सोमवार, 29 जून 2015

सतपथी ने नन दुष्कर्म कांड जांच को नया मोड़ दिया,पुलिस अब आशान्वित भेद खुल जायेगा...!




''मुर्दे भी बोलते हैं और घटना का सुराग छोड़ जाते हैंÓÓ-देश  के विख्यात फ ँारेन्सिक एक्सपर्ट डा.डी.के.सतपथी के इस वाक्ये के साथ हम यह कहना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में इस समय मानसून से ज्यादा अपराधी सक्रिय हैं.एक के बाद एक बड़ी वारदातों ने छत्तीसगढ़ पुलिस की नींद हराम कर दी है. इस बीच नन बलात्कार कांड में पुलिस को सतपथी के बयान से जैसे अमृत मिल गया हो.यह सही है कि सतपथी को फारेन्सिक की महारथ हासिल है, उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर इस  मसले को सुलझाने की जो बात कही है वह शतप्रतिशत सही हो सकती है-बहुत दिनों बाद ही सही छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनका मार्गदर्शन  लेकर अपने अन्वेषण को पुख्ता करने  में एक अहम भूमिका अदा की है. मुझे डीके सतपथी  के बारे में उनके परिवार के एक  सदस्य ने एक किस्सा सुनाया था कि वे एक बार भोपाल  से घर-बसना आ रहे थे तभी रास्ते में उनको जंगली इलाके में दुर्गन्ध आईर् तो उन्होंने गाड़ी रूकवाकर  कहा कि मुझे यहां किसी मनुष्य के लाश की गंद आ रही है. थोड़ी दूर जाकर  देखा तो एक व्यक्ति की लाश को जलाकर वहां फेका गया था. थोड़ी  ही देर में उन्होंने यह बता दिया कि उसे मारकर यहां जलाया गया है. इस प्रकार  की विशेषता बहुत कम लोगों में पाई जाती है. बहरहाल संपूर्ण छत्तीसगढ़ में ऐसे चौका देने वाले घटनाक्रम सामने आ रहे हैं जो पुलिस व सरकार दोनों के लिये चुनौती  बनते जा रहे हैं. सोमवार को महासमुन्द से खबर आई कि ट्रेन में बदमाशों ने एक महिला के साथ न  केवल छेड़खानी की बल्कि उसके कपड़े भी फाड़ दिये. दूसरा मामला भिलाई के बंटी घंटी जोड़ी का है जिसने लोगों को ठगकर करोड़ों रूपये की कमाई की- छत्तीसगढ़ में अन्य राज्यों की तुलना विशेषकर  पूर्वी और उत्तरी राज्यो के मुकाबले अपराध कम ही कहा जा सकता है लेकिन अचानक बढ़ रहे अपराधों ने चिंता की स्थिति निर्मित कर दी है.बाहरी लोगों के जमावड़े ने सर्वत्र अलार्मिगं स्थिति निर्मित कर रखी है जबकि पुलिस इस मामले में अपराधियों के मुकाबले बौनी नजर आ रही है. रायपुर में इस समय जो घटनाएं आमतौर पर हो रही है उसमें नये युवाओं विशेषकर नाबालिग लड़के ज्यादा दिखाई दे रहे हैं.पुलिस को ऐसे लोगो पर सख्त निगाह की जरूरत है.टीवी संस्कृति अपराध  को ज्यादा बढ़ावा दे रही हैं. कुछ चैनल तो अपराध के तरीके तक परोस रहे हैं.रायपुर  में नन बलात्कार कांड एक ब्लाइंड क्राइम है जिसकी तह तक अगर छत्तीसगढ़ पुलिस पहुंचती है तो यह उसकी कामयाबी ही मानी जायेगी वरना यह मामला भी उस नन के साथ भी  उसी जैसा माना जायेगा जैसा अन्य न्याय के लिये तरसती बलात्कार पीड़ितो के साथ हो रहा है. बलात्कार वास्तव में किसी महिला के साथ उसकी हत्या जैसा कृत्य है जब तक ऐसे मामलों में आरोपियों को कठोर से कठोर  सजा अन्य लोगों के लिये एक संदेश  के रूप में पेश नहीं की जायेगी ऐसी  वारदातों का रूकना कठिन  है. हमारी व्यवस्था की कमजोरी इसी में नजर आती है कि बलात्कार के कई  मामले, जिसमें निर्भया बलात्कार  हत्याकांड भी शामिल हैं में अपराधी सजा भोगने की जगह या तो छुट्टा घूम रहे हैं या फिर जेल में ऐश की जिंदगी गुजार रहे हैं.


रविवार, 28 जून 2015

आखिर सरकार ने ध्यान दिया, अब धान के साथ फल और ड्राय फ्र्रूट की भी खेती...!



अगर ऐसा होता है तो यह छत्तीसगढ़ की उन्नती और विकास में चार चांद लगा देगा, जी हां! हम बात कर रहे हैं कृषि के क्षेत्र में आने वाली नई नीति के बारे में जिसमेें सरगुजा को फल और बस्तर को फ्रूट उत्पादन के क्षेत्र में बढ़ावा देने का है. यहां हम बता दें कि सरगुजा का क्षेत्र फलों के उत्पादन में अभी से अग्रणी हैं. इस क्षेत्र में नारियल, कटहल जैसे दक्षिण में बहुतायत से होने वाले फलों के वृक्ष खूब फल देते हैं तो लिची का उत्पादन भी यहां भारी तादात में होता है. फलों के उत्पादन की दृष्टि से इस इलाके का मौसम भी अनुकूल है. हम अपने इन्हीं कालमों में पहले ही इस फसल को बढ़ावा देने का अनुरोध करते रहे हैं. उसी प्रकार बस्तर में भी मौसम ड्राय फ्रूट विशेषकर काजू के उत्पादन के लिये अनुकूल है. सरकार किसानों को प्रोत्साहित करें तो हर तरह की फसल छत्तीसगढ़ में ली जा सकती है. काफी-चाय का उत्पादन भी यहां किया जा सकता है. मसालों के लिये भी छत्तीसगढ़ के कई इलाके अनुकूल साबित हो चुके हैं. अनार की खेती के लिये भी इस अंचल का मौसम अनुकूल है. इन सबके लिये मौसम के आधार पर पानी की पर्याप्त व्यवस्था करनी भी जरूरी है क्योंकि इन पौधों में गर्मी सहन करने की शक्ति बहुत कम है. रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में हरित क्र ांति की बात कही है, ठीक उसके बाद छत्तीसगढ़ में कृषि नीति के संबन्ध में आई सोच ने इस महत्वपूर्ण मसले के संबन्ध में एक ठोस पहल की है. प्रधानमंत्री ने मेड़ों में बाढ़ की जगह ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण की बात कही है. वास्तविकता यही है कि बड़े फलदार वृक्षों के पौधों को इसी तरह लिया जाना चाहिये ताकि अन्य फसल को भी धूप-छांव मिलती रहे. वृक्षारोपण का एक लम्बा और बड़ा कार्य इस मानसून सत्र के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार हाथ में लेेने जा रही है. छत्तीसगढ़ के बदलते मौसम और सड़क ों के चौड़ीकरण में काटे गये वृक्षों के परिप्रेक्ष्य में भी इस कार्यक्रम का अपना अलग महत्व है. दूसरी सबसे बड़ी बात यह कि हम कृषि भूमि का जिस तरह से कांक्रीट के जगल बनाने में उपयोग कर रहे हैं वह भी अब चिंता का विषय बनता जा रहा है. भारी मात्रा में कृषि भूमि भवन बनाने, उद्योग लगाने में जा रही है ऐसे में जो बची कृषि भूमि है उसका सही उपयोग हो इसके लिये सरकारी तौर पर प्राथमिकता से प्रयास जरूरी है वरना एक दिन ऐसा आयेगा जब पूरा छत्तीसगढ़ हरियाली की जगह कांक्रीट का जंगल नजर आयेगा. सड़कों पर भविष्य में लगाये जाने वाले पौधों में से अधिकांश वन  विभाग को अपने संरक्षण में लेकर ज्यादातर फलदार ही लगाने  चाहिये जिससे हमारी आवश्यकता भी पूरी हो और सड़क हरियाली से बिखर जाये. आम, इमली, कटहल, नारियल जैसे वृक्षों को अन्य वृक्षों के साथ भारी संख्या में लगाकर छत्तीसगढ़ की प्रत्येक सड़कों को आकर्षक बनाया जाना चाहिये.

