बुधवार, 27 मई 2015

सुर्खियों का एक दिन-'मरे चौदह सौ , 'नक्सलियों पर नहीं होगा सेना का हमला... और गले मिले 'मूणत-बृज!


सुर्खियों का एक दिन-'मरे चौदह सौ ,
'नक्सलियों पर नहीं होगा सेना का
हमला... और गले मिले 'मूणत-बृज!

देश का पारा इस समय सातवें आसमान पर है- अब तक भीषण गर्मी से करीब 1400 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. यह मुसीबत भी किसी भूकंप से कम नहीं है. दो चार दिन बाद अच्छे दिन आने की भी खबर है. मानसून तीस मई को केरल पहुंच जायेगा, ऐसा मौसम विभाग वाले ताल ठोककर कह रहे हैं. वैसे यह भी कहा जा रहा है कि अल नीनो की सक्रियता के कारण मानसून आने में देरी हो सकती है. बहरहाल भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर बुधवार को रायपुर में थे उनने यहां आने के बाद प्रमुख बात यह कही कि नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का उपयोग नहीं किया जायेगा. यह बात पूर्व रक्षा मंत्री व अब मंत्री वीपी सिंह भी कह चुके हैं. जबकि यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री ए. के. एंटोनी ने भी यह स्पष्ट किया था कि सेना का उपयोग नहीं किया जायेगा. सवाल अब यहां यह उठ रहा है कि सरकार किस फार्मूर्ले से इस समस्या का समाधान निकालने जा रही है? यह भी  सवाल है कि क्या समस्या सदैव ऐसी ही बनी रहेगी? मुख्यमंत्री  डा. रमन सिंह भी नक्सलियों को माटी पुत्र कह चुके हैं. इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच बुधवार को जोरदार वाक युद्ध हुआ. मोदी ने टिप्पणी की कि यूपीए सरकार में सोनिया असंवैधानिक अथॉरिटी थी, इसके बाद सदा चुप्पी साधे रहने वाले मनमोहन सिंह ने कहा कि मैंने अपने परिवार या मित्रों के फायदे के लिये कभी सरकारी पद का दुरूपयोग नहीं किया. दोनों ने यह बातें दिन में कही लेकिन जब शाम हुई तो दोनों गर्मजोशी से मिले, फिर मोदी ने कहा -उनसे मिलकर बहुत खुशी हुई. इधर छत्तीसगढ़़ में सत्ता के पूर्व-पश्चिम, बृजमोहन-राजेश मूणत को एक बड़े समारोह में एक साथ दांये-बांये, हंसी-खुशी  देख टिप्पणीकारों को कुछ अजूबा लगा और फोटो भी खीचीं. दिल्ली में आप की सरकार का केन्द्र से अप्रत्यक्ष युद्ध छिड़ गया है. एलजी के नोटिफिकेशन के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर दिया गया है. नेता लोग अपनी बात को बड़ी आसानी से पलट देते हैं. केन्द्रीय मंत्री रिजिजू ने मंगलवार को गो मांस पर एक बयान दिया था, उसे गुरुवार को पलट दिया- मैंने तो ऐसा नहीं कहा था. केन्द्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति इरानी अमेठी में भाई-बहन से परेशान हैं. स्मृति को अब प्रियंका पर गुस्सा आ गया. प्रियंका ने  कहा था कि अमेठी में ट्रिपल आईटी क्यों नहीं है? इसके जवाब में वे कहती हैं कि यह अजीब है कि एक चुना हुआ सांसद हारी हुई उम्मीदवार से विकास के लिये मदद मांग रही है, मगर स्मृति शायद यह भूल गई कि हारने के बाद वे देश की मानव संसाधन मंत्री भी हैं. विदेश की खबरों की ओर नजर दौड़ायें तो मीडिया की दबंगता की एक मिसाल देखेने को मिलती है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के एक इंटरव्यू की रिपोर्टिंग को सरकारी आपत्ति के बावजूद पत्र के प्रधानसंपादक ने किसी प्रकार के संशोधन से इंकार कर दिया. एक खबर अमरीका के जार्जिया शहर की -वहां एक महिला को पुलिस ने इसलिये गिरफतार कर लिया चूंकि उनका लाडला 12 दिन तक स्कूल में गैर हाजिर रहा. ऐसी होती है मां-बाप की जवाबदेही. इससे क्या हमारे देश के लोग कुछ सीखेगें? यहां बच्चा सालभर स्कूल न जाये तो किसी को कोई फर्कनहीं पड़ता उलटा परीक्षा भी उसकी घर पर ही हो जाती है और पास भी प्रथम श्रेणी में हो जाता है!

मंगलवार, 26 मई 2015

बुरे और अच्छे के पीछे पिसते 'हम,आखिर कब तक इंतजार करना होगा?



