शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

मुद्दे की बात को किनारे कर फिजूल की बातों पर यह कैसा शोर?



कांग्रेस के कुशासन से त्रस्त जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ नई सरकार बनाने की भूमिका निभाई थी? क्या वह जनता के विश्वास पर खरा उतर रही है? वास्तविकता कुछ यही कह रही है कि जनता को दिये वायदे सब खोखले निकल रहे हैं और सरकार जनता को किये गये वायदों से पीछे हट गई है, सरकार ने जो सपने दिखाये थे वह कोरी कल्पना बनकर रह गये हैं.सरकार स्वयं  आइने के सामने आये तो उसे सारी चीजे साफ दिखाई देगी कि वह अपने  वायदों से कितनी दूर चली गई है. देश में नाराजगी और अस्तिरता का माहौल निर्मित हो रहा है.विपक्ष तो अपना काम इस मामले में हवा देने का कर ही रहा है किन्तु सरकार के अपने लोगों की तरफ से भी जो बाते हो रही है वह समाज को एक गलत संदेश दे रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बड़े मुद्दों पर देर तक चुप रहते हैं तब तक पानी सर से उतर चुका होता है.देश को इस समय मन की बात नहीं दिल से दिल मिलाने की जरूरत है-सहित्यकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक नाराज हैं, भले ही सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही किन्तु इसे अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता .एक आक्रोश तो आम जनता में भी है- मंहगाई, भ्रष्टाचार तथा कथित अव्यवस्था से लोग परेशान हैं.कभी किसी मुद्दे को लेकर बहस छिड़ती है तो कभी किसी बेतुके बयानों पर हंगामा खड़ा होता है ऐसा लगने लगता है कि कानून की पकड़ कहीं नहीं है. इधर महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी के लिये रसोई एक समस्या बन गई है.शिक्षा,रोजगार स्वास्थ्य सब बेईमानी साबित हो रही है खाने की चीजों के दाम आम आदमी की पकड़ से बाहर है- प्याज के दाम से शुरू हुईमंहगाई दाल तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में यही हाल रहा तो  और भी कई वस्तुओं को अपनी लपेटे में ले लें तो आश्चर्य नहीं.दाल दो सौ रूपये की रिकार्ड बिक्री पर चल रहा है जमाखोर पूरा फायदा उठा रहे हैं जबकि बाजार पर से सरकार की पकड़ एकदम कमजोर होती दिख रही है.विकास के नाम पर जहां सरकार ने रेलवे में मालभाड़े से लेकर यात्री किराये तक में भारी वृद्वि की है वहीं सर्विस टैक्स और ऐसे अनेक टैक्सों में बढ़ौत्तरी कर जनता को बेकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है. एक  के बाद एक उपभोक्ता सेवाओं की फीस में बढ़ौत्तरी ने आम आदमी को तो कहीं खड़े रहने लायक ही नहीं छोड़ा है.कभी बिजली की दरों में वृद्वि तो कभी संपत्ति कर में बढ़ौत्तरी और कभी सफाई के नाम पर करों का बोझ एकदम समझ के परे वाली बात हो गई है.सबसे दिलचस्प बात तो यह कि अपनी असफलताओं को छिपाने का खेल भी बड़े स्तर पर जारी है इस बीच सवाल यह उठ रहा है कि जमाखोर और भ्रष्टाचारियों के पास एकत्रित धन को क्यों नहीं पब्लिक किया जा रहा? जमाखोरों से जब्त सामग्री को तत्काल बाजार में उतारा जाये. भ्रष्ट अफसरों और कालाबाजारियों से पांच-पांच दस-दस हजार करोड़ रूपये अगर जब्त किये जा रहे हैं तो उसे पब्लिक का टैक्स बोझ कम करने के लिये क्यों नहीं उतारा जा रहा?

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

फेसबुक और व्हाट्सअप में दुनिया तो जुड़ेगी लेकिन क्या साधू और शैतान भी रहेंगे?



मार्क जकरबर्ग भारत आये और उन्होंने फेस बुक को पूरे विश्व में फैलाने की बात कही. वे चाहते हैं कि एक अरब लोग आन लाइन हो जाये,वे यह भी कह रहे हैं कि भारत के बगैर दुनिया से नहीं जुड़ सकते. जब टीवी पूरे विश्व के बाद भारत में इंट्रोड्यूस हो रही थी तब भारत में परंपरा और संस्कृति की दुहाई देने वालों ने ेकोहराम मचा दिया था-सबसे ज्यादा इसका विरोध यहां हुआ था कि इससे हमारी परंपरा, संस्कृ ति नष्ट हो जायेगी लेकिन धीरे-धीरे यह धारणा बदलती गई और टीवी को सबने अंगीकार किया- अब वही लोग घर में सबसे आधुनिक मंहगी टीवी लेकर मनोरंजन कर रहे हैं. खैर यह तो होना ही था, किसी नई चीज को अंगीकार करने में थोड़ा समय तो लगता ही है लेकिन कुछ बुुराइयां तो सभी लेकर आती है उन्हें दूर करने का प्रयास भी उसी तरह किया जाना चाहिये. इसमें दो मत नहीं कि टीवी ने हमारी संस्कृ ति पर जोरदार हमला किया. कुछ मामले में जहां बदलाव हुआ तो कुछ को बिगाड़कर भी रख दिया. विदेशी और देशी का मिलाजुला मिक्श्चर भी सामने आया लेकिन अब जो मार्क  जकरबर्ग का हमला फेसबुक के रूप में हुआ है उसे यद्यपि भारतीयों ने काफी हद तक झेला है उसे और कितना झेल पायेंगे यह आगे आने वाले वर्षों में ही पता चल सकेगा.फेसबुक और व्हाट्सअप दोनों ही समाज में एक दूसरे से संपर्क बढ़ाने और अपना संदेश तीव्र गति से पहुंचाने का माध्यम है,इसमें गूगल तो हर बात का पता लगाने का भी माध्यम बन गया है अभी हाल ही गूगल और व्हाटसअप पर तो यूजर्स की जासूसी करने तक का आरोप लग गया है.इन हालातों में  अगर कोई उसके दुरूपयोग पर उतर आये तो कई घर बरबाद हो सकते हैं अब हैदराबाद की इस हकीकत को ही देखिये इंजीनियरिंग में पडऩे वाले 21 साल के छात्र अब्दुल माजिद ने फेसबुक में 18 महीनों तक दो सौ लड़कियों से दोस्ती की और धोखे से उनकी नंगी तस्वीरें लेकर उन्हें ब्लेक मेल करता रहा.अब्दुल ने अलग-अलग काल्पनिक महिलाओं के नाम से आठ फर्जी अकाउन्ट बनायें. इन खातों से वह प्रतिष्ठित स्कूलों की छात्राओं से दोस्ती  करता था और उनकी नंगी तस्वीरे मांगता था और उसके जरिये उन्हें डराकर ब्लेक मेल करता था. उसके कहने पर कई लड़कियों ने उसे तस्वीरे भेजी. उसने कइयों को पुलिस अधिकारी की बेटी बताकर यह कहा कि अगर वह उसे अपनी तस्वीर नहीं देगी तो वह उसके साथ हुई सारी बातचीत उसके पिता को बता देगा. मार्क जकरबर्ग की फेसबुक दुनिया के लिये है हम मानते हैं कि फेसबुक में हर प्रकार की व्यवस्था है कि लोग जिसे चाहे उसे अपने मन की बात बताये किन्तु एकाउन्ट तैयार करते समय यह देखने का कोई इंतजाम भी होना चाहिये कि कौन सही है और कौन गलत है अगर पुुरूष और महिला को ही फेसबुक कन्फर्म न कर अकाउन्ट बनाये तो यह समाज के लिये बहुत घातक साबित हो सकता है.अब्दुल मजीद अब अरेस्ट हो चुका हैं लेकिन फेसबुक में ऐसे कई लोग अब भी मौजूद हैं जो समाज को हानि पहुंचा रहे हैं.दुनिया में फेसबुक की संख्या बढ़ाने के लिये अगर ऐसे लोग फेसबुक और व्हाट्स अप जैसी फास्ट सर्विस में जुड़ेंगे तो यह वास्तव में चिंता का विषय होगा.बहरहाल हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि जकरबर्ग फेसबुक को आगे बढ़ाकर लोगों से जोड़े लेकिन साधु और शैतान की पहचान करने का तरीका भी साथ में खोज निकालें.


पैसा कमाने की होड़ में इंसानियत को भी त्यागने लगे कुछ सेवक(?)



