सोमवार, 23 नवंबर 2015

सातवां वेतन आयोग क्या कर्मचारियों के तौर तरीको में भी बदलाव लायेगा?


सरकारी नौकरी यानी 'मस्ती-'शहंशाही नौकरी-'अलाली या जब मर्जी आये तब काम करो और निकल जाओ! सरकारी कर्मचारियों के बारे में लोगों को सदैव यह कहते सुना गया हैं 'यार काम करों या न करो तनख्वाह तो मिलना ही है. जब मर्जी आये तब आफिस जाओ, गप्पे सप्पे मारो और चाय पीने या लंच  के नाम से बाहर जाकर मटर गस्ती करते घूमते रहो. कई दिनों की छुट्टी,प्रोवीडन्ट फण्ड,बोनस, महंगाई भत्ता और भी कई सुविधाएं तो पकी-पकी  रहती है लेकिन अब आगे आने वाले वर्षों में सरकारी कर्मचारियों के लिये नौकरी कठिन होने वाली हैं.सरकार कर्मचारियों से काम लेगी, तभी पैसा देगी. अगर अलाली दिखाई तो घर का रास्ता दिखा दिया जायेगा-सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट संदेश दे रही है कि देश में और भी कई ईमानदार व काम करने वाले बेरोजगार हैं जिन्हें काम पर लगाया जा सकता है- आयोग कि सरकार को सिफारिश है कि जो अफसर या कर्मचारी काम किये बगैर कुर्सी पर बैठै- बैठे सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं उन्हें नौकरी से निकालो. आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान मे भारी बढ़ौत्तरी की है न्यूनतम वेतन सात हजार रूपये से बढ़ाकर अठारह हजार कर दिया है साथ ही भत्ते और अन्य सुविधाओं में भी वृद्वि की है किन्तु अब काम लेने का तरीका सरकार को ठीक वैसा ही रखना होगा जैसा निजी कंपनियों में काम करने वालों के साथ होता है.समय पर आओ,सद्व्यवहार करों और अच्छी तनख्वाह पाओं.सातवें वेतन आयोग में यह बात भी कही गई है कि कर्मचारी के व्यवहार,नेतृत्व क्षमता और कार्यकुशलता के आधार को भी पैमाना बनाया जाना चाहिये. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन अगले साल से मिलने की संभावना है लेकिन यह आयोगों के गठन के बाद पहला आयोग है जिसने वेतन बढ़ौत्तरी के साथ-साथ अच्छे से काम लेेने और दंडित करने का भी सुझाव सरकार को दिया है.केन्द्र सरकार के अनेक उपायों में यह रिपोर्ट खरा उतर रही है.सुधारात्मक सोच लेकर चल रही यह रिपोर्ट उसी के अनुकू ल है और संभावना इसी बात की है कि वह उसे जैसा का तैसा ही अंगीकार कर लें. वेतन आयोग ने अपनी सिफारिश में कर्मचारियों के वर्तमान वेतन लेने की मानसिकता पर जहां कड़ा प्रहार किया है वहीं पदोन्नति, वेतन वृद्वि व बोनस की मौजूदा व्यवस्था को ठीक नहीं माना है. अपने काम के प्रति कर्मचारी की बेपरवाही और कार्य का प्रदर्शन ठीक नहीं हाने जैसे मुद्दों पर भी आयोग ने ध्यान आकर्षित किया है. वास्तविकता यही है कि सरकारी काम शब्द ही वर्तमान स्थिति में हास्यास्पद बना हुआ है चूंकि लोग बोलचाल की भाषा में कहते हैं -क्या सरकारी काम जैसा कर रहे हो?

रविवार, 22 नवंबर 2015

रष्ट्रीय महागठबंधन कितना कारगर साबित होगा?क्या विचारधाराओं का संगम होगा?