च्छे और बुरे की लड़ाई के बीच आज एक और खबर आई कि अगले महीने से बिजली भी सरकार की मर्जी पर चलेगी अर्थात बिजली का बिल भी ग्यारह प्रतिशत बढ़ाकर देना होगा. पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने के बाद फिर दाम पुराने ढर्रे पर याने  यूपीए सरकार के लेवल तक पहुंच गया है जबकि रसोई से दाल गायब हो चुकी है फिर यह चाहे तुअर  की दाल हो या चने की दाल, सबका भाव आसमान  छू रहा है. हम एक आम आदमी की तरह किसी पार्टी पालिटिक्स को छोड़कर देखें तो क्या हमें उस और इसमें कोई फर्क पिछले एक साल में दिखा? दोनों लगभग एक जैसे हैं. एक कम बोलता था दूसरा ज्यादा बोलता है-ऐसे माहौल में हमने आजादी के एक साल और काट दिये. इस वर्ष के शुरूआती दौर मेें पेट्रोल-डीजल के दाम कम हुए तो लगा वास्तव में अच्छे दिन आने  शुरू हो गये, बुरे दिन वालों की बोलती बंद हो गई  लेकिन बजट आते तक सारी आशाओं पर पानी फिरने लगे फिर जहां सपने दिखाने की झडी  लग गई तो यहां से वहां जाने का किराया  बढाकर हमारे आने जाने  को भी सीमित कर दिया. रेल,बस,प्लेन के किराये में तो बढौत्तरी हुई ही साथ ही खाना खाने नहाने धोने तक में सर्विस टैक्स बढ़ा दिया गया. अच्छे या बुरे दिन की  तुलना कैसे करें? वो भी यही करते थे, यह भी वही कर रहे हैं.उनने कुछ कम किया तो यह कुछ ज्यादा कर रहे हैं वहीं उन्होंने कुछ ज्यादा किया तो यह कम कर रहे हैं.  काले धन को विदेश से  लाकर पन्द्रह लाख रूपये हर व्यक्ति की झोली में डालने का सपना तो लोग अब भी देख रहे हैं, न  यह पैसा आया  और न वह पैसा जो  कालेधन  के रूप में स्विस बैंक में सुरक्षित है. बुरे और अच्छे दिन वाली दोनों सरकारें लुभावने वादे युवाओं से करती रही  कि  उन्हें अच्छी नौकरी दिला देंगे इसके लिये नये नये उद्योग लगाये जायेगें सार्वजनिक क्षेत्र में ज्यादा  से ज्यादा इन्वेस्ट  तो किया जा रहा है लेकिन नौकरी कहां? अच्छे दिन दिखाने वाले अपनेे छोटे से कार्यकाल के दौरान कई बड़े देशों की यात्रा  कर आये या कहे कि विश्व भ्रमण कर आये और बुरे का आरोप जिन पर लगा वे कई दिनों तक अज्ञातवास में रहे ऐेसे में किसने किसका भला किया? कुख्यात आतंकवादियों के मामले में जितनी प्रत्याशा जनता ने की थी  उसपर भी निराशा ही हाथ लगी. मुम्बई हमले के आंतकवादियों में से एक को भी पकड़कर भारत वापस नहीं लाया जा सका जबकि दाउद इब्राहिम के मामले में यह सरकार भी पूर्व सरकार की तरह जहां की तहां है उलटा पडौसी देश के आतंकवादियों का कहर कश्मीर में फिर अलगाववाद के पंख बिखेर रहा है. जनता समझ नहीं पा रही कि इतने भारी बहुमत के बाद  भी सरकार कई मामलों में कठोर निर्णय लेने से क्यों हिचकिचा रही है?महिलाओं पर अत्याचार, यौन शोषण,अपहरण बलात्कार की घटनाओं में जस की तस स्थिति बनी हुई है. नई सरकार ने जुवेनियल नियम में जरूर बदलाव किया किन्तु कानून को इतना कठोर बनाने में वह अब भी हिचक रही है कि अपराधी एक बार पकड़ में आ जाये तो फिर कभी छूटे ही नहीं. अपराधो के मामले में सरकार के लचीले रु ख के कारण अपराधियों के हौसले बढ़े हैं.फांसी की सजा तो कइयों को दी  गई अमल में कोई मामला नहीं आया. जनता यह सब देख रही है...लोकतंत्र में वोट भले ही भेड़ चाल में डलते हैं लेकिन पांच साल का आंकलन बहुत ही सोच समझकर होता है इसलिये अभी भी वक्त है- वायदों को पूरा करना ही होगा.

सोमवार, 25 मई 2015

एक भीषण सड़क हादसा, जिसने पूरे राजधानी की आंखों को छलछला दिया!


क्या हमारी सड़कें इस लायक है कि यहां एसयूवी जैसी गाड़ियां सडकों पर 130 से 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकें?. टेड़ी-मेड़ी, उलझी और गड्ढेनुमा सड़कों पर कभी कुत्ता तो कभी अन्य पशु जहां टपक पड़ते हैं. ऐसे में गाड़ी अच्छे से अच्छे ड्रायवर के हाथों से नियंत्रण खोए बिना नहीं रह सकती. राजधानी रायपुर में शनिवार रात हुए दर्दनाक हादसे ने शहर के चार नौजवानों को जहां हमसे छीन लिया वहीं करीब पांच अभी भी मौत से संघर्ष कर रहे हैं. दुर्घटना का कारण अभी पुलिस जांच में है फिर भी जो प्राथमिक तौर  पर अनुमान लगाया जा सकता है वह यह कि एसयूवी गाड़ी जो तेज रफ्तार गाड़ियों में से एक है, हादसे के वक्त 130 से 160 किलोमीटर की रफ्तार पर रही होगी. वैसे भी लम्बे रूट पर ऐसे कारों के लिये कोई बड़ी रफ्तार नहीं है, आम तौर पर आजकल छोटी-मोटी गाड़ियां ही सौ किलोमीटर से ऊपर की रफ्तार पर दौड़ना आम बात है फिर अगर खाली सड़क मिल जाये तो रफ्तार किसी भी हद तक जा सकती है-इस बीच गाड़ी में सफर करने वाले युवा हो तो फिर क्या? मस्ती- गाने, हंसी, ठिठौली में लोग यह भी भूल जाते हैं कि सड़क पर हालात क्या हैं. खाली मिलने पर रफ्तार और भी तेज हो सकती है. इस दर्दनाक हादसे में लोग दुर्घटना के पीछे तरह-तरह के कारणों का कयास लगा रहे हैं. कुछ का कहना है कि हो सकता है- 1. ड्रायवर शराब के नशे में हो? 2. रात दो बजे का समय था ड्रायवर को झपकी आ गई हो? 3.तेज रफ्तार गाड़ी पर ड्रायवर नियंत्रण खो बैठा हो? 4. तेज रफ्तार गाड़ी के सामने कोई जानवर आ गया हो, जिसे बचाने के चक्कर में गाड़ी नियंत्रण खो बैठी और खम्बे से जा टकराई. 5. गाड़ी का बे्रक फेल होना या अन्य कोई तकनीकी कारण इस हादसे में नहीं बनता. 6. यह भी संभव है कि तेज रफ्तार गाड़ी पर ड्रायवर आगे सड़क की सही स्थिति का अनुमान नहीं कर पाया और दुर्घटना हो गई. इसमें से पहले नम्बर को अगर यह कहते हुए नकार दिया जाये कि गाड़ी चलाने वाला भी इन्हीं युवकों में से कोई था और नशे की बात होती तो सभी नशे में रहते. वैसे भी इनमें से किसी को भी नशा करने का समय नहीं मिला यहां तक कि वालीबाल ग्राउंड से निकलने के वक्त भी उनके समक्ष सारे सीनियर मौजूद थे इसलिये नशे की बात को एकदम नकारते हुए यह ही अनुमान लगाया जा सकता है कि तेज रफ्तार गाड़ी पर ड्रायवर अपना नियंत्रण रख नहीं सका और दुर्घटना हो गई. छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दुर्घटना का यह सिलसिला नया नहीं है. रात में होने वाली प्राय: दुर्घटना ड्रायवर को झपकी आने, शराब के नशे में धुत्त्त होने तथा सामने खड़ी किसी गाड़ी को देख नहीं पाने और तेज रफ्तार गाड़ी पर से नियंत्रण खो देने व ऊबड़-खाबड़ सड़कों के कारण ही होती है. इस भीषण दुर्घटना में मृतकों व घायल परिवार के साथ पूर्ण सहानुभूति व्यक्त करते हुए हम यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर मृतकों की आत्मा को शांति प्रदान  करें व परिवार को इस दुखद हादसे को सहन करने की शक्ति प्रदान करें. सरकार को भी चाहिये कि वह ऐसी दुर्घटनाओं से सबक लेकर कुछ ऐसा प्रबंध करें कि बार-बार इस ढंग के हादसे न हों.  