पैसा -पैसा और पैसा !इसने इंसान में इतना लालच पैदा कर दिया है कि इसके आगे उसे न दया दिखाई देती है न इंसानियत, जिसके पास है वह कुछ भी कर सकता है कि स्थिति में है और जिसके पास नहीं वह हर ऐसे लोगों के पास बेबस और बेसहारा है, उसके सामने इस मुसीबत से निपटने का सिर्फ एक ही रास्ता दिखाई देता है स्वंय को खत्म कर देना- राजधानी रायपुर से कुछ ही दूर भिलाई और न्यायधानी बिलासपुर से कुछ ही दूर बिल्हा में हुई दो घटनाएं समाज की आंखे खोल देने के लिये काफी है. बिल्हा में एक युवक राजेन्द्र तिवारी को प्राण से इसलिये हाथ धोना पड़ा चूंकि उसके पास एसडीएम द्वारा प्रतिबंधात्मक धारा में जमानत के लिये मांगे गये चालीस हजार रूपये की रिश्वत में देने के लिये पैसा नहीं था. इसका विकल्प उसने उनके दफतर के सामने ही अपने आपको आग के हवाले करने का चुना. दो रोज रायपुर के अस्पताल में इलाज होता रहा और अंतत: उसकी मौत हो गई. इस घटना से जनता का आक्रोश फूटना स्वाभाविक है. एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार रोकने के दावे करती है वहीं भ्रष्ट अफसर इतना मांगते हैं कि लोगों के सामने आत्महत्या करने तक की नौबत आ जाती है. सरकार की नौकरी में बैठे बहुत कम ही लोग है जो आम आदमी से दया या पे्रम का व्यवहार करते हैं.सरकारी सेवकों का एक वर्ग  पद, पैसा अहम और घमंड में इतना चूर हो गया है कि सामने वाला चाहे कोई भी हो उसके सामने वह बौना हो जाता है.इधर खाखी और सफे द वर्दी पहनने वालों ने तो कहर ही ढा दिया हैं. उनमें एक बात यह घर कर गई है कि सारी व्यवस्था उन्हीं के बल पर चल रही है-भिलाई में कल जो कुछ हुआ वह खाखी व सफेद वर्दीधारियों के अहम और पैसा कमाने की लालसा को प्रदर्शित करता

है. सड़क पर पुलिस- याने हर चलने वाले के लिये ठीक ऐसा हो गया जैसे कोई चंदा मांगने खड़ा हो. या कोई उधारी या हफता वसूल कर रहा हो. काननू का पालन करने वाला प्राय: हर व्यक्ति जब सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता है तो वह अपने सारे कागजात साथ लेकर चलता है बहुत से ऐसे भी हैं जो कागजात मुडऩे या रेखे रखे खराब होने के कारण उसे घर में रखते हैं इसका मतलब यह नहीं कि वह कानून का पालन नहीं कर रहा. पुलिस हजार में एक दो ऐसे लोगों को पकडऩे के नाम पर हर आने जाने वाले व्यक्ति के कागजातों की जांच करें यह कौन सी प्रक्रिया है?कोई कितने भी जरूरी काम से जा रहा हो उन्हें उससे कोई मतलब नहीं. भिलाई में पुलिस की चालानी कार्रवाई के चलते सदमें में आए एक बीमार व्यक्ति भागीरथी कुशवाहा (55) ने बीच सड़क पर ही दम तोड़ दिया. आरोप है कि गाड़ी में कागजात नहीं होने पर उसके बेटे से पांच सौ रूपये मांगे थे, इस सदमें में उस व्यक्ति ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया. बेटा उसे एम्स में हार्ट का चेकअप कराकर वापस आ रहा था.खाखी और सरकार के कुछ सेवक (?) कब सुधरेंगे यह एक यक्षप्रश्न है.

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

रेप पर अदालतें सख्त,ऐसे लोगों को पशुओं की संज्ञा,बधिया करने की सिफारिश,क्या व्यवस्थापिका भी सोचेगी?




लोग अब कब्र खोदकर भी बलात्कार करने लगे हैंं. मेरठ और गाजियाबाद के बीच तलहटा गांव में एक 26 वर्षीय गर्भवती महिला की दो दिन पुरानी कब्र को खोदकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे यूपी मेंं कानून और व्यवस्था की स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. इधर यूपी के बाराबंकी में रेप की शिकार एक तेरह साल की बच्ची को अनचाहे बच्चे को जन्म देने मजबूर होना पड़ा वहीं देश की राजधानी दिल्ली और देश के अन्य भागों में सिर्फ एक से दो सप्ताह के दौरान नाबालिग बच्चों के साथ रेप की कई घटनाओं ने देश की अदालतों व अच्छी सोच रखने वाले राजनेताओं को भी सोचने विवश कर दिया है कि काननू को अब कैसा रूप दिया जाये कि ऐसे पशुओं पर किस तरह लगाम लगाई जाये? दिल्ली में निर्भया बलात्कार-हत्या कांड के बाद पूरे देश में एक स्वर से यह मांग उठी थी कि ऐसे दरिन्दों के साथ सख्त से सख्त कार्रवाही की जाये,जस्टिस वर्मा आयोग का गठन भी इसी सिलसिले में किया गया लेकिन देश में इस बुराई पर किसी प्रकार से काबू नहीं पाना यही दर्शा रहा है कि कानूून में अब भी कहीं न कहीं कमी है और ऐसे अपराधियों मेेंं किसी प्रकार का खौफ नहीं है.रेप की घटनाएं तो बढ़ रही हैं वहीं उसे प्रोत्साहित करने का काम कतिपय वाचाल नेता अपने ऊल जुलूल बयानों से कर रहे हैं. कुछ जिम्मेदार व्यक्ति भी इसमें शामिल हैं.दूसरी ओर देश की अदालतों का रवैया इस मामले में सख्त होने से समाज में एक उम्मीद की किरण जागी है.हाल ही मद्रास उच्च न्यायालय ने नाबालिग बच्चे से बलात्कार के मामले में जहां तल्ख टिप्पणी करते हुए यह तक कह दिया कि ऐसे व्यक्ति को नपुसंक कर दिया जाना चाहिये ताकि वह उम्र भर इस कृत्य के लिये पछतावा कर सके. उच्च न्यायालय ने इसकी सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय से भी की है.जस्टिस किरूबकरण ने कहा है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के वीभत्स गेंगरेप की घटनाओं से अदालत मूकदर्शक बना नहीं रह सकता. बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम पोक्सो जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध बदस्तूर बढ़ रहा है अत: कोर्ट का मानना है कि बच्चों के दुष्कर्मियों को बधिया करने से जादुई नतीजे देखने को मिलेंगें. कोर्ट की यह टिप्पणी एक ब्रिटिश नागरिक द्वारा पन्द्रह वर्षीय एक बच्चे के यौन शोषण मामले में मामला खारिज करने के लिये दायर याचिका को खारिज करते हुए की. इधर सर्वोच्च न्यायालय व दिल्ली के राज्यपाल की चिंता भी इस मामले पर है सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले में यहां तक कह दिया कि  जो लोग नाबालिग बच्चों को हवस का शिकार बनाते हैं वह पशु से ज्यादा कुछ नहीं हैं.ऐसे लोगों के प्रति किसी प्रकार की दया नहीं दिखाई जानी चाहिये.हिमाचल प्रदेश के एक गंाव में दस साल की बच्ची से रेप के दोषी पाये गये 35 वर्षीय कुलदीप कुमार की दस साल की सजा को इसी आधार पर बरकरार रखी. मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की इन दो टिप्पणियों के बाद ऐसा समझा जाता है कि आगे आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर सरकार को कोई कठोर कानून का आदेश दे सकता है इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरिविन्द केजरीवाल ने भी नाबालिग बच्चियों से रेप की लगातार घटनाओं पर चिंता प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है.

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

'हाथी मेरा साथीÓ नहीं अब छत्तीसगढ़ के जशपुर और कई क्षेत्रों में 'दुश्मनÓ



दो हफते में आधा दर्जन बार हाथी का इंसानों पर हमला! और एक पचास वर्षीय व्यक्ति की परसो कुचलकर हत्या के बाद भी प्रशासन का हाथ पर धरे बैठे रहना उसकी विवशता ही दर्शाता है. सरकार का बेबस वन अमला हेल्प लाइन और कुछ सतर्कता उपायों से गांव के लोगों को सतर्क करने के सिवा कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं. हां लोग रात में ड्रम बजाकर व शोर मचाकर यह कोशिश जरूर करते हैं कि हाथी उनके पास तक न पहुंचे. हाथियों के उत्पात ने कई गांवों की नींद खराब कर दी है.यह सब हो रहा है छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में! जहां दो सौ गांवों के करीब पांच सौ घरों के लोग हाथियों से परेशान हैं. वे उनकी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं घरों को तबाह कर देते हैं तथा सामने इंसान दिखे तो पहले सूण्ड से उठाते हैं, फेंकते हैं और फिर पैरों से कुचलकर मार डालते हैं. इन गांव वालों की रक्षा के लिये न पुलिस वाले हैं ओर न कोई हाथियों के बारे में जानने वाले विशेषज्ञ! सालभर निर्दोषों की हत्या,फसल व संपत्ति को नुकसान का सिलसिला चलता रहा है अभी दो रोज पहले भी ऐसा हुआ जब भारत सरकार द्वारा संरक्षित कोरवा जनजाति पर हथियों का हमला हुआ... पूरा परिवार कहीं जा रहा था तभी दंतेल हाथी के साथ झुण्ड को अपने सामने देख उनके होश उड़ गये. परिवार के मुखिया कोदराम ने सबको सचेत कर पत्नी बच्चे सहित सबको भगाने में सफलतता पाई लेकिन स्वंय एक हाथी के कोप का भाजन बना- उसे सूण्ड से उठकार बाहर फेक दिया तथा कुचलकर उसकी हत्या कर दी. पता नहीं जो हाथी पालतू बनकर इंसानों  के दोस्त बने हुए थे वह इतने हिंसक कैसे हो गये?विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल कटने और

