रविवार, 30 अगस्त 2015

भूमि पर विवाद का खात्मा?अब राजनीति में नये-नये पैतरे और इन्द्राणी का क्राइम रहस्य!



प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी भूमि संबन्धी विधेयक अब नहीं लायेंगे.बिहार में शीघ्र ही विधानसभा के लिये चुनाव है, इससे पूर्व लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सोनिया गांधी की कांग्र्रेस के महागठबंधन ने अपने पासे फेकना शुरू कर दिया है.गुजरात से पटेल आरक्षण को लेकर उठी राजनीतिक आग यद्यपि अपने जन्म स्थल गुजरात में थम गई है लेकिन लगता है कि आगे चलकर इसकी आंच देश  के कई राज्यों में फैलाने की तैयारी शुरू हो गई है .यह आंदोलन अब सरकार के लिये मुसीबते खड़ी कर सकता है. आंदोलन के जनक हार्दिक पटेल का कहना है कि वह अब देश के सत्ताईस करोड़ लोगों को एकत्रित कर एक संगठित आंदोलन देशभर में शुरू करेंगे. इधर देश की हाई प्रोफाइल शीना मर्डर केस रोज नये-नये रहस्य उगल रहा है इससे मुम्बई पुलिस खुद आश्चर्य चकित है. इस मामले में रहस्योद्घाटन हुआ है कि इस पूरे कांड की विलन इन्द्राणी मुकर्जी शीना से जहंा नफरत करती थी वहीं उसे व उसके भाई मिखाइल को मारने का प्लान बहुत पहले बना लिया था इसके लिये वह उन्हे समय समय पर स्लो पाइजन भी देती थी. इन्द्राणी मुकर्जीे हत्या के आरोपो से इंकार करती है जबकि उसके पूर्व पति संजय खन्ना ने हत्या के आरोपों को स्वीकार कर लिया है.पुलिस ने इंद्राणी और पीटर मुकर्जी के घर से एक सूटकेस भी जब्त कर और कई रहस्यों पर से पर्दा हटाने का दावा किया है जबकि इस मामले का हश्र भी आरूषी हत्याकांड जैसा होता लग रहा है यद्यपि पुलिस ने सीआरपी की धारा 165 के तहत सारे बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराकर अपने सबूतों को पुख्ता किया है बहरहाल यह मामला अभी कई रहस्यों को खोलेगा इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस अंचल के गरीबों की सुध ली है, उसने घोषणा की है कि अब
छत्तीसगढ़ के छत्तीस शहरों में कोई गरीब बिना घर के नहीं रहेगा सबके पास अपना घर होगा.पिछला लोकसभा सत्र भूमि अधिगहण संबन्धी बिल और ललित गेट और अन्य कई मुद्दो को लेकर बाधित रहा, सरकार और विपक्ष दोनों हटधर्मी पर अड़े हुए थे और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी हठधर्मिता छोड़ दी है,उन्होनें अब यह विधेयक पेश नहीं करने का ऐलान कर दिया है.राजनीतिक विश£ेषकों का कहना है कि ऐसा ही करना था तो सत्र को इतना बाधित क्यों होने दिया? बहरहाल अब आगे आने वाला समय बिहार विधानसभा चुनाव राजनीति की एक नई राह तय करेगा.राजद, राजग और कांग्रेस के महागठबंधन और सत्तारूढ पार्टी में कौन देश की राजनीति में हावी होगा यह भी तय करेगा. वाक युद्व चरम पर है दूसरी ओर आरक्षण की राजनीति एक नई जमीन तलाश  रही है.हार्दिक पटेल ने सत्ताईस करोड़ लोगों की फौज को इस अभियान में उतारने का ऐलान कर सनसनी पैदा कर दी है जबकि इस अभियान के विरोधी यह भी कहने को नहीं चूक रहे हैं कि यह देश से आरक्षण को ही खत्म करने का एक अभियान है.

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरूषी से लेकर सुनंदा,जिया लैैला, मीनाक्षी और शीना वोरा तक सब रहस्यमय!



 नोएडा दिल्ली का आरूषी-हेमराज हत्याकांड आज उस समय याद आ रहा है जब देश के हाइप्रोफाइल शीना वोरा मर्डर केस की रहस्यमय परते एक के बाद एक खुलती चली जा रही है.तीन साल बाद उजागर इस कांड में रहस्य-रोमांच दोनों है-इस कांड के प्राय: सभी आठ पात्र लगभग- लगभग सामने आ चुके हैं लेकिन अभी बहुत से प्रश्नों का उत्तर बाकी है जो शायद आने वाले दिनों में उजागर होंगे इस बीच यहां आरूषी-हेमराज हत्याकांड का भी जिक्र हो रहा है तो बालीवुड की कुछ खास अदाकाराओं और हाई प्रोफाइल पूर्व मंत्री के पत्नी की मौत के रहस्य का भी जिक्र होने लगा है. चुनाव के पूर्व भारत के विदेश राज्य मंत्री रह चुके शशि थरूर की पत्नी सुनंदा थरूर भी रहस्यमय परिस्थितियों मेें दिल्ली के एक होटल में मृत पाई गई थी. इस पूरे मामले में थरूर पर उंगली उठी चूंकि उनका सुनंदा के अलावा पाकिस्तान की एक महिला पत्रकार से संबंध बताया जाता है. पहले सुनन्दा की मृत्यु का कारण खुदखुशी बताया गया लेकिन बाद में स्पष्ट हुआ कि उनकी मौत अन्य कारणों से हुई। पति थरूर पर जब संदेह हुआ तो मामला सीबीआई तक पहुंचा और अब मामले की जांच सीबीआई कर रही है. बालीवुड की कम से कम तीन अदाकाराओं की मौत भी रहस्यमय ढंग से हुई जिसमें उबरती अदाकारा जिया खान,लैला और मीनाक्षी थापा का नाम शामिल है.जिया खान का संबन्ध फिल्म अदाकार आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली से था. सूरज पर शक जताया गया कि उसकी मौत के पीछे की वजह सूरज पंचोली है मामला अभी भी जांच के दायरे में है यही स्थिति वालीवुड की एक अन्य अभिनेत्री लैला की हुई लैला को पांच बहनों के साथ उसके सौतेले पिता ने प्रापर्टी के लिये जिंदा दफना दिया था. मीनाक्षी थापा का कत्ल फिरौती के लिये किया गया आरोपी उसका सर लेकर घूमते रहे और अंत में एक जगह फेककर चलते बने.ऐसे-ऐसे मर्डर मिस्ट्रियों से भरा पड़ा हैै हमारा क्राइम बाजार. इस बीच शीना वोरा के मर्डर का रहस्य तीन साल बाद उसकी मां के ड्रायवर की गिरफतारी के बाद उजागर हुआ तो चौकाने वाले रिश्तों ने सबको हैरान कर दिया कि क्या ऐसा भी होता है? जो तथ्य सामने आये हैंं वे ही उजागर करते हैं कि इस मर्डर के पीछे वजह सेक्स और प्रोपर्टी दोनों से है.शीना की मां इन्द्राणी मुखर्जी यद्यपि हाईप्रोफाइल महिला बताई जाती रही परन्तु उसका सारा बेकग्राउण्ड एक रहस्यमय और छिपी दास्तान थी-अब पता चला कि उसने पांच पति बनाये. वैश्यावृत्ति करते पकड़ी भी गई बाद के समय में पैसे वालों को फंसाती रही और एक के बाद एक पांच लोगों को अपने सौंदर्य जाल में फंसाकर उनसे संबन्ध तोड़ती रही प्रापर्टी के लिये कुछ भी करने को तैयार इस महिला ने अपनी बेटी को भी रास्ते से
हटा दिया इसके पीछे भी सेक्स और संपत्ति दोनों ही कारण बताया जा रहा है. रिश्तों की एक पूरी गड़बड़ श्रंखला ने मर्डर केस को देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री बना दी है. बहरहाल इस मामले का और पर्दाफाश होना बाकी है जबकि इस कड़ी  में अगर इससे पूर्व नोएडा में चर्चित आरूषी तलवार हत्याकांड की ओर मुड़ा जाये तो वह भी अनोखे रिश्तों की दास्तान है. आरूषी स्वयं टेस्ट ट्यूब बेबी थी जबकि तलवार दंपत्ति की यह इकलौती संतान थी जिसका मर्डर पूरे बंद मकान में सिर्फ मां-बाप की उपस्थिति में हुआ आरोप लगा नौकर हेमराज पर! जो भी बाद में मृत पाया गया. एक अनोखी मर्डर मिस्ट्री के अलावा ऑनर किलिंग का भी एक वीभत्स रूप इसमें देखने को मिला जिसमें पुलिस,सीबीआई सब अंत तक इस कांड के रहस्यों को खोलने में उलझी रही और अंत में परिस्थितिजन्य हालात में मां और पिता को ही इस कांड का दोषी मानकर उम्र कैद की सजा सुनाई गई.



गुरुवार, 27 अगस्त 2015

रिश्तों का मर्डर और आरक्षण से उठी अग्रि की ज्वाला-अब आगे क्या होगा?