रविवार, 24 मई 2015

पठारीडीह की घटना के लिये कौन जिम्मेदार?पुलिस की सक्रियता घटना के बाद ही क्यों?


पठारीडीह की घटना के लिये
कौन जिम्मेदार?पुलिस की
सक्रियता घटना के बाद ही क्यों?

एस पी ओ.पी.पाल उरला के पठारीडीह की घटना के बाद अब भले ही यह कहें कि कानून हाथ में लेने की कोई भी कार्रवाही पुलिस बर्दाश्त नहीं करेगी लेकिन सवाल यह उठता है कि उरला के लोगों को कानून हाथ में लेने प्रेरित  किसने किया? घटना के सबंन्ध  में बताया जाता है कि पिछले कम से कम तीन सप्ताह से उरला और राजधानी रायपुर के आसपास आउटर में कुछ अज्ञात लोग बच्चा पकड़ने  में लगे हुए हैं-निवासियों का आरोप है कि यह बाहरी  लोग हैं जो घ्रेकी कर बच्चों को पकड़़़ रहे हैं.पुलिस से कई बार शिकायत करने के बाद भी कोईर् संज्ञान इस मामले में नहीं लिया गया यहां तक कि इस घटना के पूर्व भी कुछ संदिग्ध लोगों की पिटाई नागरिकों ने संदेह के आधार पर की लेकिन इसके बाद भी जब पुलिस ने किसी को गिरफतार नहीं किया तो आम लोगों ने अपनी सुरक्षा का दायित्व खुद सम्हाला. वे डंडे लेकर गली- गली में घूमने लगे. संंदिग्ध लोगों से पूछताछ भी की गई और संदिग्ध माने जाने पर उसकी पिटाई भी की गई.यह स्वाभाविक प्रक्रिया थी. जो काम पुलिस को घटना या अफवाह की खबर मिलते ही खुद होकर करनी चाहिये थी वह नागरिकों  को करने के लिये मजबूर किया गया इसका क्लाइमेक्स पठारीडीह में शनिवार को उस समय हुआ जब दो संदिग्ध व्यक्ति इस क्षेत्र में पहुंचे और ग्रामीणों के सवालों का जवाब गोलमोल  दिया. वैसे ही आक्रोश में घूम रहे लोगों के लिये यह जरूरी था कि वह इनकी धुनाईर्र् करें.इसका परिणाम हत्या के रूप में सामने आया. एक की  मृत्यु हो गई तथा दूसरा जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है. अब हत्या का प्रयास और हतया के बाद पुलिस सक्रिय हो गई है. दसने कम से कम दो दर्जन लोगों के खिलाफ हत्या का प्रयास और हत्या का जूर्म दायर कर लिया है किन्तु  सवाल यह उठ रहा हे कि पूरे मामले के लिये असल  जिम्मेदार कौन है? पुलिस ने क्यों नहीं एहतियाती कार्रवाही की. बच्चो की  चोरी हो रही है इसका प्रमाण किसी के पास नहीं है लेकिन यह बात तो बहुत पहले सिद्व हो चुकी थी कि आउटर में कुछ लोग लगातार संदिग्ध हालत मे घूम रहे हें इसके बाद क्षेत्र के लोग तो सतर्क हो गये लेकिन पुलिस वह तो शायद ऐसी किसी घटना का इंतजार कर रही थी. अब पुलिस बड़ी दबगंता से कह रही है कि कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आयेगी. अपाधियों को रोकने पुलिस ने उस समय सख्ती क्यों नहीं  बरती  जब लोगों के बच्चे गायब हो रहे थे तथा बच्चा पकड़ने वालो की संदिग्ध हरकते जारी थी. हम मारपीट करने वालों और युवकों की  हत्या करने वालों का कोई पक्ष नहीं ले रहे बल्कि हम अपनी उस व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं जिसके चलते ऐसी घटनाएं होती है जिसके चलते लोगों को कानून अपने हाथ में लेना पड़ता है. एक तो हमारा कानून सख्त नहीं है दूसरा जो है वह इतना सुस्त है कि वह हरकत में आते तक कई और अपराध घटित हो जाते हैं पठारीडीह की घटना ऐसी पहली घटना नहीं है जिसमें लोगों ने कानून हाथ में लिया हो इससे पूर्व भी देश के कई हिस्सों में गुण्डागर्दी,दुष्कर्म, डकैती आदि के मामलों में लोग कानून अपने हाथ में लेकर खुद फैसला दे चुके हैं. ऐसी घटनाएं न हो इसके लिये यह जरूरी  है कि कानून का पालन कराने वाले आम लोगों से ज्यादा सक्रिय हो और पीडितो को न्याय भी जल्द मिले.