उनके भोजन के लाले पडऩे का जिम्मेदार वे इंसानों को मानते हैं तथा उनपर अपनी खीज निकालते हैं. जशपुर जिले का बगीचा,कुनकुरी और फरसाबहार इस समय हाथियो से सर्वाधक प्रताडि़त इलाके हैं.करीब डेढ़ सौ हाथियों का झुण्ड पूरे इलाके में तबाही व दहशत फैलाये हुए हैं. देश के दूसरे कई राज्यों में भी हाथियों के समूह है जिनमे से कइयों को इंसानों ने अपने काम में लगा रखा है. कहते हैं दंतेल हाथी अकेले रहता है तभी वह लोगों पर हमला करता है लेकिन यहां तो पूरा का पूरा परिवार साथ में रहता है और लोगों के घर व संपत्ति को बरबाद कर रहा है.कोदराम की मृत्यु से सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार संरिक्षत जनजाति की रक्षा भी इसी प्रकार कर रही है? वन अमला हेल्प लाइन की बात करता है लेकिन यह हेल्प लाइन कैसे काम करते हैं किसी को बताने की जरूरत नहीं.हाथियों के उत्पात की यह समस्या अकेले छत्तीसगढ़ के जशपुर में ही नहंी है बल्कि कई क्षेत्रों में है इससे निपटने सरकार का प्रयाय शून्य है जब कोरीडोर बनेगा तब की बात अलग है किन्तु ऐसा कोई कोरीडोर अब तक अस्तित्व में नहीं आया है साथ ही सरकार इस गंभीर मामले पर हर तरह से खामोश है-जबकि देश के अनेक राज्यों में हाथियों को काबू करने वाले विशेषज्ञ हैं जिनकी सेवाएं ली जा सकती थी लेकिन इस मामले में भी सरकार खामोश है.

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

किसने किया समाज को विभक्त? क्यों चल रहा है आजाद भारत में दोहरी व्यवस्था का मापदण्ड?



भेद-भाव ,ऊच-नीच, बड़ा-छोटा,अमीर-गरीब, दलित-दबंग और ऐसी कई बुराइयों के चलते हमारा समाज न प्रगति कर पा रहा है और न दुनिया के सामने अपना दम खम कायम कर पा रहा है. हम अपनी ही आंतरिक बुराइयों में उलझे हुए हैं. हमें इसके आगे न कुछ सोचने की फुर्सत है और न ही हम कुछ सोच पा रहे हैं रोज नई-नई बलाओं के चलते निर्वाचित होने वाली सरकार के कुछ लोग (सभी नहीं) यह सोचने विवश है कि वह पहले क्या करें? अपने घर को सुधारे या समाज को सुधारने और विकास में अपना ध्यान लगायें. राजनीति और हमारी सामाजिक व्यवस्था दोनों की ही नकेल ढीली पड़ गई है. हम सोचते थे कि कुछ परिवर्तन आगे आने वाले वर्षों में होगा लेकिन अब उसपर भी पानी फिरते नजर आ रहा है. आखिर हमारी व्यवस्था बिगड़ी कहां से है? ऊपर से या नीचे से? अक्सर हम सारा दोष नीचे को ही देते हैं, चाहे वह सरकारी स्तर पर होने वाली गड़बड़ी हो या सामाजिक स्तर पर होने वाली गड़बड़ी . एक बड़ा घोटाला हुआ तो नीचे का बाबू या चपरासी को बलि का बकरा बनाकर सब कुछ रफा-दफा कर दिया जाता है किन्तु कभी यह नहीं होता कि इसकी जवाब देही तय हो कि आखिर इसके लिये दोषी कौन है? जब हम युद्व लड़ते हैं तो उसमें विजयी होने का श्रेय उसके कमाण्डर को देते हैं-अगर हार गये तो उसकी जिम्मेदारी से भी कमाण्डर बच नहीं सकता-क्यों नहीं यह पद्धति हर क्षेत्र में अपनाई जाती. हमारा समाज आज कितने भेदभावपूर्ण वातावरण में चल रहा है वह ऊपर से ही शुरू होता है-हर तरफ भेदभाव चाहे वह सरकारी नौकरी हो चाहे निजी अथवा संपूर्ण व्यवस्था,जिसके नियम कायदे ही टेढ़े-मेढ़ेे रास्तों को पार करते हुए निकलता है जिसमें हमारी चुनावी व्यवस्था भी शामिल है अब इन लाइनों को गौर कीजिये कैसी कैसी विभिन्नताओं से हम रूबरू हो रहे हैं:-नेता चाहे तो दो सीट से एक साथ चुनाव लड़ सकता है लेकिन हम आम लोग जो उन्हें चुनकर विधानसभा या लोकसभा में भेजते हैं दो जगहों पर वोट नहीं डाल
सकते. आप या हम अगर जेल में बंद हो तो हमको वोट डालने का अधिकार नहीं है लेकिन नेता जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ सकता है. हममें और उनमें कितना फर्क कर दिया गया है? अगर हम कभी जेल गये थे तो जिंदगी भर के लिये भूल जाइये कि किसी सरकारी नौकरी में लग पायेंगे अर्थात हमारा पूरा कैरियर खराब! इधर नेता चाहे जितनी बार भी चोरी, लूट,डकैती बलात्कार-हत्या के मामले में जेल गया हो वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जो चाहे बन सकता है.इसी प्रकार बैंक में नौकरी पाने के लिये आपको ग्रेजुएट होना जरूरी है लेकिन नेता चाहे अंगूठा छाप क्यों न हो वह भारत का फायनेंस मिनिस्टर बन सकता है.आपको सेना या पुलिस में मामूली सिपाही की नौकरी पाने के लिये डिग्री के साथ दस किलोमीटर दौड़कर दिखाना होगा लेकिन नेता यदि अनपढ़,और लूला लंगड़ा हो तो भी वह आर्मी नेवी और एयर फोर्स का चीफ बन सकता है, देश का शिक्षा मंत्री भी बन सकता हैं और जिस नेता पर हजारों केस चल रहा हो वह पुलिस डिपार्टमेंट का चीफ यानी गृह मंत्री बन सकता है? नेता और जनता के बीच ऐसा विभेद किसने किया? क्यों हमारा सिस्टम गड़बड़ा रहा है?क्या इनके पीछे यह सारे तथ्य भी विद्यमान नहीं है?

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

राजनीति की बिगड़ी लगाम को थामने एनजेएसी के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट का फैसला!


 विवादित बयानों, भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्टाचार तथा आपराधिक तत्वों के बढ़ते हौसले और उनको प्राप्त राजनीतिक संरक्षण के तहत हमारी वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा यह हम नहीं कह सकते लेकिन जो राजनीतिक  माहौल आज दिखाई दे रहा है वह यही संकेत दे रहा है कि कुछ अच्छा नहीं चल रहा. आजादी के बाद से अब तक के वर्षों में तो कम से कम ऐसा कभी नहीं हुआ जो अब हो रहा है. मुंहफ ट और कुछ भी बोलकर विवाद पैदा कर देश की एकता अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने की प्रवृति हम सबकों सोचने के लिये विवश कर रही है कि हमारा रास्ता कितना कठिन होता जा रहा है. इस संदर्भ में भारत के उपराष्ट्रपति अब्दुल हामिद अंसारी का रायपुर में दिया गया वह बयान भी महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होने कहा है कि 'हमें हमारे राजनीतिक, सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के संवैधानिक तरीकों पर कायम रहना है तथा अपनी स्वतंत्रता का समर्पण किसी महान् व्यक्ति के कहने पर भी नहीं करना है. जिससे वह हमारी संस्थाओं को ही नष्ट करने लगेÓ. अगर हम देश के संविधान की बात करें तो उसे बनाने वालों ने हर व्यक्ति को आजादी कुछ हद से ज्यादा प्रदान की है, यह होना भी चाहिये लेकिन जब लोग इसका दुरूपयोग करने लगे तो उसपर तो लगाम लगनी ही चाहिये मगर ऐसा भी नहीं हो रहा. इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया है.एनजेएसी पर उसके फैसले ने भले ही राजनीतिज्ञों को चौका दिया हो लेकिन हम समझते हैं यह एक सही फैसला है भले ही भारत के वित्त मंत्री और प्रमुख अधिवक्ता अरूण जेठली इसे लोकतंत्र की मूल भावना को नजर अंदाज करने की बात कह रहे हो.वे यह भी कह रहे हैं कि लोकतंत्र में अन इलेक्टेड अर्थात गैर चुने हुए की निरंकुशता नहीं चल सकती. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे व्यक्ति को इस तरह का निर्णय बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन भारत में विश्वास,उम्मीद और न्याय के लिये जो एक ही व्यवस्था अब तक बची है वह है देश की न्यायपालिका-वह अगर यह समझती है कि उसके अपने लोगों की नियुक्ति में उसकी ही मर्जी चलनीे चाहिये तो उसमें किसी को आड़े नहीं आना चाहिये चूंकि उसे भी शायद यह महसूस हुआ है कि जिस तंत्र के जरिये उसके लिये लोगों को चुना जायेगा उसमें भी भ्रष्टाचार की बू लग सकती है. शायद इसी लिये कोर्ट ने सरकार के इस निर्णय को मान्य नहीं किया जो सीधे-सीधे इंगित कर रहा है कि वह किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त कर न्याय नहीं कर सकती.जजों के मन में जब राजनेताओं के प्रति आभार का मन भर जायेगा तो क्या वे उन्हीं के होकर नहीं रह जायेंगे? हम समझते हैं कि इसी को मद्देनजर रखते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है जिसने पूरे राजनीतिक हल्के में सनसनी फैला दी है.यह भी जरूरी है कि न्यायपालिका की तरह अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञों की नियुक्ति का कार्य भी उन्हीं पर छोडऩा चाहिये चूंकि जो जिसमें माहिर हो वह ही दूसरों की पहचान कर सकता है. लोकतंत्र मजबूत हो यह कौन नहीं चाहता. देश की जनता आजादी के पहले और आजादी के बाद दोनों का दौर देख चुकी है. लोकतंत्र से तानाशाही का एक रूप इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपात काल का दौर था जिसे भी लोग देख चुके हैं लेकिन अब जब ढीली डोर छोड़ दी गई है तो कम से कम व्यवस्थापिका को न्यायपालिका पर हावी होने का मौका नहीं देना चाहिये शायद इसे न्यायपालिका ने महसूस किया है. जिस तरह से लोकतंत्र में बयानबाजी और आपराधिक तत्वों के हावी होने का सिलसिला शुरू हुआ है उस संदर्भ में भी अब यह संभावना बढ़ गई है कि भविष्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय जिसपर सबकी आशा टिकी हुई है और भी कुछ अन्य मुद्दों पर संज्ञान ले जिसमें महिलाओं, बच्चों पर होने वाले अत्याचार, यौन शोषण,अपराध का बढ़ता ग्राफ,अवसरवादी वोट बैंक तथा राजनीति की बिगड़ी लगाम शामिल है.