मोदी शांति की अपील कर रहे हैं-
राहुल जम्मू-कश्मीर में दु:ख बाट रहे हैं
नीतीश पैकेज को लेकर आंकड़े पेश कर रहे हैं
तो केन्द्र सरकार बिहार चुनाव की रणनीति तैयार कर रही हैं
.... और देश का रोल माडल गुजरात आरक्षण के आग की लपटे उगल रहा  है- आरक्षण आंदोलन के लीडर हार्दिक पटेल ने ऐलान कर दिया है कि जो चीज मांगने से नहीं मिलेगी उसे हम छीन लेंंगे? इन राजनीतिक और रणनीतिक खबरों के बीच एक हाई प्रोफाइल आपराधिक खबर ने चौबीस घंटे के अंदर देश को चांैका दिया कि देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ी एक प्रसिद्व उद्योगपति महिला इन्द्राणी मुखर्जी ने अपनी बेटी और बेेटे को बहुत समय तक समाज के सामने अपनी बहन - भाई बताया और अब जब उसका ड्रायवर अवैध रूप से हथियार रखने के आरोप में गिरफतार हुआ तो यह रहस्योद्घाटन हुआ कि वह जिसे अपनी बहन बताकर उसके अमरीका में होने की बात करती रही वह उसकी बहन न होकर उसकी अपनी बेटी थी और सन् 2012 में ड्रायवर व पूर्व पति के साथ उसकी गला घोटकर हत्या कर दी थी. बहरहाल तीनों को मुम्बई पुलिस ने गिरफतार कर लिया है जिसमें उसका पूर्व पति भी शामिल  है.. आगे अभी बहुत सा खुलासा होना बाकी है.इधर गुजरात में आरक्षण की आग ने राजनीतिक माहौल को काफी गर्म कर दिया है. चूंकि यह नरेन्द्र मोदी  के गृह राज्य गुजरात और देश के रोल माडल से जुड़ा मामला है इसलिये भी यह गंभीर हो गया है.दूसरी प्रमुख बात यह कि इस प्रदेश से एक और केजरीवाल के उदय ने संपूर्ण राजनीति में ही उथल पुतल मचा दी है.आरक्षण पर हार्दिक पटेल को

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का समर्थन मिल गया है. हार्दिक पटेल यद्यपि आरक्षण के इस आंदोलन को सिर्फ और सिर्फ आरक्षण की मांग तक जोड़े रहने की बात कर रहे हैं लेकिन क्या वास्तविकता यही है? हार्दिक पटेल के पिता मूलत: भाजपा से जुड़े हैं और हार्दिक के बारे में कहा जाता है कि वे केजरीवाल के समर्थक है. हार्दिक ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश का समर्थन प्राप्त होते ही अपना पासा आंन्ध्र के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू की तरफ भी यह कहते हुए फेंका है कि वे भी पाटीदार हैं. हार्दिक पटेल आंदोलन का गुर नरेन्द्र मोदी से व इसे सफल बनाने की सीख अरविन्द केजरीवाल से मिलने की बात करते हैं. दूसरी ओर महाराष्ट्र का धनगर समाज भी हार्दिक पटेल से सीख लेकर आगे बढऩे की फिराक में है,जाट समाज पहले से ही सड़क पर है ऐसे में क्या आरक्षण की आग पूरे देश में यूं ही भड़केगी और इसका हश्र वही होगा जो गुजरात का है? हार्दिक पटेल इस आंदोलन के दौरान यह भी कह चुके हैं कि मांगने से हमें अधिकार नहीं मिलता तो हम छीनना भी जानते हैं। कई सवालों के बीच देश में आरक्षण का मसला फिर आग की लपटों के बीच है इसमें कई तरह की घी का मिश्रण मिलाया जा रहा है जो कभी भी तेजी से भभक सकता है.

जनता क्यों सहन करे आरक्षण की आंच को, यह तो कूट-नीतिज्ञों की लगाई आग है वे ही झुलसे!



आजादी के अड़सठ साल बाद भी अगर हम अपने आपको इस लायक नहीं बना सके कि आर्थिक,सामाजिक व भौतिक आधार पर अपने व अपने परिवार को खड़ा नहीं कर पाये तो यह किसकी गलती है? हमें अपने आप पर शर्म करनी चाहिये कि इतना अवसर,इतनी सुविधाएं और भरपूर आरक्षण मिलने के बाद भी हम एक के बाद एक समाज आरक्षण की मांग क रते जा रहे हैं.आज कौन बताएगा कि हम आर्थिक आजादी का स्वाद इतने साल बाद भी क्यों नहीं चख पा रहे हैं-यह सवाल उठाते हुए हम पटेल समुदाय के आरक्षण आंदोलन की खिलाफत नहीं कर रहे बल्कि यह बताना चाह रहे हैं कि आरक्षण को अब वोट बैंक की राजनीतिक हथियार के रूप में क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है? क्यों नहीं लोगों ने इतने सालों में अपने व  अपने परिवार को सारी सराकारी सुविधाएं प्राप्त होने के बाद भी अपने को सीधा खड़ा होने लायक तक नहीं बनाया. वर्तमान माहौल में किसी भी समाज के आरक्षण की मांग जायज हो गई है क्योंकि सराकर में बैठने वालों ने इसे ऐसा बना दिया.  एक तरह से आरक्षण लगता है लोगों के मूल अधिकार में शामिल हो गया है.इसे अब ऐसे मांगा जा रहा है जैसे यह हर आदमी का संवैधानिक अधिकार हो जबकि संवैधानिक व्यवस्था के तहत आरक्षण को बहुत पहले खत्म कर दिया जाना चाहिये था लेकिन विभिन्न सरकारों ने अपनी पार्टी का वोट बैंक बढ़़ाने के लिये आरक्षण का उपयोग किया और अब यह सरकार के लिये ही सरदर्द बनता जा रहा है. आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान जो हो रहा वह अलग.वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में आरक्षण आंदोलन पक्ष व विपक्ष में इतना बढ़ा कि सरक ार की नाक में दम ला दिया. अबका समय भी कहीं उस ओर तो नहीं बढ़ रहा? पटेल आरक्षण आंदोलन,जाट आरक्षण आंदोलन,मराठा आरक्षण आंदोलन, मुस्लिम आरक्षण आंदोलन यह सभी तो इस समय सक्रिय हैं कुछ तो एक दूसरे से लिंक होकर बड़े आंदोलन का  रूप धारण कर चुका है. पूर्व व्यवस्था को ताक में रखकर आरक्षण किये जा रहे हैं जबकि होना तो यह चाहिये कि सभी किस्म के आरक्षणों को बंद किया जाये और अगर देना ही है तो आरक्षण आर्थिक आधार पर निर्धारित अवधि के लिये सीमित किया जाये. जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं होगी गुजरात की तरह का आंदोलन विभिन्न राज्यों में चलेगा जो सरकारों के लिये एक समस्या बनकर खड़ी रहेगी. पटेल आरक्षण आंदोलन में सोलह लाख लोगों की भीड़ एक युवक द्वारा इकट्ठी कर लेना इस आंदोलन की गंभीरता को प्रदर्शित करता है. ऊपर से पुलिस की संवेदनहीनता,अविवेकशीलता और अदूरदर्शिता ने इस आंदोलन को ज्वाला का रूप देने की भूमिका अदा की है. एक जाति और धर्म के नाम पर तो आरक्षण होना ही नहीं चाहिये. वर्तमान व्यवस्था में बदलाव लाकर उसे या तो पूरी तरह खत्म कर देना चाहिये या फिर आर्थिक व सामाजिक आधार तक सीमित रखना चाहिये.

सोमवार, 24 अगस्त 2015

रेड मंडे-कुछ उलटा तो कुछ पुलटा पाक ने भौंका तो ट्रक ने ट्रेन को ठोका, छग में अदानी की दस्तक!



जो भौंकते हैं वो काटते नहीं-कुत्ते भौंकते हैं, हाथी अपनी चाल चलता है-पाकिस्तान पिछले अड़सठ साल से भांैक रहा है अब हमे परमाणु बम से उड़ा देने की धमकी दे रहा है-हम कहते हैं दम है तो तू अपना बम निकालकर ही दिखा दे, हम तेरा नामोनिशान मिटा देंगे.हम देश के हुकमरानों से बस यही कहना चाहते हैं कि वह पाकिस्तान के आगे किसी भी तरह झुके नहीं और अपनी बात पर अड़े रहें-पाक अपने नापाक इरादों से हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. बहरहाल यह अब देश की हुकूमत को तय करना है कि वह पाक की इस धमकी से कैसे निपटेगा. इधर बात नरेन्द्र मोदी सरकार के मंत्रीगणों के बयानों की है, जो कभी भी कोई उटपटांग बयान देकर नरेन्द्र मोदी की छवि को धूमिल करने की कोशिश करते हैं.मध्यप्रदेश से मोदी सरकार के मंत्री नरेन्द्र सिह तोमर ने सोमवार को अच्छे दिन आने की बात को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ऐसा कोई बयान दिया ही नहीं था. क्यों राजनीतिज्ञ इस तरह की झूठ बोलते हैं-क्या वे देश की जनता को इतना बेवकूफ या बहरा समझते हैं? जनता सबकुछ जानती है,सुनती है देखती है और जब मौका मिलता है तो बजाती भी है जैसा मनमोहन की सरकार के साथ किया था इसलिये कम से कम मंत्रियों को तो बहुत ही संभलकर अपना मुंह खोलना चाहिये.छोडिय़े यह राजनीतिज्ञों के काम की बात है वे जाने. इधर सोमवार को सेंसेक्स में सबसी बड़ी गिरावट ने निवेशकों को सात करोड़ की चपत लगाकर किनारे बिठा दिया. यह पहला अवसर था जब सेंसेक्स इतना गिरा इस बीच एक अच्छी खबर छत्तीसगढ़ के लोगों के लिये यह कि पच्चीस हजार करोड़ के निवेश का प्रस्ताव लेकर अदानी ग्रुप ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर लिया है.संभव है इससे इस अंचल के सैकड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक रहस्यमय रेपकांड से पर्दा उठने ही वाला है लगता है नन रेप कांड के नाम से कुख्यात इस मामले में पुलिस ने दो संदेहियों को पकड़ लिया है अब उनका डीएनए टेस्ट होने वाला है. देखो आगे क्या होता है! अगस्त में सोमवार का दिन ब्लड सण्डे के रूप में भी जाना जायेगा-बंगलोर लेबल क्रासिंग पर एक ट्रक ने ट्रेन को ठोक दिया.ट्रेन की पूरी कोच के परखचे उड़ गये-ट्रक ड्रायवर सहित चार पांच लोगों की मौत हो गई अपने ढंग की इस दुर्घटना ने सबको हिलाकर रख दिया.गुजरात में इक्कीस साल के हार्दिक पटेल की पटेलों की आरक्षण देने की मांग को लेकर रैली पर भी सबकी निगाह है, उसने वहां की सरकार को तो हिला ही दिया, देश में भी अपना पताका शीघ्र फहरा दे तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये!

