गुरुवार, 30 जुलाई 2015

बीएसएनएल-सिर्फ बड़ी सरकारी कंपनी होने का घमंड, कान बंद कर रखे हैं इस विभाग के लोगों ने!



198 -यह बीएसएनएल की आटोमेटिक कम्पलेंट बुकिंग सेवा है- इसमें लैण्डलाइन में आई खराबी और इंटरनेट की कंम्पलेंट दर्ज होती है. सूचना दर्ज होते ही आपके मोबाइल पर सूचना आती है कि आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है, आपको कम्पलेंट नम्बर भी दे दिया जाता है, यह भी बताया जाता है कि आपके नम्बर की खराबी को दूर करने के लिये व्यक्ति को अधिकृत किया गया है उसका फोन नम्बर भी दिया जाता है लेकिन यह व्यक्ति कभी किसी का फोन नहीं उठाता. इस एक व्यक्ति की बात छोडिय़े पूरे डिपार्टमेंट में जिन लोगों को उपभोक्ताओं की शिकायतों को हल करने का दायित्व सौंपा गया है वे कभी अपना मोबाइल उठाने की जरूरत नहीं समझते. बीएसएनएल दावा करता है कि वह देश की सबसे बड़ी कंपनी है किन्तु आज स्थिति यह है कि इससे बकवास कंपनी और कोई नहीं है, चूंकि इसकी सर्विस इतनी लचर है कि इसे लेने के बाद लोग कोसते रहते हैं. बीएसएनएल बड़ी कंपनी होने के कारण लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं किन्तु यह कितनी अच्छी सेवा देती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रायपुर एयरपोर्ट और दुर्गा कॉलेज ने अपने क्षेत्र में इस सरकारी कंपनी से वायफाई लगवाने से इंकार कर दिया. जब बड़ी-बड़ी संस्थाओं का यह हाल है तो आम आदमी का क्या हाल होगा? रायपुर के पश्चिम क्षेत्र में दो या तीन एक्सचेंज है- एक टाटीबंध, उरला एवं एक कोटा में. उपभोक्ताओं को यह नहीं मालूम कि वे किस क्षेत्र में आते हैं. सर्वोदय नगर कालोनी में बीएसएनएल के सिर्र्फ  दो ग्राहक हैं. दो ग्राहक होने के बावजूद उन्हें सही सेवा नहीं मिल रही. यहां सड़क पर तो फाइबर केबल बिछा दिये गये हैं लेकिन उपभोक्ता के घर तक  सेवा पहुंचाने वाले केबल इतने पुराने हैं कि फोन में हमिंग होती है तथा आवाज सुनाई नहीं देती. वायफाई में भी इसका प्रभाव पड़ता है. स्पीड कम हो जाती है तथा कभी-कभी बंद भी हो जाता है. आम उपभोक्ता यद्यपि इस सेवा को अन्य निजी कंपनियों के मुकाबले इसे बेहतर समझते हैं लेकिन जब परेशानी आती है तो इस विभाग के लोग सोये रहते हैं. बीएसएनएल लैण्डलाइन के फोन भी पुराने हो चुके हैं. नये फोन आते ही अफसर दबाकर बैठ जाते हैं, यह उपभोक्ताओं तक पहुंचते ही नहीं. पैसा देने के बाद भी फोन उपभोक्ताओं को नहीं मिलता.

बुधवार, 29 जुलाई 2015

याकूब फांसी पर!इधर आतंक के खेल की आहट...

याकूब फांसी पर! इधर आंतक
के नये खेल की आहट और
आंतकियों के पास अमरीकी डिवाइस!
दो चर्चित लोगों को आज सुपुर्दे खाक किया गया. एक देश की महान हस्ती, भारत के पूर्व राष्ट्रपति मिसाइलमेन अबुल पकीर अब्दीन अब्दुल कलाम जिनका शिमला में निधन हो गया था और दूसरा मुम्बई में सीरियल ब्लास्ट के लिये जिम्मेदार याकूब मेमन जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी. याकूब मूमन का आज जन्मदिन भी था -एक का नाम विश्व के प्रसिद्ध व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जायेगा और दूसरा मुम्बई में कई लोगों की मौत के लिये जिम्मेदार!
बहरहाल इस बीच एक बड़ी खबर चौंका देने वाली है कि आईएसआईएस नामक आतंकवादी संगठन हमारे देश पर हमले की योजना बना रहा है. दूसरा बड़ा रहस्योद्घाटन यह कि जम्मू से सटे पंजाब के गुरदासपुर में सोमवार को हुए आंतकी हमले में एक  आतंकियों के रूट से मिले नाइट विजन डिवाइस में अमरीकी मार्का लगा हुआ है- अब यह जांच का विषय है कि आखिर आतंकवादियों के हाथ यह डिवाइस कैसे लगा? जीपीएस रूट से इस बात का तो खुलासा हुआ है कि इस मामले में लिप्त लोग पाकिस्तान से आये थे और तीनों मुस्लिम थे, इस बात की पुष्टि भी कर दी गई है. पहले यह संदेह व्यक्त किया गया था कि यह खालिस्तान समर्थक भी हो सकते हैं. नाइट डिवाइस अमरीकी सेना करती है किन्तु यह आंतकवादियों के पास कैसे आया? क्या उसे यह अफगानिस्तान में तालीबान आंतकियों द्वारा लूट के मामले से हिस्से में मिला है या फिर पाक को अमरीका से मिले हथियारों में से इस हमले के लिये पाक आर्मी द्वारा भेंट किया हिस्सा है? पाक वैसे भी मुंह में राम बगल में छुरी वाली कहावत पर चल रहा है. अमरीका स्वयं भी दोहरा चरित्र लेकर चलता है, उसी ने अपने देश में हमला करने वाले ओसामा बिन लादेन को तैयार किया था जो उसी के लिये खतरा बन गया. इन सबमें गंभीर मसला अब आईएसआईएस की योजना को नेस्तनाबूत करना है. हमारी सीमा को और मजबूत करने की जरूरत है, वहीं आंतरिक सुरक्षा को भी और पुख्ता करना होगा. इधर याकूब मेमन को फांसी के बाद मुम्बई हमलों के अन्य दोषी फरार लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी इस पर भी कड़ी निगाह रखने की जरूरत है. मुम्बई बम ब्लास्ट के प्रमुख आरोपी दाउद इब्राहिम व उसके कई अन्य साथियों का अब तक पता नहीं जबकि मुम्बई ब्लास्ट मामले में सारे आरोपी जब तक पकड़े नहीं जायेंगे तब तक इस कांड के पीडि़तों को न्याय नहीं मिलेगा.

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

म्यांमार की तरह पाक आतंकियों के ठिकानों पर हमला करने से क्यों हिचक रही सरकार?



साड़ी, आम और हाथ मिलाने की कूटनीति! क्या यही नरेन्द्र मोदी की कूटनीति है? विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा, केन्द्र सरकार की विदेश नीति को सही नहीं मानते! नरेन्द्र मोदी को सलाह देते हैं कि वे मेंगो डिप्लोमेसी छोड़ें और पाकिस्तान के खिलाफ स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी जैसा साहस दिखाएं! तोगडिय़ा यही नहीं रुकते, वे कहते हैं कि म्यांमार में घुसकर जिस तरह आंतकवादियों को खत्म किया गया था ठीक उसी तरह पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर में घुसकर हमला बोलना चाहिए। वास्तविकता यही है कि आखिर कब तक हम बर्दाश्त करते रहेंगे!- वे दो सैनिकों का गला काटकर ले गये तो जवाबी कार्यवाही करने की जगह हमने उन्हें साड़ी भेज दी. आंतकवादियों को भेजकर हमारी सीमा में हलचल पैदा की तो हमने उन्हें बंदूक से जवाब देने की जगह भारत का प्रसिद्ध आम अल्फांसो भेज दिया। पाकिस्तान लगातार हम पर एक के बाद एक हमले कर रहा, क्यों नहीं हमारा खून उबलता? क्यों हम चुप बैठे हैं? हमारा सारा जोश क्या चुनाव जीतने के लिए है? कभी पाक के प्रधानमंत्री की मां को साड़ी, कभी आम का रस, और कभी हाथ में हाथ देकर कब तक उनके जुल्म को झेलते रहेंगे- क्या हममें हिम्मत नहीं है कि पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर आंतकवादियों के ठिकानों को उड़ा दें। हमारी सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय के अभाव का अहम उदाहरण गुरदासपुर मुठभेड़ के दौरान देखने को मिला जब आतंकवादियों से मुकाबला चल रहा था-अगर सेना के पहुंचते ही पुलिस समन्वय स्थापित करतीं तो शायद एसपी को अपनी जान से हाथ धोना नहीं पड़ता, ऐसा कई मामलों में हो रहा है- न केवल हमारी विदेश नीति बल्कि गृह विभाग और सूचना तंत्र पर भी सवाल उठ रहे हैं- इलेक्ट्रानिक मीडिया मुठभेड़ के शुरू से लाइव प्रसारण करता रहा लेकिन जब कहीं से यह कहा गया कि इससे आंतकवादियों और उनके आकाओं को मदद मिलेगी तो ले-देकर लाइव प्रसारण पर थोड़ी बहुत लगाम लगी। क्या यह भारत-पाक किक्रेट मैच है जिसका लाइव प्रसारण किया गया? मुंबई 26/1 हमले में भी इसी प्रकार का लाइव प्रसारण हुआ था। डान दाउद इब्राहिम का मामला अभी भी लंबित पड़ा है। बीच-बीच में उसकी खबर उठती रहती है लेकिन हम उसको लाने के मामले में भी गंभीर नहीं हैं- वह कहां है? किस हालत में है, वह अभी कैसा दिखता है यह तक नहीं मालूम. उसके साथी याकूब मेमन की अभी मिली तस्वीर में बहुत उम्र का दिखाया गया है, जब दाऊद के कथित साथी की उम्र बुढ़ापे की है तो दाऊद का क्या हाल होगा, यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है. इससे तो यही कहा जा सकता है कि दाऊद को भारत लाकर उस पर मुकदमा चलाने और सजा दिलाने में शायद युग बीत जाए. अत: हमारी सलाह यही है कि सरकार को जो करना है कि वह तुरंत-फुरंत में करें- सपना दिखाना छोड़ें!

सोमवार, 27 जुलाई 2015

कलाम नहीं रहे....इधर पंजाब में आतंकवादियो का ख़ूनी मंजर-सुरक्षा में भारी चूक!


कलाम नहीं रहे....इधर पंजाब
में आतंकवादियों का खूनी
मंजर-सुरक्षा में भारी चूक!
सोमवार को सुबह से पंजाब में खूनी मंजर की बुरी खबर के साथ  शाम होते -होतेे एक और बुरी खबर ने पूरे देश को चौका दिया ''भारत के पूर्व राष्ट्रपति महान वैज्ञानिक अवुल पकीर जेनूला अब्दीन अब्दुल कलाम जिन्हें सारा विश्व इंडियन मिसाइल मेन के रूप में जानता था नहीं रहे.... '' विनम्र श्रद्वांजलि
पंजाब एक बार फिर आतंकवाद की गिरफत  में आ गया. इस बार पाक से आये आतंकियों ने कहर ढा दिया. रात के अंतिम पहर में जब सब सो रहे थे तभी आतंकवादियों ने पाक सीमा से लगे गुरूदासपुर से भारत में प्रवेश किया और सबसे पहले एक आटो को रोकने का प्रयास किया लेकिन आटोवाला शायद उनके इरादों को भाप गया और बिना रूके आगे बढ़ गया आगे कार वालों के साथ उन्होंने कोई रहमी नहीं दिखाई, उसे रोकने के लिये अंधाधुन्ध गोलियां चलाई तथा कार को हाइजेक कर शहर के अनेक क्षेत्रों में दहशत फैलाया और थाने में घुसकर भी गोली चलाई.आतंकवादियों से बारह घंटे की अब तक की सबसे बड़ी मुठभेड़ इस दौरान हुई जिसमें आतंकवादी तो मारे गये लेकिन हमें भी मानवीय क्षति उठानी पड़ी.पुलिस और सेना के बीच तालमेल का अभाव इस पूरी घटना के दौरान दिखा. पुलिस ने सेना से मदद लेेने में देरी कर दी इसलिये मुठभेड़ शायद इतनी देर चली.एक एसपी सहित कई लोगों को हमें गवाना पड़ा.आंतकवादी पूरे मुकाबले की गरज से मुम्बई हमले की तरह गोला बारूद के साथ आये थे. यह हमारे सुरक्षा व्यवस्था की चूक है कि आतंकवादी सीमा को पार कर शहर के भीतर तक घुस आये और हमारी सुरक्षा एजेंसियों को खबर तक नहीं लगी. भारत की खुफिया एजेंसियां कई दिनों से सतर्क करती रही है कि आतंकवादी किसी बड़े हमले की तलाश में है लेकिन सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं किया गया, दूसरी ओर पंजाब फिर अशांत होने की तैयारी में हैंं यहां मुख्यमंत्री बादल की सभा में खालिस्तान समर्थकों की नारेबाजी ने भी देश को एक बार फिर चौका दिया है. अस्सी के दशक में इस आतकंवादी संगठन की सक्रियता ने पंजाब को पूरी तरह अशांत बना दिया था तथा इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को प्राण से हाथ धोना पड़ा था. पंजाब पूर्व से ही नशीले पदार्थों के बेचने वाले माफियाओं से परेशान है अब भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार के आंतक से आम नागरिकों में दहशत का माहौल पैदा होना स्वाभाविक है. पंजाब के गुरूदासपुर सीमा की दृष्टि से सबसे संवेदनशील इलाका है-भारत पाक युद्व के दौरान पाक से बम-बारी भी इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा हुई थी. पाक सीमा से लगा होने के कारण पाक में मौजूद भारत विरोधी आतंकवादियों के लिये प्रवेश का यह सबसे उत्तम स्थान माना गया है लेकिन इसके बावजूद हमारी सुरक्षा व्यवस्था का क्या आलम है यह इस घटना से साफ हो जाता है. इस बार आतंकी हमले के बाद भारत में आंतकवादी गतिविधियों के लिये प्राय: अपनी जिम्मेदारी का दावा करने वाले संगठनों की चुप्पी भी विशेषज्ञों के लिये रहस्य बना हुआ है चूंकि इस आतंकवादी घटना के लिये अपनी जिम्मेदारी अब तक छिपा रखी है? वैसे यह पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हरकत है इसमें दो मत नहीं।

रविवार, 26 जुलाई 2015

सामान्य से लेकर नौकरशाही और राजनीति तक सब जगह टांग खींचने की प्रवृति!



