गुरुवार, 29 मई 2014

सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?


सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?

''पढ़ोगे लिखोगे बनागे नवाब,
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब
जो बच्चे कभी लिखते पढ़ते नहीं,
वो इज्जत की सीड़ी पर चढ़ते नहीं,
यही दिन है पढ़ने के पढ़ लो किताब
बुराई  के रास्ते से बचके चला
कभी न झूठ बोलों न चोरी करोÓÓ
हमें बचपन से यही गीत गाकर पढ़ाया लिखाया गया है.हम यही सुनते आये है लेकिन ''अगर काम से ही किसी का मूल्याकंन करना है तो देश के युवाओं को अब डिग्री लेने की जरूरत नहींÓÓ-स्मृति इरानी की माने तो कुछ ऐसा ही संकेत मिलता है. नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल  में मानव संसाधन  मंत्री जैसा महत्वपूर्ण सम्हालने वाली कम उम्र की मंत्री,जिन्हें देश की उच्च शिक्षा, जाँब,शिक्षा में एफडीआई, आईआरटी, आईबाईएम, एम्स, स्किल डेवलपमेंट, युवाओं की उम्मीदो और  बेसिक शिक्षा  के दायित्वों को पूरा करना है,वे सिर्फ बारहवीं कक्षा पास है. उनका कहना हैै कि उनके पास  तजुर्बा है और उसी को रखकर देश की शिक्षा नीति और उससे संबन्धित अन्य कार्यो को तय करेंगी.  स्मृति अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव  हार  गई, राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के बड़े नेता को हराना उनकी दूसरी योग्यता है. इस पूरे मामले पर  देशभर में गंभीर बहस छिड़ी हुई है.कहा यह भी  जा रहा है कि उन्होंने सन् 2009 के चुनाव में जो शैक्षणिक योग्यता पेश की थी वह 2014 में बदल  दी गई. बहराहल हम इस मुद्दे पर न  जाकर उस संवैधानिक व्यवस्था की ओर जाना चाहते हैं जो इस संबन्ध में मौन है. मंत्री बनने के लिये कोई शैक्षणिक योग्यता को मापदण्ड नहीं बनाया गया है.अत: स्मृति इरानी चुनाव हारकर आई या जीतकर अथवा उन्होंने कितनी  शैक्षणिक योग्यता अर्जित की, इसे दरकिनार रख उन्हें जब इस पद पर रख ही दिया है तो कार्य करने  का मौका रहने देते हुए उनके कार्यो का मूल्यांकन करना चाहिय,े उसके बाद ही वे  इस पद के लायक है या  नहीं इसपर कोईनिर्णय लिया जाना चाहिये. वैसे हमे कोई  नौकरी पर लगाता है तो वह हमारी योग्यता परखता है-हम कहां तक पड़े हैं.हमारा एक्सपीरियेन्स क्या है? हमने कहां कहां काम किया है? आदि कई झमेलों और एफडेबिट भरने  के बाद हम नौकरी पर लगते हैं. कई लोगो की लाइन में से हमें छांटकर अपायनमेंट दिया जाता है फिर देश को चलांने वाले विधायक, सासंद और मंत्री के मामले में ऐसा क्यों नहींं? मंत्रियों में कई अनपढ़ और अंगूठा छाप भी देश को चला चुके हैं.संविधान में ऐसा कहीं लिखा भी नहीं है कि कोई अंगूठा छाप देश को नहीं चला सकता. यह भी नहीं लिखा कि मंत्री पद सम्हालने के लिये योग्यता क्या होनी चाहिये?मोदी  सरकार में मानव संसाधन मंत्री पद पर स्मृति इरानी को नियुक्त करने के बाद यह सवाल उठ खड़ा  हुआ है कि आखिर  ऐसा क्यों हुआ? लालू प्रसाद हो या मायावती इनको लोगों ने हमेशा हंसी का पात्र बनाया किन्तु उनकी  राजनीतिक योग्यता के साथ शैक्षणिक योग्यता भी कम नहीं थी. लालू प्रसाद यादव जहां बीए एलएलबी हैं तो मायवती बीए साथ  ही वे एक शिक्षिका के तौर पर भी काम कर चुकी है.नरेन्द्र मोदी  मंत्रिमंडल में स्मृति इरानी  से कम शैक्षणिक योग्यता वाले कई और सदस्य है किन्तु इनको दिये गये मंत्रीपद पर कहीं कोई आपत्ति किसी स्तर पर नहीं उठाई गई शायद  इसलिये भी कि मानवसंसाधन विभाग का देशव्यापी महत्व होने के साथ व्यक्ति के जीवन निर्माण में भी इस विभाग का महत्व अन्य विभागों की बनस्बत ज्यादा  है इसलिये भी शायद  इस पर  विवाद उठा.इस मामले में कश्मीर  के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्मृति इरानी का हालाकि बचाव करते हुए जो  बात कही वह भी  कम महत्वपूर्ण नहीं.उन्होंने कहा था कि ऐसे मे तो सिविल एविएशन का मिनिस्टर किसी पायलेट को बनाना चाहिये. यह बात उन्होंने उनके पक्ष में जरूर कही है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा ही नहीं  होना चाहिये ?अगर सिविल एविएशन का काम किसी पायलेट या उस विभाग से सबंन्धित लोगों को दिया जाये तो क्या इस विभाग का काम और अच्छे से नहीं चल सकेगा? मोदी मंत्रिमंडल मे सेना को अच्छी  तरह से जानने वाले वीके सिंह मौजूद है-रक्षा मंत्री का दायित्व उन्हें नहीं दिया जा सकता था?ठीक इसी  तरह पूर्व शिक्षा मंत्री  मुरली  मनोहर जोशी  भी तो जीते हुए शिक्षा से जुड़े व्यक्ति हैं? क्या उन्हें मानवसंसाधन  विभाग नहीं दिया  जा सकता था? ऐसे बहुत से सवाल  कुरेदों तो निकल सकते हैं लेकिन हमारी संवैधानिक व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं जिसे पहले हल करने की जरूरत है.मंत्री  कैसा हो, कितना पड़ा लिखा हो, उसकी शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक स्टेटस, उसका क्रिमिनल रिकार्ड, व अन्य आवश्यक आर्हताएं क्या- क्या हो यह सब तय होना चाहिये था. अगर ऐसा होता तो शायद ऐसे मामले उठते ही नहीं. एक आदमी चुनाव लड़ता  है दूसरा,तीसरा चौथा व अन्य उसे वोट देते हैं किन्तु इन सभी  को किस तरह की योग्यता वोट देने और लेने दोनों में होनी चाहिये, यह कहीं तय नहीं किया गया. वोट देने व लेने दोनों ही व्यक्ति की भी सारी शैक्षणिक,सामाजिक ,राजनैतिक स्टेटस के साथ साथ उसका क्रिमिनल  रिकार्ड व मानसिक स्थिति क्या है, यह तक तय होना चाहिये तभी चलकर हमें एक स्वस्थ और निष्पक्ष, साफसुथरा सही लोकतंत्र प्राप्त होगा.