मंगलवार, 19 मई 2015

अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद रूकीं... आज सड़क पर चलने वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में!


अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद
रूकीं... आज सड़क पर चलने
वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में!

'दुबई भी हमारे जैसा एक देश है, वहां एक तो चोरी नहीं होती दूसरी महिलाएं बेधड़क होकर किसी भी समय सड़कों पर घूमती हैं, उन्हें किसी प्रकार का कोई खतरा नहींÓ अगर किसी ने महिला से छेड़छाड़ की तो उसकी सजा भी इतनी कठोर होती है कि लोगों की रूह कांप जाये. हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान महिलाओं की सुरक्षा के बहुत से वादे किये थे-कुछ कानूनों में बदलाव भी हुए लेकिन अभी भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. सड़कों पर एक खौफ बना रहता है कि कब किसके साथ क्या हो जाये. कानून इतना लचीला है कि अपराध करने वाला पांच-सात साल की सजा भुगतने के बाद छुट्टा घूमता है और पीड़िता जिंदगीभर का दर्द झेलती है. मुम्बई की नर्स अरूणा शानबाग बयालीस वर्षों तक ऐसे ही मंजर से गुजरकर इस सोमवार को दुनिया से रूखसत कर गईं. लेकिन उसको इस हालत में पहुंचाने वाला वार्ड ब्वॉय सिर्फ सात साल सलाखों के पीछे रहने के बाद आज किसी छद्म नाम से हंसी-खुशी की जिंदगी बसर कर रहा होगा. अरूणा की कहानी जो भी सुनता है उसकी रूह कांप जाती हैं, आंखों से आंसू टपक पड़ते हैं और आक्रोश से मन ही मन कुड़कुड़ाता भी है कि कहीं वह व्यक्ति मेरे हाथ आ जाये तो उसे कच्चा चबा डालूं, लेकिन यह भी हमारा कानून हमें करने की इजाजत नहीं देता, किन्तु हमारी सरकार जिसके हाथ में पूरा कानून व न्याय व्यवस्था है उसके दिल में क्योंं नहीं दर्द भरता? क्यों नहीं ऐसी घटनाएं सुन उसकी आंखें अश्रु से भर जाती? क्यों हम मनुष्य का मनुष्य के ऊपर हो रहे इस अत्याचार को आंख मंूदकर देखने के लिये बाध्य हैं? हाल ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने निर्भया कांड के बाद नाबालिग अपराधियों के द्वारा किये जाने वाले जघन्य अपराध को भी बालिग द्वारा किये गये अपराध के बराबर कर दिया, किन्तु अब भी बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें न केवल कानून में बदलाव करने की जरूरत है बल्कि उसे इतना कड़ा करने की जरूरत है जिससे अपराधी ऐसा कृत्य करने से पहले दस बार सोचे कि उसका अंजाम क्या होगा? जब तक हम जघन्य अपराधों, विशेषकर महिलाओं के प्रति होने वाले कृत्यों में ठोस व सख्त कदम नहीं उठायेंगे क्रिमिनल के हौसलों में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आयेगी. महिलाओं पर तेजाब हमले, यौन प्रताड़ना, रेप और न जाने कैसे-कैसे अपराध एड्स और इबोला बीमारी से भी खतरनाक ढंग से फैल रहा है इसे रोकने का प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा बल्कि इसे बढ़ावा देने का उपक्रम कुछ वर्गों द्वारा किया जा रहा है. पीड़ादायक कुछ मामलों में तड़प-तड़पकर लोगों को मरने देने की जगह इच्छा मृत्यु की इजाजत देने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिये. इस मामले में भी अरूणा की तरफ से इच्छा मृत्यु मांगी गई थी किन्तु कोर्ट से अस्वीकार कर दिया

गया. किंग एडवर्ड मेमोरियल की नर्स अरूणा शानबाग बयालीस साल इसलिये कोमा में रही चूंकि उसके सहकर्मी ने उसे कुत्ते की  चैन से बांधकर उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया था तथा इस आपाधापी में उसकी नसों से दिमाग तक खून और ऑक्सीजन जाना बंद हो गया और वह कोमा में चली गई. इस दुष्कृत्य का आरोपी सात साल सजा भुगतने के बाद अब आजाद है लेकिन अरूणा ने बयालीस साल मर-मरके बिताये और सन् 2015 मई की अठारह तारीख को उसने दम तोड़ दिया... सरकार को सोचना चाहिये कि वह  ऐसे संगीन मामलों में क्या कठोर कदम उठा सकती है, जिससे कभी  कोई दूसरी अरूणा किसी दरिन्दे के फंदे में न फंसे.

गुरुवार, 14 मई 2015

ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली बिल अब लोगों के हार्ट पर भी आघात करने लगा!


ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली
बिल अब लोगों के हार्ट
पर भी आघात करने लगा!
एक फुट दो इंच लम्बा होता है छत्तीसगढ़ के सीपीडीसीएल (छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड) का बिल! जो हर महीने उपभोक्ताओं को आन द स्पॉट परोसा जाता है. इसको देखने के बाद कइयों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है तो कइयों के दिल की धड़कन रूक जाती है. कई इस चिंता में खो जाते हैं कि आखिर इस बिल को पटाने के बाद मेरे परिवार का क्या होगा? कैसे बच्चे की फीस पटाई जायेगी, कैसे घर का किराया अदा किया जायेगा और कैसे बाबूजी के लिये दवा का प्रबंध किया जायेगा? क्या आप उपभोक्ताओं में से कोई सीपीडीसीएल द्वारा जारी किये जाने वाले बिल में से शुद्ध देयक और सकल देयक के अलावा आपसे वसूल किये जा रहे किसी बिन्दू का सही विश्लेषण कर सकता है? बिल उपभोक्ता को देने का पूरा तरीका तानाशाही, लालफीताशाही से भरपूर और त्रुटिपूर्ण रहता है जिसको विद्युत कंपनी का कोई अधिकारी अथवा इसे बनाने वाला कर्मचारी ही समझ सकता है. आम उपभोक्ताओं के लिये मुसीबत बना यह बिल आगे के दिनों में और आप सभी के लिये और मुसीबत बन सकता है, चूंकि कंपनी ने तय कर लिया है कि वह अपने उपभोक्ताओं को और निचोड़कर ही दम लेगी. आप इतना पैसा अदा नहीं कर सकेंगे- आप उनसे इस बढ़ोतरी का कारण पूछने उनके दफ्तर भी  पहुंच सकते हैं, आपको वे सिर्फ यह कहकर समझायेेंगे कि बिल बढ़ गया है लेकिन आपको बिल में लिखी उन बातों को कोई नहीं समझा पायेगा कि अनाप-शनाप पैसा क्यों वसूला जा रहा है? आपके एक फुट दो इंच लंबे बिल में लिखा उर्जा प्रभार क्या है? विद्युत शुल्क क्या है? उर्जा विकास उपकर क्या है? मीटर किराया क्यों बार-बार लिया जा रहा है? पावर फैक्टर अधिभार रियायत क्यों नहीं दी जा रही? पेनाल्टी, अति. शुल्क, डीएल समायोजन, अति. सुरक्षा निधि, बीसीए क्या है और सुरक्षा निधि बकाया के नाम से हर बिल में राशि क्यों ली जा रही है तथा कब तक यह बकाया राशि आम उपभोक्ताओं को देते रहनी पड़ेगी? जब कोई उपभोक्ता इंटरनेट से आपकी पाई-पाई पटा देता है तो उससे पूर्व बकाया के नाम से वसूली क्यों की जाती है? अन्य प्रभार के नाम से भी हम उपभोक्ताओं से कुछ पैसे  ही सही काटा जाता है? अगर आप एक रुपये देते हैं तो विद्युत कंपनी हम सारे लोगों से यूं लाखों रुपये अपने खजाने में भरती है. कंपनी का यह बिल हर महीने के शुरू में बनना शुरू होता है जिसे महीने के 20 या 23 तारीख को उस समय पटाना पड़ता है जब प्राय: हर व्यक्ति की जेब खाली हो जाती है. नहीं पटाने पर कपंनी के लोग आपकी लाइन काटने के लिये चार आदमियों की सीढ़ी लेकर भेज देते हंै- फिर इसके बाद आपके घर में चूल्हा जले या न जले, बच्चा गर्मी से रोता रहे- उन्हें अपना पैसा वसूलने के सिवा कुछ नजर नहीं आता. विद्युत कंपनी के हर माह परोसे जाने वाले एक फुट दो इंच लम्बे बिल से बड़े अमीर उपभोक्त ाओं को भले ही कोई फरक नहीं पड़ता, लेकिन यह बिल मध्यम व गरीब उपभोक्ताओं के समक्ष गंभीर सवाल खड़ा करता है कि वे घर को रौशन करने के लिये यूं कब तक विद्युत कंपनी को आबाद करते रहेंगे?

शुक्रवार, 8 मई 2015

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा-


रायपुर बुधवार दिनांक 8 दिसबंर 2010

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा- क्या
अंतिम उपाय 'मौत ही रह गया ?
यह अकेले नेहा भाटिया की कहानी नहीं हैं, संपूर्ण छत्तीसगढ़ में स्कूली छात्राओं से छेडख़ानी और उन्हें प्रताडि़त करना एक आम बात हो गई है। छेड़छाड़ से दुखी नेहा ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया था। मंगलवार को नेहा ने प्राण त्याग दिये। बहुत सी छात्राएं छेड़छाड़ को बर्दाश्त कर इसकी शिकायत इसलिये नहीं करती। चूंकि उन्हें डर लगा रहता है कि परिवार के लोग इसके पीछे पड़ कर बड़ी मुसीबत में पड़ जायेंगे। पुलिस में जाने से छेड़छाड़ पीडि़त महिला तो डरती ही है, उसका परिवार भी ऐसा नहीं करना चाहता। जबकि नेहा जैसी कई ऐसी छात्राएं भी हैं, जो अपमान को गंभीरता से लेकर उसे मन ही मन बड़ा कृत्य करने के लिये बाध्य हो जाती है। क्या स्कूल प्रबंधन इस मामले में बहुत हद तक दोषी नहीं है, जो ऐसी घटनओं की अनदेखी करता है? क्या छेड़छाड़ पीडि़तों के लिये यही एक अंतिम उपाय है कि वह मौत को गले लगा ले? नेहा कांड से पूर्व छत्तीसगढ़ के छोर सरगुजा से एक खबर आई कि एक युवक की लड़की के भाई और साथियों ने जमकर पिटाई कर दी, चूंकि वह बहन को छेड़ता था। मामला जो भी हो, छेड़छाड़ के अक्सर मामले में लोग कानून को हाथ में लेने बाध्य हो जाते हैं। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं रह जाता। छेड़छाड़ की घटनाओं का कोई समय नहीं होता- लड़की को अकेला देखा तो छेड़ दिया फिर चाहे, वह स्कूल जा रही हो, सब्जी लेने या दूध लेेने? गाली गलौज के रूप में छेडख़ानी के अलावा आजकल राह चलती महिलाओं के दुपट्टा खींचना, अश£ील हरकत करना, स्कूटर से गिरा देना या अन्य ऐसी ही हरकतें जहां आम हो गई हैं। वहीं इस छेड़छाड़ की आड़ में किसी के गले से चैन खींच लेना भी आम बात हो गई हैं। छेेड़छाड़ की आड़ में आपराधिक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। छेड़छाड़ पीडि़त महिला अगर सड़क में थोड़ा सा साहस दिखाये तो यह उसके हित में ही जायेगा। जैसे ही कोई उसके साथ छेडख़ानी करें युवती को चाहिये कि वह आसपास से निकल रहे लोगों से अपनी रक्षा के लिये सहायता लें। युवतियों की मदद के लिये कई लोग सड़क पर उतर जाते हैं। एक बार एक को अच्छा सबक सिखाया जाये तो दूसरे में इसकी हिम्मत नहीं रह जाती। छेडख़ानी का एक दूसरा माध्यम है मोबाइल। बच्चे स्कूल में इसका उपयोग किन कामों के लिये करते है, यह बताने की जरूरत नहीं। जहां तक छेडख़ानी में पुलिस की भूमिका का सवाल है पुरुष की बनिस्बत महिला पुलिस छेड़छाड़ करने वालो से अच्छे से निपट सकती है। जब तक छेडख़ानी के मामले में लिप्त व्यक्तियों को सार्वजनकि रूप से जलील नहीं किया जायेगा, ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। छेडख़ानी में लिप्त लड़कों की फौज या तो किसी पान ठेले में मौजूद रहेगी या फिर ऐसे किसी मोड़ पर जहां से होकर स्कूल कॉलेज के लिये निकलना लड़कियों की मजबूरी है। नेहा भाटिया के साथ जो कुछ हुआ उससे छत्तीसगढ़ शर्मसार है। छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में ऐसी घटना न दोहराई जाये, इसके लिये यह जरूरी है कि इन घटनााओं पर अंकुश लगाने के लिये कठोर कदम उठाये जायें।

