतपूर्व भीड़ दिखाई दी वहीं कई एटीएम जहां इस निर्णय के बाद से अब तक खुले नहीं है तो कई में कभी पैसा आता है तो खुलता है और कभी नहीं तो बंद रहता है. नोटबंदी के बाद से विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा.करीब चौरासी  लोगों की मौत का हिसाब मांगा जा रहा है तो  कारोबार बुरी तरह प्रभावित है.कई निजी संस्थानों में कर्मचारियों को महीना बीत जाने  के बाद भी  सेलरी नहीं मिली है.यह सही है कि नोटबंदी ने देश को कैशलेस लेनदेन की ओर एक कदम आगे बढ़ा दिया.एक महीना बीतने के बाद हर कोई इस पूरे एपीसोड़ को तराजू पर तौलता दिखाई दे रहा है..नोटबंदी की घोषणा के बाद देश की 86 प्रतिशत नगदी रातों-रात यूं रद्दी हो जाने से पूंजीपति से लेकर आम इंसान भी प्रभावित हुआ जबकि  सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से लोगों के रहन-सहन, खर्चो में बदलाव आएगा और वह नगदी पर कम आश्रित होंगे.कालाधन बाहर निकलने का दावा सरकारी रिकार्ड पर बहुत अच्छा लग रहा हैं लेकिन जो धन पकड़ा जा रहा है उसमें नये दो हजार, पांच सौ और सौ रूपये के नोट देखकर सभी आश्चर्य चकित हैं. सवाल यह है कि कालाधन है तो उसमें वर्तमान में जारी नये नोट कैसे शामिल हो गये?असल में सरकार की प्लानिंग में कु छ ऐसा छेद रह गया जिसका कालाधन रखने वालों ने खूब उपयोग किया. बंद किये नये नोटों को बदलने में दी गई छूट ने ऐसा मौका कालाबाजारियों को दिया कि सरकार  के गुप्त खेल का पासा ही पलट गया. जो पैसा जनता के हाथ में आना था वह लौटकर फिर कालाबजाारियों के हाथ पहुंच गया.पांच सौ और हजार रूपये हटाने के बाद सरकार कह रही है कि इसके बाद हमारा देश सोने की तरह चमकेगा.ब्याजदर  कम करने के दावे पर आरबीआई ने पानी फेर दिया. कई लोगों ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाया मगर यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इससे क्या फायदा होगा? इंडिया सेंट्रल प्रोग्राम ऑफ द इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर के निदेशक प्रणव सेन ने एक वेबसाइट आइडियास फॉर इंडिया में लिखा है कि विमुद्रीकरण से समूचा असंगठित क्षेत्र स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है.ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने  कहा है कि निरंकुश कार्रवाई जैसी है और सरकार की अधिनायकवाद प्रवृति का खुलासा करती है. अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव  सरकार के नोटबंदी के कदम की सहराना करते हैं-कहते हैं कम अवधि में नोटबंदी विकास को चोट पहुंचा सकती है लेकिन लंबे समय में इसका असर ज्यादा फायदेमंद होगा. मुख्य वैश्विक रणनीतिकार रुचिर शर्मा ने कहा है कि बड़े बिल समाप्त होने से आज कुछ छिपा धन नष्ट हो सकता है लेकिन संस्कृति और संस्थाओं में गहरे परिवर्तन के अभाव की वजह से कल इस काली अर्थव्यवस्था का पुनर्जन्म होगा.नोटबंदी के लंबी अवधि के फायदे  बाद में आएंगे लेकिन नोटबंदी के ठीक बाद हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण कैशलैस लेनदेन रहा.नोटबंदी के ठीक बाद देश के उन पढ़े-लिखे लोगों के बीच क्रेडिट-डेबिट और पेटीएम जैसे माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ गया, जो इनका कम ही इस्तेमाल करते थे या फिर बिल्कुल नहीं करते थे. बावजूद इसके कि वो कैशलेस लेनदेन के लिए पूरी तरह सक्षम हैं और उनको इसके बड़े फायदे भी मालूम हैं.देश की अर्थव्यवस्था में 50 फीसदी से अधिक का योगदान करने वाले असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के लोग जिनकी आबादी में हिस्सा 80 फीसदी है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है.देश में ई-कॉमर्स का विस्तार सालाना 51 फीसदी की दर से हो रहा है. वहीं, नोटबंदी के बाद छोटे-बड़े सभी लोगों के बीच दूध, सब्जी, अंडे और मोबाइल रिचार्ज जैसे कामों के लिए कैशलैस भुगतान का इस्तेमाल बढ़ा. नोटबंदी के बाद बैंकों और एटीएम पर उमड़ी भीड़ ने नोटबंदी की तैयारी पर सवालिया निशान उठाए हैं वहीं नोटों को बदलने व निकालने की सीमा, बैंकों में उमड़ी भीड़ और एटीएम की अधूरी व्यवस्थाओं ने लोगों को दात पीसने पर मजबूर कर दिया. एक मजदूर ने 2000 रुपये के नोट का खुला न मिल पाने के कारण आत्महत्या की कोशिश तक कर डाली.सरकार के इस फैसले का लोगों में हालांकि बढ़-चढ़ कर समर्थन किया जबकि कई लोग इस बात से खुश दिखे कि जिसके पास बड़ी संख्या में काला धन है उनके नोट पूरी तरह से रद्दी हो जाएंगे.


...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!



...और आडवाणी से भी रहा नहीं गया!
अब तक ससंद की कार्रवाही को शांतिपूर्वक देख सुन रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से बुधवार को रहा नहीं गया. उन्होनें लोकसभा के अफसर से पूछ ही लिया कि बैठक कब तक के लिये स्थगित की गई है? उन्हें बताया कि दो बजे तक तो गुस्से में कह ही दिया कि अनिश्चितकाल के लिये क्यों नहीं? तीन हफ्ते बीत गए ससंद के शीतकालीन सत्र के किन्तु अब तक कार्यवाही सामान्य नहीं हो पाई है   नोटबंदी के मसले पर उठा विवाद गुरूवार को  शांत होने की संभावना बन गई थी लेकिन विपक्षी दलों के धरने और आरबीआई की नोटबंदी पर आई रिपोर्टो ने सरकार की मुसीबते और बढ़ा दी.  विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि प्रधानमंत्री सदन में इस मसले पर जवाब दें, दूसरी ओर सत्ता पक्ष चर्चा पर जोर दे रहा है देश की स्थिति और उसमें संसद की भूमिका को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्थिति पर चिंतित हो सकता है. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के क्षोभ को समझा जा सकता है उन्होंने सदन न चल पाने के लिए न केवल संसदीय कार्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष पर भी अंगुली उठाई. निश्चित रूप से यह पिछले कई दिनों से लगातार चल रहे हंगामे के बीच सब कुछ देखने-समझने के बाद की प्रतिक्रिया है. लोकसभा राज्य सभा में मंत्रिगण व नेता मामले को किसी तरह सुलझाने की जगह ताल ठोक रहे हैं. राजनीति के क्षितिज पर लालकृष्ण आडवाणी के अनुभव और कद के मद्देनजर उनकी बातों को हल्के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए उनकी ताजा टिप्पणी को किसी एक दल या पक्ष पर उठाई गई अंगुली के तौर पर भी नहीं देखा जा सकता, उन्होंने अगर विपक्ष के हंगामे से सहमति नहीं जताई है, तो सत्ता पक्ष को भी सदन बाधित करने का जिम्मेदार ठहराया है. जब संसद की कार्यवाही बाधित होती है, तो आमतौर पर केवल विपक्षी दलों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है मगर इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि विपक्षी दलों के किसी बात पर अडऩे के पीछे कारण क्या हैं और सदन को बाधित करने के लिए सत्ता पक्ष की भी कोई जवाबदेही बनती है या नहीं! आडवाणीजी के बाद अब महामहिम राष्ट्रपति ने भी कह दिया है कि भगवान के नाम पर सदन चलने दिया जाये.देखें क्या होता है बहरहाल नोटबंदी की अचानक घोषणा के बाद से समूचे देश में जो संकट खड़ा हुआ है उसके लगातार गहराते जाने के मद्देनजर विपक्ष की इस मांग को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री इस मसले पर सदन में बयान दें  इस मांग के पीछे आधार यह हो सकता है कि जब मुद्रा से संबंधित नीतिगत फैसले की घोषणा करना पारंपरिक रूप से रिजर्व बैंक का काम माना जाता रहा है, तो प्रधानमंत्री के स्तर से यह निर्णय और इसकी घोषणा होने की नौबत क्यों आई! प्रधानमंत्री ने यह कहकर विपक्ष को और उत्तेजित कर दिया कि विपक्ष बहस नहीं होने दे रहा उसे एक्सपोस करें.नोटबंदी को साहसिक कदम मानते हुए भी लोग परेशान है तथा  देश भर में एक तरह से आर्थिक अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है अपना पैसे बैंक में जमा होने के बावजूद लोग थोड़े पैसे के लिए भी भटकने पर मजबूर हैं और इसी वजह से अब तक लगभग सौ लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं. लोगों के पास नगदी न होने के चलते समूचे बाजार का कारोबार गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. ऐसी स्थिति में यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना तैयारी के नोटबंदी के फैसले को अचानक लागू करने के बाद पैदा हालात से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है! आर्थिक अराजकता की स्थिति को लोग महसूस करने लगे है लेकिन फिर भी भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन पर काबू पाने की बात से कोई भी असहमत नहीं है लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, उसमें जरूरत इस बात की है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिल कर रोज गहराते संकट का कोई हल निकालें.संसद में हंगामे की  वजह से कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिये जा सके .कई बिल लटके पड़े हैं. 

डिजिटल तो हम हो गये लेकिन चुनौतियां भी तो कम नहीं!


डिजिटल तो हम हो गये लेकिन चुनौतियां भी तो कम नहीं!
अगस्त 2014 में नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल ने डिजिटल इंडिया का फैसला कर लिया था, करीब एक साल की गहन तैयारी के बाद जुलाई 2015 में इसे धूमधाम के साथ लांच किया गया. देश में आज भी नेटवर्क इतना स्लो है कि हमारा स्थान दुनिया में 115 वां हैं ऐसी परिस्थिति में यह हमारी पहली चुनौती है कि हम अपने इंटरनेट नेटवर्क को इतना फास्ट करें कि डिजिटल इंडिया का सपना साकार हो. जाहिर है सरकार एक दिन में इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकती मगर सरकार डिजिटल इंडिया के लिये कटिबंद्व है.देश में नब्बे करोड़ से ज्यादा लोगों के पास फोन हैं जिसमें से मात्र 14 करोड़ लोगों के पास ही स्मार्ट फोन है. स्मार्ट फोन और गैर स्मार्ट फोन को लेकर भी अमीर- गरीब की तरह बांटकर देखा जा सकता हैं,जिनके पास स्मार्ट फोन हैं उनमें से बहुत से लोग साधारण हैं जिसके आधार पर उम्मीद की जा सकती हैं कि उन लोगों को इंटरनेट मिलने भर की देर है.भले ही नोटबंदी के बाद देश के सारे एटीएम के बाहर लम्बी -लम्बी कतारे लगी है लोग पैसा जल्दी  लेने के लिये लड़ रहे कट रहे हैं और कुचलर भी मर रहे हैंं ओर तो ओर पैसा नही मिलने के कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं मगर केशलेस डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को गति मिली है सरकार की मंशा है कि डिजिटल इंडिया के मार्फ़त लोगों को रोजमर्रा की सहूलियतें दिलाई जाए
लेकिन डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के अंदर होने वाली बाते पहले भी हो रही थी- यह उन लोगों तक सीमित था जो कम्पयूटर से लेकर फोन तक चलाने में एक्सपर्ट थे -अब सरकार इसमें बदलाव लाने की कोशिश कर रही है उन लोगों को पहले ट्रेडं करना होगा जो मोबाइल रखते तो है किन्तु उसे सही ढंग से यूस नहीं कर पाते उन्हें भी जिन्हें मोबाइल में सिर्फ नम्बर मिलाना और काल अटेड़ करना ही आता है. एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश में आधार कार्ड की तरह अब आम लोगों को डिजिटल बनाना होगा. क्या यह इतना आसान है? नई पीढ़ी की बात हम नहीं  करते लेकिन पुरानी पीढ़ी का एक वर्ग आज भी  ऐसा है जो मोबाइल से पहले  शुरू हुए कम्पयूटर के माउस को तक हिला नहीं सकता ऐसे में इतनी बड़ी आबादी  को डिजिटल करना बहुत बड़ी चुनौती है. नरेन्द्र मोदी मे आत्मविश्वास है मगर यह उनसे ज्यादा उनकी टीम को व नौकरशाहों में लाना है.साथ ही  जनता का सहयोग भी जरूरी है लाइन में थक चुकी जनता को ही सरकार  ने यह  चुनौती दी है,यह कहकर कि तुम आगे बढो, हम तुम्हारे पीछे हैं. दूसरी ओर सरकार का पहला लक्ष्य होना चाहिये -ब्रॉडबैंड हाइवे. इसके तहत देश के आखरी छोर तक हर  घर में ब्रॉडबैंड के ज़रिए इंटरनेट पहुंचाना होगा.डिजिटल इंडिया और कैशलेस सिस्टम के लिये यह जरूरी  है कि सबके पास फोन की उपलब्धता हो जिसके लिए ज़रूरी है कि लोगों के पास फ़ोन खरीदने की क्षमता हो. आज कंपनियां सस्ते फोन लेकर आ गई है लेकिन इसे भी  खरीदने की क्षमता नहीं होने वाले लोग भी  देश में मौजूद हैं.हर किसी के लिए इंटरनेट अच्छी बात है. इसके लिए पूर्व में स्थापित पीसीओ की तर्ज पर पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्वाइंट बनाए जा सकते हैं. ये पीसीओ आसानी से समस्या हल कर सकते हैं, लेकिन हर पंचायत के स्तर पर इसको लगाना और चलाना भी कोई आसान काम नहीं है. इधर ई-गवर्नेंस. के मामले में हमने  कुछ प्रगति जरूर कर है लेकिन  सरकारी कामकाज में डिजीटल की घुसपैठ अब भी शतप्रतिशत नहीं  है.हर सेवा को इंटरनेट से जोडऩे का.लक्ष्य रखकर आगे बढऩे की  जरूरत  है. इसे लागू करने का पिछला अनुभव बताता है कि दफ्तर डिजिटल होने के बाद भी उनमें काम करने वाले लोग डिजिटल नहीं हो पा रहे हैं. इसका तोड़ निकालने का कोई नया तरीका ढूंढने की जरूरत है. सरकार की मंशा इंटरनेट के ज़रिए विकास गांव-गांव तक पहुंचाने की होना चाहिये.केशलेस सिस्टम ओर नई व्यापारिक अथवा आर्थिक क्रांति के लिए जरूरी है कि हमारा दिमाग, हमारी सोच, हमारा प्रशिक्षण और उपकरण सब कुछ डिजिटल हो.अगर हमने सरकार के ढांचे को इंटरनेट से नहीं जोड़ा तो फिर इसके तहत डिलीवरी कैसे करेंगे?और अगर कर भी दी, तो सही में इसका फायदा लोगों तक नहीं पहुंचता है. इसमें बड़ी धांधली होती है.दुकानों व्यापारिक संस्थानों  में चलने वाली स्वाइप मशीन के लिये चौबीस घंटे इंटरनेट सर्वर का काम करना जरूरी है चूंकि पूरी व्यवस्था इसी से जुड़ी है. अगर डेबिट, रूपे कार्ड हाथ में लेकर चले और व्यापारी तथा बैेक से लिंक न जुड़े तो कैसे चलेगा.जेब में डेबिट कार्ड के साथ में बिना अवरोध के चलने वाला एक अच्छा इंटरनेट सिस्टम में जरूरी है जो फि लहाल देश में नहीं है.



सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

नन्हीं बच्चियों की चीख .... कानून कब तक यूं अंधा बहरा बना रहेगा?