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

खामोश शहर पर फिर डकैतों ने अस्तित्व की छाप छोड़ी दस्युओं की पुलिस को चुनौती!

एक बार फिर राजधानी रायपुर में कठोर अपराधियों ने अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाया है. सेल टैक्स कालोनी के भावना नगर मेें डकैतों ने चंद दिनों के भीतर एक और परिवार को शिकार बनाया, इससे पूर्व समता कालोनी में भी डकैत अपना जलवा दिखा चुके हैं जबकि क्रीस्ट सहायता केन्द्र की नन से बलात्कार के आरोपी भी अब तक छुट्टा घूम रहे हैं लेकिन उस समय तो सारा पुलिस महकमा खुशी से झूम रहा था जब एक उद्योगपति को अपहरण के कुछ घंटो बाद ही रिहा करा लिया गया. उस समय बड़े बडे लोगों ने इस पर संज्ञान लिया और पुलिस को ढेर सारी बधाइयां दी, अब क्या हो गया? क्यों पुलिस खामोश है? आज जब भावना नगर की घटना हुई तो शाबाशी देने वालों को सांप क्यों सूंघ गया? दो डकैती कांड और नन बलात्कार कांड की भीषण और रहस्यमय घटना से जहां सारा शहर दुर्घन्धित है जबकि ऐसी अनेक -अनेक अनसुलझी घटनाओं से शहर के थानों के पन्ने भरे पड़े हैं लेकिन पुलिस हैं कि कयास लगाती बैठी है. भावना नगर में डकैती की घटना में सबकुछ ठीक वैसे ही हुआ जैसे समता कालोनी के इन्कम टैक्स वकील अग्रवाल के घर हुआ. कोई फरक नहीं, वहां ग्रिल तोड़कर घुसे और सेल्सटैक्स  कालोनी के भावनगर में दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे तथा परिवार को बंधक बनाकर खंजर गले पर टिका दिया.- वाह अपराधी! इस शहर को किस तरह निशाना बना रहे हो? और बेबस बेचारी पुलिस को तुम एक सुराग भी नहीं छोड़ रहे. वास्तव में हमारी पुलिस को ऐसा ही जवाब मिलना चाहिये क्योंकि वह जब किसी अपराधिक मामले को जैसे तैसे सुलझा लेती है तो फूल के कुप्पा हो जाती है और इसकी खुमारी उनके सर से कई दिनों तक नहीं उतरती. ऐसे कितने ही मामले हैं जो आज राजधानी रायपुर में पुलिस के बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे पड़े पड़े धूल खा रहे हैं. आखिर क्या कारण है कि पुलिस अपराध के कई दिनों बाद भी अपराधियों की गिरेबान तक नहीं पहुंच पाती? हमारा पुलिस तंत्र क्या सड़क पर चलने वाले किसी स्कूटी सवार या सीधे-साधे नियम कानून का पालन करने वाले व्यक्ति से सख्ती करने तक ही सीमित होकर रह गया? कितने ही पैसे वालों के छोकरे आज सड़कों पर स्टंट करते घूम रहे हैं जो आम लोगों के लिये सरदर्द बने हुए हंै- क्या उनसे कभी पुलिस ने पूछताछ की कि उन्हें उनके मां बाप ने कितना जेब खर्च दिया हैं?या वे कहां से यह पैसा लाते हैं? प्लेन की आवाज करने वाले मोटर सायकिलों में यह लड़के कालोनियों में लोगों की नींद हराम कर रहे हैं और पुलिस या प्रशासन के किसी को इसकी ङ्क्षचता नहीं- इन्हीं सब बातों का फायदा उठाकर अंदर और बाहर के अपराधी अपना काम कर जाते हैं और हमारी बहादुर पुलिस देखती रह जाती हैै. समता कालोनी उसके बाद पूर्व प्रोफेसर दंपत्ति के परिवार के साथ घटित घटना रोंगटे खड़े कर देने और दहशत फैला देने वाली है, इस प्रकार की घटनाएं घटित होने वाले परिवार को तो दहशत में डालता ही है साथ ही आसपास रहने वालों की भी नींद हराम कर देता है. डर के मारे लोग सो नहीं पा रहे हैं और जिनको इन घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी है वे या तो अपने घरों में चैन की नींद सुरक्षित सो रहे हैं या फिर यही आंकलन करते बैठे रह जाते हैं कि कौन हो सकता है इस डकैती में -कंजर,पारधी या लोकल? बस अनुमान लगाते रहते हैं फिर सब भूल जाते हैं तब तक दूसरी घटना हो जाती है.

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

अंधेरे से उजाले तक का लम्बा सफर,'महुआ वर्षों बाद अब जाकर महका!



         

               
  एक समय था जब राजधानी रायपुर के पश्चिम क्षेत्र में रहने वालों को लोग मजाक उड़ाकर कहते थे कि यह तो गांव से आता है. बात उनकी सही थी आयुर्वेदिक कालेज से टाटीबंध तक जाने में लोगों को डर लगता था चूंकि यहां न स्ट्रीट लाइट थी और न ही कोई रात में आता-जाता था. धीरे धीरे कालोनियों का विकास हुआ. एसबीआई की कालोनी महोबाबाजार में बनी फिर हीरापुर में सर्वोदय कालोनी के नाम से प्रोफेसरों की कालोनी बनी.महोबाबाजार के आसपास पूरे क्षेत्र में धान के खेत व महुुआ के झाड़ हुआ करते थे, इन महुए की महक आज भी पुराने लोगों की नाक में है. इन्हीं महुआ वृक्षों के कारण इस क्षेत्र का नाम महुआ बाजार पड़ा और आज यह महोबाबाजार हो गया.
     सुविधाओं के अभाव में जीने वालों को ही सुविधा मिलने पर उसकी खुशी का एहसास होता है. यहां के लोगों ने वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में सुविधाओं की मांग करते हुए प्रदर्शन व आंदोलन भी किया. वे चाहते थे कि यहां तक सिटी बसे चले, आमानाका रेलवे क्रासिंग पर ओवर ब्रिज बने, सरोना को भोपाल के हबीबगंज की तरह का स्टेशन बनाये,यहां एक पोस्ट आफिस खुले, सुरक्षा के लिये एक थाना हो लेकिन इसका कोई असर किसी पर नहीं पड़ा -हां पोस्ट आफिस खोलने और थाना बनाने की मांग जरूर बाद के वर्षों में स्वीकार की गई. सिटी बस भी टाटीबंध तक चलने लगी. पहले स्थिति इतनी बदतर थी कि यहां इक्के-दुक्के फोन थे और लोगों को डाक्टर बुलाने की बात तो छोडिय़े सरदर्द की गोली लेने के लिये भी सदर बाजार जाना पड़ता था. धरती का विकास जिस तरह हुआ, शायद यह कहानी टाटीबंध क्षेत्र में भी दोहराई गई, यहां धीरे-धीरे विकास हुआ और इसने गति पकड़ी. राज्य बनने के बाद-इस क्षेत्र में लोगों का आना-जाना भारी तादात में शुरू हुआ, कालोनियां विकसित हुई.
 पश्चिम के लोगों की एक बड़ी मांग थी कि सरोना को रायपुर के दूसरे बड़े रेलवे स्टेशन केे रूप में विकसित किया जाये यह मांग भी अब लगभग पूरी होती नजर आ रही है, इसके साथ ही अन्य मूल भूत सुविधाओं के जबर्दस्त विकास ने इस क्षेत्र के लोगों को एक नये युग में प्रवेश करा दिया. विधायक व लोकनिर्माण मंत्री राजेश मूणत के प्रयास से गुरूवार 15 अक्टूबर को शाम चार बजे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह द्वारा उद्घाटित होने वाला रेलवे अण्डर ब्रिज उन्हीं विकास कार्यों की एक कड़ी हैं. अण्डर ब्रिज शुरू होने के बाद पूरे क्षेत्र में रेलवे लाइन से होने वाली बाधा का सदा-सदा के लिये अंत हो जायेगा- इस अण्डर ब्रिज के पास ही एक आधुनिक सब्जी मार्केट भी विकसित हो गया है जो पूरे पश्चिम क्षेत्र के बड़े हिस्से के लोगों की आवश्यकताओंं को पूरी करेगा.
वर्षों से हमारा सपना था कि रायपुर पश्चिम में स्थित साइंस कालेज के मैदान को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के रूप में विकसित किया जाये-यह न केवल विकसित हुआ बल्कि इसमें विश्व हाकी प्रतियोगिता का होना भी पूरे छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित करेगा. सांइस कालेज मैदान में ही आडिटोरियम और आयुर्वेदिक कालेज के सामने अंतर्राष्ट्रीय स्विमिंग पुल के सामने लाईब्रेरी का निर्माण इस अंचल के लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करेगा. राजकुमार कालेज से टाटीबंद तक की सड़क किसी समय सिंगल ऊबड़-खाबड़ और एक्सीडेन्ट रोड कहलाती थी. इस रोड ने कई लोगों का खून पिया है, जो अब गौरव पथ हो गया. टाटीबंध का एन्टरेंस किसी विदेशी राष्ट्र के चौराहे की तरह नजर आता है यहां हमारे देश का वह विमान रिटायर होने के बाद लगा है जो कभी दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिये उपयोग हुआ था. इस समय रायपुर भिलाई मार्ग जो राजकुमार कालेज से टाटीबंध तक गौरव पथ का रूप ले चुका है उसे और आकर्षित बनाने का प्रयास युद्व स्तर पर चल रहा है ताकि विदेशी अथितियों के आगमन के समय यह अपनी  एक छाप उनके दिल में छोड़ जाये.रायपुर पश्चिम क्षेत्र को आज मिल रहे खास तीन उपहारों के लिये इस क्षेत्र की जनता वर्तमान सरकार की शुक्रगुजार है. जिनके संकल्प और जिद के कारण आज इस क्षेत्र के रहवासियों के जीवन को और आसान बनाया. 