आरटीओं की आग में भूतो का काम था तो यहां कहीं जिंदा भ्रष्ट भूत तो सक्रिय नहीं हो गये?

आरटीओं की आग में भूतो का
काम था तो यहां कहीं जिंदा
भ्रष्ट भूत तो सक्रिय नहीं हो गये?
क्या राख से सबूत निकल पायेगा? जिस तरह से सिंचाई  विभाग की  फाइले  जली  है उसको देखने से तो  ऐसा लगता नहीं कि अब कोई सबूत बचा होगा.राजधानी रायपुर में महानदी गोदावरी कछार परियोजना का एक पूरा हाल इस विभाग की पुरानी फाइलों से अटा पड़ा था, मंगलवार-बुधवार को यह गोदाम धू -धू कर जलने लगा जिसने देखा वह यही कहता रहा कि घोटालेबाजो ने सबूत मिटाने के लिये जला दिया. लोगों के संदेह की पुष्टि इसी से होती है कि कुछ लोगों ने इस दफतर के पास से आते जाते समय धुआं उठते देख यहां आकर इस हाल को जलते देखा था,यह हाल आफिस के काफी पीछे एकांत स्थान पर स्थित है. बताते हैं वहां लोगों ने देखा कि आग लगने के बाद भी मौजूद कर्मचारियों में कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं थी जो आग लगने के बाद अक्सर देखने को मिलती है अर्थात पानी लेकर दौड़ना, रेत से बुझाने का प्रयास -इधर उधर दौड़ लगाना, फायर ब्रिगेड को फोन करके बुलाना आदि बल्कि वहां तैनात कुछ कर्मचारी तो ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसा उन्हें मालूम है कि आग लग गई है ठीक वैसे ही जैसे हम कचरे के ढेर में आग लगाने के बाद निश्चिंत होकर बैठ जाते हैं.फायर  ब्रिगेड को भी शायद जलने की सूचना किसी बाहरी व्यक्ति ने ही दी, बहरहाल यह सब जांच का विषय है.चूंकि यह प्रदेश का एक  महत्वपूर्ण विभाग है जहां कार्यो के लिये भारी लेन देने होता है.वर्षो से सिचाई की कई परियोजनाओं की फाइले अब राख हो चुकी है.यह सब बताते हैं इसलिये भी हुआ चूंकि अभी कुछ ही दिन पहले बिलासपुर के इसी कार्यालय में जांच पड़ताल शुरू हुई थी.जांच की आंच रायपुर तक न  पहुंच जाये इसलिये तो यह कृत्य नहीं कर दिया गया? गुरूवार  को प्रात: हमने इस क्षेत्र का दौरा किया था घटनास्थल पर कोई अफसर दिखाई नहीं दिया. किसी को राख में से फाइल ढूंढते भी नहीं देखा गया. हां मजदूर जरूर जले हुए गोदाम की दूसरी मंजिल से जली व अधजली फाइले उठाउठाकर फेक रहे थे तथा कुछ उनपर निगरानी रखने वाले लोग बाहर बैठकर इस विषय पर  नहीं अन्य किसी विषय पर गप्पे लड़ा रहे थे. एक दिलचस्प आगजनी वर्षो  पूर्व हमने रायपुर के आरटीओं का देखा  था  तब  उसका  कार्यालय राजकुमार कालेज के पास था तब यह कहा गया कि दफतर  जिस किराये के मकान में था वहां भूत निवास करते हैं उन्हीें ने आग लगाई! यहां तो ऐसा लग रहा कि यह पूरा काम 'जिंदा भ्रष्ट भूतोÓ का है- देखे बृजमोहन अग्रवाल अपने विभाग के इन भूतो को कैसे खोज निकालते हैं? वैसे उन्होंने सात दिनों में रिपोर्ट देने को कहा है. एक बात तो इन आगजनियों से स्पष्ट है कि किसी विभाग के लिये यह आसान है कि भ्रष्टाचार करके सारी फाइले स्वाहा कर दो और निश्चिंत हो जाओ! उल्लखनीय है कि रायपुर के सरकारी और अर्धशासकीय विभागों में आगजनी एक पुरानी  परंपरा है. रविशंकर विश्वविद्यालय सहित कई सराकारी विभाग अब तक आग की लपटे छोड़ चुकी हैं.

बुधवार, 6 मई 2015

कोई बड़़ा अपराधी तो कोईछोटा, किसी को ऊंची सजा के साथ ऊंवी सुविधा भी.क्यों है ऐसा?

कोई बड़़ा अपराधी तो कोईछोटा,
किसी को ऊंची सजा के साथ
ऊंवी सुविधा भी.क्यों है ऐसा?


