सोमवार, 23 नवंबर 2015

सातवां वेतन आयोग क्या कर्मचारियों के तौर तरीको में भी बदलाव लायेगा?


सरकारी नौकरी यानी 'मस्ती-'शहंशाही नौकरी-'अलाली या जब मर्जी आये तब काम करो और निकल जाओ! सरकारी कर्मचारियों के बारे में लोगों को सदैव यह कहते सुना गया हैं 'यार काम करों या न करो तनख्वाह तो मिलना ही है. जब मर्जी आये तब आफिस जाओ, गप्पे सप्पे मारो और चाय पीने या लंच  के नाम से बाहर जाकर मटर गस्ती करते घूमते रहो. कई दिनों की छुट्टी,प्रोवीडन्ट फण्ड,बोनस, महंगाई भत्ता और भी कई सुविधाएं तो पकी-पकी  रहती है लेकिन अब आगे आने वाले वर्षों में सरकारी कर्मचारियों के लिये नौकरी कठिन होने वाली हैं.सरकार कर्मचारियों से काम लेगी, तभी पैसा देगी. अगर अलाली दिखाई तो घर का रास्ता दिखा दिया जायेगा-सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट संदेश दे रही है कि देश में और भी कई ईमानदार व काम करने वाले बेरोजगार हैं जिन्हें काम पर लगाया जा सकता है- आयोग कि सरकार को सिफारिश है कि जो अफसर या कर्मचारी काम किये बगैर कुर्सी पर बैठै- बैठे सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं उन्हें नौकरी से निकालो. आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान मे भारी बढ़ौत्तरी की है न्यूनतम वेतन सात हजार रूपये से बढ़ाकर अठारह हजार कर दिया है साथ ही भत्ते और अन्य सुविधाओं में भी वृद्वि की है किन्तु अब काम लेने का तरीका सरकार को ठीक वैसा ही रखना होगा जैसा निजी कंपनियों में काम करने वालों के साथ होता है.समय पर आओ,सद्व्यवहार करों और अच्छी तनख्वाह पाओं.सातवें वेतन आयोग में यह बात भी कही गई है कि कर्मचारी के व्यवहार,नेतृत्व क्षमता और कार्यकुशलता के आधार को भी पैमाना बनाया जाना चाहिये. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन अगले साल से मिलने की संभावना है लेकिन यह आयोगों के गठन के बाद पहला आयोग है जिसने वेतन बढ़ौत्तरी के साथ-साथ अच्छे से काम लेेने और दंडित करने का भी सुझाव सरकार को दिया है.केन्द्र सरकार के अनेक उपायों में यह रिपोर्ट खरा उतर रही है.सुधारात्मक सोच लेकर चल रही यह रिपोर्ट उसी के अनुकू ल है और संभावना इसी बात की है कि वह उसे जैसा का तैसा ही अंगीकार कर लें. वेतन आयोग ने अपनी सिफारिश में कर्मचारियों के वर्तमान वेतन लेने की मानसिकता पर जहां कड़ा प्रहार किया है वहीं पदोन्नति, वेतन वृद्वि व बोनस की मौजूदा व्यवस्था को ठीक नहीं माना है. अपने काम के प्रति कर्मचारी की बेपरवाही और कार्य का प्रदर्शन ठीक नहीं हाने जैसे मुद्दों पर भी आयोग ने ध्यान आकर्षित किया है. वास्तविकता यही है कि सरकारी काम शब्द ही वर्तमान स्थिति में हास्यास्पद बना हुआ है चूंकि लोग बोलचाल की भाषा में कहते हैं -क्या सरकारी काम जैसा कर रहे हो?

रविवार, 22 नवंबर 2015

रष्ट्रीय महागठबंधन कितना कारगर साबित होगा?क्या विचारधाराओं का संगम होगा?



बिहार में महागठबंधन को जीत क्या मिली राष्ट्रव्यापी महागबंधन बनाने की चर्चाओं का दौर चल पड़ा. यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके बारे में सोच शरू हो गई.अगले आने वाले विधानसभा चुनावों में तो संंभव हैं एक बार फिर महागठबंधन सामने आये साथ हीं राष्ट्रीय स्तर पर भी महागठबंधन कर चुनाव लडऩे की तैयारी चल रही है इसके लिये  प्रधानमंत्री प्रत्याशी की चर्चा भी शुरू हो गई हैै. लेकिन क्या पूरा देश चुनाव के मामले में दिल्ल्ी या बिहार हो सकता है?और होगा तो भी क्या इस प्रकार के दल जिनकी विचारधाराएं अलग-अलग हैं? वे कितने दिन एक साथ रह सकेंगे? या यह गठबंधन सिर्फ भाजपा और नरेन्द्र मोदी को सत्ता विहीन करने के लिये बनाया जायेगा? कई ऐसे सवाल हैं जो आगे आने वाले समय में उठेंगे बहरहाल इस समय जो माहौल चल रहा है वह बिहार चुनाव में महागठबंधन जिसमें राजद, जदयू कांग्रेस शामिल हैं की भारी विजय को लेकर है.चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश में महागठबंधन करने की तैयारी शुरू हुई थी, उसमें कांग्रेस को छोड़कर और बहुत से पार्टियों के नेता एकत्रित हुए . इस पहल के बाद ही बिहार में महागठबंधन अस्तित्व में आया जिसमें जदयू, राजद कांग्रेस के अलावा मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी भी शामिल थी जो बाद में अलग होकर अपने बलबूते पर ही बिहार में चुनाव लड़ी. अब महागठबंधन की भारी सफलता से उसमें शामिल दलों का उत्साह पूरे देश पर अपना  सिक्का जमाने का हो गया है. नीतीश कुमार को हीरो बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है जो अभी से कांगे्रस को रास नहीं आ रहा. दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी ने भी कह दिया कि प्रधानमंत्री का प्रस्तुतीकरण अभी से नहीं किया जा सकता. गठबंधनों का बड़ा दौर सन् सत्तर अस्सी के दशक में जेपी आंदोलन के साथ शुरू हुआ था एनडीए का कई दलों के समावेश के साथ जन्म हुआ उसके पश्चात यूपीए का गठन हुआ. परिस्थितिया आज भी वैसी ही है.इधर पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान शुक्रवार 20 नवंबर को एक बार फिर राजनीतिक घटना का गवाह बना। मौका तो वैसे नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार काशपथग्रहण समारोह था लेकिन यह समारोह साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई दिया। मंच पर जहां संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह कराया जा रहा था वहीं मंच के सामने वीआईपी गैलरी में गजब राजनीतिक नजारा दिखाई दे रहा था। राहुल गांधी,ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, सुखबीर बादल और शिवसेना के नेता गिले-शिकवे भुलाकर दिल खोलकर मिलते नजर आए। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी व बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, नेशनल काफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, कर्नाटक के सीएम सिद्धरमैया,असम के सीएम तरुण गोगोई, सिक्किम के सीएम पीके चामलिंग, मणिपुर के सीएम इबोबी सिंह, अरुणाचल प्रदेश के सीएम नबाम टुकी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, सीपीआईएम नेता सीताराम येचुरी, सीपीआई नेता डी. राजा, डीएमके नेता स्टालिन, शिव सेना नेता रामदास कदम व सुभाष देसाई, रालोद नेता अजित सिंह, जदयू अध्यक्ष शरद यादव, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, बीबीएम नेता डॉ प्रकाश अम्बेदकर, सांसद राज बब्बर की उपस्थिति ने यह तो बता दिया कि आगे चलकर देश की कढ़ाई में बहुत बड़ी खिचड़ी पकने वाली है.हालाकि इस मिलन में सब ठीक चला लेकिन नीतीश कुमार को अगले आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री उम्मीद्वार प्रोजेक्ट करने की क्षेत्रीय दलों की गंभीरता से कांग्रेस के अंदर खलबली मच गई नीतीश की उम्मीद्वारी को कांग्रेस
हाईकमान फिलहाल पचाने के मूड में नहीं है पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि जदयू समेत क्षेत्रीय दलों का रूख चाहे जो हो मगर पार्टी इसे भाव देने के मूड में नहीं है। वहीं बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री के खिलाफ और आक्रामक हो गए हैं. महागठबंधन अगर बनता भी है तो उसमें कांग्रस का समावेश होगा यह कहना इसलिये भी संभव नहीं है कि महागठबंधन अगर बना भी तो कांग्रेस गांधी खानदान के सिवा किसी दूसरे को प्रधानमंत्री के रूप में देखना नहीं चाहेगी इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के खिलाफ राहुल की ताबड़तोड़ बल्लेबाजी को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि 2019 में राहुल को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीद्वार के तौर पर पेश कर सकती है.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पार्टियां उनके विदेश  दौरों, वायदा पूरा नहीं करने और मंहगाई-आर्थिक नीति को लेकर प्रहार कर रहे हैं वहीं सबसे बड़ा मुद्दा इस समय यह बन रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 18 महीनो में 30 देशो का दौरा कर चुके है इससे देश को क्या मिला? आलोचक सवाल कर रहे हैं कि बार-बार विदेश दौरों की जरूरत क्यों? वे यह भी कहते हें कि प्रधानमंत्री को देश में रहकर घरेलू समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। भाजपा व एनडीए की सारी उम्मीदें चुनाव में नरेन्द्र मोदी और अमितशाह पर रही हैं. दिल्लाी और बिहार चुनाव में यह मिथ्या टूट गया अब यूपी में भी अमित शाह की चमक फीकी पडऩे लगी है.बिहार चुनाव में करारी हार के बाद पुराने नेताओं की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए उत्तर प्रदेश में अभी से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की राजनीतिक समझ और काबिलियत पर सवाल उठाएं जाने लगे हैं। पार्टी के भीतर पुरानी गुटबाजी नए जोर के साथ सिर उठा रही है जिसका असर और बढ़ सकता है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दो साल बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के टिकट बांटने के वक्त तक सिरफुटौवल का नजारा होगा.बीते लोकसभा चुनाव से ऐन पहले अमित शाह को उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी बनाया गया था. राज्य में आम चुनावों में मिली शानदार जीत को अमित शाह के नेतृत्व और सांगठनिक क्षमता का करिश्मा बताकर प्रचारित किया गया था. भाजपा में शत्रुधन सिन्हा ,आरपी सिंह जैसे बहुत से नेता हैं जो पार्टी के लिये सरदर्द बने हुए हैं अपने बयानों से पार्टी को मुसीबत में डालने वालों की भी कमी नहीं है यह सब महागठबंधन को लाभ पहुंचायेगा.लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की भारी जीत के बाद से अब का हाल देखा जाये तो सब कुछ ठीक नहीं चल रहा-बिहार में बहुत पहले जदयू ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था जबकि पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के बीच भी कुछ ठीक नहीं चल रहा. भाजपा अकेले पड़ती जा रही है इस दौर में महागठबंधन आगे चलकर बनता है तो यह उसके लिये फायदेमंद साबित होगा लेकिन इस बीच अगर नरेन्द्र मोदी ने कोई करिश्मा कर दिया तो यह इस पहल में बे्रक लग सकता है.राष्ट्रीय महगठबंधन से पूर्व कुछ राज्यों में महागठबंधन बन सकते हैं जिसके बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन का भविष्य तय हो पायेगा!





   

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

सरकारी कामगारों ने तो मंहगाई की बेतरनी पार कर ली लेकिन आम आदमी! वह तो...





सरकारी कर्मचारियों को बधाई! शुभकामना की उनका वेतन नये वर्ष से तीन गुना हो जायेगा-बढ़ती मंहगाई में उनको यह बहुत बड़ी राहत है. एक सरकारी  कर्मचारी जो अब तक सात हजार रूपये की न्यूनतम तनख्वाह पाता था वह अब अठ्ठारह हजार रूपये प्राप्त करने लगेगा.जस्टिस माथुर आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी और उसके अनुसार अब सरकार को निर्णय लेना है-यह निर्णय सरकार के अनुसार उनके द्वारा स्टडी करने के बाद जनवरी से लागू होगा परन्तु इस बढ़ौत्तरी से बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं कि सरकारी कर्मचारियों की नैया तो इस मंहगांई की धारा में पार हो जायेगी मगर शेष आम आदमी जो निजी, सार्वजनिक व रोज कमाकर खाता है उसके जीवन का क्या होगा?अभी से भारी टैक्स में फटे हाल जी रहे लोगों की जिंदगी पर अब सरकार अपने कर्मचारियों को खुश करने के लिये ऐसा तीर चलायेगी कि वे उठ नहीं सकेंगे मसलन सरकार कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने के लिये पैसा एकत्रित करने सकल कर्म करेगी- याने कर्ज लेगी, टैक्स बढ़ायेगी?अकेले रेलवे को अपने कर्मचारियों को अठ्ठाईस हजार करोड़ रूपये देना होगा. पहले से यात्रियों पर बोझ डालती आ रही रेलवे इसके लिये फर किराया,माल भाड़ा बढ़ायेगी. यह भी हो सकता है कि रेलवे निजीकरण की दिशा में आगे बढ़े. हम मानते हैं कि सरकार अपने खर्च को कम करें तो भी समस्या का बहुत हद तक हल हो सकता है लेकिन नहीं होगा.सरकार और उसके लोग अपनी सुविधाएं कभी कम नहीं करेंगे, ऊ पर से सरकार में बैठे लोग अपने वेतन में और बढ़ौत्तरी की मांग
करेंगे तथा इसे मान भी लिया जायेगा अर्थात मंहगाई से आम आदमी का पेट और पीठ दोनों एक हो जायेेगी.हकीकत यही है कि सरकारी कर्मचारियों के लिये 1.02करोड़ रूपये जुटाने के लिये खूब पापड़ बेलने पड़ेंगे लेकिन इसमें सबसे अहम बात यह भी है कि सरकार अपने कर्मचारियों को देने वाला बहुत बड़ा हिस्सा वापस अपने खजाने में एकत्रित भी कर लेगी जैसे अगर सरकार के अनुसार उसपर 1.02 करोड़ का बोझ बढ़ता है तो उसे 25 से 30 प्रतिशत पैसा कर्मचारियों को मिलने वाले पैसे में से टैक्स के रूप में वसूल कर लेगी दूसरा दस प्रतिशत पैसा कंपनियों के रास्ते सरकार की जेब में होगा चूकि कर्मचारी वेतन बढ़ौत्तरी के बाद कार,बाइक और कंज्यूमर ड्यूरेबिल गुड्स की तरफ बढ़ेगें- कर्मचारियों को खर्च ऐसे साधनों पर एक रूपये में से साठ पैसे के आसपास होगा. अनुमान है कि इस प्रकार बढ़े हुए वेतन का करीब पचास से साठ हजार करोड़ रूपये ओपन मार्केट में पहुंच जायेगा.कर्मचारियों के लिये गठित आयोगो में यह सातवां वेतन आयोग है जिसने अपनी रिपोर्ट सौंपी है. अब तक की सारी सिफारिशों को सरकार लागू कर चुकी है तथा सरकारी कर्मचारी इसका फायदा भी उठा रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो कि विख्यात अर्थशास्त्री भी हैं ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है वैसे भी नई सरकार जो मंहगाई को मुद्दा बनाकर सरकार में आई है वह टैक्सों में वृद्वि करने के अलावा मंहगाई कम करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकी है, ऐसे में मंहगाई के विकराल मुंह को मोदी सरकार इस बढ़ौत्तरी के बाद कैसे बंद करेगी यह एक यक्ष प्रश्न है. सरकारी कर्मचारियों ने तो नैया पार कर ली किन्तु आम आदमी क्या करेगा? वह कैसे अपने परिवार को चलायेगा? एक तरफ सरकारी कर्मचारियों को अभिजात्य वर्ग का दर्जा मिल गया वहीं इसके बाद महीने तनख्वाह व रोज मेहनत करने वालों का जीवन गरीबी और आर्थिक बोझ में जस की तस है जो रेगिस्तान में मृग तृष्ण की तरह चल रहा है कि कहीं आगे तो अच्छे दिन आयेंगे....





बुधवार, 18 नवंबर 2015

बोलने की आजादी का जबरदस्त दुरूपयोग अब समस्या बन रही !