शनिवार, 27 जून 2015

लोग आदत से बाज नहीं आयेंगे ेउनके लिये चाहिये पुलिस एक्ट की धारा 34




कुछ लोगों की आदत है कि वे कहीं भी, कभी भी जगह मिले शुरू हो जाते हैं, फिर वे न आगे देखते हैं और न पीछे-आगरा डिविजन की रेलवे पुलिस ने ऐसे करीब 109 लोगों को पब्लिक प्लेस पर पेशाब करने, गंदगी फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया और सभी को 24 घंटे के लिए जेल भेज दिया. इनपर आरोप था कि उन्होंने रेलवे ट्रैक, पार्किंग प्लेटफॉर्म आदि पर पेशाब किया. हालांकि बाद में उनसे 100 रुपए से 500 रुपए तक का जुर्माना लेकर छोड़ दिया गया लेकिन इससे एक संदेश पूरे देश को गया है कि ऐसा करने का खामियाजा किसी को भी भुगतना पड़ता है चूंकि यह अकेले आगरा या हमारे देश के किसी एक शहर की बात नहीं है, प्राय: हर नगर में ऐसी गंदगी फैलाने वाले आपको मिल जायेंगे. कुछ तो ऐसे भी हैं जो टायलेट होते हुए भी उसमें नहीं जाते बल्कि बाहर ही किसी दीवाल या सड़क के हिस्से को बरबाद कर देते हैं. ऐसे लोगों से निपटने का यह अच्छा तरीका  है. अभी तो आगरा रेल मंडल की पुलिस ने यह कदम उठाया है, पूरे देश को इस मामले में पूरी तरह से सक्रिय होने की जरूरत है. जब तक आप लोगों की छोटी-छोटी गलतियों पर सख्त नहीं होंगे तब तक लोग ऐसी और इससे बड़ी गलतियां करते रहेंगे. आगरा में पुलिस रेल परिसर में फैली गंदगी से परेशान थी. जीआरपी ने खुले में गंदगी फैलाने वाले लोगों के खिलाफ अभियान शुरू किया और पकड़े जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हुई, उसके बाद यह अभियान आगरा डिविजन के 12 स्टेशनों पर 48 घंटों तक चलाया गया जिसमें 109 लोग पकड़े गए। इसमें से 27 लोगों को शुक्रवार को पकड़ा गया. कई तो बच निकले वरना यह संख्या और भी ज्यादा होती. अगर रोज इसी प्रकार किसी  सार्वजनिक स्थल को गंदा करते हैं तो अनुमान लगाया जा सकता है कि उस स्थल का हाल क्या होगा? आगरा जीआरपी इसके लिये बधाई के पात्र हैं कि उसने ऐसा उदाहरण पेश किया जिसे पूरे देश की जीआरपी को ही नहीं बल्कि अन्य पुलिस को भी अपनाना चाहिये. सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब अकेले एक बीमारी नहीं है लोग पान, गुटका खाकर थूक देते हैं. अगर दूसरी मंजिल में रहते हैं तो नीचे की मंजिल में कचरा फेंक देते हैं और भी कई किस्म की गंदगी करते हैं- हमारे कानून में ऐसी कई धाराएं हैं जो ऐसे मामलों में कार्यवाही कर ऐसे लोगों पर कार्रवाही कर जेल भेज सकती है या जुर्माना लगा सकती है किन्तु इन धाराओं का उपयोग बहुत कम होता है या कहें कि निष्क्रिय पड़ी है. चूंकि इन धाराओं में कार्रवाही करने पर पुलिस को कोई ऊपरी इनकम नहीं होती. अगर यह सब धाराएं सक्रिय हो जाये तो लोग नियम कानून से डरने लगेंगे और स्वच्छता अभियान को एक नया रास्ता दिखाई देगा. यह सब कानून का पालन कराने वालों की इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है. आगरा पुलिस बता रही है कि यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा है. सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने वाले लोगों को पकड़कर उनके खिलाफ पुलिस एक्ट की धारा 34 के तहत कार्रवाई की गई है।?

गुरुवार, 25 जून 2015

पुलिस यूं कब तक अपराध को 'तराजू पर तौलकर देखती रहेगी?


पुलिस यूं कब तक अपराध
को 'तराजू पर
तौलकर देखती रहेगी?
पुलिस अपने लोगों की रक्षा नहीं कर सकती तो आम लोगों की क्या करेगी? सरेआम किसी पुलिस वाले को पीट दे और हमारी बहादुर पुलिस (?) फरियादी से एप्लिकेशन मांगे कि -''भैया तुम लिखकर दे दो तब हम उसपर कार्रवाई कर सकेंगे!, ऐसे में यही कहा जा सकेगा कि अपराधियों को खुली छूट है! इधर एक नन बलात्कार से पीड़ित है, उसे जितनी यातना बलात्कारियों ने दी उससे कई गुना ज्यादा यातना अब पुलिस और मीडिया दे रही है. हम यहां पंडरी नन  दुष्कर्म कांड और भिलाई की घटना जिसमें ओवरटेक करने वाले युवकों और पुलिस की भिड़त के बाद मारपीट होने की घटना पर पुलिस के रवैये पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या पुलिस की व्यवस्था अपराध को तौलकर देखती है कि अपराध का स्तर कितना ऊंचा है? क्या उसी स्तर के आधार पर कार्रवाई होती है? नन बलात्कार की घटना के बहत्तर घंटे बाद भी पुलिस इस बात का सुराग तक हासिल नहीं कर सकी कि आखिर यह घटना कैसे, क्यों घटी और इसमें कौन लोग शामिल रहे होंगे? क्या यह स्थिति किसी मंत्री या वरिष्ठ अधिकारियों के साथ परिवार वालों पर घटित होती तो भी ऐसा ही होता? पुलिस के अपराध अन्वेषण का स्तर कितना गिर गया है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि अपराधियों को शिकंजे में लेेने उसके पास कोई भी आधुनिक तकनीक मौजूद नहीं है. प्रशिक्षित कुत्ते भी कुछ नहीं कर पा रहे. नन मामले में अपराधियों की गिरेबान पर हाथ डालने की जगह उसका पूरा ध्यान उस पीड़िता के बयान पर लगा हुआ है. जितनी पीड़ा उसे इस घटना के समय नहीं हुई होगी उससे कुछ ज्यादा उसे अब पुलिस और मीडिया के सवालों से हो रहा होगा. इस घटना के बाद से पुलिस की जांच का जो दायरा है वह सीमित होकर रह गया है- सिर्फ और सिर्फ पीड़िता के बयान तक ही! अपराधी छुट्टा घूम रहे हैं, मौज कर रहे हैं. प्रशासन बयानबाजी कर चुप हो गया तथा पुलिस पीड़िता के बयान में उलझकर रह गई. उसे कम से कम यह तो पता करना ही चाहिये था कि इस अस्पताल की आंतरिक व्यवस्था में भी कहीं कोई खोट तो नहीं है? विलेन कहीं अंदर तो नहीं छिपा है? बहरहाल पुलिस का अन्वेषण आगे क्या रंग लाता है, यह अभी देखना बाकी है. अगर रायपुर पुलिस इसे हल नहीं कर पा रही तो मामला सीबीआई के सुपुर्द करने पर भी विचार करना चाहिये. इधर भिलाई में दो बड़े पुलिस अधिकारियों की पिटाई के बाद जो स्थिति बनी है वह अपने आप में यह ही दिखा रही है कि अपराध आज हर जगह हावी है, अपराधी पुलिस से कोई खौफ नहीं करती. पुलिस के अपने लोग ही पिट जाते हैं और महकमा खामोश हाथ पर हाथ धरे रहता है. ऐसा पहली बार नहीं अनेक बार हुआ है, शायद यही कारण है कि अपराधियों को पुलिस से न कोई खौफ है और न कानून की वे परवाह करते हैं.

