रविवार, 7 दिसंबर 2014

और कितने शरद प्रशंसा, लवकुमार मारे जायेंगे?



घरेलू हिंसा रोकने सरकार शराब बंद करें, मुफत अनाज की जगह काम के बदले राशन बांटे

गौतम, शरद, विनय, प्रशंसा, लवकुमार यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ ऐसे मासूम बच्चे थे जिनने कम से कम ग्यारह माह से लेकर छह साल तक की जंदगी जी और बाद में माता पिता के बीच घरेलू कलह के चलते अथवा किसी प्रेम संबन्ध के चलते उन्हें इस दुनिया से रूकसत कर दिया. ऐस और भी बच्चे हैं,जिन्हें पूर्व में मार दिया गया जिनका नाम हमारें पास नहीं हैं. मारने वाले ओर कोई नहीं बल्कि इनकी खुद की मां थी या फिर इनका शराबी पिता. अपना अडियल रवैया या शराब की लत, अथवा जिद छोटे छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं.प्राय: सभी घटनाओं के पीछे घरेलू हिंसा,आर्थिक तंगी और शराब एक वजह है, जो परिवार की कलह और  मासूम बच्चों की मौत का कारण बन रही है. इन सबमें प्रमुख वजह शराब है.पिछले साल एक शराबी पिता ने वाल्मिकी नगर की गौतम छै साल, शरद चार साल और विनय दो साल को शराब के नशे में मौत के घाट उतार दिया था. इन बेचारों का क्या कसूर था? पति- पत्नी के बीच विवाद इनकी मौत का कारण बना. कोई सामान्य आदमी जो कृत्य नहीं कर सकता वह कृत्य शराब पीने के बाद कर जाता है, यही कृत्य इन बच्चो के पिता नीलम मिश्रा ने किया था वह एक और बच्चे व पत्नी को भी मार देना चाहता था लेकिन वे बच निकले. छत्तीसगढ़ सरकार खूब शराब परोस रही है.कम राजस्व हुई तो पूछताछ होती है, ज्यादा बढ़ाने के लिये और दुकाने खोल दी जाती है. अगर इससे भी पूरा नहीं हुआ तो गली- गली मोहल्लों में शराब सब्जी भाजी की तरह बेची जाती है. अच्छा भला आदमी इस लत में पड़कर हैवान बन जाता है और हमारी सरकार को इन हैवानों से ज्यादा अपने खजाने की चिंता रहती है.शराब पीकर होने वाले इस हैवानियत को सरकार घरेलू हिंसा कहकर आंख मूंद लेती है और इसकी असली वजह पर किसी प्रकार लगाम लगाने का प्रयास नहीं किया जाता. टिकरापारा में अभी दो दिन पहले शराबी बाप ने अपनी दुधमुंंहे बेटे को पत्नी से विवाद के बाद इसलिये मौत के घाट उतार दिया चूंकि वह रोना बंद नहीं कर रहा था.अक्टूबर 2013 में उरला निवासी राजेन्द्र देवांगन ने अपने साढ़े तीन साल के बेटे को तालाब में नहाने ले जाने के बहाने उसे डुबाकर इसलिये मार डाला चूंकि उसका इश्क दूसरी महिला से चल रहा था. घरेलू हिसां आर शराब का चौली दामन का साथ है. अधिकांश ऐसी घटनाएं शराब सेवन के साथ ही शुरू होती हैं जो वीभत्स रूप लेकर खत्म होती है. राजधानी के देवेन्द्र नगर के रैनी जैन का उसके पति प्रकाश जैन से तेरह माह की बच्ची को ब्यूटी पार्लर ले जाने से मना करने पर विवाद हुआ और उसने बच्ची की गला घोटकर हत्या कर दी घरेलू हिंसा की शुरूआत आमतौर पर आर्थिक तंगी से शुरू होती है. पैसा हाथ में रहे तो सब खुश वरना जिंदगी को बचे पैसे से शराब में डुबों दिया जाता है इसका पूरा प्रबंध सरकार की तरफ  से है. दारू सस्ते में मिलती है.बिलो पावरटी लाइन के नाम से सुविधाएं भी दी जाती हंै.महिलाएं राशन एकत्रित कर लाती है पुरूषों का एक बहुत बड़ा वर्ग शराब में अपने आपको डुबो लेता है और इसके बाद जो कुछ होता है सब देख ही रहे हैं. जहां तक छत्तीसगढ़ में घरेलू हिंसा का कारण है वह या तो प्रेम संबन्धों को लेकर है या फिर आर्थिक तंगी  को लेकर अथवा शराब को लेकर.दारू पीकर  लोग, घर, पडोसियों यहां तक कि पूरे मोहल्ले के लिये सरदर्द बन रहे हैं इसमें अगर समाज सामने आये तो वह भी मुसीबत में पड़ जाता है ऐसे में सरकार को शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ जो राशन वह मुफत मे बांट रही है उसके स्थान पर ऐसे परिवारों के बच्चों के लिये फिक्स डिपाजिट में पैसा जमा कराने के बारे में सोचना  चाहिये ऐसे परिवारों के मुखिया के लिये काम के बदले पैसे की व्यवस्था करें तभी इस समस्या का हल  संभव है.मुफत अनाज लोगों को आलसी व निठल्ला बना रही है लोगों को काम के प्रति लापरवाह बना रही है. कई रूके पड़े काम नहीं हो रहे हैं. जब मुफत में भोजन मुंह तक पहुंच रहा है तब लोग काम क्यों करें?- जो पैसा जैसे तैसा परिवार की महिला व अन्य सदस्यों से जैसे तैसे मिलता है वह शराब और ऐश में लुटाने की आदत लोगों में पड़ गई है-बिलो पावर्टी लाइन में घूरेलू हिंसा कुछ इन्हीें  कारणों से बढ़ रही है. सरकार शराब पर पाबंधी लगाये, बीपीएल परिवारों को मुफत अनाज की जगह या तो उनके बच्चों के एकाउन्ट में फिक्स जमा कराये या फिर काम के बदले अनाज की व्यवस्था करें यह ही एक उपाय है समृद्वि और घरेलू हिंसा रोकने  का!