देश की राजनीति का संतुलन क्यों बिगड़ रहा? शायद इसलिये भी कि देश में बोलने की आजादी का दुरूपयोग इससे पहले कभी नहीं हुआ. लोग अपना काम छोड़कर कभी सहिष्णुता-असहिष्णुता पर तो कभी व्यक्तिगत आक्षेपों को लेकर  एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में आपे से बाहर हो रहे हैं.दुख इस बात का है कि बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के बड़े लोग भी इन लफड़ो में पड़कर अपने छबि पर दाग लगवाने लगे हैं. कुछ तो एकदम अति कर रहे हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो सात समुन्दर पार बैठे लोगों को कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे.बात अगर चुनाव तक सीमित रह जाती तो भी समझ में आता लेकिन चुनावों के निपटने के बाद भी यह सिलसिला बना हुआ है. पिछले  चुनावों के बाद से कुछ ऐसा हो गया कि लोग मुंंह से बाण चलाने में ज्यादा रूचि दिखा रहे हैं. संविधान में प्रदत्त अधिकारों का जिस प्रकार अभी दुरूपयोग हो रहा है वह इससे पहले कभी नहीं हुआ. यह अब विचार करने का विषय है कि क्या लोगों को इतनी आजादी दी जानी चाहये कि वह अपनी बातों से देश की अस्मिता पर ही सवाल उठा दे. सरकार की नीितयों के खिलाफ अगर विपक्ष का हल्ला हो तो बात समझ में आती है यहां तो सीधे-सीधे व्यक्तिगत मामलों में भी प्रहार हो रहे हैं जिसका कोई अंत भी नजर नहीं आता. इसका सारा असर देश के विकास और देश की एकता व अखंडता पर भी पड़ रहा है.पूर्व के बयानों को छोड़ हाल के कुछ बयानों पर नजर डाले तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि पाॢटयां किस तरफ जा रही हैं जैसे यूपी के मंत्री समाजवादी नेता आजम खान के सुपर पावर पर दिये बयान के बाद कांग्रेस के पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर का बयान- जिसे कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने आतंक को संप्रदाय से जोड़कर कांग्रेस को ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहां चुप्पी भी कांग्रेस नेतृत्व के लिए भारी पड़ सकती है। भाजपा के खिलाफ संसद में मजबूत मोर्चा बनाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस से इस मुद्दे पर साथी भी दूर-दूर हो गये.उप्र के मंत्री व सपा नेता आजम खान ने पेरिस की आतंकी घटना को यह कहकर परोक्ष रूप से सही ठहरा दिया था कि पश्चिमी देशों ने जो कुछ किया है यह उसी का नतीजा है.दो दिन बाद ही कांग्रेस के पूर्व मंत्री अय्यर ने पाकिस्तान में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी पाकिस्तान में जाकर मोदी सरकार की आलोचना की. कांग्रेस ने उसे उनकी व्यक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड़ लिया था लेकिन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू और जावडेकर ने इसे देशद्रोह करार दिया.अब शकील का  ट्वीट भी देखिये वे उसमें कह रहे हैं कि शुक्र है कि छोटा राजन और अनूप चेतिया मुस्लिम नहीं हैं वरना मोदी सरकार कुछ और कहानी कह रही होती. इसपर भाजपा का आक्रोशित होना स्वाभाविक था. उसने कहा आतंक की घटना पर भी कांग्रेस राजनीति कर रही है वह आतंकियों को भी हिंदू और मुस्लिम के चश्मे से देख रही है। यह तुच्छ राजनीति है. इधर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद कैसे चुप रहते कह दिया- भाजपा लोगों को बांटने का काम कर रही है। चुनावों में हार के बाद कांग्र्रेस इस चिंतन में लगी है कि क्या पार्टी की छबि हिंदू विरोधी होती जा रही है? वाक युद्व में नेता ही नहीं. सन्यास लेकर राजनीति में आये कई ऐसे विद्वान भी कूद पड़े हैं जिनका हम यहां जिक्र करने लगे तो यह कालम पुरेगा नहीं इसलिये इसे यहीं विराम देते हुए यह कहना चाहेंगे कि देश में चला वाक युद्ध चाहे वह सहिष्णुता पर हो धर्म और राजनीति से संबन्धित हो अथवा  आंतकवाद अथवा अन्य मुद्दों पर वह शालीन नहीं रहा तो हमारी एकता, अखंडता और संप्रभुता सभी के लिये खतरा पैदा कर देगा.




मंगलवार, 17 नवंबर 2015

सरकारी खजाने को चूना-विभागीय जांच का ढोंग कब तक? नौकरी से क्यों नहीं हटाये जाते!




एक आम आदमी जब खर्च करता है तो सोच समझकर करता है कि कहीं आगे उसको परेशानी तो न हो जाये लेकिन क्या हमारी निर्वाचित सरकारे ऐसा कर रही है? शायद नहींं! ऐसा इसलिये भी कि उसको यह पैसा खर्च करने में दर्द नहीं होता! चूंकि यह पैसा उस साधारण आदमी की जेब काटकर प्राप्त होता है जो दिनरात मेहनत करता है.भारत जैसे गरीब देश में आम आदमी पैदा होने के बाद से लेकर अपना जीवन समाप्त होते तक इतना टैक्स पटा चुका होता है कि उसकी आने वाली पीढ़ी बिना टैक्स पटाये रह सकती है लेकिन सरकार के अनाप शनाप खर्चों ने उसकी जिंदगी को जहां टैक्स और मंहगाई के बोझ से लाद दिया वहीं भ्रष्टाचरण के चलते उसे इतनी परेशानी में डाल दिया है कि उसकी कमर ही टेढ़ी हो गई है.वैसे बहुत से उदाहरण है इसके किन्तु ताजा   उदाहरण हाल के उस वाक्ये का लें जिसमें सरकार के एक विभाग ने अपने विभाग की वेबसाइट तैयार करने के लिये जनता की जेब पर ऐसा डाका डाला कि सबके होश उड़ गये.वेबसाइट के लिये नब्बे लाख रूपये निकाले गये जबकि इस पर खर्च करीब दो लाख के आसपास आता है. जनता किससे पूछे कि यह किसने किया और ऐसा करने वालों को नौकरी से निकाला गया? जब चोर को कोई नौकरी नहीं देता तो सरकार और जनता का पैसा चुराने वालों को क्यों नौकारी पर रखा जाता है?क्या हमारे देश में पढ़े लिखे योग्य और ईमानदार लोगों की कमी है? प्राय: ऐसे मामलों की विभागीय जांच कमेटी बनाकर इतिश्री कर दी जाती है जिसका निष्क र्ष कभी आता ही नहीं! यह सरकारी विभागों का फैशन हो गया है, किसी में कोई खौफ नहीं जब तक भ्रष्टाचारियों की नौकरी
घपले घोटालों के तुरन्त बाद खत्म नहीं कर दी जाती तब तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा. आज स्थिति यह है कि सरकार की दो करोड़ की योजना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के मिश्रण से बीस करोड़ रूपये की बन जाती है.स्वाभाविक है कि भारी गोलमाल होता है. कुछ ऐसी योजनाएं भी हैं जो निर्धारित समय में पूरी नहीं होती साथ ही उसकी क्वालिटी इतनी खराब होती है कि वह जनता के उपयोग के लायक नहीं रह पाती.इन्हें तोडफ़ ोड़ कर फिर बनाया जाता है. इस पर फिर जनता का पैसा निकाला जाता है. यह एक सिलसिला सा चल पड़ा है. हममें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो विकास नहीं चाहता किन्तु विकास के नाम पर हमारी जेब भी तो मत काटो.आप सेवा ठीक से दे नहीं रहे हर सेवा पर चौदह प्रतिशत टैक्स वसूल कर रहे हैं. मनोरंजन कर,एक्साइज डयूटी,स्वच्छता कर और न जाने ऐसे कितने करों से हमें लाद दिया गया है-ऊपर से रेल किराया, बिजली किराया, टेलीफोन किराया सब पर बजट के बाद भी पिछले डोर से एंट्री की जा रही. दूसरी ओर सरकार के खुद कुछ लोग घोटाला कर आम आदमी का पैसा अपने घरो में ठूस रहे हैं उस पर बोलने वाला कोई नहीं? अब फिर माननीयों के वेतनमान में बढ़ौत्तरी की चर्चा चल रही है इसके लिये भी किसी न किसी मद पर टैक्स लगाकर हमारे जेब से ही पैसा कटेगा. आखिर कब तक सामान्य वर्ग इस आजाद देश में इस प्रकार की सरकारी मनमानी और अव्यवस्था को बर्दाश्त करता रहेगा?

सोमवार, 16 नवंबर 2015

आतंक के साये में विश्व,अब तो यह लगने लगा कि अगला सूरज देख पायेेंगे या नहीं?



एक साल के भीतर जिस तरह से आतंक का रूप विश्व में सामने आया है वह इंसानियत को सोचने के लिये मजबूर कर रहा है कि वह उसके लिये कितना खतरनाक है. भावी पीढ़ी को चिंतित होना चाहिये कि आने वाला भविष्य उसे कहां लेकर जाने वाला है? भारत हो या फ्रांस अथवा अन्य शांतिप्रिय देश सर्वत्र यह चिंता है कि निकलने वाला अगला सूरज उसे देखने मिलेगा या नहीं? जिस प्रकार जेहाद ने सिर्फ एक वर्ष में विश्व के नक्शे पर अपना सिक्का कायम किया है वह न केवल चिंतनीय है बल्कि पूरी मानवता को खतरे में डालने वाला है. हमारे प्रधानमंत्री ने ठीक कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को तय करना चाहिये कि कौन आंतकवाद का साथी है और कौन मानवता के साथ है. मानवतावादियों को कुर्बानी के लिये तैयार रहना पड़ेगा. इस्लामिक संगठन आईएसआईएस जैसा आतंकवादी संगठन जिसने सिर्फ एक साल के अंदर पूरे विश्व में अपना झंडा गाड़ दिया है कि करतूते यह साबित करने के लिये काफी है कि यह सिलसिला थमने वाला नहीं. दुख तो इस बात का है कि हमारे बीच में ही कुछ लोग सारे मामले में मीरजाफर की भूमिका अदा कर रहे हैं. विश्व के साथ भारत कई सालों से आंतक के साये में है. वह अपनी धरती पर आंतकी खून के छीटे झेल चुका है और बार-बार विश्व समुदाय को उंगली उठाकर बता चुका है कि इसे रोकोयही इसकी जड़ में है किन्तु सदैव हमारे आसुओं को अनदेखा करता रहा.अब जब खुद पर आई तो समझ आ रहा है कि भारत सही था. अब भी देर नहीं हुई है पाक-सीरिया जैसे देशों में छिपे आंतकवादियों के खिलाफ एक ठोस एक्शन की जरूरत है. भारत यह सदैव विश्व समुदाय से कहता रहा है कि हमारा पड़ोसी आस्तीन का सांप है उसे कुचलने में हमारी मदद करो लेकिन इस समुदाय के ही बहुतो ने उसपर कोई कार्रवाई करने की जगह उसे संरक्षण प्रदान किया आज इसी का परिणाम है कि वह एटम बम लेकर न केवल हमें धमका रहा है बल्कि विश्व को भी चुनौती दे रहा है. हमारी स्थिति आज यह है कि एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ शेर. हम आज अपनी सीमा के चारो तरफ एक कठिन स्थिति का सामना कर रहे हैं. हमने अपने पूर्व के अनुभवों से यह सबक तो लिया है कि हम पर आने वाले संकट में हमें कौन मदद करता है लेकिन आज की स्थिति में हम चारो तरफ से धिरे हुए हंै-हमारे पड़ोस में हमारे खिलाफ षडयंत्र का जाल बुना जा रहा है. पहला पड़ोसी नेपाल दूसरा पाकिस्तान, तीसरा चीन और चौथा बंग्लादेश दिखाने के लिये सब ऊपर-ऊपर से मित्रता का दंभ भरते हैं लेकिन हकीकत यही है कि हमें पूरी तरह अपने शिकंजे में फांसने का जाल बुना जा रहा है. हाल में जो चौकाने वाले तथ्य सामने आये हैं वह यही इंगित कर रहा है कि विश्व स्तरीय संकट की स्थिति में हमें अपने बलबूते ही अपनी रक्षा करनी होगी. आंतक और पड़ोसियों की दगाबाजी से हमें ज्यादा नुकसान न हो इसके लिये यह भी जरूरी है कि हम विश्व के देशों के साथ अपने संबन्धों को और मजबूत बनाये. इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल का स्वागत किया जाना चाहिये कि उन्होंने अंदरूनी विरोध के बावजूद विदेशों में घूमकर बहुत नहीं तो कुछ देशों से अच्छी मित्रता कायम की है जो भविष्य में हमें आतंक से निपटने में बहुत हद तक मदद करेगा.

रविवार, 15 नवंबर 2015

ट्रेड सेंटर हो या मुम्बई,पेरिस हर जगह इंसानियत ही लहूलुहान होती है!






आतंक का नाम कुछ भी हो लेकिन हर बार इंसानियत ही लहूलुहान होती है.पहले न्यूयार्क का वल्ड ट्रेड सेंटर फिर मुंबई और अब पेरिस. लश्कर और अलकायदा के बाद आतंक का नया और सबसे खौफनाक चेहरा है आईएसआईएस जिसने पेरिस हमले की जिम्मेदारी ली है.पिछले शुक्रवार की रात पेरिस में उसकी इस कारस्तानी के बाद पूरी दुनिया हिल गई, इस हमले को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आतंकी हमला माना गया है.चौदह साल पहले 11 सितंबर 2001 को पूरी दुनिया ने आतंक का वो मंजर देखा जिसे देखकर इंसानियत खौफजदा हो गई. अमरीका के मशहूर शहर न्यूयार्क पर आतंकियों ने इस तरह हमला किया कि हर कोई हैरान रह गया. विमान के सहारे दुनिया की एक आलीशान इमारत वल्ड ट्रेड सेंटर पलभर में जमीदोज कर दी गई. हजारों लोग मौत के मुंह में समा गए.दूसरा बड़ा हमला भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुआ जब आतंकियों ने कई जगह हमले किए. कई बेगुनाहों की जान ले ली. कई लोगों को बंधक भी बनाया जिसमें विदेशी पर्यटक भी शामिल थे. पूरा देश सन्न रह गया था. 24 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद सुरक्षा बलों ने जान पर खेल कर आतंकियों को मार गिराया और एक आतंकी कसाब को जिंदा पकड़ लिया था. जिसे बाद में फांसी दी गई.इधर शुक्रवार की रात पेरिसवासी अपनी धुन में मग्न थे. हर कोई वीकेंड का मजा लेने शहर की सड़कों पर था. शहर के एक बड़े स्टेडियम में खुद फ्रांस के राष्ट्र्रपति ओलांद फुटबॉल मैच का मजा ले रहे थे तभी इस खूबसूरत शहर पर आतंकियों ने कहर ढां दिया. एक साथ कई जगहों पर धमाके किए गए. गोली बारी हुई और कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया.दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस जिसने इस हमले की जिम्मेदारी ली है.वहशी बन चुका है.उसने छोटे छोटे बच्चों को अपने कब्जे में रख आंतकी बना दिया है. बगदादी जो इस संगठन का लीडर है के पास ऐसे दस हजार बच्चे हैं इनमें से ही एक पन्द्रह साल का बच्चा मानव बम बन पेरिस स्टेडियम में घुसने का प्रयास कर रहा था जिसने बाद में अपने आपको विस्फोट कर खत्म कर दिया. इस आतंकी संगठन का मकसद है इराक और सीरिया सहित दुनिया भर में इस्लामिक स्टेट का झंडा लहराना. इसी मकसद को लेकर इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया का गठन हुआ .संगठन ने अपने मकसद को हासिल करने के लिए आतंक को अपना हथियार बना रखा है.जून 2014 में इस  संगठन ने दुनिया के नक्शे पर पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई. तब इस संगठन के स्वयंभू कमांडर अबु बकर अल बगदादी ने अचानक ही एक रोज़ इराक के मोसुल और तिकरित शहरों के दरम्यान खुद को इस्लामी हुकूमत का नेता बताकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी. लेकिन इसके साथ ही बगदादी ने अपने जिस प्लान का खुलासा किया, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया.बगदादी ने कहा कि वो जल्द ही दुनिया के तमाम इस्लामी मुल्कों के साथ-साथ पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत कायम करके रहेगा मगर तब दुनिया ने आईएसआईएस को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था. उसकी वजह ये थी कि बगदादी से पहले भी दुनिया में ना जाने कितने तानाशाह पैदा हुए और बर्बाद हो गए. लेकिन इस्लामी हुकूमत के नाम पर आईएसआईएस ने जिस तरीके से क़त्लेआम की शुरुआत की, उसे देख कर सबका सिर चकरा गया. ओसामा बिन लादेन के अल-कायदा से अलग होकर पश्चिमी इराक और पूर्वी सीरिया के एक बड़े इलाके में सुन्नी आतंकवादियों का ये गुट धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा था. लेकिन बगदादी की कमान संभालते ही आतंकवादियों के इस गुट ने अपने रास्ते में आने वाले तमाम लोगों को गाजर-मूली की तरह मारने-काटने की शुरुआत कर दी. इस आतंकी गिरोह ने सिर कलम करने से लेकर, ऊंची इमारतों से नीचे फेंकने, जिंदा जला देने, बिठा कर सिर में नज़दीक से गोली मार देने जैसे नए मौत के खेल इजाद किए. और उनका वीडियो बनाकर जारी करना शौक बन गया. बगदादी की वहशी सेना के खिलाफ अमेरिका ने अपने साथी मुल्कों के साथ मिलकर अभियान शुरु किया है. दुनिया में आईएसआईएस के तमाम ठिकानों को खत्म करने योजना बनाई गई है. जिस पर काम चल रहा है. इस कार्रवाई से आईएसआईएस को बड़ा झटका लगा. मित्र देशों की यह कार्रवाई सीरिया की असद सरकार के भी खिलाफ थी. सीरिया के गृहयुद्ध में आईएस के खिलाफ हमले के मकसद से रूस भी कूद पड़ा. जिसे असद सरकार का हिमायती माना जाता है.रूस के एक विमान को भी मार गिराने में इसी संगठन का हाथ बताया जाता है पिछले साल सितंबर से हवाई हमलों में जुटा फ्रांस अब अपने सबसे बड़े युद्धपोत को मैदान में उतारने की तैयारी कर चुका है. इसी बात से आईएसआईएस बौखला गया है. अपने ठिकानों पर हुए हमलों से बौखलाकर ही उसने फ्रांस को दहलाने की साजिश रची और शुक्रवार की रात आईएस ने पेरिस पर हमला करके अपने खतरनाक इरादों को जता दिया. आईएसआईएस अब भी शांत नहीं हैं उसने शनिवार को एक वीडियो जारी कर कहा है कि  पेरिस का हमला सीरिया में दखल और पैगंबर हजरत मौहम्मद के अपमान का नतीजा है.वीडियो में अरबी बोलने वाला एक आतंकी धमकी दे रहा है कि यदि सीरिया में फ्रांस ने बमबारी जारी रखी तो हमला झेलना पड़ेगा, जब तक तुम बमबारी करते रहोगे शांति से नहीं रह पाओगे. तुम लोग बाजार के लिए निकलने में भी खौफ खाओगे.वीडियो में इस आतंकी के आसपास दूसरे लड़ाके खड़े दिख रहे हैं. इसमें सीरिया में जारी लड़ाई को हॉली वार यानी पाक युद्ध करार दिया है.आईएस ने वीडियो में अपनी ताकत बताने का प्रयास भी किया है. कहा है कि तुम लोग किसका इंतजार कर रहे हो. हमारे पास हथियार हैं. कार हैं, जो किसी भी वक्त हमला करने के लिए तैयार हैं. यहां तक कि जहर भी तैयार रखा है. वो जहर पानी और खाने में भी मिलाया जा सकता है. आईएस अब तक 11 देशों में हमले कर चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि पेरिस की घटना सबके सामने मौजूद आतंकवाद के खतरे के प्रति पश्चिमी देशों के रूख को बदलकर रख सकती है..आतंकवाद से बुरी तरह त्रस्त भारत के प्रधानमंत्री हादसे के समय घटनास्थल से चार सौ अस्सी किलोमीटर दूर थे . उन्होने पेरिस में हुए बर्बर आतंकवादी हमले को 'मानवता पर हमलाÓ बताते हुए  मांग की कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए संयुक्त राष्ट्र को आतंकवाद को परिभाषित करना चाहिए जिससे दुनिया यह जान सके कि कौन आतंक का समर्थन कर रहा है और कौन उसके खिलाफ है.दुनिया को यह स्वीकार करना चाहिए कि यह केवल पेरिस पर हमला नहीं है, केवल फ्रांस के नागरिकों पर हमला नहीं है और न ही केवल फ्रांस पर हमला है बल्कि मानवता पर हमला है. प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं चाहूंगा कि अपनी 70वीं वषर्गांठ मनाते समय संयुक्त राष्ट्र् आतंकवाद को परिभाषित करने को लेकर और समय न गंवाएं. प्रस्ताव उसके समक्ष है. जिससे कि हमें यह पता लग सके कि कौन आतंकवाद के साथ है, कौन आतंकवाद की मदद कर रहा है, कौन आतंकवाद को समर्थन दे रहा है और कौन आतंकवाद का शिकार है, कौन आतंकवाद के खिलाफ है और कौन मानवतावाद के साथ रहकर कुर्बानी देने को तैयार है.