मंगलवार, 27 मई 2014

धारा 370 पर कश्मीर गर्म आखिर है क्या यह धारा?



नरेन्द्र मोदी सरकार के एक मंत्री द्वारा भारतीय संविधान की धारा तीन सौ सत्तर पर दिये बयान के बाद बखेड़ा खड़ा हो गया है. सवाल  यह उठ रहा है कि  क्या नरेन्द्र मोदी सरकार इस धारा को खत्म करेगी? इससे पूर्व कि सरकार इसपर  कोई राय बनाये जम्मू कश्मीर  के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा दोनों ने ही इसपर गंभीर रूख अख्तियार करते हुए यहां तक कह दिया कि अगर धारा 370 को हटाया गया तो कश्मीर भी भारत से अलग हो जायेगा. आखिर धारा 370 है क्या बला? आम लोग यह नहीं जानते कि आखिर यह धारा 370 है क्या? -यह भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद (धारा) है जिसे अंग्रेजी में आर्टिकल 370 कहा जाता है. इस धारा के कारण ही जम्मू एवं कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार अथवा (विशेष दज़ार्) प्राप्त है. देश को आज़ादी मिलने के बाद से लेकर अब तक यह धारा भारतीय राजनीति में बहुत विवादित रही है.भारतीय जनता पार्टी एवं कई राष्ट्रवादी दल इसे जम्मू एवं कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद के लिये जिम्मेदार मानते हैं तथा इसे समाप्त करने की माँग करते रहे हैं.भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था. स्वतन्त्र भारत के लिये कश्मीर का मुद्दा आज तक समस्या बना हुआ है. धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये. इसी विशेष दज़ेर् के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती.इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है.1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता. इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है. यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते.भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती.जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय करना ज़्यादा बड़ी ज़रूरत थी और इस काम को अंजाम देने के लिये धारा 370 के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को उस समय दिये गये थे.अब वक्त बहुत बीत चुका है तथा देश का बहुमत और नई पीढ़ी  दोनों,यहां तक कि नई सरकार भी यह महसूस करती हैै कि अब इस धारा को बनाये रखने का कोई औचित्य नहीं है.नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान जम्मू कश्मीर की सभा में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो वह इस धारा को खत्म कर देगी. अब भाजपा सत्ता में आ गई है और उसने अपने एक एक एजेण्डे पर काम करना भी शुरू कर दिया है इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय (पीएमओ) के राज्यमंत्री की ओर से जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के गुण दोषों पर चर्चा के संबंध में बयान दिये जाने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और मुख्य विपक्षी पीडीपी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। वैसे सरकार ने पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के बयान से उठे विवाद को कमतर करने का प्रयास किया और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कैबिनेट की बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा, हम इस पर विचार करेंगे. उनके अनुसार-आपने देखा था कि हमने चुनाव प्रचार के दौरान क्या कहा था, सरकार इस पर नियम कायदों के अनुरूप विचार करेगी.पहली बार जम्मू कश्मीर के उधमपुर से लोकसभा सदस्य जितेंद्र सिंह ने बुधवार को कहा था कि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर के लिहाज से अनुच्छेद 370 के गुण दोषों पर चर्चा के लिए तैयार है और राज्य में समाज के हर वर्ग के साथ संपर्क करके उन लोगों को समजाने के प्रयास किये जाएंगे जो असहमत हैं.57 वर्षीय सिंह को प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री बनाये जाने के मोदी के फैसले से कई लोगों को हैरानी हुई है. सिंह ने कहा कि भाजपा बहुत पेशेवर तरीके से इस मुददे पर काम कर रही है और कश्मीर घाटी में बैठकें बुला रही है.कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग राज्यमंत्री के तौर पर कामकाज संभालने के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा, हम कुछ लोगों को इस बारे में समझाने में कामयाब रहे हैं, सिंह के बयान पर उमर ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए टवीट किया कि अनुच्छेद 370 राज्य और शेष देश के बीच एकमात्र संवैधानिक कड़ी है. उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए  कहा कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में चर्चा करना गैरजिम्मेदाराना और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर है. उमर ने ट्वीट किया, पीएमओ के नये राज्यमंत्री कह रहे हैं कि अनुच्छेद 370 को हटाने की प्रक्रिया या बातचीत शुरू हो गयी है,वाह, कितनी तेज शुरूआत है.पता नहीं कि इस मुद्दे पर कौन-कौन बात कर रहा है.पीडीपी का मत है कि संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के संबंध में सिंह का बयान गंभीर नुकसान पहुंचाये, उससे पहले प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं को सिंह पर लगाम कसनी चाहिए. विवाद उठने के बाद मंत्री सिंह ने  रात में बयान जारी कर कहा कि खबरों में उनकी बात को गलत तरह से पेश किया गया है. उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि अनुच्छेद 370 पर मेरे बयान को मीडिया में आई खबरों में गलत तरह से पेश किया गया है. मैंने  प्रधानमंत्री का हवाला देते हुए कभी कुछ नहीं कहा. विवाद पूरी तरह निराधार है.पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने कहा, सिंह को समझना चाहिए कि जूनियर मंत्री के तौर पर उनके नये पद की कुछ जिम्मेदारियां हैं और प्रधानमंत्री को चाहिए कि उन्हें अनुशासित करने के लिए हस्तक्षेप करें. पीएमओ को जम्मू कश्मीर की जनता को आश्वस्त करने के लिए स्पष्ट करना चाहिए कि उसे कोई नुकसान नहीं होगा।
   