आपातकाल नहीं भी तो मोदी को वादे पूरे करने के लिये कठोर कदम तो उठाने ही होंगे!




देश के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने आपातकाल पर ट्वीट कर कहा है कि मोदी भी इंदिरा की राह पर चल रहे हैं-अगर ऐसा है तो कुछ हद तक तो मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा ही लगता है- हम स्वयं विश्लेषण कर देखें कि देश के हालात किस ढंग से बदल रहे हैं और देश आज उस समय के हालातों से गुजर रहा है जिसके चलते इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया. यह बात अलग है कि परिस्थितियां उनके पक्ष में भी नहीं थी. घपले-घोटाले, अनुशासनहीनता, समय पर अफसरों व कर्मचारियों का कार्य पर न पहुंचना, ट्रेनों का समय पर न चलना, मीडिया का अंधाधुन्ध गलत-सही प्रचार, यह सब उस समय भी मौजूद था जो आपातकाल लगते ही एक सख्त अनुशासन के रूप में बदल गया. अगर अनुशासन पसंद लोग अपने नजरिये से तत्कालीन आपातकाल को देखे तो वास्तव में आम आदमी का जीवन सही ट्रेक  या सही पटरी पर उतर गया था. मीडिया का अंग होने के नाते हालांकि मुझे आपातकाल का समर्थन नहीं करना चाहिये चूंकि मी़िया भी राजनीतिक  दलों की तरह उस समय सबसे ज्यादा प्रभावित थी- मंै स्वयं भी आपातकाल के दौरान की गई सख्ती की चपेट में आया था लेकिन मुझे वह अनुशासन खूब पसंद आया जो आपातकाल लगाने के बाद देश में कायम हुआ. लोग एक तरह से एक दूसरे के कार्य में झांकने की जगह अपना काम करने लगे. किसी  को दूसरे से कोई मतलब नहीं था. देश प्रगति की राह में आगे बढ़ने लगा. जो फालतू बातें होती थी वह बंद हो गई. जिस कार्यालयों में लोग साहब लोगों से मिलने के लिये घंटों बैठे रहते थे, (जो स्थिति आज भी है)- समय पर अफसर पहुंचने लगे. ट्रेनें कभी लेट नहीं होती थी. मंहगाई पर लगाम लगी. बहुत सी ऐसी बातें हुई जो आम जनजीवन को पटरी पर लाने में कामयाब हुई. अगर इंदिरा गांधी की इमरजेंसी इतनी बुरी होती तो वे दूसरी बार कभी सत्ता में नहीं आती लेकिन इमरेजेंसी के बाद इंदिरा गांधी उसी प्रकार भारी बहुमत से विजयी हुईं जैसा आज नरेन्द्र मोदी विजयी होकर सत्ता पर बैठे हैं. यद्यपि नरेन्द्र मोदी अपने बयानों में इमरजेंसी की खिलाफत कर रहे हैं लेकिन क्या वर्तमान परिस्थितियां उन्हें वे काम करने देंगी जिसका वायदा चुनाव के दौरान उन्होंने देश के लोगों से किया था. ऐसे में कुलदीप नैयर का यह सोचना वाजिब है कि मोदी भी इंदिरा की राह पर चल रहे हैं. कुलदीप नैयर और उनके जैसे अनेक लोग जो उनकी सोच रखते हैं, अगर यह कहते हैं तो गलत नहीं है, चूंकि जिस ढंग से देश में आज राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक, कानून-व्यवस्था, बेलगाम मीडिया तथा देश में विकसित हुई एक नई संस्कृति जिसमें लोग अपना दायित्व छोड़कर बाकी सब कर रहे हैं, ऐसी परिस्थिति निर्मित हो रही है उस परिप्रेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी को वादे पूरे करना उस समय तक कठिन है जब तक कि वे इंदिरा गांधी की राह न पकड़ ले. अगर वे आपातकाल नहीं लगाते तो भी उन्हें कुछ ऐसे सख्त कदम उठाने ही होंगे जो देश से किये गये वादों को निभाने के लिये जरूरी हैं.
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रविवार, 21 जून 2015

समान अधिकार के वादे धरे रह गये, व्यक्तिगत धनकुबेरों के चलतेे आम वर्ग को उठने का मौका नहीं मिल रहा!



समान अधिकार के वादे धरे रह गये,
व्यक्तिगत धनकुबेरों के चलतेे आम
वर्ग को उठने का मौका नहीं मिल रहा!

एक तरफ देश में हद पार अमीरी है तो दूसरी तरफ हद से Óयादा गरीबी!- क्या यह सोचने का विषय नहीं कि हद पार गरीब की किस्मत क्या उसके जीवनभर साथ रहेगी या उसमें कोई बदलाव आयेगा? ताजा उदाहरण उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के रेहुआ लालगंज में धर्मराज सरोज का है जो अपने दो बेटों के एक साथ आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भी परेशान हंै क्योंकि अब उनको आगे इन ब"ाों को पढ़ाने के लिये, यहां तक कि फीस जमा करने के लिये तक पैसे नहीं है. आगे आईआईटी में दाखिले के लिए एक लाख रुपये की जरूरत है, लेकिन उनके लिए यह दूर की कौड़ी है क्योंकि वह मात्र उतना ही कमा पाते हैं जिससे परिवार का पेट भर सके. धर्मराज गुजरात में सूरत के एक मिल में काम करता है. दो शिफ्टों में काम करके भी 12 हजार रुपये महीना कमाते हैं. उनके परिवार में सात लोग हैं. यह अकेले धर्मराज की कहानी नहीं है, देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं जो न केवल अपना पेट भरने के साथ ब"ाों के अ'छे भविष्य के लिये यूं ही परेशान हैं. न केवल ब"ाों की पढ़ाई, उनके स्वास्थ्य, रहने के लिये छत और ऐसी ही ढेर सारी समस्याओं से ग्रसित है- दूसरी ओर एक ऐसा भी समुदाय है जिन्हें अपने व परिवार के लिये ऐशोआराम के ढेर सारे साधन उपलब्ध हैं, वे बैठे-बैठे दुनिया की हर चाही गई वस्तु को अपने हाथ में कर सकते हैं, जहां जाना है वहां करोड़ों रुपए की महंगी कार लेकर घूम सकते हैं और भी सब कुछ। भारत को स्वतंत्रता दिलाने और देश की आजादी के लिये लड़ने, मर मिटने के लिये इसी पीड़ी के लोगों के पुरखे किसी न किसी रूप में शामिल रहे हैं, चाहे वह जुलूस में साथ देने या नारे लगाने या पोस्टर बनाने अथवा डंडे खाने का ही काम क्यों न हो लेकि न आजादी के बाद जो कुछ वादे सरकारों ने किये वह सब दरकिनार रख दिये गये, यहां तक कि संविधान में लिखे समान अधिकार के वादे को भी नहीं निभाया बल्कि कुछ लोग सिर्फ अड़सठ साल की आजादी में इतने अमीर हो गये कि देश को अंगे्रजों की तरह चलाने की ताकत रखने लगे? इतनी अकूत संपत्ति के मालिक कुछ मुट्टीभर लोग कैसे बन गये यह अपने आप में सोचने का विषय है, बहरहाल देश में एक धर्मराज और उनका परिवार नहीं है बल्कि पूरा देश का अधिकांश भाग इसी तरह के हालात से गुजर रहा है. इस वर्ग को पूरी तरह सरकारें अनदेखा करती रही है. धर्मराज मिल में काम करता है, बारह हजार रुपये वेतन है, ऐसे ही कई चपरासी, बाबू और अन्य अधिकारी भी हंै जिनकी जिंदगी इतनी कम तनख्वाह से नहीं चलती इसके लिये जरूरी है कि वह कहीं न कहीं से अतिरिक्त कमाई करें लेकिन यह अतिरिक्त कमाई भी हर आदमी के वश का काम नहीं, जो चतुर है वह आगे बढ़ रहा है, देश को लूट रहा है, परिवार और पुरखों को खुशहाल बना रहा है जिन्हें इसकी खुली छूट है? अब हालात यह है कि देश की सामाजिक व्यवस्था को खुशहाल बनाने के लिये भारी फेरबदल किया जाये. जो भी जहां भी संपति काले या सफेद धन के रूप में जहां भी जमा कर रखा हो उसे सरकार सामने करवाये और उसमें जो सही संपत्ति है वह संबन्धित के हवाले करें तथा बाकी का उपयोग देश के विकास और ऐसे कार्यों में लगायें जिससे धर्मराज जैसे लोगों के ब"ो आगे पड़ सके व उन्हें भी देश मे सम्मानपूर्वक रहने का मौका मिले. इस कार्य को करने में आस्था के नाम पर समाज को लूटने वालों को भी नहीं छोड़ना चाहिये, उनके पास तो करोड़ों की कार खरीदने की क्षमता रखने वालों से भी Óयादा की संपत्ति का अनुमान है. जब इंदिरा गांधी एक झटके में राजा महाराजाओं के प्रीविपर्स खत्म कर सकती है तो वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी तो इतनी ताकत रखते हैं कि वे ऐसे कई जनहितकारी निर्णय ले सकते हैं.