शनिवार, 14 नवंबर 2015

इतिहास को इतिहास के पन्नों पर ही रहने दो, देश की सोचो!



इतिहास पुरूषों को इतिहास में ही रहने दीजिये,देश की सोचिये- परिवार के किसी के भी गुजरने का गम पूरे परिवार व सगे संबन्धी को रहता है और यह  देश का महान व्यक्ति रहा तो यह दायरा ओर बढ़ जाता है लेकिन ईश्चर ने हम मनुष्यों को इतनी शक्ति तो दी है कि हम कुछ दिनों में ही उनके जाने के गम को भूलक र अपने काम में जुट जाये. हर मृतात्मा की याद तो बहुत आती है लेकिन सिर्फ उसे ही याद करके हमारा बाकी जीवन तो नहीं चल सकता. कुछ दिनों से देश में इतिहास के पन्नों को खोजकरआत्माओं को डिस्टर्ब करने का खेल शुरू हुआ है जो किसी के लिये राजनीतिक रोटी पकाने का साधन बन गया तो किसी के लिये अपने को खोने और उनकी आत्मा की शंाति के लिये सकल कर्म करने का! क्या कुछ ऐसा ही कर्नाटक में नहीं हो रहा जहां इतिहास पुरूषों को इतिहास के पन्नों से निकालकर सड़क पर हल्ला मचाने के लिये ला खड़ा किया गया है? कर्नाटक में कांग्रेस का राज है, यहां पिछले कुछ महीनों से जो कुछ हो रहा है वह किसी भी सभ्य व्यक्ति के गले नहीं उतर रहा. इतने दिनों बाद अचानक एक मृत महापुरूष को अचानक उनकी जयंती मनाने का सपना किसने देखा और यह क्यों साकार करने की ठानी? ऐसी कौनसी उपलब्धि इस आयोजन से मिल जायेगी जिससे राज्य या देश का भला होगा? हम इस विषय को यही छोड़ देश में मृतकों के नाम पर जो कृुछ हो रहा है उसकी ओर प्रबुद्व वर्ग का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जो इतिहास पुरूप हो गये उन्हें अपने पन्नों पर ही रहने क्यों नहीं दिया जा रहा? क्यों उन्हें बुत बनाकर किसी चौक चौराहे पर प्रदर्शित किया जा रहा ? कुछ दिन या खास दिन तो उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोडी जाती लेकिन बाद में उनकी मूर्तिया या उनकी सड़क, उनके नाम से भवन धूल गंदगी  खाती पड़ी रहती  है या फिर पक्षियों को बीट करने व आते जाते लोगों को उनके सामने लघु शंका करने के लिये छोड़ दिया जाता?क्यों लोग यह नहीं समझते कि हम एक तरह से उन इतिहास बन गये लोगों की मूर्ति को चौराहे या सड़क गलियों में स्थापित कर उनका सम्मान करने की जगह पूर्णत: उनका अपमान कर रहे हैंै-देश की आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी में से तो कई महात्मा गांधी, भगतसिह, सुुभाषचंद बोस के बारे में कुछ नहीं जानते लेकिन इतिहास के पन्ने यह उन्हें जरूर बता देते हैं कि वे कौन थे और उनका योगदान क्या था. मगर राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिये नामकरण, मूर्ति स्थापना करना यह किसी को याद करने की जगह उनका अपमान ही करता है. कई लोग तो इन महान हस्तियों का उच्चारण भी सही ढंग से नहीं कर पाते.कुछ माननीय ऐसे भी हैं जिन्हें यह भी पता नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कौन था?आज देश कई किस्म की समस्याओं से ग्रसित है आने वाले समय में यह समस्याएं और जटिल होंगी.यदि हम इतिहास के पन्ने पलटकर एक के बाद एक मृतआत्माओं को सड़क पर लाना शुरू कर देंगे तो शायद देश की सड़के ऐसी आत्माओं से भरने के लिये कम पड़ेंगी,अत: जो इतिहास हो गया उसे इतिहास ही रहने दो उसे आज की गंदी राजनीति मे मत घसीटो वरना अभी कर्नाटक में तीन मरे हैं आगे चलकर देश की सड़कों पर इतनी लाशें बिछ जायेंगी कि उसे हटाना मुश्किल हो जायेगा. सवाल उन राजनीतिक पार्टियों से भी है जो देश के बारे में और दुनिया में बढ़ते आतंक के बारे में सोचने की जगह इन मृत आत्माओं की याद अचानक करके हल्ला मचा देते हैं? जबकि जनता की अपनी ही समस्याएं इतनी ज्यादा है कि निपटायें नहीं निपटती....और तो ओर अब इन पुरानी आत्माओं को लेकर कई लोगों की जिंदगी पर बन आई है-धमकी चमकी और मारकाट का दौर शुरू हो गया..कोई तो आगे आये जो पहले इनको समझायें!!!!

रविवार, 8 नवंबर 2015

बिहार चुनाव भविष्य में देश की राजनीति को नये मोड़ पर ले जायेगा?




अब कोई लाख कितना भी कहे मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का ग्राफ तेजी से गिरा है.बिहार के चुनाव में इतनी बड़ी पराजय होगी इसकी कल्पना नहीं की थी-चुनाव से पूर्व जो सर्वेक्षण महागठबंधन के पक्ष में आये उसकी संभावना मतगणना के शुरूआती रूझान में जरूर धूमिल होते नजर आई लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि मोदी लहर बिहार में खत्म हो चुकी है.इन नतीजों के पूर्व शनिवार को त्रिवेन्द्रम के स्थानीय चुनाव में भाजपा को मिली सफलता ने उन्हे जरूर इस बात की उम्मीद दिलाई थी कि बिहार भी उनके हाथ में होगा. दिल्ली में हार का बदला लेने पूरी तरह कमर कसकर भाजपा ने बिहार में अपना दाव खेला था किन्तु उसे सफलता नहीं मिली.असल में भाजपा की सबसे बड़ी गलती तो यह रही कि बिहार में उसने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार की ताकत को कम आंका और पूरे विश्वास के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतीष्ठा को ही दांव पर लगा दिया. प्रधानमंत्री देश का प्रधानमंत्री न होकर उन्हें पार्टी का प्रधानमंत्री बना दिया गया. अकेले अमित शाह को प्रचार अभियान की बागडौर सौंप दी जाती और कुछ अन्य स्टार प्रचारकों के हाथ मेंं यह काम सौंपा जाता तो शायद पार्टी को इतनी छिछलालदर का सामना करना नहीं पड़ता. चुनाव के दौरान पार्टी के कतिपय नेताओं के बड़बोलेपन ने भी पार्टी की साख को जनता के सामने एकदम  गिराकर रख दिया. ऊलजलूल मुद्दे उछालने से यह कहा जा सकता है कि इससे पार्टी को पूरी तरह नुकसान का ही सामना करना पड़ा. दूसरी प्रमुख बात यह कि  दिल्ली और बिहार दो राज्य हाथ से निकल जाने के बाद अब आगे होने वाले कुछ और अन्य विधान सभा चुनाव के लिये भाजपा को अपनी रणनीति में भारी बदलाव करना पड़ेगा. दूसरी साख में आई गिरावट का असर देश की राजनीति में पडऩा स्वाभाविक है. एक बात इस चुनाव में साफ हो गई कि अब जनता को भरमाने, उसे ठगने के दिन लद गए. दोनों खेमों अर्थात एनडीए और महागठबंधन ने खूब मेहनत की लेकिन चुनाव के आखिरी दौर में जो चुनावी विश£ेषण आया वह साफ यह बता रही थी कि महागठबंधन अर्थात लालू नीतिश कुमार की जोड़ी को अच्छी सफलता मिलने वाली है. यह हुआ भी साथ ही गठबंधन में शािमल पार्टियों ने भी बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया. कांग्रेस गदगद है तो दूसरी तरफ एनडीए में रामविलास पासवान और जितन राम मांझाी को लगे झटके इतने तेज हैं कि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य ही खतरे में आने लगा  है.यद्यपि अभी जब हम इन पंक्तियों को लिख रहे हैं तबतक चुनाव परिणाम पूरे नहीं आ पाये थे फिर भी यह तय हो चुका है कि महागठबंधन सरकार बना रही है और भाजपा ने हार स्वीकार कर ली है ऐसे हालात में लालू की पार्टी बड़ी पार्टी के रूप में उबर रही है और मुख्यमंत्री पद के लिये भी कोई विवाद नहीं है नीतिश ही मुख्यमंत्री होगें यह शरद यादव ने स्पष्ट कर दिया है. आगे आने वाले समय में महागठबंधन देशभर में क्या रणनीति बनायेगा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन भाजपा में अंदर ही अंदर बहुत कुछ हो सकता है.


शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता सिद्ध की,अभी भी देश में हजारों मुकदमें विचाराधीन!



फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता
सिद्ध की,अभी भी देश में
हजारों मुकदमें विचाराधीन!

26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12

लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.




फास्ट ट्रेक ने अपनी सार्थकता
सिद्ध की,अभी भी देश में
हजारों मुकदमें विचाराधीन!

26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12

लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.






26 मार्च 1972 को चन्द्रपुर महाराष्ट्र की सोलह साल की एक दलित लड़की से दो पुलिस वालों ने रेप किया. 'मथुरा रेप कांडÓ से कुख्यात यह मामला सेशन कोर्ट से हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पीडि़ता को न्याय मिलने में सोलह साल लग गये.यह तो न्याय में देरी की बात हुई किन्तु कहावत हैं न 'न्याय में देर है अंधेर नहींÓ-यह अब हमारी न्यायपालिका ने दिखाना शुरू कर दिया है. 16 दिसंबर को दिल्ली में 23 साल की फिजियोथेरोपी विषय की एक मेडिकल छात्रा से बस में गेंग रेप हुआ.सभी आरोपी पकड़े गये तथा उन्हें एक साल के अंदर दस सितंबर 2013 को मौत की सजा सुनाई गई- इस मामले ने देश में रेप के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को इसके लिये न्यायिक आयोग बिठाना पड़ा और आयोग को अस्सी हजार सुझाव देशभर से मिले-कानून में कुछ संशोधन भी हुआ कि न्तु रेपिस्टों को इससे कोई भय नहीं हुआ. दिल्ली रेप कांड के मुल्जिमों में से एक नाबालिग को तीन साल की सजा हुई जबकि बाकी में एक की मौत हो गई तथा शेष करीब चार को फांसी पर लटकाने का फैसला हुआ लेकिन इन्हें आज तक फांसी नहीं हुई.दिल्ली के ही उबेर रेप कांड ने निश्चित रूप से देश में जल्द फैसला देने का इतिहास बनाया है.11 महीने के भीतर दोषी को सज़ा सुना दी! इससे यह भी साबित हुआ है कि देश की न्याय व्यवस्था में देरी जरूर है अंधेर नहीं. पीडि़त को न्याय दिलाने के मामले में न्यायालय को पुलिस का सहयोग जरूरी है अगर वह इसमें पिछड़ गई तो पीडि़त को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. दिल्ली के  दोनों मामलो में पुलिस की भूमिका भी काबिले तारीफ है.निहायत भ्रष्ट, सुस्त और लापरवाह समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस की एक टोली ने 19 दिन के भीतर उबेर रेप कांड के अपराधी को गिरफ़्तार किया, उससे पूछताछ की, मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी सबूत और 28 गवाह जुटाये तथा 19 दिन के रिकार्ड वक्त में जांच पूरी करके अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. वाकई में क़माल था यह! इस मामले से 'फास्ट ट्रैक कोर्टÓ का सपना भी पहली बार साकार हुआ.इस फैसले के बाद अब ये सबक़ तो लिया ही जा सकता है कि निचली अदालतों में भारी तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का जाल तब तक बिछाया जाता रहे जब तक कि हमारी न्यायपालिका हर एक मामले का निपटारा उबेर रेप कांड की तरह निपटाने लायक न बन जाए. क़ानून का राज तब तक हो ही नहीं सकता, जब तक अदालती इंसाफ़ की प्रक्रिया निष्कलंक नहीं हो जाती. आज हमारी अदालतों में 3.15 करोड़ मुक़दमे विचाराधीन हैं. देश में कऱीब 16 हज़ार जज,12 लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, इस समय हर एक लाख व्यक्ति पर एक जज है जबकि विधि आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार कम से कम पांच जज प्रति लाख तो होना ही चाहिए. देश में 12 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड वकील हैं. 950 से ज़्यादा लॉ स्कूल में कऱीब पाँच लाख विद्यार्थी वकालत की पढ़ाई करने के बाद भी अदालतों में वकालत करने के लिए बमुश्किल 60-65 हज़ार नये वकील ही हर साल जुड़ते हैं.देश का सर्वोच्च न्यायालय 1950 में आठ जजों से बना था आज इसमें तीस पद हैं और 66 हजार मुकदमें विचाराधीन है. 65 साल में चालीस हजार मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट से हुआ है.





गुरुवार, 5 नवंबर 2015

फ्रीडम ऑफ स्पीच का दुरूपयोग करने वालों को सरकार का करारा जवाब!


यह पहला अवसर है जब मोदी सरकार ने फ्रीडम ऑफ स्पीच का दुरूपयोग करने वाले किसी बड़े शख्स को लपेटे में लेकर देश को एक संदेश देने का प्रयास किया है कि इस स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि कोई किसी के खिलाफ कुछ भी बोलेे और सरकार यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठै रहे.-होम मिनिस्ट्री ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि फ्र ीडम ऑफ स्पीच के नाम पर लोगों को किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए. इससे अशांति फैलेगी और दंगे होंगे. सरकार का यह रुख बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के उस पिटीशन पर आया है, जिसमें उन्होंने हेट स्पीच से जुड़े आईपीसी के सेक्शन 153, 153,153क, 295, 295, 298 और 505 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए थे. केंद्र ने स्वामी के खिलाफ हेट स्पीच के मामले में केस चलाए जाने को भी सही ठहराया है.सरकार का यह रूख उस समय सामने आया है जब देश में इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है. हैट स्पीच और इनटोलेंट बहस का प्रमुख मुद्दा है ऐसे समय सरकार का रूख साफ होने से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामें के रूप में पेश होने के बाद उन लोगों के मुंह पर लगाम लग सकती है जो इस मामले को लेकर सरकार को कोसती रही है और सरकार को असहिष्णु करार दे रही है.केंद्र की ओर से दाखिल एफेडेविट में स्वामी की एक बुक पर कहा गया है कि इस किताब में ऐसा कंटेंट है, जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत को बढ़ावा देता है. इस तरह से पिटीशन लगाने वाले ने आईपीसी की धाराओं का उल्लंघन किया है. स्वामी की पिटीशन पर केंद्र सरकार ने इस साल जुलाई में केंद्र से जवाब मांगा था. केंद्र के हलफनामे में कहा गया है-अगर लोगों को भारत के विभिन्न ग्रुपों के बीच नफरत फैलाने के लिए आजाद छोड़ दिया जाए तो अशांति फैल जाएगी.दंगे या दूसरे अपराध हो सकते हैं. सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा और विभिन्न वर्गों के बीच कड़वाहट बढ़ेगी. इससे समाज की शांति-व्यवस्था में दिक्कत आएगी. केंद्र सरकार के मुताबिक, हेट स्पीच से जुड़े कानूनों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते, क्योंकि संविधान भी नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वाजिब कंट्रोल की मंजूरी देता है. इन कानूनों से समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने में मदद मिलती है जबकि बीजेपी नेता स्वामी के खिलाफ दिल्ली, मुंबई, असम, मोहाली और केरल में हेट स्पीच के कई केस चल रहे हैं.उन्होंने आतंकवाद पर अपनी राय जाहिर की थी, जिसके बाद उन पर नफरत फैलाने के आरोप लगे. स्वामी ने अपनी पिटीशन में आरोप लगाया कि हेट स्पीच से जुड़े कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों में दखल देते हैं,इनका इस्तेमाल अपनी राय जाहिर करने वाले लोगों के खिलाफ हो रहा है. स्वामी का यह भी कहना था कि वर्तमान कानूनों की वजह से कोई शख्स लोगों की सोच बदलने के लिए पब्लिक डिबेट नहीं कर सकता क्योंकि इन कानूनों से उसे चुप करा दिया जाएगा.अब सरकार के हलफनामें के बाद सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में रूख साफ होगा.

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

नन्ही रेप पीडि़ता की नन्हीें बच्ची के जीवन में खुशी ऐसे लौटायेगा हाई कोर्ट!


