सोमवार, 28 सितंबर 2015

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?



याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली आ रही धारणा को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह सही है कि चौदह साल का सजा याफता कैदी बाद में जिस राज्य का है उस राज्य की सरकार से अपील कर सकता है सरकार चाहे तो तो उसे रिहा कर सकती है लेकिन उम्र कैद का मतलब सारी उमर जेल में रहना है. 6 जनवरी 2010 में छत्तीसगढ़ के धीरज कुमार,शैलेन्द्र कुमार और उनके तीन साथियों ने मिलकर कैलाश की हत्या कर दी थी तथा उसका साथी जतिन बुरी तरह घायल हो गया था. दस अक्टूबर 2014 को हाईकोर्ट ने धीरज कुमार और उनके पांच साथियों को उम्र कैद की सजा सुनाई इसके खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह स्थिति स्पष्ट की. सर्वोच्च न्यायालय में इतने आपराधिक मामले लम्बित है कि एक-एक प्रकरण की सुनवाई में पांच साल लगेंगे मगर धीरज कुमार और अन्य मामले में इतनी छूट जरूर दे दी कि वह दो साल बाद फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट में अपने प्रकरण की जल्द सुनवाई की मांग कर सकते हैं. उम्र कैद चौदह साल या जिंदगी भर जेल वाली स्थिति के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी उस समय आई जब इस माह उक्त प्रकरण के दौरान सजा भुगत रहे लोगों की तरफ से यह कहा गया कि ''वे पांच साल से जेल में बंद हैं और लिस्ट के हिसाब से अगली सुनवाई पांच साल बाद होगी ऐसे में वे अपनी सजा के दस साल पूरे कर लेंगे लेकिन तब क्या होगा जब वे बेगुनाह पाए जायेंगे? फिर तो वे अपनी उम्र कैद की सजा पूरी कर लेंगे.ÓÓयाचिकाकर्ताओं के इसी प्रश्न का उत्तर ताउम्र के रूप में आया. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद प्राय: पूरे देश में उम्र कैद की सजा पाने वालों के लिये अब चौदह साल का इंतजार नहीं बल्कि पूरी जिंदगी कालकोठरी में ही रहना होगा. इस मामले पर पूरी स्थिति स्पष्ट होने के बाद अब बारी है फांसी की. क्या देश में फांसी की सजा बरकरार रहेगी या इसपर भी भविष्य में इसी प्रकार का कोई फैसला आ सकता है?





गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सड़क से..लेकर बस,ट्रेेन और प्लेन तक मौत का पीछा...आखिर कौन है इन सबके लिये जिम्मेदार?



सबसे पहले राजधानी के छेरी-खेड़ी इलाके से लगी उस बुरी खबर का जिसमें तीन छात्रों की मौत हो गई. दो अन्य भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. राजधानी में फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करने वाले 10 दोस्त बर्थडे मनाने दो कारों में सवार होकर नया रायपुर जा रहे थे. दोनों कारों के बीच रेस होने लगी, रेस के दौरान दोनों का बैलेंस बिगड़ा और आपस में टकरा गये. हादसे में  कार में सवार तीन छात्रों  की मौत हो गई जबकि दो युवक गंभीर रूप से घायल हैं. इस दर्दनाक हादसे में टाटीबंद रायपुर की  किरण पनेज सहित उसकी क्लास मेट अनिशा सरलिया व सिद्वार्थ अब इस दुनिया में नहीं रहे-सभी को हार्दिक श्रद्वांजलि.
रायपुर की खबर चौका देने वाली है जबकि हंसी खुशी परिवार को लेकर ट्रेन, बस या हवाई जहाज से सफर करने वालों की जिंदगी का भी अब कोई भरोसा नहीं रहा.कभी सपने में भी नहीं आता कि हम जिस सफर पर जा रहे हैं  यह हमारी आखिरी यात्रा हो सकती है, किन्तु हो जाती है. यह मौत कभी एक्सीडेंट के रूप में तो कभी डकैती, लूट, छेड़छाड़ या अन्य किसी तरह से होती है. प्लेन में सफर करने वाले चंद मिनटों या घंटो में अपने गंतव्य पर पहुंच गये तो ठीक वरना डर बना रहता है कि कभी प्लेन का इंजन खराब न हो जाये या फिर कोई अन्य दुर्घटना न घट जाये. आंतकियों के अपहरण का भी भय रहता है लेकिन बस और ट्रेन में सफर करने वाले तो आजकल पैसा देकर मौत या अपनी मुसीबत खरीदते हैं-यह हमारी मजबूरी और सरकार की लापरवाही है जिसके चलते यात्री मुसीबत में फंसते हैं विशेषकर ट्रेनों में सफर करने वालों के ऊपर मुसीबत किस रूप में आ जाये कोई नहीं जानता अब अलीपुरद्वार (पश्चिम बंगाल) के इस परिवार को ही देखिये अपने दस माह के बच्चे को लेकर हंसी खुशी यात्रा पर निकले थे किन्तु दीमा स्टेशन के पास इन्हे मुसीबतों ने घेर लिया और ट्रेन से बच्चे को लेकर कूदने मजबूर कर दिया. दंपत्ति और उनकी बच्ची को गंभीर चोटें आई हैं तथा वे अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल पुलिस जो बखान कर रही है उसके अनुसार पत्नी के साथ ट्रेन में  पुरुषों के एक समूह द्वारा कथित तौर पर छेड़छाड़ और फिर बलात्कार की कोशिश किए जाने के बाद दंपत्ति को अपनी इज्जत बचाने के लिये बच्ची के साथ टे्रन से कूदना पड़ा. यह घटना महानंदा एक्सपे्रेस की है जिसमें 32 वर्षीय आशाबल और उसकी पत्नी (25) अपनी 10 माह की बेटी के साथ सफर कर रहे थे कूदने की वजह यह रही कि रात ट्रेन के जनरल डिब्बे में 10 से 12 शराबियों का समूह  घुस आया और उसने पत्नी के साथ छेडछाड़ शुरू कर दी. ऐसी घटनाओं के लिये आखिर कौन जिम्मेदार है. सब जानते हैं कि ऐसी घटनाएं लगातार हो रही  है फिर भी इन्हें रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया जाता? प्लेन में चढ़तेे वक्त यात्रियों का ऊपर से लेकर नीचे तक सारी चीजों की जांच होती है फिर ट्रेन को क्यों बख्शा जाता है? विशेषकर उन ट्रनों को जो लम्बी दूरी तक चलती है. सफर करने वाले अच्छी खासी रकम रेलवे को देते हैं फिर भी कोई गारंटी नहीं कि वे सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच जायेंगे. यात्रियों की जेब से निकलने वाले पैसे से मोटे हो रहे टीटीआई आरपीएफ वाले कहां रहते हैं? यात्रियों के समक्ष टे्रन में घटित होने वाली प्राय: घटनाओं को मौन, आंख मीचकर सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता.? यात्रियों की इस मजबूरी का फायदा अपराधी तो उठाते ही हैं- रेल प्रशासन भी लापरवाह है. आम यात्रियों की सुरक्षा का कोई इंतजाम किसी भी गाड़ी में नहीं रहता. असल में सारी सुरक्षा यात्रियों के स्टेशन में
पहुंचते ही शुरू हो जाना चाहिये. हर ट्रेन में बंदूकधारी पुलिस के कम से कम दो से तीन जवानों की मौजूदगी किसी भी अनहोनी घटना को टाल सकती है लेकिन ऐसा कोई प्रबंध किसी भी ट्रेन में नहीं है. हर यात्री को टिकिट लेने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है इसमें उसके सामान की चोरी हो सकती है.उसकी इज्जत लुट सकती है उसे धक्का देकर ट्रेन से बाहर फेक दिया जा सकता है या और भी कुछ. बेचारा यात्री वास्तव में हमारी भारतीय रेल का एक निरीह प्राणी है जो बेबस,मजबूर यात्रा कर अपने गंतव्य तक पहुंचता है पहुंच गया तो उसकी किस्मत वरना क्या? वह अपनी किस्मत पर रोने वाला अलीपुरद्वार के उन तीन मनुष्यों की तरह है जो आज जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.




सोमवार, 21 सितंबर 2015

यह चिंतनीय है कि कुछ घटनाएं सामाजिक मान्यताओं को तोड़ रही!