बुधवार, 17 जून 2015

अमीर-गरीब की खाई कौन पैदा कर रहा? कूड़े में खाना डालना और कूड़े से खाने की प्रवृति कब खत्म होगी?




एक नेता छगन भुजबल की संपत्ति 2563 करोड़ और ऐसे छुपे रूस्तम नेताओं की कितनी? एक अधिकारी आलोक अग्रवाल की संपत्ति सौ करोड़! अन्य अधिकारी कितना दबाये बैठे हैं? धनपतियों का एक अलग ही साम्राज्य बन गया है हमारे देश में! ऐसे लोगों की तिजोरियों को टटोला जाये तो स्वर्गिक आनंद में जीवन जीने वाले कई मानवप्राणी मिल जायेंगे जिन्होंने राष्ट्र और इस राष्ट्र की गरीब जनता की जेब में डकैती डालकर अपने व अपने परिवार के जीवन को न केवल सुखद बनाया बल्कि वैभव को भी खरीद लिया है. महाराष्ट्र के एक मंत्री के पास से जब 2563 करोड़ रुपये की संपत्ति का पता लग सकता है तो जांच करने वाली एजेंसियां तो समझ गई होंगी कि देश में छिपे धन का रहस्य क्या है? हिमाचल में वर्षों पूर्व ऐसे ही एक मंत्री के घर पर छापा पड़ा तो उनकी दीवारों से भी नोटों की गड्डियां निकली थी. अधिकारी और नेता दोनों मिलकर किस प्रकार देश को चूना लगा रहे हैं यह भी कई बार साबित हो चुका है. अकेले छत्तीसगढ़ में एक आलोक अग्रवाल नहीं बल्कि डीके दीवान, बीडी वैष्णव, अशोक कुमार नगपुरे, राजेश कुमार गुप्ता जैसे कई लोग हैं जिन्होंने देश की आजादी के बाद के वर्षों में पैदा होकर चंद समय की सरकारी नौकरी में राष्ट्रीय संपत्ति का बहुत सा हिस्सा दबा दिया. एक तरफ देश का माटी पुत्र है, जमीन से जुड़ा मेहनतकश वर्कर है, सरकार की बाबूगिरी और साहबों को पानी पिलाकर जिंदगी गुजार देने वाला चपरासी है तो दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जिनके पास जादू की छड़ी है जिससे वे अपने व अपने खानदान को वर्षों तक बिना कुछ किये जीने का साधन मुहैया करा रहे हैं. क्या यह व्यवस्था देश के उन ईमानदार लोगों को सोचने के लिये विवश नहीं कर रही कि उन्होंने क्या जुर्म किया जो इन भ्रष्टाचारियों की तरह विलासिता की जिंदगी नहीं जी पा रहे? हमारा संविधान कहता है कि यहां रहने वाला हर व्यक्ति समान है किन्तु क्या ऐसा है? किसी के पास इतना धन है कि उसे रखने की जगह नहीं है तो किसी के पास सिर छिपाने की भी जगह नहीं है. देश में ऐसे लोग भी हैं जिनके पास इतना खाना है कि वह उसका एक छोटा हिस्सा खाकर शेष कूड़ेदान में फेंक देते हैं और एक वर्ग ऐसा भी है जो इन लोगों के फेंके हुए खाने को कूड़े में से निकालकर खाता है? समाजवाद  का ढकोसला अब खत्म होना चाहिये. समाज दो भागों में बंट चुका है-एक तरफ गरीब है तो दूसरी तरफ अकूत संपत्ति के मालिक. दोनों के बीच सेतु बनाने की सारी कोशिशें विफल हो चुकी है. वोट की राजनीति में भ्रष्टाचार, जमाखोरी, कालाबाजारी में कमाया हुआ धन अब लोगों पर हावी हो चुका है. ऐसे लोगों को जब तक ईमानदार सरकार बिल से बाहर निकालकर अदालतों में पेश नहीं करेगी तब तक उस कूड़ेदान से निकला खाना खाने वालों और बिना छत के रहने वालों का उद्धार नहीं हो पायेगा. सरकार की कोशिशें जारी है किन्तु सरकार को यह भी सोचना चाहिये कि क्या छगन भुजबल या चंद अधिकारी ही इस तरह की काली कमाई लेकर ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं? ऐसे ढेरों लोग हैं जिनके पास देश की अकूत निधि जमा है, अगर यह सब पैसा बाहर आ जाये तो हमें न किसी बाहरी देश से अनाज मंगाना पड़ेगा और न ही हमें अपने विकास के लिये किसी पर निर्भर रहना होगा. आज सरकार की कार्रवाई सिर्फ उसी पर है जिसका पता लग गया या जिससे बदला लेना है असल में ऐसे लोगों पर तो कार्रवाई हो ही नहीं रही जो अरबों रुपये दबाकर बैठे हुए हैं इनमें कई आस्था के केन्द्र भी हैं जिनके पास अकूत संपत्ति है अगर यह सब बाहर निकल जाये तो देश का जीवन स्तर विश्व में एक नंबर पर हो जाये!

मंगलवार, 16 जून 2015

सड़क के बॉक्स में भी पुलिस वाट्सअप में भी पुलिस... देखते हैं कैसे बचते हैं क्रिमिनल?