नन्ही रेप पीडि़ता की नन्हीें
बच्ची के जीवन में खुशी
ऐसे लौटायेगा हाई कोर्ट!
हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस शाबिबुल हसनेन और न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय के उस एैतिहासिक फैसले का स्वागत करते हैं जिसमें उन्होंने एक ऐसी बच्ची को जीने की राह दिखाई है जो एक तेरह साल की बच्ची से रेप के बाद पैदा हुई. न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में यूपी सरकार को आदेश दिया है कि वो विक्टिम के नाम 10 लाख रुपए की एफडी कराए. सरकार विक्टिम की बेटी की देखभाल करे. इसके अलावा, विक्टिम के एडल्ट होने के बाद उसकी नौकरी का भी इंतजाम करें. सवाल यह भी पैदा हुआ है कि क्या इससे समाज को कोई संदेश जायेगा और व्यवस्था में कुछ सुधार होगा? इस फैसले के तुरन्त बाद थाने में रेप पीडि़ता के पिता ने रिपोर्ट लिखाई है कि रेपिस्टों ने उनकी दूसरी बेटियों से भी रेप की धमकी दी है-कोर्ट के फैसले के बाद अब समाज और पुलिस दोनों का दायित्व और बढ़ गया है कि वह अपने बेटियों की हैवानों से रक्षा कैसे करें. रेप पीडि़ता का यह मामला अबार्शन की मांग को लेकर  सात सितंबर को हाईकोर्ट पहुंचा था,उस समय मेडिकल जांच कराने की सलाह दी गई. जांच के बाद डॉक्टरों की टीम ने यह कहकर इजाजत देने से मना कर दिया कि प्रेग्नेंसी साढ़े सात महीने की हो चुकी है. लड़की ने 26 अक्टूबर को क्वीन मेरी हॉस्पिटल में बच्ची को जन्म दिया.बहरहाल  कोर्ट का फैसला इतना महत्वूपूर्ण और ऐतिहासिक है कि इससे पीडि़तों को तो कुछ हद तक राहत व न्याय मिलेगा लेकिन जो दाग उनके शरीर में लग जाता है उसे मिटाने में समाज कितनी बड़ी भूमिका अदा करेगा यह एक यक्ष प्रश्न की तरह अब भी मौजूद है.चूंकि रेप पीडि़ता को जिंदगीभर के लिये इस कष्ट को झेलना अनिवार्य हो जाता है जिसमें से कई पीडि़ताएं तो ऐसी होती है कि जो इसे सहन नहीं कर पाती और अपना जीवन ही खत्म कर देती है. ऐसे में दुष्टों के लिये कानून को और कड़ा करने की जरूरत है जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि नाबालिगों से दुष्टाचार करने वालों को नपुंसक बना दिया जाना चाहिये जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि नाबालिगों से दुराचार करने वाले लोग पशु हैं. इन दोनों फैसलों पर गौर कर सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिये कि कोई रेप जैसी हैवानियत का विचार ही न कर सके और अगर करता है तो उसकी कठोर सजा भुगतने के लिये भी तैयार रहे. बहरहाल रेप पीडि़त बच्ची के बच्चे मामले मेंं जो फैसला आया है उसमें गौर करने वाली बात है कि अब इस मामले में सरकार को विक्टिम के फ्यूचर के लिए पूर्व में पीडि़ता को दिए गए 3 लाख रुपए के अलावा 10 लाख की एफडी भी करानी होगी. विक्टिम के 21 साल होने पर उसे यह रकम सौंप दी जायेगी. विक्टिम की नवजात बच्ची का मेडिकल चेकअप करने के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को अडॉप्शन के लिए सौंप दिया जाएगा.विक्टिम की पढ़ाई के लिए राज्य सरकार कस्तूरबा गांधी विद्यालय में बिना किसी टेस्ट के एडमिशन दे. पढ़ाई से लेकर हर जरूरत की चीज मुफ्त में मुहैया कराई जाएगी. इस दौरान खाने और रहने की व्यवस्था भी राज्य सरकार को करना होगा. एक गंभीर बात उच्च अदालत ने कही है कि बच्चा चाहे रेप से ही क्यों न पैदा हुआ हो उसे अपने बायोलॉजिकल पिता की संपत्ति में अधिकार है लेकिन इस मामले में अभी आरोपी की संपत्ति में बच्ची को अधिकार के बारे में आदेश नहीं दिया गया है क्योंकि इससे कई कानूनी पेचीदगियां पैदा हो जाएगी चूंकि आरोपी को दोषी भी करार नहीं दिया गया है.संभावना है कि आगे आने वाले वर्षों में कानून में कुछ ऐसे संशोधन हो सकते हैं जो देश से इस बुराई को सदा के लिये खत्म करने में अहम भूमिका अदा करें.

सोमवार, 2 नवंबर 2015

असहिष्णुता क्यों सर चढ़कर बोल रही है! क्यों अचानक ऐसे हालात पैदा हुए?



अंग्रेजी के शब्द इनटोलेरेन्ट को हिन्दी में कहते हैं असहिष्णु अर्थात असहनशीनता या न बर्दाश्त करने वाला.यह नेताओं के साथ साथ उन सैकड़ों लोगों की जुबान पर भी है जो देश में असहिष्णुता के कारण गुस्से में हैं इनमे कलाकार भी हैं,इतिहासवेत्ता भी है समाजसेवी भी, वैज्ञानिक भी और फिल्मकार भी और आगे आने वाले समय में और भी कई लोग जुड जाये तो आश्चर्य नहीं. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?अगर साफ तौर पर आम आदमी की भाषा में कहेे तो यह सब कुछ पैदा हो रहा है कुछ लोगों की असहिष्णुता के कारण- वैसे इसके कई उदाहरण है कि न्तु जब जनप्रतिनिधियों व ब्यूरोक्रेटस में सहिष्णुता नहीं रह जाती तो इसका व्यापक असर समाज पर होता है एक उदाहरण से स्पष्ट है-मध्यप्रदेश की एक मंत्री है कुसुम मेहदले, वे प्रदेश में समाज कल्याण व बाल विकास विभाग सम्भालती है-स्वाभाविक है विभाग के अनुरूप उन्हें संवेधनशील व पोलाइट होना चाहिये लेकिन वे क्या संवैधनशील अथवा पोलाइट हैं? नहीं, चूंकि उन्होनें सड़क पर भीख मांगते बच्चे को अपने समीप पाकर उसे लात मारकर दूर कर दिया.उसका कसूर बस इतना था कि उसने कहा दीदी मुझे एक रूपया दे दो. वह तो भड़की उनके सुरक्षा जवानों ने भी उसे धक्के मारकर अलग कर दिया. दूसरा एक ब्यूरोक्रेट का है जिसे एक महिला से उसकी बात न सुनने व अभद्र व्यवहार के कारण स्थानान्तर कर दिया. ऐसे लोगो को तो एक मिनिट भी पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है बहरहाल देशभर में इनटोलेरेंट की घटनाओं की बाढ़ ने सभी को सोचने के लिये विवश कर दिया है कि इसका क्या सोल्यूशन निकाला जाये? बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी की जुबान पर भी असहिष्णुता की बात आ गई लेकिन इसके निदान पर कोई टिप्पणी नहीं हुई.बिहार चुनाव के दौरान तो नेताओं ने सारी हदे पार कर दी. असहिष्णुता अब देश में सर चढ़कर बहने लगी है.लोग समझने भी लगे हैं कि यह सब राजनीतिक स्वार्थ सिद्वी का प्रयास हैं.कर्नाटक के कलबुर्गी ओर दो तीन ऐसे लोगों की हत्या हुई तथा उत्तर प्रदेश में गाय का मांस खाने के अफवाह पर  एक व्यक्ति की पीटपीटकर हत्या करदी गई. एक दलित परिवार को जिदंा जलाकर मारने की कोशिश की गई -इस मामले में परिवार के दोनों बच्चे जिंदा जल मरें.महिलाओं से पशुता से भी बदतर व्यवहार असहिष्णुता की ऐसी मिसाले पूरे देश में है इसके चलते देश के लेखक साहित्यकार, इतिहासकार, वैज्ञानिक पहले सामने आये उन्होंने विरोधस्वरूप जहां अपने एवार्ड वापस किये वहीं कतिपय लोग इसकी तैयारी में है यह सब सरकार को सही रास्ते पर लाने का है ताकि वह लोगों के प्रति सहिष्णु बने- इस कड़ी में अब प्रसिद्व फिल्म अभिनेता शाहरूख खान भी सामने आ गये हैं उन्होंने भी अपने पुरस्कार वापस देने की बात कह दी है.देश की एकता, संप्रभुता बनाये रखने के लिये यह जरूरी है कि सहिष्णुता बनाये रखा जाये. इसे खत्म करने की कोई भी कौशिश देश को नुकसान ही पहुंचायेगी जो किसी भी राष्ट्रवादी को पसंद नहीं.

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

मुद्दे की बात को किनारे कर फिजूल की बातों पर यह कैसा शोर?



कांग्रेस के कुशासन से त्रस्त जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ नई सरकार बनाने की भूमिका निभाई थी? क्या वह जनता के विश्वास पर खरा उतर रही है? वास्तविकता कुछ यही कह रही है कि जनता को दिये वायदे सब खोखले निकल रहे हैं और सरकार जनता को किये गये वायदों से पीछे हट गई है, सरकार ने जो सपने दिखाये थे वह कोरी कल्पना बनकर रह गये हैं.सरकार स्वयं  आइने के सामने आये तो उसे सारी चीजे साफ दिखाई देगी कि वह अपने  वायदों से कितनी दूर चली गई है. देश में नाराजगी और अस्तिरता का माहौल निर्मित हो रहा है.विपक्ष तो अपना काम इस मामले में हवा देने का कर ही रहा है किन्तु सरकार के अपने लोगों की तरफ से भी जो बाते हो रही है वह समाज को एक गलत संदेश दे रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बड़े मुद्दों पर देर तक चुप रहते हैं तब तक पानी सर से उतर चुका होता है.देश को इस समय मन की बात नहीं दिल से दिल मिलाने की जरूरत है-सहित्यकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक नाराज हैं, भले ही सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही किन्तु इसे अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता .एक आक्रोश तो आम जनता में भी है- मंहगाई, भ्रष्टाचार तथा कथित अव्यवस्था से लोग परेशान हैं.कभी किसी मुद्दे को लेकर बहस छिड़ती है तो कभी किसी बेतुके बयानों पर हंगामा खड़ा होता है ऐसा लगने लगता है कि कानून की पकड़ कहीं नहीं है. इधर महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी के लिये रसोई एक समस्या बन गई है.शिक्षा,रोजगार स्वास्थ्य सब बेईमानी साबित हो रही है खाने की चीजों के दाम आम आदमी की पकड़ से बाहर है- प्याज के दाम से शुरू हुईमंहगाई दाल तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में यही हाल रहा तो  और भी कई वस्तुओं को अपनी लपेटे में ले लें तो आश्चर्य नहीं.दाल दो सौ रूपये की रिकार्ड बिक्री पर चल रहा है जमाखोर पूरा फायदा उठा रहे हैं जबकि बाजार पर से सरकार की पकड़ एकदम कमजोर होती दिख रही है.विकास के नाम पर जहां सरकार ने रेलवे में मालभाड़े से लेकर यात्री किराये तक में भारी वृद्वि की है वहीं सर्विस टैक्स और ऐसे अनेक टैक्सों में बढ़ौत्तरी कर जनता को बेकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है. एक  के बाद एक उपभोक्ता सेवाओं की फीस में बढ़ौत्तरी ने आम आदमी को तो कहीं खड़े रहने लायक ही नहीं छोड़ा है.कभी बिजली की दरों में वृद्वि तो कभी संपत्ति कर में बढ़ौत्तरी और कभी सफाई के नाम पर करों का बोझ एकदम समझ के परे वाली बात हो गई है.सबसे दिलचस्प बात तो यह कि अपनी असफलताओं को छिपाने का खेल भी बड़े स्तर पर जारी है इस बीच सवाल यह उठ रहा है कि जमाखोर और भ्रष्टाचारियों के पास एकत्रित धन को क्यों नहीं पब्लिक किया जा रहा? जमाखोरों से जब्त सामग्री को तत्काल बाजार में उतारा जाये. भ्रष्ट अफसरों और कालाबाजारियों से पांच-पांच दस-दस हजार करोड़ रूपये अगर जब्त किये जा रहे हैं तो उसे पब्लिक का टैक्स बोझ कम करने के लिये क्यों नहीं उतारा जा रहा?

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

फेसबुक और व्हाट्सअप में दुनिया तो जुड़ेगी लेकिन क्या साधू और शैतान भी रहेंगे?



मार्क जकरबर्ग भारत आये और उन्होंने फेस बुक को पूरे विश्व में फैलाने की बात कही. वे चाहते हैं कि एक अरब लोग आन लाइन हो जाये,वे यह भी कह रहे हैं कि भारत के बगैर दुनिया से नहीं जुड़ सकते. जब टीवी पूरे विश्व के बाद भारत में इंट्रोड्यूस हो रही थी तब भारत में परंपरा और संस्कृति की दुहाई देने वालों ने ेकोहराम मचा दिया था-सबसे ज्यादा इसका विरोध यहां हुआ था कि इससे हमारी परंपरा, संस्कृ ति नष्ट हो जायेगी लेकिन धीरे-धीरे यह धारणा बदलती गई और टीवी को सबने अंगीकार किया- अब वही लोग घर में सबसे आधुनिक मंहगी टीवी लेकर मनोरंजन कर रहे हैं. खैर यह तो होना ही था, किसी नई चीज को अंगीकार करने में थोड़ा समय तो लगता ही है लेकिन कुछ बुुराइयां तो सभी लेकर आती है उन्हें दूर करने का प्रयास भी उसी तरह किया जाना चाहिये. इसमें दो मत नहीं कि टीवी ने हमारी संस्कृ ति पर जोरदार हमला किया. कुछ मामले में जहां बदलाव हुआ तो कुछ को बिगाड़कर भी रख दिया. विदेशी और देशी का मिलाजुला मिक्श्चर भी सामने आया लेकिन अब जो मार्क  जकरबर्ग का हमला फेसबुक के रूप में हुआ है उसे यद्यपि भारतीयों ने काफी हद तक झेला है उसे और कितना झेल पायेंगे यह आगे आने वाले वर्षों में ही पता चल सकेगा.फेसबुक और व्हाट्सअप दोनों ही समाज में एक दूसरे से संपर्क बढ़ाने और अपना संदेश तीव्र गति से पहुंचाने का माध्यम है,इसमें गूगल तो हर बात का पता लगाने का भी माध्यम बन गया है अभी हाल ही गूगल और व्हाटसअप पर तो यूजर्स की जासूसी करने तक का आरोप लग गया है.इन हालातों में  अगर कोई उसके दुरूपयोग पर उतर आये तो कई घर बरबाद हो सकते हैं अब हैदराबाद की इस हकीकत को ही देखिये इंजीनियरिंग में पडऩे वाले 21 साल के छात्र अब्दुल माजिद ने फेसबुक में 18 महीनों तक दो सौ लड़कियों से दोस्ती की और धोखे से उनकी नंगी तस्वीरें लेकर उन्हें ब्लेक मेल करता रहा.अब्दुल ने अलग-अलग काल्पनिक महिलाओं के नाम से आठ फर्जी अकाउन्ट बनायें. इन खातों से वह प्रतिष्ठित स्कूलों की छात्राओं से दोस्ती  करता था और उनकी नंगी तस्वीरे मांगता था और उसके जरिये उन्हें डराकर ब्लेक मेल करता था. उसके कहने पर कई लड़कियों ने उसे तस्वीरे भेजी. उसने कइयों को पुलिस अधिकारी की बेटी बताकर यह कहा कि अगर वह उसे अपनी तस्वीर नहीं देगी तो वह उसके साथ हुई सारी बातचीत उसके पिता को बता देगा. मार्क जकरबर्ग की फेसबुक दुनिया के लिये है हम मानते हैं कि फेसबुक में हर प्रकार की व्यवस्था है कि लोग जिसे चाहे उसे अपने मन की बात बताये किन्तु एकाउन्ट तैयार करते समय यह देखने का कोई इंतजाम भी होना चाहिये कि कौन सही है और कौन गलत है अगर पुुरूष और महिला को ही फेसबुक कन्फर्म न कर अकाउन्ट बनाये तो यह समाज के लिये बहुत घातक साबित हो सकता है.अब्दुल मजीद अब अरेस्ट हो चुका हैं लेकिन फेसबुक में ऐसे कई लोग अब भी मौजूद हैं जो समाज को हानि पहुंचा रहे हैं.दुनिया में फेसबुक की संख्या बढ़ाने के लिये अगर ऐसे लोग फेसबुक और व्हाट्स अप जैसी फास्ट सर्विस में जुड़ेंगे तो यह वास्तव में चिंता का विषय होगा.बहरहाल हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि जकरबर्ग फेसबुक को आगे बढ़ाकर लोगों से जोड़े लेकिन साधु और शैतान की पहचान करने का तरीका भी साथ में खोज निकालें.


पैसा कमाने की होड़ में इंसानियत को भी त्यागने लगे कुछ सेवक(?)