सामाजिक जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती है जो हमें गंभीर रूप से न केवल प्रभावित करती हैं बल्कि सोचने के लिये भी मजबूर कर देती है कि क्या वास्तव में ऐसा भी होता है? अगर कोई पुरूष शराब पीकर हंगामा करे तो हमें उतना आश्चर्यजनक नहीं लगता जितना अगर कोई महिला शराब पीने के बाद हंगामा करे गालियां बके लेकिन कुछ अर्से से ऐसा ही हो रहा है और इधर छत्तीसगढ़ के साथ उदित उस झारखंड की तरफ जरा गौर कीजिये वहां तो लोग अति करने लगे हैं जहां अपनी बेवकूफी का डंका बजा रहे हैं तो वहीं ऐसा कृत्य भी कर रहे हैं जो मानवता को झकजोर कर रख रही है. कानून को अपने हाथ में लेकर उन्होनें एक बाइक सवार को पीट-पीटकर न केवल उसका कचूमर निकाल दिया बल्कि गुस्से की हद पार कर उसकी आंख भी निकाल ली यह वह राज्य हैं जहां के एक मंत्री व प्राचार्य नेे जीते जी दो बड़े नेताओं को जहां श्रद्वाजंलि अर्पित की बल्कि स्कूल की छुट्टी भी करा दी. बहरहाल कुछ ताजा जीवंत घटनाएं भी हैं जो समाज का वास्तविक आइना दिखाता है- उस घटना का यहां हम जिक्र कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में घटित हुई. एक तेरह साल की मासूम के साथ एक पैसे वाले के नाबालिग बेटे ने रेप कर उसे मां बना दिया और वह आज उसके बच्चे को पेट में लेकर किसी अस्पताल में जीवन और मौत से संघर्ष कर रही है. कुछ घटनाएं ऐसी भी घटित होती है जो अपराधी को सबक सिखाती है लेकिन हमें यह भी बता जाती है कि हमें भी इतना क्रूर नहीं होना चाहिये था. जैसे झारखंड में हुआ जहां गांववालों ने दो लुटेरों को पीट-पीट कर मार डाला तथा उनकी आंखें निकाल ली. दोनों पर आरोप था कि वे बाइक लूटने आए थे. इस दौरान उन्होंने गोली भी चलाई, गोली एक क्रेन ऑपरेटर को

लगी, जिसकी अस्पताल में मौत हो गई यह घटना रविवार शाम राजधानी रांची से सटे हटिया के एक गांव में हुई. बहरहाल चोर लुटेरों,बदमाशों के साथ आम लोगों का गुस्सा आम है किन्तु जब लड़कियां शराब पीकर हंगामा करें तो इसका क्या किया जाय. देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई मेें जहां यह आम होता जा रहा है जहां अक्सर शराब के नशे में कभी सड़क पर हंगामा करती है तो कभी पुलिस स्टेशन में. पहले एक अभिनेत्री ने हंगामा किया तो सोमवार को एक अन्य महिला को पुलिस रात तीन बजे सड़क से उठाकर थाने लाई जहां भी उसने न केवल हंगामा किया बल्कि बोतल खोलकर सबके सामने शराब पी. सामाजिक मान्यताएं,परंपराएं सब एक के बाद एक खत्म होती जा रही है जो चिंताजनक है.

अब एक नया 'शिगूफा! 'एस्ट्रायड इस सप्ताह दुनिया को खत्म कर देगा?





हम और आप में से कई लोग वर्षो से सुनते आ रहे हैं कि दुनिया का अंत होने वाला है.सन् 1960 के दशक में तो यह खबर ऐसे उडी कि बहुत से लोग मरने के कथित निर्धारित दिन घर से बाहर निकलकर आ गये. ऐसा कुछ नहीं हुआ, उस दिन न प्रलय आया न जलजला आया और न ही कुछ अनहोनी हुई इसके बाद के दिनों में एक स्काई लैब के पृथ्वी टकराने की खबर ने खूब आंतकित किया. दूर क्यों जायेंं -21 दिसंबर 2012 में भी पृथ्वी पर भयंकर प्रलय की बात कही गई थी, तब प्राचीन माया सभ्यता के कैलेंडर (5,125 साल लंबा चक्र)के  खत्म होने का हवाला दिया गया था, इसपर हॉलीवुड में फिल्म भी बन चुकी है. इस बार बात एक एस्ट्रायड की है-कहा जा रहा है कि वर्ष 2015 में सितंबर महीने अर्थात आज 21 तारीख से शुरू होने वाले सप्ताह में फिर ऐसी स्थिति निर्मित होगी कि दुनिया से मानव सभ्यता का अंत हो जाएगा? क्या पृथ्वी तबाह होने वाली है? कॉन्सपिरेसी थ्योरी की माने तो वह कुछ इसी ओर इशारा कर रही है. डूम्सडे (प्रलय का दिन)थ्योरिस्ट्स के अनुसार  22 से 28 सितंबर के बीच पृथ्वी से एक विशालकाय चट्टान (एस्ट्रॉयड) टकराएगी, जिससे सबकुछ खत्म हो जाएगा. धर्मग्रंथों में भी दुनिया के अंत होने का जिक्र आया है.एक बार  हुए   प्रलय ने कुछ लोगों को छोड़कर मानव सभ्यता को ही खत्म कर दिया था- इस बार कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट्स ने तीन महीने पहले भविष्यवाणी की थी कि सितंबर में सब कुछ खत्म होने जा रहा है.खुद को पैगंबर बताने वाले रेव इफ्रैन रॉड्रीगुएज नामक एक शख्स ने सबसे पहले इस विनाशकारी प्रलय का दावा किया था.उसके मुताबिक, एस्ट्रॉयड प्यूर्टो रिको (कैरीबियाई समुद्र में एक द्वीप) के पास टकराएगा.इससे शक्तिशाली भूकंप आएगा और पृथ्वी तबाह हो जाएगी. कई बाइबिल थ्योरिस्ट्स ने भी इस घटना की बात की है लेकिन  वैज्ञानिक पूर्व की तरह इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेते बल्कि इसे खारिज करते है उनके मुताबिक वर्तमान संकट का जो जिक्र एस्ट्रॉयड  के रूप में किया गया है वह पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही जलकर भस्म हो जाता है फिर भी
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एस्ट्रॉयड्स का पता लगाने के मामले को हाई प्रायोरिटी में रखा है. नासा  ने इस कॉन्सपिरेसी थ्योरी पर कहा था,नासा को पता है कि कोई भी एस्ट्रॉयड इस वक्त धरती से टकराने वाला नहीं है। ऐसी घटनाओं की आशंका बहुत कम है किन्तु यह भी कहा कि आने वाले सैकड़ों सालों में धरती से कोई भी एस्ट्रॉयड टकराने नहीं जा रहा.


बुधवार, 16 सितंबर 2015

सिर्फ गैस ही नहीं कई तरह की चिंगारी सड़कों पर सुलग रही है!




हादसे होते हैं, तब जागता है प्रशासन, उससे पहले तक उसे होश नहीं रहता कि जो हो रहा है वह खतरनाक व जानलेवा है.गैस के गोदाम, पटाखे की दुकान,पेट्रोल पंप, मिट्टी तेल की दुकान यह सब प्राय: विकसित शहरों के बीच में हैं चूंकि विकास के साथ आबादी बढ़ी और घनी बस्ती, कालोनियां बेतरतीब ढंग से विकसित हुई. ऐसा प्रशासन के लोगों की नाक के नीचे होता रहा किन्तु किसी को भी इतनी फुरसत नहीं रहती कि वे शहरों में निर्माण होतेे वक्त देखे कि इससे क्या रिफरकेशन हो सकते हैं. ट्रेन दुर्घटना होने के बाद उसके कारणों का पता लगाया जाता है-ट्रेन दुर्घटना न हो इसका प्रबंध शुरू से नहीं किया जाता. सांप मर जाये तो लोग लकीर को पीटते रहते हैं. झाबुआ हादसे ने देश को हिलाकर रख दिया. यहां गैस का गोदाम फटा तो पूरा देश हिल गया. क्या वहां के प्रशासन और हमारे छत्तीसगढ़ के प्रशासन में बैठे लोगों को मालूम नहीं था कि घनी बस्तियों में गैस के गोदाम खतरनाक है? क्या उन्हें मालूम नहीं कि शहर के भीतर पटाखा दुकाने चलाना और पेट्रोल-डीजल के पंप खतरनाक हो सकते हैं? फिर प्राथमिक तौर पर ऐसे प्रबंध क्यों नहीं किये जाते कि आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ न हो. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर विकसित होने के साथ यहां विकास तेजी से और बेढंग तरीके से हुआ. बस्तियां,कालोनी और शहर  बसते गये किन्तु यह सब प्रशासन में बैठे लोग देखते रहे- शहर के अंदर करीब पैंतीस गैस गोदाम काम कर रहे हैं क्या कभी प्रशासन ने जानने की कोशिश की यह शहर में भारी विस्फोट का काम कर सकता है? -अब झाबुआ मध्यप्रदेश में हादसा होने के बाद याद आ रहा है कि यहां भी तो आम आदमी सुरक्षित नहीं है. क्यों नहीं ऐसे प्रबंध किये गये कि इन सभी को शहर से दूर ट्रासंपोर्ट नगर, थोक बाजार, डेयरी आदि की तरह सुरक्षित जगह पर बसाया जाये.सरकार ने नगर निगम, विकास प्राधिकरण, ग्रामीण निवेश विभाग, पर्यावरण विभाग, पीडब्लूडी, गृह-निर्माण मंडल और न जाने कितने ऐसे विभागों का गठन कर रखा है जिसपर जनता की जेब से निकला पैसा खर्च होता है इसमें तैनात मोटी तनख्वाह प्राप्त करने वालों के सिर पर यह जिम्मेदारी थोपकर क्यों एक्शन नहीं लिया जाता? अब भी समय है शहर के व्यवस्थित बसाहट के लिये.जिस तरह गुढिय़ारी थोक बाजार को शहर से बाहर बसाया गया है उसी प्रकार अन्य व्यावसायिक स्थलों के लिये अलग से व्यवस्था की जाये. शहर में विस्फोटक ही नहीं सड़कों पर ठेले में नाश्ता बेचने वाले तक भीड़ एकत्रित कर सड़क में हादसों को आमंत्रित कर रहे हैं. जब सरकारी तौर पर गैस गोदामों को व्यवस्थित करने का बीड़ा उठा लिया गया है तो उसे इस दिशा में भी अब कड़ाई बरतने की जरूरत है कि शहर के प्रमुख मार्गों पर ठेले से व्यापार न चले उसके लिये भी जगह निश्चित हो. इससे पहले डेयरी चलाने वाले, पटाखे और पेट्रोल पंप वालों के लिये भी एसे स्थलों की व्यवस्था की जानी जरूरी है जो आम लोगों के लिये सुरक्षित हो.

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

आईएएस की एक रात कब्रिस्तान में! और एक मासूम की कोर्ट में एंट्री!