हम अपना काम छोड़कर बाकी सब करते हैं-वह चाहे किसी की आलोचना करना हो, टांग खींचना हो या फिर किसी के काम में अडंग़ा डालना- यह बात अकेले सामान्य लोगों पर लागू नहीं होती, देश की राजनीतिक व्यवस्था में लगे लोगों का भी यही हाल है. इससे जो काम होना है वह या तो ढंग से नहीं होता या फिर उस काम की गति कमजोर पड़ जाती है. देश में सामान्यजन से यह बात निकलक र नौकरशाही और राजनीति में भी पहुंच गई है, इसका हश्र आज सभी के सामने है. लोग अपना काम छोड़कर परनिंदा, आरोप-प्रत्यारोप, भत्र्सना और ऐसी ही कई फिजूल की बातों में उलझकर रह गये हैं। व्यवस्था और राजनीति में इस बुराई के प्रवेश ने सारे माहौल को ही बिगाड़ दिया है, जबकि इससे नुकसान आम लोगों का ही हो रहा है. माननीयों को भी अब जनता-देश को छोड़  दूसरों की चिंता ज्यादा सताने लगी है. वह क्या कर रहा है, उसने क्या किया इसी में समय गुजर रहा है- यहां तक कि देश का सबसे बड़े तंत्र को भी आज अखाड़ा बना दिया गया है- किसी को इस बात की कतई परवाह नहीं कि उसने क्या किया? वह क्या कर रहा है? इस पूरे एपीसोड में हर आदमी अपने काम को छोड़कर दूसरे की बुराई निकालने में ही अपना बड़प्पन समझने लगा है। जनता के काम का दायित्व जिन लोगों को सौंपा गया है उसपर नजर दौड़ाएं तो साफ नजर आता है कि एक छोटे कार्यालय का चपरासी अपना काम छोड़कर बाबू या साहब की चापलूसी करने में लगा है या फिर इधर-उधर मटरगश्ती में अपना समय बर्बाद कर रहा है. उधर ब्यूरोक्रेट्स का यह हाल है कि वह अपने अन्य साथी या किसी अपने बास या अधिनस्थ दुश्मन की कब्र खोदने में लगा है। मंत्री जिन्हें जनता ने उम्मीदों के साथ देश को चलने का दायित्व सौंपा है वह या तो विपक्ष के पीछे पड़ा है या विपक्ष सत्ता पक्ष के पीछे पड़ा है, कोई किसी को कालिया नाग कह अपनी भड़ास निकाल रहा है तो कोई सत्ता में पहुंचकर पुरानी कब्र खोदने में लगा है. इसका एक ही उपाय है कि जिसे जो काम सौंपा गया है वह अपना काम करें दूसरों के काम में टांग अड़ाने की आदत छोड़ें। जनता के प्रतिनिधि विशेषकर जो देश के बड़े ओहदे पर पहुंचते हैं उनके लिए यह जरूरी होना चाहिए कि वह उच्च पद पर बैठने के पांच साल तक भारत के राष्ट्रपति की तरह किसी भी राजनीतिक दल से ताल्लुक न रखें और सिर्फ देश के लिए काम करें. आजादी के बाद के दशकों में स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि लोग सिर्फ अपने जेब के लिये काम करते हैं, देश के लिये कोई काम नहीं करता!

शनिवार, 25 जुलाई 2015

सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने की आवाज, और गुस्से में भागती मां-'घर-घर की कहानी


सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने
की आवाज, और गुस्से में
भागती मां-'घर-घर की कहानी

पति-पत्नी के बीच झगड़े आम बात है, यह झगड़े प्राय: हर घर में होते हैं, जो शाम या रात होते-होते फिर दोस्ती और पे्रम में बदल जाते हैं लेकिन इन सबके बाद भी कुछ मामले इतने अड़ियल हो जाते हैं कि इसके परिणाम घातक व पूरे परिवार को प्रभावित करने वाले हो जाते हैं- ऐसा ही एक मामला हाल के दिनों में प्रकाश में आया जो इतना घातक था कि अगर मौके पर हल  नहीं निकाला जाता तो संभव है पूरा परिवार बिछड़ जाता तथा  सभी संबन्धित लोगों को जिंदगीभर के लिये पछताना पड़ता. अक्सर मीडियाकर्मी रात में सारे दिन रात की टेंशन के बाद घर लौटते हैं तब उन्हें काफी ऐसे नजारे देखने मिलते हैं जो वास्तव में हमारे सामाजिक जीवन में रोजमर्रे की घटनाएं हैं. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रात को एक मीडियाकर्मी अपने काम से पूरा टेंशन लेकर वापस लौट रहा था तभी सड़क पर उसे एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी, पहले तो वह घबराया फिर पीछे मुड़कर देखा तो एक पांच-छह साल की बच्ची रोती हुई चली जा रही थी, स्कूटर सवार मीडियाकर्मी ने रूककर बच्ची से पूछा तो उसने बताया कि उसकी मां छोड़कर आगे निकल गई है. बच्ची को स्कूटर में बिठाकर मीडियाकर्मी पास के एक बहुमंजिले मकान के गार्डों के पास पहुंचा तो उसे याद आया कि इस बच्ची की मां भी है जो सड़क से आगे निकल गई है. वह बच्ची को गार्डों को सौंपकर वहां से फिर पीछे भागा तो देखा कि एक महिला पैदल गुस्से में चली जा रही है, उससे पूछा तो पता चला माजरा क्या है? किसी अच्छे घराने की भद्र महिला गुस्से में बिना चप्पल पहने ही शायद किसी ट्रेन के नीचे सिर देने के लिये निकल पड़ी थी. जब उसे मीडियाकर्मी ने उसके बच्चे की बात बताई तो उसके कदम थम गये- वह उस बच्चे पर ही भड़क गई कि तू क्यों पीछे चली आई. वास्तव में बच्ची पति-पत्नी के झगड़े को देखती रही और मां को बाहर निकलते देख उसके पीछे चली आई. बातचीत के दौरान और भी लोग एकत्रित हो गये. समझा-बुझाकर उसे उनके घर भेजा गया. पति महोदय झगड़े के बाद गुस्से में आराम फरमाने चले गये थे जब यह पता चला होगा तो उन महोदय पर क्या बीती होगी? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. बहरहाल यह घर-घर की कहानी है जो कहीं न कहीं दोहरायी जाती है. अक्सर परिवारों में यह होता है किन्तु इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. पति-पत्नी में तो कोई गुस्से में अपने प्राण की बलि चढ़ा देता है लेकिन उन बच्चों का क्या कसूर? सवाल बहुत से खड़े होते हैं-अगर यह बच्ची या उसकी मां दोनों में से कोई भी किसी गलत हाथ में पड़ जातीं तो? पत्नी मरने का इरादा छोड़कर घर आ जाती तो संभव है फिर पति-पत्नी दोनों मिलकर बच्ची को खोजने निकलते, तब तक देर हो गई होती? रायपुर पुलिस की गश्त पर भी सवाल उठता है? शहर की सड़कों पर रात में कभी पुलिस गश्त दिखाई नहीं देती, क्राइम स्क्वाड की गाड़ियां कहां है? कब व किसे लेकर कहां घूमती रहती है? हम डिजिटल इंडिया, वाय-फाय की बात करते हैं, सड़कों पर सीसीटीवी क्यों नहीं? कई मार्गों, गलियों यहां तक कि चौराहे भी घूप्प अंधेरा हैं, फिर कोई घटना हो जाये तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

ताउम्र जेल या फांसी?, बेहतर तो यही कि ताउम्र कैद में रहकर कठोर यातना भुगते!



'जेल में ताउम्र सड़ने से मर जाना ही अच्छाÓ- यह हमारी राय नहीं बल्कि देश के सुप्रीम कोर्ट की है-जेल में ताउम्र सड़ रहे ऐसे कैदी भी संभवत: यही चाहते होंगे लेकिन उनके चाहने से क्या होता है उन्हेंं तो अपने किये की सजा भुगतनी ही होगी. सुप्रीम कोर्ट की राय व कैदियों की मंशा का अगर विश्लेषण करें तो बात साफ है कि फांसी से बेहतर ताउम्र सजा है, चूंकि अपराधी को जिंदगीभर  इस बात का तो एहसास होता है कि उसने जो कृत्य किया वह कितना घिनौना था कि उसे नरक धरती पर ही जीते जी मिल गया. आतंकवाद में लिप्त याकूब मेमन को फांसी के बाद एक मानवाधिकारी महिला को यह कहते हुए सुना गया कि फांसी से
अपराध बंद नहीं होगा फिर फांसी का क्या औचित्य? अपराधी  जन्मजात अपराधी नहीं होता उसे परिस्थितियां ही ऐसा बना देती है- सही है कोई व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता, उसके कर्म उसे अपराधी बना देते हैं. अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे इसकी सजा तो भुगतनी ही होगी, यह सजा फांसी न होकर अगर जन्मजात पछताने की है तो फांसी से भी बढ़ी सजा मानी जायेगी क्योंकि फांसी, बंदूक की गोली या जहर का इंजेक्शन तो उसे इस जन्म से मुक्ति दिला देगी. मरने के बाद क्या होता है किसे मालूम! कौन पश्चाताप करेगा? असल में फांसी की सजा देकर हम उस पूरे परिवार को भी सजा दे रहे हैं जिसने कोई पाप या दुष्कर्म किया ही नहीं. अगर जिंदगीभर किसी को एक ही कमरे मेंं ठूंसा जाता है तो उसे न केवल अपने किये पर पछतावा होगा बल्कि यह भी महसूस करेगा कि उसने जो किया वह गलत था लेकिन फांसी देकर तो सबकुछ खत्म हो जाता है. लोग जिदंगीभर एक काल कोठरी  में पड़े-पड़े सड़ते रहे और पछताते रहे इस लिहाज से भी फांसी से बेहतर उम्र कैद है. बहरहाल याकूब मेनन को फांसी वाले मामले में कई सवाल खड़े हो गये हैं. क्या डेथ वारंट जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बैंच का फैसला, उसके बाद फांसी की सजा को अब फिर चुनौती बड़े पेचीदा प्रश्न खड़े कर रही है, आगे आने वाले समय इस मामले में सुनवाई होगी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय कर सकता है कि आगे फांसी के निर्णयों को कैसे अमल में लाया जाये. वैसे जो व्यवस्था अपराध और अपराधियों को सजा के मामले में है वह इतनी पेचीदगीभरी है कि सजा मिलने में काफी देरी हो जाती है. यह कोई समझ नहीं पा रहा है कि जब  हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च मानता है तो उसके निर्णय के आगे अन्य अलग-अलग प्रक्रियाएं क्यों होती हैं? हम मानते हैं कि संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति को दया याचिका पर सुनवाई और सजा-ए-मौत को बनाये रखने या न रखने का पूर्ण अधिकार है लेकिन एक बार जब सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति कोई निर्णय ले लेते हैं तो उसे कैसे चुनौती दी जाती है? देश का सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है, उसके आगे कुछ नहीं की व्यवस्था होनी चाहिये.

व्यवस्था के दो रूप-एक माननीय ने जीवित पूर्व राष्ट्रपति के चित्र पर फूल चढ़ाया, दूसरे ने मान बढ़ाया!