चम्मच और मत घुमाना, अभी तो काकरोच निकला है तेज घुमाओगे तो मेंढ़क भी निकल सकता है!




राष्ट्रगान जनगणमन किसने लिखा था-?
यह सवाल किसी बच्चे से पूछा जाता तो शायद उसका जवाब सही में यही होता रविंद्रनाथ टैगोर!-
लेकिन यह सवाल पूछा गया उत्तरप्रदेश के एक बुजुर्ग प्रधान अध्यापक से-
तो सुनिये उनके द्वारा अत्यंत गंभीरता से दिया गया जवाब...वे कहते हैं...वो जो है न हमारे कानपुर के पार्षद...वो उनका नाम क्या है.... उन्होंने लिखा है.
यही सवाल फिर एक प्रधान अध्यापिका से पूछा गया तो वे भी बगले झांकने लगी.
देश में शिक्षा की बुनियाद रखने वालों के ज्ञान को समझने की कोशिश करते हुए एक रिपोर्टर को जब इन 'महानशिक्षाविदोंÓ के गुणों का एहसास हुआ तो लगा कि कुछ और लोगों से भी जानकारी एकत्रित की जाये कि उनका ज्ञान कैसा है? आश्चर्य के साथ विश्वास भी हुआ कि यह 'महानज्ञानीÓ अपने छात्रों को कैसी महान शिक्षा दे रहे हैं?
एक से पूछा गया कि क्या महोदया आप भारत के राष्ट्रपति का नाम बता सकती हैं?
तो इस ज्ञानी मेडम का जवाब पूरे आत्मविश्वास के साथ था- वे तपाक से कहती हैं- जी... राम नायक- जवाब देते समय उनके चेहरे पर न मुस्कराहट थी और न हंसी-ज्ञान का आत्मविश्वास चेहरे पर खासतौर पर झलक रहा था- जैसे उन्होंने सही जवाब देने का वल्र्ड रिकार्ड कायम कर लिया हो.
स्कूलों में हर साल बालदिवस मनाया जाता है किन्तु हमारे शिक्षक कितना ज्ञान

रखते हैं यह उस शिक्षक से पूछे गये सवाल के जवाब से प्रतीत होता है जिसमें उन्होंने इसका जवाब प्राप्त करने के लिये ऊपर आसमान की ओर देखा फिर कहा मुझे नहीं मालूम...इसका जवाब तो चौदह नवम्बर है, हर साल जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस पर बालदिवस मनाया जाता है.
एक और ज्ञानी शिक्षक से पूछा गया कि प्रदेश की राजधानी..जवाब था दिल्ली! तो देश की राजधानी...नहीं मालूम!
मेडम क्या आप एट की स्पेलिंग बता सकती है?
बच्चों की तरफ रूख करते हुए.. बच्चों- बोलो एट की स्पेलिंग-
बच्चों ने वही बताया जो शिक्षिका उन्हें पढ़ा रही थी अर्थात.. ई आई जी टी  उनके अनुसार मतलब ऐट अर्थात आठ, मैडम ने तो एट का स्पेलिंग भी गलत बताया ऐट का स्पेलिंग ईआईजीएचटी जबकि उनका कहना ईआईजीटी था.
पीएम कौन है?  नहीं मालूम
सीएम कौन है-नाम याद नहीं!
सीएम डीएम में कौन बढ़ा ?
सीएम डीएम से छोटा होता है!
उपराष्ट्रपति-प्रधानमंत्री कौन है?
नहीं मालूम..
यूपी के राज्यपाल का नाम?
नहीं मालूम
अच्छा 19 का पहाड़ा बताओ- 19 इंन्टू 6 बराबर...नहीं मालूम
यह देश में अकेले उस राज्य के शिक्षाविदों के ज्ञान का खजाना है जहां के सरकारी स्कूलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही माननीय जनप्रतिनिधियों, ब्यूरोक्रेट्स के बच्चों को भी भर्ती क राने का आदेश दिया गया है- जी हां.. यूपी जिससे कम से कम उन बच्चों के पालक इन स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधार कर सके.
एक छोटा चुटकला इस पूरे एपीसोड पर कहा जा सकता है-
दो दोस्त एक होटल में नाश्ता कर रहे थे तभी एक ने चम्मच लेकर हिलाया तो उसमें से एक काकरोच निकला- दोस्त बड़े गुस्से में बोला, क्या होटल में ले आया यार, यहां तो खाने में काकरोच निकल रहा है तो दूसरे ने कहा अब ज्यादा
जोर से मत घुमा आगे मेंढ़क भी निकल सकता है.
आज हमारे देश की बुनियादी शिक्षा का हाल भी कुछ इसी तरह का तो नहीं?

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

हम तो यहां हैं, तुम उसकी डिक्की में क्या झांक रहे? कलयुगी तंत्र छत्तीसगढ़ पहुंचा!




 ''रामचन्द्र कह गये सिया से, ऐसा कलयुग आयेगा, हंस चुगेगा दाना तिनका कौवा मोती खायेगा...ÓÓ दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म गोपी के इस गाने ने किसी समय खूब धूम मचाई थी. कवि की यह कल्पना सच होती दिखाई दे रही है. नेता भले ही अच्छे दिन की बात कर हमारा मुंह बंद करे लेकिन जिस वास्तविकता का दृश्य हमारे सामने है, वह सच्चाई को नकार नहीं सकता. एक पिचहत्तर वर्षीय मां के साथ उसका अपना बेटा अपनी पत्नी के सामने बलात्कार करता है तो दूसरा बेटा पिचहत्तर वर्ष के उम्र की एक बूढी मां को सहारा देने की जगह उसे सरेआम ठगकर उसके खाते से समूचा ढाई लाख रुपये निकाल लेता है, इतना ही नहीं कोई बाप अपनी नन्ही बिटिया को हवस का शिकार बना रहा है तो कोई भाई अपने ही खून और राखी के बंधन की भी परवाह नहीं कर रहा. कानून के पहरेदार भी यह सब देख सिर्फ खानापूर्ति में लगे हैं. हम यूपी, बिहार, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल की बात नहीं करते वहां तो कलयुगी पुत्रों ने संपूर्ण कानून व्यवस्था को ही चुनौती दे डाली है, जहां किसी इंसान का भाग्य इन दुस्साहसियों ने अपने हाथ में ले रखा है जिसको प्रश्रय भी सत्ता व विपक्ष में शामिल कतिपय लोगों के हाथ में कठपुतली की तरह नाच रहा है. इधर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पिछले कुछ समय से जहां अपराधियों के हाथ में नाच रहा है उसने इस शांत शहर को न केवल अशंात कर दिया है बल्कि दहशत भी पैदा कर दी है. कानून और व्यवस्था को सम्हालने वालों की असफलता का ग्रॉफ इससे पहले कभी शायद इतना गिरा होगा कि उनकी नाक के नीचे चौबीस घंटे के दौरान कोई भी लुट रहा है या
उसकी इज्जत तार-तार हो रहा है. ठगी के ऐसे किस्से सामने आ रहे हैं जो यह बताता है कि चोरी और ठगी करने वालों में भी वह रहम खत्म हो गई जो पहले के चोरों में मौजूद थी, तभी तो एक पिचहत्तर वर्ष की मां की संपूर्ण कमाई एक झटके में ले उड़ा. एक अन्य बुजुर्ग आदमी का पिचहत्तर हजार डिकी से पार कर लिया गया. उस वृद्ध मां के ठग के मन में थोड़ी भी मानवीयता बाकी है तो उसे इस मां के पैसे वापस कर देना चाहिये. बहरहाल कलयुग आया है तो उसे झेलना भी पड़ेगा- वो कहते हैं न पाप-पुण्य का सारा हिसाब इसी जन्म में पूरा करना होता है- यही हो रहा है. पापी, दुष्ट सब हावी हैं और आम-खास सब बेबस- असहाय!. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को बनाने की मांग करने  वाले अब पछता रहे हैं कि हमने कहां से बला मोल ले ली. यहां लगातार दूसरे दिन बीच बाजार रुपये से भरा थैला पार कर दिये जाने से हर जगह खलबली है. एक दिन पहले फाफाडीह और भाठागांव में एक घंटे के भीतर क्रमश: तीन लाख और 40 हजार रुपये दुपहिया की डिक्की से पार किये गये थे जबकि गुरुवार को बूढ़ापारा स्थित पुरोहित बाड़ा के पास एक इलेक्ट्रानिक शॉप का मैनेजर का ढाई लाख रुपये पार हो गया. अपराधियों को पकडऩे की पुलिस तत्परता देख हंसी आती है- सड़क पर ब्रेकर लगाकर जांच होती है, अपराधी अगर उनके सामने से निकलता भी होगा तब वह भी पुलिस की मूर्खता पर जरूर हंसता होगा. यह कहते हुए कि हम तो इधर हैं, तुम वहां गाड़ी की डिक्की में क्या झांक रहे हो!

बुधवार, 19 अगस्त 2015

पैसे के खेल ने सामाजिक व्यवस्था की चूले हिलाना शुरू कर दिया!