जूता-चप्पल फेक से कालिख पोत तक का सफर-समय के साथ बदलता रहा,विरोध का तरीका भी!



जूता-चप्पल फेक से कालिख पोत
तक का सफर-समय के साथ
बदलता रहा,विरोध का तरीका भी!
सन् दो हजार आठ से दुनिया में बड़े और नामी नेताओं तथा ख्याति प्राप्त लोगों पर जूता- चप्पल फेकने और अपना ध्यान आकर्षित कराने का एक सिलसिला चला हुआ है.विदेश ही नहीं हमारे देश में भी कई बड़े नेता अब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन की चपेट मेंं कई देशों के पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और देशों के बड़े नेता इसकी चपेट में आ चुके हैं. सन् 2008 में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश पर बगदाद में मुत्ताधर अल जैदी नामक व्यक्ति ने उस समय जूता फेका जब राष्ट्रपति बुश प्रधानमंत्री पेलेस में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे. 2009 में चीनी प्रधानमंत्री बेन जरिबाओ पर एक 27 वर्षीय जर्मन मार्टिन झोके ने यह कहते हुए जूता फेका कि कैसे हम इनके झूठ को सुने? विदेशों में तो नेल्सल मण्डेला भी इससे नहीं बचे फिर भारत में तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी,नवीन जिंदल,पी चिदम्बरम जैसी बड़ी हस्तियों के अलावा कर्ई हस्तियां जूता प्रहार झेल चुके हैं जबकि ऐसे कृत्यों के साथ कालिख पोतने की भी घटानाएं लगातार सुर्खिया बनने लगी. जूते या चप्पल का प्रहार सिर्फ एक व्यक्ति करता था और वह पकड़ा भी जाता और उसकी खूब धुनाई भी होती किन्तु कालिख पोतने का काम जब समूह में होता तो यह और भी सुर्खियां बटोरता जैसे मुम्बई में सुधींद्र कुलकर्णी के साथ हुआ. सुधींद्र कुलकर्णी पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम करा रहे थे जिसके विरोध में शिवसेना उतर आई और उसने उनके चेहरे पर कालिख ऐसे पोती कि उन्हें पहचानना तक कठिन हो गया. इसी हालत में उन्होंने न केवल पत्रकार वार्ता ली बल्कि ऐसे ही घूमते भी रहे. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर चुनाव प्रचार के दौरान कालिख पोती गई जबकि योग गुरू बाबा रामदेव का भी मुंह काला किया गया. केजरीवाल के पूर्व साथी योगेन्द्र यादव पर भी दिल्ली के जंतर मंतर की भरी सभा में कालिख पोती गई. सहारा ग्रुप के मालिक सुब्रत राय पर कोर्ट से निकलते ही कुछ लोगों ने कालिख पोत कर विरोध किया.पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर 26 अप्रैल 2009 में उस समय जूता फेंका गया जब वे एक इलेक्शन रैली को संबोधित कर रहे थे. लोगों को हरास करने के लिये पूर्व में जूता फै कने की जगह कई अन्य पद्वतियां अपनाई जाती थी जिसमें चेहरे पर कालिख पोतकर गधे पर बिठाना,जूते की माला पहनाकर घुमाना, मुर्गा बनाकर खड़े कर देना आदि लेकिन अब समय के बदलने के साथ साथ हरासमेंट की पद्वतियां भी बदलने लगी है. जूता फे क या कालिख पोतने के क्रम में वर्ष 2015 में अब तक विश्वभर में पांच से ज्यादा घटनाएं हो चुकी है जिसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माझी पर जूता फेकने और सुधीर कुलकर्णी कालिख कांड भी शामिल है.

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

'तो के बगैर अब कुछ नहीं, यह अब सरकारी मदद और काम का हिस्सा बना!


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मां बव्चे से कहती है -गिलास भर दूध पियोगे 'तोÓ तुम्हे घूमने ले जाएंगे खिलौने लेकर देंगे..यही 'तोÓ अब रोजमर्रे की जिंदगी का 'तोÓ बन गया है-इसका महत्व इतना बढ़ गया है कि अब इसके बगैर कोई काम नहीं होता. काम चाहिये तो पैसा, पैसा कमाना हो तो काम,जमानत चाहिये तो पैसा, शादी करना हो तो दहेज,मरना हो तो लकड़ी या कब्र... और न जाने क्या क्या? सबसे मजेदार बात तो यह कि अब सरकार भी तो-तो करने लगी है.हाल ही सरकार ने एक पहल की उसमें भी उसने तो लगा दिया-यह पहल थी Óयादा से Óयादा लोगों को रोजगार देने की..सरकार ने नियोजकों पर शर्त लगा दी कि अगर आप अपने संस्थान में Óयादा से Óयादा लोगों को रोजगार देंंगे तो आपको इंकम टैक्स में छूट दी जायेगी. यह तो कुछ दिन जारी रहेगा फिर खत्म हो जायेगी. असल में यह सरकार की योजना का हिस्सा है जिसमें उसने घोषणा की थी कि हम Óयादा से Óयादा बेरोजगारों को नौकरी पर लगायेंंगे, सरकार ने  बहुत प्रतीक्षा की लेकिन Óयादा लोग नौकरी पर नहीं लग सके तो फिर एक स्कीम तैयार की गई जिसमें उसने तो लगा दिया- इंक म टैक्स में छूट चाहिये तो Óयादा लोगों को नौकरी पर लगाओं. बहरहाल यह योजना सफल होगी या नहीं यह तो आगे पता चलेगा जब इंकम टैक्स में छूट पाने के कारण कई लोगों को रोजगार मिलेगा. दूसरा 'तोÓ फिर आज आ गया-घर में सोलर रोशनी चाहिये 'तोÓ संपत्ति कर में राहत मिलेगी. हर जगह यह तो क्यों लग रहा है!. वैसे ही हम तो से परेशान है अब तो की बाढ़ आ गई. एक के बाद एक टैक्स लोगों की बाध्यता बढ़ा रही है. वहीं अगर उनकी सुविधाओं में बिना तो लगाये बढ़ौत्तरी की जाती तो देश खुशहाल होता.अब हर तो के पीछे पैसा कमाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो गया है जिसमें आम आदमी का पसीना निकल रहा है. मेहनत कर कुछ कमाने के लिये 'तोÓ की भूमिका के बगैर आगे बढऩा मुश्किल होता जा रहा है. हम यह कहकर सरकार को नहीं कोस रहे बल्कि इस तो के पीछे छिपे अन्य तो के बारे में बताने का प्रयास कर रहे हैं जो आम जन जीवन के लिये वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार आसान नहीं है. सरकारी योजनाओं में बहुत सी योजनाएं शामिल होती है अगर कारपोरेट टैक्स में छूट लेकर Óयादा से Óयादा लोगों को नौकरी पर लगाएं तो यह कई परिवारों की जिंदगी सवार देगा उसी प्रकार घर में सोलर रोशनी हो तो इससे अ'छी बात और क्या हो सकती है, अ'छी बात यह भी है कि इस योजना को कमर्शियल काम्पलेक्स और बड़े भवनों के लिये अनिवार्य किया गया है इससे बिजली की खपत कम होगी तथा लोग प्राकृतिक बिजली के साथ-साथ कृत्रिम बिजली का भी Óयादा से Óयादा उपभोग कर सकेंगे.

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

विकास की छाया में पल गये कई टैक्स और कंकाल में बदल गया आम आदमी!