व्यवस्था के दो रूप-एक माननीय ने
जीवित पूर्व राष्ट्रपति के चित्र
पर फूल चढ़ाया, दूसरे ने मान बढ़ाया!
झारखंड की शिक्षामंत्री ने बुधवार को एक स्कूल के कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के चित्र पर माल्यार्पण किया, फूल चढ़ाये और जीते जी उन्हें श्रद्धांजलि भी दे डाली. यह सब देखने के लिये स्कूली बच्चे, शिक्षक और झारखंड के अधिकारी मौजूद थे, किसी ने यह नहीं कहा कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये. चूंकि कलाम अभी जीवित हैं. झारखंड में यह पहला अवसर नहीं है जब मंत्रियों के व्यवहार की इतनी छीछालदर हुई है. दूसरी ओर सांसद शशि थरूर का उदाहरण है, जिन्होंने ब्रिटेन जाकर उसके देश में वहां की सरकार को ललकारा कि ब्रिटिश शासनकाल में उसने हमारे देश को लूटा है, उसका मुआवजा उसे मिलना चाहिये. यह दो उदाहरण है जो प्रजातांत्रिक व्यवस्था को तुला पर तौल रही है-एक का वजन ज्यादा है तो दूसरे का कम! यह हमारी ही गलती है कि हम ऐसे कतिपय लोगों को चुनकर सत्ता में भेजते हैं जो न केवल अशिक्षित हैं बल्कि अज्ञानता की भी हद पार कर देते हैं,-जबकि देश में संविधान के तहत निर्मित एक संस्था है 'चुनाव आयोग, जिसे चुनाव नियमों में अपार परिवर्तन का अधिकार है किन्तु दुख इस बात का है कि चुनाव में मौजूद खामियों को यह संस्था आजादी के अड़सठ वर्षों बाद भी दूर नहीं कर सकी. अड़सठ साल पीछे मुड़कर देखें तो उस समय देश गरीब था, अशिक्षित था, कई बातों से अनजान था लेकिन अब तो यह स्थिति नहीं रही- कुछ चंद प्रतिशत को छोड़कर लोग पढ़े लिखे हैं, समृद्ध हैं और जानकार भी! फिर चुनाव आयोग निर्वाचन की प्रक्रिया में समय के अनुसार फेरबदल क्यों नहीं करता? हम मानते हैं कि जिम्मेदार मंत्री पद पर किसी की नियुक्ति मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपनी पसंद से करते हैं लेकिन वहां उन तक पहुंचाने के लिये जो अर्हताएं होती है उसका चयन चुनाव आयोग को ही करना होता है मसलन उसकी आयु कितनी है? मंद बुद्धि का तो नहीं है? कोई कितना पढ़ा-लिखा होना चाहिये, वह आपराधिक प्रवृति का तो नहीं है- उसक ा चरित्र कैसा होना चाहिये यह सब तो चुनाव से पूूर्व किसी प्रत्याशी को सार्टिफिकेट देने से पहले ही तय होना चाहिये लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत जो पहले से चला आ रहा है वही ढर्रा चल रहा है, उसी का नतीजा है कि आज देश में कहीं आपराधिक प्रवृति का कोई व्यक्ति मंत्री पद ग्रहण कर जाता हैं तो कोई फर्जी डिग्री लेकर पूरे समाज को ज्ञान बांटने लगता है. चुनाव प्रक्रिया में भारी बदलाव की जरूरत है-जो व्यक्ति चुनाव में उतरता है उस पर चुनाव आयोग की नजर उसकी शैक्षणिक योग्यता, उसका चरित्र, आपराधिक इतिहास व अन्य कई महत्वपूर्ण जानकारियों से भरा होना चाहिये. देश में इस समय होने वाली बहुत सी घटनाएं कतिपय माननीयों की जुबान और उनकी अज्ञानता, अशिक्षा के कारण हो रही है, इसपर नियंत्रण के लिये कोई न कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाना जरूरी है. अभी तो सिर्फ देश के अंदर ही ऐसे माहौल का सामना करना पड़ रहा है, आगे भी कोई परिवर्तन नही हुआ तो विदेशों में भी हम ऐसेे लोगो के कारण हंसी के पात्र बनेंगे.

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

नैतिकता, सिद्धांत सब पुरानी बात इस्तीफों की मांग को लेकर आंदोलनों का औचित्य क्या





व्यापमं, नान घोटाले के लिये कौन जिम्मेदार है? क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह? क्या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह? इसका जवाब सीधे तौर पर हां या न में हो सकता है लेकिन इन मंत्रियों के इस्तीफे से संपूर्ण मसला हल हो जायेगा? अगर हां तो उन्हें तत्काल त्यागपत्र दे देना चाहिये- न तो ऐसे किसी आंदोलन को चलाने का कोई औचित्य नहीं! यही बात वसुन्धरा राजे, सुषमा स्वराज पर ललितगेट मामले, स्मृति इरानी पर फर्जी डिग्री और महराष्ट्र की मंत्री श्रीमती पंकजा मुण्डे जिन पर भूमि घोटाले का आरोप है, पर भी उठ रहा है. सभी मामले कहीं न कहीं किसी रूप में कोर्ट की परिधि में है. इतना हल्ला इन मामलों पर मचाने की बनिस्बत हम क्यों नहीं कोर्ट के फैसले का इंतजार करते? हम अपनी संस्कृति, सिद्धांत और नैकितकता की चाहे जितनी दुहाई दें हम दूसरे देशों के मुकाबले में ऐसे मामलों में बहुत पीछे हैं. बुधवार को जापान से एक खबर आई कि वहां तोशिबा में सत्यम जैसी हेराफेरी के बाद सीईओ रिसाको तनाओ, वाइस चेयरमेन नोरियो ओरछेअन्ने ने न केवल अपने पदों से इस्तीफा दिया बल्कि आधा मिनट झुककर कहा कि हम शर्मिन्दा हैं. हमारे देश में बात कुछ अलग है. नैतिकता का तकाजा बताकर इस्तीफा देने वाली बात अब पुरानी हो गई है. पहले घपले-घोटाले तो दूर की बात एक छोटे से ट्रेन हादसे पर भी सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए मंत्री व अफसर पद छोड़ देते थे लेकिन आज स्थिति बदल गई है. इस्तीफा दें या न दें वह संबन्धित मंत्री की नैतिकता पर निर्भर हो गया है. इसमें दिलचस्प स्थिति यह बन गई है कि आज जो लोग जो इस्तीफा मांग रहे हैं वे भी कितने दूध के धुले हैं? सत्ता में रहते ऐसे लोगों ने या उनके साथियों के ढेरों ऐसे मामले हैं जिसमें देश को काफी चूना लगा है. एक बार कुर्सी से चिपकने के बाद कोई भी उससे मुक्त होना नहीं चाहता. युद्ध में जीत-हार दोनों की जिम्मेदारी कप्तान की होती है. जीत हुई तो उसे श्रेय और हार हुई तो भर्त्सना. यही हाल खेल में भी है. हम कितनी बार देख चुके हैं कि क्रिकेट में जीत के बाद कप्तान और उसके साथियों को लोग जहां हाथों-हाथ उठा लेते हैं, वहीं हार होने पर वह सबकुछ कर डालते जो कम से कम खेल के मामले में तो नहीं करना चाहिये. राजनीति और खेल दोनों में फर्क है. राजनीति में आज जो कुछ हो रहा है अगर उससे जनता का कोई हित होता है तो यह होना ही चाहिये, मगर यहां तो आगे सब खाली ही खाली नजर आता है. नान घोटाले का मामला अदालत पहुंच चुका है. व्यापमं घोटाले का मामला सीबीआई के सुपुर्द है-अन्य प्राय: सभी मामलों में मुकदमे न्यायालयों में लंबित हैं फिर इस्तीफे की मांग से क्या समस्या का हल हो जायेगा?  इन फैसलों का इंतजार करना ही चाहिये. सत्ता में बैठे लोग व विपक्ष दोनों ही इन घपले घोटालों की आड़ में कहीं न कहीं अपना हित खोजने में लगे हैं. इन आंंदोलनों व सरकारी तंंत्र की खामोशी ने सारे अन्य जनहित के मुद्दों से सभी का ध्यान हटा दिया है.
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जनता के माल को अपनी पैतृक संपत्ति मानकर भ्रष्टतंत्र चट कर रहा..!



जनता के खरे पसीने की कमाई को सरकारी तंत्र में बैठे कुछ लोग दीमक की तरह खा रहे हैं. हाल ही में एसीबी की जाल में फंसी बड़ी मछलियों के कारनामों से तो कुछ ऐसा ही लगता है. इन तत्वों ने सरकार व जनता के माल को अपनी पैतृक संपत्ति मान ली है. जिस ढंग से सरकारी सर्विस में चंद सालों से लगे लोगों के घर व पारिवरिक सदस्यों यहां तक कि नौकर चाकरों के घर से जो माल निकल रहा है यह यही दर्शा रहा है कि ऐसे लोगों ने अपने पद और ओहदे को निचोड़कर उसमें से रस निकालने में कोई कमी नहीं छोड़ी है.अगर प्रदेश में आठ कर्मचारियों की संपत्ति पचास करोड़ से ज्यादा है तो इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में ऐसे और कितने लोग होंगे जो अकूत संपत्ति लेकर मौज से काम कर रहे हैं और ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं. नान घोटाले के आरोपियों के पास से भी करोड़ों रूपये की संपत्ति व पैसा निकला है-उनके खिलाफ कार्रवाही के बाद से लग रहा था कि अब भ्रष्टाचार पर कुछ तो लगाम लगेगा लेकिन यहां तो भ्रष्टाचार की पूरी खदान है जिसमें थोड़ा बहुत धन नहीं बल्कि पूरा रिजर्व बैंक है- यह पैसा  बाहर आ जाये तो छत्तीसगढ़ स्वर्ग बन सकता है उसे न केन्द्र पर निर्भर रहना पड़ेगा और न लोगो को शराब पिलाकर पैसा वसूल करना पड़ेगा और न ही वेट जैसा जानलेवा टैक्स रोपित करना पड़ेगा.सारा काम ईमानदारी से चलता रहा तो संभव है आगे भी कई बड़ी मछलियां छत्तीसगढ़ के तालाब से निक ले.सरकारी तंत्र में इस समय ऐसा कोई विभाग नहीं रह गया है जहां लेन-देन के बगैर काम होता है.पहले यह माना जाता था कि कम वेतन के कारण ऊपरी लेन देन करते हैं लेकिन अब ज्यादा वेतन, सुरक्षित नौकरी के बाद भी ब्लेक मनी जुटाने में लगे हैं लोग,जिसके जरिये उनका उद्देश्य अपने खानदान को लम्बे समय तक सुरक्षित बनाना है.छत्त्तीसगढ़ के बस्तर इलाके का कितना शोषण हो रहा है यह इसी से पता चलता है कि यहां तैनात कतिपय अफसरों के घर से करोड़ों रूपये जमीन तक से निकल रहा है.नक्सली क्षेत्र होने के कारण यहंा तैनात अफ सर अपने ऊपर किसी कार्रवाही का खौफ नहीं रखते, वे देखते ही देखते धन कुबेर हो जाते हैं.बस्तर में नक्सलवाद का उदय व सक्रियता के पीछे भी यही कारण है कि यहां केन्द्र व राज्य सरकार का जो भी पैसा विकास कार्यों के लिये पहुंंचता है उसका बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के कतिपय भ्रष्ट अफसर व कर्मचारी खा जाते हैं.यही हाल राज्य के अन्य मलाईदार विभागों का है जैसे सिंचाई, वन,पीडब्लूडी,कृृषि,शिक्षा आदि जिनके विकास के लिये पहुंचने वाले एक रूपये में से सिर्फ चवन्नी ही खर्च होती है बाकी सारा बडी़-छोटी मछलियांं मिलकर गप कर जाती है. सरकार जब तक अपनी योजनाओं के विकास पर खर्च होने वाले पैसे की सतत निगरानी नहीं करेगा तब तक ऐसे भ्रष्ट तंत्र पनपते रहेंगे. दूसराऐसे फंसने वालो पर पंजा इस तरह कसा दिखना चाहिये कि दूसरा कोई इसमें फंसने से पहले दस बार सोचे. एसीबी ने कुछ माह से ऐसा प्रयास किया है लेकिन अभी उसे बहुत कुछ करना है.

रविवार, 19 जुलाई 2015

हर आदमी के हाथ बंधे हैं फिर पीड़ितों की मदद में कैसे हाथ बढ़ायें?