 कुछ लोगों के काम करने का तरीका अन्य से अलग होता है जो न केवल दूसरों के लिये उदाहरण पेश करता है बल्कि उसे अंगीकार करने की प्रेरणा भी देता है-अब चंडीगढ़ की एडीजे अंशु शुक्ला का ही उदाहरण ले-जिनकी कोर्ट में एक अजूबा मामला आया, जिसे उन्होंने न केवल अपनी सूझबूझ से हल किया बल्कि एक पांच साल की बच्ची, जो यौन शोषण से पीडि़त थी उसके परिवार को न्याय भी दिया.बच्ची जिसे कोर्ट में पेश किया गया न कोर्ट के बारे में उसे कुछ मालूम था और न जज को जानती,न ही उससे कठोर सवाल किये जा सकते.अंशु शुक्ला ने कोर्ट की परिधि से बाहर जाकर इस मामले में पारिवारिक नुस्खा अख्तियार किया.बच्ची से सवाल पूछने जज ने पहले बच्ची को गले लगाया, फिर गोद में बिठा लिया. इस आत्मीयता से बच्ची को लगा कोई अपना है,जज ने बातचीत शुरू की और बातों-बातों में उन सवालों के जवाब जान लिए जो अहम थे. बच्ची ने जो बताया वह वास्तव में रोंगटे खड़े कर देने वाली थी,उसने कंडक्टर अंकल की सारी पोल खोल कर रख दीं जो उससे स्कूल जाने के दौरान करता था. बच्ची ने जज के सामने खड़े आरोपी की ओर इशारा करके बता दिया कि यही वह अंकल हैं.बच्ची ने यह भी बताया कि कंडक्टर ने यह बात किसी को नहीं बताने की धमकी दी थी. अब किसी को यह बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे जालिम इंसान को जज ने क्या सजा दी होगी? बहरहाल न्याय में देर है, अंधेर नहीं. इस न्यायाधीश ने अपनी सूझबूझ से इस मामले में जिस ढंग से सारी सच्चाई सामने लाकर रखी यह एक उदाहरण बन गया है.वर्षों पूर्व बनी राजेश खन्ना- मीना कुमारी अभिनीत फिल्म दुश्मन की याद ताजा हो गई जिसमें ड्रायवर राजेश खन्ना को उसी घर की सेवा करने
की सजा दी गई जिसका कमाऊ पुत्र ट्रक  की ठोकर से मारा गया था. न्याय के परंपरागत तरीकों की जगह अब न्याय के अलग-अलग तरीके अपनाने का संदेश भी नई परिस्थितियां दे रही है इसपर विचार किया जाना चाहिये. एक दूसरा मामला है जो एक ईमानदार आईएएस अधिकारी का है जिसने अपने दायित्व को पूरा करने व मिले सबूतों की रक्षा के लिये पूरी रात एक कब्रिस्तान में बिताई.मामला तमिलनाडु के मदुरै की है,जहां 16 हजार करोड़ का ग्रेनाइट घोटाला सामने आया है. मामले की जांच आईएएस अफसर यू सगायम को दिया गया है. बीते शनिवार को इस घोटाले से ही जुड़े एक दूसरे मामले में दफनाए गए कुछ शवों को बाहर निकालना था ताकि उनकी फॉरेंसिक जांच कराई जा सके सगायम अपनी टीम के साथ शाम को मदुरै से सटे एक गांव के उस कब्रिस्तान में पहुंचे लेकिन मदुरै पुलिस और एडमिनिस्ट्रेशन ने उस वक्त कब्रों की खुदाई न कर पाने की बात कही गई सबने रविवार सुबह से काम शुरू करने को कहा. इसके बाद मौके से लौट जाने की बजाए सगायम ने वहीं रात बिताना तय किया. दरअसल मदुरै के मेलूर का ग्रेनाइट कारोबारी पीआर पलानिस्वामी इस घोटाले में मुख्य आरोपी है. पलानिस्वामी पर आरोप है कि कारोबार को बढ़ाने के लिए उन्होंने 12 लोगों की बलि दी है. जिन्हें नदी के किनारे स्थित एक गांव में दफना दिया गया. इस मामले की जांच भी मद्रास हाईकोर्ट ने सगायम को सौंप है. सगायम परेशान थे कि कब्रिस्तान में मौजूद सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर दी जाएगी. रात घिरने पर सगायम के लिए उन्हीं कब्रों के पास चारपाई लगवा दी गई. इस दौरान देर रात तक वे, वहां मौजूद पुलिसवालों और लोगों से बातचीत करते रहे. रविवार सुबह होने पर सर्किट हाउस गए। और कुछ ही देर में तैयार होकर फिर वहां पहुंच गए. इसके बाद खुदाई शुरू हुई और जांच टीम ने कुछ कंकाल बरामद किए.यह एक ऐसा उदाहरण है जो बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है.इससे यह भी साबित होता है कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी तथा पीडि़तों को न्याय मिलेगा. काश हमारे देश की सभी जांच एजेंसियां इसी जज्बे और लगन से काम करती!


सोमवार, 14 सितंबर 2015

क्या वीआईपी कल्चर आम आदमी के अधिकारों पर ठोकर नहीं मार रहा?



इस साल के शुरू में एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण खबर अखबारों में छपी, जो किसी अफ्रीकी राष्ट्र से संबन्धित थी जिसमें कहा गया कि-''एक व्यक्ति सड़क पर अपनी कार से जा रहा था, तभी उसे एक व्यक्ति ने हाथ दिखाकर लिफट देने को कहा-उसने कार रोकी, उसको कार में बिठाया और दोनो बात करते हुए गंतव्य की ओर निकल पड़े. रास्ते में अपना पड़ाव आते ही उस व्यक्ति ने गाड़ी मालिक से कहा गाड़ी रोक दो, मुझे यहीं उतरना है.गाडी रोकने के बाद चालक ने उस व्यक्ति से पूछा- भाईसहाब आप करते क्या हैं?-उसने बताया कि वह उस देश का राष्ट्रपति है.ÓÓ अब बताइये उस ड्रायवर पर क्या गुजरी होगी. क्या हमारे दंश के वीआई पी और वीवीआईपी इस तरह आपको कभी मिले या मिल सकेंगे? गरीब व आम पब्लिक का देश जो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं थकता वह कुछ- इस तरह से ढल गया है या ढाल दिया गया है कि यहां निर्वाचन के बाद हर व्यक्ति वीआईपी बन जाता है या बना दिया जाता है, वहीं उनके इशारे पर चलने वाले हर ब्यूरोके्रट की आज एक अलग ही दुनिया बना दी गई है जिसे हम आम आदमी की भाषा में  वीआईपी कल्चर कहते हैं. पूर्व के राजा महाराजाओं और अंग्रेजो से प्राप्त इस कल्चर को न हम त्याग सके हैं और लगता है न आगे इसको त्यागने का प्रयास कहीं किसी स्तर पर होगा. जिस गुलामी की जंजीर को तोडऩे के लिये लाखो करोड़ों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी आज अडसठ साल बाद भी हम उसी में जकड़े हुए है. साहब और जनप्रतिनिधियों के नाम पर चुने जाने वालों के बंगलों में गुलामी प्रथा अर्दली के रूप में, माली, चपरासी, रसोइये,नाई,धोबी और अन्य कई रूपों में जारी है जिसके चलते वीआईपी कल्चर पूरे शबाब पर है साहब तो छोडिये मेम साहब और उनके साहब जादों और साहब जादियों की देख रेख का जिम्मा भी गुलामो की तरह  इस देश के वोटर सम्हाले हुए हैं.असल में इस  कल्चर के बने रहने का कारण यह है कि देश की आजादी का संघर्ष और उसके बलिदान को सब भूल गये है.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक खबर है कि आवारा पशुओं को हटाने का अभियान उन सडकों पर शुरू किया गया है जहां वीआईपी लोग आते जाते हैं, जहां वीआईपी लोग रहते हैं और घूमने निकलते हैं. क्यां आम आदमी को गंदगी और आवारा मवेशियों के सड़क पर घूमने से  परेशानी नहीं होती? किसी आम आदमी के मरने के बाद ही तो प्रदेश में यह अभियान शुरू किया गया? तो यह वीआई पी रोड़ और वीआई पी सड़के कहां से आ गई? वीआईपी कल्चर में रहने वाला हर व्यक्ति आम आदमी से ज्यादा सुरक्षित है फिर ऐसा विभाजन क्यों? कोई भी अभियान चलता है या कोइ्र्र सुविधा देने की बात होती है तो आम जनता को क्यों वर्गो में बांट दिया जाता है? वीआईपी और वीवीआई पी कल्चर आम जनता के लिये दुखदायी होता जा रहा है?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आम आदमियों के बीच से प्रधानमंत्री बने हैं उनकी चण्डीगढ़ यात्रा के दोैरान  वीवीआईपी कल्चर की वजह से एक शहीद की अंत्योष्टी नहीं हो सकी. इससे दुखी प्रधानमंत्री ने इस बाधा के लिये जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाही का आदेश दिया-शायद इस घटना के बाद देश के कुछ राज्यों में तो वीआईपी  कल्चर को बनाये रखने वालों के ख्यालों में कुछ परिवर्तन आयेगा-ऐसी आशा है!

प्रकृति केे कोप के आगे भी कई सवाल-जिसका जवाब तो किसी न किसी को देना ही होगा!