पैसा -पैसा और पैसा !इसने इंसान में इतना लालच पैदा कर दिया है कि इसके आगे उसे न दया दिखाई देती है न इंसानियत, जिसके पास है वह कुछ भी कर सकता है कि स्थिति में है और जिसके पास नहीं वह हर ऐसे लोगों के पास बेबस और बेसहारा है, उसके सामने इस मुसीबत से निपटने का सिर्फ एक ही रास्ता दिखाई देता है स्वंय को खत्म कर देना- राजधानी रायपुर से कुछ ही दूर भिलाई और न्यायधानी बिलासपुर से कुछ ही दूर बिल्हा में हुई दो घटनाएं समाज की आंखे खोल देने के लिये काफी है. बिल्हा में एक युवक राजेन्द्र तिवारी को प्राण से इसलिये हाथ धोना पड़ा चूंकि उसके पास एसडीएम द्वारा प्रतिबंधात्मक धारा में जमानत के लिये मांगे गये चालीस हजार रूपये की रिश्वत में देने के लिये पैसा नहीं था. इसका विकल्प उसने उनके दफतर के सामने ही अपने आपको आग के हवाले करने का चुना. दो रोज रायपुर के अस्पताल में इलाज होता रहा और अंतत: उसकी मौत हो गई. इस घटना से जनता का आक्रोश फूटना स्वाभाविक है. एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार रोकने के दावे करती है वहीं भ्रष्ट अफसर इतना मांगते हैं कि लोगों के सामने आत्महत्या करने तक की नौबत आ जाती है. सरकार की नौकरी में बैठे बहुत कम ही लोग है जो आम आदमी से दया या पे्रम का व्यवहार करते हैं.सरकारी सेवकों का एक वर्ग  पद, पैसा अहम और घमंड में इतना चूर हो गया है कि सामने वाला चाहे कोई भी हो उसके सामने वह बौना हो जाता है.इधर खाखी और सफे द वर्दी पहनने वालों ने तो कहर ही ढा दिया हैं. उनमें एक बात यह घर कर गई है कि सारी व्यवस्था उन्हीं के बल पर चल रही है-भिलाई में कल जो कुछ हुआ वह खाखी व सफेद वर्दीधारियों के अहम और पैसा कमाने की लालसा को प्रदर्शित करता

है. सड़क पर पुलिस- याने हर चलने वाले के लिये ठीक ऐसा हो गया जैसे कोई चंदा मांगने खड़ा हो. या कोई उधारी या हफता वसूल कर रहा हो. काननू का पालन करने वाला प्राय: हर व्यक्ति जब सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता है तो वह अपने सारे कागजात साथ लेकर चलता है बहुत से ऐसे भी हैं जो कागजात मुडऩे या रेखे रखे खराब होने के कारण उसे घर में रखते हैं इसका मतलब यह नहीं कि वह कानून का पालन नहीं कर रहा. पुलिस हजार में एक दो ऐसे लोगों को पकडऩे के नाम पर हर आने जाने वाले व्यक्ति के कागजातों की जांच करें यह कौन सी प्रक्रिया है?कोई कितने भी जरूरी काम से जा रहा हो उन्हें उससे कोई मतलब नहीं. भिलाई में पुलिस की चालानी कार्रवाई के चलते सदमें में आए एक बीमार व्यक्ति भागीरथी कुशवाहा (55) ने बीच सड़क पर ही दम तोड़ दिया. आरोप है कि गाड़ी में कागजात नहीं होने पर उसके बेटे से पांच सौ रूपये मांगे थे, इस सदमें में उस व्यक्ति ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया. बेटा उसे एम्स में हार्ट का चेकअप कराकर वापस आ रहा था.खाखी और सरकार के कुछ सेवक (?) कब सुधरेंगे यह एक यक्षप्रश्न है.

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

रेप पर अदालतें सख्त,ऐसे लोगों को पशुओं की संज्ञा,बधिया करने की सिफारिश,क्या व्यवस्थापिका भी सोचेगी?




लोग अब कब्र खोदकर भी बलात्कार करने लगे हैंं. मेरठ और गाजियाबाद के बीच तलहटा गांव में एक 26 वर्षीय गर्भवती महिला की दो दिन पुरानी कब्र को खोदकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे यूपी मेंं कानून और व्यवस्था की स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. इधर यूपी के बाराबंकी में रेप की शिकार एक तेरह साल की बच्ची को अनचाहे बच्चे को जन्म देने मजबूर होना पड़ा वहीं देश की राजधानी दिल्ली और देश के अन्य भागों में सिर्फ एक से दो सप्ताह के दौरान नाबालिग बच्चों के साथ रेप की कई घटनाओं ने देश की अदालतों व अच्छी सोच रखने वाले राजनेताओं को भी सोचने विवश कर दिया है कि काननू को अब कैसा रूप दिया जाये कि ऐसे पशुओं पर किस तरह लगाम लगाई जाये? दिल्ली में निर्भया बलात्कार-हत्या कांड के बाद पूरे देश में एक स्वर से यह मांग उठी थी कि ऐसे दरिन्दों के साथ सख्त से सख्त कार्रवाही की जाये,जस्टिस वर्मा आयोग का गठन भी इसी सिलसिले में किया गया लेकिन देश में इस बुराई पर किसी प्रकार से काबू नहीं पाना यही दर्शा रहा है कि कानूून में अब भी कहीं न कहीं कमी है और ऐसे अपराधियों मेेंं किसी प्रकार का खौफ नहीं है.रेप की घटनाएं तो बढ़ रही हैं वहीं उसे प्रोत्साहित करने का काम कतिपय वाचाल नेता अपने ऊल जुलूल बयानों से कर रहे हैं. कुछ जिम्मेदार व्यक्ति भी इसमें शामिल हैं.दूसरी ओर देश की अदालतों का रवैया इस मामले में सख्त होने से समाज में एक उम्मीद की किरण जागी है.हाल ही मद्रास उच्च न्यायालय ने नाबालिग बच्चे से बलात्कार के मामले में जहां तल्ख टिप्पणी करते हुए यह तक कह दिया कि ऐसे व्यक्ति को नपुसंक कर दिया जाना चाहिये ताकि वह उम्र भर इस कृत्य के लिये पछतावा कर सके. उच्च न्यायालय ने इसकी सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय से भी की है.जस्टिस किरूबकरण ने कहा है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के वीभत्स गेंगरेप की घटनाओं से अदालत मूकदर्शक बना नहीं रह सकता. बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम पोक्सो जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध बदस्तूर बढ़ रहा है अत: कोर्ट का मानना है कि बच्चों के दुष्कर्मियों को बधिया करने से जादुई नतीजे देखने को मिलेंगें. कोर्ट की यह टिप्पणी एक ब्रिटिश नागरिक द्वारा पन्द्रह वर्षीय एक बच्चे के यौन शोषण मामले में मामला खारिज करने के लिये दायर याचिका को खारिज करते हुए की. इधर सर्वोच्च न्यायालय व दिल्ली के राज्यपाल की चिंता भी इस मामले पर है सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले में यहां तक कह दिया कि  जो लोग नाबालिग बच्चों को हवस का शिकार बनाते हैं वह पशु से ज्यादा कुछ नहीं हैं.ऐसे लोगों के प्रति किसी प्रकार की दया नहीं दिखाई जानी चाहिये.हिमाचल प्रदेश के एक गंाव में दस साल की बच्ची से रेप के दोषी पाये गये 35 वर्षीय कुलदीप कुमार की दस साल की सजा को इसी आधार पर बरकरार रखी. मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की इन दो टिप्पणियों के बाद ऐसा समझा जाता है कि आगे आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर सरकार को कोई कठोर कानून का आदेश दे सकता है इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरिविन्द केजरीवाल ने भी नाबालिग बच्चियों से रेप की लगातार घटनाओं पर चिंता प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है.

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

'हाथी मेरा साथीÓ नहीं अब छत्तीसगढ़ के जशपुर और कई क्षेत्रों में 'दुश्मनÓ



दो हफते में आधा दर्जन बार हाथी का इंसानों पर हमला! और एक पचास वर्षीय व्यक्ति की परसो कुचलकर हत्या के बाद भी प्रशासन का हाथ पर धरे बैठे रहना उसकी विवशता ही दर्शाता है. सरकार का बेबस वन अमला हेल्प लाइन और कुछ सतर्कता उपायों से गांव के लोगों को सतर्क करने के सिवा कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं. हां लोग रात में ड्रम बजाकर व शोर मचाकर यह कोशिश जरूर करते हैं कि हाथी उनके पास तक न पहुंचे. हाथियों के उत्पात ने कई गांवों की नींद खराब कर दी है.यह सब हो रहा है छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में! जहां दो सौ गांवों के करीब पांच सौ घरों के लोग हाथियों से परेशान हैं. वे उनकी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं घरों को तबाह कर देते हैं तथा सामने इंसान दिखे तो पहले सूण्ड से उठाते हैं, फेंकते हैं और फिर पैरों से कुचलकर मार डालते हैं. इन गांव वालों की रक्षा के लिये न पुलिस वाले हैं ओर न कोई हाथियों के बारे में जानने वाले विशेषज्ञ! सालभर निर्दोषों की हत्या,फसल व संपत्ति को नुकसान का सिलसिला चलता रहा है अभी दो रोज पहले भी ऐसा हुआ जब भारत सरकार द्वारा संरक्षित कोरवा जनजाति पर हथियों का हमला हुआ... पूरा परिवार कहीं जा रहा था तभी दंतेल हाथी के साथ झुण्ड को अपने सामने देख उनके होश उड़ गये. परिवार के मुखिया कोदराम ने सबको सचेत कर पत्नी बच्चे सहित सबको भगाने में सफलतता पाई लेकिन स्वंय एक हाथी के कोप का भाजन बना- उसे सूण्ड से उठकार बाहर फेक दिया तथा कुचलकर उसकी हत्या कर दी. पता नहीं जो हाथी पालतू बनकर इंसानों  के दोस्त बने हुए थे वह इतने हिंसक कैसे हो गये?विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल कटने और

उनके भोजन के लाले पडऩे का जिम्मेदार वे इंसानों को मानते हैं तथा उनपर अपनी खीज निकालते हैं. जशपुर जिले का बगीचा,कुनकुरी और फरसाबहार इस समय हाथियो से सर्वाधक प्रताडि़त इलाके हैं.करीब डेढ़ सौ हाथियों का झुण्ड पूरे इलाके में तबाही व दहशत फैलाये हुए हैं. देश के दूसरे कई राज्यों में भी हाथियों के समूह है जिनमे से कइयों को इंसानों ने अपने काम में लगा रखा है. कहते हैं दंतेल हाथी अकेले रहता है तभी वह लोगों पर हमला करता है लेकिन यहां तो पूरा का पूरा परिवार साथ में रहता है और लोगों के घर व संपत्ति को बरबाद कर रहा है.कोदराम की मृत्यु से सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार संरिक्षत जनजाति की रक्षा भी इसी प्रकार कर रही है? वन अमला हेल्प लाइन की बात करता है लेकिन यह हेल्प लाइन कैसे काम करते हैं किसी को बताने की जरूरत नहीं.हाथियों के उत्पात की यह समस्या अकेले छत्तीसगढ़ के जशपुर में ही नहंी है बल्कि कई क्षेत्रों में है इससे निपटने सरकार का प्रयाय शून्य है जब कोरीडोर बनेगा तब की बात अलग है किन्तु ऐसा कोई कोरीडोर अब तक अस्तित्व में नहीं आया है साथ ही सरकार इस गंभीर मामले पर हर तरह से खामोश है-जबकि देश के अनेक राज्यों में हाथियों को काबू करने वाले विशेषज्ञ हैं जिनकी सेवाएं ली जा सकती थी लेकिन इस मामले में भी सरकार खामोश है.

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

किसने किया समाज को विभक्त? क्यों चल रहा है आजाद भारत में दोहरी व्यवस्था का मापदण्ड?



भेद-भाव ,ऊच-नीच, बड़ा-छोटा,अमीर-गरीब, दलित-दबंग और ऐसी कई बुराइयों के चलते हमारा समाज न प्रगति कर पा रहा है और न दुनिया के सामने अपना दम खम कायम कर पा रहा है. हम अपनी ही आंतरिक बुराइयों में उलझे हुए हैं. हमें इसके आगे न कुछ सोचने की फुर्सत है और न ही हम कुछ सोच पा रहे हैं रोज नई-नई बलाओं के चलते निर्वाचित होने वाली सरकार के कुछ लोग (सभी नहीं) यह सोचने विवश है कि वह पहले क्या करें? अपने घर को सुधारे या समाज को सुधारने और विकास में अपना ध्यान लगायें. राजनीति और हमारी सामाजिक व्यवस्था दोनों की ही नकेल ढीली पड़ गई है. हम सोचते थे कि कुछ परिवर्तन आगे आने वाले वर्षों में होगा लेकिन अब उसपर भी पानी फिरते नजर आ रहा है. आखिर हमारी व्यवस्था बिगड़ी कहां से है? ऊपर से या नीचे से? अक्सर हम सारा दोष नीचे को ही देते हैं, चाहे वह सरकारी स्तर पर होने वाली गड़बड़ी हो या सामाजिक स्तर पर होने वाली गड़बड़ी . एक बड़ा घोटाला हुआ तो नीचे का बाबू या चपरासी को बलि का बकरा बनाकर सब कुछ रफा-दफा कर दिया जाता है किन्तु कभी यह नहीं होता कि इसकी जवाब देही तय हो कि आखिर इसके लिये दोषी कौन है? जब हम युद्व लड़ते हैं तो उसमें विजयी होने का श्रेय उसके कमाण्डर को देते हैं-अगर हार गये तो उसकी जिम्मेदारी से भी कमाण्डर बच नहीं सकता-क्यों नहीं यह पद्धति हर क्षेत्र में अपनाई जाती. हमारा समाज आज कितने भेदभावपूर्ण वातावरण में चल रहा है वह ऊपर से ही शुरू होता है-हर तरफ भेदभाव चाहे वह सरकारी नौकरी हो चाहे निजी अथवा संपूर्ण व्यवस्था,जिसके नियम कायदे ही टेढ़े-मेढ़ेे रास्तों को पार करते हुए निकलता है जिसमें हमारी चुनावी व्यवस्था भी शामिल है अब इन लाइनों को गौर कीजिये कैसी कैसी विभिन्नताओं से हम रूबरू हो रहे हैं:-नेता चाहे तो दो सीट से एक साथ चुनाव लड़ सकता है लेकिन हम आम लोग जो उन्हें चुनकर विधानसभा या लोकसभा में भेजते हैं दो जगहों पर वोट नहीं डाल
सकते. आप या हम अगर जेल में बंद हो तो हमको वोट डालने का अधिकार नहीं है लेकिन नेता जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ सकता है. हममें और उनमें कितना फर्क कर दिया गया है? अगर हम कभी जेल गये थे तो जिंदगी भर के लिये भूल जाइये कि किसी सरकारी नौकरी में लग पायेंगे अर्थात हमारा पूरा कैरियर खराब! इधर नेता चाहे जितनी बार भी चोरी, लूट,डकैती बलात्कार-हत्या के मामले में जेल गया हो वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जो चाहे बन सकता है.इसी प्रकार बैंक में नौकरी पाने के लिये आपको ग्रेजुएट होना जरूरी है लेकिन नेता चाहे अंगूठा छाप क्यों न हो वह भारत का फायनेंस मिनिस्टर बन सकता है.आपको सेना या पुलिस में मामूली सिपाही की नौकरी पाने के लिये डिग्री के साथ दस किलोमीटर दौड़कर दिखाना होगा लेकिन नेता यदि अनपढ़,और लूला लंगड़ा हो तो भी वह आर्मी नेवी और एयर फोर्स का चीफ बन सकता है, देश का शिक्षा मंत्री भी बन सकता हैं और जिस नेता पर हजारों केस चल रहा हो वह पुलिस डिपार्टमेंट का चीफ यानी गृह मंत्री बन सकता है? नेता और जनता के बीच ऐसा विभेद किसने किया? क्यों हमारा सिस्टम गड़बड़ा रहा है?क्या इनके पीछे यह सारे तथ्य भी विद्यमान नहीं है?

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

राजनीति की बिगड़ी लगाम को थामने एनजेएसी के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट का फैसला!


 विवादित बयानों, भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्टाचार तथा आपराधिक तत्वों के बढ़ते हौसले और उनको प्राप्त राजनीतिक संरक्षण के तहत हमारी वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा यह हम नहीं कह सकते लेकिन जो राजनीतिक  माहौल आज दिखाई दे रहा है वह यही संकेत दे रहा है कि कुछ अच्छा नहीं चल रहा. आजादी के बाद से अब तक के वर्षों में तो कम से कम ऐसा कभी नहीं हुआ जो अब हो रहा है. मुंहफ ट और कुछ भी बोलकर विवाद पैदा कर देश की एकता अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने की प्रवृति हम सबकों सोचने के लिये विवश कर रही है कि हमारा रास्ता कितना कठिन होता जा रहा है. इस संदर्भ में भारत के उपराष्ट्रपति अब्दुल हामिद अंसारी का रायपुर में दिया गया वह बयान भी महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होने कहा है कि 'हमें हमारे राजनीतिक, सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के संवैधानिक तरीकों पर कायम रहना है तथा अपनी स्वतंत्रता का समर्पण किसी महान् व्यक्ति के कहने पर भी नहीं करना है. जिससे वह हमारी संस्थाओं को ही नष्ट करने लगेÓ. अगर हम देश के संविधान की बात करें तो उसे बनाने वालों ने हर व्यक्ति को आजादी कुछ हद से ज्यादा प्रदान की है, यह होना भी चाहिये लेकिन जब लोग इसका दुरूपयोग करने लगे तो उसपर तो लगाम लगनी ही चाहिये मगर ऐसा भी नहीं हो रहा. इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया है.एनजेएसी पर उसके फैसले ने भले ही राजनीतिज्ञों को चौका दिया हो लेकिन हम समझते हैं यह एक सही फैसला है भले ही भारत के वित्त मंत्री और प्रमुख अधिवक्ता अरूण जेठली इसे लोकतंत्र की मूल भावना को नजर अंदाज करने की बात कह रहे हो.वे यह भी कह रहे हैं कि लोकतंत्र में अन इलेक्टेड अर्थात गैर चुने हुए की निरंकुशता नहीं चल सकती. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे व्यक्ति को इस तरह का निर्णय बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन भारत में विश्वास,उम्मीद और न्याय के लिये जो एक ही व्यवस्था अब तक बची है वह है देश की न्यायपालिका-वह अगर यह समझती है कि उसके अपने लोगों की नियुक्ति में उसकी ही मर्जी चलनीे चाहिये तो उसमें किसी को आड़े नहीं आना चाहिये चूंकि उसे भी शायद यह महसूस हुआ है कि जिस तंत्र के जरिये उसके लिये लोगों को चुना जायेगा उसमें भी भ्रष्टाचार की बू लग सकती है. शायद इसी लिये कोर्ट ने सरकार के इस निर्णय को मान्य नहीं किया जो सीधे-सीधे इंगित कर रहा है कि वह किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त कर न्याय नहीं कर सकती.जजों के मन में जब राजनेताओं के प्रति आभार का मन भर जायेगा तो क्या वे उन्हीं के होकर नहीं रह जायेंगे? हम समझते हैं कि इसी को मद्देनजर रखते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है जिसने पूरे राजनीतिक हल्के में सनसनी फैला दी है.यह भी जरूरी है कि न्यायपालिका की तरह अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञों की नियुक्ति का कार्य भी उन्हीं पर छोडऩा चाहिये चूंकि जो जिसमें माहिर हो वह ही दूसरों की पहचान कर सकता है. लोकतंत्र मजबूत हो यह कौन नहीं चाहता. देश की जनता आजादी के पहले और आजादी के बाद दोनों का दौर देख चुकी है. लोकतंत्र से तानाशाही का एक रूप इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपात काल का दौर था जिसे भी लोग देख चुके हैं लेकिन अब जब ढीली डोर छोड़ दी गई है तो कम से कम व्यवस्थापिका को न्यायपालिका पर हावी होने का मौका नहीं देना चाहिये शायद इसे न्यायपालिका ने महसूस किया है. जिस तरह से लोकतंत्र में बयानबाजी और आपराधिक तत्वों के हावी होने का सिलसिला शुरू हुआ है उस संदर्भ में भी अब यह संभावना बढ़ गई है कि भविष्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय जिसपर सबकी आशा टिकी हुई है और भी कुछ अन्य मुद्दों पर संज्ञान ले जिसमें महिलाओं, बच्चों पर होने वाले अत्याचार, यौन शोषण,अपराध का बढ़ता ग्राफ,अवसरवादी वोट बैंक तथा राजनीति की बिगड़ी लगाम शामिल है.