बिहार में महागठबंधन को जीत क्या मिली राष्ट्रव्यापी महागबंधन बनाने की चर्चाओं का दौर चल पड़ा. यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके बारे में सोच शरू हो गई.अगले आने वाले विधानसभा चुनावों में तो संंभव हैं एक बार फिर महागठबंधन सामने आये साथ हीं राष्ट्रीय स्तर पर भी महागठबंधन कर चुनाव लडऩे की तैयारी चल रही है इसके लिये  प्रधानमंत्री प्रत्याशी की चर्चा भी शुरू हो गई हैै. लेकिन क्या पूरा देश चुनाव के मामले में दिल्ल्ी या बिहार हो सकता है?और होगा तो भी क्या इस प्रकार के दल जिनकी विचारधाराएं अलग-अलग हैं? वे कितने दिन एक साथ रह सकेंगे? या यह गठबंधन सिर्फ भाजपा और नरेन्द्र मोदी को सत्ता विहीन करने के लिये बनाया जायेगा? कई ऐसे सवाल हैं जो आगे आने वाले समय में उठेंगे बहरहाल इस समय जो माहौल चल रहा है वह बिहार चुनाव में महागठबंधन जिसमें राजद, जदयू कांग्रेस शामिल हैं की भारी विजय को लेकर है.चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश में महागठबंधन करने की तैयारी शुरू हुई थी, उसमें कांग्रेस को छोड़कर और बहुत से पार्टियों के नेता एकत्रित हुए . इस पहल के बाद ही बिहार में महागठबंधन अस्तित्व में आया जिसमें जदयू, राजद कांग्रेस के अलावा मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी भी शामिल थी जो बाद में अलग होकर अपने बलबूते पर ही बिहार में चुनाव लड़ी. अब महागठबंधन की भारी सफलता से उसमें शामिल दलों का उत्साह पूरे देश पर अपना  सिक्का जमाने का हो गया है. नीतीश कुमार को हीरो बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है जो अभी से कांगे्रस को रास नहीं आ रहा. दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी ने भी कह दिया कि प्रधानमंत्री का प्रस्तुतीकरण अभी से नहीं किया जा सकता. गठबंधनों का बड़ा दौर सन् सत्तर अस्सी के दशक में जेपी आंदोलन के साथ शुरू हुआ था एनडीए का कई दलों के समावेश के साथ जन्म हुआ उसके पश्चात यूपीए का गठन हुआ. परिस्थितिया आज भी वैसी ही है.इधर पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान शुक्रवार 20 नवंबर को एक बार फिर राजनीतिक घटना का गवाह बना। मौका तो वैसे नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार काशपथग्रहण समारोह था लेकिन यह समारोह साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई दिया। मंच पर जहां संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह कराया जा रहा था वहीं मंच के सामने वीआईपी गैलरी में गजब राजनीतिक नजारा दिखाई दे रहा था। राहुल गांधी,ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, सुखबीर बादल और शिवसेना के नेता गिले-शिकवे भुलाकर दिल खोलकर मिलते नजर आए। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी व बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, नेशनल काफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, कर्नाटक के सीएम सिद्धरमैया,असम के सीएम तरुण गोगोई, सिक्किम के सीएम पीके चामलिंग, मणिपुर के सीएम इबोबी सिंह, अरुणाचल प्रदेश के सीएम नबाम टुकी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, सीपीआईएम नेता सीताराम येचुरी, सीपीआई नेता डी. राजा, डीएमके नेता स्टालिन, शिव सेना नेता रामदास कदम व सुभाष देसाई, रालोद नेता अजित सिंह, जदयू अध्यक्ष शरद यादव, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, बीबीएम नेता डॉ प्रकाश अम्बेदकर, सांसद राज बब्बर की उपस्थिति ने यह तो बता दिया कि आगे चलकर देश की कढ़ाई में बहुत बड़ी खिचड़ी पकने वाली है.हालाकि इस मिलन में सब ठीक चला लेकिन नीतीश कुमार को अगले आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री उम्मीद्वार प्रोजेक्ट करने की क्षेत्रीय दलों की गंभीरता से कांग्रेस के अंदर खलबली मच गई नीतीश की उम्मीद्वारी को कांग्रेस
हाईकमान फिलहाल पचाने के मूड में नहीं है पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि जदयू समेत क्षेत्रीय दलों का रूख चाहे जो हो मगर पार्टी इसे भाव देने के मूड में नहीं है। वहीं बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री के खिलाफ और आक्रामक हो गए हैं. महागठबंधन अगर बनता भी है तो उसमें कांग्रस का समावेश होगा यह कहना इसलिये भी संभव नहीं है कि महागठबंधन अगर बना भी तो कांग्रेस गांधी खानदान के सिवा किसी दूसरे को प्रधानमंत्री के रूप में देखना नहीं चाहेगी इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के खिलाफ राहुल की ताबड़तोड़ बल्लेबाजी को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि 2019 में राहुल को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीद्वार के तौर पर पेश कर सकती है.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पार्टियां उनके विदेश  दौरों, वायदा पूरा नहीं करने और मंहगाई-आर्थिक नीति को लेकर प्रहार कर रहे हैं वहीं सबसे बड़ा मुद्दा इस समय यह बन रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 18 महीनो में 30 देशो का दौरा कर चुके है इससे देश को क्या मिला? आलोचक सवाल कर रहे हैं कि बार-बार विदेश दौरों की जरूरत क्यों? वे यह भी कहते हें कि प्रधानमंत्री को देश में रहकर घरेलू समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। भाजपा व एनडीए की सारी उम्मीदें चुनाव में नरेन्द्र मोदी और अमितशाह पर रही हैं. दिल्लाी और बिहार चुनाव में यह मिथ्या टूट गया अब यूपी में भी अमित शाह की चमक फीकी पडऩे लगी है.बिहार चुनाव में करारी हार के बाद पुराने नेताओं की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए उत्तर प्रदेश में अभी से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की राजनीतिक समझ और काबिलियत पर सवाल उठाएं जाने लगे हैं। पार्टी के भीतर पुरानी गुटबाजी नए जोर के साथ सिर उठा रही है जिसका असर और बढ़ सकता है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दो साल बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के टिकट बांटने के वक्त तक सिरफुटौवल का नजारा होगा.बीते लोकसभा चुनाव से ऐन पहले अमित शाह को उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी बनाया गया था. राज्य में आम चुनावों में मिली शानदार जीत को अमित शाह के नेतृत्व और सांगठनिक क्षमता का करिश्मा बताकर प्रचारित किया गया था. भाजपा में शत्रुधन सिन्हा ,आरपी सिंह जैसे बहुत से नेता हैं जो पार्टी के लिये सरदर्द बने हुए हैं अपने बयानों से पार्टी को मुसीबत में डालने वालों की भी कमी नहीं है यह सब महागठबंधन को लाभ पहुंचायेगा.लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की भारी जीत के बाद से अब का हाल देखा जाये तो सब कुछ ठीक नहीं चल रहा-बिहार में बहुत पहले जदयू ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था जबकि पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के बीच भी कुछ ठीक नहीं चल रहा. भाजपा अकेले पड़ती जा रही है इस दौर में महागठबंधन आगे चलकर बनता है तो यह उसके लिये फायदेमंद साबित होगा लेकिन इस बीच अगर नरेन्द्र मोदी ने कोई करिश्मा कर दिया तो यह इस पहल में बे्रक लग सकता है.राष्ट्रीय महगठबंधन से पूर्व कुछ राज्यों में महागठबंधन बन सकते हैं जिसके बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन का भविष्य तय हो पायेगा!





   

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

सरकारी कामगारों ने तो मंहगाई की बेतरनी पार कर ली लेकिन आम आदमी! वह तो...





सरकारी कर्मचारियों को बधाई! शुभकामना की उनका वेतन नये वर्ष से तीन गुना हो जायेगा-बढ़ती मंहगाई में उनको यह बहुत बड़ी राहत है. एक सरकारी  कर्मचारी जो अब तक सात हजार रूपये की न्यूनतम तनख्वाह पाता था वह अब अठ्ठारह हजार रूपये प्राप्त करने लगेगा.जस्टिस माथुर आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी और उसके अनुसार अब सरकार को निर्णय लेना है-यह निर्णय सरकार के अनुसार उनके द्वारा स्टडी करने के बाद जनवरी से लागू होगा परन्तु इस बढ़ौत्तरी से बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं कि सरकारी कर्मचारियों की नैया तो इस मंहगांई की धारा में पार हो जायेगी मगर शेष आम आदमी जो निजी, सार्वजनिक व रोज कमाकर खाता है उसके जीवन का क्या होगा?अभी से भारी टैक्स में फटे हाल जी रहे लोगों की जिंदगी पर अब सरकार अपने कर्मचारियों को खुश करने के लिये ऐसा तीर चलायेगी कि वे उठ नहीं सकेंगे मसलन सरकार कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने के लिये पैसा एकत्रित करने सकल कर्म करेगी- याने कर्ज लेगी, टैक्स बढ़ायेगी?अकेले रेलवे को अपने कर्मचारियों को अठ्ठाईस हजार करोड़ रूपये देना होगा. पहले से यात्रियों पर बोझ डालती आ रही रेलवे इसके लिये फर किराया,माल भाड़ा बढ़ायेगी. यह भी हो सकता है कि रेलवे निजीकरण की दिशा में आगे बढ़े. हम मानते हैं कि सरकार अपने खर्च को कम करें तो भी समस्या का बहुत हद तक हल हो सकता है लेकिन नहीं होगा.सरकार और उसके लोग अपनी सुविधाएं कभी कम नहीं करेंगे, ऊ पर से सरकार में बैठे लोग अपने वेतन में और बढ़ौत्तरी की मांग
करेंगे तथा इसे मान भी लिया जायेगा अर्थात मंहगाई से आम आदमी का पेट और पीठ दोनों एक हो जायेेगी.हकीकत यही है कि सरकारी कर्मचारियों के लिये 1.02करोड़ रूपये जुटाने के लिये खूब पापड़ बेलने पड़ेंगे लेकिन इसमें सबसे अहम बात यह भी है कि सरकार अपने कर्मचारियों को देने वाला बहुत बड़ा हिस्सा वापस अपने खजाने में एकत्रित भी कर लेगी जैसे अगर सरकार के अनुसार उसपर 1.02 करोड़ का बोझ बढ़ता है तो उसे 25 से 30 प्रतिशत पैसा कर्मचारियों को मिलने वाले पैसे में से टैक्स के रूप में वसूल कर लेगी दूसरा दस प्रतिशत पैसा कंपनियों के रास्ते सरकार की जेब में होगा चूकि कर्मचारी वेतन बढ़ौत्तरी के बाद कार,बाइक और कंज्यूमर ड्यूरेबिल गुड्स की तरफ बढ़ेगें- कर्मचारियों को खर्च ऐसे साधनों पर एक रूपये में से साठ पैसे के आसपास होगा. अनुमान है कि इस प्रकार बढ़े हुए वेतन का करीब पचास से साठ हजार करोड़ रूपये ओपन मार्केट में पहुंच जायेगा.कर्मचारियों के लिये गठित आयोगो में यह सातवां वेतन आयोग है जिसने अपनी रिपोर्ट सौंपी है. अब तक की सारी सिफारिशों को सरकार लागू कर चुकी है तथा सरकारी कर्मचारी इसका फायदा भी उठा रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो कि विख्यात अर्थशास्त्री भी हैं ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है वैसे भी नई सरकार जो मंहगाई को मुद्दा बनाकर सरकार में आई है वह टैक्सों में वृद्वि करने के अलावा मंहगाई कम करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकी है, ऐसे में मंहगाई के विकराल मुंह को मोदी सरकार इस बढ़ौत्तरी के बाद कैसे बंद करेगी यह एक यक्ष प्रश्न है. सरकारी कर्मचारियों ने तो नैया पार कर ली किन्तु आम आदमी क्या करेगा? वह कैसे अपने परिवार को चलायेगा? एक तरफ सरकारी कर्मचारियों को अभिजात्य वर्ग का दर्जा मिल गया वहीं इसके बाद महीने तनख्वाह व रोज मेहनत करने वालों का जीवन गरीबी और आर्थिक बोझ में जस की तस है जो रेगिस्तान में मृग तृष्ण की तरह चल रहा है कि कहीं आगे तो अच्छे दिन आयेंगे....