मांग को लेकर सड़कों पर उतरने से अगर समस्या हल हो जाती है तो हम कहेंगे कि रोज लोग सड़कों पर आये और अपनी मांग रखे. प्रकृति के कोप के आगे सब बेबस हैं तो सरकार की तैयारियों के अभाव ने भी तो लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा. प्रकृति की मार झेल रहे किसान परेशान है उसकी फसल तबाह हो चुकी है. बारिश इस बार कम हुई.जहां पानी खूब गिरा वहां के पानी को सम्हालकर फसल व पीने के लिये रखने की जिम्मेदारी सरकार की थी उसका निर्वहन सही ढंग से नहीं किया. सितंबर का महीना आधा चला गया अब बारिश की  गुंजाइश कम है लेकिन लोगों को ढाढस बंधाने के लिये हमारा मौसम विभाग कह रहा है कि अभी बारिश होगी, कितना सही कितना गलत वे ही जाने क्योंकि उनकी भविष्यवाणियां अक्सर उलटी ही निकलती है याने पानी गिरेगा तो सूखा पड़ता है बहरहाल संपूर्ण छत्तीसगढ़ इस समय सूखे की चपेट में है इतना ही नहीं जलप्रबंधन सही नहीं होने के कारण इस बार गर्मी के दिनों में गंभीर पेयजल संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. जमीन के भीतर अभी पर्याप्त पानी इकट्ठा नहीं हो सका है. पानी की एक- एक बूंद अब महत्वपूर्ण हो गई है. इसमें दो मत नहीं कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ सूखे की चपेट में है लेकिन क्या इसकों लेकर सड़क पर उतरने, नारेबाजी, प्रदर्शन करने से समस्या का समाधान हो जायेगा? इसमें दो मत नहीं कि किसान इस समय मुसीबत में है और आगे आने वाले दिनो में आम नागरिक भी इसी तरह पीने के पानी और निस्तारी के लिये परेशान होंगें लेकिन इसको लेकर की जाने वाली राजनीति का औचित्य क्या है?जिस मांग का कोई समाधान नहीं उसके लिये सड़कों पर जाम लगा देने से क्या समस्या का निदान हो जायेगा? हर कोई यह मानता है कि बांधों में पानी उस समय सही ढंग से एकत्रित नहीं हो सका जब अच्छी बारिश हो रही थी समय से पन्द्रह दिन बाद बारिश हुई थी  लेकिन  जब आई तो अच्छी बारिश हुई इस दौैरान भारी मात्रा में पानी बह गया इसकी जिम्मेदारी सरकार के जलप्रबंधन विभाग की थी जवाब उनसे लेने की जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सड़को पर नारे लगाने चक्का जाम करने से इस समस्या का निदान निकल सकेगा? हां सारी मांग किसान के भविष्य पर होनी चाहिये जिसके सामने पहाड़ टूटकर गिर पड़ा है- हम क्यों नहीं पानी संचित करने की योजनाओं का पालन करते? सरकार की रिचार्जिगं योजना कहां हैं? नये बांध बनाने, वर्तमान बांधों की क्षमता बढ़ाने पर विचार क्यों नहीं किया जाता? कहां गई लाखों करोड़ो रूपये खर्च कर तैयार की गई टार बांध योजना?क्यों सरकार एक नदी से दूसरे को जोडऩे की योजनाओं पर तेजी से अमल करती ?आज की स्थिति में एक राज्य सूखे की चपेट में है तो दूसरे राज्य में बाढ़ की स्थिति है. अगर एक दूसरे से नदियों को जोडऩे की  योजना पर अमल हो जाता तो क्या देश में ऐसी स्थिति निर्मित होती?-क्या लोगों को राजनीति करने के लिये सड़क पर उतरना पड़ता? इस हालात के लिये सरकार- विपक्ष दोनों जिम्मेदार है. जो भी सत्ता में आता है वह पुराने वादो को भूल जाता है, भुगतना पड़ता है आम लोगों को, जो सडक पर निकलकर नेताओं की हां मेंं हां मिलाती है, नारे लगाती है उपद्रव करती है.इसकी आड़ में नेता अपना स्वार्थ पूरा कर फिर सत्ता में काबिज हो जाते हैं. प्रकृति के नियम से लेकर सबमें राजनीति जो घुस गई है!

किसानों की फसल बर्बाद होने व कृषकों की आत्महत्या के लिये आखिर कौन जिम्मेदार?







यह सही है कि इस साल बहुत पहले ही मौसम विभाग ने इस बात का अनुमान लगा दिया था कि इस बार साामान्य से कम बारिश होगी लेकिन क्या ऐसी स्थिति में सरकार की तरफ से ऐसे कोई कदम उठाये गये जिससे किसानों की तकनलीफ दूर हो सके और उनकी तकलीफे दूर हो सके.हर बार चाहे वह सूखे कि स्थिति हो या ज्यादा बारिश अथवा कम बारिश हमारा किसान आसमान की तरफ देखने के लिये मजबूर है.उसे कुछ सूझता नहीं कि वह क्या करें? क्या न करें? बारिश आने से पूर्व वह बैेंक से कर्ज लेकर अच्छी फसल पैदा करने के लिये पैसे का जूगाड़ करता. अपना बतँन भाड़ा बेचकर या घर गिरवी रखकर उन बैंक वालों से ऋण प्राप्त करता है जो देने के समय तो मुस्कराते हैं हंसते हैं लेकिन वसूली के समय क्रूरता की सारी हदें पार कर देते हैं. किसान बैंक व साहूकार से प्राप्त ऋण से न केवल बीज खरीदता है बल्कि खाद व दवा आदि की भी खरीदता है इसके बाद फसल बोता है जिसे वह भगवान भरोसे छोड़ देता है. भगवान ने पानी बरसाया तो ठीक वरना उसे सरकार के बंाध और नालों पर भरोसा करना पड़ता है इसके लिये भी उसे इतनी मगरमच्छी करनी पड़ती है कि कई जगह तो सर फु टव्वल की नोबत आ जाती है. अडसठ साल में देश में शासन करने वाली सरकारें प्रकृति के सारे हालातों से वोकिफ है उसे मालूम है कि कब सूखा पड़ता है कब बाड़ की स्थिति निर्मित होती है और कब ऐसे हालाता पैदा होती है कि खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है उसने इस स्थिति से निपटने के लिये कई ऐसे विभागों में मोटी मोटी तनखाह देने वाल अधिकारी ेकर्मचारियों  की नियुक्ति कर रखी है इनपर हर साल करोड़ों रूपये इन किसानों व अन्य आम नागरिकों की जेब से निकला पैसा लगता है.सवाल यह उठता है कि आखिर इतना पैसा व्यय करने के बाद भी किसानेों की फसल क्यो बर्बाद होती है?क्यों उन्हें आत्महत्या के लिये मजबूर होना पड़ता है ओर क्यों सरकार उनकी फसनों की  रक्षा करती? देश में कितने लोग खेती किसानी करते हैं क्या यह हमारी सरकार नहीं जानती?क्योंं वह ऐसी कोई योजना नहीं बनाती कि किसान खेत में फसल डालते ही उसे इस बात की गारंटी दे कि अगर किसी कारणवश उसकी फसल बर्बाद हो जाये तो उस हालत में सरकार उसकी बरपाई करेंगी और ऐसा क्यों नहीं की  जाती कि उसकी फसल अच्छी होने की स्थिति में वह सरकार को फसल का एक हिस्सा अच्छे दाम पर देगा. अगर ऐसा किसानों के साथ हो जाये तो उसकी आर्थिक स्थिति न केवल अच्छी होगी बल्कि उसे अपने आगे कि फसल पैदा करने मे ं प्रोत्साहन मिलेगा. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हम देश में आज भी एक तरफ बाढ़ से जूझते हैं तो दूसरी तरफ सूखे की मार सहते हैं1पांच साल की योजना ऐसी बनाई जा सकती है कि देश की नदियों को एक दूसरे से जोड़कर इस गंभीर समस्या का समाधान करें.क्यों नहीं इस कार्य के  िलये प्राथमिकता तय की जाती.अब जहां तक किसानों की आत्महत्या का मामला है किसानो को ऋण देने के पूूर्व सरकार को यह तय करना होगा कि वह जो ऋण उसकों दे रहा है उसकी वसूली में उस समय ढिलाई बरतेगी जब उसकी फसल प्राकृतिक आपउा से खराब होगी. हमारा किसान इतना गरीब है कि वह प्राकृतिक आपदा झेलने की स्थिति में नहीं है उसके लिेये मछली पालन,मुर्गी पालन बकरी पालन और अन्य लघु उद्योगों की वैकल्पिक व्यवस्था करना भी जरूरी है जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं की जायेगी तब तक देश का किसान खुशहाल नहीं होगा.
एक फसली परंपरा को छोड़कर सालभर अबग अलग फसल लेने के लिये चाहे वह आम अमरूद कटहल,नारियल  जैसे बड़े वृक्षों पर लगने वाले फल ही क्यों न हो लेने के लिये प्रेरित करना चाहिये जबकि सरकार को विपरीत मोसम में  इन फसलों को जीवित रखने के लिये पानी की व्यवस्था अपने स्त्रोतो से करनी होगी.

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

अंतरराष्ट्रीय संधि में उलझा एक विदेशी राष्ट्र के राजनयिक पर बलात्कार का संगीन मामला!