कोई सड़क पर किसी गुण्डे से पिटता रहे, कोई गुण्डा किसी महिला की सरेराह इज्जत उतार दे, कोई राह पर दुर्घटना में कराहता रहे, किसी को क्या फर्क पड़ता है? हमारे देश के कानून ने लोगों को कुछ ऐसा ही बना दिया, चाहते हुए भी वह मजबूर है! पिछले  शुक्रवार, शनिवार और रविवार को इलेक्ट्रानिक चैनल दिल्ली में मीनाक्षी मर्डर केस के संदर्भ में दिनभर चिल्लाता रहा कि 'कौन बचायेगा दिल्ली कोÓ? -शायद उन्हें नहीं मालूम कि अकेली दिल्ली नहीं पूरा देश यह पूछ रहा है कि कौन बचायेगा देश को? हर जगह न स्त्री सुरक्षित हैं और न पुरुष और न ही बच्चे. मीडिया में होने के कारण हम भी यही सवाल करते हैं कि कौन बचायेगा हमें? देश के करोड़ों सामान्य लोगों की जिंदगी आज सड़क पर कभी भी लाश में बदल सकती है. घर से निकलने वाला हर आदमी असुरक्षित है. वह सुरक्षित घर लौट आये तो भाग्यशाली वरना उसका दुर्भाग्य! मीनाक्षी, निर्भया और भी कई अन्य तो एक बार में इस दुनिया की बुराई से छुटकारा पाकर चली गईं लेकिन अन्य जीवितों के सामने आज भी प्रश्न बना हुआ है कि उनके सुरक्षा की क्या गारंटी?. सड़क, गली-कूचे पर होने वाली हर गंभीर घटना आम लोगों के लिये आज सिर्फ एक तमाशा बनकर रह गया है, इस तमाशे को देखने वालों में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो गुण्डे, मवालियों से शक्तिशाली व प्रभावशाली होते हैं किन्तु उन्हें भी उनका भविष्य मन को मसोसकर रखने मजबूर कर देता है. चूंकि आगे उनके सामने भी इससे बड़ी मुसीबतें हैं जिनका सामना करने में शायद वह सक्षम न हो. इससे खामोश रहने में ही वह अपनी भलाई समझता है. मीनाक्षी नामक दिल्ली की लड़की को दो गुण्डे भाइयों ने चाकू से 32 बार गोद-गोदकर मार डाला. इसे देखने वाला पूरा मोहल्ला था- इसमें उन गुण्डों से शक्तिशाली भी थे, युवा भी थे और बुुजुर्ग भी थे जो शायद इसलिये आगे नहीं आये कि चूंकि यह प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त गुण्डे पुलिस की पकड़ में नहीं आये तो उनके दुश्मन बन जायेंगे. दूसरा अगर पुलिस को बयान दिया तो वे खुद परेशानी में पड़ जायेंगे, इसके बावजूद कुछ महिलाएं कैमरे के सामने आकर बोलीं- उनकी हिम्मत को दाद देना चाहिये. ऐसे मामलों में प्राय: लोगों का नजरिया एक जैसा है. मदद सब करना चाहते हैं किन्तु दूसरा काम छोड़कर गवाही के लिये अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, यह विचार आते ही अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाते हैं. असल बात तो यह है कि मानवता के नाते हर कोई मदद करना चाहता है लेकिन ऐसे प्राय: सभी मामलों में लोग हाथ बांधकर तमाशबीन रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. सामूहिक विरोध कर ऐसे किसी व्यक्ति की पीटने से मौत हो जाये तो भी पुलिस और कानून उन्हें नहीं बख्शता. उल्टे उन्हें ही अपने किये पर दण्ड भोगना पड़ता है. ऐसे कई मामले हुए हैं और होते रहते हैं जिसमें किसी गुण्डे या अपराधी को पीटने वालों को ही पुलिस ने अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया. अपराधियों के अदालतो से छूटने पर क्या गारंटी की  गवाही देने वाला या उसका परिवार खुले में सांस ले सकेगा? ऐसे में कौन किसकी मदद करेगा? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घायलों की मदद कर उन्हे पहुंचाने वाले को कानून के दायरे से बाहर रखने के आदेश के बावजूद कानून पसंद लोग पूर्व के अनुभवों से इतना डरे हुए हैं कि वह किसी घायल को आज भी अस्पताल पहुंचाने से डरते हैं.

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कानून से कौन डरता है? नेता छात्रावास निरीक्षण के लिये पहुंचे, लड़कियों को देख मन डोल गया!

कानून से कौन डरता है? नेता छात्रावास
निरीक्षण के लिये पहुंचे,
लड़कियों को देख मन डोल गया!

महिला छात्रावास फिर सुर्खियों में है, इस बार बारी आई है छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के पाली गांव के आदिवासी छात्रावास की! जहां स्थानीय नेताओं के एक आठ सदस्यीय दल ने अनधिकृत रूप से प्रवेश किया और वहां मौजूद कम से कम दस छात्राओं से यौन दुर्व्यवहार किया. एक पन्द्रह साल की छात्रा ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि दल का नेता घनराज उसके कमरे में घुस आया और उसे अपनी ओर खींचकर गलत हरकतें करने लगा. हालांकि कोरबा पुलिस अधीक्षक के हवाले से जो खबर आई है उसमें इस घटना में लिप्त प्रमुख आरोपी घनराज सहित पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि अन्य फरार हैं, उनकी  तलाश की जा रही है. यह घटना इस सप्ताह के शुरू में मंगलवार  को तब की बताई जाती है जब पाली के सरकारी आदिवासी छात्रावास में उस समय हॉस्टल निरीक्षण के नाम पर यह तत्व जबर्दस्ती घुस गये. उस समय छात्रावास अधीक्षिका बाहर गई हुई थी. शिकायत के अनुसार जिला पंचायत उपाध्यक्ष अजय जायसवाल, जनपद अध्यक्ष घनराज सिंह कंवर, पाली कांग्रेस विधायक का प्रतिनिधि शंकर दास महंत और उनके साथी रसिया सिंह, दिनेश राठौर और दो अन्य जबर्दस्ती छात्राओं के कमरे में घुसे और उन्होंने छात्राओं के साथ जोर जबर्दस्ती की तथा यौन प्रताड़ना दी. पन्द्रह वर्षीय छात्रा से बदतमीजी के बाद बताया गया कि उसे मुंह बंद रखने के लिये हाथ में सौ रुपये का नोट भी थमाया. जब जनता के प्रतिनिधि ही इस ढंग की हरकतों पर उतर जाये तो इसका क्या इलाज है?. हालांकि शिकायत के बाद त्वरित कार्रवाही  पुलिस की ओर से  की गई. जिला पुलिस अधीक्षक अमरीश मिश्रा के निर्देश पर आरोपियों को तुरन्त गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है किन्तु राजनीतिक दलों के लिये यह एक गंभीर सवाल है कि क्या उन्हें अपने कार्यकर्ताओं पर नजर नहीं रखनी चाहिये. क्या उन्हें इसका अधिकार है कि वे किसी भी संस्था में निरीक्षण के नाम पर उस समय घुस जाये जब उसकी अधीक्षिका भी मौजूद नहीं थी. बताया जाता है कि अधीक्षिकों से फोन पर इन तत्वों ने छात्रावास निरीक्षण की बात कही थी, उसपर उन्होंने उनसे कहा भी था कि वे उस समय आये जब वे वहां उपस्थित हो लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी और उस समय छात्रावास में आ धमके जब अधीक्षिका मौजूद नहीं थी. अधीक्षिका को जब उनके पहुंचने और घुसने की खबर दी गई तो उन्होंने गार्डों को रोकने का आदेश दिया था लेकिन गार्ड ऐसे नेताओं के समक्ष बौने हो जाते हैं यह सर्वविदित है. गंभीर बात यह है कि छत्तीसगढ़ के छात्रावासों में विशेषकर महिला छात्रावासों में रह रही बच्चियां किसी भी ढंग से सुरक्षित नहीं हैं, उनके साथ यौन दुर्व्यवहार अब तक अंदर में समाये बैठे कतिपय दुराचारी किया करते थे, अब यह सिलसिला बाहरी छुटभैयों ने भी  शुरू कर दिया है. राजधानी रायपुर के नन

से बलात्कार का मामला अभी सुलझा नहीं है तब इस ढंग की एक और घटना ने संपूर्ण छत्तीसगढ़ की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर  गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है- सरकार ऐसे मामलों में कितनी गंभीर है, यह तो पता नहीं लेकिन अब तक हुई घटनाओं से तो ऐसा लगता है कि सरकार ऐसे मामलों को गंभीरता से नहीं ले रही. 

बुधवार, 15 जुलाई 2015

क्या हम कभी ट्रेन लेट न होने का जापानी रिकार्ड इक्यावन सेक ण्ड तोड़ पायेंगे?



इसमें दो मत नहीं कि हमारी रेलवे ने पिछले वर्षों में बहुत प्रगति की है लेकिन क्या आम आदमी इस प्रगति और उसकी सेवाओं से संतुष्ट है? क्या हम जापान या किसी अन्य बड़े देश की तरह या अपने हवाईअड्डों की तरह ट्रेन सुविधा उपलब्ध करा पायेंगे? क्या हमारी ट्रेनें वक्त पर आवाजाही करेंगी? क्या ट्रेनें और रेलवे स्टेशन कभी साफ सुथरे होंगे? क्या हमारी पटरियों पर ट्रेनें जापान की बुलेट ट्रेनों की तरह स्पीड़ से दौड़ती नजर आयेंगी? क्या इसे उपयोग करने वाले साफ सुथरे रेलवे स्टेशनों को उसी तरह रहने देेंंगे जैसे विदेशों में लोग रखते हैं? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब हम वर्षों से खोज रहे हैं लेकिन दूर-दूर तक हमें कहीं इसका जवाब नहीं मिल रहा. यह सही है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता  में आने के बाद रेल को आधुनिकता की ओर ले जाने का कुछ प्रयास जरूर हुआ लेकिन इसके साथ-साथ किराये में बढ़ोत्तरी, टिकिट व्यवस्था में फेरबदल भी हुआ. कुछ और नई टे्रनों को पटरियों पर उतारा भी किन्तु हम अपने सपनों की ट्रेन अब तक नहीं देख सकें. ट्रेनें न समय पर चलती है. न उसमें सुरक्षा है, न स्वच्छता है. किसी डिब्बे में पानी है तो बिजली नहीं, खाने-पीने का पर्याप्त इंतजाम नहीं. यात्रियों का सामान चूहे कुतर डालते हैं. सफाई भी मनमर्जी अनुसार होती है. स्टेशनों में यात्रियों का जमावड़ा किसी  मेले जैसा लगता है, इसमें जो बलवान है वह गाड़ी पर चढ़ गया वरना देखते खड़े रह जाने के अलावा उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं. इन परिस्थितियों में हमारे सामान्य दर्जे की बोगियों में आज भी यात्री ठूंस-ठूसकर भरे जाते हैं. लोकल ट्रेनों की कमी  के कारण लंबी दूरी की ट्रेनों में ज्यादा संख्या में यात्री ठूंस-ठूसकर भरे जाते हैं. कुछ तो आज भी टायलटों में सफर करने मजबूर हैं- ऐसे  हालात में बुलेट ट्रेन का सपना तो दूर वर्तमान में जो ट्रेनें चल रही हैं उनकी साफ-सफाई, समय पर परिचालन, सुरक्षा सब दिवा स्वप्र है. अगर हम जापान की तुलना करें तो ऐसा लगता है कि कहां स्वर्गीय यात्रा और कहां यहां की नरकीय यात्रा? जापान जहां  के मॉडल पर हम अपनी रेल सेवा के परिचालन का दावा करते हैं उसका आक लन करें तो हमारा सपना यूं ही बिखरता नजर आता है. वहां किसी स्टेशन पर अगर कोई ट्रेन  9 बजकर 25 मिनट पर करीब पांच सौ किलोमीटर का सफर कर अपने आखिरी स्टेशन पर पहुंचती है तो उसके प्लेटफार्म पर रुकने और यात्रियों के चढ़ने उतरने के बारह मिनट में ही वापस चली जाती है, उस दौरान सफाई, स्टाफ चेंज, टेक्निकल जांच सब कुछ हो जाता है. 17 बोगियों वाली ट्रेन जो 200 किलोमीटर प्रतिघंटा से चलती है उसे 12 मिनट में तैयार कर वापस भेज देना क्या हम अपने देश में संभव बना सकते हैं? जापान में बुलेट ट्रेन की रफ्तार ही तीर जैसी होती है, इससे जुड़ी हर बात, हर चीज तीर या बंदूक की गोली जैसी होती है ..जैसे कोई ट्रेन 9 बजकर 32 मिनट पर आती है तो 9-44 मिनट पर वापस रवाना कर दिया जाता है. पहला दो ढ़ाई मिनट सवार यात्रियों के उतरने में गुजर जाता है वहीं कोई भी यात्री बाहर आता उससे पहले एक महिला पॉलिथिन बैग लेकर गेट पर खड़ी हो जाती  है. लोग उसमें अखबार...खाली बॉटल जैसी चीजों को डालते हुए निकल जाते हैं. इसके बाद ट्रेन के हर एक बोगी में सफाईकर्मी दाखिल होते हंै. इन बागियों में 65 से लेकर 100 सीटें हो सकती हैं. एक-एक सीट की सफाई, फर्श की सफाई, उपरी रैक का निरीक्षण होता है फिर सामने के ट्रे की सफाई होती है ..उसके बाद सारे सफाईकर्मी बाहर निकलते हैं...और इंतजार कर रहे यात्रियों को झुककर धन्यवाद देकर चल पड़ते हैं अगली ट्रेन की सफाई के लिए. 12 मिनट के समय में इतना कुछ क्या हमारी ट्रेनों में इसे संभव बनाया जा सकता है? सफाई  का लोग कितना ख्याल रखते हैं इसका उदाहरण यह है कि कचरा उस समय पर अपने साथ रखते हैं जब तक कि उन्हें वेस्ट बॉक्स नहीं मिल जाता. सात मिनट में पूरी की पूरी ट्रेन साफ. और इस ट्रेन को साफ करने वालों में ज्यादातर महिलायें जिनकी औसत उम्र 52 साल और इस तरह से बरसों से टोक्यो के स्टेशन ही नहीं जापान के सभी स्टेशनों पर काम हो रहा है, फिर भी हम कुछ नहीं सीख पाये. हमारे नेतागण कई बार जापान का दौरा कर आये कुछ सीखा? दिलचस्प बात तो यह है कि रोज जापान में 800 से ज्यादा तेज गति की बुलेट ट्रेन चलती है पर लेट होने का औसत समय 1 मिनट से भी कम  है . एक और दिलचस्प बात यह कि जापान में पचास सालों से गोली की गति से चलने वाली ट्रेनें कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई चूंकि वे समय का पूरा ख्याल रखती है. ट्रेन लेट होने का औसत समय 51 सेकण्ड है जो विश्व रिकार्ड है, जबकि यहां एक दुर्घटना सिर्फ इसलिये हुई थी कि ट्रेन नब्बे सेकण्ड विलम्ब से चल रही थी और उसका ड्रायवर टेंशन में आ गया था. हमारी सरकार की मंशा बुलेट ट्रेन चलाने की है लेकिन उसे पहले कुछ विशेषताओं को अंगीकार करना होगा.
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अब तक तीन! सरकारी विभागों में घोटालों को दबाने का नया खेल,