सड़क के बॉक्स में भी पुलिस
वाट्सअप में भी पुलिस...
देखते हैं कैसे बचते हैं क्रिमिनल?
हम हमारे सामने होने वाले कई अपराधों पर आंखें मूंद लेते हैं, इसके पीछे कारण यही है कि हम क्यों पुलिस के लफड़े में पड़ें या क्यों बेकार बैठे-ठाले कोर्ट जाने की मुसीबत मोल लें? होता यही है कि पुलिस पूछताछ के नाम पर आपके घर तक पहुंच जाती है और सारा मोहल्ला ऐसे ताक-झांक करता है जैसे आपने ही कोई अपराध कर डाला हो. बाद में कोर्ट में गवाही के लिये जाने का लफड़ा अलग. असल में किसी को मदद कर देना या अपने नागरिक कर्तव्य को पूरा करना दोनों ही अपराध बन गया है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना के मामले में कदम उठाते हुए कानून में लचीलापन लाया है. दुर्घटना पीड़ित को अस्पताल पहुंचाने के मामले में आपसे कोई यह नहीं पूछेगा कि आप कौन हंै? आपके पिता का नाम क्या है? और आप कहां के रहने वाले हैं? इसके चलते कुछ लोगों की जान तो बचेगी ऐसी आशा हम कर सकते हैं. अब इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ मेंं राजधानी पुलिस ने अपराध से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने का फैसला किया है तद्नुसार शहर में कहीं अपराध हो रहा है? या आपको किसी के कारनामों से शिकायत है लेकिन आप सामने नहीं आना चाहते तो कोई बात नहीं! रायपुर के प्रमुख चौराहों पर पुलिस की एक शिकायती पेटी मिलेगी इसमें आप अपनी शिकायत या अपराध की जानकारी चि_ी में लिखकर डाल सकते हैं. शिकायत की खुफिया पड़ताल भी होगी. खबर पक्की होने पर सीधे कार्रवाई का भरोसा दिलाया गया है. पुलिस ने कम्युनिटी पुलिसिंग की दिशा में लंबे समय बाद बड़ा कदम बढ़ाने का फैसला किया है. पुलिस का मानना है कि आम लोग कई बार अपराध होते हुए देखते हैं, लेकिन कई कारणों से थानों में जाकर शिकायत नहीं करते. आला अफसरों तक भी सूचना पहुंचाने में गुरेज करते हैं. आम लोगों की इसी झिझक को दूर करने और अपराधों की सूचना हासिल करने के लिए पुलिस चौराहों पर डाक विभाग की पेटी सदृश्य बाक्स लगा रही है. जयस्तंभ चौक, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, डाक घर, कोतवाली, एमजी रोड व एसपी ऑफिस के पास शिकायत पेटी लगाई जाएगी. अगर पुलिस का यह अभियान सफल होता है तो आगे और जगहों पर भी ऐसी पेटी लगेगी. पुलिस का दावा है कि शिकायत जानने के लिए रोज सुबह पेटी खोली जाएगी. एएसपी स्तर के अधिकारी शिकायत को खुद ही देखेंगे. शिकायत सेल से लेकर क्राइम ब्रांच से उसकी जांच कराई जाएगी. स्कूली छात्र-छात्राएं भी इसमें अपनी शिकायत कर सकेंगे. शिकायत पेटी के अलावा पुलिस ने सोशल मीडिया को भी जरिया बनाया है. एसपी बद्री नारायण मीणा ने वाट्स एप्प नंबर जारी किया है, मोबाइल नंबर 99775-63904 पर कोई भी मैसेज करके अपनी शिकायत या सूचना दे सकता है जिसे खुद एसपी मॉनीटरिंग करेंगे. यह नंबर आम जनता के लिए जारी हो गया है. कोई भी व्यक्ति इस नंबर पर शिकायत कर सकता है. शिकायत करने वाले का नाम, पता व पहचान गुप्त रखी जाएगी- ऐसा दावा है. ट्रैफिक से लेकर अवैध शराब तस्करी, गंजा बिक्री, पुलिस वालों के गलत रवैये , ड्यूटी में लापरवाही या मोहल्ले में चलने वाले अवैध काम भी इस नई पहल से रूक सकेंगे ऐसी मान्यता लेकर पुलिस चल रही है. लोग वॉट्सएप पर वीडियो या फोटो खींचकर भी भेज सकते हैं. राजधानी रायपुर में अपराधों पर लगाम लगाने यह पहल कारगर साबित हो सकती है ऐसी हमारी भी मानना है.

रविवार, 14 जून 2015

सामाजिक व्यवस्था में मां,बेटी, बहन, पत्नी के रिश्तों पर ग्रहण-दुुष्ट कहर ढाने लगे...!


सामाजिक व्यवस्था में मां,बेटी,
majosep23@gmail.comबहन, पत्नी के रिश्तों पर
ग्रहण-दुुष्ट कहर ढाने लगे...!

जगल में रहने वाले जानवर भी वह कृत्य नहीं करते जो आज इंसान करने लगा है. एक उनतीस साल के लड़के ने अपनी साठ वर्षीय मां को भी नहीं बख्शा उसने उनके साथ बलात्कार किया. यह घटना है उस गुजरात की जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ,लौह पुरूष सरदार पटेल जैसी हस्तियों का जन्म हुआ और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हुए.जिस व्यक्ति ने यह कृत्य किया वह हालाकि गिरफतार कर लिया गया है किन्तु यह इंसान कहलाने लायक भी नहीं है. हैवानियत का नंगा खेल अब हमारे देश में एक प्रवृति बनती जा रही है जिसपर  कानून के लचीलेपन व निकम्मेपन ने हिम्मत देने का काम किया है. साठ सत्तर साल की वृद्वा और दो-तीन साल की बच्चियों तक को  इस एक अरब तीस करोड़ की आबादी वाले देश में चंद हवसी राक्षस अपनी वासना का शिकार बना रहे हैं और हमारा कानून बेबस अदालतों में इन राक्षसों के बचाव  में बहस कर उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है. इस बड़ी आबादी का एक छोटा सा वर्ग अगर अपराधी, दरिन्दा और राक्षसी प्रवृति का है तो उसे फांसी के झूले पर लटका दिया जाये तो हमारी कौनसी मानवता नष्ट हो जायेगी?और किसे इसका नुकसान होगा? इस एक कृत्य से कम से कम समाज से यह कोड़ तो खत्म हो जायेगा. आज की प्रमुख आपराधिक खबरों में सागर की एक बारह साल की  बच्ची का भी है जिसे चौदह साल के दो लड़कों ने बंधक बनाकर उसके साथ दो दिन तक रेप किया. बच्ची के हाथ पैर बांधकर उसे बाथरूम में बधंक बना रखा था. कोई भी इस घटना को सुनकर यही कहेगा कि ऐसे दुष्ट अपनी मां की कोख में ही क्यों नहीं मर गये? वास्तव में समाज किस ओर जा रहा है यह अब विद्वानों, कानूनविदो और समाज शास्त्रियो तथा मानवता की वकालत करने वालों को सोचना पड़ेगा कि ऐसे मामलों में उसे क्या करना है? सरकार  को भी चाहिये कि वह महिलाओं पर विशेषकर बच्चियों व वृद्व महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ ऐसा कानून बनाये कि समाज में संदेश जाये कि दूसरा कोई ऐसा कृत्य करने की हिम्मत ही न कर सके. बच्ची के साथ दो दिन तक बंधक बनाकर रेप करने वाले दोनो आरोपी भले ही बालिग नहीं है किन्तु बालिग से भी बदतर जुर्म उन्होंने किया वे इतना सोचने की ताकत तो रखते हैं कि उन्हें इसकी क्या सजा  मिल सकती है फिर भी आगे ऐसे लोगो को हमारा कानून कई बहाने बनाकर खुला छोड़ देगा ,इस प्रवृति को रोकने की जरूरत है, जब तक कठोर से कठोर सजा और तुरन्त सजा का प्रावधान नहीं किया जायेगा ऐसी और उससे क्रूरतम घटनाएं होती रहेगी.यूं तो बहुत सी ऐसी घटनाएं  हो रही है किन्तु एक वीभत्स घटना कल यूपी में हुई है जहां एक विवाहिता को एक तरफा प्यार  में पागल होकर एक व्यक्ति ने उसके प्रायवेट पार्ट को गोदकर उसकी हत्या कर दी. ऐेसे वीभत्सतम मामलों में आरोपी को सजा देन में सरकार ढिलाई करेगा और देरी करेगा तो स्वाभाविक है समाज में आगे आने वाले दिनो में लोग मां,बेटी, बहन,पत्नी  के रिश्तो को भूल जायेंगे और सामाजिक व्यवस्था एक नारकीय व्यवस्था में बदल जायेगी.

शुक्रवार, 12 जून 2015

पेट्रोल पंपों में ऐसा भी होता है? नोज़ल पर उंगली के जादू से होती है भारी कमाई!


पेट्रोल पंपों में ऐसा भी होता
है? नोज़ल पर उंगली के
जादू से होती है भारी कमाई!