''सन् उन्नीस सौ इकसठ में वियना में विभिन्न देशों के बीच एक संधि हुई थी जिसमें तय किया गया था कि किसी भी देश के राजनयिकों को वह देश राजनयिक संरक्षण देगा जिसमें वह कार्यरत है. इस संधि के अनुच्छेद  29 में कहा गया है कि किसी भी राजनयिक को हिरासत में नहीं लिया जा सकता न ही उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, साथ ही उसके खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई भी नहीं की जा सकती जिससे उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचे. इस संधि के अनुच्छेद संख्या इकतीस में यह भी कहा गया कि किसी राजनयिक को आपराधिक मुकदमे से भी छूट हासिल हैÓÓ
वियना की यह संधि  इसलिये भी याद आ रही है चूंकि भारत सउदी के राजनयिक पर कार्रवाई करना चाहता है और पुलिस व सरकार दोनों इस संधि से बंधी हुई है. गुडग़ांव के एक फ्लैट में रहने वाले राजनयिक व उनके साथ कुछ लोगों पर आरोप है कि उन्होंने भूकंप पीडि़त दो नेपाली महिलाओं का न केवल लगातार रेप किया बल्कि उन्हें प्रताडि़त भी किया व अपने दोस्तों को भी परोसा. हमारी सरकार को इन सउदी डिप्लोमेट्स पर कार्रवाई से पूर्व वहां की सरकार से कहना पड़ेगा कि वह राजनयिक संरक्षण हटा ले. बिना अनुमति के अगर हमारी सरकार अंतरराष्ट्रीय कानून को नजरअंदाज कर कोई कार्रवाई करता है तो सउदी अरब भी भारत के राजनयिकों के साथ ऐसा ही कर सकता है. ऐसा बहुत से राष्ट्रों में हुआ है. अमरीका और रूस के बीच तो कई बार होता रहा है कि एक राजनयिक को गिरफ्तार करने की स्थिति में दूसरे ने दो को गिरफ्तार कर लिया किन्तु ऐसा भी कई बार हुआ है कि एक देश के कहने पर दूसरे देश ने अपने राजयनिक  सेसंरक्षण हटा लिया. अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन में तो ऐसा कई बार हुआ है. संधि का इससे बड़ा उदाहरण और क्या दें कि भारत और पाकिस्तान के बीच भारी तनाव की स्थिति के बाद भी कभी एक दूसरे देश के राजनयिक को हाथ तक नहीं लगा सका. सउदी अरब के मामले में भारतीय जांच एजेंसियों के सामने यही समस्या है कि वह राजनयिक को पूछताछ के लिए भी नहीं बुला सकते. उनके खिलाफ तब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकती जब तक उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल है. यहां तक कि उन्हें बदनाम भी नहीं किया जा सकता और भारत का फर्ज बन जाता है कि उनकी हिफाजत की जाए. इस सप्ताह बुधवार को गुडग़ांव पुलिस ने कहा था कि सऊदी अरब के एक राजनयिक के खिलाफ दो नेपाली महिलाओं ने उन्हें अगवा करने और गुडग़ांव के एक फ्लैट में उनके साथ बार-बार बलात्कार करने का आरोप लगाया है. गुडग़ांव के इस फ्लैट को सऊदी अरब के दूतावास ने किराए पर लिया था. महिलाओं में से एक की उम्र 50 साल और दूसरी की 30 साल है. एक महिला नेपाल के मोरंग और दूसरी बांग्लुंग की रहने वाली है. महिलाओं को पहले सऊदी अरब ले जाया गया था और पांच महीने पहले ही ये गुडग़ांव आईं थीं. जब एक नई महिला घरेलू काम करने इस फ्लैट में पहुंची तो उसे नेपाली महिलाओं की कथित दशा का पता चला और फिर उसने एक एनजीओ को इस बारे में बताया. एनजीओ के मार्फत मामला पुलिस तक पहुंचा. इसके बाद गुडग़ांव पुलिस ने डीएलएफ फेज 2 में एक फ्लैट पर छापा मारकर दो महिलाओं को छुड़ाया. अब देखना दिलचस्प हो गया है कि अतंरराष्ट्रीय संधि के चलते इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है?

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

प्रेम, सेक्स-संपत्ति की भूख ...और अब तो रक्त संबंधों की भी बलि चढऩे लगी!





कुछ लोग तो ऐसे हैं जो मच्छर, मक्खी, खटमल और काकरोच भी नहीं मार सकते लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो हैवानियत की सारी हदें पार कर मनुष्य यहां तक कि अपने रक्त संबंधों का भी खून करने से नहीं हिचकते. इंसान खून का कितना प्यासा है वह आज की दुनिया में हर कोई जानता है क्योंकि आतंकवाद और नक्सलवाद के चलते रोज ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल जाती है जो क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती हैं. मनुष्य का राक्षसी रूप इस युग में ही देखने को मिलेगा शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा के दो रूप के अतिरिक्त अब रिश्तों के खून का वाद भी चल पड़ा है जो सामाजिक व पारिवारिक मान्यताओं, संस्कृति- परंपराओं का भी खून कर रहा है. नारी जिसे अनादिकाल से अबला, सहनशक्ति और मासूमियत, ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है उसका भी अलग रूप देखने को मिल रहा है. रक्त संबंध, रिश्ते, सहानुभूति, आदर, प्रेम, बंधन सबको तिलांजलि देकर जिस प्रकार कतिपय मामलों में अबलाओं ने जो रूप दिखाना शुरू किया है वह वास्तव में ङ्क्षचंतनीय, गंभीर और खतरनाक बन गया है. नारी के कई रूप हमें इन वर्षों के दौरान देखने को मिले हैं लेकिन जो रूप अभी हाल के दिनों में देखने को  मिला है उसने तो समाज को एक तरह से हिलाकर ही रख दिया है. जिस नारी को समाज ने शिखर तक देखा उसने दौलत और शोहरत, सेक्स के लिये अपने ही खून का खून कर दिया. बात मुंबई के इन्द्राणी मुखर्जी का है जिसने अपनी ही बेटी को दौलत के खातिर रास्ते से हटा दिया और अब वह जेल में अन्य कैदियों के साथ चार रोटी और बाद में अन्य अपने नित्य कर्मों के लियेतार में हैं. दूसरा किस्सा देश व विश्व में रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत राज्य गुजरात के अमरेली का है जहां एक बहन ने अपने प्रेमी के साथ अफेयर में आड़े आने के कारण इस क्रूरता से अपने सगे भाई का वध किया कि सुनने वालों केे रोंगटे खड़े हो गये और देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गई. बताते हैं उसका इरादा अपने माता और पिता का भी खून करने का था लेकिन इससे पूर्व ही वह पकड़ ली गई. इस लड़की ने बड़े तरीके से अपने भाई के साथ आंखमिचौली खेली, आंख में पट्टी बांधी, कुर्सी पर बिठाया और दुपट्टे से हाथ को बंाधा, किचन में गई चाकू लेकर आई- भाई से कहा कि अब में तुझे मार डालूंगी और चाकू उसके शरीर में दो बार घुसाकर मार डाला, बाथरूम जाकर खून साफ किया व नये कपड़े पहन बाहर जाकर लोगों को बताया कि भाई को कुछ हो गया. यह बयान उसने पुलिस को भी दिया. तीसरी घटना बंगलोर के गोकुल की है जिसने पूर्व पे्रमिका को पाने के लिये अपनी पत्नी का खून कर दिया तथा इसे छिपाने व अपने प्रेमिका के पति जोस को फंसाने के लिये विमानों को उड़ाने की धमकी उसके सिम को मोबाइल में डालकर दी. लोगों की तकनीक देखिये कितनी हाईटेक हो गई हैं. रोज हो रही ऐसी घटनाओं ने उन सामाजिक मान्यताओं पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिया है जो वर्षों से चली आ रही है. मां-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, चाचा-चाची, दादा-दादी, पोता-पोती, नाना-नानी और ऐसे कई रक्त संबंधों से भरे समाज में जब खूनी खेल होता है तो समाज का चौकना स्वाभाविक है, लेकिन यह सब बंद कमरों और बंद दीवारों के भीतर होता है जिसपर निगाह तभी पड़ती है जब सब हो जाता है. इसलिये इससे निपटने के लिये भी समाज में ऐसा माहौल तैयार करना वर्तमान परिथिति में कठिन है. अब सिर्फ हम यही कह सकते हैं कि आगे चलकर सब ठीक हो जायेगा या स्थिति और खराब हो जायेगी. इसमें दूसरे स्थिति के ही ज्यादा चांसेस हैं.

सोमवार, 7 सितंबर 2015

हाईवे, फोरलेन सड़कों पर एक्सीडेंट के लिये वाहन चालक कितना दोषी?