डेव्हलपमेंट की छाया में जो टैक्स थोपे जा रहे हैं उसने सामान्यजन के रास्ते को कठिन बना दिया है. वह न कुछ बोल पा रहा है और न कुछ कर पा रहा है जिसके पास पहले से मिल रही तनख्वााह है वह दुविधा में है और जिसके वेतन में बढ़ौत्तरी की गई है वह भी परेशान है.किसान ऋण के बोझ तले दबा है तो आम आदमी मंहगाई और भारी टैक्स के बोझ तले! किसानों ने ऋण को लेकर मौत को चुना तो अब आम आदमी भारी टैक्स और मंहगाई को लेकर फ्रस्टेशन में हैं, उसके सामने परिवार चलाने की समस्या है. केन्द्र की नई सरकार ने तो पिछले एक साल में टैक्स लादा ही है वहीं राज्यों की सरकार और इन राज्य सरकारों के अधिनस्थ काम करने वाली स्वायत्त संस्थाओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. विकास के नाम पर हमारी जेब से पैसा निकालना जारी है. चाहे वह किसी भी टैक्स के रूप में क्यों न हो. सड़क पर चलो तो टोल टैक्स और घर में बैठों तो स्वच्छता के नाम पर! लेकिन सुविधाएं जो इन टैक्सों के नाम पर कथित रूप से दी जा रही है वह किसी देने वाले को पता ही नहीं चल रही. जबकि वह इन्कम टैक्स भी पटा रहा है,संपत्ति कर भी पटा रहा है और सैकड़ों अन्य कर भी पटा रहा है साथ ही कचरा फैकने का टैक्स भी दे रहा है. कई घरों में न पानी आता है न कचरा उठता है, न स्ट्रीट लाइट जलती है फिर भी उससे टैक्स वसूली होती है-टैक्स लने की इस विभिन्नता ने सामान्य वर्ग को कहीं का नहीं छोड़ा. किसी को यह पता ही नहीं कि उनकी जेब से कटने वाले पैसे से कथित विकास कहां हो रहा है. हां यह जरूर सुनाई दे जाता है कि फलाना इतना पैसा खा गया और फलाने की कोठी से ढेरों नगदी बरामद हुई. क्या
हमारेे पैसे का ऐसा ही उपयोग हो रहा है? केन्द्र सरकार ने अपने बजट में ट्रेनों में यात्री किराये में बढ़ौत्तरी की, इन्कम टैक्स पटाने के लेवल में कोई खास संशोधन नहीं किया. माल भाड़े में बढ़ौत्तरी का नतीजा यह हुआ कि सारी  वस्तुओं के दामों में वृद्वि हुई. दाल अब तक की सबसे ऊंचार्ई पर है. प्राय: हर भारतीय की थाली में अनिवार्य रूप से रहने वाली यह वस्तु ही मंहगी हो जाये तो इसके बाद तो कुछ कहना ही क्या? प्याज का यही हाल है. सेवा कर के नाम से वसूल होने वाली राशि हर आदमी के लिये मुसीबत बनी हुई है. प्राय: राज्य सरकारों ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना रखा है. एक सामान्य परिवार को क्या-क्या करना पड़ता है?-परिवार का स्वास्थ्य,परिवार की परवरिश जिसमें उसकी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, उनकी फीस , कपड़े, हास्टल फीस,टेलीफोन किराया,और न जाने क्या-क्या? इसके अलावा घर की भारी बढ़ी हुई बिजली, नगर निगम का संपत्ति कर,जल कर, सफाई कर और अन्य कई अघोषित कर. प्राय: हर घर में गैस,पेट्रोल डीजल से चलने वाले वाहन की सुविधा है. पेट्रोल डीजल के भाव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आई कमी ने कुछ राहत जरूर दी है लेकिन अगर यह भी नहीं होता तो? हमारी स्थिति कर्ज में पैदा होने और कर्ज में मरने वाली पुरानी कहावत पर आज भी विद्यमान है. इस दौर में भगवान किसी को बीमार न करें अगर बीमार हुआ तो समझ लीजिये सारे परिवार पर मुसीबत आ गई क्योंकि अस्पताल में भरती होते ही अस्पताल के बिल को सुनकर उनकी आधी मौत हो चुकी होती है. 

सरकार की खामोश जांच प्रणालियां दवा का तो काम करती है,देरी भी उतनी ही!



 विभागीय जांच,सस्पेण्ड, लाइन अटैच, मजिस्ट्रीयल जांच और ज्यादा हुआ तो सीआईडी अथवा सीबीआई या न्यायिक जांच -यह कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिन्हें सरकारी तौर पर दवा के रूप में उपयोग किया जाता है. इनमें से कुछ ऐसी है जिनका असर कभी दिखाई ही नहीं देता अर्थात जांच रिपोर्ट कब आती है और क्या निर्णय होता है यह किसी को मालूम नहीं होता. सरकार की यह सब प्रक्रियाएं कुछ को छोड़कर तब अपनाई जाती है जब कोई सीरियस घटना होती है और जनता इसको लेकर उद्वेलित होती है. मोटे तौर पर कहा जाये तो इन प्रक्रियाओं में से बहुतों का संबन्ध सरकार की कार्यप्रणाली से जुड़ा है. कुछ जांच के आदेश मजबूरन दिये जाते हैं जब जनता उस घटना को लेकर आक्र ोश में आ जाती है गुस्से में मारपीट की नौबत आती है पथराव, आगजनी और बड़ी हिंसा की वारदात होती है. कुछ कर्मचारियों द्वारा कथित तौर पर गलतियां करने और सरकारी कामकाज में ढिलाई करने आदि पर होती है जिसमें विभागीय जांच या सस्पेण्ड जैसी कार्रवाही होती है. अमूमन सारी जांच प्रक्रियाओं में कई दिनों तक की देरी संभावित है लेकिन जांच का आदेश या आयोग बिठाकर सरकार उस समय होने वाली घटना के सरदर्द से बच जाती है या कहे कि उत्तेजित पब्लिक को शांत कर लेती है इसके बाद घटना का क्या हुआ क्या जांच परिणाम निकला इसका न उस समय की आक्रोशित जनता को कोई मतलब रहता है. अब रायपुर के लोधीपारा में बुधवार को हुई घटना को ही ले लीजिये यहां दो लाइनमैन बिजली सुधार के लिये खम्बे पर चढ़े और किसी ने लाइन चालू कर दी. किसी ने क्या सबको मालूम है कि बिजली विभाग के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने ही इसे चालू किया होगा. दोनों लाइनमैन विद्युत झटका

खाकर नीचे गिरे और उनकी मौत हो गई.भीड़ ने आक्रोश में आकर जिम्मेदार एक कर्मी की पिटाई कर दी. पुलिस ने आक्र ोश शांत करने के लिये भीड़ को जांच का आश्वासन दिया तो वे शांत हो गये अब इस मामले में गया किसका? उस परिवार का जिसके भरण पोषण की जिम्मेदारी इन व्यक्तियों के सिर पर था. क्या जांच होगी? रिपोर्ट कब आयेगी और उस परिवार की जिंदगी कैसे कटेगी यह देखने वाला कोई नहीं. प्रशासन को ऐसे मामले में सिर्फ इस बात की फिक्र रहती है कि कैसे भी तत्काल मामले को शांत कर दिया जाये. अक्सर ऐसा ही होता है-भीड़ को शांत करने के लिये सरकार के अस्त्र या कहें ब्रम्हास्त्र काम आते हैं लेकिन इन अस्त्रों की हकीकत यही है कि यह बहुत ही खामोश अस्त्र हैं जिसका कोई फायदा जनता को नहीं होता है कुछ मामलों में ऐसा भी होता है कि नेताओं की श्रद्वाजंली,मुआवजा भी इन लोगों को शांत करने में अहम भूमिका अदा करती है. कुछ नेताओं के पास तो रटे रटाये या पहले से कम्पूयटर में सेव्ड श्रद्वांजलि और मुआवजे के अंक पड़े रहते हैं जिसमें नाम और मुआवजे की राशि कम ज्यादा करनी पड़ती है.

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

छत्तीसगढ़ में बुनियादी शिक्षा को यूं बिगाडऩे का ठेका किसने दिया?