अब धरती पर अत्याचार छोड़ आकाश की ओर बढों....! वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि पर लगे वृक्षों को भी नहीं काटा जा सकता. इसे भी काटने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.कहने का तात्पर्य सरकार अपनी तरफ से भी वनों की रक्षा के लिये कटिबद्व है लेकिन मजबूरियां ऐसी हैं कि सरकार को बाध्य होकर कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं जिसके चलते वृक्षों व वनों का सफाया करना अनिवार्य हो जाता है. बस्तर में बोधघाट परियोजना का ही उदाहरण ले- वृक्षों की भारी कटाई,कई गांवों के डुबान की स्थिति इन सबके चलते आज तक यह परियोजना अस्तित्व में नहीं आई. अब विकास की दौड़ मेंं सरकार के लिये यह मजबूरी है कि वह छत्तीसगढ़ के इस जंगल से आछादित क्षेत्र को नई दुनिया से जोड़ने के लिये यह यातायात की आधुनिकतम सुविधाएं मुहैया करायें.इसी कड़ी में राजधानी रायपुर से बस्तर तक रेल लाइन बिछाने का कार्य हाथ मेें लिया जा रहा र्है इस कड़ी में कई पहाड़, कई वृूक्ष उजडेंगें.तभी जाकर रेललाइन बिछेगी. यह बस्तर सहित पूरे देश की आवश्यकता है. इस परियोजना को अगर हम दूसरे नजरियें से देखें तो यह कुछ आसान है, जिसमें आम लोगों को सुविधा होगी, वन नहीं कटेगें पहाड़ों को नहीं हटाना पड़ेगा और सुविधाएं भी लोगों को मिलेंगी. सरकार रायपुर से बस्तर की दूरी जो करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक है धरती को छोडकर मेट्रो की तर्ज पर आकाश की तरफ धरती से ऊपर ट्रेेनें चलाये व सड़को को भी ऊपर ही ऊपर विकसित करें. विश्व के कई विकसित देशों में यह व्यवस्था है जिसके चलते धरती को छुए बगैर सारा यातायात चलता रहता है और किसी को जाम की स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ता. खर्चा इसमें भी होगा उसमें भी होगा लेकिन काम को चरण बद्व शुरू करने से यह काम आसान और कम खर्चीला होगा. अगर रायपुर से धमतरी तक या धमतरी से ये जगदलपुर तक इस योजना पर शुरूआती दौर पर काम किया जाय तो इसके फायदे नजर आने लगेंगे. सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कुछ ऐसा ही है. वे बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे जो सत्तर हजार करोड़ की तो सिर्फ एक बुलेट ट्रेन की है लेकिन यह योजना जो धरती से आकाश की ओर जाती है तो यह शायद उससे कम खर्च में पूरी हो सकती है. यातायात की गंभीर समस्या भविष्य में और पेचीदा होगी इसके लिये हम अब आकाश की ओर ताकना पड़ेगा ही.


वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि पर लगे वृक्षों को भी नहीं काटा जा सकता. इसे भी काटने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.कहने का तात्पर्य सरकार अपनी तरफ से भी वनों की रक्षा के लिये कटिबद्व है लेकिन मजबूरियां ऐसी हैं कि सरकार को बाध्य होकर कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं जिसके चलते वृक्षों व वनों का सफाया करना अनिवार्य हो जाता है. बस्तर में बोधघाट परियोजना का ही उदाहरण ले- वृक्षों की भारी कटाई,कई गांवों के डुबान की स्थिति इन सबके चलते आज तक यह परियोजना अस्तित्व में नहीं आई. अब विकास की दौड़ मेंं सरकार के लिये यह मजबूरी है कि वह छत्तीसगढ़ के इस जंगल से आछादित क्षेत्र को नई दुनिया से जोड़ने के लिये यह यातायात की आधुनिकतम सुविधाएं मुहैया करायें.इसी कड़ी में राजधानी रायपुर से बस्तर तक रेल लाइन बिछाने का कार्य हाथ

मेें लिया जा रहा र्है इस कड़ी में कई पहाड़, कई वृूक्ष उजडेंगें.तभी जाकर रेललाइन बिछेगी. यह बस्तर सहित पूरे देश की आवश्यकता है. इस परियोजना को अगर हम दूसरे नजरियें से देखें तो यह कुछ आसान है, जिसमें आम लोगों को सुविधा होगी, वन नहीं कटेगें पहाड़ों को नहीं हटाना पड़ेगा और सुविधाएं भी लोगों को मिलेंगी. सरकार रायपुर से बस्तर की दूरी जो करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक है धरती को छोडकर मेट्रो की तर्ज पर आकाश  की तरफ धरती से ऊपर ट्रेेनें चलाये व सड़को को भी ऊपर ही ऊपर विकसित करें. विश्व के कई विकसित देशों में  यह व्यवस्था है जिसके चलते धरती को छुए बगैर सारा यातायात चलता रहता है और किसी को जाम की  स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ता. खर्चा इसमें भी होगा उसमें भी होगा लेकिन काम को चरण बद्व शुरू करने से यह काम आसान और कम खर्चीला होगा. अगर रायपुर से धमतरी  तक या धमतरी  से ये जगदलपुर तक इस योजना पर शुरूआती दौर पर काम किया जाय तो इसके फायदे नजर आने लगेंगे. सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कुछ ऐसा ही है. वे बुलेट ट्रेन का सपना देख  रहे जो सत्तर हजार करोड़ की  तो सिर्फ एक बुलेट ट्रेन की है लेकिन यह योजना जो धरती से आकाश की ओर जाती है तो यह शायद उससे कम खर्च में पूरी हो सकती  है.  यातायात की गंभीर समस्या भविष्य में और पेचीदा होगी इसके लिये हम अब आकाश की ओर ताकना पड़ेगा ही.  