बुधवार, 18 नवंबर 2015

बोलने की आजादी का जबरदस्त दुरूपयोग अब समस्या बन रही !


देश की राजनीति का संतुलन क्यों बिगड़ रहा? शायद इसलिये भी कि देश में बोलने की आजादी का दुरूपयोग इससे पहले कभी नहीं हुआ. लोग अपना काम छोड़कर कभी सहिष्णुता-असहिष्णुता पर तो कभी व्यक्तिगत आक्षेपों को लेकर  एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में आपे से बाहर हो रहे हैं.दुख इस बात का है कि बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के बड़े लोग भी इन लफड़ो में पड़कर अपने छबि पर दाग लगवाने लगे हैं. कुछ तो एकदम अति कर रहे हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो सात समुन्दर पार बैठे लोगों को कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे.बात अगर चुनाव तक सीमित रह जाती तो भी समझ में आता लेकिन चुनावों के निपटने के बाद भी यह सिलसिला बना हुआ है. पिछले  चुनावों के बाद से कुछ ऐसा हो गया कि लोग मुंंह से बाण चलाने में ज्यादा रूचि दिखा रहे हैं. संविधान में प्रदत्त अधिकारों का जिस प्रकार अभी दुरूपयोग हो रहा है वह इससे पहले कभी नहीं हुआ. यह अब विचार करने का विषय है कि क्या लोगों को इतनी आजादी दी जानी चाहये कि वह अपनी बातों से देश की अस्मिता पर ही सवाल उठा दे. सरकार की नीितयों के खिलाफ अगर विपक्ष का हल्ला हो तो बात समझ में आती है यहां तो सीधे-सीधे व्यक्तिगत मामलों में भी प्रहार हो रहे हैं जिसका कोई अंत भी नजर नहीं आता. इसका सारा असर देश के विकास और देश की एकता व अखंडता पर भी पड़ रहा है.पूर्व के बयानों को छोड़ हाल के कुछ बयानों पर नजर डाले तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि पाॢटयां किस तरफ जा रही हैं जैसे यूपी के मंत्री समाजवादी नेता आजम खान के सुपर पावर पर दिये बयान के बाद कांग्रेस के पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर का बयान- जिसे कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने आतंक को संप्रदाय से जोड़कर कांग्रेस को ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहां चुप्पी भी कांग्रेस नेतृत्व के लिए भारी पड़ सकती है। भाजपा के खिलाफ संसद में मजबूत मोर्चा बनाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस से इस मुद्दे पर साथी भी दूर-दूर हो गये.उप्र के मंत्री व सपा नेता आजम खान ने पेरिस की आतंकी घटना को यह कहकर परोक्ष रूप से सही ठहरा दिया था कि पश्चिमी देशों ने जो कुछ किया है यह उसी का नतीजा है.दो दिन बाद ही कांग्रेस के पूर्व मंत्री अय्यर ने पाकिस्तान में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी पाकिस्तान में जाकर मोदी सरकार की आलोचना की. कांग्रेस ने उसे उनकी व्यक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड़ लिया था लेकिन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू और जावडेकर ने इसे देशद्रोह करार दिया.अब शकील का  ट्वीट भी देखिये वे उसमें कह रहे हैं कि शुक्र है कि छोटा राजन और अनूप चेतिया मुस्लिम नहीं हैं वरना मोदी सरकार कुछ और कहानी कह रही होती. इसपर भाजपा का आक्रोशित होना स्वाभाविक था. उसने कहा आतंक की घटना पर भी कांग्रेस राजनीति कर रही है वह आतंकियों को भी हिंदू और मुस्लिम के चश्मे से देख रही है। यह तुच्छ राजनीति है. इधर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद कैसे चुप रहते कह दिया- भाजपा लोगों को बांटने का काम कर रही है। चुनावों में हार के बाद कांग्र्रेस इस चिंतन में लगी है कि क्या पार्टी की छबि हिंदू विरोधी होती जा रही है? वाक युद्व में नेता ही नहीं. सन्यास लेकर राजनीति में आये कई ऐसे विद्वान भी कूद पड़े हैं जिनका हम यहां जिक्र करने लगे तो यह कालम पुरेगा नहीं इसलिये इसे यहीं विराम देते हुए यह कहना चाहेंगे कि देश में चला वाक युद्ध चाहे वह सहिष्णुता पर हो धर्म और राजनीति से संबन्धित हो अथवा  आंतकवाद अथवा अन्य मुद्दों पर वह शालीन नहीं रहा तो हमारी एकता, अखंडता और संप्रभुता सभी के लिये खतरा पैदा कर देगा.




मंगलवार, 17 नवंबर 2015

सरकारी खजाने को चूना-विभागीय जांच का ढोंग कब तक? नौकरी से क्यों नहीं हटाये जाते!