इज्जत किसे प्यारी नहीं होती...किसी महिला की इज्जत उसकी जिंदगी होती है और कोई अगर इसी को लूट ले तो फिर उसके जीने का मकसद ही खत्म हो जाता है. कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज में महिलाएं पुरूषों के मुकाबले बहुत कमजोर होती है जबकि समाज ने झांसी की रानी दुर्गावती जैसी  सिंहनियों को भी देखा है मगर सारी महिलाएं वैसे नहीं हो सकती. उनमें से कइयों पर जो अत्याचार होते हैं उसकी निंदा करने वाले, उनको मुआवजा देने वाले तो बहुत सामने आ जाते हैं लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी तो हैं जो हम सबके ऊपर सारे अत्याचारों को अपनी आंखों से देखता है,सुनता है और निर्णय करने की क्षमता रखता है. यह वर्ग ऐसे कानून भी  बना सकता है जो अबलाओं पर अत्याचार को रोकने में सक्षम है फिर उनके सामने कौन सी मजबूरी है जो वो समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को यह कहकर संरक्षण नहीं दे पा रहा जिसके कारण छोटी- छोटी  बच्चियां तक असुरक्षित हो गई. आज बड़ी बड़ी बाते करने वाली हमारी सरकारों की नाक के नीचे एक छोटी सी बच्ची मसल दी जाती है उसे खरोच डाला जाता है फिर भी  हमारा कानून ऐसे जालिमों को वह सजा नहीं दे पाता जिसके वे वास्तव में हकदार हैं.नतीजतन आज स्थिति ऐसे आ गई है कि बच्चियां अपने ऊपर होने वाले अत्याचार से तंग आकर शरीर को आग के हवाले कर देती है या फिर किसी ऊंची मंजिल से कूदकर जान दे दती है या फिर जहर खाकर खुदकुशी कर लेती है अथवा अपने कपड़े के किसी अंग को खीचकर गले में बांधकर अपनी इंहलीला खत्म कर देती है फिर भी हमारे चुने हुए लोग अपने पौराणिक घटिया कानून को संवारकर उसकी ही दुहाई देते हैं कि वह कमजोर है. दुख इस बात का है कि लोग आज इतने असहनशील हो गये हैं कि उनपर न मध्यप्रदेश की ग्यारह साल की बच्ची के साथ हुए यौन अपराध का कोई प्रभाव पड़ता है और न महासमुन्द के पिरदा की उस विवाहिता महिला की चीख सुनाई देती है जिसे दुष्कर्मी उसके घर से उठाकर ले जाकर जंगल में उसके साथ मुंह काला करते हैं.हम इस बात का दावा जरूरत करते हैं कि हमारे देश की आबादी एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा है.इस आबादी में मुटठीभर लोग ऐसे हैं जो किसी बच्ची का यौन शोषण करने के आरोपी है, कुछ ही ऐसे हैं जो दुराचारी की श्रेणी में आते हंै इन दस में से दो को भी ऐसे दुष्कर्म के बाद बीच चोराहे पर लटकाकर इस दुनिया से रूकसत कर दिया जाये तो किसी दूसरे दुष्कर्मी की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह किसी अबला को घूर कर भी देख सके. हर अमन पंसद व्यक्ति की आंखे भर आई होंगी जब उसने सुना कि  मध्य प्रदेश के इटारसी में गैंगरेप की शिकार एक 11 साल की बच्ची ने जेल से छूटे आरोपी के डर से खुद पर केरोसिन उडेलकर आग लगा ली. बच्ची को अधजली हालत में पिता मोटर साइकिल पर 10 किमी दूर इटारसी अस्पताल लेकर पहुंचे .... करीब 40 परसेंट जल चुकी बच्ची ने जो बताया वह भी हमारे कानून की खामियां गिनाता है-कहती है- एक आरोपी जेल से छूट चुका है, दूसरा भी छूट जाएगा मुझे हमेशा डर रहता है कि वे मुझे मार देंगे.छठवीं की स्टूडेंट् कितनी बड़ी होती है उससे 8 महीने पहले खेत में गैंगरेप हुआ था. आरोपी गांव के ही कम उमर के लड़के हैं. क्या ऐसे लोगों को इस समाज में जीने का अधिकार है? अगर हम रोज होने वाली वीभत्स घिनौनी घटनाओं का जिक्र करें तो आंखे भर आयेंगी.उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक परिवार की महिला सदस्यों के साथ सरे आम गेंग रेप की घटना की स्याही अभी सूखी भी नहीं कि महासमुन्द की उस विवाहिता का क्या कसूर था कि दुष्कर्मियो ने उसे उसके घर से उठाकर कहीं का न छोड़ा. दुष्कर्म के बाद उसका वीडियों बनाया ओर उसके प्रायवेट पार्टस को लहूलुहान कर दिया. एक राष्ट्रीय पार्टी का पदाधिकारी इस मामले में लिप्त है शक नहीं कि उसके पूरे प्रभाव का इस्तेमाल होगा और पतली  गली से निकलकर फिर उसी तरह धमायेगा जिस तरह इटारसी की बच्ची के साथ हुआ. हरियाणा रोहतक में भी ऐसा हुआ था. हम अपने वेतन बढ़ाने में कोई देर नहीं करते फिर ऐसे पुराने कानून को बदलने में देर क्यों करते हैं? जो लोग पिंजरे में रहने के आदी होते हैं उन्हें जिंदगीभर पिंजरें में ही रखने का कानून बनाया जाये और जो इसके बाद भी नहीं माने उसे जेल में पूर्ण ऐशोआराम देने की जगह रस्सी पर टांग दिया जाये. समाज में किसी के भी अपनों के साथ  ऐसी घटना हो सकती है जो लोग हमेशा बंदूकधारियों की सुरक्षा में घिरे रहते हैं उनकी बात छोड़ दीजिये उनको  कोई खतरा नहीं  लेकिन आम आदमी जिसे सुरक्षा चाहिये उसे अब सामने आना ही होगा.

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

जयललिता बीमार....मार्कंडे का प्यार जागा, लालू भी आये नये अंदाज में!


अपने बयानों को लेकर विवादों में  में!रहने वालों में यूं तो देश के कई नामी गिरामी हैं लेकिल जब पूर्व चीफ जस्टिस मार्कंडे काटजू और पूर्व रेलमंत्री व बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री लालू प्रसाद बोलते हैं तो इसका रंग ही अलग होता है.यह दोनों हस्तियां अपने विवादास्पद बयानों से तत्काल चर्चा में आ जाते हैं.उनके बयानों की या तो तीव्र प्रतिक्रिया होती है या फिर उन्हें स्वंय अपने बयान का खंडन करना पड़ता है. कुछ में उन्हें इसके लिये माफी मांगनी पड़ती है. काटजू हाल ही बिहार पर दिये गये एक बयान के बाद फिर चर्चा में आये थे जिसमें उनके खिलाफ कोर्ट में याचिका भी दायर की है अब उनका ताजा बयान आया है तामिलनाडृ की मुख्यमंत्री जयललिता पर-वे कहते हैं तामिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता  शेरनी है और उनके विरोधी  लंगूर. .काटजू फेस बुक में भी हैं उसी में उन्होंने एक पोस्ट में  लिखा है कि जब वो जवान थे तो उन्हें जयललिता से प्यार हो गया था उन्होंने लिखा, उस वक्त मुझे जयललिता काफी मनमोहक लगती थीं. मैं उनके प्यार में पड़ गया था.लेकिन जयललिता को इस बारे में नहीं पता था, यह एकतरफा प्यार था काटजू ने लिखा, मुझे वह अब भी अच्छी लगती हैं लेकिन अब मैं उतना अच्छा नहीं दिखता मैं उन्हें अब भी प्यार करता हूं और मैं उनके जल्द ही ठीक होने की प्रार्थना करता हूं.तामिलनाडु की सीएम जयललिता कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं उनकी सेहत के बारे में अभी कुछ भी औपचारिक रूप से नहीं कहा गया है. अब खबर है कि राज्यपाल सी. विद्यासागर राव ने  उनके सारे विभाग प्रदेश के वित्त मंत्री ओ. पनीसेल्वम को सौंप दिए हैं देश में यह शायद पहला अवसर है जब किसी मुख्यमंत्री के इतने लम्बे समय तक बीमार होने की स्थिति में भी उनका कार्यभार किसी दूसरे मंत्री के हाथ में नहीं सौपा गया. बहरहाल अब काम देखने का दायित्व जयललिता के सबसे विश्वस्त वित्तमंत्री पनीसेल्वलम को सौंप दिया है जिसपर भी विरोध के स्वर उठे हैं.परिवर्तन के बाद भी जयललिता मुख्यमंत्री बनी रहेंगी. तामिलनाडू के लोग अपने नेताओं- अभिनेताओं के प्रेम जाल में इतने दीवाने हो जाते हें कि आगे पीछे कु छ नहीं देखते-उनको कुछ हो जाने पर आत्महत्या,आत्मदाह तक करने  तैयार रहते हैं-यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है फिर चाहे चह अन्न्नदुराई का मामला हो या चाहे जैमिनी गणेशन का अथवा सुपर स्टार रजनीकांत का- यहां के लोगों ने दीवानगी अपनी हद तक दिखाई है. इस बार मुख्यमंत्री बनने के पूर्व जयललिता को जेल जाना पड़ा था इसपर उनके समर्थकों में से कइयों ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया कुछ अब भी जब जया अस्पताल में भर्ती है तो तरह तरह की अफवाहों सेे अपने आपकों दूर नहीं कर पा रहे- इस हालात से निपटने के लिये पुलिस को एफआईआर तक का सहारा लेना पड़ा.ऐसे में अगर पूर्व जस्टिस की भावनाएं जाग जाती है तो इसमें भी किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिये. अपने विवादित बयानों के  लिये विख्यात दूसरे नेता लालूप्रसाद यादव ने इस बार आरएसएस को निशाना बनाया है विजयादशमी के दिन आरएसएस द्वारा औपचारिक तौर पर अपनी ड्रेस बदलने पर लालू  इसे संघ में शुरू हुआ बदलाव बताते हैं वे कहते हैं स्वयं सेवक खाकी की हॉफ पैंट की जगह फुल पैंट में नजर ही नहीं आएंगे बल्कि उनमें अभी और कई बदलाव होने हैं. अभी तो हमने पेंट को हॉफ से फुल करवाया है, आगे दिमाग को भी ठीक करवाएंगे. लालू तो यह भी कहते हैं  पैंट ही नहीं सोच भी बदलवाएंगे, हथियार भी डलवाएंगे. हम इन्हें अब और जहर नही फैलाने देंगे. यह बयान पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के इसी साल जनवरी महीने में राजद के एक कार्यकर्ता सम्मेलन में आरएसएस पर टिप्पणी के संदर्भ में था जिसमें उन्होनें कहा था कि आरएसएस कैसा संगठन है, जहां बुड्ढा बुड्ढा लोग भी हॉफ पैंट पहनते हैं, क्या उन्हें सार्वजनिक जगहों पर जाने में शर्म नहीं आती? लालू के बयानो की तरह रावड़ी का यह बयान भी  काफी दिनों तक मीडिया की सुर्खियों में रहा था विजयादशमी पर लालू को मौका मिला और उन्होंने रावड़ी के बयान को आगे बढ़ा दिया .हालांकि इसी बीच संघ की ओर से मार्च में अपनी ड्रेस में बदलाव की बात सामने आ गई थी. युवाओं को खुद से जोडऩे और वर्तमान जरूरत को देखते हुए हाफ पैंट की जगह फुल पैंट को अपनाने की बात कही गई थी। मंगलवार को विजयादशमी के दिन संघ ने विधिवत रूप से अपनी ड्रेस में बदलाव किया तो लालू ने तुरंत उस पर निशाना साध दिया.भाजपा नेताओं को लालू का यह बयान पसंद नहीं आया तो वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राबड़ी देवी को अब संघ की प्रशंसा करनी चाहिए क्योंकि उन्हें उनका हॉफ पैंट में घूमना पसंद नहीं था।





सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

हमारी सेना बहादुर थी, बहादुर हैै और रहेगी.....कोई शक?


उड़ी हमले में हमारे अठारह जवानों के मारे जाने के बाद हमारी सेना ने पीओके में पाक ठिकानों पर जाकर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया या 2011 में जिंजर आपरेशन को अंजाम दिया वह हमारी सेना की वीरगाथाओं में से एक है इसका श्रेय किसी पालिटिकल पार्टी का नहीं जाता और न  इस पर सेना के सिवा किसी का  इसको लेकर राजनीति करके लोग क्यों अपना समय गंवा रहे हैं?. देश पर दुश्मनों के हमले होते हैं तो मैदान में नेता नहीं सेना जाती है. सेना की वीरता पर ही जीत और हार का सारा दारोमदार टिका होता है. देश ने आजादी के बाद सेे अब तक कम से तीन से चार युद्व देखे हैं इसमें से कभी  हमारी लड़ाई चीन से हुई तो कभी पाकिस्तान से तो कभी बंगलादेश आजाद कराने के लिये. हर लड़ाई में हमारी फोज ने दुश्मनों के छक्के छुड़ायें हैं. पाकिस्तान से हमारी दुश्मनी पुरानी है पहले वह हमसे फैाज भेजकर मुकाबला करता था लेकिन अब उसकी स्ट्रेटजी बदल गई है उसने देख लिया कि हमसे वह अपनी फौज से टक्कर नहीं ले सकता तो उसने परमाणु अस्त्रो को एकत्र किया और साथ ही अपने ऐसे तत्वों को पालना शुरू किया जो आतंक पर विश्वास करते हैं- उन्हें हमारी सीमा में आतंक फैलाने के लिये भेजने की स्टे्रेटजी ने हमें मजबूर किया कि हम भी  उसकी चाल को किसी न किसी रूप में नाकाम करें. सेना ने वही किया. आतंकवादियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये उनसे निपटा गया. यह सिलसिला सेना गुपचुप रूप से वर्षो से करती आई है लेकिन अब यह मीडिय़ा और राजनेताओं की ज्यादा दिलचस्पी से सार्वजनिक हो गई जिसे हम सुरक्षा के लिये बिल्कुल उचित नहीं मानते. सत्ता, विपक्ष तथा मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का फर्ज बनता है कि वह सेना से  संबन्धित किसी भी गतिविधियों को सार्वजनिक न करें. अभी एक दो दिन पहले एक चैनल ने पाकिस्तान द्वारा हमारे नेताओं द्वारा सर्जिकल आपरेशन पर की गई राजनीति से उत्पन्न वह ब्योैरा प्रसारित किया जिसमें पाकिस्तान ने उसे तोड़ मरोड़कर पेश किया. उड़ी हमले के बाद सरकार ने बहुत से कदम उठाये यह कदम देश के हित में और देश की सुरक्षा के खातिर उठाये गये इसमें कुछ ऐसे कदम भी थे जो युद्व की स्थिति आने पर हमारी सेना को करना था  जिनमें से बहुत सी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना था लेकिन सार्वजनिक होता रहा.कुठ नेताओं ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सवाल उठाये. मुम्बई में आतंकी हमला हुआ था तब मीडिय़ा ने कुछ ऐसे दृश्यों का प्रसारण किया था जिसका फायदा दुश्मनों को मिला मसलन हमारे कमाण्डो अब पहुंच गये हैं-वे पेराशूट से उतर रहे हैं यहां तक कि उनके बिल्डिंग में उतरते  दृश्यों तक को दिखाया गया. क्या यह जरूरी था? तत्कालीन सरकार के ध्यान में जब यह बात आई तो उसने  तत्काल इसपर प्रतिबंध लगाया जो एक सही कदम था. सर्जिकल स्ट्राइक हो या अन्य किसी  भी प्रकार की सुरक्षात्त्मक कार्रवाही- हर मामले में देश के हर नागरिक का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी किसी भी हरकत से चाहे वह बयानबाजी हो या किसी टीवी पर उसका दृष्याकन सबमें बेहद सतर्कता की जरूरत है हमारी छोटी सी गलती दुश्मन को बहुत बडा फायदा पहुंंचा सकती है.सेना ने अपना काम कर दिया, यह सब हमें चैन से सोने के लिये किया. अब इसका ढिढौरा पीटने से क्या मिलने वाला? एक अंग्रेजी अखबार की खबर है कि 2011 में जिंजर आपरेशन भी वर्तमान सर्जिकल स्ट्राइक की तरह किया गया,  जिसमें भारतीय सैनिक तीन पाक सैनिकों के सिर कलम कर ले आए थे. इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सैनिक 48 घंटों तक पाकिस्तान की सीमा में रहे. ठीक है यह सेना का काम है इसे फिर से तरह उखाड़कर हम क्या हासिल करने वाले हैं? हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि हम अपने देश के चारो तरफ दुश्मनों से घिरे हुए हैं हमे अपनी सुरक्ष यूं अंदरूनी खोज करके करने की जगह यह देखना है कि चीन ने भारतीय इलाकों के समीप इतना तगडा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है कि उसको भारत में प्रवेश करने में कभी कोई कठिनाई न हो पाए,उसने पूरब से लेकर पश्चिम तक वल्र्ड स्तर के हाईवे बना लिए हैं। चीन ने लीपू झील इलाके में एक ऐसी सड़क बनाई है, जो सभी मौसमों में काम करती है इससे कैसे निपटा जाये? हमारी सेना ने सर्वोच्च साहस और वीरता का परिचय देते हुए सदैव विजय पताका फहराया है लेकिन हर बार, चाहे वह कांग्रेस की सरकार के दौरान हुआ हो या भाजपा के शासनकाल में सेना के शौर्य का श्रेय नेताओं ने झटकने की कोशिश  की है.