अब तक तीन! सरकारी
विभागों में घोटालों
को दबाने का नया खेल,
'आग लगा दो, सबूत नष्ट कर दोÓ- घपले, घोटालेबाजों की छत्तीसगढ़ में यह कोई नई परंपरा नहीं है,कई सालों से ऐसा होता आया है, इससे पूर्व रायपुर के राजकुमार कालेज के सामने जब  आरटीओ दफतर था, उसे भी आग के हवाले किया जा चुका है लेकिन इस एक वर्ष दौरान तीन घटनाओं ने तो एक नया रिकार्ड कायम किया है.मलाई से भरपूर विभागों में एक के बाद एक अग्रिकांड से प्रशासनिक हलकों में तहलका मचना स्वाभाविक है साथ ही अब विभागों में कार्यरत कतिपय कर्मचारियों के चरित्र पर भी संदेह की परत चढ़ गई है. सिंचाई विभाग के जिस कमरे में आग लगी थी उसमें कई सालों का रिकार्ड जमा था जो जल गया या जलाकर राख कर दिया गया. आग लगने के लिये सीधे-सीधे शार्ट सर्किट को जिम्मेंदार बताकर अधिकारी व कर्मचारी अपना पल्ला झाड़ लेते हैं. कोई जवाबदारी लेने को तैयार नहीं.सिंचाई विभाग में आग कैसे लगी, इसमें कौन लोग मिले हुए हैं इसकी जांच चल ही रही थी कि डायवर्सन विभाग में आग लग गई. और इसकी आग ठंड भी नहीं हुई कि संस्कृति विभाग आग की चपेट में आ गया .यहां शक की सुई कैशियर डिपार्टमेंट के बाबू पर टिकी हुई है जो यहां देर रात तक कार्य करते मिला जबकि इस दफतर में तैनात चौकीदार के अनुसार बाबू देर रात तक आफिस में था और फाइले टटोल रहा था, उसके आफिस से निकलने के बाद ही धुआं उठा और आग लग गई.एक साधारण आदमी भी बता सकता है कि सरकारी दफतरों में होने वाली आगजनी की घटनाओं में कथित रूप से संबन्धित लोग ही इनवोल्व रहते हैं फिर भी अब तक ऐसा कोई मामला उजागर नहीं हुआ जिसमें किसी पर कार्यवाही हुई हो. संस्कृति विभाग में लगी आग में 2010 से 2014 के बीच की सारी फाइलों के जलने की संभावना व्यक्त की गई अर्थात इस दौरान जो भी फाइले जमा की गई थी वे सब स्वाहा हो गई. घपले घोटालों का अंतिम संस्कार कर दिया गया. आगजनी की घटनाओं के बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्जर् होती है विभागीय जांच होती है किन्तु आज तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया जिसमें किसी विभागीय कर्मचारी को आगजनी के आरोप में सजा दी गई हो.आग की आंच जैसे ही ठण्डी होती है दूसरा मामला सामने आ जाता है. सरकारी विाभागों को अपनी गोपनीय फाइलों को रखने की पृथक व्यवस्था करनी होगी साथ ही ऐसे कुछ कर्मचारियों की गतिविधियों पर भी निगाह रखनी होगी तभी इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सकती है वरना अग्रिकांड के लिये गठित जांच कमेेटियों का दायरा इतना बढ़ जायेगा कि उनके लिये एक अलग से विभाग बनाना पड़ेगा.


सोमवार, 13 जुलाई 2015

पीड़ित को न्याय में गवाह की मौत कितनी बाधक?- साक्षियों की मृत्यु ने कई मामलों को उलझाया!


गवाह की मौत मुकदमा खत्म? कानून की किताब में यह लिखा है या नहीं हम नहीं जानते लेकिन एक सामान्य नागरिक के नाते यह एक अनसुलझा सवाल है की क्या गवाह की मौत के बाद पीड़ित को न्याय मिल सकेगा या नहीं! दो तीन गवाहों  में  से एक की मौत के बाद तो यह माना जा सकता है कि पीड़ित को न्याय मिलने की संभावना है लेकिन जब सारे साक्ष्य व गवाह ही खत्म हो जाये तो इसका विकल्प क्या है? ऐसा प्रावधान जरूर है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अपराधी को सजा दी जाये लेकिन सवाल यह भी है की क्या न्यायालयों मेंं लंबित मुकदमें गवाह बिना चल ही नहीं सकते? इस स्थिति के चलते कई पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता? कानून में यह प्रावधान तो है कि मृतक के रिश्तेदार की गवाही को अदालत मान्य कर सकती है लेकिन कई बार रिश्तेदारों की गवाही भी काम नहीं आती. गवाहों को किसी प्रकार की सुरक्षा नहीं मिलती.कुछ खास मामलों में ही सुरक्षा दी जाती है. सही भी है कितने लोगों को सुरक्षा देंगे? हमारे देश का कानून साक्ष्य पर आधारित है, इसलिए भी यह सवाल उठ खड़ा है कि देश में एक बड़ा घोटाला हुआ जिसमें एक-एक कर कई साक्ष्यों ने मुकदमा शुरू होने के पूर्व ही दम तोड़ दिया.कानून अनुसार जब साक्ष्य ही मौजूद नहीं है तो मुकदमा काहे का? ऐसे में पीड़ित क्या न्याय प्राप्त कर सकेगा? दूसरा महत्वपूर्ण मामला एक हाई प्रोफाइल संत का है जो पिछले कुछ सालों से अपने ऊपर लगाये गये दुष्कर्म का मुकदमा झेल रहा है. इस मामले के भी  कई गवाहों की हत्या हो गई है. साक्ष्य के अभाव में इस मामले में पीड़ितों को न्याय मिलेगा या नहीं यह अब संदिग्ध होता जा रहा है.घटनाओंं पर पूर्ण निगाह रखने वाले विशेषज्ञ भी सोचने के लिये मजबूर है कि आखिर ऐसी स्थिति में क्या होगा? कानून के विशेषज्ञों के पास ऐसी स्थिति का जरूर कोई तोड़ हो सकता है लेकिन ऐसी स्थिति पैदा होने के कारण हमारी न्याय व्यवस्था, जिस पर अभी भी लोगों का विश्वास है पर से विश्वास उठने की स्थिति भी पैदा हो रही है. वैसे कोई घटना होने के बाद गवाह या प्रत्यक्ष साक्षी के बयान को मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराने का प्रावधान है लेकिन सभी मामलों में तो यह नहीं हो पाता. दूसरी बात यह कि मजिस्ट्रेट के समक्ष अगर बयान दर्ज हो भी जाता है तो उस बयान को कोर्ट कितना मान्य करता है? अपराध जगत में नई संस्कृति विकासित हो चुकी है.'सफेदपोश रहो, जुर्म करों, गवाह को उड़ा दो  मामला अपने आप खत्म.Ó अपराधी फिर से सफेद पोश होकर अपराध का सिलसिला शुरू करता है-कई अपराधी तो अपराध करने के बाद सारे सबूत मिटाकर चलते हैं-रायपुर के मिशन नन से दुष्कर्म मामले में कोई साक्ष्य ही नहीं मिला ऐसे में किसी को पकड़कर न्यायालय में पेश भी किया जाता है तो क्या सबूत? पीड़ित को न्याय मिलना ही मुश्किल है-ऐसे बहुत से सवालों से

आज हमारा कानून गुजर रहा है कई कठिनाइयां बीच-बीच  में संशोधनों से हल हो जाती है लेकिन हाल ही मामलो में गवाहों की मौत और हत्या ने संपूर्ण न्याय- व्यवस्था को चुनौती दे डाली है.

कानून इतना ढीला क्यों? संगीन जुर्म के अपराधियों को फरार होने का मौका कैसे मिलता है?



उरला रबर आयल फैक्ट्री में शुक्रवार को हुए ब्लास्ट में फैक्ट्री मालिक पर तत्काल कार्रवाही न होने को लेकर हमारे कानून की खामियां फिर उजागर हुई है. ऐसी घटना किसी गरीब या मध्यम वर्ग का व्यक्ति करता तो शायद उसे तत्काल गर्दन पकड़कर  सीखंचों के पीछे भेज दिया जाता. इतना ही नहीं उसे पीट-पीटकर चलने-फिरने लायक भी रहने नहीं दिया जाता. उरला में घटना पिछले शुक्रवार को हुई थी जिसमें तीन मजदूर जिंदा जल गये. फैक्ट्री बिना सरकारी नियमों का पालन करे चल रही थी तथा इसका संचालक बालेन्द्र उपाध्याय घटना के बाद कानून से बचने के लिये राज्य छोड़कर भाग गया. सवाल यहां यह उठता है कि कानून की नजरें क्यों इतनी कमजोर है कि वह अपराधियों पर निगाह भी नहीं रख सकती? जब मालूम था कि उसे इस व्यक्ति को आज नहीं तो कल इस मामले में गिरफ्तार  करना ही है तब घटना के बाद से उसपर निगरानी  क्यों नहीं रखी गई? यह तो ऐसा लगता है कि सरासर उसे भागने का मौका दिया गया? यह पहला अवसर नहीं है जब ऐसे मामलों में पुलिस का कथित  चेहरा नजर आ रहा है. घटना के बाद अपराधी पुलिस के सामने से जादुई तरीके से फरार हो जाते हैं और पुलिस आंख मलती रह जाती है. अकेले यह छत्तीसगढ़ पुलिस की बात नहीं है, देशभर में कई ऐसे हाई प्रोफाइल मामले हुए हैं जिसमें अपराधियों को भागने का मौका दिया गया है. एक संत आसाराम के पुत्र नारायण साईं को कथित अपराध के बाद ढूंढ निकालने के लिये सरकार के खजाने से लाखों रुपये खर्च किये गये. ऐसा इसलिये भी होता है ताकि अपराधी अदालतों में जाकर अपनी गिरफ्तारी पूर्व ही जमानत ले ले. कुछ मामले तो साफ है कि पुलिस
खुद ऐसा मौका देती है. शुक्रवार को रायपुर के उरला क्षेत्र में हुई इस गंभीर घटना के बाद पुलिस ने अपनी जांच प्रक्रिया पूरी कर अब जाकर मालिक के घर की चौकसी करना शुरू किया है जबकि यह काम तत्काल भी किया जा सकता था ताकि वह निकलकर भाग न जाये. अब उसके घरवालों को सताने का काम शुरू होगा, उसके बाद पुुलिस को  उसके संदिग्ध ठिकानों की जानकारी मिलेगी तब कुछ पुलिसवालों का दौरा कार्यक्रम बनेगा जिसपर सरकारी कोष से काफी पैसा खर्च होगा जो शायद उस पीड़ित परिवार को मिलने वाले मुआवजे से भी कहीं ज्यादा होगा. अपराधी को पकड़कर लाते तक मामला ठण्डा हो जायेगा, फिर सौदेबाजी होगी. यह सब करने की स्थिति क्यों आती है? क्योंकि हमारा कानून अपराधियों के मामले में बहुत कमजोर है. जब सभी को मालूम है कि घटना के लिये कौन जिम्मेदार है फिर उसे फरार होने का मौका क्यों दिया जाता है? रायपुर में उद्योग तो बहुत लगे लेकिन उनमें कर्मचारियों की सुरक्षा पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. इससे पूर्व भी यहां ऐसी वीभत्स घटनाएं होती रही हैं और हो रही है किन्तु छत्तीसगढ़ शासन के श्रम विभाग की खामोशी से ऐसे संयत्र चलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और मनमाना तरीके से श्रमिकों से काम लिया जाता है और लापरवाही से लोगों की  जान जाती है.