एक आम आदमी जब खर्च करता है तो सोच समझकर करता है कि कहीं आगे उसको परेशानी तो न हो जाये लेकिन क्या हमारी निर्वाचित सरकारे ऐसा कर रही है? शायद नहींं! ऐसा इसलिये भी कि उसको यह पैसा खर्च करने में दर्द नहीं होता! चूंकि यह पैसा उस साधारण आदमी की जेब काटकर प्राप्त होता है जो दिनरात मेहनत करता है.भारत जैसे गरीब देश में आम आदमी पैदा होने के बाद से लेकर अपना जीवन समाप्त होते तक इतना टैक्स पटा चुका होता है कि उसकी आने वाली पीढ़ी बिना टैक्स पटाये रह सकती है लेकिन सरकार के अनाप शनाप खर्चों ने उसकी जिंदगी को जहां टैक्स और मंहगाई के बोझ से लाद दिया वहीं भ्रष्टाचरण के चलते उसे इतनी परेशानी में डाल दिया है कि उसकी कमर ही टेढ़ी हो गई है.वैसे बहुत से उदाहरण है इसके किन्तु ताजा   उदाहरण हाल के उस वाक्ये का लें जिसमें सरकार के एक विभाग ने अपने विभाग की वेबसाइट तैयार करने के लिये जनता की जेब पर ऐसा डाका डाला कि सबके होश उड़ गये.वेबसाइट के लिये नब्बे लाख रूपये निकाले गये जबकि इस पर खर्च करीब दो लाख के आसपास आता है. जनता किससे पूछे कि यह किसने किया और ऐसा करने वालों को नौकरी से निकाला गया? जब चोर को कोई नौकरी नहीं देता तो सरकार और जनता का पैसा चुराने वालों को क्यों नौकारी पर रखा जाता है?क्या हमारे देश में पढ़े लिखे योग्य और ईमानदार लोगों की कमी है? प्राय: ऐसे मामलों की विभागीय जांच कमेटी बनाकर इतिश्री कर दी जाती है जिसका निष्क र्ष कभी आता ही नहीं! यह सरकारी विभागों का फैशन हो गया है, किसी में कोई खौफ नहीं जब तक भ्रष्टाचारियों की नौकरी
घपले घोटालों के तुरन्त बाद खत्म नहीं कर दी जाती तब तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा. आज स्थिति यह है कि सरकार की दो करोड़ की योजना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के मिश्रण से बीस करोड़ रूपये की बन जाती है.स्वाभाविक है कि भारी गोलमाल होता है. कुछ ऐसी योजनाएं भी हैं जो निर्धारित समय में पूरी नहीं होती साथ ही उसकी क्वालिटी इतनी खराब होती है कि वह जनता के उपयोग के लायक नहीं रह पाती.इन्हें तोडफ़ ोड़ कर फिर बनाया जाता है. इस पर फिर जनता का पैसा निकाला जाता है. यह एक सिलसिला सा चल पड़ा है. हममें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो विकास नहीं चाहता किन्तु विकास के नाम पर हमारी जेब भी तो मत काटो.आप सेवा ठीक से दे नहीं रहे हर सेवा पर चौदह प्रतिशत टैक्स वसूल कर रहे हैं. मनोरंजन कर,एक्साइज डयूटी,स्वच्छता कर और न जाने ऐसे कितने करों से हमें लाद दिया गया है-ऊपर से रेल किराया, बिजली किराया, टेलीफोन किराया सब पर बजट के बाद भी पिछले डोर से एंट्री की जा रही. दूसरी ओर सरकार के खुद कुछ लोग घोटाला कर आम आदमी का पैसा अपने घरो में ठूस रहे हैं उस पर बोलने वाला कोई नहीं? अब फिर माननीयों के वेतनमान में बढ़ौत्तरी की चर्चा चल रही है इसके लिये भी किसी न किसी मद पर टैक्स लगाकर हमारे जेब से ही पैसा कटेगा. आखिर कब तक सामान्य वर्ग इस आजाद देश में इस प्रकार की सरकारी मनमानी और अव्यवस्था को बर्दाश्त करता रहेगा?

सोमवार, 16 नवंबर 2015

आतंक के साये में विश्व,अब तो यह लगने लगा कि अगला सूरज देख पायेेंगे या नहीं?



एक साल के भीतर जिस तरह से आतंक का रूप विश्व में सामने आया है वह इंसानियत को सोचने के लिये मजबूर कर रहा है कि वह उसके लिये कितना खतरनाक है. भावी पीढ़ी को चिंतित होना चाहिये कि आने वाला भविष्य उसे कहां लेकर जाने वाला है? भारत हो या फ्रांस अथवा अन्य शांतिप्रिय देश सर्वत्र यह चिंता है कि निकलने वाला अगला सूरज उसे देखने मिलेगा या नहीं? जिस प्रकार जेहाद ने सिर्फ एक वर्ष में विश्व के नक्शे पर अपना सिक्का कायम किया है वह न केवल चिंतनीय है बल्कि पूरी मानवता को खतरे में डालने वाला है. हमारे प्रधानमंत्री ने ठीक कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को तय करना चाहिये कि कौन आंतकवाद का साथी है और कौन मानवता के साथ है. मानवतावादियों को कुर्बानी के लिये तैयार रहना पड़ेगा. इस्लामिक संगठन आईएसआईएस जैसा आतंकवादी संगठन जिसने सिर्फ एक साल के अंदर पूरे विश्व में अपना झंडा गाड़ दिया है कि करतूते यह साबित करने के लिये काफी है कि यह सिलसिला थमने वाला नहीं. दुख तो इस बात का है कि हमारे बीच में ही कुछ लोग सारे मामले में मीरजाफर की भूमिका अदा कर रहे हैं. विश्व के साथ भारत कई सालों से आंतक के साये में है. वह अपनी धरती पर आंतकी खून के छीटे झेल चुका है और बार-बार विश्व समुदाय को उंगली उठाकर बता चुका है कि इसे रोकोयही इसकी जड़ में है किन्तु सदैव हमारे आसुओं को अनदेखा करता रहा.अब जब खुद पर आई तो समझ आ रहा है कि भारत सही था. अब भी देर नहीं हुई है पाक-सीरिया जैसे देशों में छिपे आंतकवादियों के खिलाफ एक ठोस एक्शन की जरूरत है. भारत यह सदैव विश्व समुदाय से कहता रहा है कि हमारा पड़ोसी आस्तीन का सांप है उसे कुचलने में हमारी मदद करो लेकिन इस समुदाय के ही बहुतो ने उसपर कोई कार्रवाई करने की जगह उसे संरक्षण प्रदान किया आज इसी का परिणाम है कि वह एटम बम लेकर न केवल हमें धमका रहा है बल्कि विश्व को भी चुनौती दे रहा है. हमारी स्थिति आज यह है कि एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ शेर. हम आज अपनी सीमा के चारो तरफ एक कठिन स्थिति का सामना कर रहे हैं. हमने अपने पूर्व के अनुभवों से यह सबक तो लिया है कि हम पर आने वाले संकट में हमें कौन मदद करता है लेकिन आज की स्थिति में हम चारो तरफ से धिरे हुए हंै-हमारे पड़ोस में हमारे खिलाफ षडयंत्र का जाल बुना जा रहा है. पहला पड़ोसी नेपाल दूसरा पाकिस्तान, तीसरा चीन और चौथा बंग्लादेश दिखाने के लिये सब ऊपर-ऊपर से मित्रता का दंभ भरते हैं लेकिन हकीकत यही है कि हमें पूरी तरह अपने शिकंजे में फांसने का जाल बुना जा रहा है. हाल में जो चौकाने वाले तथ्य सामने आये हैं वह यही इंगित कर रहा है कि विश्व स्तरीय संकट की स्थिति में हमें अपने बलबूते ही अपनी रक्षा करनी होगी. आंतक और पड़ोसियों की दगाबाजी से हमें ज्यादा नुकसान न हो इसके लिये यह भी जरूरी है कि हम विश्व के देशों के साथ अपने संबन्धों को और मजबूत बनाये. इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल का स्वागत किया जाना चाहिये कि उन्होंने अंदरूनी विरोध के बावजूद विदेशों में घूमकर बहुत नहीं तो कुछ देशों से अच्छी मित्रता कायम की है जो भविष्य में हमें आतंक से निपटने में बहुत हद तक मदद करेगा.

रविवार, 15 नवंबर 2015

ट्रेड सेंटर हो या मुम्बई,पेरिस हर जगह इंसानियत ही लहूलुहान होती है!