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

सब में मिलावट....लोग खाये तो क्या?और पिये तो क्या?



आज लोगों के समक्ष यह स्थिति बनती जा रही है कि वे क्या खाये क्या न खाये और क्या  पिये और क्या न पिये. खाने पीने की हर वस्तु या तो मिलावटी हो गई अथवा इसमें इतने केमिकल मिले होते हैं कि यह इंसान के स्वास्थ्य को बुरी तरह झकझोर रही है.देश में हर किस्म के रोगों के लिये अब खानपान जिम्मेदार होता जा रहा है. पिछले कुछ समय से सरकार ने इंसानों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया है उसकी एजेंंसियां बाजार में मौजूद ऐसे कई खाद्य पदार्थो को खोज -खोजकर उनकी जांच कर रही है जिसका बाजार काफी गर्म है अर्थात काफी मात्रा में इसका उपयोग लोग करते हैं.मिलावट से निपटने में सरकार और उपभोक्ता मंचों की जिम्मेदारी तो है ही, कंपनियां भी इस मामले में अपनी भूमिका से मुकर नहीं सकती- होता यह है कि कई कंपनियां अपने ब्रांड की नकल पर ज्यादा शोर नहीं मचातीं, क्योंकि उन्हें नकारात्मक प्रचार का डर रहता है. इस संकोच के साथ मिलावटखोरों व नक्कालों से नहीं निपटा जा सकता. नूडल्स मैगी विवाद ने खाने-पीने की चीजों में मिलावट के मामले को चर्चा का विषय बना दिया था उसके  बाद अब सरकारी जांच में स्प्राइट, कोका कोला, ड्यू, पेप्सी और 7अप में  5 जहरीले तत्व पाये गये हैं स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी)की जांच में पेप्सिको तथा कोका कोला जैसी कंपनियों के कोल्ड्रिंक्स में एंटीमोनी, लीड, क्रोमियम, कैडमियम और कम्पाउंड डीईएचपी जैसे जहरीले तत्व मिले हैं. इससे पूर्व पता चला था कि बहुत सारे घरों में सुबह नाश्ते के समय खाई जाने वाली बे्रड और बेकरी के उत्पादों में कैंसर पैदा करने वाले रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है सेंटर फार साइंस एंड इनवायर्नमेंट (सीएसई) ने बे्रड, पाव, बन, बर्गर बे्रड और पिज्जाबे्रड आदि के  नमूनों की जांच मेें चौरासी फीसद नमूनों में पोटेशियम ब्रोमेट और आयोडेट के अंश मिले. बे्रड बनाने के दौरान आटे में इन नुकसानदेह रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है.चिकित्सक कई बीमारियों के लिए मिलावटी खाद्य पदार्थों को ही जिम्मेवार बताते हैं. जिगर, दिल की बीमारियों और कैंसर के मामलों के तेजी से बढऩे की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों में मिलावट है. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने की तमाम कोशिशों के बाद भी बाजार में मौजूद खाने-पीने की ज्यादातर चीजों के शुद्ध देने का भरोसा नहीं किया जा सकता है.भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसआइए) द्वारा  तैंतीस राज्यों और केंद ्रशासित प्रदेशों में कराए गए सर्वे में झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ व पश्चिम बंगाल के शत-प्रतिशत दूध नमूनों में मिलावट पाई गई. दक्षिण के राज्यों में भी दूध में मिलावट का धंधा फल-फूल रहा है।  दूध में फैट, एसएनएफ, ग्लूकोज, स्टार्च, साल्ट, वेजीटेबल फैट, पाउडर, एसिड आदि तत्व पाए गए. पानी की मात्रा भी अधिक पाई गई. कई नमूनों की जांच में तो डिटर्जेंट व यूरिया जैसे खतरनाक तत्व भी पाए गए यह हमारा देश ही है जहां इस कदर मिलावट को सरकार भी बर्दाश्त करती रहती है और जनता भी. मिलावट के धंधेबाज धड़ल्ले से सक्रिय हैं. पशुओं से अधिक दूध निकालने या सामान्य से ज्यादा सब्जियों के उत्पादन के लिए ऑक्सीटोसिन नामक हारमोन का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है.इसके अलावा, फलों को समय से पहले पकाने या सब्जियों को दिखने में ताजा और आकर्षक बनाने की खातिर भी कई घातक रसायनों का प्रयोग वे करते हैं। दालों को चमकीला बनाने के लिए या मसालों में जिन रंगों का प्रयोग किया जाता है, उनका असर किसी से छिपा नहीं है। तंत्रिका तंत्र, हृदय, गुर्दे से संबंधित कई गंभीर बीमारियों के कारण ये कैंसर तक की वजह बन सकते हैं।सिंथेटिक दूध रासायनिक उर्वरकों (यूरिया), वनस्पति घी, डिटर्जेंट, ब्लीचिंग पाउडर व चीनी को मिला कर बनाया जाता है तथा सस्ते दामों पर बेचा जाता है. दूध की कमी के दौर में अगर सस्ता दूध मिल जाए तो गरीब आदमी उसे खरीदेगा ही.  सिंथेटिक दूध और घी बनाने में मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक रसायनों, उर्वरकों, कीटनाशकों, क्रूड वैक्स तथा इंडोनेशिया से आयातित पाम ऑयल (स्टाइरिन), तंबाकू व जूट का तेल इस्तेमाल किया जाता है. यह पाम ऑयल सस्ता तथा साबुन व डिटर्जेंट बनाने में इस्तेमाल होता है. इस सारे मिश्रण को देसी घी का रूप देने के लिए घी की खुशबू वाला एसैंस व रंग मिलाया जाता है.ये सब चीजें ऐेसी होती हैं जो कैंसर पैदा करती है.वेज तो वेज नान वेज भी मिलावटी हो गया. बकरे की जगह भेढ़ और देशी  अंडे को कलर करके बेचने का धंधा भी फलफूल रहा है. लोगों को इनसबसे कब मुक्ति मिलेगी कोई नहीं जानता
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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

रेलवे में रिकार्ड अपराध.....और अब स्पर्म के लुटेरे भी!




यह रेलवे में पनप रहे एक नए अपराध की कहानी है जो एक ऐसे गिरोह द्वारा संचालित है जो पैसा कमाने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं गिरोह ट्रेनों में सफर करने वाले युवकों सेजबर्दस्तीकर उनके स्पर्म निकालकर बेचने का धंधा करता हैं हालाकि इस मामले की पूर्ण सत्यता सामने नहीं आई है  लेकिन एक पीडि़त ने देश के एक प्रमुख अंग्रेजी-हिन्दी चैनल में अपनी आप बीती पोस्ट करने के बाद इस गिरोह का रहस्योद्घाटन किया है. वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार 2 अगस्त 2016 को विशाखापटनम से पटना के लिये एर्नाकलम एक्सप्रेस से रवाना हुए इस शख्स को रात गिरोह के दो सदस्यों ने उसके बर्थ में ही पिस्तौल की नौक पर स्पर्म निकालकर एक पोलीथीन में डालकर चलते बने.उस व्यक्ति ने पहले तो यह बात किसी को नहीं बताई लेकिन बाद में उसने न केवल पूरे कम्पार्टमेंंट को बताया बल्कि एसएमएस के जरिये भी उसने लोगों को सावधान किया है.युवक ने जो एसएमएस भेजा है उसे ज्यों का त्यों चैनल ने अपने वेबसाइट में डाला है ताकि अगर कोई अन्य ऐसा पीडित है तो उसे भी यह बताना चाहिये. पुलिस को भी चाहिये कि वह इसकी सच्चाई का पता लगाये और इस किस्म के अपराधियों को अपने जाल में फांसना एक चुनौती के रूप मेें स्वीकार करें. इस युवक की बात में कितनी सच्चाई है यह पुलिस के अन्वेषण का विषय है किन्तु ऐसा हो रहा है तो भारत की ट्रेन में इस तरह के अपराध का बिल्कुल नया ट्रेंड है, वैसे जापान में ट्रेन में सेक्स अटैक का मामला सामने आया था, इस मामले में अप्रैल 2015 में तेत्सुआ फुकदा नाम के एक अधेड़ की गिरफ्तारी हुई थी उसने 2011 से करीब सौ बार सेक्स अटैक किया था वह ट्रेनों में मुसाफिरों पर स्पर्म छिड़कता था पकड़े जाने पर उसने बताया कि उसे ऐसा करने में मजा आता था, उसकी गिरफ्तारी एक स्कूली लड़की की स्कर्ट पर गिरे स्पर्म के छीटों की डीएनए सैंपल जांच के आधार पर हुई थी. बहरहाल सुरेश प्रभ़ की ट्रेनें इस समय अपराध से लबालब हैं पिछले दो सालों में टे्रनों और स्टेशनों दोनों जगह अपराधों की संख्या में भारी वृद्वि हुई है. यह उनका मंत्रालय खुद कह रहा है.आंकडे बताते हें कि 2014 में ट्रेनों में 13,813 अपराध हुए थे. यह संख्या 2015 में बढ़कर 17,726 हो गई. 2014 में रेल परिसरों में 8,085 अपराध हुए और 2015 में यह संख्या बढ़कर 9,650 हो गई जबकि रेल मंत्रालय ने अपराध रोकने हेतु भी कोई कमी नहीं की है देश भर के 202 संवेदनशील स्टेशनों पर निगरानी तंत्र सीसीटीवी, अभिगमन नियंत्रण और तोडफ़ोड़ विरोधी जांच से जुड़ी एकीकृत सुरक्षा प्रणाली को मंजूरी दी गई है.विभिन्न स्टेशनों में 5367 सीसीटीवी तथा हर दिन दो हजार तीन सौ ट्रेनों में आरपीएफ ओर 2200ट्रेनों में जीआरपीएफ के जवान तैनात रहते हें फिर  भी अपराध कैसे बढ़ रहे हैं यह यक्ष प्रशन है. इस साल आठ महीने में अकेले छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाली ट्रेनों में चोरी की 298 घटनाएं हो चुकी हैं. पिछले साल की तुलना में सौ से ज्यादा चोरियां अब तक हो चुकी हैं. इसमें भी सबसे ज्यादा घटनाएं रात के समय एसी बोगी में हुई हैं.इसके बाद भी जीआरपी और आरपीएफ के जवानों को रात के समय एसी बोगी के अंदर नहीं जाने दिया जाता चोरों का आसान लक्ष्य एसी बोगी में सफर करने वाली अकेली महिलाएं होती हैं.जीआरपी नियमों की बाध्यता बताकर मजबूरी गिना रही है.13फरवरी को हावड़ा-मुंबई मेल, अमरकंटक एक्सप्रेस और सारनाथ एक्सप्रेस की चार एसी बोगियों में करीब एक करोड़ की चोरी हो गई. इसमें एक ही गैंग के लोगों के शामिल होने की आशंका जताई गई थी. रेलवे में अपराध की ताजा घटना  इस बुधवार की है जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जब कानपुर स्टेशन के पास हथियारबंद लुटेरों ने तड़के दो सुपरफास्ट और एक पैसेंजर ट्रेन में लूटपाट की और विरोध करने पर यात्रियों के साथ मारपीट की जिससे कई लोग घायल हो गये. हथियारों से लैस बदमाशों ने पहले लखनऊ से मुंबई जाने वाली लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस में लूटपाट की. इसके बाद बदमाशों ने वहां से गुजर रही वैशाली एक्सप्रेस के यात्रियों के साथ लूटपाट की बाद में लखनउ कानपुर पैसेंजर ट्रेन में भी लूटपाट की. कुछ  घटनाओ के पीछे पुलिस से मिली भगत से भी इंंकार नहीं  किया जा सकता वरना हथियारबंद पुलिस के होते किसी की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वह यात्रियों के साथ मारपीट व लूटपाट को एक साथ अंजाम दे सके. जो खबरे आ रही है उसके अनुसार  बदमाश लूटपाट करने के बाद भागने में कामयाब रहे चूंकि यह घटना उन्नाव और कानपुर जिलों के बीच हुई तो पहले तो दोनो जिलों की जीआरपी पुलिस सीमा विवाद में ही उलझ पड़ी.













मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

अपराध की तपिश से क्यों झुलस रहा छत्तीसगढ़?

 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित बड़े शहर इन दिनों गंभीर किस्म के अपराधों से झुलस रहे हैं वहीं पुलिस की नाकामी ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं. एक के बाद एक अपराध और उसमें पुलिस की विफलता ने यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि आखिर यह शांत राज्य अपराधों से कैसे झुलसने लगा?. एक के बाद एक होने वाले अपराधों से पुलिस से ज्यादा छत्तीसगढ़, विशेषकर राजधानी रायपुर में बाहर से आने वाले नागरिक ज्यादा परेशान हो रहे हैं-घटना के तुरन्त बाद पुलिस की कार्रवाही नाकेबंदी होती है इसमें अपराधी तो पतली गली से निकल जाते हैं लेकिन सड़क पर चलने वाले आम आदमी की फजीहत हो जाती है जैसे उसी ने सारा जुर्म किया हो.हाल ही कई वाहनों को रोककर जबर्दस्त तलाशी ली गई. किसी से कुछ नहीं मिला,उलटे अपराधियों को भागने का मौका मिल गया. बड़ी बड़ी घटनाओं ने शहरों में दहशत की स्थिति पैदा कर रखी है. आम आदमी को अपनी सुरक्षा पर संदेह है.असल में छत्तीसगढ़ बाहरी उन अपराधियों का पनाहस्थल बन गया है जिनकी दूसरे राज्यों की पुलिस को तलाश है. अपराधी कतिपय स्थानीय लोगों की मदद से दूसरे राज्यों से आने वाली ट्रेनों व बसों से यहां पहुंचते हैं तथा अपने रिश्तेदारों के यहां किसी न किसी बहाने ठहरते हैं,अपना मकसद पूरा होते ही आसानी से लौट जाते हैं फिर पुलिस इसको खोजने के लिये टूर प्रोग्राम बनाती है ,दूसरे राज्यों मे खोजबीन कर एक दो पुराने हिस्ट्री शीटरों को लाकर अपनी खानापूर्ति करती है. यह सिलसिला कुछ समय से यूं ही चल रहा है. असल में शहर के प्राय: सभी थानों की यह स्थिति बन गई है कि यहां स्थानीय पुलिस कर्मियों की जगह ऐेसे पुलिस कर्मियों को लगाया गया है जो रायपुर के किसी मोहल्ले को तथा वहां रहने वालों तक से परिचित नहीं हैं. हाल ही भारी मात्रा में चंदन की लकड़ी पकड़ी गई.जब कुछ साल पहले रायपुर मे चंदन तस्करों के बीच संघर्ष में एक व्यक्ति की जान चली गई थी तब से पुलिस को इस बात का अंदाज तो हो ही गया था कि रायपुर और आसपास के शहरो में इसका कोई न कोई लिंक है पर फिर भी उसकी नाक के नीचे यह कारोबार पनपता रहा. उसे इस बात की जानकारी तब लगी जब नागपुर में अपराधी पकडे गये. असल में हमारे यहां कार्रवाही तभी होती है जब हमपर बीतती है या किसी के कहने पर बात आगे बढ़ती है.छत्तीसगढ़ पुलिस के बारे में आज की स्थिति में यही कहा जा सकता है कि एक तरह से उसका राजनीतिकरण हो गया है,उसके कतिपय अफसरों को काम से ज्यादा प्रचार प्रसार में ज्यादा विश्वास हैै शायद एक कारण यह भी है कि अपराधियों को पकडऩे में वह पूर्णत: निष्फल साबित हो रहा हैं. असल बात तो यह है कि आम जनता बिल्कुल सुरक्षित नहीं है, किसी के साथ कभी भी कोई घटना हो सकती है. पुलिस तंत्र पूरी तरह फिसड्डी साबित हो रहा है.राजधानी में अपराधिक घटनाएं प्रति दिन हो रही है और पुलिस एक भी अपराधी को पकडऩे में सफल नहीं है.पुलिस का सूचना तंत्र फेल हो चुका है शासन का शिकंजा भी पुलिस प्रशासन पर जिस तरह होना चाहिए वह नहीं है. राजधानी के लालपुर स्थित शराब दुकान के सेल्स मेन अशोक सिन्हा पर गोलीचलाकर अपराधी 4 लाख रूपए लूटकर ले गयेे वहीं अनुपम नगर में सराफा व्यपारी प्रवीण नाहटा पर दो युवकों ने गोली चलाकर लूटपाट कर चलते बने. पुलिस सड़कों पर बेरियर लगाकर खाख छानती रर्हीँ. इसी तरह टिकरापारा भैंवर सोसयटी में पंकज बोथरा की गोली मारकर हत्या और लूट, भनपुरी की शराब दुकान में कैशियर को गोलीमारकर साढ़े 12 लाख की लूट, शारदा चौक से फैक्ट्री मालिक से साढ़े 12 लाख की उठाईगिरी के साथ शहर में चेन स्नैचिंग की वारदातें तो आये दिन होते रहती है. अब यह स्थिति हो गई है कि पुलिस अपराध का एफआईआर करती है और भूल जाती है. पुलिस का अपना कोई ऐसा तंत्र अभी तक विकसित नहीं हुआ है जो तत्काल अपराधियों की गिरेबान तक पहुंच जाये. बस सीसी कैमरे की धुंधली तस्वीरे ही भगवान बनकर उनके पास है.दिलचस्प बात तो यह है कि कतिपय मामलों में फुटेज मिलने के बाद भी कार्यवाही करने की जगह सीसीटीवी में उबर आये चित्रों को देखकर ललचाते रहते हैं .पुलिस की सुरक्षा आजकल छत्तीसगढ़ में किसे मिल रही है यह आज प्रत्येक व्यक्ति की जुबान पर सवाल के रूप में मौजूद है. अपराधियों के पंजे प्रदेश में बच्चे, बुढ़े, महिलाएं किसी को भी निशाने पर ले लेते हैं औैर हमारी व्यवस्था बस एक मूक दर्शक बनी हुई ताक रही है.  