ृजिनके पास पैसा है उन्हें जेल नहीं हो सकती-आज के हालात में आम लोग कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं- लेकिन यह हम नहीं उपहार अग्रिकांड में अन्य उनसठ लोगों के साथ अपने दो बेटों को गवा चुकी मां की आवाज है जो अठारह साल बाद इस अग्रिकांड पर अंसल बंधुओं को दिये फैसले के बाद सामने आई है. अंसल बंधुओं को सुप्रीम कोर्ट ने पांच माह कैद की सजा के बाद तीस-तीस करोड़ रुपये जुर्माना चुकाने का आदेश देकर यह कहते हुए छोड़ दिया कि पांच माह की सजा पर्याप्त है. बहरहाल एक तरफ इस फै सले के बाद उक्त मां की आवाज गूंजी है, दूसरी तरफ देश में पैसे का खेल किस तरह समाज और व्यवस्था पर हावी है यह हर कोई जानता है. पिछले दिनों आस्था के न्द्रों में बरसने वाले पैसे पर टिप्पणी कर बता चुके हैं कि देश की संपत्ति किस तरह कुछ लोगों के हाथ में केन्द्रित होकर रह गई है. दूसरी ओर आजादी के बाद पैदा हुए चंद लोगों ने अपनी संपत्ति का किस ढंग से विस्तार किया है यह मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाला, छत्तीसगढ़ में नान घोटाला जैसे मामलों से साफ है. मध्यप्रदेश में एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से रिटायर्ड डायरेक्टर डीएन शर्मा के निवास पर एसीबी  छापा भी कम चौंकाने वाला नहीं है, इस व्यक्ति ने तीस साल नौकरी की  जिसकी एवज में उसके पास तीस लाख रुपये होने चाहिये था लेकिन उसके पास जो संपत्ति का आंकलन हुआ वह करोड़ों रुपये का है, इसमें तीन बंगला, तीन लग्जरी गाडिय़ां ऐसा कुल मिलाकर पांच करोड़़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति  है. जनता के माल को अपनी पैतृक संपत्ति समझकर पान की तरह चबाने वाला यह पहला अफसर नहीं है ऐसे सैकड़ों अब तक प्रकाश में आ चुके हैं लेकिन सरकार की तरफ से क्या एहतियाती कदम अपने इन भ्रष्ट कर्मचारियों और अन्य भ्रष्ट तंत्र के प्रति उठाया जा रहा है यह कहीं स्पष्ट नहीं हो पा रहा. एक तरह से जानबूझकर छूट दी जा रही है, दूसरी तरफ आम लोगों पर जबर्दस्त टैक्स लगाकर उन्हें नंगा किया जा रहा है वहीं सरकार के अपने कर्मचारियों और कतिपय ऐसे लोगों जिन्होंने आम जनता का पैसा लूटा है वे भी सफेदपोश की तरह से समाज में मौजूद हैं जिनपर किसी प्रकार का फंदा नहीं कसा जा रहा. अपराधियों को भी खुली छूट है. राजधानी रायपुर में कई ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें आरोपी कई लोगों को ठगकर करोड़पति बन बैठे. दुर्ग में तो हद ही कर दी जहां पांच सौ लोगों से पच्चीस करोड़ रुपये की ठगी हुई है. आम आदमी जो पसीना बहाकर पैसा कमाता है उससे उसका पेट नहीं भरता लेकिन वे जो गलत तरीके से पैसा कमाते हैं उनका लगभग हर जगह बोलबाला है. क्यों है यह विभिन्नता?

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

अब आयेगा मजा! साहब और माननीयों के बच्चों को भी सरकारी स्कूलों का थोड़ा आनंद लेना होगा....!




आजकल के बच्चे क्या जाने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का मजा! लेकिन जो बच्चे इन स्कूलों में पढ़ते हैं उन बच्चों से पूछो- सरकारी स्कूलों में पढऩे में कैसा मजा आता है? वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि निजी स्कूलों की बनिस्बत इन स्कूलों में पढऩे का अपना अलग ही मजा है. खूब स्वतंत्रता है-जब मर्जी आए तब स्कूल जाओ और जब मर्जी आए तब स्कूल से भाग जाओ, बारिश हो तो छुट्टी, मास्टर जी नहीं आये तो छुट्टी! जब चाहे तब किसी पेड़ के नीचे बैठकर गप्प मारो, दोस्तों के साथ कभी भी फिल्म देखने चले जाओ. कभी-कभी तो एक ही मास्टर पूरे स्कूल को पढ़ा देता है. ऐसे हालात में सरकारी स्कूल बच्चों के लिये बहुत ही मजेदार हैं लेकिन पालकों को यह पसंद नहीं, वे तो प्रायवेट स्कलों की तरफ दौड़ते हैं- अब लेकिन उनकी नहीं चलने वाली. हाईकोर्ट ने भी मान लिया है कि सरकारी कर्मचारियों, नेताओं, जनप्रतिनिधियों, जजों आदि को भी अपने बच्चों की बुनियादी शिक्षा सरकारी स्कूलों में ही देनी होगी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसा आदेश सुनाया है जो स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. कोर्ट ने कहा है कि सभी एमपी-एमएलए और सरकारी कर्मचारियों व जजों के बच्चों को सरकारी स्कूल में ही पढ़ाया जाए. कोर्ट का मानना है कि ऐसा करने से ही सरकारी प्राइमरी स्कूलों की हालत में सुधार आयेगा. कोर्ट का मानना है कि एमपी, एमएलए, सरकारी अधिकारी-कर्मचारी और सरकार से सहायता प्राप्त करने वाले लोगों के बच्चों को प्राइमरी शिक्षा सरकारी स्कूलों में दिलाई जाए. जबतक ऐसे लोगों के बच्चे सरकारी प्राइमरी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तबतक सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी. कोर्ट का मानना बिल्कुल सही है, चूंकि जब तक सरकारी स्कूलों में बड़े लोगों के बच्चे नहीं पढ़ेंगें तब तक किसी को कैसे पता चलेगा कि स्कूल किन हालतों में चल रहे हैं. कहीं छत चू रहा है तो कहीं मास्टर और मास्टरनियां नहीं हंै तो कहीं टायलेट नहीं है और कहीं प्रयोगशालाएं और लायबे्ररी नहीं है. सरकारी स्कूलों में पीटी टीचर आौर प्ले ग्राउण्ड भी नहीं है. शिक्षा का स्तर भी गिरा हुआ है. स्कूलों में पंखे नहीं है, पीने का पानी नहीं, यहां तक कि ब्लेक बोर्ड और चाक-डस्टर भी नहीं. हाई कोर्ट ने इन सारी परिस्थतियों पर संज्ञान लिया है तथा कहा है कि सरकार इस बारे में 6 महीने में कानून बनाए. इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश फिलहाल यूपी के लिये है लेकिन यह नियम आगे आने वाले वर्षों में पूरे देश में लागू हो जाये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये. कोर्ट का फैसला है कि यूपी सरकार अगले साल शुरू होने वाले नये सेशन से ये आदेश लागू करे और जो लोग इस आदेश का पालन नहीं करते उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो. इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से यूपी के सरकारी स्कूलों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता क्योंकि जब राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के बच्चे खस्ताहाल सरकारी स्कूलों में जाने के लिए विवश होंगे तब वाकई सरकारी स्कूलों की सूरत और सीरत बदल सकती है. हाईकोर्ट के मुताबिक, यदि सरकारी कर्मचारियों ने अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाया तो उन्हें फीस के बराबर की रकम हर महीने सरकारी खजाने में जमा करानी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे लोगों का इंक्रीमेंट और प्रमोशन कुछ वक्त के लिए रोकने की व्यवस्था की जाए। देश के प्राय: सभी राज्यों के जूनियर और सीनियर स्कूलों में पढ़ाई की बुरी हालत है. हाई कोर्ट मानता है कि जब तक जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, टॉप लेबल पर बैठे अधिकारियों और जजों के बच्चे सरकारी स्कूलों में अनिवार्य रूप से नहीं पढ़ेंगे, तब तक इन स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी। एक आंकलन के अनुसार अकेले यूपी में एक लाख 40 हजार जूनियर और सीनियर बेसिक स्कूलों में टीचर्स के दो लाख 70 हजार खाली पदों सहित स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं है।

रविवार, 16 अगस्त 2015

पाक है कि मानता नहीं, हम कब तक झेलते रहेंगे उसके जुल्मों को?




यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही कि पाक आखिर चाहता क्या है? उधर पाक प्रधानमंत्री हमारे प्रधानमंत्री से बात करते हैं या विदेश यात्रा पर निकलते हैं तो इधर सीमा पर  गोलियां चलने लगती है. ऐसा लगता है कि पाक शांत बैठना जानता ही नहीं- या तो पाक हुक्मरानों का उसके फौज पर कोई नियंत्रण नहीं है या वह हमें ललकारना चाहता है, या छेड़कर युद्ध जैसे हालात पैदा करना चाहता है. एक बात यह भी स्पष्ट हो रही है कि पाक में उग्रवादी संगठनों ने सत्ता को अपने हाथ में ले रखा है, वह वहां की सत्ता को हमसे दोस्ती करने की इजाजत नहीं देता- पाक में आतंकवादियों के जमघट का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि सीमा पर फायरिंग के दौरान ही आतंकवादियों ने लाहौर में गृहमंत्री के घर हमला बोलकर उनकी हत्या कर दी जबकि इस हमले में करीब बारह लोगों की मौत हो गई. इधर पुंछ जिले मेेंं नियंत्रण रेखा पर आठ दिनों से ज्यादा समय सेे जारी गोलीबारी तो यही दर्शा रही है कि पाक के हुक्मरान बातचीत का झांसा देकर सीमा पर युद्ध के हालात पैदा करने में लगे हैं. सीमा पर गोलीबारी में इस बार पाक सेना ने सिविलियन को अपना निशाना बनाया है. एक महिला और एक बच्चा सहित छह लोगों की गोलीबारी में मौत से यह साबित हो गया है कि पाक दहशत का वातावरण पैदा करने में लगा है. अब यह बात भी समझ में नहीं आती कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि पाक प्रधानमंत्री जब भी भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो सीमा पर गोली चलने लगती है, कभी नमस्ते करने पर तो कभी स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देने पर तो कभी द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने पर- यह सब क्या पाक का कोड वर्ड है कि हम ऐसा करें तो तुम ऐसा करो- वाह रे पड़ोसी, अच्छा धर्म निभा रहे हो तुम. अब सोचने का वक्त नहीं है, पाक को उसकी हर हरकत पर मुंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी तरफ से पूरा प्रयास अब तक कर लिया है, अब पाक को और मौका देने की जरूरत नहीं. पुंछ, बालकोट, हमीरपुर, शौजिया, मंडी को कब तक यूं ही संवेदनशील क्षेत्र बनाये रखेंगे? नियंत्रण रेखा पर मौजूद इन गांवों के लोग पिछले छह दिनों से जारी फायरिंग से दहशत में हैं. कभी किसी को गोली लग जाती है तो किसी की मौत हो जाती है. पन्द्रह दिनों में अड़तीस बार पाक की तरफ से फायरिंग हो चुकी है. रक्षा मंत्री ने कहा है कि हम दबने वाले नहीं- ठीक है हम दबने वाले नहीं, लेकिन कब तक हम इस पड़ोसी को अपनी मर्जी पर चलने का मौका देते रहेंगे?