आतंक का नाम कुछ भी हो लेकिन हर बार इंसानियत ही लहूलुहान होती है.पहले न्यूयार्क का वल्ड ट्रेड सेंटर फिर मुंबई और अब पेरिस. लश्कर और अलकायदा के बाद आतंक का नया और सबसे खौफनाक चेहरा है आईएसआईएस जिसने पेरिस हमले की जिम्मेदारी ली है.पिछले शुक्रवार की रात पेरिस में उसकी इस कारस्तानी के बाद पूरी दुनिया हिल गई, इस हमले को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आतंकी हमला माना गया है.चौदह साल पहले 11 सितंबर 2001 को पूरी दुनिया ने आतंक का वो मंजर देखा जिसे देखकर इंसानियत खौफजदा हो गई. अमरीका के मशहूर शहर न्यूयार्क पर आतंकियों ने इस तरह हमला किया कि हर कोई हैरान रह गया. विमान के सहारे दुनिया की एक आलीशान इमारत वल्ड ट्रेड सेंटर पलभर में जमीदोज कर दी गई. हजारों लोग मौत के मुंह में समा गए.दूसरा बड़ा हमला भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुआ जब आतंकियों ने कई जगह हमले किए. कई बेगुनाहों की जान ले ली. कई लोगों को बंधक भी बनाया जिसमें विदेशी पर्यटक भी शामिल थे. पूरा देश सन्न रह गया था. 24 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद सुरक्षा बलों ने जान पर खेल कर आतंकियों को मार गिराया और एक आतंकी कसाब को जिंदा पकड़ लिया था. जिसे बाद में फांसी दी गई.इधर शुक्रवार की रात पेरिसवासी अपनी धुन में मग्न थे. हर कोई वीकेंड का मजा लेने शहर की सड़कों पर था. शहर के एक बड़े स्टेडियम में खुद फ्रांस के राष्ट्र्रपति ओलांद फुटबॉल मैच का मजा ले रहे थे तभी इस खूबसूरत शहर पर आतंकियों ने कहर ढां दिया. एक साथ कई जगहों पर धमाके किए गए. गोली बारी हुई और कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया.दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस जिसने इस हमले की जिम्मेदारी ली है.वहशी बन चुका है.उसने छोटे छोटे बच्चों को अपने कब्जे में रख आंतकी बना दिया है. बगदादी जो इस संगठन का लीडर है के पास ऐसे दस हजार बच्चे हैं इनमें से ही एक पन्द्रह साल का बच्चा मानव बम बन पेरिस स्टेडियम में घुसने का प्रयास कर रहा था जिसने बाद में अपने आपको विस्फोट कर खत्म कर दिया. इस आतंकी संगठन का मकसद है इराक और सीरिया सहित दुनिया भर में इस्लामिक स्टेट का झंडा लहराना. इसी मकसद को लेकर इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया का गठन हुआ .संगठन ने अपने मकसद को हासिल करने के लिए आतंक को अपना हथियार बना रखा है.जून 2014 में इस  संगठन ने दुनिया के नक्शे पर पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई. तब इस संगठन के स्वयंभू कमांडर अबु बकर अल बगदादी ने अचानक ही एक रोज़ इराक के मोसुल और तिकरित शहरों के दरम्यान खुद को इस्लामी हुकूमत का नेता बताकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी. लेकिन इसके साथ ही बगदादी ने अपने जिस प्लान का खुलासा किया, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया.बगदादी ने कहा कि वो जल्द ही दुनिया के तमाम इस्लामी मुल्कों के साथ-साथ पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत कायम करके रहेगा मगर तब दुनिया ने आईएसआईएस को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था. उसकी वजह ये थी कि बगदादी से पहले भी दुनिया में ना जाने कितने तानाशाह पैदा हुए और बर्बाद हो गए. लेकिन इस्लामी हुकूमत के नाम पर आईएसआईएस ने जिस तरीके से क़त्लेआम की शुरुआत की, उसे देख कर सबका सिर चकरा गया. ओसामा बिन लादेन के अल-कायदा से अलग होकर पश्चिमी इराक और पूर्वी सीरिया के एक बड़े इलाके में सुन्नी आतंकवादियों का ये गुट धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा था. लेकिन बगदादी की कमान संभालते ही आतंकवादियों के इस गुट ने अपने रास्ते में आने वाले तमाम लोगों को गाजर-मूली की तरह मारने-काटने की शुरुआत कर दी. इस आतंकी गिरोह ने सिर कलम करने से लेकर, ऊंची इमारतों से नीचे फेंकने, जिंदा जला देने, बिठा कर सिर में नज़दीक से गोली मार देने जैसे नए मौत के खेल इजाद किए. और उनका वीडियो बनाकर जारी करना शौक बन गया. बगदादी की वहशी सेना के खिलाफ अमेरिका ने अपने साथी मुल्कों के साथ मिलकर अभियान शुरु किया है. दुनिया में आईएसआईएस के तमाम ठिकानों को खत्म करने योजना बनाई गई है. जिस पर काम चल रहा है. इस कार्रवाई से आईएसआईएस को बड़ा झटका लगा. मित्र देशों की यह कार्रवाई सीरिया की असद सरकार के भी खिलाफ थी. सीरिया के गृहयुद्ध में आईएस के खिलाफ हमले के मकसद से रूस भी कूद पड़ा. जिसे असद सरकार का हिमायती माना जाता है.रूस के एक विमान को भी मार गिराने में इसी संगठन का हाथ बताया जाता है पिछले साल सितंबर से हवाई हमलों में जुटा फ्रांस अब अपने सबसे बड़े युद्धपोत को मैदान में उतारने की तैयारी कर चुका है. इसी बात से आईएसआईएस बौखला गया है. अपने ठिकानों पर हुए हमलों से बौखलाकर ही उसने फ्रांस को दहलाने की साजिश रची और शुक्रवार की रात आईएस ने पेरिस पर हमला करके अपने खतरनाक इरादों को जता दिया. आईएसआईएस अब भी शांत नहीं हैं उसने शनिवार को एक वीडियो जारी कर कहा है कि  पेरिस का हमला सीरिया में दखल और पैगंबर हजरत मौहम्मद के अपमान का नतीजा है.वीडियो में अरबी बोलने वाला एक आतंकी धमकी दे रहा है कि यदि सीरिया में फ्रांस ने बमबारी जारी रखी तो हमला झेलना पड़ेगा, जब तक तुम बमबारी करते रहोगे शांति से नहीं रह पाओगे. तुम लोग बाजार के लिए निकलने में भी खौफ खाओगे.वीडियो में इस आतंकी के आसपास दूसरे लड़ाके खड़े दिख रहे हैं. इसमें सीरिया में जारी लड़ाई को हॉली वार यानी पाक युद्ध करार दिया है.आईएस ने वीडियो में अपनी ताकत बताने का प्रयास भी किया है. कहा है कि तुम लोग किसका इंतजार कर रहे हो. हमारे पास हथियार हैं. कार हैं, जो किसी भी वक्त हमला करने के लिए तैयार हैं. यहां तक कि जहर भी तैयार रखा है. वो जहर पानी और खाने में भी मिलाया जा सकता है. आईएस अब तक 11 देशों में हमले कर चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि पेरिस की घटना सबके सामने मौजूद आतंकवाद के खतरे के प्रति पश्चिमी देशों के रूख को बदलकर रख सकती है..आतंकवाद से बुरी तरह त्रस्त भारत के प्रधानमंत्री हादसे के समय घटनास्थल से चार सौ अस्सी किलोमीटर दूर थे . उन्होने पेरिस में हुए बर्बर आतंकवादी हमले को 'मानवता पर हमलाÓ बताते हुए  मांग की कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए संयुक्त राष्ट्र को आतंकवाद को परिभाषित करना चाहिए जिससे दुनिया यह जान सके कि कौन आतंक का समर्थन कर रहा है और कौन उसके खिलाफ है.दुनिया को यह स्वीकार करना चाहिए कि यह केवल पेरिस पर हमला नहीं है, केवल फ्रांस के नागरिकों पर हमला नहीं है और न ही केवल फ्रांस पर हमला है बल्कि मानवता पर हमला है. प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं चाहूंगा कि अपनी 70वीं वषर्गांठ मनाते समय संयुक्त राष्ट्र् आतंकवाद को परिभाषित करने को लेकर और समय न गंवाएं. प्रस्ताव उसके समक्ष है. जिससे कि हमें यह पता लग सके कि कौन आतंकवाद के साथ है, कौन आतंकवाद की मदद कर रहा है, कौन आतंकवाद को समर्थन दे रहा है और कौन आतंकवाद का शिकार है, कौन आतंकवाद के खिलाफ है और कौन मानवतावाद के साथ रहकर कुर्बानी देने को तैयार है.