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

पैसठ हजार लोग 'काले से 'गोरे हो गये, बाकी कब?


काला धन एक समानान्तर अर्थ व्यवस्था को पैदा करता है इससे देश का विकास रूक जाता है और उपभोक्ता वस्तुओं तथा उत्पादक वस्तुओं में कमी होती है. ब्लेक मनी अर्थात् गैर कानूनी धन जीवन का एक धु्र्रव सत्य बन चुका है जो पिछले कुछ वर्षो के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचा रहा है. लोकसभा चुनाव में कालाधन एक अहम मुद्दा था, जिसके बल  पर भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला. नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो विदेशों में जो काला धन जमा है वे उसे भारत लायेगे और प्रत्येक व्यक्ति में खाते में पन्द्रह पन्द्रह लाख रूपये डालेंगे-यह वादा कब पूरा होगा यह तो पता नहीं लेकिन देश से कालाधन बाहर लाने के मामले में सरकार को एक विशेष सफलता हाल के महीनों में मिली- सरकार ने घरेलू आय घोषणा योजना (इनकम डिक्लेरेशन स्कीम) आईडीएस लागू की जिसके तहत देश के 64,275 लोगों ने  4 महीनों के दौरान 65,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बेनामी संपत्ति का खुलासा किया. घरेलू आय घोषणा योजना के तहत लोग अपने काले धन का खुलासा तय समय के भीतर करने पर से टैक्स और पेनाल्टी से बच गये. इसके तहत उन्हें काला धन को सार्वजनिक करना था जिसके बाद उनपर कोई कानूनी कार्रवाई होगी. सरकार ने इस योजना के तहत ज्यादा से ज्यादा काला  धन अपने खाते में लाने के लिये कई किस्म की कोशिशें की.इस स्कीम के तहत 45 फीसदी टैक्स और पेनाल्टी के बाद ब्लैकमनी को व्हाइट किया जा सकता था.सरकार ने अभी जो वक्त दिया उससे जितने लोग काले से गोरे हो गये लेकिन अब जो बचे  हैं उनकी संख्या इन गोरे हुए लोगों से बहुत ज्यादा है इनपर सरकार की जो कार्रवाही होगी वह कठोर तो होगी ही साथ ही ऐसे लोगों के पास से जो धन निकलेगा वह शायद इससे कई गुना ज्यादा होगा बशर्ते सरकार इस मामले में ईमानदारी से कठोर कार्रवाही बिना झिझक व बिना प्रभाव को देखे करे.सरकार की धमकी है कि 30 सितंबर के बाद से काला धन रखने वालों को कड़ी कार्रवाई और जेल जाने जैसे अंजामों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. इस योजना में उम्मीद से कम ही सही लेकिन काले धन का खुलासा हुआ है. औसतन हर व्यक्ति ने 1 करोड़ रुपये का खुलासा किया. हालांकि कुछ का ज्यादा है तो कुछ का कम इससे एक प्रशन यह भी पैदा होता है कि कई लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कार्रवाही से बचने के लिये अपने छिपाये गये धन  के कुछ हिस्से को बताकर सरकार की कार्रवाही से बचने का  प्रयास कर गये? काले धन का व्यापार में प्रयोग न किया जाना तथा धन को केवल जोड़कर, छिपाकर रखना एक अच्छा आर्थिक विकास है, क्योंकि इस प्रकार धन की मात्रा में कमी करके मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखता है लेकिन जिस व्यक्ति के पास काला धन होता है वह उसका प्रयोग करना भी जानता है वह जानता है कि जीवन छोटा है इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण को जिया जाना चाहिए इसलिए वह अपने घर का विस्तार करता है, घर में बड़ेे शानो-शौकत एवं ऐय्याशी के साथ रहता है, शादी तथा अन्य उत्सवों पर धन पानी की तरह बहाता है अथवा सोना तथा ऐसे कीमती पत्थर जमीन, हीरे-जवाहरात खरीदता है, जिन्हें पास रखने में आसानी होती है.पिछले कुछ वर्षो के दौरान देश में जहां कालेधन  की बाढ़ आ गई वहीं विदेशी बैंकों में यह बहुत ज्यादा तादात में जमा होता रहा. सरकार अगर देश की तरह विदेश में जमा कालाधन भी बाहर लाने  में कामयाब हो गई तो देश से गरीबी का जहां नामोनिशान मिट जायेगा वहीं लोग अच्छे काम धंधों में भी लग जायेगें. रोजगार को बढ़वा मिलेगा और विकास कार्यो को बल मिलेगा. अपराध की प्रवृत्ति में कमी आयेगी.काले धन के स्वामी तथा नियंन्त्रक काले धन को स्थानीय तथा संसदीय निर्वाचनों में व्यय करने के लिए बचाकर रखते हैं, इसे वह एक प्रकार से उम्मीदवार के ऊपर किया गया अर्थविनियोग समझते है जो बाद में उनके लिए लाभकारी सिद्ध होता है  वे इस बात से अच्छी तरह परिचित होते हैं कि यह अर्थविनियोग एक लम्बे समय का धन स्रोत संयोजन है और इसे वह उम्मीदवार पर उचित समय में प्रयोग करके उससे लाभ उठाते हैं इन प्रवृत्तियों पर अगर तेजी से लगाम लगता है तो संभव है आगे आने वाले दिन देश के प्रत्यके व्यक्ति के लिये अच्छे दिन में बदल जायें.









गुरुवार, 29 सितंबर 2016

सेना ने वादा निभाया-चुनी हुई जगह और समय पर जवाब दिया!

  इस सर्जिकल स्ट्राइक्स को भले ही कुछ लोग उत्तर प्रदेश चुनाव से पूर्व मोदी की छवि सुधारने का प्रयास या और कुछ कहें लेकिन हम मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी का यह कदम उडी हमले के बाद पाक को सबक सिखाने के लिये उठाया गया अब तक का सबसे बेहतरीन कदम है जो पूरे सोच समझकर और पूरी ब्यूह रचना के साथ किया गया. ठीक वैसा ही जैसा अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ओसामा बिन लादेन के साथ किया था. पाकिस्तान में छिपे इस कुख्यात आंतकवादी को बिल से निकालकर अमरीकियो ने समुन्द्र में फेक दिया था.हमारी सेना ने उनके अनुयायिों को वहीं दफनाने के लिये छोड़ दिया. पाक आतंकवादी ठिकाने पिछले कई समय से भारत के लिये सरदर्द बने हुए हैं. म्यामार में हमारी सेना की कार्यवाही के बाद से लगातार यह मांग उठती आ रही थी कि पाक अधिकृत कश्मीर में छिपे बैठे आतंकवादियों पर भी इसी प्रकार की कार्यवाही की जाये.उड़ी हमले के बाद पाक को उसकी औकात दिखाने का समय आ गया और कहना चाहिये कि नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के समय जिस छप्पन इंच के सीने की बात कही थी वह हकीकत में दिखा दी. ऐसे मामलों में तत्काल निर्णय लेने की जरूरत होती है जो हर किसी के बस की बात नहीं .सेना को ऐसे मामलों में कोई ठोस निर्णय लेने के लिये उच्च स्तर पर आदेश की प्रतीक्षा रहती है इस मामले मेंं फैसला शायद उसी दिन हो गया था जिसदिन पाक के आंतकियों ने उड़ी में अपनी नापाक हरकत को अंजाम दिया. सारे देश के साथ देश का विपक्ष और सत्तासीन लोग सभी यह चाहते थे कि इस बार इन आंतक के ठकेदारों को सबक सिखाना ही होगा. आतंक के ठिकानें पाक अधिकृत क्षेत्रों में थे और यहां जाकर वार करने के लिये प्रधानमंत्री की अनुमति जरूरी थी... और आखिर देश के गुस्से ने अब चाहे जो हों देखा जायेगा कि तर्ज पर एलओसी क्रास करा दी. दुश्मन न केवल मारे गये बल्कि हमने बदला भी निकाल लिया.पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक्स के बाद जश्न का माहौल है. सेना ने जो कहा वो किया. आतंकवादियों को उन्हीं की मांद में उनकी ही भाषा में जवाब दे दिया लेकिन हमें बहुत ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं, दुश्मन अब पहले से ज्यादा आक्रामक होकर बिल में छिपा बैठा हे उनके आंका छिपकर योजनाएं बनाने में लगे हुए हैं. वे मोके की तलाश में हें कभी भी पलटवार कर सकते हैं. जिस प्रकार उड़ी हमले के बाद हमारा लक्ष्य आतकंवादियों के ठिकानों को नष्ट करने का था ठीक इसी प्रकार अब हमार लक्ष्य पडौस में छिपे इन आंतकवादियों के आकाओं को भी उनके बिलों से बाहर निकालकर मारने का होना चाहिये. कई तीसमारखां पाक के संरक्षण में पल रहे हैं और भारत की तरफ आंख गढ़ाये बैठे हैं.पीओके में आतंकियों के ठिकाने ध्वस्त से पाक में छिपे हमारे देश के दुश्मनों के सीने में आग लगी हुई है इससे निपटने भी हमारी फौज पूरी तरह सक्रिय है हम किसी भी मुकाबले के लिये तैयार हैं. हम इतने वर्षो तक उसकी मनमानी को बर्दाश्त करते आ रहे हैं लेकिन अब हमारे सहनशक्ति की हद हो चुकी है. हमें आर या पार चाहिये. सेना पूरी तरह इसके लिये तैयार है-सैनिको को इस दिन का इंतजार था. वे अपनी तरफ से छुट्टियां रद्द करवा रहे हैं.अगर पाक ने हमारी इस कार्रवाही के जवाब में उतरने की कोई भी कोशिश की तो इस बार उसे जवाब पहले जैसा नहीं उससे कई कठोर ढंग से मिलेगा. पाक के आंतकवादियों को उडी हमले की योजना बनाने में काफी समय लगा होगा लेकिन हमने उसके छह ठिकानों को एक ही झटके में समाप्त कर दिया.कमांडोज ने आतंकियों पर ग्रेनेड से हमला किया. अफरा-तफरी फैलते ही स्मोक ग्रेनेड के साथ ताबड़तोड़ फायरिंग की.और , देखते ही देखते 38 आतंकवादियों को ढेर कर दिया गया. हमले में पाकिस्तानी सेना के दो जवान भी मारे गए. साथ ही इस ऑपरेशन में दो पैरा कमांडोज भी लैंड माइंस की चपेट में आने के कारण घायल हुए हैं.सेना प्रमुख दलबीर सुहाग ने इस ऑपरेशन की तारीफ करते हुए ठीक ही कहा है कि सेना ने अपने कहे का पालन किया है और चुनी हुई जगह और समय पर इसका जवाब दिया है.  

बुधवार, 28 सितंबर 2016

बिना खून खराबे के ही हमने अपने दुश्मन की रीढ़ तोड़ दी!




किसी को अगर सजा देना है तो इससे अच्छी बात ओर क्या हो सकती है कि उससे बात करना ही बंद कर दे. यह सजा उसे मारने- पीटने से भी ज्यादा कठोर होती है. पीएम नरेन्द्र मोदी यह नुस्खा अच्छी तरह जानते हैं.उन्होंने उत्पाती पडौसी को सबक सिखाने के लिये जो रास्ता चुना वह युद्व का न होकर कुछ इसी तरह का है जिसने आंंतक फैलाने वाले पडौसी को संसार में हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया. उड़ी में हमारे अठारह जवानों को शहीद बनाकर वह यह सोचने लगा था कि उसने इस आतंक के बल पर भारत की एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या को सबक सिखा देगा लेकिन उसने यह नहीं समझा कि उसके इस हथियार से बड़ा हथियार लेकर हमारे प्रधानमंत्री मैदान में है. पाक ने लुका -छिपी के खेल में हमारे देश में खून बहाया तो हमने बस इतना कहा कि तुम पानी -पानी के लिये तरसोगे तो उसके होश उड गये.पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया से अलग-थलग करने की रणनीति ने अब अपना असल रूप दिखाना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार ने जहां सिन्धु जल समझौते पर कड़ा रूख अपनाया वहीं मंगलवार को यह  बड़ा फैसला लिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवंबर में इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेंगे और अंतत: दक्षेस सम्मेलन स्थगित भी हो गया चूंकि सार्क में शामिल कोई एक देश भी अगर सम्मेलन में आने से इंकार करता है तो सम्मेलन नहीं होता. इधर बौखलाए पाकिस्तान ने भी कह दिया कि कोई आये चाहे न आये हम नवम्बर में सार्क सम्मेलन आयोजित करके रहेंगे. इस समय सार्क देशों का अध्यक्ष नेपाल है. इस मामले पर एक अच्छी बात यह हुई कि हमें कम से कम यह पता चलने लगा कि हमारे पडौस में हमारे सच्चे दोस्त कौन है.पडौसी देश बंगलादेश, अफगानिस्तान,भूटान ने तत्काल भारत के साथ सार्क सम्मेलन में भाग नहीं लेने का निर्णय लेकर भारत की स्थिति को जहां मजबूत बनाया वहीं यह साबित कर दिया कि इस लड़ाई में वह भारत के साथ है लेकिन अभी  भी बहुत से पडौसी ऐसे हैं जिनकी प्रतिक्रिया अभी मिलना शेष है. अमरीका की मीडिय़ा ने पाक को यह जता दिया कि वह मोदी की अपील को ठुकराकर भारत से पंगा न ले वरना विश्व में अछूत बनकर रह जायेगा. यह पहली बार हो रहा है जब पाकिस्तान विश्व में अकेला पड़ता नजर आ रहा है. उसे चीन की दोस्ती पर बहुत दंभ था लेकिन चीन ने आंतकवाद के मामले मेंं उसका साथ न  देने का ऐलान कर उसे अपनी औकात दिखा दी. भारत ने पाक को उरी हमले में उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत देकर यह जता दिया है कि आतंकवादियों के खिलाफ कदम उठाने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता उसके पास हीं है. सार्क सम्मेलन में भारत सहित चार देशों के भाग नहीं लेने से इस्लामाबाद में यह सम्मेलन अब नहीं होगा.पाकिस्तान ने शायद सपने में भी  नहीं सोचा होगा कि उसके नापाक चालों की आंच इतना उग्र  रूप धारण कर लेगा. सिंधु नदी  का पानी रोकने वाली बात को भी उसने  हीं सोचा.  अगर सिंधु नदी से उसे पानी नहीं मिला तो पाक में त्राहि त्राहि मच सकती है. पाकिस्तान के अस्तित्व  पर भी बैठे बिठाये संकट गहरा जायेगा. हकीकत यह कि सिंधु जल समझौते पर हमारा रूख पाकिस्तान को युद्व से भी भारी पड़ सकता है. शायद इसीलिये पाकिस्तान और बुरी तरह बौखला गया है.केरल के कोझिकोड में प्रधानमंत्री  की गर्जना  और विदेश मंत्री सुषमा सुराज की यूएन में दहाड़ ने वास्तव में विश्व को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत से मुकाबला पाकिस्तान के लिये इतना आसान नहीं है. पाक हुक्मरान भले ही परमाणु अस्त्र से डराने की कोशिश करें लेकिन हमारे पानी ने ही उसके गले को सुखाकर रख दिया. विश्व को भारत यह समझाने में पूरी तरह कामयाब हो गया है कि एक देश सीमापार से लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, इतना ही नहीं, दूसरे देशों के घरेलू मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहा है, ऐसे कठिन समय में  अधिकांश  यूरोपियन राष्ट्रों की तरफ से भी भारत को पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है.अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान से कहा है कि उन्हें हिंसा के जरिए नहीं बल्कि कूटनीति के जरिए आपसी मतभेद सुलझाने चाहिए हालांकि उसने भी स्पष्ट कहा है कि पाकिस्तान को अपनी हदों का ख्याल रखना चाहिए.