मोदी का भाषण अच्छा लेकिन ग्रॉफ गिरा, कई लोगों की उम्मीदों पर भी पानी फिरा!




नरेन्द्र मोदी भाषण अच्छा देते हैं, उनकी इसी कला ने आज उन्हें लोकप्रिय बना दिया, लेकिन क्या इस बार उनके भाषण के ग्रॉफ में गिरावट आई है? सिर्फ भाषण से कब तक लोगों की आशााएं पूरी होंगी? स्वतंत्रता दिवस पर 86 मिनट  दस सेकण्ड का भाषण लोगों को अच्छा जरूर लगा लेकिन क्या यह जनता की उम्मीदों को पूरा कर सकेगा? जो वादे उन्होंने चुनाव के दौरान किये, उसमें से कितने पूरे हुए? विश्लेषक इसे विभिन्न ढंग से लेते हैं. प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से अपने भाषण में वह सब कुछ नहीं कहा जो वास्तव में घट रहा है. उन्होंने अपने भाषण में पूर्व सैनिकों के वन रैंक-वन पेंशन पर दिलासा ही दी. टेररिज्म और पाकिस्तान की ओर से लगातार हो रहे सीजफायर वॉयलेशन समेत इंटरनेशनल रिलेशन्स पर भी बात नहीं की। गुरदासपुर और घाटी में आतंकवादी हमलों में जवान-अफसर शहीद हो रहे हैं ऐसे में पीएम को लाल किले से देश के दुश्मनों को एक मैसेज देना चाहिए था लेकिन यह भी नहीं हुआ. पीएम ने लोगों की दिक्कतों को ज्यादा तरजीह दी. एक साल में सरकार के किए काम गिनाए. स्टार्टअप इंडिया और स्टैंडअप इंडिया जैसे कुछ नए नारे दिए. मोदी ने टीम इंडिया की बार-बार बात की, लेकिन विश्लेषकों का दावा है कि उनके मंत्रिमंडल में कतिपय सदस्यों पर जो आरोप लगे हैं उसपर जिस ढंग से पर्दा डाला गया वह किसी को रास नहीं आया. इसमें संदेह नहीं कि अब तक किसी भी पीएम ने लाल किले से इतनी लंबी स्पीच नहीं दी थी. अपने भाषण के दौरान शुरुआती कुछ मिनटों को छोड़कर वे कहीं कमजोर नजर नहीं आये, उनकी बॉडी लैंग्वेज में तो दम था, लेकिन बातों में जोर कुछ कम होता दिखा. मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ा- राहुल गांधी पर लगभग सीधे कटाक्ष करते हुए कहा कि कुछ लोगों को नींद नहीं आती, राहुल ने इसपर कहा कि इसका जवाब आज वे यहां इस मौके पर नहीं देंगें लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर कोई राजनीतिक मसला उठाना था?- पीएम के बयान से रिटायर्ड फौजी भी भड़क गये. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि हम भीख नहीं, अपना हक मांग रहे हैं- पाकिस्तान की हरकतों के बारे में चुप्पी, कालाधन मसले पर चुप्पी, बेरोजगारी, मंहगाई आदि मुद्दों से हाथ खींच लेने से उनके राजनीतिक ग्रॉफ में कमी दर्ज हुई है. पीएम ने ऐलान कम किए और पिछले साल के वादों पर सफाई देते नजर आए। 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

बच्चों की पीठ से कापी, किताब, टिफिन का बोझ तो कम होगा लेकिन शिक्षा का स्तर कब सुधरेगा?




बहुत से लोगों को याद होगा कि एक समय ऐसा था जब बच्चों की बुनियाद फैले हुए चावल के ढेर या आटे के ऊपर रखी जाती थी- उन्हें वर्णमाला का पहला अक्षर अ या ए उसी पर लिखना सिखाया जाता था. धीर-धीरे स्लेट का प्रचलन हुआ और अब बच्चों की पीठ पूरी पढ़ाई का साधन बन गई! किंडर गार्डन और प्रायमरी स्कूल के बच्चों को इतनी पुस्तकें, कापियां, कम्पास बॉक्स, टिफिन और पानी की बोतल लादनी पड़ती है कि उनकी पढ़ार्ई तो छोडिय़े कमर तक टूट जाती है. एक दस किलो का बच्चा दस किलो से ज्यादा का वजन अपनी पीठ पर लादता है, अब शायद उसे ऐसा नहीं करना पड़ेगा. कम से कम छत्तीसगढ़ सरकार ने तो इस पर गंभीरता से सोचा है और सभी जिला शिक्षा अधिकारियों के नाम से परिपत्र जारी कर बच्चों की पीठ से बस्ते का बोझ हटाने का आदेश दिया है. अब देखना यह है कि इस आदेश का पालन कितना होता है. आदेश में कहा गया है कि विद्यालय के प्राचार्य एवं शिक्षक समय सारिणी में प्रति दिवस पढ़ाये जाने वाले विषयों का चयन ऐसा करें कि अत्यधिक मात्रा में पुस्तकें व कापियां लाने की बाध्यता न हो. सरकार यह मानने लगी है कि बस्ते का मूल वजन न्यूनतम नहीं होने से बच्चे के विकास पर प्रतिकूल असर डालता है. अशासकीय शालाएं बच्चों पर बस्ते का बोझ ज्यादा लादती रही है. सरकार ने इसे देखते हुए अब इन शालाओं के बच्चों के लिये रोज मुख्य पुस्तक के साथ अन्य संदर्भित पुस्तकें, कार्यपुुस्तिका, रजिस्टर इत्यादि साथ लाने की बाध्यता खत्म कर दी है. हालांकि सरकार का दावा है कि उसने अशासकीय शालाओं के प्रबंधकों से इस संबन्ध में बात कर ली है लेकिन यह शालाएं बच्चों के पीठ से बोझ हटा पायेंगी इसमें संदेह है. सरकारी स्कूलों की बनिस्बत निजी स्कूल ही बच्चों की पीठ को ज्यादा गर्म करती हैं वे यह शायद इसलिये भी करती हैं चूंकि वे इसके माध्यम से पालकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे बच्चों को कैसा पढ़ाते हैं. किंडर गार्डन से लेकर प्रायमरी तक बच्चों के पुस्तकों का ढेर देखने से तो ऐसा लगता है कि वे उसे बुनियाद में ही यूपीएससी की परीक्षा में बिठा देंगे. क्या ऐसी शिक्षा का कोई फायदा है? शिक्षा पर बार-बार प्रयोग करने वालों ने क्या कभी शिक्षा के स्तर पर गंभीरता से विचार किया है. प्रायवेट शिक्षा तो जैसे-तैसे चल रही है मगर सरकारी शिक्षा में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों का तो यह हाल ही कि वह न ठीक से अंग्रेजी जानते हैं और न हिन्दी, या कोई अन्य भाषा! जब तक शिक्षकों के स्तर को सुधारा नहीं जायेगा शिक्षा के स्तर में सुधार की अपेक्षा करना बेमानी होगी.

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

अच्छे पकवान से भरी थाली हर आदमी के सामने है लेकिन बेबसी कि उसे खा नहीं पाता!