हाईवे पर एक्सीडेंट के पीछे असली कारण क्या है? ड्रायवर की लापरवाही? ड्रायवर का शराब पीकर गाड़ी चलाना, तेज रफ्तार, ऊटपटांग मोड़, गाड़ी के सामने अचानक मवेशियों अथवा किसी व्यक्ति  या अन्य किसी वस्तु या चीज  का आ जाना या ओवरटेक?- दुर्घटना के पीछे यह सभी कारण हो सकते हैं. अगर हाईवे, फोरलेन पर तेज रफ्तार से गाड़ी नहीं चले तो एक घंटे का सफर दो और तीन घंटे का हो जाये किन्तु इन सबके बीच आज ज्वलंत प्रश्न है. सड़कों पर मवेशियों का झुंड और उनका टांग पसारे पड़े रहना, आवारा मवेशियों का अचानक वाहन के आगे कूद पडऩा, झुंड के रूप में चराने अथवा किसी तालाब में पानी पिलाने या नहलाने के लिये उस स्थिति में भी निकालना जबकि दूसरा रास्ता मौजूद है आदि. जब हाईवे खाली मिलता है तो हर ड्रायवर चाहे वह शराब पिये हुए हो या न हो उसके  गाड़ी का एक्सीलेटर बढ़ता ही रहता है, वह फिर या तो किसी रेड सिंग्नल पर रूकता है या फिर कोई दूसरी गाड़ी के सामने खड़े होने या आने से कम होती है लेकिन सपाट रोड पर अचानक मवेशी कूद पड़े तो किसकी गलती? राजधानी रायपुर के आसपास रिंग रोड और सड़कों पर रात-दिन आवारा मवेशियों का मेला लगा रहता है. इन सड़कों से राजधानी रायपुर के बड़ेबड़े अफसर, मंंत्री, विधायक, महापौर और अन्य शहरों व गांवों को चलाने वाले अधिकारियों की गाडिय़ां गुजरती है किन्तु उन्हे यह दिखाई नहीं देता कि सड़कों पर आवारा मवेशियों का झुंड पांव पसारे पड़े रहते हैं, उन्हें हटवाने के लिये वे चाहे तो अपनी गाड़ी में बैठे-बैठे ही निर्देश जारी कर सकते हैं किन्तु ऐसा होता नहीं. शायद अपने दफ्तरों से निकलने के बाद ऊपर लिये गये नामों में से किसी को देश दुनिया की चिंता नहीं होती- अगर ऐसा नहीं तो पिछले चौबीस घंटे के दौरान हुए बड़े-बड़े हादसे नहीं होते. राजधानी के आसपास तीन महत्वपूर्ण हाईवे तथा फोरलेन सड़कों पर तेज रफ्तार कारों के सामने आए तीन मवेशियों की मौत हो गई तथा गाडिय़ां भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई. फोरलेन जीई रोड पर अग्रसेनधाम मोड़ के पास तथा वीआईपी रोड पर टेमरी गांव के पास हुए हादसों में गायों की तो मौत हुई लक्जरी कारें भी क्षतिग्रस्त हुई. शहर के अंदर-बाहर सब इस तरह की घटनाएं मवेेशियों के कारण होती है लेेकिन सारा दोष अक्सर ड्रायवरों पर मढ़ दिया जाता है. दुर्घटना होने के बाद ड्रायवर को हर स्थिति में अपनी जान बचाकर भागना पड़ता है, चाहे उसकी गलती हो या न हो. मवेशी सड़कों पर आ ही न पाये इसका इंतजाम क्यों नहीं होता? क्यों नगर निगम के लोग प्रतिदिन अभियान चलाकर मवेशियों को कांजी हाउस में नहीं भेजते? प्रमुख और लम्बी सड़कों के दोनों तरफ ऐसे बाड़ क्यों नहीं लगाये जाते कि मवेशियों का प्रवेश सड़कों पर न हो? आप राजधानी के जीई रोड पर डिवाइडर जहां पौधे लगाये गये हैं वहां मवेशियों को ऊपर चढ़कर खड़े रहते और पौधों को नुकसान पहुंचाते कभी भी देख सकते हैं- एक तरफ हम वृक्षारोपण के लिये अभियान चला रहे हैं, दूसरी तरफ पौधों को मवेशी रौंदकर खत्म कर रहे हैं. डिवाइडरों पर खड़े मवेशी अचानक किसी तेज कार के सामने कूद जाये तो हादसा होना स्वाभाविक है. मवेशी दुर्घटनाओं को अंजाम देने वाले सबसे बड़ी वजह बन गये हैं, जिस पर गंभीरता से कोई कदम उठाना जरूरी है.

रविवार, 6 सितंबर 2015

सरोना स्टेशन का वर्षों पुराना सपना अब साकार होगा! ट्रेनों में सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह



अगर रेलवे अपनी योजना के अनुरूप आगे बढ़ा तो भोपाल के हबीबगंज और दिल्ली में निजामुद्दीन की तरह रायपुर के सरोना में भी एक स्टेशन शीघ्र ही अस्तित्व में आयेगा जो न केवल रायपुर के सबसे पुराने स्टेशन में भीड़ कम करेगा बल्कि इस पूरे क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत भी देगा. ऐसे स्टेशन देश के कई बड़े नगरों में हैं जहां इस सुविधा के होने से आधी से ज्यादा भीड़ छंट जाती है. सरोना को स्टेशन बनाने की पहल इस बार सांसद रमेश बैस की तरफ से शुरू हुई है और रेलवे ने अपने कदम आगे बढ़ा भी दिया है. इससे एक बात तो साफ है कि योजना पर अमल भी जल्द होगा. रमेश बैस अच्छी तरह जानते हैं कि रायपुर पश्चिम में रेलवे स्टेशन की मांग बहुत पुरानी है तथा इसके स्थापना की पहल भी इस क्षेत्र के लोगों की आशाओं के अनुरूप है. जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से जुड़ा हुआ था तब इस क्षेत्र के लोगों ने यहां स्टेशन बनाने के लिये आंदोलन छेड़ा था. पूर्व में रेलवे ने सरोना को पूर्णत: विकसित करने की जगह सरस्वतीनगर को विकसित किया- जिसकी अब कोई उपयोगिता नहीं रह गई क्योंकि यहां एनआईटी की बड़ी-बड़ी दीवार ने स्टेशन के लिये रास्ता ही नहीं छोड़ा. सरोना रायपुर का नया और बड़ा स्टेशन बनेगा यह लगभग तय है, इसके लिये सरोना में पर्याप्त भूमि है. एम्स बनने के बाद यह बाहर से पहुंचने वाले रोगियों के लिये भी एक अनिवार्यता बन  गई है. आसपास शैक्षणिक संस्थानों के अलावा रिहाइशी कालोनियों के परिप्रेक्ष्य में भी इस स्टेशन का अपना महत्व होगा. सरोना रेलवे स्टेशन जीई रोड और दोनों तरफ की रिंग रोड से लगा हुआ होने के कारण यहां स्टेशन तक चार या छह लाइन की अच्छी चौड़ी सड़क निकल जाये तो यह वर्तमान रायपुर स्टेशन से भी बड़ा और लोगों की प्राथमिकता वाला स्टेशन बन सकता है. रेलवे व जनप्रतिनिधियों की तरफ से सरोना में नया स्टेशन विकसित करने की पहल का हर तरफ से स्वागत है किन्तु यह भी सही है कि इसे बनाने में अब और देरी नहीं करनी चाहिये. रेलवे से जुड़ी एक अन्य खबर ने भी आज सनसनी  पैदा कर दी है जिसमें कहा गया है कि भगत की कोठी एक्सप्रेस के एसी कोच में जयपुर से रायपुर कोण्डागांव आ रहे एक परिवार की बहू का पर्स किसी ने गायब कर दिया. इस पर्स में नब्बे हजार रुपये नगद और दस लाख रुपये के गहने थे. ट्रेनों में लूट और चोरी की ऐसी कई घटनाओं के बीच लोगों की इस ढंग की लापरवाही भी चर्चा का विषय है कि इतनी रकम को ट्रेन में रखकर लोग घोड़ा बेचकर सोने की तरह  कैसे सो जाते हैं किन्तु यह भी सवाल है कि रेलवे भारी किराया वसूल करने के बाद भी अपने यात्रियों को सुरक्षा क्यों नहीं दे पा रहा?

अपराध अन्वेषण में मीडिया का दखल, अपराधों की गुत्थियां सुलझाने में रोड़ा!



किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना और गिरफ्तार करना दोनों अलग-अलग है -यह बात मुझे उस समय पता चली जब एक आपराधिक मामले की रिपोर्ट के बाद कोर्ट से समन पहुंचा. असल में कथित अपराधी को हिरासत में लिया गया था न कि उसे विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार किया गया था. कई बार होता यह है कि पुलिस अपने तरीके से किसी को यूं ही पूछताछ के लिये बुलाती है और बाद में या तो छोड़ दिया जाता है या फिर गिरफ्तारी शो कर दी जाती है लेकिन कतिपय हाई-प्रोफाइल मामलों में पहले हिरासत और फिर गिरफ्तारी शो की जाती है. कानूनी दृष्टि से हिरासत और गिरफ्तारी अलग-अलग बात है इसलिये उसे छापते समय भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है वरना कभी-कभी रिपोर्टिंग का हमारा उत्साह कानून ठंडा कर सकता है, बहरहाल हम आज इस बात का जिक्र कुछ विशेष परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं- अपराध और अपराध की रिपोर्टिंग में आये भारी बदलाव ने सबको चौंका दिया है. कुछ रिपोर्टिंग प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में ऐसी हो रही है जो पुलिस को मदद मिलने की जगह सीधे-सीधे अपराधियों को लाभ पहुंचाने का काम कर रही है. मुम्बई 26/11 आतंकी हमला हो चाहे गुरूदासुपर की घटना अथवा जम्मू-कश्मीर की-प्रिंट मीडिया की भूमिका अपने कर्तव्य की दृष्टि से जरूर सही हो सकती है लेकिन अगर सही ढंग से विश्लेषण कर देखा जाये तो इसका फायदा सीधे-सीधे अपराधियों को ही होता है. जम्मू-कश्मीर में आंतकवादी हमले के सीधे दृश्यांकन के बाद तो सरकार को स्वयं संज्ञान लेकर दृश्यांकन रूकवाना पड़ा. हम कभी-कभी अति उत्साह में आकर या अपना टीआरपी बढ़ाने के लिये ऐसी-ऐसी बातें दिखा या लिख देते हैं जो सीधे-सीधे संबंधित अपराधी को भाग निकलने या अगली  ब्यूहरचना तैयार करने में मदद करता है. हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़ी डकैती हुई, अपराधी अपराध कर भाग गये, उसके बाद जो रिपोर्टिंग इस मामले में कुछ मीडिया में हुई वह अपराधियों को सीधे-सीधे मदद पहुंचाने वाली थी. उदाहरणार्थ- वे कहां भागे हैं, कैसे भागे, कहां-कहां पुलिस उनका पीछा कर रही है, कौन लोग हो सकते हैं? डकैती में कोई पकड़ा नहीं गया उसके पहले ही डिसाइड कर लिया गया कि वह पारधी गिरोह हो सकता है. ऐसी सब बातें या तो कुछ हमारे लोग खुद अपने मन से बनाते हैं या जांच करने वालों में से कुछ लोगों के मुंह से निकलता है. अकेले यह इस डकैती का मामला नहीं इससे पूर्व कई ऐसी घटनाएं हुई जिसमें इस तरह की मीडिया रिपोर्ट ने पुलिस के अन्वेषण को बाधक बनाया है. नन बलात्कार कांड का आज तक खुलासा नहीं हुआ- इस कांड में पीछे मुड़कर देखें-क्या क्या खुलासे हुए थे. आरूषी हत्याकांड की हकीकत कुछ निकली और कुछ कही गई. अब यह जरूरी हो गया कि जो बातें कही या लिखी जाय उसके लिये किसी एक व्यक्ति को अधिकृत किया जाये. यह बात और है कि रिपोर्टर अपनी इन्वेस्टीगेटिंग कर अपनी रिपोर्ट दे, मगर यह कहा जाना कि अपराधी को पकडऩे पुलिस फलां जगह के लिये रवाना हो गई है और एक टीम वहां जायेगी तो दूसरी वहां तो इससे तो यही होगा कि अपराधी पूरी तरह सचेत हो जायेगा. आज संचार साधन इतने हाईटेक हो गये हैं कि हर व्यक्ति इसका भरपूर उपयोग कर रहा है. मुम्बई में शीना मर्डर केस में जांच प्रमुख रूप से पुलिस कमीश्नर राकेश मारिया स्वयं कर रहे हैं. उन्होंने इस केस की गुत्थियों को सुलझाने में देरी के लिये मीडिया को जिम्मेदार ठहरा दिया है. कुछ बातें अतिउत्साह में ऐसी भी लिख या दिखाई जा रही है जिसका शायद अपराध या अपराधी से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. काल्पनिक बातों पर होने वाली रिपोर्टिंग वास्तव में गड़बड़झाला ही है जो राकेश मारिया के उस कथन की पुष्टि करता है जिसके अनुसार मीडिया के भारी दखलअंदाजी ने गुत्थियों को बुरी तरह से उलझा दिया है तथा अन्वेषण के तथ्यों तक पहुंचने में देरी कर दी है.