आखिर हम किससे डर रहे हैं-अमरीका, चीन या अपने आप से?सईद ललकार रहा है क्यों न हो जाये आर पार की लड़ाई


अस्सी हजार से ज्यादा लोग अब तक  आतंकवादियों के हाथों मारे जा चुके...हमें मालूम है कि इस नरसंहार के पीछे पाकिस्तानी सेना, भारत से भागे दाउद इब्राहिम और वहां के उग्रवादी संगठन जमात उद दावा के सरगना हाफिज सईद का हाथ है-यह व्यक्ति मुम्बई हमले का भी मास्टर माइण्ड है- इस कुख्यात व्यक्ति के सिर पर अमरीका ने भी एक करोड़ रूपये का इनाम रखा है, फिर भी हम चुप हैं...इस बार उसके पिट्ठू आये तो ए के 47 का जखीरा, खाने पीने के लिये रेडीमेड चिकन आचारी, दाल, रोटी सहित काजू किशमिश, खजूर और अन्य कई किस्म के ड्राय फ्रूट भी लेकर आये-प्लान बनाया था कि भारत के मस्तक पर बैठकर कई दिनों तक आतंक का खेल खेलेंगे लेकिन इन छक्कों के मंसूबों को भारतीय फौज ने सफल होने नहीं दिया लेकिन इस कड़ी में हमारे कम से कम बारह जवानों को भी शहीद होना पड़ा. तीन दशक से ज्यादा का समय हो गया- हम अपने पडौसी की  मनमानी झेल रहे हैं?क्या हमने  चूडियां पहन रखी है कि वह अपनी मनमानी  करता रहे और हम चुप बैठे रहे? क्यों नहीं हम आर या पार की लड़ाई लड़े? हम किससे डर रहे हैं?अमरीका से? चीन से? या फिर अपने आप से?कि अगर हम पाकिस्तान से मुकाबला करेंगे तो यह शक्तियां नाराज हो जायेंगी?यह भी कि क्या पाकिस्तान से हमला करने की स्थिति में हमे चीन से भी मुकाबला करना पड़ेगा? लेकिन आज हममें इतनी ताकत तो है कि हम एक बार दोनों से दो दो हाथ कर सकें.हाल ही हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमरीका के उस राष्ट्रपति से मिलकर आये हैं जिसने अपने देश में आंतकी हमला कर सैकडा़े लोगों को मारने वाले कुख्यात आंतकवादी ओसामा बिन

लादेन को पाकिस्तान में उसकी मांद से रातो रात निकालकर समुन्द्र में फेक दिया था-मोदी को जरूर उनसे प्रेरणा मिली होगी. अमरीका ने तो इतने दूर से आकर अपने दुश्मन को मार दिया लेकिन सईद तो हमारी बगल में छुट्टा घूम रहा है, वह हमे चिढ़ा रहा है, चुनौती दे रहा है और हमारे सब्र का इंतजार कर रहा है?सवाल यही उठता है कि हम कब तक सब्र करते रहेंगें ?हमारे पास  एक ही विकल्प है कि अपने  देश  में घुसपैठियों और आंतकवादियों को रोकने के लिये किसी की परवाह किये बगैर अपने  बलबूते पर पाकिस्तान से दो दो हाथ करें और बंगलादेश  में  नियाजी को घुटने पर खड़े कराने की तरह पाक  के इस आंतकवादी को भी हमारे देश लाकर उसे हमारे कानून के हवाले करें. सेना के पूर्व अफसरों व विशेषज्ञों की भी राय यही है कि अब वह समय आ गया है कि जब हमें आर या पार का फैसला करना होगा. कब तक हम अपने जवानों को यूं मरते देखेंगेें?सवाल यह भी उठता है कि इतने  वर्षो से हमने जो ताकत बनाई है उसे क्या हम यूं ही दिखाने के लिये शो केस में रखे सडाते रहेेंगे?