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

एटीएम, ई-बैंकिंग मशीनों से लूटपाट! आखिर जनता के पैसे की यूं बरबादी के लिये कौन जिम्मेदार?




ई-बैंकिंग शुरू होने के बाद ग्राहकों को बड़ी राहत मिली, उन्हें भीड़ भरे माहौल में पैसे जमा कराने, निकालने न अब लाइन लगाना पड़ता है और न बैंक खुलने-बंद होने का इंतजार करना पड़ता है लेकिन लगता है अब इस पर भी ग्रहण लग गया है, कहीं एटीएम को तोड़कर पैसे निकाले जा रहे हैं तो कहीं एटीएम लगे हैं किन्तु उसमें से पैसे नहीं निकलते. कई बड़े बैंकों विशेषकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एटीएम सेंटर में प्राय: एटीएम व ई-बैंकिंग मशीनों के काम नहीं करने का बोर्ड टंगा रहता है. अगर बैंक बंद होने के बाद एटीएम मशीन में खराबी आ गई तो उसे सुधारने में भी काफी वक्त लग जाता है. एटीएम मशीनों की सुरक्षा कितनी है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि अकलतरा शहर में लगे सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एटीएम मशीन से चोरों ने चौबीस लाख से ज्यादा की रकम पार कर दी. दिलचस्प तथ्य तो यह कि एटीएम पर चोर हाथ साफ कर गये यह बैंक अधिकारियों को उस समय पता चला जब ग्राहकों ने बैंक अधिकारियों को एटीएम से पैसा नहीं निकलने की शिकायत की, इसके बाद छानबीन हुई तो वे पहले तो यही समझ नहीं सके कि आखिर बैंक से पैसा क्यों नहीं निकल रहा. आगे जांच में पता चला कि पीछे से वायर काट दिये गयेे और बड़े तरीके से एटीएम को काटकर माल पार कर दिया गया. छत्तीसगढ़ में यह पहला अवसर नहीं है जब एटीएम तोड़कर पैसा निकालने की वारदात हुई, इससे पूर्व कई बार ऐसा हो चुका है जिनमें से बहुतों के बारे में तो अब तक पता ही नहीं चला कि इसके लिये कौन जिम्मेदार है. अकेले रायपुर के स्टेट बैंक के एटीएम्स में कई बार वारदात हो चुकी है किन्तु कहीं भी सुरक्षा के  पुख्ता इंतजाम नहीं हैं. हर बार एटीएम की सुरक्षा पर सवाल उठता है. मामला ठंडा होता है तो उस पर कोई सोचता ही नहीं.  असामाजिक तत्व एटीएम में घुसकर उसे गंदा तो करते ही हैं साथ ही चोरी करने की योजना भी तैयार कर लेते हैं. बंगलोर के एक एटीएम में पैसा निकालते समय एक महिला को उसी में बंद कर उस पर प्राणघातक प्रहार कर रुपये छीने गये थे. इस हादसे की  खबर पूरे देश में बैंक के अधिकारियों को है इसके बाद भी एटीएम जिसमें लोगों का अरबों रुपये रखा रहता है सुरक्षित नहीं है. अधिकांश एटीएम में न गार्ड हैं न सीसीटीवी कार्य करते हैं. एटीएम व पैसा तो सुरक्षित नहीं है पैसा निकालने, जमा करने वाला ग्राहक भी सुरक्षित नहीं है. जनता के जमा पैसे से अरबों रुपये कमाने वाले बैंक लोगों व अपनी प्रापर्टी व अपने ग्राहकों को सुरक्षा देने के मामले में तो ढीला है ही नई तकनीक और नई सुविधाएं प्रदान करने में भी व्यापक कंजूसी बरतता है. एटीएम मशीनों के साथ ई-बैंकिंग मशीनें लगाने में भारी कंजूसी हो रही है. राष्ट्रीयकृत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने नगर के गिने-चुने क्षेत्रों में यह सुविधा दी है लेकिन वह भी पूरी तरह चौबीस घंटे चालू नहीं रहती. जमा करने वाली मशीनों
में अब वैसी ही भीड़ लगने लगी है जैसे बैंकों में लगा करती थी. अत: अब जरूरी हो गया है कि यह सेवा जगह-जगह एटीएम मशीनों के साथ ही दी जाये.

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

भ्रष्टों को सेवा से बर्खास्त करने में देरी क्यों? नये को मौका मिलना चाहिये!


एक अरब पच्चीस करोड़ की आबादी में सरकारी कर्मचारियों की संख्या आबादी के प्रतिशत से बहुत कम है, इनमें से अधिकांश जहां अपनी ईमानदारी से काम करते हैं किन्तु उनमें से बहुतों पर घूसखोरी, अनुपातहीन संपत्ति रखने, शराब पीकर कार्यालय आने, दुर्व्यवहार, यौन प्रताड़ना जैसे आरोप हंै लेकिन सरकार की ऐसे मामलों में कार्रवाई इतनी ढीली है कि ऐसे लोग अपने पदों पर बने रहते हैं जिससे नये और उत्साही लोगों को मौका नहीं मिलता. आजादी के बाद से अब तक यह सिलसिला चला आ रहा है. किसी भी पार्टी की सरकार ने इस मुद्दे पर कोई कदम नहीं उठाया. सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि सरकारी तंत्र को चलाने वाले राजनीतिज्ञ भी जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप होते हैं वे भी पद छोड़ने के लिये तैयार नहीं होते, या तो वे खुद अपने आपको ईमानदार समझते हैं या फिर उन्हें सरकार में बैठे लोगों का ही संरक्षण प्राप्त रहता है. अब व्यापम घोटाले में गंभीर आरोपों से लिप्त एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का ही उदाहरण लीजिये- कुर्सी से ऐसे चिपके हुए हैं कि हटने का नाम ही नहीं ले रहे. जब सरकारी तंत्र का बड़ा हिस्सा ही इस प्रकार का अड़ियल रूख अख्तियार करता है और सरकारी तंत्र खामोश रहता है तो बाकी लोगों की क्या कहें? लेकिन सरकारी नौकरशाही से भ्रष्टाचार को तुरन्त खत्म किया जा सकता है, इसके लिये यह जरूरी है कि सरकार एक आदमी जो भ्रष्टाचार व अन्य बुराइयों में लिप्त है उसी को सब कुछ न माने, दूसरे को मौका देने की नीति अपनाएं. लाखों नये बेरोजगारों को इससे नौकरी मिलेगी. सरकारी नौकरी में लगाने से पहले यह जरूरी है कि उनपर ऐसी व्यवस्था लागू की जाये कि अगर वे किसी भी भ्रष्टाचार या अन्य किसी गलत कार्य में लिप्त पाये जाते हैं तो उनकी सेवा तत्काल समाप्त कर दूसरे व्यक्ति को मौका दिया जाये. देश में ऐसे एक नहीं करोड़ों लोग आज नौकरी के लिये भटक रहे हैं. देश की जड़ को हिलाकर रख देने वाला भ्रष्टाचार इस समय अधिक पनप रहा है, उसे खत्म करने के लिये जरूरी है कि सेवा में रहते या नई सेवा में आते समय दोनों ही स्थिति में उनसे वचन लिया जाये कि अगर वे कुछ गड़बड़ करते पकड़े जाते हैं तो उन्हें अपनी सेवा से तत्काल हाथ धोना पड़ेगा और उनकी जगह नये व्यक्ति को मौका दिया जायेगा, साथ ही उनकी अवैध कमाई पर मुकदमा भी चलेगा तथा अनुपातहीन संपत्ति को भी जप्त किया जायेगा. इसी प्रकार सेवा में रहते अपने सहयोगी से यौन प्रताड़ना का भी कोई मामला अगर सामने आता है तो ऐसे व्यक्ति को भी सेवा में रहने का कोई अधिकार नहीं रह जाता. यह बात भी समझ में नहीं आता कि गंभीर से गंभीर आरोप लगने के बाद भी किसी एक व्यक्ति को महिमामंडित कर सेवा में रहने क्यों दिया जाता है? तत्काल नौकरी से बर्खास्त करो. यह नीति जब तक अस्तित्व में नहीं आयेगी तब तक इस बात की संभावना कम ही है कि भ्रष्टाचार व यौन प्रताड़ना जैसे मामलों पर रोक लगेगी.

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

जब ऊपरी लेवल पर ही नैतिकता, जिम्मेंदारी खत्म हो रही है तब आगे तो खाई ही खाई है!



जी हां नैतिकता, जिम्मेंदारी,संस्कृति, परंपराएं यह सब अब जिम्मेंदार और सत्ता में बैठे लोगों की डिक्शनरी से गायब हो चुके हैं.कुर्सी और सत्ता में चिपके रहने पर ही लोग अपनी भलाई समझने लगे हैं चाहे वह बड़े से बड़ा घोटाला हो, भीषण प्लेन दुर्घटना हो या ट्रेन दुर्घटना अथवा किसी अबला पर सामूहिक दुष्कर्म, किसी को कोई फरक नहीं पड़ता.असल में नैतिकता का पाठ जिन्हें सिखाना है वे स्वयं जब कुर्सी छोड़ने के लिये तैयार न हो तो हम किसी छोटे- बड़े को दोष क्यों दें? बड़े से बड़े घोटाले आज प्रकाश में आ रहे हैं.नौकरशाह और संबन्धित मंत्रीगण लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाकर एक  दूसरे पर  जिम्मेंदारी थोपकर अपनी गर्दन बचाने की फिराक में हैं कोई नैतिकता का नाम लेकर के न पद छोड़ता है और न ही जिम्मेंदारी लेता है. छत्तीसगढ़ में नान घोटाला हो या मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला किसी बड़े अधिकारी और संबन्धित मंत्री ने न कभी अपनी नैतिक जिम्मंदारी ली और न ही पद छोड़कर एक उदाहरण पेश करने का साहस किया. ऐसे में सारी व्यवस्था में बैठे लोग आम जनता, जिनके लिये वे काम करते हैं विश्वास खोने लगे हैं. यह स्थिति पूर्व में यूपीए सरकार के समय भी थी और अब  एनडीए सरकार का भी यही हाल है.यूपीए के शासन काल में भ्रष्टाचार, जिसमें स्पेक्ट्रम, कोलगेट जैसे गंभीर मामलों पर पूरी सरकार में से कोई भी ऐसा सामने नहीं आया जिसने नैतिकता के नाम से अपने पद से इस्तीफा दिया हो जबकि कांग्रेेस और पुरानी एनडीए सरकार के समय कई ऐसे उदाहरण थे जिसमें एक बड़ा मामला अगर सामने आ जाता तो संबन्धित मंत्री कुर्सी छोड़कर घर बैठ जाते थे.लालबहादुर शास्त्री, ललित नारायण मिश्र, माधव राव सिंधिया,अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे उस समय के मंत्रियों को लोग आज भी याद करते हैं जिन्होंने रेल दुर्घटनाओं और घोटालों की जिम्मेंदारी अपने ऊपर लेते हुुए पदत्याग किया.अटल बिहारी का गुजरात मामले पर राजधर्म की सीख को भी लोग भूल गये जबकि हवाला मामले में लालकृष्ण आडवाणी  ने उस समय  पद पर रहना उचित नहीं समझा था जब तक उनके ऊपर से यह दाग नहीं मिटा. इधर एनडीए को सत्ता में आये अभी एक साल ही हुए हंै कि कई घपले,घोटाले, रेल दुर्घटनाएं, हवाई दुर्घटनाएं, अन्य बड़े बड़े हादसे हो गये किसी को कोई फरक नहीं पड़ा.जनता स्वयं यह महसूस करने लगी है कि सारी गड़बड़ियों का घड़ा अभी से भरने लगा है तो आगे क्या होगा? सबसे बड़ी बात तो यह है कि शीर्ष में बैठे लोग आंख मूंदकर सारी गड़बडियों को देख रहे हैं और उन्हें आगे और गड़बडियां करने का मौका दे रेहे हैं. मध्यप्रदेश में व्यापम, महाराष्ट्र में भू खरीदी छत्तीसगढ़ में नान घोटाला,केन्द्र में ललित मोदी विवाद, शिक्षा मंत्री की फर्जी डिग्री ,राजस्थान की मुख्यमंत्री बसुन्धरा राजे और

केन्द्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का कथित रूप से ललित गेट में इन्वोलमेंट यह सब कुछ ऐसे मामले हैं जो जनता की नजरों में न केवल है बल्कि इस पर घरों में तक बहस हो रही है.व्यापम घोटाले में रोज एक के बाद एक कथित रूप से शामिल लोगों की मौत का गंभीर रहस्य छाए होने के बाद भी इस पर जो टिप्पणियां शासन पक्ष के लोगों की तरफ से आ रही है वह न केवल चिंतनीय है बल्कि गंभीर भी है. इन सब पर शीर्ष स्तर में बैठी कमान की खामोशी और निर्णय लेने की क्षमता में कमी के कारण देश की संपूर्ण व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का नामोनिशान मिटेगा? हवा और जमीनी लड़ाई दोनों की बू!