शनिवार, 14 नवंबर 2015

इतिहास को इतिहास के पन्नों पर ही रहने दो, देश की सोचो!



इतिहास पुरूषों को इतिहास में ही रहने दीजिये,देश की सोचिये- परिवार के किसी के भी गुजरने का गम पूरे परिवार व सगे संबन्धी को रहता है और यह  देश का महान व्यक्ति रहा तो यह दायरा ओर बढ़ जाता है लेकिन ईश्चर ने हम मनुष्यों को इतनी शक्ति तो दी है कि हम कुछ दिनों में ही उनके जाने के गम को भूलक र अपने काम में जुट जाये. हर मृतात्मा की याद तो बहुत आती है लेकिन सिर्फ उसे ही याद करके हमारा बाकी जीवन तो नहीं चल सकता. कुछ दिनों से देश में इतिहास के पन्नों को खोजकरआत्माओं को डिस्टर्ब करने का खेल शुरू हुआ है जो किसी के लिये राजनीतिक रोटी पकाने का साधन बन गया तो किसी के लिये अपने को खोने और उनकी आत्मा की शंाति के लिये सकल कर्म करने का! क्या कुछ ऐसा ही कर्नाटक में नहीं हो रहा जहां इतिहास पुरूषों को इतिहास के पन्नों से निकालकर सड़क पर हल्ला मचाने के लिये ला खड़ा किया गया है? कर्नाटक में कांग्रेस का राज है, यहां पिछले कुछ महीनों से जो कुछ हो रहा है वह किसी भी सभ्य व्यक्ति के गले नहीं उतर रहा. इतने दिनों बाद अचानक एक मृत महापुरूष को अचानक उनकी जयंती मनाने का सपना किसने देखा और यह क्यों साकार करने की ठानी? ऐसी कौनसी उपलब्धि इस आयोजन से मिल जायेगी जिससे राज्य या देश का भला होगा? हम इस विषय को यही छोड़ देश में मृतकों के नाम पर जो कृुछ हो रहा है उसकी ओर प्रबुद्व वर्ग का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जो इतिहास पुरूप हो गये उन्हें अपने पन्नों पर ही रहने क्यों नहीं दिया जा रहा? क्यों उन्हें बुत बनाकर किसी चौक चौराहे पर प्रदर्शित किया जा रहा ? कुछ दिन या खास दिन तो उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोडी जाती लेकिन बाद में उनकी मूर्तिया या उनकी सड़क, उनके नाम से भवन धूल गंदगी  खाती पड़ी रहती  है या फिर पक्षियों को बीट करने व आते जाते लोगों को उनके सामने लघु शंका करने के लिये छोड़ दिया जाता?क्यों लोग यह नहीं समझते कि हम एक तरह से उन इतिहास बन गये लोगों की मूर्ति को चौराहे या सड़क गलियों में स्थापित कर उनका सम्मान करने की जगह पूर्णत: उनका अपमान कर रहे हैंै-देश की आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी में से तो कई महात्मा गांधी, भगतसिह, सुुभाषचंद बोस के बारे में कुछ नहीं जानते लेकिन इतिहास के पन्ने यह उन्हें जरूर बता देते हैं कि वे कौन थे और उनका योगदान क्या था. मगर राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिये नामकरण, मूर्ति स्थापना करना यह किसी को याद करने की जगह उनका अपमान ही करता है. कई लोग तो इन महान हस्तियों का उच्चारण भी सही ढंग से नहीं कर पाते.कुछ माननीय ऐसे भी हैं जिन्हें यह भी पता नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कौन था?आज देश कई किस्म की समस्याओं से ग्रसित है आने वाले समय में यह समस्याएं और जटिल होंगी.यदि हम इतिहास के पन्ने पलटकर एक के बाद एक मृतआत्माओं को सड़क पर लाना शुरू कर देंगे तो शायद देश की सड़के ऐसी आत्माओं से भरने के लिये कम पड़ेंगी,अत: जो इतिहास हो गया उसे इतिहास ही रहने दो उसे आज की गंदी राजनीति मे मत घसीटो वरना अभी कर्नाटक में तीन मरे हैं आगे चलकर देश की सड़कों पर इतनी लाशें बिछ जायेंगी कि उसे हटाना मुश्किल हो जायेगा. सवाल उन राजनीतिक पार्टियों से भी है जो देश के बारे में और दुनिया में बढ़ते आतंक के बारे में सोचने की जगह इन मृत आत्माओं की याद अचानक करके हल्ला मचा देते हैं? जबकि जनता की अपनी ही समस्याएं इतनी ज्यादा है कि निपटायें नहीं निपटती....और तो ओर अब इन पुरानी आत्माओं को लेकर कई लोगों की जिंदगी पर बन आई है-धमकी चमकी और मारकाट का दौर शुरू हो गया..कोई तो आगे आये जो पहले इनको समझायें!!!!

रविवार, 8 नवंबर 2015

बिहार चुनाव भविष्य में देश की राजनीति को नये मोड़ पर ले जायेगा?