रविवार, 25 सितंबर 2016

इंसान की ताकत- बहादुरी(?) के कारनामें इंसानों पर ही




 लोग धीेरे धीरे काफी बहादुर(?) होते चले जा रहे हैं वे कभी अपनी मर्दानगीे सड़कों पर दिखाते हैं तो कभी घरों पर!... और इस  मर्दानगी का शिकार कहीं कोई अबला बनती है तो कभी कोई मासूम सी बच्ची! जबलपुर के एक संभ्रान्त परिवार की महिला ने पिछले दिनों अपनी मासूम बेटी का इसलिये कत्ल कर दिया चूंकि वह बेटी नहीं बेटा चाहती थी- उसने अपनी मासूम बच्ची को मारकर एसी के अंदर छिपा दिया. एक बहादुर(?) प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को दिल्ली में सरे आम चौबीस बार चाकू मारकर अपनी बहादुरी(?) का प्रदर्शन किया. हाल ही चेन्नई की एक अदालत ने दिलचस्प बात कही- पत्नी ने अदालत को बताया था कि उसका बहादुर? पति उसे पीटता है. अदालत ने पति महोदय को फटकार लगाते हुुए कहा कि अगर पीटना ही है तो सरहद पर जाओं वहां आतंकवादी खूब उत्पात मचा रहे हैं, उनको पीटो. ऐसे बहादुर(?) लोगो के लिये कोर्ट का ऐसा ही आदेश शोभा देता है.पता नहीं कितने लोग इसका पालन करेंगे, बहरहाल असल मुद्दा आज यही है कि देशभर में बलवान पुरूष एक  दो या तीन मिलकर किसी  भी अबला के साथ कहीं भी अत्याचार कर रहे हैं,हमारे कानून के लचीलेपन के कारण या तो ऐसे लोगो को कोर्ट से जमानत मिल रही है या फिर उन्हें बरी कर दिया जाता है. गोवा में एक विदेशी महिला से रेप करने वाले दोनो आरोपियों को निर्दोष बरी कर दिया गश्स. कानून की कमजोरी ने अपराधियों को यह मौका दिया. हमारा  कानून क्यों नहीं बताता कि यह नहीं तो इस मामले में कौन इनवाल्व था?ऐसे में तो पीढितों को कभी न्याय ही न मिले. कई ऐसे लोग मर्डर करने के बाद सबूत नहीं होने के कारण छूट जाते हैं. छूटने के बाद पीडि़त पक्ष रोता रहता है-उसे तो कहीं न्याय नहीं मिला. जिसने रेप  किया या मर्डर किया  वह सबके सामने है पर सबूत के अभाव में छूट जाता है. फिर यहां भी वही सवाल  कि आखिर रेप या मर्डर करने वाला कौन?अदालत से बरी होने के बाद पुलिस का काम खत्म ... क्यों हमारी व्यवस्था ने इसतरह के नियमों को अंगीकार कर रखा है जो पीडि़तों को न्याय ही नहीं दिला पा रही है. एक मार्मिक खबर एक रेप पीडि़ता की आई जिसमें उसके साथ तीन युवकों ने रेप किया उसकी जिंदगी  तबाह हो गई हंसता खेलता परिवार सदमें आ गया. युवकों को पकड़कर सजा भी हुई लेकिन परिवार पर जो बीती उसका मुआवजा तो इस जन्म में उसे मिलने वाला नहीं. क्यों ऐसे गलत नियमों को सुधारने  का प्रयास सामाजिक और सरकारी  तौर पर नहीं होता? पति के जेल में होने के कारण अगर किसी महिला केा अपने दुध मुंहे बच्चे पर गुसा निकालने की नौबत आये तो इसे क्या कहना चाहिये? छत्तीसगढ़ के जशपुर में एक मां ने अपनी दस माह की दुधमुंही  बच्ची को इसलिये घूसेा मार मारकर  मार डाला चूंकि उसके पास अपने पति को छुड़ाने के लिये पैसे नहीं थे. कोई भी मां इस  तरह का कृत्य अपने कलेजे के टुकड़े के साथ नहीं करेगी  मगर उसने ऐसा किया वह अब अन्य महिलाओं व समाज  की नजर में दुष्ट मां है और न जाने  क्या- क्या?गरीबी  ओर पैसे के अभाव मे इंसान की मति मारी जा रही है, वह ऐसे कृत्य करने लगा है जिसको कोई भी  इंसान होश मेें रहकर नहीं करना चाहेगा - बहरहाल समाज का  तंत्र भी कई भागों में बंटा हुआ है एक तरफ जहां दु:ख और चिंता है तो दूसरी ओर खुशी भी है. लोग जहां बच्चा न होने  से दुु:खी होकर दूसरे बच्चे की चोरी तक कर डालते हैं वहीं कुछ लोगों के यहां बच्चों की ऐसी बारिश भी हो जाती है कि परिवार इसमें खुशी से फूला नहीं समाता. ऐसा हुआ मेरठ के एक गांव में जहां एक मां ने एक साथ चार बचचो को जन्म दिया तो पुरा परिवार फूला नहीं समाया. इसे और जशपुर की घटना को जोड़कर कैसे देखा जाये?




मंगलवार, 20 सितंबर 2016

थानों में पिटाई...यह तो होता आ रहा है!


थानों में पुलिस पिटाई कोई नई बात नहीं है-यहां जात पात,ऊंच-नीच या धर्म  देखकर कार्रवाही नहीं होती बल्कि सबकुछ होता है पुलिस या खाकी की दबंगता के नाम पर...चोरी,लूट,अपहरण,हत्या जैसे मामले में थर्ड डिग्री का उपयोग जहां आम बात है वहीं पालिटिकल बदला लेने और पैसे देकर पिटाई कराने के भी कई उदाहरण हैं. इसके पीछे बहुत हद तक हमारी वर्तमान व्यवस्था स्वंय जिम्मेदार हैं जिसने थानों को कई मायनों में छुट्टा छोड़ रखा है जिसपर अक्सर किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं रहता. बड़े अफसर कभी  कबार दूर दराज के थानों  में पहुंच गये तो ठीक वरना सारा थाना वहां के हवलदार और सिपाहियों के भरोसे चलता हैॅ. छत्तीसगढ़ के जांजगीर में एक शिक्षक  के बेटे सतीश के साथ जो कुछ हुआ वह कई थानों में आम लोगों के साथ होता है. कुछ लोग झेल जाते हैं और कुछ यूं ही सतीश की तरह प्राण त्याग देते हैं. सन् 2003 में पूरे पुलिस महकमें में अंबरीश शर्मा कांड की चर्चा रही.टीआई रेंक के इस अधिकारी और उसके साथियों की पिटाई से बलदाऊ कौशिक की पुलिस कस्टड़ी में मौत हो गई. अम्बरीश और साथी पुलिस वालों पर हत्या का मुकदमा चला.अतिरिक्त सेशन जज दीपक तिवारी की अदालत से अम्बरीश शर्मा को दस साल का कठोर कारावास और पैसठ हजार रूपये जुर्माना की सजा हुई अम्बरीश के सहयोगी सब इंस्पेक्टर राजेश पाण्डे को पांच साल का कठोर कारावास व बीस हजार रूपये  जुर्माना की सजा सुनाई गई.इतना ही नहीं इस मामले में थाने के सात अन्य को भी दो दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.कवर्धा थाना के अंतर्गत 22 मई 2002 को पुलिस कस्टडी में बलदाऊ की मौत हुई थी. इस घटना में पुलिस को सजा ने संपूर्ण पुलिस महकमें में सनसनी फैला दी. थानों में मारपीट की  घटनाओं पर अंकुश सा लग गया. पुलिस का काम थर्ड डिग्री मेथड़ के बगैर संभव ही नहीं है चूंकि अपराधी कभी प्यार से पूछो तो बताता नहीं.ऐसे में पुलिस के लिये काम इतना कठिन हो गया कि इसके चलते कई मामलों में अपराधी ही पुलिस पर हावी होने लगे. बहरहाल समय के साथ सब पिछली घटनाओं को भूल जाते हैं, थाने  फिर गर्म होने लगे.  पुलिस के लिये यह एक झटका  देने वाली  बात है कि उन्हें जो  काम समझबूज से निपटाना चाहिये उनमें से निनयानवे प्रतिशत में वे बल का प्रयोग करते हैं यह काम उन लोगों पर कतई नहीं करते जो पैसे वाले हैं, जो रसूखदार है और जो किसी न किसी प्रभावशाली के रिश्तेदार हैं. ऐसे लोगों को अपना शिकार बनाया जाता  है जिसका कोई नहीं .छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में भी शायद कु छ ऐसा ही हुआ.मुलमुला थाने में सतीश नोरंगे जो एक शिक्षक का बेटा हैं कथित रूप से सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में थाने लाया गया और पुलिस कस्टडी में मौत हो गई इस मामले में एक एसआई समेत चार पुलिसवालों पर हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है इसके अलावा सरकार ने न्यायिक जांच बिठा दी है. टीआई समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 302 के अलावा थाने के स्टॉफ पर एससी-एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है.छत्तीसगढ़ में पुलिस प्रणाली  को फिर से दहला देने वाली इस घटना पर अब सरकार कई बिन्दुओं पर जांच करा रही है. हम इस बात का  स्वागत करते हैं कि सरकार ने समय पर  संज्ञान लिया और न्यायिक जांच के आदेश दिये तथा पीडि़त परिवार को छह लाख का मुआवजा और मृतक की पत्नी को  नौकरी देने  का फैसला किया लेकिन अब भी कई प्रश्न पुलिस की प्रणाली पर यूं ही सतह पर है कि संदेह या पूछताछ  के नाम पर क्या किसी भी व्यक्ति को थाने में बुलाने की प्रथा उचित है? क्या पुलिस जब किसी ऐसे संदिग्ध व्यक्ति को थाने  बुलाकर उससे पूछताछ करती है तो उसके पास क्या आधार होता है कि उसने कोई ऐसा कृत्य किया होगा? अगर पूछना ही है तो उसके पास उसके किसी रिश्तेदार को भी बिठाने की क्यों नहीं व्यवस्था की जाती? संदेही के साथ अपराधी जैसा व्यवहार क्यों होता है? उससे सच उगलवाने के लिये पिटाई की जाती है. इस पिटाई का उस समय खामियाजा क्या है जब  यह पता चलता है कि उसका दूर दूर तक इससे कोई संबन्ध नहीं है? क्या सरकारी काम में बाधा डालने जैसे अपराध की सजा थाने में पिटाई है? या उसे अदालत में पेश कर न्याय का इंतजार करना चाहिये? अक्सर पुलिस की कई मामलों में पूछताछ का आधार कुछ ऐसा ही होता आया है. पक्के सबूत के बगैर किसी को भी यूं ही तंग किया जाना एक आदत बन गई है. इससे पुलिस के प्रति लोगों का विश्वास तो घटता ही है और कवर्धा जांजगीर जैसी घटनाएं जन्म लेती है. पुलिस पर कानून का डंडा चलता है तथा अदालती कार्रवाही होती है तो पुलिस में काम करने वाले अन्य स्वच्छ छबि वाले  लोगों के लिये भी काम करना मुश्किल हो जाता है=कहने का तात्पर्य यही कि उनका नैतिक बल गिर जाता है तथा संपूर्ण व्यवस्था को कोसने मजबूर हो जाते हैं. वैसे  जांजगीर के पूरे मामले में सबूत स्पष्ट तौर पर पुलिस के खिलाफ जाता है चूूंकि मृतक  के शरीर पर पड़े  निशान पूरी तरह यह साबित कर रहे हैं कि सतीश के साथ काफी क्रूरता से पुलिस पेश आई थीॅ.चिकित्सकों की कलम पर  भी संदेह की लकीरे हैं1

सोमवार, 19 सितंबर 2016

फिर वही -ढाक के तीन पात! आखिर कब तक?


फिर वही -ढाक के तीन पात! आखिर  कब तक?
सोमवार को दिनभर चले घटनाक्रम के बाद अब यह लगभग निश्चित हो चला है कि उरी हमला भी पिछले अन्य हमलों की ही तरह जुबानी जंग के बाद भुला दी जाएगी लेकिन 17 जवानों की शहादत को देश सदैव याद रखेगा.जम्मू-कश्मीर के उरी में सेना के ब्रिगेड कैंप पर हमले ने देश को झकझोर कर रख दिया है. 17 जवानों के एक साथ शहीदी हो जाने की खबर ने चारों तरफ दुख और सनसनी फैला दी लेकिन यह खबर भी अब पूर्व की घटनाओं की तरह अतीत की बात लगने लगी. वैसे इस बार का  आक्रोश इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला चूंकि इतना बड़ा संहार एकसाथ दुश्मन इससे पहले एक ही दिन में चंद घंटो में शायद इससे पूर्व (मुम्बई हमलों को छोड़कर) कभी नहीं कर पाया.  राजनेता से लेकर अभिनेता, सांसद से लेकर आम आदमी तक, सबने एक सुर में सैनिकों की शहादत को सलाम किया और आतंक के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जरूरत बताई, इन बयानों में से ज्यादातर बयान पुरानी लीक पर थे, कोई नई बात नहीं -आजादी के बाद से ही आतंकवाद का नासूर लेकर पल रहे हमारे देश में हर आतंकी हमले के बाद कमोबेश एक जैसे बयान आते हैं 'हम हमलों की कड़ी निंदा करते हैं, आतंकियों को बख्शा नहीं जाएगा.Ó-'हम अपने जवानों की शहादत का बदला लेंगे, आतंक फैलाने वाले देश को बेनकाब किया जाएगाÓ जैसे बयानों से अखबार और टीवी पट जाते हैं. देश पर आतंकी हमलों के बाद एक तरह की जुबानी जंग शुरू होती है ठीक वैसे ही जैसे छत्तीसगढ़ मेंं माओवादी हमलों के बाद शुरू होती है मगर कभी मुकम्मल नहीं होती, हर बार देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले जवानों की शहादत भुला दी जाती है.शहादत का अंतिम संस्कार भी ऐसे कि कभी कभी तो उसमें भी रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर आ जाती है जैसा हाल ही में शहीद हुए एक जवान के शहीदी पर उसके संस्कार के लिये लकड़ी कम पड़ गई तो उसके पार्थिव शरीर के साथ जो कृत्य किया गया उसने वास्तव में यह सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि हम किस गलतफहमी के मंजर में फंसे हुए हैं. इस रविवार को फिर एक हमला हुआ है, फिर वैसे ही बयान आए हैं, जैसे पहले आते थे, मगर ये बातें कुछ ही  दिन में थम जाएंगी ... आज की सुबह आते आते थम भी गई....हां उन जवानों की शहादत भ्ी भुला दी जाएगी.उनके परिवार के लोग परेशानियों के जंजाल में फंस जायेंगे जैसे कुछ दिन पूर्व बंगलूरू में एक शहीद केपरिवार का घर ही सड़क बनाने के लिये तोड़ दिया गया. रविवार को उरी में हुआ आतंकी हमला सेना पर बीते 26 सालों का सबसे घातक हमला साबित हुआ. 17 जवानों की शहादत पर भारत गमगीन है. हम यूं ही नहीं कह रहे कि उनकी शहादत भुला दी जाएगी, पिछले उदाहरणों के साथ यह बात अपने आप स्पष्ट है. हम छत्तीसगढ़ के लोग तो यह बराबर देखते आ रहे हैं कि पिछले वर्षो के दौरान नक्सलियों ने कितने ही घर उजाड़ दिये. कितने ही परिवारों को उनके अपनों से छीन लिया यहां तक कि कई नेताओं को भी मार डाला गया लेकिन सबमें वहीं निंदा, श्रंद्वाजंलि और मुआवजे का खेल होता रहा. कोई ठोस एक्षन कहीं भी नहीं उठे कि समस्या का निदान सदा सदा के लिये कर दिया जाये. घटना के बाद विशेषकर शहीदी के बाद घडिय़ाली आंसू ऐसे फंू टते हैं जैसे कोई तूफान आ गया हो लेकिन वह जो थमता है उसका भी हश्र उसी रूके झरने की तरह होता है.नक्सलियों को तो हम अपना बताते हैं उन्हें कोई नेता अपना भाई बताता है तो कोई भटके हुए लोग-खून करदे या देश की संपत्ति को तबाह कर दे तो कोई बात नहीं लेकिन जो आंतकी देश में 26 नवंबर, 2008 को  मुंबई का आतंकी हमला कर रहा है उसमें से एक कसाब को फांसी दिलाकर ही हम खुश हो जाते हैं बाकी जो लगातार हम पर हमारेे घर में घुसकर मारके जाते हेैं उनके आंकाओं को खोजकर मारने की बाते सब चंद दिनों में ही फुर्र हो जाती है. मुम्बई  हमले में कुल 166 लोग मारे गए और 293 घायल हुए। भारत पर हुआ यह सबसे बड़ा आतंकी हमला था जिसके बाद बड़े-बड़े बयान आए, डॉजियर भी पाकिस्तान को सौंपे गए मगर आज भी भारत सरकार पाकिस्तान से तेज ट्रायल कराने को कहती है कोई ठोस कार्रवाई अभी तक नहीं हुई. 2 जनवरी, 2016 को पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ, 2 जवान शहीद हुए, जबकि 3 घायलों नेे अस्पताल में दम तोड़ा. भारतीय सुरक्षा बलों ने सभी आतंकियों को मार गिराया. देश के सैन्य ठिकानों पर इसे सबसे बड़े हमलों में गिना जाता है. एक बार फिर, हमले के बाद बयानों की बाढ़ आई, पाकिस्तान की एक टीम भी दौरा करने पठानकोट आई क्या हुआ? ऑटोमटिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड्स से लैस दो आतंकी  अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर में घुसे, घुसते ही उन्होंने अंधाधुध गोलियां बरसायी हमले में 31 नागरिक मारे गए थे और 80 घायल हुए थे.क्या हुआ? 13 मई 2008,के जयपुर धमाके में 15 मिनट के भीतर 9 धमाकों से जयपुर समेत पूरा देश दहल गया था. इन हमलों में 63 लोग मारे गए और 210 घायल हुए.1 अक्टूबर, 2001 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा कॉम्प्लेक्स पर हमला हुआं 38 लोग मारे गए. इसके बाद कश्मीर में आतंकवाद की समस्या को खत्म करने के लिए कई बैठकें की गईं, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात.यह सिलसिला चला आ रहा है पता नहीं कब तक ?