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

खामोश शहर पर फिर डकैतों ने अस्तित्व की छाप छोड़ी दस्युओं की पुलिस को चुनौती!

एक बार फिर राजधानी रायपुर में कठोर अपराधियों ने अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाया है. सेल टैक्स कालोनी के भावना नगर मेें डकैतों ने चंद दिनों के भीतर एक और परिवार को शिकार बनाया, इससे पूर्व समता कालोनी में भी डकैत अपना जलवा दिखा चुके हैं जबकि क्रीस्ट सहायता केन्द्र की नन से बलात्कार के आरोपी भी अब तक छुट्टा घूम रहे हैं लेकिन उस समय तो सारा पुलिस महकमा खुशी से झूम रहा था जब एक उद्योगपति को अपहरण के कुछ घंटो बाद ही रिहा करा लिया गया. उस समय बड़े बडे लोगों ने इस पर संज्ञान लिया और पुलिस को ढेर सारी बधाइयां दी, अब क्या हो गया? क्यों पुलिस खामोश है? आज जब भावना नगर की घटना हुई तो शाबाशी देने वालों को सांप क्यों सूंघ गया? दो डकैती कांड और नन बलात्कार कांड की भीषण और रहस्यमय घटना से जहां सारा शहर दुर्घन्धित है जबकि ऐसी अनेक -अनेक अनसुलझी घटनाओं से शहर के थानों के पन्ने भरे पड़े हैं लेकिन पुलिस हैं कि कयास लगाती बैठी है. भावना नगर में डकैती की घटना में सबकुछ ठीक वैसे ही हुआ जैसे समता कालोनी के इन्कम टैक्स वकील अग्रवाल के घर हुआ. कोई फरक नहीं, वहां ग्रिल तोड़कर घुसे और सेल्सटैक्स  कालोनी के भावनगर में दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे तथा परिवार को बंधक बनाकर खंजर गले पर टिका दिया.- वाह अपराधी! इस शहर को किस तरह निशाना बना रहे हो? और बेबस बेचारी पुलिस को तुम एक सुराग भी नहीं छोड़ रहे. वास्तव में हमारी पुलिस को ऐसा ही जवाब मिलना चाहिये क्योंकि वह जब किसी अपराधिक मामले को जैसे तैसे सुलझा लेती है तो फूल के कुप्पा हो जाती है और इसकी खुमारी उनके सर से कई दिनों तक नहीं उतरती. ऐसे कितने ही मामले हैं जो आज राजधानी रायपुर में पुलिस के बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे पड़े पड़े धूल खा रहे हैं. आखिर क्या कारण है कि पुलिस अपराध के कई दिनों बाद भी अपराधियों की गिरेबान तक नहीं पहुंच पाती? हमारा पुलिस तंत्र क्या सड़क पर चलने वाले किसी स्कूटी सवार या सीधे-साधे नियम कानून का पालन करने वाले व्यक्ति से सख्ती करने तक ही सीमित होकर रह गया? कितने ही पैसे वालों के छोकरे आज सड़कों पर स्टंट करते घूम रहे हैं जो आम लोगों के लिये सरदर्द बने हुए हंै- क्या उनसे कभी पुलिस ने पूछताछ की कि उन्हें उनके मां बाप ने कितना जेब खर्च दिया हैं?या वे कहां से यह पैसा लाते हैं? प्लेन की आवाज करने वाले मोटर सायकिलों में यह लड़के कालोनियों में लोगों की नींद हराम कर रहे हैं और पुलिस या प्रशासन के किसी को इसकी ङ्क्षचता नहीं- इन्हीं सब बातों का फायदा उठाकर अंदर और बाहर के अपराधी अपना काम कर जाते हैं और हमारी बहादुर पुलिस देखती रह जाती हैै. समता कालोनी उसके बाद पूर्व प्रोफेसर दंपत्ति के परिवार के साथ घटित घटना रोंगटे खड़े कर देने और दहशत फैला देने वाली है, इस प्रकार की घटनाएं घटित होने वाले परिवार को तो दहशत में डालता ही है साथ ही आसपास रहने वालों की भी नींद हराम कर देता है. डर के मारे लोग सो नहीं पा रहे हैं और जिनको इन घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी है वे या तो अपने घरों में चैन की नींद सुरक्षित सो रहे हैं या फिर यही आंकलन करते बैठे रह जाते हैं कि कौन हो सकता है इस डकैती में -कंजर,पारधी या लोकल? बस अनुमान लगाते रहते हैं फिर सब भूल जाते हैं तब तक दूसरी घटना हो जाती है.

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

अंधेरे से उजाले तक का लम्बा सफर,'महुआ वर्षों बाद अब जाकर महका!



         

               
  एक समय था जब राजधानी रायपुर के पश्चिम क्षेत्र में रहने वालों को लोग मजाक उड़ाकर कहते थे कि यह तो गांव से आता है. बात उनकी सही थी आयुर्वेदिक कालेज से टाटीबंध तक जाने में लोगों को डर लगता था चूंकि यहां न स्ट्रीट लाइट थी और न ही कोई रात में आता-जाता था. धीरे धीरे कालोनियों का विकास हुआ. एसबीआई की कालोनी महोबाबाजार में बनी फिर हीरापुर में सर्वोदय कालोनी के नाम से प्रोफेसरों की कालोनी बनी.महोबाबाजार के आसपास पूरे क्षेत्र में धान के खेत व महुुआ के झाड़ हुआ करते थे, इन महुए की महक आज भी पुराने लोगों की नाक में है. इन्हीं महुआ वृक्षों के कारण इस क्षेत्र का नाम महुआ बाजार पड़ा और आज यह महोबाबाजार हो गया.
     सुविधाओं के अभाव में जीने वालों को ही सुविधा मिलने पर उसकी खुशी का एहसास होता है. यहां के लोगों ने वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में सुविधाओं की मांग करते हुए प्रदर्शन व आंदोलन भी किया. वे चाहते थे कि यहां तक सिटी बसे चले, आमानाका रेलवे क्रासिंग पर ओवर ब्रिज बने, सरोना को भोपाल के हबीबगंज की तरह का स्टेशन बनाये,यहां एक पोस्ट आफिस खुले, सुरक्षा के लिये एक थाना हो लेकिन इसका कोई असर किसी पर नहीं पड़ा -हां पोस्ट आफिस खोलने और थाना बनाने की मांग जरूर बाद के वर्षों में स्वीकार की गई. सिटी बस भी टाटीबंध तक चलने लगी. पहले स्थिति इतनी बदतर थी कि यहां इक्के-दुक्के फोन थे और लोगों को डाक्टर बुलाने की बात तो छोडिय़े सरदर्द की गोली लेने के लिये भी सदर बाजार जाना पड़ता था. धरती का विकास जिस तरह हुआ, शायद यह कहानी टाटीबंध क्षेत्र में भी दोहराई गई, यहां धीरे-धीरे विकास हुआ और इसने गति पकड़ी. राज्य बनने के बाद-इस क्षेत्र में लोगों का आना-जाना भारी तादात में शुरू हुआ, कालोनियां विकसित हुई.
 पश्चिम के लोगों की एक बड़ी मांग थी कि सरोना को रायपुर के दूसरे बड़े रेलवे स्टेशन केे रूप में विकसित किया जाये यह मांग भी अब लगभग पूरी होती नजर आ रही है, इसके साथ ही अन्य मूल भूत सुविधाओं के जबर्दस्त विकास ने इस क्षेत्र के लोगों को एक नये युग में प्रवेश करा दिया. विधायक व लोकनिर्माण मंत्री राजेश मूणत के प्रयास से गुरूवार 15 अक्टूबर को शाम चार बजे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह द्वारा उद्घाटित होने वाला रेलवे अण्डर ब्रिज उन्हीं विकास कार्यों की एक कड़ी हैं. अण्डर ब्रिज शुरू होने के बाद पूरे क्षेत्र में रेलवे लाइन से होने वाली बाधा का सदा-सदा के लिये अंत हो जायेगा- इस अण्डर ब्रिज के पास ही एक आधुनिक सब्जी मार्केट भी विकसित हो गया है जो पूरे पश्चिम क्षेत्र के बड़े हिस्से के लोगों की आवश्यकताओंं को पूरी करेगा.
वर्षों से हमारा सपना था कि रायपुर पश्चिम में स्थित साइंस कालेज के मैदान को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के रूप में विकसित किया जाये-यह न केवल विकसित हुआ बल्कि इसमें विश्व हाकी प्रतियोगिता का होना भी पूरे छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित करेगा. सांइस कालेज मैदान में ही आडिटोरियम और आयुर्वेदिक कालेज के सामने अंतर्राष्ट्रीय स्विमिंग पुल के सामने लाईब्रेरी का निर्माण इस अंचल के लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करेगा. राजकुमार कालेज से टाटीबंद तक की सड़क किसी समय सिंगल ऊबड़-खाबड़ और एक्सीडेन्ट रोड कहलाती थी. इस रोड ने कई लोगों का खून पिया है, जो अब गौरव पथ हो गया. टाटीबंध का एन्टरेंस किसी विदेशी राष्ट्र के चौराहे की तरह नजर आता है यहां हमारे देश का वह विमान रिटायर होने के बाद लगा है जो कभी दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिये उपयोग हुआ था. इस समय रायपुर भिलाई मार्ग जो राजकुमार कालेज से टाटीबंध तक गौरव पथ का रूप ले चुका है उसे और आकर्षित बनाने का प्रयास युद्व स्तर पर चल रहा है ताकि विदेशी अथितियों के आगमन के समय यह अपनी  एक छाप उनके दिल में छोड़ जाये.रायपुर पश्चिम क्षेत्र को आज मिल रहे खास तीन उपहारों के लिये इस क्षेत्र की जनता वर्तमान सरकार की शुक्रगुजार है. जिनके संकल्प और जिद के कारण आज इस क्षेत्र के रहवासियों के जीवन को और आसान बनाया. 

जूता-चप्पल फेक से कालिख पोत तक का सफर-समय के साथ बदलता रहा,विरोध का तरीका भी!



जूता-चप्पल फेक से कालिख पोत
तक का सफर-समय के साथ
बदलता रहा,विरोध का तरीका भी!
सन् दो हजार आठ से दुनिया में बड़े और नामी नेताओं तथा ख्याति प्राप्त लोगों पर जूता- चप्पल फेकने और अपना ध्यान आकर्षित कराने का एक सिलसिला चला हुआ है.विदेश ही नहीं हमारे देश में भी कई बड़े नेता अब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन की चपेट मेंं कई देशों के पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और देशों के बड़े नेता इसकी चपेट में आ चुके हैं. सन् 2008 में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश पर बगदाद में मुत्ताधर अल जैदी नामक व्यक्ति ने उस समय जूता फेका जब राष्ट्रपति बुश प्रधानमंत्री पेलेस में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे. 2009 में चीनी प्रधानमंत्री बेन जरिबाओ पर एक 27 वर्षीय जर्मन मार्टिन झोके ने यह कहते हुए जूता फेका कि कैसे हम इनके झूठ को सुने? विदेशों में तो नेल्सल मण्डेला भी इससे नहीं बचे फिर भारत में तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी,नवीन जिंदल,पी चिदम्बरम जैसी बड़ी हस्तियों के अलावा कर्ई हस्तियां जूता प्रहार झेल चुके हैं जबकि ऐसे कृत्यों के साथ कालिख पोतने की भी घटानाएं लगातार सुर्खिया बनने लगी. जूते या चप्पल का प्रहार सिर्फ एक व्यक्ति करता था और वह पकड़ा भी जाता और उसकी खूब धुनाई भी होती किन्तु कालिख पोतने का काम जब समूह में होता तो यह और भी सुर्खियां बटोरता जैसे मुम्बई में सुधींद्र कुलकर्णी के साथ हुआ. सुधींद्र कुलकर्णी पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम करा रहे थे जिसके विरोध में शिवसेना उतर आई और उसने उनके चेहरे पर कालिख ऐसे पोती कि उन्हें पहचानना तक कठिन हो गया. इसी हालत में उन्होंने न केवल पत्रकार वार्ता ली बल्कि ऐसे ही घूमते भी रहे. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर चुनाव प्रचार के दौरान कालिख पोती गई जबकि योग गुरू बाबा रामदेव का भी मुंह काला किया गया. केजरीवाल के पूर्व साथी योगेन्द्र यादव पर भी दिल्ली के जंतर मंतर की भरी सभा में कालिख पोती गई. सहारा ग्रुप के मालिक सुब्रत राय पर कोर्ट से निकलते ही कुछ लोगों ने कालिख पोत कर विरोध किया.पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर 26 अप्रैल 2009 में उस समय जूता फेंका गया जब वे एक इलेक्शन रैली को संबोधित कर रहे थे. लोगों को हरास करने के लिये पूर्व में जूता फै कने की जगह कई अन्य पद्वतियां अपनाई जाती थी जिसमें चेहरे पर कालिख पोतकर गधे पर बिठाना,जूते की माला पहनाकर घुमाना, मुर्गा बनाकर खड़े कर देना आदि लेकिन अब समय के बदलने के साथ साथ हरासमेंट की पद्वतियां भी बदलने लगी है. जूता फे क या कालिख पोतने के क्रम में वर्ष 2015 में अब तक विश्वभर में पांच से ज्यादा घटनाएं हो चुकी है जिसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माझी पर जूता फेकने और सुधीर कुलकर्णी कालिख कांड भी शामिल है.

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

'तो के बगैर अब कुछ नहीं, यह अब सरकारी मदद और काम का हिस्सा बना!


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मां बव्चे से कहती है -गिलास भर दूध पियोगे 'तोÓ तुम्हे घूमने ले जाएंगे खिलौने लेकर देंगे..यही 'तोÓ अब रोजमर्रे की जिंदगी का 'तोÓ बन गया है-इसका महत्व इतना बढ़ गया है कि अब इसके बगैर कोई काम नहीं होता. काम चाहिये तो पैसा, पैसा कमाना हो तो काम,जमानत चाहिये तो पैसा, शादी करना हो तो दहेज,मरना हो तो लकड़ी या कब्र... और न जाने क्या क्या? सबसे मजेदार बात तो यह कि अब सरकार भी तो-तो करने लगी है.हाल ही सरकार ने एक पहल की उसमें भी उसने तो लगा दिया-यह पहल थी Óयादा से Óयादा लोगों को रोजगार देने की..सरकार ने नियोजकों पर शर्त लगा दी कि अगर आप अपने संस्थान में Óयादा से Óयादा लोगों को रोजगार देंंगे तो आपको इंकम टैक्स में छूट दी जायेगी. यह तो कुछ दिन जारी रहेगा फिर खत्म हो जायेगी. असल में यह सरकार की योजना का हिस्सा है जिसमें उसने घोषणा की थी कि हम Óयादा से Óयादा बेरोजगारों को नौकरी पर लगायेंंगे, सरकार ने  बहुत प्रतीक्षा की लेकिन Óयादा लोग नौकरी पर नहीं लग सके तो फिर एक स्कीम तैयार की गई जिसमें उसने तो लगा दिया- इंक म टैक्स में छूट चाहिये तो Óयादा लोगों को नौकरी पर लगाओं. बहरहाल यह योजना सफल होगी या नहीं यह तो आगे पता चलेगा जब इंकम टैक्स में छूट पाने के कारण कई लोगों को रोजगार मिलेगा. दूसरा 'तोÓ फिर आज आ गया-घर में सोलर रोशनी चाहिये 'तोÓ संपत्ति कर में राहत मिलेगी. हर जगह यह तो क्यों लग रहा है!. वैसे ही हम तो से परेशान है अब तो की बाढ़ आ गई. एक के बाद एक टैक्स लोगों की बाध्यता बढ़ा रही है. वहीं अगर उनकी सुविधाओं में बिना तो लगाये बढ़ौत्तरी की जाती तो देश खुशहाल होता.अब हर तो के पीछे पैसा कमाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो गया है जिसमें आम आदमी का पसीना निकल रहा है. मेहनत कर कुछ कमाने के लिये 'तोÓ की भूमिका के बगैर आगे बढऩा मुश्किल होता जा रहा है. हम यह कहकर सरकार को नहीं कोस रहे बल्कि इस तो के पीछे छिपे अन्य तो के बारे में बताने का प्रयास कर रहे हैं जो आम जन जीवन के लिये वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार आसान नहीं है. सरकारी योजनाओं में बहुत सी योजनाएं शामिल होती है अगर कारपोरेट टैक्स में छूट लेकर Óयादा से Óयादा लोगों को नौकरी पर लगाएं तो यह कई परिवारों की जिंदगी सवार देगा उसी प्रकार घर में सोलर रोशनी हो तो इससे अ'छी बात और क्या हो सकती है, अ'छी बात यह भी है कि इस योजना को कमर्शियल काम्पलेक्स और बड़े भवनों के लिये अनिवार्य किया गया है इससे बिजली की खपत कम होगी तथा लोग प्राकृतिक बिजली के साथ-साथ कृत्रिम बिजली का भी Óयादा से Óयादा उपभोग कर सकेंगे.