अच्छे पकवान से भरी थाली हर
आदमी के सामने है लेकिन
बेबसी कि उसे खा नहीं पाता
एक व्यक्ति ने दस सालों में सौ करोड़ रुपये की संपत्ति बना डाली, नब्बे कंटेनरों से भरी एक ट्रेन करीब अठारह दिनों से लापता है. नान घोटाला, व्यापम घोटाला में अरबों रुपये का घोटाला हुआ, ललित मोदी घोटाला, कोलगेट घोटाला, राधे मां की संपत्ति अरबों में, आशाराम बापू, राम रहीम और ऐसे ही कई बाबाओं की प्रापर्टी अरबों में, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे और अन्य आस्था केन्द्रों की आय व प्रापर्टी खरबों मेंं, रिश्वतखोरी से कमाने वालों की बेहिसाब संपत्ति का अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन समय-समय पर जो छापे पड़ते हैं उससेे यह जरूर संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में भी पैसों की कोई कमी नहीं. फिर क्यों गरीब है हमारा देश? हाल ही एक अखबार ने जो सर्वेक्षण कुछ आस्था केन्द्रों का किया उसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं, जिसमें कहा गया है कि देश के सिर्फ चार आस्था केन्द्रों, जिसमें केरल का प्रसिद्ध आस्था के न्द्र शामिल नहीं है उसकी एक दिन की औसत आय प्रतिदिन आठ करोड़ रुपये है. अकेले एक आस्था केन्द्र की कुल संपत्ति 1.30 लाख करोड़ है. जबकि देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी की कुल दौलत 1.29 करोड़ रुपये ही है. हम विदेश में काला धन की खोज करते-करते बूढ़े हो जाएंगे जबकि धन तो देश में ही छिपा है. आज देश के लोगों की स्थिति ठीक वैसी है जिसके सामने अच्छे-अच्छे पकवानों से भरी थाली रखी है लेकिन वह खा नहीं सकता, मसलन आस्था केन्द्रों में 22 हजार टन सोना जो करीब 20 लाख टन होता है, भरा पड़ा है. इसमें केरल के पद्मनाभ मंदिर का सोना शामिल नहीं है. जमा सोना अमरीकी गोल्ड रिजर्व- 8133.5 टन से ढाई गुना और भारतीय गोल्ड रिजर्व का 557.7 टन का चार हजार गुना है. जमा स्वर्ण भंडार की कीमत पचास लाख करोड़ रुपये है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने को पूरा करने के लिये क्या यह पर्याप्त नहीं है? देश में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से नजर आ रहा धन और काला धन जो विभिन्न स्त्रोतों से लोगों ने एकत्रित किया है वह बाहर आ जाये तो देश में कोई गरीब न रहे और देश में लोगों का जीवन स्तर किसी भी विकसित राष्ट्र के मुकाबले शिखर पर पहुंच सकता है. देश का प्रत्येक व्यक्ति पांच सौ साल तक फ्री पेट्रोल भरवा सकता है, एक वर्ष तक फ्री ट्रेन में सफर कर सकता हैं, दो साल तक मुफत में खाना खा सकता है. हम विकास के ऐसे मोड़ पर पहुंच सकते हैं जो दुनिया में कहीं नहीं? फिर यह पहल क्यों नहीं हो रही कि इस पूरी संपत्ति का जो कुछ लोगों तक सीमित है उसे निकालकर देश के खजाने में डाला जाये और हम अपनी उन आवश्यकताओं का पहले निपटारा करें जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है. आखिर इन सभी आस्था केन्द्रों व लोगों द्वारा छिपकर कमाई गई सारी संपत्ति हमारे जेब से निकला हुआ पैसा ही तो है. देश की जनता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आज एक वर्ष बाद भी बहुत उम्मीद है कि वह काले धन को विदेश से वापस लाने के अलावा देश में मौजूद धन को भी सरकारी खजाने में एकत्रित कर देश को एक नये युग में प्रवेश करायेंगे.


सोमवार, 10 अगस्त 2015

पोर्न साइट बनाम देखने की आजादी....इच्छा मृत्यु बना मांग मनवाने का हथियार!



इच्छा मृत्य-पोर्न साइट-सियासत व न्याय के दरबार में इस समय विशेष चर्चा का विषय बने हुए हैं. एक तरफ जेल में बंद व्यापम के आरोपी इच्छा मृत्यु की मांग कर रहे हैं तो पच्चीस हजार किसानों ने भी राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की है. यह किसान सत्रह सालों से मुआवजे के लिये परेशान हंै- इनके समक्ष अब रोजी रोटी का जरिया भी खत्म हो चुका है तथा भूखे मरने की नौबत आ गई है. आम चर्चा में अगर देखें तो कोई भी इस खबर को पड़कर यह कह सकता है कि आपको मरना है तो क्यों नहीं मर जाते. मरने वाले को राष्ट्रपति से पूछने की क्या जरूरत? हर मरने वाले को राष्ट्रपति थोड़े ही इजाजत देता है, यह तो सीधे-सीधे दबाव की बात है कि हमारे लिये सरकार कुछ करें! अगर राष्ट्रपति इजाजत भी दे तो कोई इच्छा मृत्यु मांगने वाला मरता नहीं बहरहाल किसानों के प्रति हमदर्दी के साथ हम यही कहना चाहते हैं कि सरकार को इन किसानों की समस्या का निदान पूर्र्ण प्राथमिकता से कराना चाहिए.इच्छा मृत्यु की मांग प्राय: अत्यन्त गंभीर बीमारी से पीडि़त लोग करते आयें हैं लेकिन अब हर कोई न कोई समस्या लेकर इसकी मांग करने लगा है जिससे इच्छा मृत्यु की मांग ही मजाक बन गया है. दूसरा मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 19 (1)का है जो भारत में रहने वालों को अभिव्यक्ति और देखने सुनने की  आजादी प्रदान करता है-अनुच्छेद 19 (1)का मुद्दा इसलिये उठा चूंकि सरकार के अनुसार पोर्न साइटों के कारण अपराध बढ़ रहे हैं और यह समाज में अनेक बुराइयों को जन्म दे रहे हैं. अघोषित रूप से कुछ पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगा तो अनेक तरफ से आवाज उठने लगी तब सरकार को बाध्य होकर कहना पड़ा कि वह सिर्फ  चाइल्ड पोर्न वल्गारिटी के खिलाफ हैं अन्य पोर्न साइट पर प्रतिबंध लगाने की कोई मंशा नहीं है. सरकार ने जब प्रतिबंध की कार्रवाही की तो अनेक जरूरी वेबसाइट भी इसकी चपेट में आ गये. इससे इंटरनेट प्रोवाइडरों के सामने समस्या पैदा हो गई. सवाल यहां यह उठता है कि क्या पोर्न साइट पर प्रतिबंध लगा
देने से देश में दुष्कर्म और अन्य यौन बुराइयों पर लगाम लग जायेगी?अगर ऐसा है तो इसपर तत्काल प्रतिबंध लगा देना चाहिये लेकिन लोगों के बेडरूम में घुसकर तो कोई देख नहीं सकता कि वहां क्या हो रहा है.व्यक्तिगत या पर्सनल आजादी पर लगाम लगाने की बात तो सरकार सोच भी नहीं सकती? यह सही है कि पोर्न साइट बच्चों के लिये पूरी तरह से हानिकारक है इसका उपाय यह नहीं है कि पूरे वेबसाइट पर ही पाबन्धी लगा दी जाये. प्राय: हर वेबसाइट का अपना ताला अर्थात पासवर्ड होता है इस पर कड़ाई से पालन किया जाये तो बहुत हद तक पोर्नसाइट बच्चों तक पहुंचने से रोका जा सकेगा.विश्वस्तर पर व्याप्त बुराई पर भारत में रोक की पहल एक अच्छी शुरूआत है लेकिन कहां तक इसमें कामयाबी मिलेगी यह संदिग्ध है!

बच्चों की बुनियाद पढ़ाई के साथ सैनिक शिक्षा पर रखी जाये आने वाले समय के लिये जरूरी!




हमने जब से होश संभाला तब से लेकर अबतक कम से कम चार युद्ध तो देखे हैं जो कभी पाकिस्तान से हुआ तो कभी चीन से, सन् 62 में जब चीन से युद्ध हुआ तो हमारी फौज इतनी शक्तिशाली नहीं थी लेकिन चीन युद्ध के बाद हमने अपनी शक्ति में भारी इजाफा किया. पाकिस्तान से युद्ध में पाक को अमरीका की भरपूर सहायता मिली, उसके बाद भी हमारी फौज ने जमकर उससे मुकाबला किया. अब जब देश को आजाद हुए करीब 68 साल होने को आये तब हमारी सैनिक शक्ति दुनिया की मजबूत और शक्तिशाली सेना के रूप में उभरकर आई है. इस मामले में हमने अमरीका को भी पछाड़ दिया है. आज के नौजवान हमसे सवाल करते हैं कि युद्ध नहीं होने की स्थिति में देश के सेना की क्या भूमिका है- हमारा उन्हें जवाब रहता है कि देश की सेना को हमेशा सक्रिय रहना चाहिये. सुस्त पड़़़़़ी रहे तो हम पर अगर दुश्मन हमला करें तो यह सुस्त सेना क्या करेगी? अत: हर दिन हमारी सेना एक नये रूप में उभरकर आती है जिसका उपयोग हम किसी भी पल कहीं भी कर सकते हैं. युद्ध नहीं तो सेना पर खर्च हमारी नौजवान पीढ़ी में से कई को अनावश्यक लगता है लेकिन वास्तविकता यह है कि सेना के लिये, सेना के ऊपर खर्च हर दिन जरूरी है, ताकि हम अपने संप्रभुता की रक्षा कर सकें. पहले सेना में महिलाओं की भर्ती बहुत कम होती थी लेकिन अब सेना में महिलाओं को भी लगभग समान रूप से रखा जाने लगा है. यह आवश्यक भी है, हाल ही बीएसएफ में कुछ ऐसी महिलाएं प्रशिक्षण प्राप्त कर निकली हैं जिन्होंने युद्ध में अपने पति को गंवा दिया. यह एक सराहनीय प्रयास है कि सीमा सुरक्षा बल ने उन परिवारों को मदद की जो देश के लिये मर मिटे. अक्सर यह शिकायत मिलती है कि सेना, बीएसएफ, पुलिस में शहीद के परिजन अपने भविष्य के प्रति चिंतित होकर भटकते रहते हैं. बच्चे
नौकरी के लिये तो परिजन मुआवजे व सहायता के लिये. सेना बीएसएफ व अन्य सशस्त्र बलों में भर्ती के बाद यह जरूरी है कि संबंधित बल उनके परिजनों के लिये यह सुनिििश्चत करें कि उन्हें सैनिक के शहीद होने के बाद उनके परिवार के सदस्य को या तो उसके स्थान पर नौकरी पर लगाया जायेगा या फिर ऐसी कोई अन्य सुविधा दी जायेगी जिससे उनके भविष्य पर किसी प्रकार की आंच आयेगी. सेना के प्रति लोगों का आकर्षण होना जरूरी है. आज के युवाओं में बहुत से जानते भी नहीं कि सेना आखिर है क्या? इसके लिये यह जरूरी है कि स्कूलों से ही बुनियादी तौर पर सेना के प्रति रूझान बढ़ाया जाये, प्राथमिक शिक्षा के बाद एनसीसी को अनिवार्य किया जाये ताकि इसके जरिये बच्चे सेना की पूरी जानकारी प्राप्त कर सके. वर्तमान परिस्थितियों में यह जरूरी है कि बच्चों को शुरू से इस लायक बनाया जाये कि वह देश के लिये कुछ कर सकें.
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गुरुवार, 6 अगस्त 2015

साहब मस्त,चपरासी सुस्त जेल की हवा गरीब को, नियम में यह भेदभाव क्यों?