रविवार, 18 सितंबर 2016

अब समय आ गया पाकिस्तान से फिर दो दो हाथ करने का!


अब समय आ गया पाकिस्तान से फिर दो दो हाथ करने का!
हकीकत यह है कि आज पूरा देश गुस्से में हैं कि सिर्फ चार आंतकवादी पडौस से आकर हमारे सत्रह जवानों को मारकर चले गये और हमारी सरकार हमेशा की तरह सिर्फ और सिर्फ निंदा करके वही पहली बाते दोहरा कर रह गई. जम्मू-कश्मीर में सेना की एक बटालियन के मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि हम इतने कमजोर कैसे हो गये? रविवार (18 सितंबर) को पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने हमारे सब्र को तोड़कर रख दिया हैं,सबूत हमारे पास है कि उसने जो अस्त्र इस्तेमाल किए उन उपकरणों पाकिस्तान निर्मित होने के निशान  हैं क्या यह सबूत काफी नहीं  कि हम इस देश का नामोनिशान मिटा दें? सेना के शीर्ष अधिकारियों ने इस हमले को 'गंभीर झटकाÓ करार दिया। 17 जवान मारे गये और कम से कम 20 सैनिक घायल भी हो गए जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है.यह बात भी स्पष्ट हो गई हैं कि मारे गए आतंकवादियों का ताल्लुक जैश-ए-मोहम्मद संगठन से हैÓ पठानकोट हमले के बाद हमें उसी समय पाकिस्तान के खिलाफ एक्शन में आ जाना चाहिये था लेकिन क्यों हम बार बार ऐसा सोच रहे हैं कि अब मारा तो ठीक अबकी मार के देख -ऐसा कब तक चलता रहेगा? आतंकवादियों ने अत्याधुनिक हथियारों से गोलीबारी की जिससे सेना के म्प, तंबुओं और अस्थायी शिविरों में आग लग गई. वे दिनभर हमारे इलाके में घुसकर हमारे लोगों को मारते  रहे और हम सिर्फ बाते करने में ही  समय बर्बाद करते रहे. हम इस मामले के बाद आम लोगों की तरह यह सवाल पूछना चाहते हैं कि क्या हमने अपनी ताकत को यूं ही म्यूजियम में संजोकर रख्नने के लिये तैयार कर रखी है? इस हमले के बाद तो यह लगने लगा है कि हम हर हमले पर खामोश रहने की नीति पर चल रहे हैं. आतंकवादियों ने दो साल पहले भी इसी क्षेत्र के मोहरा में इसी तरह का हमला किया था. पांच दिसंबर 2014 को हुए उस आतंकी हमले में 10 जवान शहीद हो गए थे लेकिन तब भी निंदा और खामोशी का यही अदंाज रहा.इस बार हमले की चपेट में आया स्थल सेना के ब्रिगेड मुख्यालय से कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित है.हमले के समय डोगरा रेजीमेंट के जवान एक तंबू में सोए हुए थे जिसमें विस्फोट के चलते आग लग गई,आग पास स्थित बैरकों तक भी फैल गई. सलमाबाद नाला के पास एक क्षेत्र से घुसे आतंकवादियों ने इस हमले को अंजाम दिया था.पठानकोट हमले को भी लोग भूल नहीं पाये हैं. इसबार भी सरकार की तरफ से सीधे सीधे जवाब देने की जगह वही सबकुछ हो रहा है जो पिछले हमलों के बाद हुआ शायद ै  यही कारण है कि इस बार हमले के बाद लोगों का रोष सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति हो गया.हमले के बाद उनकी कही बाते लोगों को पसंद नहीं आइ्र्र ऐसे लोगों ने ट्विटर पर अपना गुस्सा जाहिर किया-कोई मोदी को जल्द से जल्द कोई एक्शन लेने के लिए कह रहा था तो कोई कह रहा था कि पीएम मोदी ने पठानकोट हमले के वक्त भी ऐसी ही बात कही थी, एक ने कहा कि अच्छे दिन की जगह बुरे दिन आ रहे हैं वहीं एक ने तो पीएम मोदी को ही आतंकी बता दिया- एक ने राम मंदिर का नाम लेकर भी बीजेपी सरकार को घेरा एक ने सवाल पूछा है, 'कड़ी निंदा करनेवाले को हटाके आप को पीएम इसीलिए बनाया था !Óजनता की तीखी प्रतिक्रियाएं उनके  आक्रोश को साफ तौर पर उजागर  करती है वहीं पाक के उस बयान ने भी  आग में घी  का काम किया हे जिसमें पाक के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने  कहा है कि अगर हमारी सलामती को खतरा हुआ और किसी ने हमारी जमीन पर कदम रखा तो हम परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेंगे हालाकि हमारी सरकार की तरफ से इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लकिन साठ सालों से हम पाक की ऐसी घमकियों को सिर्फ झेल रहे हैं. इतने युद्व कर हम उसे जमीन चटा चुके हैं अब एक बार और सही, हमें भी उससे किसी प्रकार का डर नहीं होना चाहिये-हम पूरी तरह तैयार हैं. अब या तो आर....या...पार!





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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!


एक देश,एक चुनाव: अब इसमें देरी किस बात की!

पहले प्रधानमंत्री बोले, फिर राष्ट्रपति ने मोहर लगा दी, अब  बीजेपी भी कह रही है कि एक देश एक चुनाव में हमें भी कोई आपत्ति नहीं..तो फिर देरी किस बात की- देश में पांच साल मे सिर्फ एक ही बार चुनाव होना चाहिये-बार बार के चुनाव से जनता ऊब चुकी है-चुनावी खर्च भी बहुत बढ रहा है. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति दोनों की चिंता इस विषय में स्वाभाविक है. आखिर चुनाव के लिये पैसा भी तो जनता की जेब से निकलकर ही लगता है. देश में बढ़ती हुई मंहगाई की जड़ में भी बार बार होने वाले चुनाव है.आजादी के शुरूआती दौर में सब ठीक चल रहा था लेकिन आगे आने वाले समय में यह व्यवस्था गडबडाती चली गई. देश में 26 अक्टूबर 1962 को पहली इमरजेंसी का ऐलान उस समय हुआ जब चीन ने भारत पर हमला किया इसके बाद 3 दिसंबर 1971 को भी इमरजेंसी का ऐलान हुआ जब पाकिस्तान के साथ तीसरा युद्ध हुआ तीसरी और आखिरी बार 25 जून 1975 की रात में इमरजेंसी का ऐलान हुआ और वजह बताई गई देश के अंदरूनी हालात का बेकाबू होना. तीसरी और आखिरी इमरजेंसी करीब दो साल तक लगी, इस दौरान सारे चुनाव और अन्य कई किस्म की गतिविधियों पर लगाम लग गई. इमरजेंसी हटने के बाद शायद फिर कभी चुनाव व्यवस्था पटरी पर नहीं आई.अब इसे पटरी पर लाने का प्रयास तेज हो सकता है चूंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा था कि देशभर में स्थानीय निकाय और राज्य चुनाव वस्तुत: हर साल होते हैं, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में रुकावट आती है. प्रधानमंत्री सभी चुनाव पांच साल में एक बार कराने को लेकर उत्सुक दिखे, वे यह चाहते हैं कि पंचायत से लेकर संसद तक के सभी चुनाव एक साथ होने चाहिए. वैसे सभी चुनावों को एकसाथ कराने का विचार बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी बहुत समय पहले व्यक्त कर चुके थे तथा कई संसदीय समितियों और विधि आयोग ने इस विचार के पक्ष में राय दी है. बीजेपी के सत्तारूढ़ होने के बाद बजट सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से इस विचार को अनौपचारिक तौर पर रखा, जिसको कुछ बड़ी पार्टियों ने समर्थन दिया. अब यह मामला उस समय पुन: एक नई आशा के साथ जागा है जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को शिक्षक दिवस के मौके पर सरकारी स्कूल में एक विशेष क्लास लेने के दौरान लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनावों की वकालत की-इस बयान के तुरंत बाद रायपुर में भाजपा के महासचिव अनिल जैन ने पत्रकारों को यह बताकर कि भाजपा पहले से ही इस विचार का समर्थन करती है ने अब विश£ेषको के लिये यह विषय विचार करने के लिये दे दिया है कि आगे आने वाले समय में इस बिगडी व्यवस्था को किस तरह से सरकार और चुनाव आयोग मिलकर पटरी पर लायेगी़? पटरी पर लाने के लिये एक विकल्प एक बार फिर इमरजेेंसी भी हो सकती है. 1975 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस के पास दोनों सदनों में बहुमत था. लोकसभा में कांग्रेस के 523 में से 363 सदस्य थे और राज्यसभा में उसके सांसदों की संख्या कहीं ज्यादा थी, आज भले ही बीजेपी के पास लोकसभा में 543 में से 281 सदस्य हों लेकिन राज्यसभा में उसके पास 245 में से सिर्फ 46 सदस्य ही हैं, ऐसे में अगर सरकार चाहे भी तो इमरजेंसी नहीं लगा सकती.अनुच्छेद 352 में कहीं ज्यादा सेफगार्ड्स यानी सुरक्षात्मक प्रावधान हैं. राष्ट्र्रपति बिना पूरी कैबिनेट की सिफारिश के इमरजेंसी लागू नहीं कर सकते और इस सिफारिश पर भी संसद के दोनों सदनों की कुल सदस्यों की संख्या के आधे या उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगीऔर अगर ये सिफारिश दोनों सदनों से एक महीने के अंदर पारित नहीं हुई तो इसे असंवैधानिक मान लिया जाएगा.इसके अलावा राज्य पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं. इंदिरा गांधी के समय ओडिशा, तमिलनाडु, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर और  गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन आज की सत्तारूढ़ बीजेपी मुश्किल से महज 13 राज्यों में राज करती है, इनमें से भी कुछ राज्यों में उसकी दूसरे दलों के साथ सरकार है मजबूत राज्य का मतलब पुलिस और प्रशासन पर उसकी पकड़ जो इमरजेंसी जैसे हालात में काफी अहम होती है इतना ही नहीं आज राज्य पहले से कहीं ज्यादा स्वायत्त और आर्थिक तौर पर आजाद हैं, साथ ही करीब-करीब हर राज्य में एक या दो मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी मौजूद हैं.दूसरी ओर हम न्यायपालिका की बात करें तो 1975 की इमरजेंसी में सुप्रीम कोर्ट करीब-करीब खामोश रहा था, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट कहीं ज्यादा मुखर और सक्रिय है.स ुप्रीम कोर्ट आज न सिर्फ सरकार विरोधी बल्कि जजों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं की भी सुनवाई करता है ऐसे में सरकार को चाहते हुए भी सर्वदलीय व राज्यों के समर्थन के बगैर 'एक देश एक चुनावÓ की व्यवस्था को लागू कराने में चुनौती का सामना करना पड़ेगा.












रविवार, 28 अगस्त 2016

ं शिक्षा के मंदिर में बड़े पुजारी की तानाशाही...क्यों सिस्टम फैल है यहां?



शिक्षा के मंदिर में बड़े पुजारी की तानाशाही...क्यों सिस्टम फैल है यहां?