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

विकास की छाया में पल गये कई टैक्स और कंकाल में बदल गया आम आदमी!



डेव्हलपमेंट की छाया में जो टैक्स थोपे जा रहे हैं उसने सामान्यजन के रास्ते को कठिन बना दिया है. वह न कुछ बोल पा रहा है और न कुछ कर पा रहा है जिसके पास पहले से मिल रही तनख्वााह है वह दुविधा में है और जिसके वेतन में बढ़ौत्तरी की गई है वह भी परेशान है.किसान ऋण के बोझ तले दबा है तो आम आदमी मंहगाई और भारी टैक्स के बोझ तले! किसानों ने ऋण को लेकर मौत को चुना तो अब आम आदमी भारी टैक्स और मंहगाई को लेकर फ्रस्टेशन में हैं, उसके सामने परिवार चलाने की समस्या है. केन्द्र की नई सरकार ने तो पिछले एक साल में टैक्स लादा ही है वहीं राज्यों की सरकार और इन राज्य सरकारों के अधिनस्थ काम करने वाली स्वायत्त संस्थाओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. विकास के नाम पर हमारी जेब से पैसा निकालना जारी है. चाहे वह किसी भी टैक्स के रूप में क्यों न हो. सड़क पर चलो तो टोल टैक्स और घर में बैठों तो स्वच्छता के नाम पर! लेकिन सुविधाएं जो इन टैक्सों के नाम पर कथित रूप से दी जा रही है वह किसी देने वाले को पता ही नहीं चल रही. जबकि वह इन्कम टैक्स भी पटा रहा है,संपत्ति कर भी पटा रहा है और सैकड़ों अन्य कर भी पटा रहा है साथ ही कचरा फैकने का टैक्स भी दे रहा है. कई घरों में न पानी आता है न कचरा उठता है, न स्ट्रीट लाइट जलती है फिर भी उससे टैक्स वसूली होती है-टैक्स लने की इस विभिन्नता ने सामान्य वर्ग को कहीं का नहीं छोड़ा. किसी को यह पता ही नहीं कि उनकी जेब से कटने वाले पैसे से कथित विकास कहां हो रहा है. हां यह जरूर सुनाई दे जाता है कि फलाना इतना पैसा खा गया और फलाने की कोठी से ढेरों नगदी बरामद हुई. क्या
हमारेे पैसे का ऐसा ही उपयोग हो रहा है? केन्द्र सरकार ने अपने बजट में ट्रेनों में यात्री किराये में बढ़ौत्तरी की, इन्कम टैक्स पटाने के लेवल में कोई खास संशोधन नहीं किया. माल भाड़े में बढ़ौत्तरी का नतीजा यह हुआ कि सारी  वस्तुओं के दामों में वृद्वि हुई. दाल अब तक की सबसे ऊंचार्ई पर है. प्राय: हर भारतीय की थाली में अनिवार्य रूप से रहने वाली यह वस्तु ही मंहगी हो जाये तो इसके बाद तो कुछ कहना ही क्या? प्याज का यही हाल है. सेवा कर के नाम से वसूल होने वाली राशि हर आदमी के लिये मुसीबत बनी हुई है. प्राय: राज्य सरकारों ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना रखा है. एक सामान्य परिवार को क्या-क्या करना पड़ता है?-परिवार का स्वास्थ्य,परिवार की परवरिश जिसमें उसकी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, उनकी फीस , कपड़े, हास्टल फीस,टेलीफोन किराया,और न जाने क्या-क्या? इसके अलावा घर की भारी बढ़ी हुई बिजली, नगर निगम का संपत्ति कर,जल कर, सफाई कर और अन्य कई अघोषित कर. प्राय: हर घर में गैस,पेट्रोल डीजल से चलने वाले वाहन की सुविधा है. पेट्रोल डीजल के भाव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आई कमी ने कुछ राहत जरूर दी है लेकिन अगर यह भी नहीं होता तो? हमारी स्थिति कर्ज में पैदा होने और कर्ज में मरने वाली पुरानी कहावत पर आज भी विद्यमान है. इस दौर में भगवान किसी को बीमार न करें अगर बीमार हुआ तो समझ लीजिये सारे परिवार पर मुसीबत आ गई क्योंकि अस्पताल में भरती होते ही अस्पताल के बिल को सुनकर उनकी आधी मौत हो चुकी होती है. 

सरकार की खामोश जांच प्रणालियां दवा का तो काम करती है,देरी भी उतनी ही!



 विभागीय जांच,सस्पेण्ड, लाइन अटैच, मजिस्ट्रीयल जांच और ज्यादा हुआ तो सीआईडी अथवा सीबीआई या न्यायिक जांच -यह कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिन्हें सरकारी तौर पर दवा के रूप में उपयोग किया जाता है. इनमें से कुछ ऐसी है जिनका असर कभी दिखाई ही नहीं देता अर्थात जांच रिपोर्ट कब आती है और क्या निर्णय होता है यह किसी को मालूम नहीं होता. सरकार की यह सब प्रक्रियाएं कुछ को छोड़कर तब अपनाई जाती है जब कोई सीरियस घटना होती है और जनता इसको लेकर उद्वेलित होती है. मोटे तौर पर कहा जाये तो इन प्रक्रियाओं में से बहुतों का संबन्ध सरकार की कार्यप्रणाली से जुड़ा है. कुछ जांच के आदेश मजबूरन दिये जाते हैं जब जनता उस घटना को लेकर आक्र ोश में आ जाती है गुस्से में मारपीट की नौबत आती है पथराव, आगजनी और बड़ी हिंसा की वारदात होती है. कुछ कर्मचारियों द्वारा कथित तौर पर गलतियां करने और सरकारी कामकाज में ढिलाई करने आदि पर होती है जिसमें विभागीय जांच या सस्पेण्ड जैसी कार्रवाही होती है. अमूमन सारी जांच प्रक्रियाओं में कई दिनों तक की देरी संभावित है लेकिन जांच का आदेश या आयोग बिठाकर सरकार उस समय होने वाली घटना के सरदर्द से बच जाती है या कहे कि उत्तेजित पब्लिक को शांत कर लेती है इसके बाद घटना का क्या हुआ क्या जांच परिणाम निकला इसका न उस समय की आक्रोशित जनता को कोई मतलब रहता है. अब रायपुर के लोधीपारा में बुधवार को हुई घटना को ही ले लीजिये यहां दो लाइनमैन बिजली सुधार के लिये खम्बे पर चढ़े और किसी ने लाइन चालू कर दी. किसी ने क्या सबको मालूम है कि बिजली विभाग के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने ही इसे चालू किया होगा. दोनों लाइनमैन विद्युत झटका

खाकर नीचे गिरे और उनकी मौत हो गई.भीड़ ने आक्रोश में आकर जिम्मेदार एक कर्मी की पिटाई कर दी. पुलिस ने आक्र ोश शांत करने के लिये भीड़ को जांच का आश्वासन दिया तो वे शांत हो गये अब इस मामले में गया किसका? उस परिवार का जिसके भरण पोषण की जिम्मेदारी इन व्यक्तियों के सिर पर था. क्या जांच होगी? रिपोर्ट कब आयेगी और उस परिवार की जिंदगी कैसे कटेगी यह देखने वाला कोई नहीं. प्रशासन को ऐसे मामले में सिर्फ इस बात की फिक्र रहती है कि कैसे भी तत्काल मामले को शांत कर दिया जाये. अक्सर ऐसा ही होता है-भीड़ को शांत करने के लिये सरकार के अस्त्र या कहें ब्रम्हास्त्र काम आते हैं लेकिन इन अस्त्रों की हकीकत यही है कि यह बहुत ही खामोश अस्त्र हैं जिसका कोई फायदा जनता को नहीं होता है कुछ मामलों में ऐसा भी होता है कि नेताओं की श्रद्वाजंली,मुआवजा भी इन लोगों को शांत करने में अहम भूमिका अदा करती है. कुछ नेताओं के पास तो रटे रटाये या पहले से कम्पूयटर में सेव्ड श्रद्वांजलि और मुआवजे के अंक पड़े रहते हैं जिसमें नाम और मुआवजे की राशि कम ज्यादा करनी पड़ती है.

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

छत्तीसगढ़ में बुनियादी शिक्षा को यूं बिगाडऩे का ठेका किसने दिया?



एक समय ऐसा था जब छत्तीसगढ़ के रायपुर में स्थापित रविशंकर विश्वविद्यालय ने अपने घपले-घोटाले जिसमें रद्दी कांड,फर्जी डिग्री कांड, अंकसूची कांड आदि के चलते अपनी साख खो दी थी-यहां तक कि इस विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर निकलने वाले छात्रों को कहीं नौकरी पर लगाने से पहले भी लोग दस बार सोचते थे- इस स्थिति से निजात पाने में विश्वविद्यालय को वर्षों लग गये. अब ले देकर यह विश्वविद्यालय अपनी साख पुन: कायम करने में ज्यों त्यों सफल हुआ है, तभी छत्तीसगढ़ की बुनियादी शिक्षा पर प्रश्र चिन्ह लगता नजर आ रहा है- यहां कि शिक्षा, शिक्षक और संपूर्ण व्यवस्था को सम्हालने वाले प्राय: सभी इस समय न केवल संदेह के दायरे में हैं बल्कि उनपर गंभीर आरोप भी है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि बुनियादी शिक्षा की जड़े ही जब मजबूत नहीं हो पा रही है तो क्या यहां कि उच्च शिक्षा और अन्य शिक्षा से जुड़ी संस्थाएं विश्व की बात छोड़े अपने देश में ही अपना अस्तित्व जमा सकेंगी?. मध्यप्रदेश में हुए व्यापमं घोटाले के तो तार यहां से जुड़े होने के कुछ-कुछ प्रमाण मिले हैं अब दुष्कर्म मामले में जेल में बंद आसाराम बापू के कथित दिव्य पुस्तकों को भी न केवल स्कूल में खपाने और उसमें लिखी बातों को छोटे-छोटे बच्चों के मन में डालने का कु त्सित प्रयास कथित लोगों ने किया है-स्वाभाविक है कि इस पूरे मामले की डोर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हाथ में है जिसे बचाने का प्रयास भी अब शुरू हो गया है- इस मामले का भंडाफोड़ होने के बाद भी प्रशासन और सरकार ठण्डी कार्यवाही कर बैठा है ताकि मामला पूरी तरह से ठण्डा हो जाये. ऐसे मामले प्रकाश में आने के बाद जिम्मेदार लोगों के पास रटी रटाई बयानबाजी मौजूद रहती है जिसे अखबारों में प्रकाशित करा सब लीपापोती कर दी जाती है.यह पहला अवसर नहीं है जब शिक्षा से जुड़े मामलों को यूं ही ठण्डे बस्ते में डालकर रखा गया. जब स्वयं शिक्षा मंत्री से जुड़ा एक मामला परीक्षार्थी की जगह दूसरे को बिठाने का सामने आया तब भी इसी प्रकार की ठंडाई दिखाकर मामले को रफा दफा किया गया? शिक्षा के मामले में जिस कदर एक के बाद  एक घपले घोटाले,अनियमितता, लालफीताशाही के सामने आ रहे हैं वह यह इंगित कर रहे हैं कि सरकार शिक्षा की बुनियाद पर गंभीर नहीं हैं. 

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

रक्त ऐसे बह रहा जैसे नदी बह रही हो, किस-किस पर रोयें?


 रक्त ऐसे बह रहा जैसे
 नदी बह रही हो,
 किस-किस पर रोयें?

 मांस खाने वाले प्राणी का पूरा जीवन ही मारकाट से भरा रहता है, किसी निर्जीव की हत्या करते समय उसे जरा भी  ज्ञान नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है, उसे सिर्फ चिंता रहती है कि अपना पेट कैसे भरा जाये? जन्मजात मांसभक्षी होने से उसे इस बात की चिंता नहीं कि कौन कैसा है और उसके मरने से उसे क्या मिलने वाला ? लेकिन क्या मनुष्य भी जंगली जानवरों की तरह है?-उसे तो बनाने वाले ने इतनी सोचने की शक्ति दी है कि वह अच्छा बुरा क्या है बखूबी समझ सकता है. वह क्यों जानवरों की तरह हरकत करता है-मानते हैं कुछ लोगों को जानवरों का मांस खाने की जन्मजात आदत है किन्तु ऐसा भी तो मत करों कि उस प्राणी का अस्तित्व ही इस संसार से मिट जाये! अपने स्वार्थ और अपनी खुशी के लिये मनुष्य ने जानवरों का तो वध किया है और उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया मगर अब वह इसे लेकर या अन्य दूसरे बहानों के बल पर अपने ही जैसे और अपने खून का भी वध करने पर उतर आया है. कहीं कोई कुछ बहाना बनाता है तो कहीं कुछ. विश्व  का एक पूरा भाग आतंकवाद के उन्माद में डूबा है तो दूसरी तरफ जहां शांतिपूर्ण सब चल रहा है वहां जहर घोलकर एक दूसरे का खून करने और खून के लिये उकसाने में लगे हैं. जंगल कानून क्या शहर में चल सकता हैं? मनुष्य का बर्ताव भी अगर जानवरों की तरह होने लगे तो इसे कौन रोके? हाल की कुछ घटनाओं ने सारी सोच को ही बदल दिया है.कोई विश्वविद्यालय में तो कोई सड़क पर तो कोई मंच पर कुछ भी कह रहा है -मैं यह कर लूंगा तो तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे? कोई पढ़ा लिखा और जिम्मेदार व्यक्ति समाज को अपना असली चेहरा दिखाते हुए बक रहा है कि मैंने अभी-अभी फलाना मांस खाया है-आओ मुझे मार डालों. ऐसी -ऐसी बाते करने की स्वतंत्रता क्या हमारे संविधान में दी हुई है? जब कोई जिम्मेदार लोगों का समूह आस्था स्थल पर एकत्रित होता है तो उसका ध्यान सिर्फ और सिर्फ उस परमात्मा की ओर होना चाहिये जिसने उसे बनाया है लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? खून खराबे और हिंसा की बातें आस्था के पवित्र स्थल से क्यों उठ रही है? जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर क्यों समाज एक दूसरे के खून का प्यासा हो गया? जब हम दूसरे धर्म मानने वालों से सिर्फ़ इसलिए संपर्क ना रखें कि कहीं बाक़ी लोग बुरा न मान जाएं तो उसके बाद हमारा मन और दिमाग़ उन्हीं बाक़ी लोगों का ग़ुलाम बनता चला जाता है.और हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी आत्मा और नजऱ का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में चला गया? मेरा एक मित्र बताता है एक दिन जब वो एक किराना दुुकान से सिंवई खरीद रहा था तो वहां खड़े एक व्यक्ति ने हैरानी से पूछा कि आप भी सिंवई खाते हैं. मैं तो समझता था कि सिवंई बस एक वर्ग विशेष खाता हैं. वाह भई वाह क्या मानसिकता है हमारी? किसी के कहने पर किसी की जान लेने का काम तब शुरू होता है जब किसी के मुंह पर पहला चांटा पड़े और आसपास के लोग इस व्यक्ति की हिमायत इसलिए ना करें क्योंकि उसकी नस्ल, धर्म और संस्कृति अलग है. चूंकि इस बुनियाद पर पहली बार थप्पड़ मारने का हौसला और बढ़ जाता है, फिर यह हौसला बढ़ते-बढ़ते अगली वारदात में दो चांटों और फिर एक चाक़ू और फिर एक पिस्तौल और फिर भीड़ के हमले और फिर पूरी बस्ती फूंक देने में बदल जाता है. हम खुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं. यही छोटी-छोटी बातें समाज की माला में पिरोते-पिरोते इतनी बड़ी हार बन जाती हैं जिससे पूरे समाज को फांसी दी जा सकती है. जिसके हाथ में यह रस्सा है, अगर वो इससे हम सबको फांसी ना दे तो यह हमारी कोई अच्छाई नहीं, उसकी मेहरबानी है.

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

और अब हूँन ने भी लिख डाली पुस्तक


...और अब हून ने भी लिख डाली
पुस्तक-ऐसा दावा किया
कि सब सोचने हुए मजबूर!