इस समय की सबसे कीमती वस्तुओं में से एक है पेट्रोल-डीजल! देश की अर्थव्यवस्था भी इसी से तय हो रही हैै- पेट्रोल डीजल के भाव बढ़े नहीं कि वस्तुओं के भाव भी बढ़ जाते हैं, यही नहीं यात्रा करना भी महंगा हो जाता है, माल  परिवहन बढ़ जाता है- ऐसे में आम आदमी के जीवन में पेट्रोल-डीजल की क्या अहमियत होती है यह समझाने की जरूरत नहीं है. अगर पेट्रोल-डीजल में पंप से ही डंडी मारने लगे तो मुसीबत सीधे आम जनता के गले पड़़ती है. हाल ही में की गई एक गुप्त जांच-पड़ताल में एक सूत्र ने जो तथ्य एकत्रित किये हैं वह काफी चौंकाने वाले हैं. आप पंप वाले को पेट्रोल-डीजल भराने का पूरा पैसा देते हैं, वह आपके सामने उतना ही पेट्रोल भरता भी है जितना आपने मांगा है, लेकिन क्या ऐसा होता है? वास्तविकता कुछ और है- आपकी गाड़ी में पेट्रोल या डीजल जो भी भरते हैं वह नाप-तौल विभाग और पेट्रोल पंप मालिक के बीच एक एडजस्टमेंट पर चलता है जिसकी जानकारी उपभोक्ता को नहीं रहती. अगर आप सही माप करें तो आपको पता चलेगा कि आप पेट्रोल पंप पर बुरी तरह लुट गये हैं. आपके सामने कुछ हुआ है और जांच कराओ तो कुछ और निकलेगा. आपकी गाड़ी में कम पेट्रोल जानकर चौंक पड़ेंगे!  कैसे चोरी होता है पेट्रोल? कैसे लगती है आपकी जेब पर चपत? वैसे चोरी कई तरह से होती है जिसमें एक मालिक और नाप-तौल इंस्पेक्टर के बीच एडजस्टमेंट है तो दूसरा स्वयं मालिक व कर्मचारियों की तरफ से होने वाला खेल! - जब मीटर चलता है तो पेट्रोल पंप वाले कम पेट्रोल कैसे डाल देते है? जब कोई हजार रुपये का पेट्रोल भरवाता है तो कर्मचारी पहले मीटर में शून्य करता है फिर उसमें हजार रुपए फीड करता है और नोज़ल लेकर पेट्रोल डालने लगता है. इस समय में उसने जो खेल खेला वही इस पूरे काली कमाई का क्लाइमैक्स होता है. नोज़ल का स्विच एक बार दबा देने पर स्वत: पेट्रोल टंकी में गिरने लगता है. लेकिन अचानक वह अपने हाथ में फिर हरकत कर पेट्रोल को टंकी में जाने से रोक देता है लेकिन मीटर चलता रहता है आपका ध्यान मीटर पर और इधर कर्मचारी की हरकत नोज़ल पर चलती है. होता कुछ यूं है कि जिस नोज़ल से कर्मचारी पेट्रोल डालते हैं उसका संबंध मीटर से होता है. अगर मीटर में 200 रुपए का पेट्रोल फीड किया गया है तो एक बार नोज़ल का स्विच दबाने पर स्वत: 200 रुपए का पेट्रोल डल जायेगा उसे ऑफ करने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती. स्विच सिर्फ मीटर को ऑन करने के लिए होता है उसका ऑफ से कोई संबंध नहीं होता क्योंकि मीटर फीड की हुई वैल्यू खत्म होने पर रुक जाता है, अगर पेट्रोल डालते समय नोज़ल का स्विच बंद कर दिया जाये तो मीटर चलता रहता है लेकिन नोज़ल बंद होने की वजह से पेट्रोल बाहर नहीं निकलता, इसी बात का फायदा उठाकर कर्मचारी करते ये हैं कि जब भी कोई पेट्रोल डलवाता है तो बीच-बीच में स्विच ऑफ कर देते हैं जिससे रुक-रुककर पेट्रोल टंकी में जाता है और हम कंपनी को कोसकर चुप हो जाते हंै. फज़र् कीजिये आप पेट्रोल पम्प पर गये और 200 रुपए का पेट्रोल डलवाया, 200 रुपए का पेट्रोल डलने में 30-45 सेकंड का समय लगता है, आपका सारा ध्यान मीटर की रीडिंग पढ़ने में निकल जाता है और अगर ये लोग 10 सेकंड के लिए भी स्विच ऑफ करते हंै तो समझ लीजिये आपका 50 रुपए का पेट्रोल कम डाला गया है।
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शुक्रवार, 5 जून 2015

मैगी से ज्यादा खतरनाक है शराब, पूरे देश में प्रतिबंध हो!



मैगी पर पूरे देश भर में बैन लगा दिया- अच्छा किया, चूंकि  सरकार के अनुसार इसमें लेड की मात्रा ज्यादा पाई गई. देश में जगह-जगह छापेमारी की कार्यवाही हो रही है और मैगी को उसके बिल से खोज-खोजकर बाहर निकाला जा रहा है. निकाला भी जाना चाहिये, चूंकि यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये बहुत ही खतरनाक है. ज्यादा लेड मैगी के साथ शरीर के अंदर पहुंच गया तो यह इंसान का बेड़ा गर्क कर देगा. सरकार ने जनता के हित में यह कदम उठाया है, हम इसकी तारीफ करते हैं इसके साथ ही एक सवाल सरकार से करना चाहते हैं कि मैगी पर जिस तरह कार्रवाई की गई ठीक उसी तरह शराब, स्प्रिट, तम्बाकू, गुटखा और अन्य ऐसे ही मादक पदार्थों पर क्यों नहीं की जा रही? शराब पीना स्वास्थ्य के लिये घातक है यह जानते हुए भी उसपर क्यों नहीं प्रतिबंध लगाया जा रहा! चाहे देशी हो या विदेशी दोनों शराब में अल्कोहल की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि किसी के भी लीवर को हानि पहुंचा सकती है और उसे मौत के घाट उतार सकती है. मैगी और शराब दोनों में इस समय कोई अंतर नजर नहीं आ रहा. इतने सालों से लोग मैगी का उपयोग करते आ रहे हैं किसी को उससे तकलीफ नहीं हुई लेकिन शराब पीकर तो कई लोग मर चुके हैं, अचानक लेड की मात्रा मैगी में कहां से घुस गई? जबकि शराब के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है कि उसे पीने से आदमी का लीवर नष्ट हो जाता है. भारत जैसे गरीब राष्ट्र में तो मैगी से कई गुना ज्यादा खतरनाक शराब-तम्बाकू है जिसे पीने और खाने से लोग लीवर और कैंसर की बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं. शराब कई घरों को बरबाद कर रही है. सरकार जनता की हितचिंतक है इसमें दो मत नहीं उसे मैगी के साथ शराब पर भी पूरे देश में बैन कर देना चाहिये यह समय की मांग है. मैगी में लेड है तो शराब में अलकोहल तो तम्बाकू, सिगरेट में निकोटिन जैसे घातक रासायनिक पदार्थ मिले होते हैं तब तो यह जरूरी हो जाता है कि पूरे देश में मैगी के साथ इस समाज विरोधी व समाज के लिये घातक द्रव्य पर भी तुरन्त बैन लगाई जाये. मैगी के अलावा भी बहुत से ऐसी वस्तुएं बाजार में मौजूद है जो इंसान के शरीर के लिये घातक है. सरकार को चाहिये कि बाजार में मौजूद हर ऐसे पदार्थ की जांच कराये जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये घातक है. इसमें मिलावटी दूध, खोवा, घी व अन्य ऐसे पदार्थ भी शामिल है. दूध में तो सोडा जैसे धातक पदार्थ का उपयोग किया जाता है इसलिये पूरे देश में दूध पीने व बेचने पर भी प्रतिबंध जरूरी हो जाता है. बाजार में मौजूद हर वस्तुओं और पदार्थों को लोग अब शक के नजरिये से देख रहे हैं ऐसे में यह जरूरी है कि आम लोगों में व्याप्त भ्रांति को तत्काल दूर किया जाये.

गुरुवार, 4 जून 2015

एक तरफ जंगली जानवर दूसरी तरफ नक्सली, दोनों इंसान की खून के प्यासे!