बहुमत नहीं तो सरकार नहीं चल सकती- डेमोक्रेटिक कंट्री में ऐसा होता है लेकिन डेमोके्रेटिक कंट्री के सिस्टम में ऐसा नहीं हो रहा. सिस्टम को चला रहे कतिपय लोगों के खिलाफ सारी प्रजा एक भी हो जाये तो सिस्टम उसे बनाये रखने में ही अपनी शेखी समझता है. अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ किलोमीटर दूर आदिवासी कांकेर जिले के गढ़ पिछवाड़ी सरस्वती शिशु मंदिर को ही लीजिये यहां का पूरा
जनसमुदाय अर्थात इस शैक्षणिक मंदिर में पढऩे वाले बच्चे वहां का स्टाफ और शिक्षक सभी एक स्वर से मांग कर रहे हैं कि इस शिक्षा मंदिर के बड़े पुजारी अर्थात प्राचार्य को हटाया जाये लेकिन प्रशासन और सरकार दोनों कान में रूई डालकर छात्र-शिक्षकों और स्टाफ को मजबूर कर रहा है कि वे आंदोलन करें. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे एक व्यक्ति को किसी पद से हटा देने से वहां पहाड़ टूटकर गिर जायेगा. अगर बहुमत यह मांग कर रहा है तो उसे हटाने में क्यों देरी की जाती है. एक व्यक्ति अगर सारी व्यवस्था के लिये बोझ बनता है तो क्या हमारे देश में दूसरा कोई नौजवान नहीं है जो इस कार्य को संम्हाल सके. अक्सर ऐसा प्रश्न इस किस्म के आंदोलनों के चलने के बाद उठ खड़ा होता है. कुछ आंदोलन तो कई कई दिन तक खिच जाते हैं इसमें नुकसान न केवल सरकार का होता है बल्कि संबन्धित पक्ष को भी इसका खामियाजा भरना पड़ता है जैसा कि इस मामले में हो रहा है-प्राचार्य के दुव्र्यवहार अपशब्दों के कारण छात्रों को सड़क पर आना पड़ा.उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. तोडफ़ोड़ हुई तो सरकार का नुकसान होगा. ऐसे मामलों में तत्काल डिसीशन क्यों नहीं लिये जाते? कांकेर के गढ़पिछवाड़ी सरस्वती शिशु मंदिर के छात्रों ने शुक्रवार को स्कूल प्राचार्य के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया छात्र स्कूल के बाहर पेड के नीचे धरने पर बैठ नारेबाजी कर रहे हैं उनका आरोप है कि प्राचार्य की प्रताडऩा से तंग आकर शिक्षक स्कूल छोड़ रहे हैं। प्राचार्य छात्रों को नाली के पनपते कीड़े, मक्खी, मच्छर कहकर बुलाते हैं. छात्रों व शिक्षकों सभी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है-शिकायत पहुंचने के तुरन्त बाद संज्ञान  क्यों नहीं लिया गया? बात को बढऩे देने से अच्छा यही होता कि निर्णय तत्काल लिया जाता. वास्तव में यही नौकरशाही की कमजोरियां हैं जो जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के कार्यो का आंकलन करती है.स्कूल के छात्रों शिक्षकों ने काफी सब्र करने के बाद आंदोलन किया होगा.. चूंकि जब पानी सर के ऊपर से निकल जाता है तभी कोई व्यवस्था के खिलाफ सड़क पर उतरने का निर्णय लेता है. इस स्कूल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है जहां कई दिनों से ऐसा ही चल रहा है.शिकायतों का अंबार उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद भी वे कान में रूई डालकर बैठे हैं. एक प्राचार्य से पूरी संस्था खफा है तो इसका मतलब है कि वह पूरा तानाशाह होकर  किसी कि शह पर काम कर रहा है. इससे यह आंकलन भी किया जा सकता है कि कोई ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण दे रहा है.ऐसे में पूरे महकमें के जिम्मेदार लोगो को यह पता लगाना चाहिये था कि आखिर माजरा क्या है? अगर यह पता लगा लिया जाता तो शायद यहां तक की नौबत नहीं आती.यह एक शिक्षा विभाग का मामला नहीं है जहां इस ढंग की लापरवाही बरती जाती है जिसके चलते लोगों को आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है-पहले थोडी सी हलचल, फिर उसका विस्तार, फिर राजनीतिक हस्तक्षेप किन्तु ऐसी छोटी छोटी सी बातों को रोकने की जिम्मेदारी जिनकी होती  है वे इसे और विस्तारित करने और अंत में भारी डेमेज के बाद कोई निर्णय लेने में ही विश्वास करते हैं. इस स्कूल के बारे में भी कुछ ऐसी ही खबर मिली है जिसमें कहा गया है कि एक उच्च पदस्थ व्यक्ति के आचरण ने इस संस्था से न केवल कई योग्य शिक्षकों को अपनी नौकरी छोड़कर जाना पड़ा है वहीं कई छात्रों ने स्क्ूल जाना भी बंद कर दिया है.खबर तो यह है कि एक साल में ग्यारह शिक्षक स्कूल छोड़कर जा चुके हैं. सवाल यह भी उठता है कि इतने दिनों तक उच्च पदों पर बैठे लोगों ने इस संपूर्ण मामले  पर संज्ञान क्यों नहीं लिया?






सोमवार, 22 अगस्त 2016

आखिर सरकार को डिब्बा बंद सामान की याद तो आई!

आखिर सरकार को डिब्बा बंद सामान की याद तो आई!


कहतेे है न 'बेटर लेट देन नेवरÓ अर्थात देर आये दुरूस्त आये- सरकार ने देर से ही सही  डिब्बा बंद सामग्रियों के बारे में संज्ञान तो लिया. डिब्बा बंद सामग्रियों की मनमर्जी अब बंद होनी चाहिये यह आम लोगों की मांग है. जिस प्रकार खाद्य सामग्रियों व अन्य दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर कं पनिया मनमर्जी चलाती है उसपर रोक लागने के लिये सरकार ने अब अपना पंजा फैला दिया है. डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों पर ब्योरा पढऩे लायक हो- पहली बार इसपर गौर किया गया है. दूसरा और तीसरा कदम इसके बाद उठ सकता है, जिसमें डिब्बा बंद सामग्रियों की  क्वालिटी कैसी है, सही बजन है या नहीं इसको बनाने में कौन कौन सी  सामग्रियों का उपयोग किया गया है. इसकी कीमत अन्य प्रोडक्टस की  तुलना में कितना बेहतर है आदि तय करने की जिम्मेदारी भी सरकार को तय करना है.फिलहाल सरकार की योजना है कि 2011 के पैकेजिंग नियमों में संशोधन किया जाये इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों का पूरा ब्योरा स्पष्ट और पढऩे लायक हो साथ ही सरकार नकली सामानों से ग्राहकों के हितों के संरक्षण के लिये बारकोड जैसी प्रणाली शामिल करने जा रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने ग्राहकों के हित में विधिक माप विज्ञान (डिब्बा बंद वस्तुएं), नियम 2011 में संशोधन के लिये कई दौर की चर्चा की है.उद्योग तथा नियमों में बदलाव की मांग उपभोक्ता लगातार करते आ रहे हैं. वर्तमान स्थितियो में से किन किन बातो ंपर गौर किया जायेगा  यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन हम मानते है पैक वस्तुओं के मूल्यों में कंपनियां अपने हिसाब से कभी भी किसी समय में बदलाव कर देते हैं पहले प्रोडक्ट को कई स्कीम और कम दामों में अच्छी क्वालिटी के साथ निकाल देते हैं उसके बाद देखते हैं कि ग्राहकों का झुकाब इस ओर काफी  हैं तो वे इन वस्तुओं की कीमतों में न केवल भारी इजाफा करते हैं बल्कि इसे बाजार से कुछ दिनों के लिये गायब भी कर देते हैं ताकि इस ग्राहक को इसके पीछे दौड़ते देखे और मजा ले. दूसरी महत्वपूर्र्ण बात है पैकेड वस्तुओं में भरी हुई मात्रा का सही हिसाब किताब नहीं होना, विशेषकर टूथ पेस्ट, षेविंग क्र ीम डयूरेंट, साबुन जैसी वस्तुओं में लिखा हुआ बजन दिखाने के लिये कई टेक्रीक अपनाते हैं ताकि प्रोडक्ट को कम कर मुनाफा कमाया जाये. साबुन के मामले में छोटा बड़ा कर दिया जाता है साथ ही कोई न कोई स्कीम चालू कर जनता को बेवकूफ बना दिया जाय. ठीक इसी प्रकार टूथ पेस्ट का बहुत हिस्सा हवा भरा होता है. कुछ थोड़ी ही मात्रा में प्रोडक्ट होता है इससे ग्राहक को बहुत नुकसान होता है. फेस पावडर और बेबी फूड और अन्य कई मामलों में भी कुछ ऐसा ही होता है चिप्स बगैरह को फूला दिखाने के लिये उसमें हवा भर दी जाती है बाकी माल थोड़ा सा रहता है कीमत ज्यादा सब बड़े मजे से खाते हैं किसी को कोई आपत्ति नहीं. सरकार भी यह मानती है-उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में  एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार ''नियम-7 उत्पाद के ब्योरे के संदर्भ में शब्दों के आकार को बताता है लेकिन अधिकतर कंपनियां इसका कड़ाई से पालन नहीं करती छोटे पैकेट में फोंट का आकार इतना छोटा होता है कि ग्राहकों के लिये उसे पढऩा मुश्किल होता है इसीलिए हमने फोंट के आकार के बारे में अमेरिकी मानक को अपनाने का फैसला किया हैÓÓइस अधिकारी के अनुसार फिलहाल नाम, पता, विनिर्माण तिथि, खुदरा मूल्य जैसी घोषणाओं के लिये फोंट आकार एक एमएम से कम है अमेरिका 1.6 एमएम के आकार का पालन करता है, लेकिन अब सरकार 200 ग्राम: एमएल के लिये 1.5 एमएम रखने की योजना बना रही हैं. 200 ग्राम (एमएल से 500 ग्राम) एमएल तक के डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों पर फोंट आकार दो से बढ़ाकर चार एमएम तथा 500 ग्राम: एमएल से ऊपर के डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के लिये फोंट आकार दोगुना आठ एमएम करने का विचार है इसके अलावा,  बार-कोड या इस प्रकार के चिन्ह पेश करने की योजना बना रहा है ताकि यह चिन्हित हो सके कि खाद्य उत्पाद भारत या अन्य देश में बने हैं और नकली नहीं है साथ ही मंत्रालय डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की अधिकतम मात्रा मौजूदा 25 किलो (लीटर से बढ़ाकर 50 किलो) लीटर करने पर विचार कर रहा है, ''छोटे पैकों के लिये उपभोक्ताओं को अधिक देना पड़ता है इसीलिए चावल, आटा जैसे अन्य सामान 50 किलो लीटर के पैकेट में आएंगे इससे ग्राहकों के लिये लागत कम होगीÓÓ इससे पहले, मंत्रालय ने 2015 में नियम संशोधित किये थे.



रविवार, 21 अगस्त 2016

इतना पैसा रखकर भी हम अपने खिलाडियों को क्यों नहीं सवार पाते?


इतना पैसा रखकर भी हम अपने खिलाडियों को क्यों  नहीं सवार पाते?
किसी को इस बात पर कोई जलन या अफसोस नहीं होना चािहये कि रियो ओलंपिक में जीतने वाली  सिंधु और साक्षी पर इनामों की बौछार हो रही है,किसी को इस बात का भी अफसोस नहीं होना चािहये कि पीवी सिंधु को तेलंगाना सरकार ने पांच करोड़, आंध्र प्रदेश सरकार ने तीन करोड़, दिल्ली सरकार ने दो करोड़, मध्यप्रदेश सरकार ने पचास लाख के अलावा तीन करोड़ रुपये और अन्य खेल संगठनों ने भी पैसा देने का ऐलान किया है. किसी को इस बात का भी कोई मलेह नहीं होना चाहिये कि आंध्र सरकार ने भी उन्हें एक हजार वर्ग गज जमीन और ए-ग्रेड सरकारी नौकरी  देने का फैसला किया है. दूसरी रेसलर साक्षी मलिक जिसने कुश्ती में एक पदक जीत हासिल की  को भी  हरियाणा सरकार ने 2.5 करोड़, दिल्ली सरकार ने एक करोड़ और तेलंगाना सरकार ने  एक करोड़  रुपये देने का फैसला लिया-साक्षी को रेलवे 50 लाख और पदोन्नति देगा जबकि उनके पिता का भी प्रमोशन होगा.ऐसा होना चाहिये लेकिन यह प्रोत्साहन जीतने के बाद ही क्यों? उससे पहले प्रतिभाओं को क्येंा दबोचकर रखा जाता है? काश! खिलाडिय़ों को संवारने पर भी देश की संस्थााएं इतना खर्च करती! तो शायद पूजा जैसी राष्ट्रीय स्तर की हैंड बाल खिलाड़ी को आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता. बता दे कि पटियाला खालसा कालेज के अधिकारियों की ओर से उसे नि:शुल्क छात्रावास सुविधा देने से इनकार करने पर इस राष्ट्रीय खिलाड़ी ने  आत्महत्या कर ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे पत्र में पूजा ने अफसोस जताया कि वह गरीब है और छात्रावास के शुल्क का भुगतान नहीं कर सकती इसलिए वह मौत को गले लगा रही है. पटियाला के खालसा कॉलेज की इस छात्रा ने पत्र में प्रधानमंत्री से अपील की कि वह यह सुनिश्चित करें कि उसके जैसी गरीब लड़कियों को पढ़ाई की सुविधा नि:शुल्क मिले.इस खिलाड़ी को  पिछले साल कॉलेज में नि:शुल्क दाखिला दिया गया था जिसमें हॉस्टल सुविधा और भोजन शामिल था लेकिन इस वर्ष उसे हॉस्टल में रहने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया गया. कॉलेज तक जाने का रोज का खर्चा 120 रुपए था. उसके पिता सब्जी बेचने का काम करते हैं. वित्तीय हालत अच्छी न होने के कारण पहले तो उसने कॉलेज छोडऩे पर विचार किया बाद में यह बड़ा कदम उठाया. यहां भी खेल में घुसी राजनीति का अच्छा खासा  दृश्य सामने आया जिसमें खिलाड़ी ने अपने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए अपने कोच को जिम्मेदार ठहराया है.  सुसाइड नोट में लिखा है, उसी ने मुझे हॉस्टल का कमरा देने से इनकार किया और कहा कि वह हर दिन अपने घर से यहां आया जाया करें. इससे इस प्रतिभाशाली लड़की को हर महीने 3,720 रुपए खर्च करने होते जो उसके पिता वहन नहीं कर सकते. रियो में पदक जीतने के बाद से ही सिंधु और साक्षी पर इनामों की बौछार हो रही है. अब तक केंद्र, राज्य सरकारें, खेल एवं अन्य संगठन सिंधु को 13 करोड़ रुपये के करीब नगद देने की घोषणा कर चुकी हैं,इसके अलावा उन्हें बीएमडब्ल्यू कार और घर भी मिलेगा.साक्षी को भी करीब पांच करोड़ का इनाम दिए जाने की घोषणा हो चुकी है.जीते खिलाडियों ने देश की शान को आसमान तक  पहुंचाया है वे इस इनाम के हकदार भी है लेकिन पूरे  देश में पूजा जैसे कितने ही अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं जिन्हें तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता.खेल की गंदी राजनीति में पड़कर कइयों का भविष्य बरबाद हो जाता है. देश का नाम  रौशन कर सकने वाले कई खिलाड़ी आज भी देश में बदतर स्थितियों में गुजारा  करने मजबूर हैं. जरा सोचिए, अगर जीतने से पहले खिलाडिय़ों को संवारने पर इतना खर्च किया जाता तो शायद नतीजे कुछ और होतेा. यह हम नहीं कह रहे बल्कि  ओलंपिक में सर्वाधिक पदक जीतने वाले अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के आंकड़े बताते हैं कि वहां खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण और सुविधाओं पर ज्यादा खर्च किया जाता है यही कारण है कि पदक तालिका में ये देश आगे रहते हैं. अमेरिका, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों में खिलाडिय़ों को बहुत ही कम नकद पुरस्कार दिया जाता है.ये देश खिलाडिय़ों की प्रतिभा को निखारने पर ज्यादा खर्च करते हैं. भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी समिति के अनुसार, भारत में सिर्फ 3 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति दिन खेल पर खर्च होते हैं। खेल के मामले में अब सोच सिर्फ अमीरों के खेल  क्रि केट तक ही सीमित न रख अन्य खेल और खिलाडिय़ों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. साक्षी,सिुंधु ने तो  इस ओलंपिक में देश  का नाम रौशन कर दिया. कई गरीब  खिलाडिय़ों की कहानी भी  इस दौरान सामने आई.  कम से कम अब हमारे कर्ताधर्ताओं को सतर्क  होने की जरूरत है ताकि और कोई पूजा इस तरह का घातक कदम न उठा ले.



शनिवार, 20 अगस्त 2016

मंहगाई के दौर में नई आशाओं के साथ आये उर्जित पटेल!