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

स्कूलों में बच्चो को शैक्षणिक ज्ञान के अलावा कराटे,मार्शल आर्ट जैसी तकनीक भी सिखाई जाये




अगर हममेें हिम्मत है तो किसी भी कठिन स्थिति का सामना कर सकते हैं और यदि कुछ दाव पेच सीखा है तो यह ताकत हमारी रक्षा के लिये काफी हो जाती है. अब ब्राजील की उस साधारण सी दिखने वाली महिला को ही बात को ले - लुटेरे ने उसका आंकलन सही  किया होता तो वह उससे जूझते ही नहीं. मोबाइल लूटने के चक्कर में लुटेरा ऐसा फंसा कि उसे उसके नाना, नानी, पापा मम्मी से लेकर भगवान तक सब याद आ गये. लड़की ने ऐसा दाव मारा कि लुटेरा ट्राइगं चोक फंदे में फंस गया.असल में यह लड़की मार्शल आर्ट में ब्लू बेल्ट है और उसने इस लुटेरे को अपने शिकंजे में कसने के लिये उसी विदा का प्रयोग किया. करीब बीस मिनिट तक उसे उसी दाव में कसे रखा जब तक कि पुलिस नहीं पहुंच गई. इस वाक्ये का उल्लेख हम यहां इसलिये कर रहे हैं चूकि इस ढंग की घटनाएं भारत में आम है यहां लुटेरे सड़कों पर महिलाओं को छेडऩे, लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ते. अगर देश की शिक्षा में रोज कम से कम एक पीरियेड ऐसी विदाओं जिसमें मार्शल आर्ट,कराते आदि सिखाने के लिये तय किया जाये तो देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनी सुरक्षा स्वंय करने के काबिल हो जायेगा. वैसे भी हर व्यक्ति को इतना तो काबिल होना ही चाहिये कि वह किसी भी आपात स्थिति का मुकबाला स्वंय कर सके.हम यह सुझाव देकर अपने देश के युवक-युवतियों को कमजोर नहीं बता रहे, यहां भी ऐसे कई उदाहरण है जिसमें युवक युवतियों ने कई ऐसे साहसपूर्ण कारनामे किये हैं जिसके चलते अपना व अपने परिवार का बचाव किया है लेकिन यह कुछ लोगो तक सीमित है इसका फैलाव हर स्तर पर होना चाहिये जिसके चलते किसी भी आक्रमण का त्वरित निपटारा युवक युवतियां कर कर सके. यह अलग बात है कि कोई एकदम असहाय हो जाये तथा कुछ कर ही नहीं पाये जैसा दिल्ली में राष्टपति का पुरस्कार प्राप्त करने समता एक्सप्रेस से रवाना हुई सेन्ट्रल स्क्ूल की प्राचार्या के साथ हुआ जिन्हे ट्रेन में कुछ नशीला पदार्थ देकर बेहोश कर लूट लिया गया. चोर लुटेरे किसी को नहीं छोड़ते वो भगवान के मंदिर में भी घुस जाते हैं और लोगों के घरों में भी यहां तक कि सजा देने वाले जज को भी नहीं छोड़ते.एक मामला अहमदाबाद के मेट्रोपोलिटिन जज का है जिनके पास से मोबाइल चोर उड़ा ले गये. हम देश में अनुशासन के नाम पर एनसीसी  स्काउट जैसी शिक्षा को अपने जीवन में शामिल कर चुके हैं लेकिन अपनी आत्मरक्षा के लिये जो भी बच्चों में बांट रहे हैं वह हर दृष्टि से कम है इसपर सरकारों को संज्ञान लेना चाहिये. प्राय: सभी शालाओं में एनसीसी के साथ साथ योग,कराटे, मार्शल आर्र्ट जैसी कलाओं को भी बच्चों के शिक्षा में शामिल करना चाहिये ताकि मानसिक शिक्षा के साथ बच्चों को शारीरिक तकनीक  की शिक्षा भी मिल सकें.

बुधवार, 2 सितंबर 2015

रायपुर में डकैती तब भी होती थी अब भी,तब पारधी गिरोह का नाम आया अब भी! क्यो सक्रिय है यह गिरोह?


जहां तक मेरी जानकारी है रायपुर में डकै ती का इतिहास बहुत ज्यादा पुराना नहीं है. उस समय रायपुर मेें एक एसपी,एक सीएसपी, एक टीआई और गिने चुने थाने जिसमें कोतवाली, गंज, आजाद चौक शामिल हुआ करते थे, तभी एक दिन खबर आई कि महुआ बाजार में डकैतों का एक गिरोह पकड़ा गया है जो अपने शिकार की तैयारी में था. उस समय के एसपी पूरन बतरिया, सीएसपी बीएल तारन और टीआई नायडू सहित कई अफसर कर्मचारी तुरन्त एक गैरेज में पहुंचे जहां सभी डकैतों को पकड़कर रखा गया था.वहां उनसे पूछताछ में पता चला कि गिरोह में से अधिकांश बाहरी व्यक्ति है जिसमें एक स्थानीय महिला भी थी.गिरोह कोई बड़ी वारदात नहीं कर सका इससे पहले पुलिस ने उन्हे दबोच लिया और पुलिस ने राहत की सांस ली किन्तु डकैतों की इस सक्रियता ने पुलिस को बैचेन करना शुरू किया उसके बाद सर्वोदय नगर हीरापुर कालोनी मेें प्रोफेसर वर्मा के घर डकैतों ने धावा बोला इस डकैती में भी काफी लोग शामिल थे इसके बाद इतनी दहशत इस कालोनी में फैल गई थी कि अधिकांश लोगों ने रायपुर पश्चिम स्थित स्थित इस सुनसान स्थल पर बसी उक्त कालोनी से घर खाली कर दिया कई तो बेचकर चले गये.इसके बाद तो जैसे रायपुर में डकैतों के आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया. फाफाडीह स्टेट बैंक कालोनी,सुन्दर नगर,श्यामनगर ऐसे कई इलकों को डकैतों ने अपना शिकार बनाया.अधिकांश डकैतियां ऐसे स्थलों में होती थी जहां से रेल पटरियां निकलती है या स्टेशन नजदीक हो. रायपुर के अलावा छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों को भी ऐसे गिरोह ने निशाना बनाया.पुलिस का हमेशा शक चड्डी बनियान गिरोह अथवा पारधी गिरोह पर रहा.यह सच भी निकला. बंजारों की तरह रहने वाली इस प्रजाती के लोगों का एक तरह से यही धंधा है- डकैती के साथ यह विचित्र किस्म की हरकत भी करते हैं अर्थात दहशत पैदा करने के लिये पत्थर फैकते हैं आस-पास शौच करते हैं और निडर होकर वारदात को अंजाम देते हैं.  रेलेवे स्टेशन के आसपास के घरों को चुनते हैं ताकि वारदात के बाद उस गाड़ी से निकल भाग सके. बरसात ठण्ड के दिनों में सुबह के पहर में वारदात को अंजाम देते हैं और भाग निकलते हैं.आज और कल की बात में बहुत अंतर आ गया अब लोगों के घरों के आस-पास सीसीटीवी, गार्ड और अन्य अनेक सुरक्षा उपाय के बावजूद डकैतों को मौका मिल रहा है यह या तो हमारी लापरवाही के कारण हो रहा है या पुलिस की कमजोरी के कारण कि वह रेलवे स्टेशनों, बस स्टैण्डों पर व शहरों के बाहरी क्षेत्र में जहां दवा बेचने या अन्य किस्म की गतिविधियों पर लिप्त लोगों के ऊपर निगाह नहीं रखती.स्टेशन में हर आने-जाने वाली गाडिय़ों के समय पुलिस की सघन निगाह रखे तो डकैती और डकैतों पर नियंत्रण पाया जा सकता है. कालोनियों में रहने वालों की भी गलती है कि बैंक और अन्य सुविधाएं होने के बावजूद घरों में भारी मात्रा में नगदी और गहने रखना तो एक तरह से अपराधियों को आमंत्रित करना ही है. राजधानी रायपुर अब महानगर के रूप में तब्दील हो चुका है पुलिस की पर्याप्त गश्त नहीं है.रात घूमने फिरने वालों और संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त लोगों पर कोई निगरानी नहीं है. स्थानीय के मुकाबले बाहरी लोग विदेशी लुटेरों की तरह आते हैं और लूटकर चले जाते हैं. पिछली वारदातों का विश्लेषण किया जाये तो यह अपने आप साबित हो जाता है कि अधिकांश वारदातों में बाहरी गिरोह का हाथ होता है.