नियम-कानून सभी के लिए समान क्यों नहीं है? बड़ा-छोटा, बाहुबली, नेता सबके लिये अलग कानून, अलग नियम! क्यों ऐसा होता है कि एक चपरासी अपने साहब के लिए घूस लेता है तो साहब तो बच जाते हैं किन्तु गरीब चपरासी को जेल में ठूंस दिया जाता है? न्याय की आंखों से पट्टी कब हटेगी? छत्तीसगढ़ में रिश्वत के मामले में ट्रेप होने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा 2012 बैच के अधिकारी को पद से हटाकर मंत्रालय में अटैच कर दिया, कुछ दिन बाद उसे सम्मानजनक कुर्सी भी प्रदान कर दी जायेगी, जबकि जो चपरासी कथित रुप से उनके कहने पर घूस लेता था उसे तत्काल जेल में ठूंस दिया. साहब का तो कुछ नहीं जाता, अब इस चपरासी पर आश्रित परिवार के सामने ढेरों मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा. कुछ कमाई उसने जमा की है तो सही वरना उसका परिवार उसकी जमानत के लिए वकील तक नहीं जुटा पायेगा. पाक-साफ ईमानदार छवि और न्याय की बात करने वाले बहुत से माननीय लोग हमारे समाज में मौजूद हैं-क्या उन्हें हमारी व्यवस्था के इस प्रकार के गुण-दोष नजर नहीं आते? यह पहला उदाहरण नहीं है- देशभर में "अपराध" के मामले में यही व्यवस्था चली आ रही है. एक गरीब या मध्यम वर्ग का व्यक्ति कोई भी अपराध करता है तो उसे पुलिस स्टेशन में प्रताडि़त करने से लेकर जेल पहुंचाने तक कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, जबकि आप देखते ही हैं अगर कोई पहुंच वाला प्रभावी या बड़ा अधिकारी जुर्म करता है तो उसके खिलाफ  एफआईआर दर्ज करने से लेकर उसकी गिरफ्तारी तक पूरा वक्त दिया जाता है ताकि वह कैसे भी बच निकले, यहां तक कि सत्तारुढ़ और विपक्षी दल भी अपने ऐसे चहेते लोगों के समर्थन में उतर जाते हैं अगर देश को छोड़ छत्तीसगढ़ की बात करें तो पिछले वर्षों में ऐेसे कई बड़े-बड़े घोटाले सामने आये जिसमें बड़ी-बड़ी मछलियां शामिल रहीं, सभी को दरकिनार कर छोटी मछलियों को जाल में फांस दिया गया- क्यों ऐसा किया जाता है? क्या आम लोग यह चाल नहीं समझते? रोजमर्रे की बात करें तो हमारे सामने कुछ घटनाएं तो ऐसी है जिसे देख या सुनकर ही लोग समझ जाते हंै कि इसमें कौन दोषी है? फिर उसे संरक्षण देने, बचाने वाले दौड़ पड़ते हैं जैसे उसपर कार्रवाही हो गई तो दुनिया पलट जायेगी या दुनिया का अस्तित्व ही मिट जायेगा! चाहे यह देश की अस्मिता का सवाल हो या किसी महिला की इज्जत को सरेआम तार-तार करने की घटना हो, ऐसे क्रूर और दुष्ट अपराधियों को बचाकर निकालने तक लोग दौड़ पड़ते हैं. व्यवस्था जिस ढंग से तुला में डोल रही है उस पर तत्काल कोई कठोर कदम उठाने की जरुरत है वरना एक दिन ऐसा आयेगा जब दुष्ट, भ्रष्टाचारी, बेईमान, ठहाके मारकर हंसेगा और आम इंसान रोता रहेगा. मध्यप्रदेश के पूर्व राज्यपाल के.एम. चांडी ने एक भ्रष्ट अधिकारी के मर्सी पिटीशन को यह कहते हुए रिजेक्ट कर दिया था कि ''जब नियम बनाने वाले ही अपराध में लिप्त हो जायेंगे तो नियम का संरक्षण कौन करेगा?"

बुधवार, 5 अगस्त 2015

सवालों के घेरे में भारतीय टे्न, गंतव्य तक की यात्रा या मौत की दौड़!




चांपा रेल दुर्घटना के बाद मध्यप्रदेश के हरदा के पास खंडवा-इटारसी सेक्शन में हरदा के पहले खिरकिया और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना ने रेल यात्रियों में दहशत व कई सवाल पैदा कर दिये हैं-क्या रेलवे यात्रियों को सुरक्षा दे पा रहा है कि वह यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचा देगा? अगर जान की गारंटी नहीं दे पा रहा तो वह यात्रियों के माल की गारंटी भी तो नहीं दे पा रहा! यात्री विशेषकर महिलाएं रेलों में पहले ही सुरक्षित नहीं हैं, दूसरा बहुत ज्यादा वेतन पाने वाले कतिपय भ्रष्ट कर्मियों के व्यवहार से भी यात्री परेशान हैं जबकि ट्रेनों में अनअथराइज्ड लोगों की घुसपैठ, सफाई, छेड़छाड़, गुण्डागर्दी की घटनाओं ने भी यात्रियों के लिये कई समस्याएं पैदा कर रखी हैं. खिरकिया-भिरंगी स्टेशनों के बीच दो ट्रेनें दुर्घटनाग्रस्त हुुुई हैं जिसमें 30 से 37 लोगों के मारे जाने की अधिकृत जानकारी है, दुर्घटना के फोटोग्राफ दुर्घटना की भीषणता को दर्शा रहे हैं. ऐसे में क्या दुर्घटना के इन अधिकृत आकड़ों पर विश्वास किया जा सकता है? बोगी जिस ढंग से उलटी-पलटी है वही दर्शाते हैं कि दुर्घटना के समय इन ट्रेन के डिब्बों में भारी संख्या में लोग भरे थे तथा घायलों और मौत का आंकड़ा भिन्न हो सकता हैे! नब्बे के दशक में छत्तीसगढ़ के चांपा में अहमदाबाद-हावड़ा ट्रेन एक्सीडेंट में भी हालात कुछ ऐसे ही थे. उक्त दुर्घटना के पांच-छह घंटों के भीतर ही मैं भी इस दुर्घटना की रिपोर्टिंग के लिये घटनास्थल पर पहुंच गया था, लाशों का ढेर देखकर हम चौंक गये थे. दुर्घटना की वीभत्सता और दुर्घटना का परिदृश्य ठीक ऐसा ही था जैसा खिरकिया-और भिरंगी स्टेशनों के बीच हुई रेल दुर्घटना के बाद दिखाई दे रही है, फर्क बस इतना था कि उसमें कम से कम तीन बोगी पुल से नीचे की ओर लटकी हुई थी तथा यात्रियों की लाश उसमें भरी पड़ी थी, बहरहाल हरदा दुर्घटना के बाद हम अपने देश की रेल सेवा को दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा होने का दंभ भरते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी बिछी हुई पटरियों की देखरेख इतनी पुरानी हो चुकी है कि इनपर से ट्रेनों का दौडऩा ही आश्चर्यजनक लगता है. अंग्रेजों के समय की रेल लाइनें आज भी उसी माहौल में पड़ी है जैसे वह बिछाई गई थी- थोड़ा बहुत परिवर्तन के कुछ नहीं किया गया? ऐसे में दुर्घटनाएं नहीं होंगी तो क्या होगा? सरकार बुलेट ट्रेन की बात करती है, करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट भी तैयार हो रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या रेलवे के वर्तमान माहौल में ही देश में तेज गति से दौड़ऩे वाली बुलेट ट्रेनें चलेंगी?

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

मुन्नाभाई एमबीबीएस के बाद छत्तीसगढ़ में रिलीज हुई नई फिल्म मुन्नीबाई एमए!