अब कोई लाख कितना भी कहे मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का ग्राफ तेजी से गिरा है.बिहार के चुनाव में इतनी बड़ी पराजय होगी इसकी कल्पना नहीं की थी-चुनाव से पूर्व जो सर्वेक्षण महागठबंधन के पक्ष में आये उसकी संभावना मतगणना के शुरूआती रूझान में जरूर धूमिल होते नजर आई लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि मोदी लहर बिहार में खत्म हो चुकी है.इन नतीजों के पूर्व शनिवार को त्रिवेन्द्रम के स्थानीय चुनाव में भाजपा को मिली सफलता ने उन्हे जरूर इस बात की उम्मीद दिलाई थी कि बिहार भी उनके हाथ में होगा. दिल्ली में हार का बदला लेने पूरी तरह कमर कसकर भाजपा ने बिहार में अपना दाव खेला था किन्तु उसे सफलता नहीं मिली.असल में भाजपा की सबसे बड़ी गलती तो यह रही कि बिहार में उसने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार की ताकत को कम आंका और पूरे विश्वास के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतीष्ठा को ही दांव पर लगा दिया. प्रधानमंत्री देश का प्रधानमंत्री न होकर उन्हें पार्टी का प्रधानमंत्री बना दिया गया. अकेले अमित शाह को प्रचार अभियान की बागडौर सौंप दी जाती और कुछ अन्य स्टार प्रचारकों के हाथ मेंं यह काम सौंपा जाता तो शायद पार्टी को इतनी छिछलालदर का सामना करना नहीं पड़ता. चुनाव के दौरान पार्टी के कतिपय नेताओं के बड़बोलेपन ने भी पार्टी की साख को जनता के सामने एकदम  गिराकर रख दिया. ऊलजलूल मुद्दे उछालने से यह कहा जा सकता है कि इससे पार्टी को पूरी तरह नुकसान का ही सामना करना पड़ा. दूसरी प्रमुख बात यह कि  दिल्ली और बिहार दो राज्य हाथ से निकल जाने के बाद अब आगे होने वाले कुछ और अन्य विधान सभा चुनाव के लिये भाजपा को अपनी रणनीति में भारी बदलाव करना पड़ेगा. दूसरी साख में आई गिरावट का असर देश की राजनीति में पडऩा स्वाभाविक है. एक बात इस चुनाव में साफ हो गई कि अब जनता को भरमाने, उसे ठगने के दिन लद गए. दोनों खेमों अर्थात एनडीए और महागठबंधन ने खूब मेहनत की लेकिन चुनाव के आखिरी दौर में जो चुनावी विश£ेषण आया वह साफ यह बता रही थी कि महागठबंधन अर्थात लालू नीतिश कुमार की जोड़ी को अच्छी सफलता मिलने वाली है. यह हुआ भी साथ ही गठबंधन में शािमल पार्टियों ने भी बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया. कांग्रेस गदगद है तो दूसरी तरफ एनडीए में रामविलास पासवान और जितन राम मांझाी को लगे झटके इतने तेज हैं कि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य ही खतरे में आने लगा  है.यद्यपि अभी जब हम इन पंक्तियों को लिख रहे हैं तबतक चुनाव परिणाम पूरे नहीं आ पाये थे फिर भी यह तय हो चुका है कि महागठबंधन सरकार बना रही है और भाजपा ने हार स्वीकार कर ली है ऐसे हालात में लालू की पार्टी बड़ी पार्टी के रूप में उबर रही है और मुख्यमंत्री पद के लिये भी कोई विवाद नहीं है नीतिश ही मुख्यमंत्री होगें यह शरद यादव ने स्पष्ट कर दिया है. आगे आने वाले समय में महागठबंधन देशभर में क्या रणनीति बनायेगा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन भाजपा में अंदर ही अंदर बहुत कुछ हो सकता है.


शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता सिद्ध की,अभी भी देश में हजारों मुकदमें विचाराधीन!



फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता
सिद्ध की,अभी भी देश में
हजारों मुकदमें विचाराधीन!

26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12

लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.




फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता
सिद्ध की,अभी भी देश में
हजारों मुकदमें विचाराधीन!

26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12

लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.






26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12 लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.





गुरुवार, 5 नवंबर 2015

फ्रीडम ऑफ स्पीच का दुरूपयोग करने वालों को सरकार का करारा जवाब!


यह पहला अवसर है जब मोदी सरकार ने फ्रीडम ऑफ स्पीच का दुरूपयोग करने वाले किसी बड़े शख्स को लपेटे में लेकर देश को एक संदेश देने का प्रयास किया है कि इस स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि कोई किसी के खिलाफ कुछ भी बोलेे और सरकार यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठै रहे.-होम मिनिस्ट्री ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि फ्र ीडम ऑफ स्पीच के नाम पर लोगों को किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए. इससे अशांति फैलेगी और दंगे होंगे. सरकार का यह रुख बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के उस पिटीशन पर आया है, जिसमें उन्होंने हेट स्पीच से जुड़े आईपीसी के सेक्शन 153, 153,153क, 295, 295, 298 और 505 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए थे. केंद्र ने स्वामी के खिलाफ हेट स्पीच के मामले में केस चलाए जाने को भी सही ठहराया है.सरकार का यह रूख उस समय सामने आया है जब देश में इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है. हैट स्पीच और इनटोलेंट बहस का प्रमुख मुद्दा है ऐसे समय सरकार का रूख साफ होने से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामें के रूप में पेश होने के बाद उन लोगों के मुंह पर लगाम लग सकती है जो इस मामले को लेकर सरकार को कोसती रही है और सरकार को असहिष्णु करार दे रही है.केंद्र की ओर से दाखिल एफेडेविट में स्वामी की एक बुक पर कहा गया है कि इस किताब में ऐसा कंटेंट है, जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत को बढ़ावा देता है. इस तरह से पिटीशन लगाने वाले ने आईपीसी की धाराओं का उल्लंघन किया है. स्वामी की पिटीशन पर केंद्र सरकार ने इस साल जुलाई में केंद्र से जवाब मांगा था. केंद्र के हलफनामे में कहा गया है-अगर लोगों को भारत के विभिन्न ग्रुपों के बीच नफरत फैलाने के लिए आजाद छोड़ दिया जाए तो अशांति फैल जाएगी.दंगे या दूसरे अपराध हो सकते हैं. सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा और विभिन्न वर्गों के बीच कड़वाहट बढ़ेगी. इससे समाज की शांति-व्यवस्था में दिक्कत आएगी. केंद्र सरकार के मुताबिक, हेट स्पीच से जुड़े कानूनों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते, क्योंकि संविधान भी नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वाजिब कंट्रोल की मंजूरी देता है. इन कानूनों से समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने में मदद मिलती है जबकि बीजेपी नेता स्वामी के खिलाफ दिल्ली, मुंबई, असम, मोहाली और केरल में हेट स्पीच के कई केस चल रहे हैं.उन्होंने आतंकवाद पर अपनी राय जाहिर की थी, जिसके बाद उन पर नफरत फैलाने के आरोप लगे. स्वामी ने अपनी पिटीशन में आरोप लगाया कि हेट स्पीच से जुड़े कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों में दखल देते हैं,इनका इस्तेमाल अपनी राय जाहिर करने वाले लोगों के खिलाफ हो रहा है. स्वामी का यह भी कहना था कि वर्तमान कानूनों की वजह से कोई शख्स लोगों की सोच बदलने के लिए पब्लिक डिबेट नहीं कर सकता क्योंकि इन कानूनों से उसे चुप करा दिया जाएगा.अब सरकार के हलफनामें के बाद सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में रूख साफ होगा.

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

नन्ही रेप पीडि़ता की नन्हीें बच्ची के जीवन में खुशी ऐसे लौटायेगा हाई कोर्ट!