क्या छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का सदा-सदा के लिये अंत होगा? बस्तर के घने जंगलों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक तो  कुछ ऐसा ही लग रहा है कि सरकार इस मौसम में कुछ ऐसा ही करने जा रही है कि आगे आने वाले समय में ऐसी कोई समस्या ही नहीं रहे. केन्द्र व राज्य सरकार का कोई भी जिम्मेंदार व्यक्ति यह नहीं कहता कि नक्सलवाद को समाप्त करने के लिये सेना को उतारा जायेगा. जब सेना की बात आती है तो नक्सली भी घबरा जाते हैं चूंकि सेना के अभियान में कोई नहीं बचता.छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के उदय को कई दशक बीत गये.कई मुठभेड़ें हुई और कई मारे भी गये, इनमे सुरक्षा बलों के लोग भी शामिल हैं. सामान्य वर्ग भी शामिल है और नेता भी शामिल हैं. सुरक्षा बलों के हाथों कई नक्सली भी मारे गये हैं. बहरहाल इन वर्षों में नक्सलियों ने भारी तादात मेें राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, कई का गला काटा तो कइयों को गोली से भूना. निर्दोष लोगों के खून से बस्तर की धरती लाल होती रही है.अब जिस अभियान का जिक्र कुछ समय से चल रहा है उसमें मिलट्री तो नहीं शामिल हो रही है लेकिन जानकारों के अनुसार यह पूरा अभियान मिलट्री स्टाइल पर होने वाला है तथा सुरक्षा बलों के जवानों को इसकी पूरी ट्रेनिंग भी दी जा रही है,मसलन अब जो भी होगा वह मिलट्री स्टाइल में ही युद्व की तरह ही होगा और इसमें भारी तादात में खून खराबे से भी इंकार नहीं किया जा सकता? इस अभियान में लगने वाले जवानों को पूर्वोत्तर के किसी सैन्य प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षित किया जा रहा है जबकि यह अंदेशा है कि कथित अभियान में जमीनी लड़ाई के साथ-साथ हवाई लड़ाई भी हो सकती है.बस्तर इन वर्षों में नक्सलियों का गढ़ बन चुका है. बीहड़ से आकर वे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों से हिल मिल जाते हैं और यह पता भी नहीं चलता कि कौन नक्सली है और कौन सामान्य नागरिक. ऐसे में यह निश्चित है कि कोई भी अभियान चलता है तो गेहूं के साथ-साथ धुन के भी पिसने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.नक्सलियों ने पिछले वर्षों में अपने गढ़ को काफी मजबूत किया है, उनके पास आधुनिक शस्त्रास्त्र है तो असला और बारूद की भी कोई कमी नहीं है.जंगल में रहते हुए भी यह सब मिल जाता है तो इसका मतलब तो यही है कि उनके तार दूर- दूर तक जुड़े हैं यहां तक कि उन्हें राशन भी आसानी से  उपलब्ध होता रहता है. इतने बड़े नेटवर्क को तोड़ने के लिये कितना बड़ा अभियान चलाना होगा और कितने लोग मारे जायेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती  है. अभियान के बाद क्या छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का सदा- सदा के लिये अंत हो जायेगा यह भी एक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है. आज की स्थिति में पूरे नक्सलवाद का नेट वर्क देश के अनेक राज्यों से जुड़ा हुआ है आसपास के राज्यों से नक्सली आना-जाना करते हैं. ऐसे में

नक्सलियों के अभियान से पहले ही नक्सलियों के बड़े नेताओं के निकल भागने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता.बीच में यह भी खबर आई थी कि छत्तीसगढ़ के किसी  स्थान पर नक्सलियों के बड़े लीडर एकत्रित हुए थे- इससे इस अनुमान को भी बल मिलता है कि सरकार के साथ साथ नक्सली भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं ऐसे में यह संघर्ष एक छोटे से युद्व के रूप में तब्दील हो जाये तो आश्चर्य नहीं।

व्यापम से भी बड़ा रहस्य अब इसमें आरोपियों, गवाहों की मौत, संदिग्ध मौतों के पीछे आखिर कौन?




हम तंत्र-मंत्र पर विश्वास नहीं करते, इसमें कोई शक्ति है या नहीं यह भी हमें नहीं मालूम क्योंकि विश्व को ईश्वर नामक शक्ति ने बनाया है, उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं है. मेरा संपर्क एक वरिष्ठ तांत्रिक से हुआ था जिसने मुझे एक खास बात बताई कि तंत्र विद्या दो तरह की होती है, इसे बड़ी मुश्कि ल से प्राप्त किया जाता है, एक होती है 'पाकÓ और दूसरी 'नापाकÓ. उन्होंने कहा हम तो पाक करते हैं लेकिन जो लोग नापाक करते हैं वह इतने खतरनाक होते हैं कि मुम्बई में बैठकर रायपुर या दुनिया के किसी कोने में किसी को भी मार सकते हैं और लोग कहेंंगे कि उनकी मौत स्वाभाविक हार्ट अटैक से, दुर्घटना अथवा बीमारी से हुई या फिर लीवर फेल हो गया या और कुछ और. आज यह संदर्भ इसलिये भी निकला कि मध्यप्रदेश के देशव्यापी व्यापम घोटाले में कम से कम संदिग्ध पैतालीस मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर यह मौतें कैसे और क्यों हो रही है. इस पूरे प्रकरण में अधिकांश लोग युवा हैं जिनकी मौत पर कोई भरोसा भी नहीं कर सकता, आखिर यह कौन सी शक्ति है या कौन-सा प्रयोग है जो इस घोटाले  में लिप्त या गवाही देने वाले अथवा मध्यस्थ को एक-एक कर मारे जा रहा है? बहरहाल अब शिवराज सिंह ने फैसला कर लिया है कि इन मौतों के मामले पर सीबीआई जांच कराई जाये. व्यापम घोटाले की ताजातरीन घटना एक और संदिग्ध मौत है, व्यापम के जरिये भर्ती हुई ट्रेनी एसआई अनामिका कुशवाहा ने आज तालाब में कूदकर  आत्महत्या कर ली. चौबीस घंटे के अंदर तीसरी मौत ने इस मामले से जुड़े मृतकों की संख्या 44-45 के आसपास कर दी है. शनिवार  और रविवार को दो लोगों की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई  जिनमें जबलपुर मेडिकल कालेज के डीन दिल्ली के एक होटल में मृत पाये गये जबकि आज तक चैनल के खोजी पत्रकार अक्षय सिंह भी इस मामले की और खोज करते-करते एक अन्य मृतका के घर पर ही संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गये. डीन डा. शर्मा ने कुछ दिन पहले ही एसटीएफ को व्यापम घोटाले के बारे में दो सौ से ज्यादा जानकारियां सांैपी थी. मध्यप्रदेश प्रोफेशनल एक्सामिनेशन बोर्ड उर्फ मध्यप्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल उर्फ व्यापम में भारी अनियमितता की शिकायत सन् 2004 में सामने आई थी इसमें बड़े-बड़े अधिकारी नेताओं के शामिल होने का आरोप लगा, सरकार द्वारा बिठाई गई एसआईटी की जांच के बाद कई बड़े राजनीतिज्ञ नेता और अधिकारी चपेट में आये. मध्यप्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक इसकी आंच लगी. 2015 तक इस पूरे मामले में दो हजार से ज्यादा लोग गिरफ्तार किये गये. जांच के दौरान कई लोगों की मौत हुई जिसमें 25-26 के करीब लोगों की मौत तो प्राकृंितक न होकर एकदम संदिग्ध मानी गई जिसके बारे में खोजबीन में कोई तथ्य सामने नहीं आया. मौतों का सिलसिला 2009 को उस समय शुरू हुआ जब इस कांड से जुड़े एक मध्यस्थ विकास सिंह की दवा केे एडवर्स रियेक्शन से मौत हो गई फिर 2010 को एक अन्य मध्यस्थ श्यामवीर यादव की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. अंशुल सचिन, अनुज उके, ज्ञान सिंह, दीपक वर्मा सभी मध्यस्थ की मृत्यु 2010 में हुई. 2012 में नम्रता दामोर, आदित्य चौधरी, अनंतराम, अरविन्द साख्या, रिकंू, कांस्टेबल प्रमोद शर्मा की मौत हुई जबकि 2013 में कुलदीप मरावी, प्रेमलता पाण्डे, आशुतोष तिवारी, तरूण मच्चर, आनंद सिंह यादव, देवेन्द्र नागर की मौत हुई. इसी प्रकार 2014 में भी बंटी सिकरवार नामक मध्यस्थ ने भी आत्महत्या कर ली. 2015 शुरू होते ही मौत का सिलसिला जारी है, जनवरी में एक छात्र ललित गोलारिया का शव मुरेैना में पुल के नीचे मिला. जनवरी में ही छात्र रामेन्द्र सिंह भदोरिया भी मारा गया, अमित सागर, शैलेष यादव, विजय सिंह पटेल, नरेन्द्र सिंह तोमर, राजेन्द्र आर्या, अक्षय सिंह, अरूण कुमार ऐसे कितने ही नाम हंै जो इस घोटाले की एसआईटी पूछताछ के बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई. अभी जांच खत्म नहीं हुई हैै. इस पूरे मामले में किसी न किसी रूप से लिप्त लोगों में भय छाया हुआ है कि उनकी मौत कब हो जाये. कुछ ने तो अपनी जान का खतरा बताकर सुरक्षा की मांग भी की है. यह मौतें प्राकृतिक है या सुनियोजित कोई नहीं जानता किन्तु आगे आने वाले समय में जब पूर्ण खुलासा होगा तो सभी को चौंका सकता है.

शनिवार, 4 जुलाई 2015

एक माननीय पर हर माह 2.92 लाख का खर्चा तो टैक्स और मंहगाई नहीं बढ़ेगी तो और क्या होगा?





कहते हैं परिवार में एक अधिकारी, एक पुलिसवाला, एक पत्रकार तथा एक नेता जरूर होना चाहिये जो परिवार की हर मुसीबतों को हल करें, लेकिन अब इस युग में उक्त बात में कोई दम नहीं रह गया. इन चारों में से अगर तीन को अलग कर दिया जाये तो सिर्फ नेता बच जाता है, परिवार में सिर्फ एक नेता ही काफी है और अगर यह नेता माननीय हो जाये तो सोने में सुहागा. हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाइली क्वालीफाइड आउट परफोर्मिगं सीईओ और अन्य ज्यादा वेतन पाने वालों से कहा है कि वे अपने वेतन में कटौती करें और एलपीजी की सब्सिडी न लें लेकिन क्या हाईली वेतन प्राप्त करने वाले देश के माननीय अपने वेतन में कटौती करने तैयार हैं? या वे एलपीजी सब्सिडी नहीं लेंगे? प्रधानमंत्री के विचारों का हम स्वागत करते हैंं. इसमें दो मत नहीं कि निजी क्षेत्रों में काम करने वालों का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं अन्य लोगों से बहुत ज्यादा है, उनकी क्वालिफिकेशन भी उसके लायक है लेकिन देश के माननीयों पर क्या यह नियम लागू हो सकता है? जो जनता के बीच से उनकी सेवा के नाम पर चुनकर विधानसभा या लोकसभा में पहुंचते हैं-लाखों रुपये की कमाई का जरिया बना लेते हैं. एक माननीय जो देश के सबसे ऊंचे दरबार में पहुंचता है, क्या आम जनता जानती है कि उसकी आमदनी कितनी है? तथा वह निर्वाचित होने के बाद कितने भोग-विलासपूर्ण जिंदगी की ओर दाखिल हो जाता है? तो जानिये-उच्च दरबार में पहुंचे एक माननीय को एक महीने में वेतन के रूप में मिलता है पचास हजार रूपये, फिर उसे मिलता है पंैतालीस हजार रूपये जो उसका क्षेत्रीय भत्ता होता है. यात्रा भत्ते के रूप में आठ रूपये प्रतिकिलोमीटर जो करीब पड़ता है अड़तालीस हजार रूपये या मान लीजिये एक माननीय केरल से दिल्ली तक की 6000 किलोमीटर यात्रा करता है तो उसका भत्ता पक जाता है अड़तालीस हजार रूपये. संसद की बैठक के दौरान प्रतिदिन माननीय को मिलता है एक हजार रूपये. मामला यहीं खत्म नहीं होता-पूरे भारत में माननीय कितनी ही बार कहीं भी ट्रेन से एसी प्रथम दर्जे में बिना पैसा खर्च किये फ्र ी में सफर कर सकते हैं. इसी प्रकार हवाई जहाज में अगर माननीय चढ़ते हैं तो यहां भी सपत्नीक उन्हें सालभर में चांैतीस बार बिजनेस क्लास में बैठकर नि:शुल्क यात्रा की सुविधा है. माननीयों को दिल्ली में बिना किराये के नि:शुल्क रहने की सुविधा है. पचास हजार यूनिट तक बिजली भी नि:शुल्क  उपयोग कर सकता है. माननीय 1,50,000 टेलीफोन काल भी बिना कोई पैसा दिये कर सकते हैं. वह ससंद के होटल में अन्य होटलों से तीन या चार गुना सस्ता खाना भी उच्च कोटि के स्वादिष्ट व्यजंनों के साथ खा सकता है. एक माननीय का जो शिक्षित हो या न हो अथवा साधु-संत हो पर खर्च प्रति माह दो लाख बयानवे हजार रूपये है जो प्रति साल 35,00,000 के करीब जाता है. पांच साल के कुल खर्च का हिसाब लगाया जाये तो यह पहुंचता है करीब 1,75,00,000. गरीब और मध्यमवर्ग से भरपूर इस देश की सबसे बड़ी व्यवस्थापिका में इस समय माननीयों की संख्या 543 है और उनपर पांच साल में खर्च 9,50,25,00,000 अर्थात करीब 950 करोड़ रूपये का. क्या इतना खर्च होने के बाद हमारे देश का गरीब व मध्यमवर्ग का व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सकेगा? जबकि अभी हाल ही वेतन में और बढ़ोत्तरी की मांग की गई है. हमारे जेब पर प्रतिदिन प्रहार हो रहा है. टैक्सों में रोजमर्रा बढ़ोत्तरी हो रही है, वस्तुओं के भावों में निरंतर वृद्वि हो रही है. आखिर माननीयों पर खर्च होने वाला पैसा कहां से निकल रहा है? कुछ लोगों को सुविधाएं देने के लिये हमारे बच्चों को भूखे मारने का सिलसिला आखिर कब तक चलेगा?