एक समय ऐसा था जब छत्तीसगढ़ के रायपुर में स्थापित रविशंकर विश्वविद्यालय ने अपने घपले-घोटाले जिसमें रद्दी कांड,फर्जी डिग्री कांड, अंकसूची कांड आदि के चलते अपनी साख खो दी थी-यहां तक कि इस विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर निकलने वाले छात्रों को कहीं नौकरी पर लगाने से पहले भी लोग दस बार सोचते थे- इस स्थिति से निजात पाने में विश्वविद्यालय को वर्षों लग गये. अब ले देकर यह विश्वविद्यालय अपनी साख पुन: कायम करने में ज्यों त्यों सफल हुआ है, तभी छत्तीसगढ़ की बुनियादी शिक्षा पर प्रश्र चिन्ह लगता नजर आ रहा है- यहां कि शिक्षा, शिक्षक और संपूर्ण व्यवस्था को सम्हालने वाले प्राय: सभी इस समय न केवल संदेह के दायरे में हैं बल्कि उनपर गंभीर आरोप भी है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि बुनियादी शिक्षा की जड़े ही जब मजबूत नहीं हो पा रही है तो क्या यहां कि उच्च शिक्षा और अन्य शिक्षा से जुड़ी संस्थाएं विश्व की बात छोड़े अपने देश में ही अपना अस्तित्व जमा सकेंगी?. मध्यप्रदेश में हुए व्यापमं घोटाले के तो तार यहां से जुड़े होने के कुछ-कुछ प्रमाण मिले हैं अब दुष्कर्म मामले में जेल में बंद आसाराम बापू के कथित दिव्य पुस्तकों को भी न केवल स्कूल में खपाने और उसमें लिखी बातों को छोटे-छोटे बच्चों के मन में डालने का कु त्सित प्रयास कथित लोगों ने किया है-स्वाभाविक है कि इस पूरे मामले की डोर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हाथ में है जिसे बचाने का प्रयास भी अब शुरू हो गया है- इस मामले का भंडाफोड़ होने के बाद भी प्रशासन और सरकार ठण्डी कार्यवाही कर बैठा है ताकि मामला पूरी तरह से ठण्डा हो जाये. ऐसे मामले प्रकाश में आने के बाद जिम्मेदार लोगों के पास रटी रटाई बयानबाजी मौजूद रहती है जिसे अखबारों में प्रकाशित करा सब लीपापोती कर दी जाती है.यह पहला अवसर नहीं है जब शिक्षा से जुड़े मामलों को यूं ही ठण्डे बस्ते में डालकर रखा गया. जब स्वयं शिक्षा मंत्री से जुड़ा एक मामला परीक्षार्थी की जगह दूसरे को बिठाने का सामने आया तब भी इसी प्रकार की ठंडाई दिखाकर मामले को रफा दफा किया गया? शिक्षा के मामले में जिस कदर एक के बाद  एक घपले घोटाले,अनियमितता, लालफीताशाही के सामने आ रहे हैं वह यह इंगित कर रहे हैं कि सरकार शिक्षा की बुनियाद पर गंभीर नहीं हैं. 

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

रक्त ऐसे बह रहा जैसे नदी बह रही हो, किस-किस पर रोयें?


 रक्त ऐसे बह रहा जैसे
 नदी बह रही हो,
 किस-किस पर रोयें?

 मांस खाने वाले प्राणी का पूरा जीवन ही मारकाट से भरा रहता है, किसी निर्जीव की हत्या करते समय उसे जरा भी  ज्ञान नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है, उसे सिर्फ चिंता रहती है कि अपना पेट कैसे भरा जाये? जन्मजात मांसभक्षी होने से उसे इस बात की चिंता नहीं कि कौन कैसा है और उसके मरने से उसे क्या मिलने वाला ? लेकिन क्या मनुष्य भी जंगली जानवरों की तरह है?-उसे तो बनाने वाले ने इतनी सोचने की शक्ति दी है कि वह अच्छा बुरा क्या है बखूबी समझ सकता है. वह क्यों जानवरों की तरह हरकत करता है-मानते हैं कुछ लोगों को जानवरों का मांस खाने की जन्मजात आदत है किन्तु ऐसा भी तो मत करों कि उस प्राणी का अस्तित्व ही इस संसार से मिट जाये! अपने स्वार्थ और अपनी खुशी के लिये मनुष्य ने जानवरों का तो वध किया है और उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया मगर अब वह इसे लेकर या अन्य दूसरे बहानों के बल पर अपने ही जैसे और अपने खून का भी वध करने पर उतर आया है. कहीं कोई कुछ बहाना बनाता है तो कहीं कुछ. विश्व  का एक पूरा भाग आतंकवाद के उन्माद में डूबा है तो दूसरी तरफ जहां शांतिपूर्ण सब चल रहा है वहां जहर घोलकर एक दूसरे का खून करने और खून के लिये उकसाने में लगे हैं. जंगल कानून क्या शहर में चल सकता हैं? मनुष्य का बर्ताव भी अगर जानवरों की तरह होने लगे तो इसे कौन रोके? हाल की कुछ घटनाओं ने सारी सोच को ही बदल दिया है.कोई विश्वविद्यालय में तो कोई सड़क पर तो कोई मंच पर कुछ भी कह रहा है -मैं यह कर लूंगा तो तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे? कोई पढ़ा लिखा और जिम्मेदार व्यक्ति समाज को अपना असली चेहरा दिखाते हुए बक रहा है कि मैंने अभी-अभी फलाना मांस खाया है-आओ मुझे मार डालों. ऐसी -ऐसी बाते करने की स्वतंत्रता क्या हमारे संविधान में दी हुई है? जब कोई जिम्मेदार लोगों का समूह आस्था स्थल पर एकत्रित होता है तो उसका ध्यान सिर्फ और सिर्फ उस परमात्मा की ओर होना चाहिये जिसने उसे बनाया है लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? खून खराबे और हिंसा की बातें आस्था के पवित्र स्थल से क्यों उठ रही है? जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर क्यों समाज एक दूसरे के खून का प्यासा हो गया? जब हम दूसरे धर्म मानने वालों से सिर्फ़ इसलिए संपर्क ना रखें कि कहीं बाक़ी लोग बुरा न मान जाएं तो उसके बाद हमारा मन और दिमाग़ उन्हीं बाक़ी लोगों का ग़ुलाम बनता चला जाता है.और हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी आत्मा और नजऱ का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में चला गया? मेरा एक मित्र बताता है एक दिन जब वो एक किराना दुुकान से सिंवई खरीद रहा था तो वहां खड़े एक व्यक्ति ने हैरानी से पूछा कि आप भी सिंवई खाते हैं. मैं तो समझता था कि सिवंई बस एक वर्ग विशेष खाता हैं. वाह भई वाह क्या मानसिकता है हमारी? किसी के कहने पर किसी की जान लेने का काम तब शुरू होता है जब किसी के मुंह पर पहला चांटा पड़े और आसपास के लोग इस व्यक्ति की हिमायत इसलिए ना करें क्योंकि उसकी नस्ल, धर्म और संस्कृति अलग है. चूंकि इस बुनियाद पर पहली बार थप्पड़ मारने का हौसला और बढ़ जाता है, फिर यह हौसला बढ़ते-बढ़ते अगली वारदात में दो चांटों और फिर एक चाक़ू और फिर एक पिस्तौल और फिर भीड़ के हमले और फिर पूरी बस्ती फूंक देने में बदल जाता है. हम खुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं. यही छोटी-छोटी बातें समाज की माला में पिरोते-पिरोते इतनी बड़ी हार बन जाती हैं जिससे पूरे समाज को फांसी दी जा सकती है. जिसके हाथ में यह रस्सा है, अगर वो इससे हम सबको फांसी ना दे तो यह हमारी कोई अच्छाई नहीं, उसकी मेहरबानी है.

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

और अब हूँन ने भी लिख डाली पुस्तक


...और अब हून ने भी लिख डाली
पुस्तक-ऐसा दावा किया
कि सब सोचने हुए मजबूर!

रिटायर होनेे के बाद प्राय: कुछ लोगों को पुस्तक लिखने का शौक आ जाता है लिखवाने और छपवाने दोनों के लिये उनके पास लोगों की कोई कमी नहीं रहती और वे उसका भरपूर फायदा भी उठाते हैं. यूं तो उनकी आत्मकथा से किसी  को कोई लेना देना नहीं होता लेकिन जब ऐसे लोग किसी स्वर्गीय प्रसिद्व लोगों का नाम और उनके जीवन में घटित घटनाचक्र का खुलासा करते हैं तो स्वयं तो चर्चा में आ जाते हैं दूसरों को भी खुलकर बोलने का मौका देते हैं. अब कोई मृत व्यक्ति अपना स्पष्टीकरण देने आनेे वाला तो नहीं तो फिर क्यों न ऐसी कुछ बातों की कल्पना की जाये जो 'शायदÓ की श्रेणी में आती हो.  हाल के वर्षों में जीवनी लिखने वालों की बाढ़ सी आ गई है. इनमें से उस समय के लोग भी हैं जो स्व.जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के जीते जी उनके खिलाफ मुंह खोलने की भी हिमाकत नहीं करत थेे. जहां तक नेताजी सुभाषचंद बोस की जीवनी का सवाल है उनकी मृत्यु को लेकर बहुत सी भ्रांतियां है यह बाते आज भी सामने आये तो बात समझ में आती है लेकिन इंदिरा और नेहरू के समय के लोग तो अब भी जीवित हैं वे जानते हैं कि इन दोनों ने देश को कैसे चलाया. उनपर अपनी आत्मकथा में जिक्र करने वाले सिर्फ अपनी पुस्तक को चर्चित बनाने और इसे भारी संख्या में बिकवाने के अलावा कोई खास मकसद लेकर पुस्तक लेकर आते प्रतीत नहीं होते. अभी एक रिटायर्ड आर्मी अफसर ने फिर पुस्तक लिख डाली है जिसमें दावा किया गया है कि आर्मी ने राजीव गांधी सरकार का तख्तापलट की साजिश की थी, इससे पूर्व एक अन्य पुस्तक में दावा किया गया था कि आर्मी ने और कई कारनामे किए थे लेकिन यह समझ में नहीं