हड़ताल,हड़ताल और हड़ताल! देश की रीड़ तोडऩे वाले इस मूल अधिकार का है कोई इलाज?



हड़ताल से पच्चीस करोड़ रूपये से ज्यादा का नुकसान हुआ,आवश्यक सेवाएं ठप्प रही,औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन नहीं हुआ, बदंरगाहों पर भी कामकाज ठप्प रहा-चंद लोगों की जिद,चंद लोगोंं की मांग और उसपर सरकार की अडिय़ल नीति पर यह सब कल ही नहीं अक्सर होता आ रहा है-हम आम नागरिकों को  कब तक यूं तकलीफे सहनी होंगी? हड़ताल शांतिपूर्ण ढंग से निपट जाये तो ठीक वरना चक्का जाम, तोडफ़ोड़ आगजनी-जिसे जो लोग बनाते हैं उसे वे ही चंद मिनटों में ही उजाड़ देते हैं. यह कौन सी व्यवस्था है? कैसा अधिकार है? क्यों सरकारें ऐसा होने का मौका देती है? । इस बार देश में ट्रेड यूनियनों की हड़ताल के दौरान जो कुछ हुआ वह कुछ ऐसा ही था कि लोग अपने ही देश के दुश्मन बन गये! श्रमिकों की मांगों पर सरकार के कान में जू नहीं रेंगती हम क्यों इतने असंवेदनशील हो जाते हैं? जगह-जगह अनजान लोगों से लडऩे झगडऩे और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से किसका भला होता है? पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्यप्रदेश जैसे शहरों में जो कुछ हुआ वह शायद यही कह रहा था कि कोई इसे करा रहा है और यह कराने वाला दूर बैठा मजा ले रहा था. कोई मां आटो से बच्चे सहित खींचकर निकाली जा रही थी तो कोई युवा जिसे इंटरव्यू में समय पर पहुंचना था वह तोडफ़ोड करने वाले से गिड़गिड़ा रहा था कि भाई हमें जाने दो समय पर नहीं पहुंचे तो हमें नौकरी नहीं मिलेगी. बहुत से लोग अपना भारी सामान अपने कंधों पर लादकर पैदल ही ऐसे भाग रहे थे कि कहीं तो उन्हें सुरक्षा मिलेगी. अपने पिता की उम्र के लोगों को सड़क पर उनके बेटे कुचल रहे थे, ऊपर से पुलिस की लाठियां ऐसे बरस रही थी जैसे कोई हिंसक जानवर घुस आया हो।  इन कलयुगी हड़तालों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी जिन लोगों की है वे अब भी चुप हैं। अड़सठ साल के दौरान होने वाली बुराइयों को दूर करने का प्रयास क्यों नहीं किया जाता? किसी भी बड़ी घटनाओं पर तत्काल पूर्व से लिखी गई श्रद्वाजंली और श्रद्धासुमन अर्पित करने वालों को क्या यह सब बुरा नहीं लगता? क्योंं वे देश के हित की बात नहीं सोचते? जनता भी तो इसके लिये दोषी है, क्यों नहीं वह अपने नुमाइन्दों से यह सब रोकने की मांग करती? बच्चे, महिलाएं पुरूषों व वृद्धों सभी को ऐसी हड़तालों से परेशानी का सामना करना पड़ता है। अक्सर होने वाली हड़ताल में यही अंजाम होता है कि जनता बुरी तरह परेशानी का सामना करती है और इस परेशानी में एक तरह से व्यवस्था में बैठे लोग उन्हें झोक देते हैं। बैंक कर्मचारी हो या राज्य अथवा सेन्ट्रल की नौकरी करने वाला सभी वर्ग-आम आदमी से अच्छी तनख्वाह पाता है अच्छी जिंदगी बसर करता हैं. एक का समाधान निकलने के कुछ ही दिनों के अंतराल में यह वर्ग हाथ में झंडे- मुंह में नारे लेकर पुन: सड़क पर कूद पड़ता है. सरकार इनसे बातचीत को टालती रहती है और अंत में जब ऐसा हो जाता है जैसा बुधवार को हुआ तो बातचीत कर दोनों गले मिलकर एक हो जाते हैं। सारा खेल आम जनता को दो पाटों की चक्की में पीसने के सिवा कुछ नहीं- इसे अब समझने की जरूरत है. क्यों हड़ताल की नौबत आती है? क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था की जाती है कि देश के लिये काम करने वाला हर व्यक्ति सेना-पुलिस के अनुशासन की तरह बंधने बाध्य हो। अगर वह इसके लायक नहीं है तो दूसरे नौजवान को मौका मिले-कितने ही ऐसे नौजवान हैं जो आज सारी योग्यता होने के बाद भी नौकरी की तलाश में घूम रहे हैं। जब तक कठोर व्यवस्था कायम नहीं होगी यह मुसीबत सरकार के गले में लटकी रहेगी तथा आम जनता पिसती रहेगी.

दूरंतों का फायदा रायपुर को क्यों नहीं?सामने दिख रही फिर भी कई प्राथमिकताएं नजर अंदाज !




एक अच्छी खबर यह है कि दूरंतों ट्रेन बिलासपुर से सवारी भरना शुरू करेगी लेकिन बुरी खबर यह कि इसका स्टापेज रायपुर सहित छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे शहर में नहीं होगा. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर होने के बावजूद जब भी कोई बड़ी सुविधा देेने की बात आती है तो इस बड़े शहर की उपेक्षा ही होती है. रायपुर में इंटरनेशनल हवाई अड्डा है यहां बंगलादेश का भटका हवाई जहाज सही सलामत उतरकर यह बता चुका है कि यहां कोई भी विमान उतर सकता है या उड़ान भर सकता है. देश के बड़े बड़े शहरों की राजधानियों से जोडऩे वाले विमान यहां से उड़ान भर रहे हैं तथा भविष्य में यहां से और ज्यादा यात्री विमानों व मालवाहक विमानों के उड़ान भरने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता जबकि टे्रेन सेवा के मामले में शुरू से रायपुर उपेक्षित रहा है.बाहर से आकर देश की राजधानियों को जोडऩे वाली कई ट्रेने रूकती व गुजरती जरूर हैं किन्तु बाहर से आकर रायपुर रुककर या यहां से रवाना होने वाली कोई ट्रेन नहीं चलती.कोई दुर्ग से जाती है तो कोई रायगढ़, कोरबा या बिलासपुर से शुरू होकर या खत्म होकर फिर अपने गंतव्यों की ओर रवाना होती है.अब यह मामला ट्रेन का हो या प्लेन का अथवा सड़क का सरकार और उसके योजनाकार किसी भी जनहितकारी योजना को बनाने में प्राथमिकताओं की तिलांजंली देकर आगे बढ़ते हैं इससे लोगों की मुसीबतें और बढ़ जाती है उदाहरण के लिये राजधानी के कुछ हिस्सों की सड़कों का ही मामला लें जहां सड़कों का तुरन्त विस्तार जरूरी है ताकि ट्रेफिक की समस्या का हल तत्काल हो सके .तेलघानी नाका स्टेशन रोड फाफाडीह की सड़के इतनी चौड़ी हो चुकी है
कि वे ट्रेफिक के बोझ को झेल सके उसका विस्तार आगे भी किया जा सकता है लेकिन योजनाकार इसके तत्काल और विस्तार की योजना बना रहे हंै जबकि जीई रोड जहां शहर के चारों तरफ से ट्रेफिक का दबाव है उसपर उसका कोई ध्यान नहीं है शाम के वक्त तात्यापारा से शारदा चौक तक निकलने में आम आदमी की बात छोडिय़े मंत्री-संत्री नौकरशाह सभी को तकलीफ होती है जनता की तकलीफों पर जिद या पैसा हावी है। योजनाकारों को राजनांदगांव से सीख लेना चाहिये जहां जीई रोड को शहर से मुक्त कर अलग फलाई ओवर निकालकर सारी ट्रेफिक समस्या ही दूर कर दी. जनता को चाहिये सुगम ट्रेफिक उसके लिये चाहे सरकार फलाई ओवर बनाये या सड़के चौड़ी करें इसके लिये उसे जो करना है वह प्राथमिकता से करें यह रवैया होना चाहिये. मुआवजे, कचहरी से ज्यादा अच्छा समझौते का रास्ता अख्तियार करें. फलाई ओवर के लिये चंद बड़ी बिल्डिंगे आड़े आ रही है तो उनकी ऊंचाई कम भी तो की जा सकती है. सरकार के योजनाकारों को सारी विकास योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर तय करना चाहिये.कुछ योजनाएं या तो रूकी पड़ी है या फिर बनने के बाद भी फीता कटवाने के चक्कर में रूकी पड़ी है।