अपराध घटित हुआ सन् 2002 में!
फैसला आया सन् 2015 में!
फैसले की घोषणा हुई सवेरे 11.15 पर!
सजा सुनाई गई शाम 1.15 पर !
अभियोजन पक्ष जमानत लेने हाई कोर्ट की तरफ दौड़ा  दोपहर बाद 3 बजकर पन्द्रह मिनिट पर!
जमानत पर सुनवाई हुई शाम चार बजे!
जमानत की घोषणा हुई शाम 4.50 बजे!
कौन कहता है भारतीय न्यायव्यवस्था काबिल नहीं है? लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सामान्य व्यक्ति इस ढंग का न्याय प्राप्त कर सकता है? न्यायपालिका का पूर्ण सम्मान करते हुए हम अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कुछ सवाल उठाना चाहते हैं कि दोहरी व्यवस्था को क्यों कायम किये हुए हैं?क्या आज हमारी व्यवस्था-सामान्य व्यक्ति और प्रभावशाली, धनवान, बाहुबलियो के बीच अलग अलग बट नहीं गई है? कानून में विभिन्नता क्यों हैं? एक सामान्य व्यक्ति अगर किसी ऐसे मामले में फंसता है तो उसका फैसला आने में देरी नहीं होती उसे तत्काल काल कोठरी के पीछे भेज दिया जाता किन्तु बड़े व पैसे लोग इस स्वतंत्र भारत में अपने  प्रभाव का भरूपूर  उपयोग करने लगे हैं.संविधान प्रदत्त समाजवाद का जहां  नामोनिशान  मिट गया है वहीं अमीर अमीर से और अमीर होने के पूरे रिकार्ड तोड़ चुका है. दूसरी तरफ मध्यम और  गरीब वर्ग है जिसके तन से कपड़े तक छिनते जा रहे हैं. कानून का कुछ नया रूप एक के बाद एक हमारे  सामने आता जा रहा हैं.कोई एक प्रभावशाली व्यक्ति भारतीय दंड विधान की धारा 302 जैसा जघन्य कृत्य करता है तो  माननीय न्यायालय से उसे आजन्म कैद या फांसी की सजा सुनाई जाती है लेकिन वह जेल की सलाखों के पीछै जाता है तो उसे वे सारी  सुविधाएं प्रदान कर दी जाती है जो किसी अन्य सामान्य कैदी को नहीं मिलती. हाल ही हुए कई निर्णय के बाद ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिनके प्रति हर दृष्टि से नर्मी बरती गई. अदालतों से सजा पाये व्यक्ति सीधे  जेल जाने की जगह अस्पतालों में भेजे गये, जेल से नियम विरूद्व परोल स्वीकृत किया गया. छुटटी दी गई. यहां तक कि सजा की घोषणा के बाद उसे सीधे जेल भेजने की जगह किसी आलीशान सर्किट हाउस में पूर्ण सुविधा और सेक्युरिटी के साथ रखा गया. समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग अपराधी हैं या सजा भुगतने के बाद भी  वीआईपी या वीवीआईपी? जबकि कुछ मामले ऐसे भी आये जिसमें सीधे घर ही भेज दिया गया, यह कहते हुए कि जाओं अपने मां बाप से मिलकर उनके चरण छू आओ? अब तक सही पटरी पर एक ही व्यवस्था है जिसपर हम गर्व कर सकते हैं वह है हमारी न्यायव्यवस्था है. हमें उसपर  पूर्ण भरोसा है.ईश्वर के बाद अगर धरती पर भगवान है तो वह न्यायाधीश है-यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कह चुके हैं लेकिन कुछ बाते ऐसी भी हो रही है जिसपर अब गौर करना जरूरी हो गया है।

मंगलवार, 5 मई 2015

ऐसी है हमारी शिक्षा नीति-प्रथम वर्ग, इंजीनियर,डाक्टर,द्वितीय वर्ग प्रशासक, तृतीय वर्ग राजनीति और चौथा-पांचवा....?


ऐसी है हमारी शिक्षा नीति-प्रथम वर्ग,
इंजीनियर,डाक्टर,द्वितीय वर्ग प्रशासक,
तृतीय वर्ग राजनीति और चौथा-पांचवा....?


''तेरे पिताजी क्या करते हेैं? मैरे पिताजी तो डाक्टर हैं और तेरे-मैरे पिता तो सरकारी कार्यालय में बाबू हैं....तो तूू बड़ा होकर बाबू बनेगा और मैं डाक्टर.ÓÓ-बच्चों के बीच स्कूली शिक्षा के दौरान अक्सर इस तरह की बात होती रहती है जिसमें पढ़ते पढ़ते ही भविष्य को तय कर दिया जाता है कि कौन बड़ा होकर क्या बनेगा और कौन किस व्यवसाय में लगेगा. सड़सठ साल की शिक्षा नीति में आज तक कोई बदलाव नहीं आ रहा है. कहीं यह प्रयास नहीं किया गया कि जो नीचे है या मध्यम स्तर पर है उसे ऐसा बनाया जाये कि समानता स्थापित हो सके.अगर रिक्शा चलाने वाले का लड़का या किसी बर्तन मांजने वाली बाई का बेटा  अथवा बेटी भी अच्छे नम्बरों  से पास हो तो उसे भी ऐसी परिस्थिति मिलनी चाहिये कि वह आईएएस आईपीएस बनजाये किन्तु ऐसे बच्चों के सामने सबसे बड़ी बाधा उनकी आर्थिक स्थिति आती है जिसके चलते पूरी योग्यता धरे रह जाती हे ओर वे या तो किसी संस्थान  में बाबूगिरी करते नजर आते  है या फिर शिक्षक बन किसी स्कूल में छड़ी लेकर खड़े रहने बाध्य हो जाते हैं-बहरहाल यह सब हमारी शिक्षा नीति का दोष है जो पढाई से ज्यादा आरक्षण पर निर्भर है. कभी कोई प्रयोग किया जाता है तो कभी कोई.हाल ही सोशल  मीड़िया में अब तक बनी सरकारों की शिक्षा नीति की खिल्ली उड़ाते एजुकेशन इंडिया शीर्षक से एक लिखित कार्टून वायरल हुआ है जिसमें एक दो तीन चार पांच नम्बर से शिक्षा नीति का यह कहते हुए मखौल  उड़ाया है कि अधिकांश -प्रथम वर्ग छात्र तकनीकी सीट प्राप्त कर लेते हैं, कुछ को डाक्टरी मिल जाती है तो कुछ इंजीनियर बन जाते हैं. दूसरा दर्जे में पास करने वाला एमबीए बनकर प्रशासक बन जाता है तथा प्रथम दर्जे वाले के ऊपर  नियंत्रण रखता है जबकि तीसरे दर्जे में उत्तीर्ण करने वाला राजनीति में प्रवेश कर जाता है तथा मंत्री बनकर प्रथम व द्वितीय दोनो श्रेणी में उत्तीर्ण करने वालों पर नियंत्रण रखता है...अभी भी शिक्षा के इस खेल का अंत नहीं होता और परीक्षाओं में बराबर फैल होने वालो का एक वर्ग भी तो है जिसमें से बहुत से चोरी सीनाजोरी गुण्डागर्दी अंडरं वल्ड में शरीक होकर सभी वर्ग पर नियंत्रण रख हीरो बन जाता है.इतना ही नहीं ऐसे लोग जिन्होंने  किसी स्कूलं में कभी उपस्थिति नहीं दी वे स्वामी और गुरू कहलाने लगते है और पूरा वर्ग उनकी  तरफ भागने लगता है. वास्तव में दिलचस्प है. क्या ऐसा ही कुछ नहीं है आज हमारी शिक्षा व्यवस्था? सभी  वर्ग को सोचने समझने व कुछ करने की जरूरत है जिससे हमारी आने वाली पीड़ी का कोई हिस्सा इस वर्ग भेद के जाल में फंस न जाये.

शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा!


शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज
को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से
मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा!

कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं- इस कहावत में जहां हकीकत है वहीं अब आजकल की बेटियों को कपूत के पांव शादी की दहलीज पर ही दिखाई देने लगे हैं- इससे एक अ'छी बात यह होगी कि भविष्य में गृह कलह, तलाक, दहेज हत्या, आत्महत्या और अन्य बुराइयों से बेटियां बच सकें गी. छत्तीसगढ़ की उर्मिला, रेखा जैसी बेटियों ने जो मिसाल कायम की है वह अन्य उन लड़कियों के लिये भी प्रेरणादायक है जो किसी युवक के साथ अपना जीवन संवारने की तैयारी में हैं. छत्तीसगढ़ में इस दो महीने के अंतराल में चार बेटियों ने अपने घर की दहलीज तक पहुंचे दुल्हे को शराब के कारण वापस भेज चुकी हैं. यह उस समाज के लिये एक संदेश है जो खुशियां मनाने के लिये शराब को अपना साथी चुनते हैं. वैवाहिक जीवन का शुरूआती दौर आनंददायक है, लेकिन उसमें दरार तब पड़ जाती है जब पता चलता है कि युवक या युवती दोनों में से कोई एक आशा, प्रत्याशा के अनुरूप नहीं बैठता, मसलन पुरुष शराबी है, गे है अथवा लड़की के चरित्र में खामियां है, सारी बातें पहले से ही देख-परख कर पुख्ता कर लिया जाये तो जीवन खुशहाल और दाम्पत्य जीवन सुखी हो जाता है. अभी दो रोज पहले ही एक दूल्हे से दुल्हन ने शादी से इसलिये इंकार किया चूंकि उसे रुपये तक गिनना नहीं आता था. दूल्हे ने अपने आपको शिक्षित बताया था, उसकी पोल स्वयं दुल्हन ने खोल दी और वह खाली हाथ घर लौट गया. एक अन्य गंभीर घटना एक महिला चिकित्सक के साथ हुई उसने इसलिये आत्महत्या कर ली चूंकि उसका पति गे अर्थात समलैंगिक था-इसके बावजूद महिला वैवाहिक संबंध में पांच साल तक बंधी रही और अंतत: तंग आकर उसने अपने आपको खत्म कर लिया. हालांकि ऐसे संबंधों की नौबत का प्रतिशत बहुत कम है लेकिन शराब से घर को तबाह करने वालों का प्रतिशत तो इतना Óयादा है कि वह भारत जैसे गरीब देश में कई परिवारों को बरबाद कर रहा है. शादी के समारोह में कहीं मारपीट हो रही है तो कहीं गोली चल रही है, ऐसे में अगर कोई महिला एहतियाती व ऐतिहासिक कदम उठाती है तो यह अपने आप में साहसिक है, वह भी उस देश में जहां परंपराएं, संस्कृति, धर्म, समाज आदि का रोना दिखावे के रूप में खूब रोया जाता है. बेटियों के इस साहसिक कदम की जितनी तारीफ की जाये कम है. यह समाज के ही बस का काम है कि वह शराब की बुराई को जड़ से उखाड़ फेंके-विवाह समारोह में पूर्ण रूप से नशे, जुएं को रोके और ऐसे लोगों को अपनी बेटियों से बचाये जो चिकनी-चुपड़ी बातों से आपकी लाडली को नरक में ले जाये. हमें उम्मीद है कि सर्वसमाज के ठेकेदार एवं धनाड्य वर्ग जो शराब सेवन व जुएं को विवाह और अन्य खुशियों के अवसर पर महान पवित्र कार्य समझते हैं वे इसके
दुष्परिणाम से सबक लेंगे तथा विकराल रूप से पनपती इस बुराई पर अंकुश लगाने के लिये स्वयं पहल करेंगे. सरकार का भी ध्यान इस ओर दिलाना चाहते हैं कि शराब मुक्ति के नारे से बस काम नहीं चलेगा। वे इस ओर कठोर कानून बनाए और शराब व्यवसाय को समाप्त करने की योजना बनाए। इसके साथ ही ऐसी बेटियों का सम्मान भी करें जो समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ सख्ती से खड़ी होकर अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।