हिन्दी सिनेमा के नायक संजय दत्त की सुपरहिट फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस के बाद अब छत्तीसगढ़ की सरज़मीं पर नक्सलगढ़ में तैयार हुई 'मुन्नीबाई एमएÓ. नई फिल्म आते ही हिट हो गई और छग में अब तक के बहुचर्चित नान घोटाला, नसबंदी कांड, पर्चा लीक कांड जैसे घोटालों को पीछे छोड़ते हुुए हिट हो गई. फिल्म ने छत्तीसगढ़ में तहलका मचा दिया, चूंकि इस फिल्म की साइड हीरोइन मुन्नीबाई परीक्षा देने के तुरन्त बाद पकड़े जाने के डर से भाग गई और फंस गई असल हीरोइन, जिनके नाम से परीक्षा दी जा रही थी वह राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप की पत्नी है. परीक्षा केन्द्र में नाम, रोल नम्बर, फोटो, पता सब कुछ उन्हीं का है लेकिन परीक्षा उनकी एवज मेंं कोई दूसरी दे रही थी. इस कांड की गंभीरता इसलिये भी है चूंकि प्रदेश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लग गया है कि ऐसा कब से और कैसे क्यों और किसकी शह पर चल रहा है? प्रदेश में मुख्यमंत्री की अपील के बाद भी  बुनियादी शिक्षा पहले से ही लडख़ड़ाई हुई है जिसकी नींव मजबूत नहीं हो पाई है. ऐसे में अब इस उच्च शिक्षा में मुन्नीबाइयों के बोलबाले ने संपूर्ण शिक्षा जगत में ही नहीं सियासत में भी खलबली पैदा कर दी है. स्कूली शिक्षा बच्चों को कैसे दी जा रही है यह भी बस्तर के उस इलाके की शिक्षा से अपने आप स्पष्ट हो रहा है जहां कोई पढ़ाई हुए बिना ही बच्चों को प्रमोट करके एक क्लास से दूसरे क्लास में भेजा जा रहा है. उच्चत्तर शिक्षा में फर्जी डिग्री और फर्जी अंकसूची छत्तीसगढ़ के लिये नई बात नहीं है, यहां यह सिलसिला रविशंकर विश्वविद्यालय के समय से चला आ रहा है. एक समय तो यह स्थिति पैदा हो गई थी कि रविशंकर विश्वविद्यालय से पढ़कर निकलने वालों के लिये नौकरी देश के दूसरे स्थानों में बंद थी- राज्य बनने के बाद ले देकर यहां कुछ सुधार हुआ ही था कि पर्चा लीक कांड और अन्य अनियमितताओं ने यहां के बेरोजगार युवाओं के लिये मुसीबत खड़ी कर दी. अब छत्तीसगढ़ में इस नई फिल्म के रिलीज होते ही संपूर्ण सियासत में खलबली मचना स्वाभाविक है- मुख्यमंत्री ने जहां संपूर्ण मामले की जांच की बात कही है वहीं प्रदेश अध्यक्ष ने भी इस पर कार्रवाई की बात कही है. दिल्ली में विपक्ष जहां ललितगेट मामले को लेकर संसद की कार्रवाई नहीं चलने दे रहा है वहीं छत्तीसगढ़ में किसानों को बोनस और अन्य मुद्दों को लेकर कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में एक नया मुद्दा मिल गया. स्कूली शिक्षा मंत्री बीते सत्र में आउट सोर्सिंग से शिक्षा सुधार की वकालत कर रहे थे तब पक्ष-विपक्ष के सदस्यों ने घेरा था तब मंत्री का वक्तव्य था कि क्या आप नहीं चाहते कि बस्तर क्षेत्र के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, आईएस-आईपीएस, आईएफएस बने। हमारी सरकार सुदूरवर्तीय क्षेत्र में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था कर रही है। मंत्री जी बताएं क्या यही परीक्षा व्यवस्था अच्छी शिक्षा व्यवस्था है? क्या ऐसे ही गुणवत्तायुक्त शिक्षा की कल्पना करें हम? कुछ भी कहो- नक्सलगढ़ बस्तर अब पूरे देश में मुन्नीबाई एमए फिल्म के नाम से भी सुपरहिट हो गई है। अब इसकी रायल्टी का नफा-नुकसान सरकार और मंत्री के खाते में कितना जाता है यह यक्ष प्रश्न है. वैसे इस पूरे मामले में हम बता दें कि अगर सही ढंग से कार्रवाही हुई तो संबंधित लोगों पर छत्तीसगढ़ परीक्षा अनुचित साधन निवारण अधिनियम 2008 की धारा चार (क)10 के अनुसार दोषी को एक साल की सजा व दस हजार रूपये जुर्माने का प्रावधान है जबकि आईपीसी की धारा 419 व 420 के तहत भी कार्रवाही की जा सकती है. इसमें धोखाधड़ी के दोषी को तीन साल की सजा हो सकती है।



बेमकसद हो रही लड़ाई को क्यों देश में पनपने दिया जा रहा? मदद कहां से मिल रहा?



इनामी नक्सलियों के आत्मसमर्पण के लाख सरकारी दावों के बावजूद कारखानों में आग लग रही है तो यात्री बसों को भी आग के  हवाले किया जा रहा है. लोगों के सर कलम करने में भी कोई रहम नहीं किया जा रहा है लेकिन एक बड़ी घटना होने के बाद कड़ी कार्रवाही करने, नक्सलवाद का नामोनिशान मिटाने का दावा करने वाली सरकार उस समय खामोश रहती है जब नक्सलवादी राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को अंजाम देते हैं. पिछली बार नक्सलवादियों ने चार जवानों का अपहरण कर उनकों मौत के घाट उतार दिया था- श्रद्वांजलि अर्पित करने के अलावा सरकारी तौर पर कुछ नहीं किया जाना यही दर्शाता है कि कतिपय मामलों में नक्सलवाद को पनपने देने में  सरकार का भी कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष हाथ है. सोमवार को नक्सलियों ने लोहा कारखाने को आग के हवाले कर दिया वहां खड़ी कई कीमती गाडिय़ों को भी आग से जलाकर राख कर दिया . सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक यह सब बर्दाश्त किया जायेगा? जब यह संगठन सरकार द्वारा प्रतिबंधित है तब इसको क्यों इस ढंग से पनपने दिया जा रहा? हिंसा और खून खराबेे का हमारे संविधान में कोई जगह नहीं है फिर देश के ग्यारह से ज्यादा राज्यों में कैसे तेजी से यह आंदोलन बढ़ता जा रहा है? यह सब तभी हो सकता है जब किसी न किसी बड़े का संरक्षण हो. सरकार पहले यह पता लगाये कि जंगलों में छिपे नक्सलियों तक गोला बारूद और राशन पानी तथा कपड़े आदि सारे सामान कौन पहुंचा रहा है अगर यह हमारे देश के भीतर से ही है तो यह इतना गंभीर नहीं हो सकता लेकिन अगर किसी बाहरी देश से मदद प्राप्त कर नक्सली उछल रहे हैं तो यह अत्यंन्त गंभीर मामला है जिससे और कड़ाई से निपटा जाना चाहिये. हम बीहड़ में छिपे मोस्ट वान्टेड वीरप्पन को खत्म कर सकते हैं म्यामार में भारत पर हमला करने वाले आतंकवादियों का नाश कर सकते हैं  लेकिन वर्षों से सिर दर्द बने नक्सलियों से मुकाबला करने और इस समस्या का सदा-सदा के लिये खात्मा करने में क्या तकलीफ है? सरकार कुछ न कुछ तो करें आखिर जनता का पैसा कब तक सिर्फ नक्सलियों के पीछे  भागने पर खर्च होता रहेगा? अगर बात से समस्या का हल नहीं होता तो बुलेट से हल करो.यह भी तो समझ में नहीं आता कि आखिर नक्सली क्या चाहते हैं? यह आम आदमी पूछता है कि इन्हें सरकारी,सार्वजनिक या निजी संपत्ति नष्ट करने में क्या मजा आता है? वे क्यों निर्दोष लोगों का सिर कलम करते हैं. आतकंवादियों और इनमें क्या फर्क है? दोनों ही तो एक जैसा व्यवहार कर रहे हैं फिर इनसे भी आतंकवादियों की तरह निपटने में क्यों देरी की जा रही?

सोमवार, 3 अगस्त 2015

सेक्स रैकेट का जाल, बच्चियों को बंधक बनाने, यौन शोषण का खेल-छत्तीसगढ़ शर्मसार!




बहुत दिनों बाद राजधानी के किसी थाने में भारतीय दंड विधान की धारा 363, 376 (घ), 372, 342, 506, 34 और पास्को एक्ट का प्रयोग हुआ, वह भी तब जब एक गुमशदा तेरह साल की नाबालिग बच्ची पुलिस के हाथ लगी! इस बच्ची ने सारा भेद खोला तब कहीं जाकर कार्रवाही हुई वरना पुलिस आज भी हाथ मलती रहती तथा अपराधी अपना कुत्सित खेल खेलते रहते. शहर के सबसे बड़े कोतवाली थाने से कुछ ही दूरी पर स्थित है टिकरापारा! इस इलाके का भी अपना थाना है-पास ही पुलिस लाइन और इसके अंदर पूरे छत्तीसगढ़ की फोर्स का जमावड़ा- इन सबकी नाक के  नीचे पनप रहे इस घिनौने व्यापार जिसे पुलिसिया भाषा में कहे तो सेक्स रेैकेट! पुलिस की माने तो साक्ष्य के अभाव में कोई कार्रवाई न करने की बाध्यता पर चलता रहा- एक गंभीर मामला है जिसे यूं ही अनदेखा नहीं किया जा सकता. अगर राजी मर्जी से सारा खेल होता तो बात समझ में आती लेकिन यहां तो पूरी जबर्दस्ती थी और संभव है यह खेल यहां वर्षों से चला आ रहा होगा जिसमें कई सफेदपोश और राज्य तथा राज्य के बाहर के अपराधियों का समावेश होगा. रायपुर पुलिस विशेषकर एसपी बद्रीनारायण मीणा इस अंतर्राज्यीय गिरोह को खोज निकालने तथा अपराधियों पर गंभीर किस्म के अपराध की धाराएं लगवाने के लिये बधाई के पात्र हैं. आगे की जांच पड़ताल में यह संभव है कि इस पूरे गिरोह में कई नये-नये नाम सामने आयेंगे बशर्ते कि पुलिस इस मामले में पूरी ईमानदारी दिखाये. छत्तीगसढ़ से बच्चियों के अपहरण, तस्करी, यौन शोषण का मामला विधानसभा में भी गूंज चुका है, साथ ही हाल के  दिनों में जो आंकड़े आये हैं वह भी अलार्मिंग है जिसमें यह बताया जा रहा है कि भारी तादात में बच्चे छत्तीसगढ़ से गायब हैं- पुलिस गुमशुदा की रिपोर्ट लिखाने के बाद इस बात का कोई प्रयास नहीं करती कि आखिर यह बच्चे किन परिस्थितियों में गायब हुए तथा उनका क्या हश्र हुआ? बच्चों के अपहरण, उनका यौन शोषण के मामले में पुलिस की पड़ताल व कार्रवाही दोनों धीमी होने के कारण ही अपराधियों के हौसले आसमान पर है. टिकरापारा मामले में जब पुलिस को पहली सूचना मिली, उसके बाद से वह साक्ष्य का इंतजार करती रही, अगर तत्काल कार्यवाही करती तथा कुछ अपराधियों को शिकंजे में लेती तो संभव है कि  इस मासूम बच्ची का जीवन नारकीय होने से बचाया जा सकता था. अब जब यह सेक्स रैकेट उजागर हो चुका है तो पुलिस को इसकी तह तक जाने की जरूरत है तथा ऐसे सभी सफेदपोश लोगों का चेहरा उजागर करने की जरूरत है जो ऐसे कार्यों में सहयोग करते व लिप्त रहते हैं!