आता कि ऐसा था तो लोग उस समय ऐसे महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठे रहने के बाद भी इसका रहस्योद्घाटन करने से क्यों डरते थे. बुढ़ापे में आकर बताकर वे समाज को क्या मेसेज देना चाहते हैं ? वेस्टर्न कमांड में कभी तैनात रहने वाले ले.जनरल पीएन हून का दावा है कि 1987 में राजीव गांधी सरकार के तख्ता
पलट की साजिश रची गई थी. हून वेस्टर्न कमांड में पोस्टेड रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि पैरा-कमांडोज की तीन बटालियंस जिसमें एक वेस्टर्न कमांड की भी थी, उन्हें एक्शन के लिए दिल्ली जाने को कहा गया था. हून ने यह दावा अपनी किताब द अंटोल्ड ट्रूथ में किया है. दिलचस्प तथ्य तो यह है कि देश में सेना का विभाजन जिस ढंग से हुआ है उस परिस्थिति में क्या देश में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलटा जा सकता है. यहां राष्ट्रपति के अधीन सेना के तीन अंग- जल, वायु ,और थल हैं तथा तीनों अंगों के अपने अलग-अलग जनरल, वायुसेना, थल  और जल सेना अध्यक्ष हैं तब क्या यह संभव है कि इस देश में सिर्फ तीन बटालियन लेकर कोई क्रांति की जाये? जब तक तीनों एक अंग एक नहीं होंगे तब तक देश में तख्ता पलट जैसी बात सोची भी नहीं जा सकती? फिर क्या हून जैसा कह रहे हैं यह सिर्फ उस बटालियन से संभव है? ऐसी बहुत सी बाते हैं जो ऐसी पुस्तक लिखकर लोगों के बीच चर्चा में आने का प्रयास करते हंै. 86 साल के हून का दावा  हैं कि जब वे आर्मी में थे तब आर्मी चीफ जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी और ले.जनरल एसएफ रोड्रिगेउस (वाइस चीफ ऑफ आर्मी) तख्ता पलट करने की प्लानिंग में शामिल थे। किताब में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि उस वक्त तख्ता पलट के लिए उन नेताओं की मदद लेने की प्लानिंग थी जिनसे राजीव गांधी के संबंध अच्छे नहीं थे बहरहाल हून की बातों का अब विश्लेषण होगा और खूब चर्चा भी होगी.

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

डेढ़ सौ साल पहले बना लाउड़स्पीकर अब इंसान का दुश्मन बना!


लाउडस्पीकर की आवाज से लोगों को इतनी नफरत हो गई है कि जोर से बोलने वालों को भी अब लोग लाउडस्पीकर का नाम देने लगे हैं. आज की दुनिया में लोग लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध नहीं चाहते बल्कि इसके  उत्पादन पर ही प्रतिबंध चाहते हैं.यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने आस्था स्थलों पर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है लेकिन लोगों को तो समझना चाहिये कि यह आम लोगों के लिये कितना अनुपयोगी व हानिकारक है. अब तो लाउडस्पीकर लोगों की जान के दुश्मन बनने लगे हैं.ऐसे में क्या लाउडस्पीकर का उपयोग जारी रखना उचित है? आस्था केन्द्रो में सदैव शाङ्क्षत होनी चाहिये चूंकि यह उस परमात्मा का वासस्थल है जिसने दुनिया को बनाया है अगर वहीं आप अशांति फैलाओगे तो फिर इसका मतलब तो यही है कि आपको उन्हीं पर विश्वास नहीं है, बहरहाल आज हालात यह हो गये हैं कि लाउडस्पीकर आज नफरत फैलाने का भी एक जरिया बन गया है. हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकल रही है. अब देश में लाउडस्पीकर का बड़ा भाई डीजे भी सड़क पर उतर आया है जो लोगों की धड़कनों पर सीधा प्रहार करता है कई लोगों की धड़कने इसकी आवाज से बंद हो जाती है. देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के जारचा इलाके के बिसेड़ा गांव में हुई सांप्रदायिक घटना की जड़ में एक लाउडस्पीकर है, जिससे हुई घोषणा के बाद भीड़ ने एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी. इसी लाउडस्पीकर से घोषणा की गई कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर में कुछ अनर्थ हो रहा है. पिछले साल यूपी में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा हुई, उसमें हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकली है. लाउडस्पीकर का उपयोग करते समय लोग सारी गाइडलाइन को बलाये ताक रख देते हैं. गाइडलाइंस है कि कब और कहां लाउडस्पीकर बजाएं और किस स्तर तक कितनी ऊंची  या नीची आवाज में बजाएं. लेकिन कोई इसका न पालन करता है न प्रशासन कभी ये संज्ञान लेता है कि उनके  आदेश का पालन हो रहा है या नहीं. कुछ स्थानों पर तो लोग सोये रहते हैं लेकिन टेप लगाकर लाडडस्पीकर को तेज आवाज में चालू करके चले जाते हैं. 19वीं सदी में लाउडस्पीकर बनाने वाले जॉन फिलिप रेइस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 150 साल बाद एक विकसित समाज में यही भोंपू बेगुनाहों की जान का दुश्मन बन जायेगा. एक अनुमान के मुताबिक 2014 के अगस्त महीने तक अकेले यूपी में पुलिस ने सांप्रदायिक हिंसा के 600 मामले दर्ज किए. उनमें हर पांचवा मामला लाउडस्पीकर से फैलाए उन्माद का अंजाम था. करीब 120 मामले लाउडस्पीकर पर नफरत की गूंज से निकले.बावजूद इसके प्राय: हर आस्था केन्द्रो में  लाउडस्पीकर बजते ही रहते हैं. इनसे ना सिर्फ ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा छात्रों की पढ़ाई को नुकसान व लोगों के सुनने में फरक व नफरत का जहर फैलता है. ध्वनि प्रदूषण रेगुलेशन रुल्स के मुताबिक प्रशासन की लिखित इजाजत के बाद ही कहीं पर लाउडस्पीकर लगाया जा सकता है. रिहायशी इलाकों में लाउडस्पीकर की आवाज की सीमा दिन में 55 डेसिबल है, जबकि रात में 45 डेसिबल लेकिन इस नियम का पालन तभी होता है  जब कोई वीआईपी या वीवीपी इसकी शिकायत करता है.




गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

करोड़ों का एम्स क्या अंचल की आशाओं,आकाक्षांओं पर खरा उतर रहा! यहां क्या हो रहा है?



करोड़ों रूपये खर्च कर रायपुर में बनाया गया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान  संस्थान 'एम्सÓ क्या छत्तीसगढ़ के लोगों की आशाओं के अनुरूप खरा उतर रहा है? या आंतरिक गुटबाजी, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता जैसी बुराइयों में फंसता जा रहा है? एक सौ बीस एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस ख्याति प्राप्त अस्पताल का विवाद शुरू से इसके साथ रहा है. एम्स बनाने की घोषणा के बाद कई वर्षों तक न इसके लिये बजट स्वीकृत किया गया और न ही कोई संज्ञान लिया गया. ले देकर कार्य शुरू हुआ तो फंड का रोना रोते हुए कई बार निर्माण कार्य में विलंब हुआ और कोई न कोई अड़ंगा आता रहा. आखिर दो साल पहले इसका उद्घाटन हुआ तो बस कुछ ही तरह की चिकित्साएं यहां सुलभ हुई. अब तो आलम यह है कि अस्पताल बनाने वाली कंपनी आगे का निर्माण कार्य बीच में ही छोड़कर चली गई. बताया जा रहा है कि कंपनी का पेमेन्ट नहीं दिया गया है ऐसे में उसके लिये आगे का काम जारी रखना मुश्किल है वह अपना बोरिया बिस्तर बांधकर रायपुर से चला गया. स्थानीय अस्पताल प्रबंधन का यद्यपि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं है लेकिन कंपनी द्वारा फिनिश्ंिाग कार्य व अन्य जो कार्य उसे करना था उसे बीच में छोडऩे से जो परेशानी अब यहां के मरीजों व स्थानीय प्रबंधन को झेलना पड़ेगा वह अलग. अस्पताल को बाहर से देखो तो यहां सुनसानियत ही नजर आती है जबकि अंदर पूरे छत्तीसगढ़ के लोग लाइन लगाये न केवल अपने नम्बर का इंतजार करते खड़े रहते है बल्कि ईश्वर से दुआ, चिकित्सकों पर भरोसा और आशा की उम्मीदें लगाये नजर आते हैं किन्तु क्या वास्तव में ऐसा है कि अस्पताल बनने के बाद से जैसी सुविधा और स्वास्थ्य लाभ की आशा की गई थी वह लोगों को उपलब्ध हो रही है? एम्स का अपना
कालेज शुरू हो गया है उसमें छात्र अध्ययनरत हैं तथा नर्सिगं कालेज भी चल रहा है. यहां सबसे बड़ी दिक्कत यहां सुविधाओं को विकसित करने के काम में देरी है जिसका खामियाजा इस अंचल व आसपास के मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.  दूसरी ओर  दिल्ली तथा अन्य राज्यों में पहले से मौजूद एम्स की सुविधाएं इस एम्स को अब तक नहीं दी गई वहीं कतिपय चिकित्सकों के बीच पटरी भी नहीं बैठ रही. अभी कुछ दिन पहले यहां एनाटामी  विभाग के एक पुस्तक प्रकाशन को लेकर डाक्टरों के बीच हुआ विवाद सुर्खियों में है. वरिष्ठ चिकित्सकों में इस मुद्दे को लेकर मारपीट तक की नौबत आ गई.यहां सीनियर और जूनियर का झगड़ा भी चर्चा में है-दोनों पक्षो का अलग अलग साम्राज्य है और इसमें किसी का दखल बड़ा विवाद का कारण बन जाता है.एनाटामी की पुस्तक प्रकाशन को लेकर अस्पताल की पहली मंजिल पर गरमागरम बहस,धक्का मुक्की और मारपीट की नौबत को चटखारे लेकर लोग एक दूसरे को सुनाते हैैं.