नन्ही रेप पीडि़ता की नन्हीें
बच्ची के जीवन में खुशी
ऐसे लौटायेगा हाई कोर्ट!
हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस शाबिबुल हसनेन और न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय के उस एैतिहासिक फैसले का स्वागत करते हैं जिसमें उन्होंने एक ऐसी बच्ची को जीने की राह दिखाई है जो एक तेरह साल की बच्ची से रेप के बाद पैदा हुई. न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में यूपी सरकार को आदेश दिया है कि वो विक्टिम के नाम 10 लाख रुपए की एफडी कराए. सरकार विक्टिम की बेटी की देखभाल करे. इसके अलावा, विक्टिम के एडल्ट होने के बाद उसकी नौकरी का भी इंतजाम करें. सवाल यह भी पैदा हुआ है कि क्या इससे समाज को कोई संदेश जायेगा और व्यवस्था में कुछ सुधार होगा? इस फैसले के तुरन्त बाद थाने में रेप पीडि़ता के पिता ने रिपोर्ट लिखाई है कि रेपिस्टों ने उनकी दूसरी बेटियों से भी रेप की धमकी दी है-कोर्ट के फैसले के बाद अब समाज और पुलिस दोनों का दायित्व और बढ़ गया है कि वह अपने बेटियों की हैवानों से रक्षा कैसे करें. रेप पीडि़ता का यह मामला अबार्शन की मांग को लेकर  सात सितंबर को हाईकोर्ट पहुंचा था,उस समय मेडिकल जांच कराने की सलाह दी गई. जांच के बाद डॉक्टरों की टीम ने यह कहकर इजाजत देने से मना कर दिया कि प्रेग्नेंसी साढ़े सात महीने की हो चुकी है. लड़की ने 26 अक्टूबर को क्वीन मेरी हॉस्पिटल में बच्ची को जन्म दिया.बहरहाल  कोर्ट का फैसला इतना महत्वूपूर्ण और ऐतिहासिक है कि इससे पीडि़तों को तो कुछ हद तक राहत व न्याय मिलेगा लेकिन जो दाग उनके शरीर में लग जाता है उसे मिटाने में समाज कितनी बड़ी भूमिका अदा करेगा यह एक यक्ष प्रश्न की तरह अब भी मौजूद है.चूंकि रेप पीडि़ता को जिंदगीभर के लिये इस कष्ट को झेलना अनिवार्य हो जाता है जिसमें से कई पीडि़ताएं तो ऐसी होती है कि जो इसे सहन नहीं कर पाती और अपना जीवन ही खत्म कर देती है. ऐसे में दुष्टों के लिये कानून को और कड़ा करने की जरूरत है जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि नाबालिगों से दुष्टाचार करने वालों को नपुंसक बना दिया जाना चाहिये जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि नाबालिगों से दुराचार करने वाले लोग पशु हैं. इन दोनों फैसलों पर गौर कर सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिये कि कोई रेप जैसी हैवानियत का विचार ही न कर सके और अगर करता है तो उसकी कठोर सजा भुगतने के लिये भी तैयार रहे. बहरहाल रेप पीडि़त बच्ची के बच्चे मामले मेंं जो फैसला आया है उसमें गौर करने वाली बात है कि अब इस मामले में सरकार को विक्टिम के फ्यूचर के लिए पूर्व में पीडि़ता को दिए गए 3 लाख रुपए के अलावा 10 लाख की एफडी भी करानी होगी. विक्टिम के 21 साल होने पर उसे यह रकम सौंप दी जायेगी. विक्टिम की नवजात बच्ची का मेडिकल चेकअप करने के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को अडॉप्शन के लिए सौंप दिया जाएगा.विक्टिम की पढ़ाई के लिए राज्य सरकार कस्तूरबा गांधी विद्यालय में बिना किसी टेस्ट के एडमिशन दे. पढ़ाई से लेकर हर जरूरत की चीज मुफ्त में मुहैया कराई जाएगी. इस दौरान खाने और रहने की व्यवस्था भी राज्य सरकार को करना होगा. एक गंभीर बात उच्च अदालत ने कही है कि बच्चा चाहे रेप से ही क्यों न पैदा हुआ हो उसे अपने बायोलॉजिकल पिता की संपत्ति में अधिकार है लेकिन इस मामले में अभी आरोपी की संपत्ति में बच्ची को अधिकार के बारे में आदेश नहीं दिया गया है क्योंकि इससे कई कानूनी पेचीदगियां पैदा हो जाएगी चूंकि आरोपी को दोषी भी करार नहीं दिया गया है.संभावना है कि आगे आने वाले वर्षों में कानून में कुछ ऐसे संशोधन हो सकते हैं जो देश से इस बुराई को सदा के लिये खत्म करने में अहम भूमिका अदा करें.

सोमवार, 2 नवंबर 2015

असहिष्णुता क्यों सर चढ़कर बोल रही है! क्यों अचानक ऐसे हालात पैदा हुए?



अंग्रेजी के शब्द इनटोलेरेन्ट को हिन्दी में कहते हैं असहिष्णु अर्थात असहनशीनता या न बर्दाश्त करने वाला.यह नेताओं के साथ साथ उन सैकड़ों लोगों की जुबान पर भी है जो देश में असहिष्णुता के कारण गुस्से में हैं इनमे कलाकार भी हैं,इतिहासवेत्ता भी है समाजसेवी भी, वैज्ञानिक भी और फिल्मकार भी और आगे आने वाले समय में और भी कई लोग जुड जाये तो आश्चर्य नहीं. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?अगर साफ तौर पर आम आदमी की भाषा में कहेे तो यह सब कुछ पैदा हो रहा है कुछ लोगों की असहिष्णुता के कारण- वैसे इसके कई उदाहरण है कि न्तु जब जनप्रतिनिधियों व ब्यूरोक्रेटस में सहिष्णुता नहीं रह जाती तो इसका व्यापक असर समाज पर होता है एक उदाहरण से स्पष्ट है-मध्यप्रदेश की एक मंत्री है कुसुम मेहदले, वे प्रदेश में समाज कल्याण व बाल विकास विभाग सम्भालती है-स्वाभाविक है विभाग के अनुरूप उन्हें संवेधनशील व पोलाइट होना चाहिये लेकिन वे क्या संवैधनशील अथवा पोलाइट हैं? नहीं, चूंकि उन्होनें सड़क पर भीख मांगते बच्चे को अपने समीप पाकर उसे लात मारकर दूर कर दिया.उसका कसूर बस इतना था कि उसने कहा दीदी मुझे एक रूपया दे दो. वह तो भड़की उनके सुरक्षा जवानों ने भी उसे धक्के मारकर अलग कर दिया. दूसरा एक ब्यूरोक्रेट का है जिसे एक महिला से उसकी बात न सुनने व अभद्र व्यवहार के कारण स्थानान्तर कर दिया. ऐसे लोगो को तो एक मिनिट भी पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है बहरहाल देशभर में इनटोलेरेंट की घटनाओं की बाढ़ ने सभी को सोचने के लिये विवश कर दिया है कि इसका क्या सोल्यूशन निकाला जाये? बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी की जुबान पर भी असहिष्णुता की बात आ गई लेकिन इसके निदान पर कोई टिप्पणी नहीं हुई.बिहार चुनाव के दौरान तो नेताओं ने सारी हदे पार कर दी. असहिष्णुता अब देश में सर चढ़कर बहने लगी है.लोग समझने भी लगे हैं कि यह सब राजनीतिक स्वार्थ सिद्वी का प्रयास हैं.कर्नाटक के कलबुर्गी ओर दो तीन ऐसे लोगों की हत्या हुई तथा उत्तर प्रदेश में गाय का मांस खाने के अफवाह पर  एक व्यक्ति की पीटपीटकर हत्या करदी गई. एक दलित परिवार को जिदंा जलाकर मारने की कोशिश की गई -इस मामले में परिवार के दोनों बच्चे जिंदा जल मरें.महिलाओं से पशुता से भी बदतर व्यवहार असहिष्णुता की ऐसी मिसाले पूरे देश में है इसके चलते देश के लेखक साहित्यकार, इतिहासकार, वैज्ञानिक पहले सामने आये उन्होंने विरोधस्वरूप जहां अपने एवार्ड वापस किये वहीं कतिपय लोग इसकी तैयारी में है यह सब सरकार को सही रास्ते पर लाने का है ताकि वह लोगों के प्रति सहिष्णु बने- इस कड़ी में अब प्रसिद्व फिल्म अभिनेता शाहरूख खान भी सामने आ गये हैं उन्होंने भी अपने पुरस्कार वापस देने की बात कह दी है.देश की एकता, संप्रभुता बनाये रखने के लिये यह जरूरी है कि सहिष्णुता बनाये रखा जाये. इसे खत्म करने की कोई भी कौशिश देश को नुकसान ही पहुंचायेगी जो किसी भी राष्ट्रवादी को पसंद नहीं.