रिटायर होनेे के बाद प्राय: कुछ लोगों को पुस्तक लिखने का शौक आ जाता है लिखवाने और छपवाने दोनों के लिये उनके पास लोगों की कोई कमी नहीं रहती और वे उसका भरपूर फायदा भी उठाते हैं. यूं तो उनकी आत्मकथा से किसी  को कोई लेना देना नहीं होता लेकिन जब ऐसे लोग किसी स्वर्गीय प्रसिद्व लोगों का नाम और उनके जीवन में घटित घटनाचक्र का खुलासा करते हैं तो स्वयं तो चर्चा में आ जाते हैं दूसरों को भी खुलकर बोलने का मौका देते हैं. अब कोई मृत व्यक्ति अपना स्पष्टीकरण देने आनेे वाला तो नहीं तो फिर क्यों न ऐसी कुछ बातों की कल्पना की जाये जो 'शायदÓ की श्रेणी में आती हो.  हाल के वर्षों में जीवनी लिखने वालों की बाढ़ सी आ गई है. इनमें से उस समय के लोग भी हैं जो स्व.जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के जीते जी उनके खिलाफ मुंह खोलने की भी हिमाकत नहीं करत थेे. जहां तक नेताजी सुभाषचंद बोस की जीवनी का सवाल है उनकी मृत्यु को लेकर बहुत सी भ्रांतियां है यह बाते आज भी सामने आये तो बात समझ में आती है लेकिन इंदिरा और नेहरू के समय के लोग तो अब भी जीवित हैं वे जानते हैं कि इन दोनों ने देश को कैसे चलाया. उनपर अपनी आत्मकथा में जिक्र करने वाले सिर्फ अपनी पुस्तक को चर्चित बनाने और इसे भारी संख्या में बिकवाने के अलावा कोई खास मकसद लेकर पुस्तक लेकर आते प्रतीत नहीं होते. अभी एक रिटायर्ड आर्मी अफसर ने फिर पुस्तक लिख डाली है जिसमें दावा किया गया है कि आर्मी ने राजीव गांधी सरकार का तख्तापलट की साजिश की थी, इससे पूर्व एक अन्य पुस्तक में दावा किया गया था कि आर्मी ने और कई कारनामे किए थे लेकिन यह समझ में नहीं

आता कि ऐसा था तो लोग उस समय ऐसे महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठे रहने के बाद भी इसका रहस्योद्घाटन करने से क्यों डरते थे. बुढ़ापे में आकर बताकर वे समाज को क्या मेसेज देना चाहते हैं ? वेस्टर्न कमांड में कभी तैनात रहने वाले ले.जनरल पीएन हून का दावा है कि 1987 में राजीव गांधी सरकार के तख्ता
पलट की साजिश रची गई थी. हून वेस्टर्न कमांड में पोस्टेड रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि पैरा-कमांडोज की तीन बटालियंस जिसमें एक वेस्टर्न कमांड की भी थी, उन्हें एक्शन के लिए दिल्ली जाने को कहा गया था. हून ने यह दावा अपनी किताब द अंटोल्ड ट्रूथ में किया है. दिलचस्प तथ्य तो यह है कि देश में सेना का विभाजन जिस ढंग से हुआ है उस परिस्थिति में क्या देश में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलटा जा सकता है. यहां राष्ट्रपति के अधीन सेना के तीन अंग- जल, वायु ,और थल हैं तथा तीनों अंगों के अपने अलग-अलग जनरल, वायुसेना, थल  और जल सेना अध्यक्ष हैं तब क्या यह संभव है कि इस देश में सिर्फ तीन बटालियन लेकर कोई क्रांति की जाये? जब तक तीनों एक अंग एक नहीं होंगे तब तक देश में तख्ता पलट जैसी बात सोची भी नहीं जा सकती? फिर क्या हून जैसा कह रहे हैं यह सिर्फ उस बटालियन से संभव है? ऐसी बहुत सी बाते हैं जो ऐसी पुस्तक लिखकर लोगों के बीच चर्चा में आने का प्रयास करते हंै. 86 साल के हून का दावा  हैं कि जब वे आर्मी में थे तब आर्मी चीफ जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी और ले.जनरल एसएफ रोड्रिगेउस (वाइस चीफ ऑफ आर्मी) तख्ता पलट करने की प्लानिंग में शामिल थे। किताब में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि उस वक्त तख्ता पलट के लिए उन नेताओं की मदद लेने की प्लानिंग थी जिनसे राजीव गांधी के संबंध अच्छे नहीं थे बहरहाल हून की बातों का अब विश्लेषण होगा और खूब चर्चा भी होगी.

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

डेढ़ सौ साल पहले बना लाउड़स्पीकर अब इंसान का दुश्मन बना!


लाउडस्पीकर की आवाज से लोगों को इतनी नफरत हो गई है कि जोर से बोलने वालों को भी अब लोग लाउडस्पीकर का नाम देने लगे हैं. आज की दुनिया में लोग लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध नहीं चाहते बल्कि इसके  उत्पादन पर ही प्रतिबंध चाहते हैं.यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने आस्था स्थलों पर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है लेकिन लोगों को तो समझना चाहिये कि यह आम लोगों के लिये कितना अनुपयोगी व हानिकारक है. अब तो लाउडस्पीकर लोगों की जान के दुश्मन बनने लगे हैं.ऐसे में क्या लाउडस्पीकर का उपयोग जारी रखना उचित है? आस्था केन्द्रो में सदैव शाङ्क्षत होनी चाहिये चूंकि यह उस परमात्मा का वासस्थल है जिसने दुनिया को बनाया है अगर वहीं आप अशांति फैलाओगे तो फिर इसका मतलब तो यही है कि आपको उन्हीं पर विश्वास नहीं है, बहरहाल आज हालात यह हो गये हैं कि लाउडस्पीकर आज नफरत फैलाने का भी एक जरिया बन गया है. हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकल रही है. अब देश में लाउडस्पीकर का बड़ा भाई डीजे भी सड़क पर उतर आया है जो लोगों की धड़कनों पर सीधा प्रहार करता है कई लोगों की धड़कने इसकी आवाज से बंद हो जाती है. देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के जारचा इलाके के बिसेड़ा गांव में हुई सांप्रदायिक घटना की जड़ में एक लाउडस्पीकर है, जिससे हुई घोषणा के बाद भीड़ ने एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी. इसी लाउडस्पीकर से घोषणा की गई कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर में कुछ अनर्थ हो रहा है. पिछले साल यूपी में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा हुई, उसमें हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकली है. लाउडस्पीकर का उपयोग करते समय लोग सारी गाइडलाइन को बलाये ताक रख देते हैं. गाइडलाइंस है कि कब और कहां लाउडस्पीकर बजाएं और किस स्तर तक कितनी ऊंची  या नीची आवाज में बजाएं. लेकिन कोई इसका न पालन करता है न प्रशासन कभी ये संज्ञान लेता है कि उनके  आदेश का पालन हो रहा है या नहीं. कुछ स्थानों पर तो लोग सोये रहते हैं लेकिन टेप लगाकर लाडडस्पीकर को तेज आवाज में चालू करके चले जाते हैं. 19वीं सदी में लाउडस्पीकर बनाने वाले जॉन फिलिप रेइस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 150 साल बाद एक विकसित समाज में यही भोंपू बेगुनाहों की जान का दुश्मन बन जायेगा. एक अनुमान के मुताबिक 2014 के अगस्त महीने तक अकेले यूपी में पुलिस ने सांप्रदायिक हिंसा के 600 मामले दर्ज किए. उनमें हर पांचवा मामला लाउडस्पीकर से फैलाए उन्माद का अंजाम था. करीब 120 मामले लाउडस्पीकर पर नफरत की गूंज से निकले.बावजूद इसके प्राय: हर आस्था केन्द्रो में  लाउडस्पीकर बजते ही रहते हैं. इनसे ना सिर्फ ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा छात्रों की पढ़ाई को नुकसान व लोगों के सुनने में फरक व नफरत का जहर फैलता है. ध्वनि प्रदूषण रेगुलेशन रुल्स के मुताबिक प्रशासन की लिखित इजाजत के बाद ही कहीं पर लाउडस्पीकर लगाया जा सकता है. रिहायशी इलाकों में लाउडस्पीकर की आवाज की सीमा दिन में 55 डेसिबल है, जबकि रात में 45 डेसिबल लेकिन इस नियम का पालन तभी होता है  जब कोई वीआईपी या वीवीपी इसकी शिकायत करता है.




गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

करोड़ों का एम्स क्या अंचल की आशाओं,आकाक्षांओं पर खरा उतर रहा! यहां क्या हो रहा है?



करोड़ों रूपये खर्च कर रायपुर में बनाया गया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान  संस्थान 'एम्सÓ क्या छत्तीसगढ़ के लोगों की आशाओं के अनुरूप खरा उतर रहा है? या आंतरिक गुटबाजी, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता जैसी बुराइयों में फंसता जा रहा है? एक सौ बीस एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस ख्याति प्राप्त अस्पताल का विवाद शुरू से इसके साथ रहा है. एम्स बनाने की घोषणा के बाद कई वर्षों तक न इसके लिये बजट स्वीकृत किया गया और न ही कोई संज्ञान लिया गया. ले देकर कार्य शुरू हुआ तो फंड का रोना रोते हुए कई बार निर्माण कार्य में विलंब हुआ और कोई न कोई अड़ंगा आता रहा. आखिर दो साल पहले इसका उद्घाटन हुआ तो बस कुछ ही तरह की चिकित्साएं यहां सुलभ हुई. अब तो आलम यह है कि अस्पताल बनाने वाली कंपनी आगे का निर्माण कार्य बीच में ही छोड़कर चली गई. बताया जा रहा है कि कंपनी का पेमेन्ट नहीं दिया गया है ऐसे में उसके लिये आगे का काम जारी रखना मुश्किल है वह अपना बोरिया बिस्तर बांधकर रायपुर से चला गया. स्थानीय अस्पताल प्रबंधन का यद्यपि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं है लेकिन कंपनी द्वारा फिनिश्ंिाग कार्य व अन्य जो कार्य उसे करना था उसे बीच में छोडऩे से जो परेशानी अब यहां के मरीजों व स्थानीय प्रबंधन को झेलना पड़ेगा वह अलग. अस्पताल को बाहर से देखो तो यहां सुनसानियत ही नजर आती है जबकि अंदर पूरे छत्तीसगढ़ के लोग लाइन लगाये न केवल अपने नम्बर का इंतजार करते खड़े रहते है बल्कि ईश्वर से दुआ, चिकित्सकों पर भरोसा और आशा की उम्मीदें लगाये नजर आते हैं किन्तु क्या वास्तव में ऐसा है कि अस्पताल बनने के बाद से जैसी सुविधा और स्वास्थ्य लाभ की आशा की गई थी वह लोगों को उपलब्ध हो रही है? एम्स का अपना
कालेज शुरू हो गया है उसमें छात्र अध्ययनरत हैं तथा नर्सिगं कालेज भी चल रहा है. यहां सबसे बड़ी दिक्कत यहां सुविधाओं को विकसित करने के काम में देरी है जिसका खामियाजा इस अंचल व आसपास के मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.  दूसरी ओर  दिल्ली तथा अन्य राज्यों में पहले से मौजूद एम्स की सुविधाएं इस एम्स को अब तक नहीं दी गई वहीं कतिपय चिकित्सकों के बीच पटरी भी नहीं बैठ रही. अभी कुछ दिन पहले यहां एनाटामी  विभाग के एक पुस्तक प्रकाशन को लेकर डाक्टरों के बीच हुआ विवाद सुर्खियों में है. वरिष्ठ चिकित्सकों में इस मुद्दे को लेकर मारपीट तक की नौबत आ गई.यहां सीनियर और जूनियर का झगड़ा भी चर्चा में है-दोनों पक्षो का अलग अलग साम्राज्य है और इसमें किसी का दखल बड़ा विवाद का कारण बन जाता है.एनाटामी की पुस्तक प्रकाशन को लेकर अस्पताल की पहली मंजिल पर गरमागरम बहस,धक्का मुक्की और मारपीट की नौबत को चटखारे लेकर लोग एक दूसरे को सुनाते हैैं.

सोमवार, 28 सितंबर 2015

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?



याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली आ रही धारणा को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह सही है कि चौदह साल का सजा याफता कैदी बाद में जिस राज्य का है उस राज्य की सरकार से अपील कर सकता है सरकार चाहे तो तो उसे रिहा कर सकती है लेकिन उम्र कैद का मतलब सारी उमर जेल में रहना है. 6 जनवरी 2010 में छत्तीसगढ़ के धीरज कुमार,शैलेन्द्र कुमार और उनके तीन साथियों ने मिलकर कैलाश की हत्या कर दी थी तथा उसका साथी जतिन बुरी तरह घायल हो गया था. दस अक्टूबर 2014 को हाईकोर्ट ने धीरज कुमार और उनके पांच साथियों को उम्र कैद की सजा सुनाई इसके खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह स्थिति स्पष्ट की. सर्वोच्च न्यायालय में इतने आपराधिक मामले लम्बित है कि एक-एक प्रकरण की सुनवाई में पांच साल लगेंगे मगर धीरज कुमार और अन्य मामले में इतनी छूट जरूर दे दी कि वह दो साल बाद फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट में अपने प्रकरण की जल्द सुनवाई की मांग कर सकते हैं. उम्र कैद चौदह साल या जिंदगी भर जेल वाली स्थिति के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी उस समय आई जब इस माह उक्त प्रकरण के दौरान सजा भुगत रहे लोगों की तरफ से यह कहा गया कि ''वे पांच साल से जेल में बंद हैं और लिस्ट के हिसाब से अगली सुनवाई पांच साल बाद होगी ऐसे में वे अपनी सजा के दस साल पूरे कर लेंगे लेकिन तब क्या होगा जब वे बेगुनाह पाए जायेंगे? फिर तो वे अपनी उम्र कैद की सजा पूरी कर लेंगे.ÓÓयाचिकाकर्ताओं के इसी प्रश्न का उत्तर ताउम्र के रूप में आया. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद प्राय: पूरे देश में उम्र कैद की सजा पाने वालों के लिये अब चौदह साल का इंतजार नहीं बल्कि पूरी जिंदगी कालकोठरी में ही रहना होगा. इस मामले पर पूरी स्थिति स्पष्ट होने के बाद अब बारी है फांसी की. क्या देश में फांसी की सजा बरकरार रहेगी या इसपर भी भविष्य में इसी प्रकार का कोई फैसला आ सकता है?





गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सड़क से..लेकर बस,ट्रेेन और प्लेन तक मौत का पीछा...आखिर कौन है इन सबके लिये जिम्मेदार?



सबसे पहले राजधानी के छेरी-खेड़ी इलाके से लगी उस बुरी खबर का जिसमें तीन छात्रों की मौत हो गई. दो अन्य भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. राजधानी में फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करने वाले 10 दोस्त बर्थडे मनाने दो कारों में सवार होकर नया रायपुर जा रहे थे. दोनों कारों के बीच रेस होने लगी, रेस के दौरान दोनों का बैलेंस बिगड़ा और आपस में टकरा गये. हादसे में  कार में सवार तीन छात्रों  की मौत हो गई जबकि दो युवक गंभीर रूप से घायल हैं. इस दर्दनाक हादसे में टाटीबंद रायपुर की  किरण पनेज सहित उसकी क्लास मेट अनिशा सरलिया व सिद्वार्थ अब इस दुनिया में नहीं रहे-सभी को हार्दिक श्रद्वांजलि.
रायपुर की खबर चौका देने वाली है जबकि हंसी खुशी परिवार को लेकर ट्रेन, बस या हवाई जहाज से सफर करने वालों की जिंदगी का भी अब कोई भरोसा नहीं रहा.कभी सपने में भी नहीं आता कि हम जिस सफर पर जा रहे हैं  यह हमारी आखिरी यात्रा हो सकती है, किन्तु हो जाती है. यह मौत कभी एक्सीडेंट के रूप में तो कभी डकैती, लूट, छेड़छाड़ या अन्य किसी तरह से होती है. प्लेन में सफर करने वाले चंद मिनटों या घंटो में अपने गंतव्य पर पहुंच गये तो ठीक वरना डर बना रहता है कि कभी प्लेन का इंजन खराब न हो जाये या फिर कोई अन्य दुर्घटना न घट जाये. आंतकियों के अपहरण का भी भय रहता है लेकिन बस और ट्रेन में सफर करने वाले तो आजकल पैसा देकर मौत या अपनी मुसीबत खरीदते हैं-यह हमारी मजबूरी और सरकार की लापरवाही है जिसके चलते यात्री मुसीबत में फंसते हैं विशेषकर ट्रेनों में सफर करने वालों के ऊपर मुसीबत किस रूप में आ जाये कोई नहीं जानता अब अलीपुरद्वार (पश्चिम बंगाल) के इस परिवार को ही देखिये अपने दस माह के बच्चे को लेकर हंसी खुशी यात्रा पर निकले थे किन्तु दीमा स्टेशन के पास इन्हे मुसीबतों ने घेर लिया और ट्रेन से बच्चे को लेकर कूदने मजबूर कर दिया. दंपत्ति और उनकी बच्ची को गंभीर चोटें आई हैं तथा वे अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल पुलिस जो बखान कर रही है उसके अनुसार पत्नी के साथ ट्रेन में  पुरुषों के एक समूह द्वारा कथित तौर पर छेड़छाड़ और फिर बलात्कार की कोशिश किए जाने के बाद दंपत्ति को अपनी इज्जत बचाने के लिये बच्ची के साथ टे्रन से कूदना पड़ा. यह घटना महानंदा एक्सपे्रेस की है जिसमें 32 वर्षीय आशाबल और उसकी पत्नी (25) अपनी 10 माह की बेटी के साथ सफर कर रहे थे कूदने की वजह यह रही कि रात ट्रेन के जनरल डिब्बे में 10 से 12 शराबियों का समूह  घुस आया और उसने पत्नी के साथ छेडछाड़ शुरू कर दी. ऐसी घटनाओं के लिये आखिर कौन जिम्मेदार है. सब जानते हैं कि ऐसी घटनाएं लगातार हो रही  है फिर भी इन्हें रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया जाता? प्लेन में चढ़तेे वक्त यात्रियों का ऊपर से लेकर नीचे तक सारी चीजों की जांच होती है फिर ट्रेन को क्यों बख्शा जाता है? विशेषकर उन ट्रनों को जो लम्बी दूरी तक चलती है. सफर करने वाले अच्छी खासी रकम रेलवे को देते हैं फिर भी कोई गारंटी नहीं कि वे सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच जायेंगे. यात्रियों की जेब से निकलने वाले पैसे से मोटे हो रहे टीटीआई आरपीएफ वाले कहां रहते हैं? यात्रियों के समक्ष टे्रन में घटित होने वाली प्राय: घटनाओं को मौन, आंख मीचकर सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता.? यात्रियों की इस मजबूरी का फायदा अपराधी तो उठाते ही हैं- रेल प्रशासन भी लापरवाह है. आम यात्रियों की सुरक्षा का कोई इंतजाम किसी भी गाड़ी में नहीं रहता. असल में सारी सुरक्षा यात्रियों के स्टेशन में
पहुंचते ही शुरू हो जाना चाहिये. हर ट्रेन में बंदूकधारी पुलिस के कम से कम दो से तीन जवानों की मौजूदगी किसी भी अनहोनी घटना को टाल सकती है लेकिन ऐसा कोई प्रबंध किसी भी ट्रेन में नहीं है. हर यात्री को टिकिट लेने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है इसमें उसके सामान की चोरी हो सकती है.उसकी इज्जत लुट सकती है उसे धक्का देकर ट्रेन से बाहर फेक दिया जा सकता है या और भी कुछ. बेचारा यात्री वास्तव में हमारी भारतीय रेल का एक निरीह प्राणी है जो बेबस,मजबूर यात्रा कर अपने गंतव्य तक पहुंचता है पहुंच गया तो उसकी किस्मत वरना क्या? वह अपनी किस्मत पर रोने वाला अलीपुरद्वार के उन तीन मनुष्यों की तरह है जो आज जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.