वैसे इस बार मानसून के पहुंचने में देरी नजरआ रही है लेकिन बारिश के दौरान हर मामले में एहतियात बरतनी जरूरी है विशेषकर मनुष्य के स्वास्थ्य और उनकी जगंली जानवरों व कीड़े -मकोड़े से रक्षा. प्रदेश  में दो महीने के अंदर  जंगली जानवरों के हमले से पन्द्रह से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.अब आगे आने  वाले समय में एक दूसरी समस्या- सांपों के काटने से हो सकती है. सांप काटने से पीड़ित व्यक्ति के इलाज का क्या एहतियाती प्रबंध सरकार की तरफ से किया गया है यह तो पता नहीं चला लेकिन इस समय एक नजर में छत्तीसगढ़  को देखा जाये तो आम आदमी कहीं भी न सुरक्षित है और न उसे कहीं चैन से जीने दिया जा रहा है.अगर इधर बस्तर तरफ जाओ तो वहां नक्सलवादियों की धूम है वे किसी को चैन  की सांस लेने नहीं दे रहे हैं. सरकार राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान व गला रेतकर हत्या करने वालों के प्रति नरम दिखाई देती है.दूसरी और  कोरबा, जशपुर,रायगढ़,सरगुजा, बिलासपुर और कांकेर में हाथी, भालू, तेन्दुए नक्सलवादियों की भूमिका अदा कर रहे हैं. हाथियों के लिये कोरीडोर जैसी बाते सिर्फ सपना बनकर रह गई है.अप्रैल-मई दो महीने के दौरान वन्य जीवो के हमले से पन्द्रह लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.भालू तेन्दुए, हाथी सब सक्रिय हैं यह न केवल इंसानों का वध कर रहे हैं बल्कि भारी मात्रा में पशुओं को भी अपना शिकार बना रहे हैं.जंगली जानवरों की शहर तरफ दौड़ के पीछे कारण यही गिनाया जा सकता  है कि मनुष्य ने उनके इलाके में भारी दखल अंदाजी कर ली है. कहीं लकड़ी काटने के नाम से तो कभी खदान बनाने सिंचाई के साधन स्थापित करने व जंगली पशुओं की गिनती आदि के नाम पर भारी मात्रा में जंगल के भीतर दखलदांजी ने अब जंगली जानवरों को भी यह सोचने विवश कर दिया है कि क्यों ने अब हम शहरी इलाके पर कब्जा कर लें? महुएं की सुगन्ध, प्यास भी कारण  है जो  जंगली जानवरों को जंगल से शहर  की और दौड़ने मजबूर करती है. इस समय ज्यादातर  परेशानी हाथियों से है जो लोगों की जान लेने के साथ संपत्ति को भी नुकसान  पहुंचा रहे हैं. भालू, तेन्दुए के हमलों की खबर भी बराबर आ रही है.कई क्षेत्रों में अभी बरसात शुरू होने के बाद सांप बिलो से निकलकर आयेंगे और हमले शुरू हो जायेंगे. सीधे -सीधे कहा जाये तो छत्तीसगढ़ में  एक तरफ जानवर तो दूसरी तरफ नक्सली दोनों घात लगायें बैठे हैं कि कब मौका मिले और वार करें?

शहर की न प्यास बुझी न स्वच्छ हुआ, हां टैक्स जरूर बढ़ा लोग दुखी जरूर हैं पांच माह में!


शहर प्यासा है, नलों में पानी नहीं है, टैंकर पहुंच नहीं रहे. जहां सार्वजनिक नल लगे हैं वहां लोगों की लाइन लगी हुई है, जहां टैंकर पहुंचना चाहिये वहां नहीं पहुंच रहे हैं. सौदर्य के नाम पर सड़कों पर लगाये गये पौधे पानी नहीं मिलने से सूख रहे हैं. विकास कार्य ठप्प पड़े हैं, कई वार्डों में सफाई नहीं हो रही. आउटर की कालोनियों में तो बुरा हाल है जहां न स्ट्रीट लाइट जलते हैं और न सफाई होती है. अवैध निर्माण का बोलबाला है, निगम का कोई भी  जिम्मेदार कर्मचारी वार्डों में नजर नहीं आता जिससे लोग अपनी शिकायत कर सकें. कचरे के ढेर से निकलने वाली बदबू से लोग परेशान हैं-आखिर इन सब समस्याओं के हल करने की जिम्मेदारी किसकी है? रायपुर में नये नगर निगम का गठन हुए पांच माह बीत गये. महापौर जनता के बीच नजर नहीं आते. पूर्व के कार्यकाल की तुलना कर देखें तो वर्तमान का कार्य पूरी तरह से शून्य नजर आ रहा है. जो घोषणाएं समयबद्ध कार्यक्रमानुसार पूर्ण करने की बात कही जा रही है वह अपनी तिथि छोड़कर काफी आगे निकल जाती है लेकिन उसका संज्ञान लेने वाला कोई नहीं. एक दिलचस्प किन्तु गंभीर स्थिति निर्मित हो गई है. आखिर जनता क्या करें? कुछ ही समय में बरसात शुरू हो जायेेगी लेकिन शहर व आसपास के क्षेत्रों में नालियां बजबजा रही है. आगे जब बारिश होगी तब इस शहर का हाल क्या होगा, कोई नहीं जानता. रायपुर की जनता की अपेक्षाएं नये पदाधिकारियों के कार्यकाल के शुरूआती दौर में ही खरी नहीं उतर रही है. पुराने बस स्टैण्ड में बन रहे पार्किंग को कब से शुरू हो जाना था लेकिन अब तक शुरू नहीं हुआ जबकि आज खबर है कि निगम रेलवे स्टेशन में एक पार्किंग और बनाने की तैयारी में है. निगम कम से कम जो कार्य पहले से चल रहे हैं उसे पूर्ण करें फिर आगे बढ़ें. लेकिन ऐसी कोई परिस्थितियां निगम के लोग निर्मित नहीं कर रहे हैं. आम जनता के भारी बहुमत से जीते महापौर अब तक के अपने कार्यों से जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं बल्कि अपने कार्यकाल के दौरान लोगों पर टैक्स में वृद्धि कर उन्हें और मुसीबत में डाल रहे हंै. उद्यानों के रखरखाव व उनके संरक्षण पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा. कई जगह लोग मनमानी कर रहे हैं किन्तु निगम का अमला इसे रोकने में नाकाम है. सड़कों पर आवारा मवेशियों का डेरा है, महापौर के अपने मोहल्ले में ही मवेशी पैर पसारे सड़क पर पड़े रहते हैं, कोई देखने वाला नहीं. निगम का कुत्तों की नसबंदी का कार्यक्रम भी ठप्प है जबकि आवारा कुत्तों का आतंक अब भी कई मोहल्लों में छाया हुआ है. पांच महीने के कार्यकाल का विश्लेषण यही कहता है कि निगम ने अभी कोई काम न शहर के लिये किया और न आम लोगों के लिये.

नान घोटाला कांड के जाल में फंसी बड़ी मछलियां फिसल गई या फिसलाकर बाहर कर दिया?