उर्जित पटेल होंगे रिजर्व बैंक आफ इंडिया के नये गवर्नर. रघुराम राजन  के बाद नया गवर्नर  कौन होगा इसकी चर्चा उसी समय शुरू हो गया थी जब स्वामी विवाद के बाद रघुराम राजन ने आगे अपना कार्यकाल जारी रखने से अनिच्छा प्रकट कर दी थी. भारी ऊहापोह के बाद अंतत: भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल को आरबीआई का 24वां गवर्नर घोषित कर दिया गया. रघुराम राजन  चार सितंबर को पदमुक्त होंगे इसके बाद पटेल उनका  स्थान लेंगे. भारतीय रिजर्व बैंक में गवर्नर  नियुक्ति को  लेेकर इतनी ऊहा पोह शायद इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली. शायद रिजर्व बैंक के इतिहास  में यह पहला अवसर भी है जब इसमें गवर्नर की नियुक्ति को लेकर राजनीति ने भी अपना असर दिखाया. बहरहाल  52 वर्षीय उर्जित पटेल का अनुभव रिजर्व बैंक की कार्यप्रणाली से पूर्व से रहा है इसलि येभी इस पद पर नियुक्ति मामले में कोई नये विवाद की गुंजाइश नहीं दिखती.पटेल 11 जनवरी 2013 को रिजर्व बैंक में डिप्टी गवर्नर नियुक्त किये गये थे और इस साल जनवरी में उन्हें सेवा विस्तार दिया गया अर्थात यह भी कहा जा सकता है कि उन्हें अपने कामों के लिये प्रमोशन मिला हैं. रिजर्व बैंक में डिप्टी गवर्नर के तौर पर पटेल ने आरबीआई की उस समिति की अध्यक्षता की है जिसे मौद्रिक नीति रपट का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी, बाद में यही रपट केंद्रीय बैंक में चल रहे वर्तमान सुधारों का आधार बनी.पटेल समिति की इसी रपट के आधार पर ही मौद्रिक नीति समिति का गठन हुआ,इसके गठन से आरबीआई और उसके गवर्नर की कई सारी शक्तियां समिति के पास चली गई, इसके अलावा सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी बनाने का कदम भी इसी रपट के आधार पर उठाया गया है. स्वतंत्र मौद्रिक नीति समिति के तहत सरकार आरबीआई के लिए एक महंगाई लक्ष्य तय करेगी और आरबीआई गवर्नर यदि उस महंगाई लक्ष्य को पाने में नाकाम रहते हैं तो वह संसद के प्रति जवाबदेह होगा.आरबीआई में डिप्टी गवर्नर नियुक्त होने से पहले पटेल दि बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में सलाहकार (ऊर्जा एवं बुनियादी ढांचा) थे.उन्होंने 1990 में येल विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की, डिग्री प्राप्त की और 1986 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड से एम.फिल किया था. वह 2009 से द ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में एक अनिवासी वरिष्ठ फैलो रहे हैं कहने का तात्पर्य कि  र्योग्यता में किसी  दृष्टि से कम नहीं. वर्ष 2000 से 2004 के बीच पटेल ने कई उच्च स्तरीय राज्य एवं केंद्रीय समितियों में कार्य किया, इनमें प्रत्यक्ष कर पर कार्यबल, वित्त मंत्रालय, शोध परियोजनाओं और बाजार अध्ययन पर सलाहकार समिति, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, अवसंरचना पर प्रधानमंत्री के कार्यबल के लिए सचिवालय, दूरसंचार मामलों पर मंत्री समूह और नागर विमानन सुधार समिति इत्यादि शामिल हैं.पटेल ने कई तकनीकी प्रकाशन, दस्तावेज और भारतीय वृहद अर्थव्यवस्था पर टिप्पणियां भी लिखी हैं.
उर्जित पटेल को राजन के महंगाई के खिलाफ लडऩे वाले सैनिक के तौर पर भी जाना जाता रहा है.उर्जित पटेल उन कुछ लोगों में हैं जो कार्पोरेट जगत में काम करने के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर बने हैं. मिंट स्ट्रीट के इस शीर्ष पद पर अब तक ज्यादातर आर्थिक संस्थानों के अर्थशास्त्री और नौकरशाह ही बैठते रहे हैं.
मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन की पहचान सरकार की विभिन्न आर्थिक और यहां तक कि गैर आर्थिक नीतियों की मुखर आलोचना करने वाले गवर्नर के तौर पर बनी है हाल के महीनों में भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुब्रमणयम स्वामी सहित विभिन्न वर्गों से उन पर राजनीतिक हमले होते रहे है, ये हमले उनकी नीतियों को लेकर हुए हैं. वे तीन साल का कार्यकाल पूरा कर चार सितंबर को पदमुक्त होंगे.गवर्नर के पद पर पटेल की नियुक्ति को राजन की नीतियों को ही आगे बढ़ाने के तौर पर देखा जा रहा है. रिजर्व बैंक गवर्नर के पद पर पटेल की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब खुदरा मुद्रास्फीति छह फीसद से ऊपर निकल चुकी है और थोक मुद्रास्फीति भी 23 महीने के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है. पटेल को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए की सफाई करने के अधूरे काम को भी आगे बढ़ाना होगा हां अब सुब्रमणियम स्वामी भी खुश है तभी तो उन्होंने कहा है-उर्जित पटेल की आलोचना करना मूर्खतापूर्ण होगा जब स्वामी के एक फॉलोवर ने केन्या का नागरिक होने के कारण पटेल की आलोचना की तो स्वामी ने कहा  कि वह केन्या के नागरिक नहीं हैं- वह थे- आर 3 का जन्म भारत में हुआ और उन्होंने भारत में 2007 से रहने के बावजूद अपना ग्रीन कार्ड बरकरार रखना चुना. आर 3 रघुराम राजन का उल्लेख करने के लिए आदिवर्णिक शब्द है. इसका उन्होंने ब्याज दर ऊंची रखकर विकास को नुकसान पहुंचाने के लिए राजन पर हमला करने के दौरान कई बार इस्तेमाल किया.

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जनता के बीच के लोग...लेकिन जनता से कई आगे!




राजा महाराजाओं के दिन लद गये लेकिन हमारी व्यवस्था ने कई ऐसे महाराजा तैयार कर दिये जिनकी लाइफ स्टाइल किसी भी आम आदमी से कही ऊंची है-येह लोग अब भी प्राप्त सुविधाओं से संतुष्ट नहीं हैं उन्हेें जनता की सेवा के लिये और पैसे चाहिये. यह चाहे वेतन में बढौत्तरी के रूप में हो, चाहे भत्ते के रूप में जबकि भारत की गरीब जनता जिनकी बदौलत यह सेवक बनकर ऊंची कुर्सियों पर विराजमान हैं उनमें से कइयों को तो कपड़े लत्ते और मकान की बात छोडिय़ें एक समय का खाना भी मुश्किल से नसीब होता है.उनके बच्चों की शिक्षा  के लिये कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं? और उनके बीमार पडऩे पर उन्हें क्या  क्या बेचना पड़ता है यह किसी  से छिपा नहीं है- आप  मौजूदा उच्च सदन की बात को ही ले लीजिये -442 माननीय करोड़पति बताए जाते हैं. एक माननीय की संपत्ति 683 करोड़ भी है. वहीं एक माननीय ऐसे भी है जिसकी संपत्ति मात्र 34 हजार रुपये है. ठीक हैं यह कम वेतन पाने वाले माननीय अपने वेतन और सुविधाओं में और वृद्वि की मांग कर सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है- सभी मांग कर रहे हैं कि वेतन बढ़ाया जाये. निचले सदन में इसी जून में 57 नए माननीय और जुड गये, जिनमें से 55 करोड़पति हैं. जो सबसे अमीर माननीय हैं उनकी संपत्ति 252 करोड बताई जाती है.देश का हर आदमी शायद यह सुनकर हैरान हो जाये जब उसे यह पता चले कि माननीयों  के ऊपर हमारी जेब से निकलने वाला पैसा हर साल खजाने से उनके लिये कितना निकलता है,माननीयों को इस समय सैलरी 50,000 रुपए प्रतिमाह तो मिलती ही है जो पूरी तरह से टैक्स फ्री है.माननीयों को 3 टेलीफोन लाइन फ्री मिलती है जिनसे वह 1 लाख 70 हजार फोन कॉल हर महीने फ्री कर सकते है, इन्हें हर महीने अपने स्टाफ खर्चे के 45,000 रुपए और 15,000 रुपए स्टेशनरी व अन्य डाक व्यय आदि के मिलते है, इनके घर के अन्य खर्चे जैसे फर्नीचर, धोबी आदि के खर्चे भी सरकार या कहे जनता द्वारा ही फ्री दिए जाते है .हर माननीय अपने घर के लिए 50,000 यूनिट बिजली फ्री इस्तेमाल कर सकता है और जाहिर सी बात है की पानी तो पूरी तरह से ही फ्री मिलता है.हर  माननीय को यह विशिष्ट सुविधा हासिल है कि वह पूरे देश की किसी भी टे्रेन में कही भी फर्स्ट क्लास में फ्री यात्रा कर सकता है और इसके अलावा इन्हें साल में 34 फ्री एयर टिकट भी मिलते है.ऐसी सुविधा भारत  के किसी आम नागरिक  को नहीं मिलती-बताइयें ऐसी सुविधाओं के लिये उन्होंने ऐसा कोैन  सा तीर  मार लिया? माननीयों को सरकार या कहें कि हमारी तरफ से जो बंगला मिलता है वह पूरी तरह से सज्जित होता है अर्थात उसमे एसी, फ्रिज, टीवी पहले से ही लगे हुए होते हं और पूरे बंगले की मेंटेनेंस भी जैसे रंग रोगन, फर्नीचर आदि की देखभाल आदि का व्यय भी सरकार की तरफ से किया जाता है अधिकतर माननीय जब बीमार हो जाते हें तो उन्हें चिकित्सा व्यय केंद्र सरकार की तरफ से 'चिकित्सा सेवा योजनाÓ के अंतर्गत दी जाती है. हां जब भी कोई माननीय अधिकारिक रूप से विदेश यात्रा पर जाता है तो इन्हें फ्री बिजनेस क्लास टिकट दी जाती है तथा इन्हें दैनिक यात्रा भत्ता भी अलग से दिया जाता है जो यात्रा के लिए जाने वाले देश के ऊपर आधारित होता है.हम उन्हें  निर्वाचित करते हैं हमारे क्षेत्र में खर्च करने के लिए इन्हें हरमाह 45,000 रुपए अलग से दिए जाते है .सदन के अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए 2,000 रुपए प्रतिदिन अलग से, हर साल 3 अधिवेशन होते है जो कुल 150 दिनों के होते है और अगर आप इन सबका हिसाब जोडोगे तो कुल बनता है 3 लाख रुपए, जो सिर्फ सदन  की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए ही बनता है.अधिवेशन के दौरान माननीयों की मेम को देश के किसी भी हिस्से से दिल्ली आने के लिए 8 बार फ्री एयर टिकट मिलता है और ट्रेन से आना-जाना पूरी तरह से फ्री.  यदि कोई भी व्यक्ति इस देश में एक बार माननीय बन जाता है तो वह पूरी जिंदगी 20,000 रुपए की पेंशन पाने का हकदार बन जाता है याने नौकरी मत करों  माननीय बन  जाओं आपकी निकल पड़ेगी.अगर कोई व्यक्ति पूरे 5 साल के लिए माननीय बना रहता है तो उसकी पेंशन में प्रति वर्ष 15,00 रुपए की अतिरिक्त वृद्धि का भी विधान है.भारत  के हर माननीय को सीधे- सीधे तीन लाख रूपये तो मिलते ही हैं. इसके अलावा उन्हें किसी भी सरकारी और निजी नौकरी के अलावा किसी भी प्रकार का व्यापार करने की भी छूट है सबसे बड़ी बात यह है की अगर कोई माननीय अधिवेशन में भी शामिल नहीं होता तो भी उसे उपरोक्त सारी सुविधाएं मिलती रहेगी.अब यह माननीय मांग कर रहे हैं कि उन्हें कैबिनेट सचिव  से ज्यादा सेलरी दी जाये!





सोमवार, 15 अगस्त 2016

ओलंपिक खेलों में हमारी शर्मनाक स्थिति..साई कितना सही?


ओलंंपिक खेलों में हमारी शर्मनाक स्थिति के लिये आखिर हम किसे दोष दें.?खिलाडिय़ों को, व्यवस्था को हमारी परंपरा को,हमारी राजनीतिक व्यवस्था को या खेलों के प्रति युवाओं में उत्साह की कमी को? कारण इससे भी ज्यादा हो सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर  जो कारण दिखाई देते हैं वह यह ही है जिसके चलते हम अपने दावे पर खरे नहीं उतर सके. 19 मेडल जीतने का था दावा, दस दिनों  बाद भी खाली हाथ हाकी की टीम सहित 37 से ज्यादा एथलीटस बाहर हो गये हैं. रही सही उम्मीद जिमनास्ट दीपा की पराजय के साथ पूरी हो गई. मेडल जीतने में वह भी कामयाब नहीं रही.भारतीय हाकी टीम  बेलजियम के हाथो पराजित होने के बाद ओलंपिक खेलों से बाहर हो गई. भारत से 119 प्लेयर्स 15 गेम्स में हिस्सा लेने गए थे आधे  से ज्यादा  का सफर बिना मेडल जीते खत्म हो गया,जबकि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) ने ओलिंपिक की शुरुआत से पहले सरकार को भेजी रिपोर्ट में दावा किया था कि 19 मेडल जीते जा सकते हैं. भारत के खराब परफॉर्मेंस पर हालकि अधिकारिक तौर पर किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन चीन ने हमारी आलंपिक खेलों में शर्मनाक स्थिति पर अपने सरकारी मीडिया के जरिए जो वजहें गिनाई हैं उसे भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. इसमें दावा किया गया है कि खेलों में फंडिंग की कमी, स्पोर्ट्स ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार, शाकाहारी खान-पान और नागरिकों के ज्यादा धार्मिक होने की वजह से भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा.चीन की मीडिया के अनुसार ज्यादातर भारतीय शाकाहारी हैं और इससे खेलों में नुकसान होता है,साथ ही यह भी लिखा कि भारतीय परिवार बच्चों को खेलने के लिए प्रेरित नहीं करते हैं वे अपने बच्चों को डॉक्टर और अकाउंटेंट बनाना चाहते हैं, खिलाड़ी नहीं. रिपोर्ट में 2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स का हवाला देते हुए बताया गया है कि उसमें हुई धांधलियों ने भविष्य में किसी खेल आयोजन की उम्मीद को धूमिल कर दिया है. क्रिकेट के दबदबे को भी अन्य खेलों के लिए नुकसानदायक बताया गया है, रिपोर्ट में भारतीय सरकार का खेल को लेकर क्लियर विजन न रखने की बात भी कही गई है,चीन अपनी बातों के तर्क में कहता है कि चीनी  सरकार  ने 2001 में एथलेटिक्स, स्वीमिंग और अन्य वाटर स्पोर्ट्स में सुधार के लिए कैसी पॉलिसी बनाई वहीं भारत सरकार ने अब तक इस तरह की कोई पहल नहीं की है.विश्व ओलंपिक में चीन,जापान, अमरीका का सदैव जलवा रहता है लेकिन हमारा राष्ट्र इतना बड़ा और अच्छे खिलाड़ी होने के बाद भी दूसरे देशों के खिलाडिय़ों का किसी स्तर पर मुकाबला नहीं कर पाते.यह नहीं कि सरकार ने खेलों को प्रोत्साहित करने में ढिलाई बरती है-सरकार की तरफ से अच्छे खिलाडियों को प्रोत्साहित किया जाता है लेकिन हमारी खेल राजनीति और अच्छे खिलाडिय़ों को पहुंच वाले  खिलाडिय़ों के सामने अनदेखा करने की बहुत पुरानी  सोच ने खेल में प्रतिष्ठावान खिलाडियों को पीछे छोड़ दिया है. दीपा का ही उदाहरण ले जिम्रास्टिक में ले देकर यह खिलाड़ी आगे बढ़ी थी जिसपर अपेक्षाकृत घ्यान नहीं दिया गया बल्कि उसकी जरूरतों को तक  पूरा नहीं किया गया.हां हम बैडमिंटन के क्षेत्र में कुछ जलवा दिखा पाये हैं यहां श्रीकांत और सिंधू से पदक की उम्मीद जागी है. दोनों क्वार्टर फायनल में पहुंच गये हैं जबकि कुश्ती में विकास से भी आशा टूट गई है वह भी हार गया है.  बहरहाल हम साई के उस दावे पर भी सवाल  उठाना चाहेंगे कि उसने वर्तमान परिस्थियों में चयन की गई टीम से किस तरह ओलंपिक में 19 मेडल जीतने का दावा किया था? उसने खेल मंत्रालय को सौंपी 240 पन्नों की रिपोर्ट में कहा था कि इसमें सबसे ज्यादा चार मेडल शूटिंग में मिलेंगे लेकिन ओलंपिक में सब ठाय ठाय फिस्स हो गया.  कुश्ती में तीन और एथलीटिक्स, बैडमिंटन, बॉक्सिंग, तीरंदाजी और टेनिस में दो-दो मेडल का दावा किया था.जिम्नास्टिक और हॉकी में एक-एक पदक की बात कही गई यह सब  ऐसे कहा गया जैसे बाजार में मेडल रखा है और वहां पहुंचे खरीदकर ले आयेंगे.शर्मसार करने वाली  बात तो यह भी  है कि एक मंत्री महोदय ने वहां  जाकर जो शर्मनाक हरकत की उसने भी देश को शर्मसार किया. क्यों ऐसे लोगों को किरकरी कराने के लिये भेजा जाता है?  साई की रिपोर्ट इंडियन प्लेयर्स के हालिया प्रदर्शन और उनके इवेंट में विदेशी खिलाडियों के परफॉर्मेंस के आधार पर बनाई थी अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या साई ने भारतीय संभावनाओं को बढ़ाकर पेश किया?