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

बरसात रायपुरवासियों के लिये मुसीबत, पानी तो पानी, बिजली, गंदगी भी सर चढ़कर बोलती है!



बरसात रायपुरवासियों के लिये
मुसीबत, पानी तो पानी, बिजली,
गंदगी भी सर चढ़कर बोलती है

अभी तो पूरी बरसात बाकी है और राजधानी रायपुर में गुरुवार को हुई बारिश ने संपूर्ण व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी.  आगे अगर रायपुर में कहीं और ज्यादा बारिश हुई तो शहर के लोग बड़ी मुसीबत में पड़ जायेंगे. हम मानते हैं कि शहर को सुन्दर बनाने के लिये प्रशासन, निगम व सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन तेज गर्मी, बारिश-तूफान आने पर संपूर्ण व्यवस्था की स्थिति ठीक उसी प्रकार हो जाती है जैसे दूध में मक्खी गिर गई हो. चकाचक सड़कें जहां बारिश के दौरान  क्लियर होनी चाहिये वहीं नाली के गंदे पानी से भर जाता है और सतह तक कचरों का ढेर लग जाता है. टेलीफोन विभाग की लाइनें बैठ जाती हैं तथा बिजली गुल रहती है, यह दुर्भाग्यजनक  है कि हम इतने सालों बाद भी ऐसी कोई तकनीक अपनाने में नाकाम रहे हैं जिससे लोगों को बरसात के दिनों में किसी प्रकार  की तकलीफ नहीं हो. बिजली विभाग की लापरवाही का इससे बड़ा उदाहरण और क्या दें कि उसने तेलीबांंधा के जलविहार कालोनी में ट्रांसफार्मर को इतने नीचे लगाया है कि उसकोपानी छू गया तो हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है. ऐसी  स्थिति अकेले जलविहार की नहीं बल्कि शहर के अनेक हिस्सों में बिजली की अव्यवस्थित लाइनें बिछी हुई है, इससे एक बात तो यह स्पष्ट होती  है कि योजनाकार पुराने रायपुर शहर के बारे में कोई भी नई योजना लेकर नहीं चलते जिससे यहां मौसमी कठिनाइयां भी लोगों को झेलनी पड़ रही है. एक तरह से नये रायपुर के मुकाबले पुराने शहर की पूरी तरह अनदेखा किया जा रहा है. सर्वाधिक बसाहट वाले शहर में न आज तक ढंग का ट्रैफिक हो सका है और न ही नई राजधानी की तरह चकाचक  सड़कें, जबकि निर्माण कार्यों का तांता लगा हुआ है. लोग बिना किसी भय के जैसा चाहते हैं वैसे कालोनियां विकसित कर रहे हैं. मानसून के इस मौसम में पानी ही पानी है तो दूसरे मौसम में लोग पीने के पानी के लिये भी तरस जाते हैं. बरसात में भी कई कालोनियों की स्थिति यह है कि उन्हें पीने के पानी के लिये बरसात के पानी को पार करते हुए भटकना पड़ता है या फिर टैंकर का इंतजार करना पड़ता है. अभी कुछ दिन पहले ही नगर निगम ने कम से कम आधे शहर को गटर के पानी से भी बदतर पानी पिलाया. बरसात के इस मौसम में सबसे ज्यादा जरूरत स्ट्रीट लाइट की है, लेकिन अधिकांश बाहरी हिस्सों में स्ट्रीट लाइट नाम की व्यवस्था का अता-पता नहीं है. 

बुधवार, 1 जुलाई 2015

डिजिटल इंडिया की एंट्री, आम लोगों तक पहुंचाने में कई पापड़ बेलने पड़ेंगे



एक समय जब पुलिस वाले वायरलेस हाथ में लेकर एक दूसरे से बात करते थे तो हमें भी लालच होता था कि काश हमारे पास भी ऐसा कुछ होता तो हमारे काम कितने आसान हो जाते, धीरे से समय ने हमारी इच्छा को पूरा किया. सामाजिक क्षेत्र में पेजर की एंट्री हुई और यह कुछ ही समय में लोगों के रेस्ट में टंगा और कैसेे लुप्त हो गया पता ही नहीं चला. मोबाइल की एंट्री ने सभी संचार माध्यमों को पीछे छोड़ दिया. मोबाइल मंहगें थे, कम लोगों के पास थे लेकिन लोग मजाक में यह भी कहा करते थे कि एक समय ऐसा आयेगा जब रद्दी बेचने वाला भी दस मंजिले मकान के नीचे खड़े होकर फोन कर गृह स्वामी से पूछेगा कि बाई रद्दी है क्या? और घर में काम करने वाली बाई मोबाइल से फोन कर कहेगी कि बाई आज काम पर नहीं आऊंगी. युग बदला और वह सब कुछ हो गया जो पिछली शताब्दी में लोग सपने में देखते और दिन में कल्पना करते थे. बीसवीं सदी में युग ऐसा बदला कि आज हम कम्पयूटराइज्ड और डिजिटिल हो गये. पूरी दुनिया हमारी उंगली पर नाचने लगी. घर बैठे आप बिजली का बिल भर सकते हैं, टेलीफोन का किराया अदा कर सकते हैं. डिश टीवी का पेमेंट कर सकते हैं. नौकरी पर लगने के लिये चक्कर लगाने की भी जरूरत नहीं-घर बैठे ही वेबसाइट पर आप अपने लिये नौकरी खोज सकते हैं और भी बहुत कुछ. भारत डिजिटल में आगे बढ़ने बेताब है,  इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को डिजिटल इंडिया के एक बड़े कार्यक्रम का ऐलान किया. इस योजना में जहां अरबों रुपये का निवेश होगा वहीं कई युुवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे, बशर्ते योजना ईमानदारी से लागू हो. योजना के मुताबिक इंटरनेट और वाई-फाई सेवा को जन-जन तक पहुंचाना है. आज की स्थिति में वैसे भी करोड़ों लोग मोबाइल का उपयोग करते हैं, इसमें गरीब-अमीर सभी हैं लेकिन इसका उपयोग वैसे नहीं हो पाता जैसे बड़ा और उच्च वर्ग करता है. इंटरनेट से बैंकिंग सुविधा और अन्य ऐसी ही सुविधाएं आज भी कई लोग नहीं कर पाते. जब हम किसी तकनीक को फैलाने का प्रयास करते हैं तो उसके लिये लोगों को प्रशिक्षित भी करना पड़ता है. प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में शामिल करने के लिये किसान, मजदूर सभी वर्ग के लोग शामिल हैं. जन-जन तक पहुंचाने की योजना को लागू करने में वक्त लगेगा, नई पीढ़ी जो डिजिटल इंडिया में ही पैदा हुए उनके लिये तो यह आसान होगा लेकिन प्रश्न उन लोगों के लिये है जो न कम्पयूटर का ए बी सी डी जानते हैं और न मोबाइल को आन, डायल और रिसीव करना जानते हैं. ऐसे लोगों तक आप इंटरनेट व वाई-फाई पहुंचा भी दोगे तो यह किस काम का. अत: एक जागरूकता का अभियान भी सरकार को साथ-साथ चलाना पड़ेगा जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ सकें इसके लिये यह भी जरूरी है कि प्राय: हर स्कूल कॉलेज में कम्पयूटर शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाये तथा मोबाइल को इंटरनेट सुविधा से ऑपरेट
करने का तरीका समझाया जाये. डिजिटल इंडिया में प्रधानमंत्री ने देश के कोन-कोने तक यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी इंटरनेट, वाई-फाई और मोबाइल सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही है लेकिन क्या हमारे देश की जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग इसके लिये तैयार है? जहां तक हर काम को इंटरनेट और वाई-फाई से जोड़कर ई-वर्किंग का सवाल है, यह पूर्णत: उपयोगी साबित हो सकता है लेकिन सारी योजना का क्रियान्वयन के लिये बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ेगी.

सरकार की दूरगामी योजनाएं लेकिन वर्तमान को कौन देखेगा, महंगाई फिर बेलगाम!


या तो हमे जल्दी भूल जाने की आदत है या फिर हम अपने पर होने वाले जुल्म का प्रतिकार ही नहीं करते. हमारी खामोशी सामने वाले को हमारे ऊपर और जुल्म ढहाने का मौका देती है. सत्ता में आने से पूर्व सरकारें हमसे कितने लुभावने वादे करती है हम यह कर देंगे वो कर देंगे मगर हकीकत यही है कि ऊं ची कुर्सियों से चिपकने के बाद वे न यह करते हैं और न वे करते हैं! मंहगाई,भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा कालेधन की वापसी का लुभावना नारा देकर सरकार सत्ता में आई. यह सरकार भी भूल गई और हम भी भूलने लगे.वास्तविकता यही थी कि जनता पूर्ववर्ती सरकार की चुप्पी और मंहगाई, भ्रष्टाचार तथा कालाधन वापस लाने में असफलता को लेकर आम जनता को नाराज कर चुकी थी.वर्तमान सरकार ने सौ दिन पूरे होने के बाद भी आम इंसान को सपने दिखाने के सिवा कोई राहत देने का प्रयास किया हो यह दिखाई नहीं दे रहा. शुरू-शुरू में जब पेट्रोल, डीजल के भाव गिरे तो जनता ने यह महसूस किया कि वास्तव में सरकार  अपने वादों के प्रति कटिबद्व है लेकिन बाद में पता चला कि यह सब अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में घट बढ़ से हो रहा है.जो भाव आज पेट्रोल डीजल के हैैं वह नई सरकार बनते समय भी लगभग उतनी ही थी. सरकार ने बजट पेश करते हुए लुभावने सपने दिखाये, पहले रेल किराये, रेल भाड़े में आगे पीछे सब ओर से बढ़ौत्तरी की फिर सुविधा देने के बाद लगातार वृद्वि पर वृद्वि ने लोगों की कमर ही तोड़कर रख दी. महिलाओं को सुरक्षा देने के सपने सब धरे के धरे रह गये. कहीं कभी किसी महिला को ट्रेन  से उठाकर फेक दिया जाता तो कहीं गुण्डे ट्रेन में चढ़कर दुर्व्यवहार करते. लूटपाट, डकैती की घटनाओं ने रेल के सफर को कठिन बना दिया. ट्रेनों में न सुविधाएं बढ़ी न भीड़ घटी और न रेल की स्पीड बढ़ी. इधर पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि का नतीजा यह हुआ कि ट्रांसपोर्ट किराया बढ़ गया.बस किराया भी बढ़ा दिया गया वहीं सर्विस टैक्स ने लोगों का जीना हराम कर दिया. राजस्व के अनेक साधन होते हुए भी सरकारें सर्विस टैक्स से लाभ कमाने में लगी है-यहां तक कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने भी सर्विस टैक्स के मामले में जनता पर रहम नहीं किया. वस्तुओं के भावों में अनाप- शनाप वृद्धि से लोगों की रसोई का बुरा हाल हो गया. गैस, बिजली तो पहले ही महंगी कर दी गई. आम आदमी का रोटी दाल सब्जी खाना भी महंगा हो गया. हर  दृष्टि से देखा जाये तो आज के हालात में वही अपना जीवन बसर कर पा रहा है जिसके पास मासिक आमदनी तीस चालीस हजार रूपये से ऊपर है वरना मध्यम दर्जे के किसी व्यक्ति को परिवार चलाना मुश्किल है-वह बच्चों की फीस, कपड़े,इलाज,बिजली,टेलीफोन, मोबाइल जैसे रोजमर्रा के खर्चे आदि सभी के लिये अपने आपको असहाय महसूस कर रहा है.सरकार दूरगामी योजनाओं की ही बात कर रही है किन्तु वर्तमान की चिंता नहीं है .इसमें दो मत नहीं कि दूरगामी योजनाएं होनी चाहिये लेकिन वर्तमान को कौन देखगा? सवाल आज सबके सामने यही है।