यूं ही एसीबी  एंटी करप्शन ब्यूरो या आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरों के कार्यो पर किसी का विश्वास नहीं रहा अब जब उसने विश्वास जीतने के लिये एक बड़ा मामला अदालत में सौपने की कोशिश की तो उसमें भी सरकार चट्टान बनकर सामने हैं. नान घोटाला छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले की तरह चर्चा में रहा है. नान घोटाले में लिप्त सत्रह आरोपियों के खिलाफ तो छत्तीसगढ़ शासन ने अभियोग पत्र पेश करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी लेकिन इस करोड़ों  रूपये के घोटाले में लिप्त दो प्रमुख कड़ियों को यह कहते हुए अलग कर दिया कि तकनीकी कारणवश उनपर कार्रवाई की अभी अनुमति नहीं दी जा सकती. सरकार  को आम लोगों के समक्ष यह स्पष्ट करना चाहिये कि इन आईएएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने  में ऐसे कौन से तकनीकी कारण है जिसके चलते उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. जब देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में लाया जा सकता है तो यह कौन से तीस मारखां हैं जिन्हें बख्शने का प्रयास किया जा रहा है? क्यों नहीं और  लोगों के साथ  इन लोगों का चालान भी अदालत मेें पेश नहीं किया जाता ताकि दूध का दूध और पानी का पानी ह हो जाय तथा सरकार  अपने पर लगने वाले  दाग से भी बच सकें .मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले  में भी  कम से कम दो नामी आईएएस अफसरों का नाम आया था जिनके खिलाफ कार्रवाही करने में वहां की सरकार नहीं हिचकी फिर छत्तीसगढ़ में ऐसा कौनसा तकनीकी कारण इन बड़े अफसरों पर कार्रवाही करने से रोक रहा है? एसीबी या आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो अब तक कोर्ट में चालान पेश करने व अपराधियों पर कार्रवाही करने के नाम पर बदनाम रहा है कि वह अपराध दर्ज करने के बाद काफी विलंब करता है तथा मामला आगे चलकर रफा दफा हो जाता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. जनता का पैसा डकारने वालों पर सख्त कार्रवाही के रूप में अभियोग पत्र अदालत में पेश करने की अनुमति मांगी गई जिसमेें यह दो बड़े अफसर भी  थे किन्तु इनपर कार्रवाई न करने देकर यह स्पष्ट हो रहा है कि किसी न किसी को बचाने के लिये यह सब किया जा रहा है.नागरिक आपूर्ति निगम 'नानÓ के मुख्यालय सहित अटठाईस ठिकानों पर एनटी करप्शन ब्यूरो ने छापा मारा था तथा पता लगाया था कि कैसे कैसे घोटाला किया गया.प्रबंधक के पास से एक करोड़ उनसठ लाख नगद जप्त किया था वहीं अन्य कर्मचारी  भी इस पूरे घोटाले में प्रारंभिक रूप से लिप्त पाये गये. 12 अधिकारियों को गिरफतार  भी किया गया. सरकार की तरफ से आईएएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाही के रूप  में सिर्फ इतना किया कि उन्हें एक विभाग से सरकाकर दूसरे  विभाग में कर दिया गया जबकि अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ बर्खास्तगी  की कार्रवाही की गई. नान  घोटाले के पूर्व एक आईए एस अधिकारी  के ठिकानों से करोड़ों रूपये की संपत्ति मिली थी. उक्त अफसर को सरकार ने पुन: नौकरी पर लेकर अब उसे प्रमोशन भी  दे दिया गया है. ऐसे निर्णयों से तो लोगों का विश्वास काननू और सरकार से उठना स्वाभाविक है. नान मामले में अब नये कानून के तहत कार्रवाई होगी जिसमें अनुपातहीन  संपत्ति को जप्त भी किया जा सकता है. जेल भेजे जाने का प्रावधान भी है. देखना है आगे क्या होता है.

सोमवार, 1 जून 2015

गुण्डों को गोद में बिठाकर कब तक पूछताछ करते रहोगे? कुछ तो मप्र पुलिस से सीखो छग पुलिस!


गुण्डों को गोद में बिठाकर कब
तक पूछताछ करते रहोगे? कुछ
तो मप्र पुलिस से सीखो छग पुलिस!
'लातों के भूत बातों से नहीं मानतेÓ यह बहुत पुरानी कहावत है लेकिन इस कहावत का प्रयोग इन दिनों हम नहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं. सड़क पर पिटते देख किसी को अच्छा नहीं लगता लेकिन अगर यह कोई चोर, लुटेरा, गुण्डागर्दी करने वाला हो तो हर कोई उसे अपनी  ओर से भी दो थप्पड़ देना चाहता है. इन दिनों मध्यप्रदेश पुलिस यही कर रही है. गुण्डागर्दी करने वालों को उनके घर से निकालकर उनके अपने मोहल्ले में ही सरेआम पीट रही है. दया जरूर आती है लेकिन ऐसे लोगों के कृत्य सुने तो कोई ऐसा नहीं जो इनके बचाव में उतरे लेकिन कुछ लोग तो जैसे ऐसे लोगों का भी ठेका ले रखे हैं. उधर पुलिस ने पीटा नहीं तो खड़े हो जाते हैं आपने उन्हें क्यों पीटा? यह तो मनुष्यों के अधिकार का हनन है. शिवराज सिंह ने इन्हीं लोगों को जवाब दिया है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते. हम भी इस अभियान का पूर्ण समर्थन करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार से भी अनुरोध करते हैं कि अपराधियों के साथ किसी प्रकार की दया की जरूरत नहीं, वे अब इस लायक रह ही नहीं गये हैं. गुण्डागर्दी, छेड़खानी की घटना से आज हर मोहल्ला परेशान है. गुण्डे जो कृत्य करते हैं वह आम आदमी का दिल दहला देने वाला है, ऐसे लोगों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये. जब तक अपराधियों में खौफ नहीं आ जायेगा तब तक गुडागर्दी और छेड़खानी पर लगाम नहीं लगेगी. पिछले पचास दिनों से मध्यप्रदेश में यह अभियान चल रहा है और सफतलापूर्वक चल रहा है तथा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पुलिस की  इस कार्यवाही का पूर्ण समर्थन किया है. इधर छत्तीसगढ़ में अपराध करने के बाद अपराधियों के कृत्यों को छिपाने का कार्य किया जा रहा है. सर्वोदय नगर में एक लड़का पिस्टल लेकर भरी दोपहरी में घर में घुसकर महिलाओं के गले से चैन खिंच लिया और भाग गया. आसपास के इलाके में दो थाने हैं एक कबीर नगर दूसरा आमानाका दोनों थाने सीमा विवाद में घिरे हैं, यहां कबीर नगर जो निकट का थाना है उसके थानेदार को घटना की जानकारी का कोई पता नहीं था जबकि दूसरे थाने के थानेदार ने बेतुका जवाब देकर सारे मामले को टालने का प्रयास किया. उनका कहना था कि जब घटना जिनके साथ हुई उन्होंने कोई रिपोर्ट ही नहीं लिखाई तो हम क्या करें? वाह! पुलिस आपसे डरकर और आपकी काबिलियत देखकर तो कोइ$ रिपोर्ट लिखाने की जुर्रत भी नहीं समझता. ऊपर से आपने घर में मौजूद बच्चियों पर ही आरोप लगा दे रहे हैं कि उनसे मिलने कोई घुसा होगा. गुण्डे, बदमााशों का छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस के बचाव की मुद्रा और उनको संरक्षण देने तथा पीड़ित परिवारों तक को बदनाम करने का इससे बड़ा उदाहरण क्या दें? रायपुर में चाकूबाजी, लूट, छेड़छाड़ महिलाओं के गले से छैन खींचने की घटनाएं लगातार बढ़ी है. मध्यप्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ में तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि यहां पुलिस कभी हरकत में ही नहीं रहती. दूसरी ओर अपने सुशासन के लिए जाने जाने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस की दबंगई को सुशासन देकर उनकी हौसला अफजाई की है. हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौतरफा आलोचना के शिकार हुए हैं लेकिन गुण्डों की हरकतों के शिकार लोगों ने तो उनको सराहा ही है. वे आज इंदौर पुलिस की दबंगई का बचाव करते हुए उसके संकटमोचक बन गये. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर पुलिसिया कार्रवाई का विरोध करने वालों पर झल्लाते हुए कहा कि उन्हें पीटू नहीं तो क्या करूं? गुंडों के साथ क्या करें? मैंने तो कह दिया है कि जमकर पीटो गुंडों को, चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। हम जनता की सेवा के लिए हैं और वही कर रहे हैं. कुछ तो सीखों छत्तीसगढ़ पुलिस. गुडों को आप पुचकारते रहोगे तो जनता खुद ही सड़क पर उतर जायेगी. अभी कई मामलों में ऐसा हो भी रहा है.