गुरुवार, 22 मई 2014

इच्छा शक्ति, छप्पन इंच का सीना ही जनता का विश्वास जीतेगी


इच्छा शक्ति, छप्पन इंच का सीना ही जनता का विश्वास जीतेगी!
नरेन्द्र मोदी के लिये काम आसान लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
बेेरोजगारी, काला धन, आर्थिक विकास/निवेश, आंतरिक सुरक्षा, चौबीस घंटे बिजली, सड़क, फास्ट ट्रेन, नि:शुल्क शिक्षा जैसी बातें जो आम आदमी से जुड़ी हैं जिसे सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिये हल करना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन इसके लिये भी इच्छा शक्ति के साथ छप्पन इंच का सीना भी होना चाहिये. अब तक शासन करने वालों में इसका अभाव था या उनके साथ काम करने वालों ने अपनी जेब भरने के साथ जनता से दूरी बनाई और समस्या को ज्यों का त्यों बनाये रखा लेकिन अब मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही लोगों की वे आशाएं जाग गई हैं जिनका वर्षों से वे सपना देखते रहे हैं?
नरेन्द्र मोदी 26 मई को शाम छह बजे भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे और इसी के साथ देश की जनता की वे आशाएं और अपेक्षाएं भी मोदी का पीछा करने लगेंगी जो उन्होंने चुनाव के दौरान लोगों से वादे किए थे. सबसे पहला मुद्दा है महंगाई- कम से कम एक महीने के भीतर नरेन्द्र मोदी को आम लोगों को यह महसूस कराना होगा कि उनके सिंहासन पर बैठते ही मंहगाई कम होने लगी है.
 पिछली सरकार ने कार्यग्रहण करने के बाद से लेकर अपने दस वर्षों के दौरान पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में अनाप-शनाप वृद्धि या तो ग्लोबल मंदी का बहाना या कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का बहाना बनाकर की या किसी  अन्य कारणों से. यह बढ़ोतरी मंहगाई का सबसे बड़ा कारण रहा है. जो पेट्रोल 35 रूपये लीटर मिल रहा था वह आज 75-80 रुपए के आसपास हो गया है. विपक्ष हमेशा कहता रहा है कि राज्य सरकारें टैक्स कम कर दें तो पेट्रोल-डीजल के भावों में कमी आ सकती है. मंहगाई की जड़ में कालाबाजारी और जमाखोरी  दोनों है. देखना है नई सरकार कीमतों को कैसे नीचे लायेगी. बेरोजगारी की समस्या देश में मुंह बाये खड़ी है. लाखों नौजवानों ने नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगियों को जिताया, वह यह सोचकर कि मोदी जीतेंगे तो बेरोजगारी दूर होगी, युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान होंगे. इसके उपाय भी मोदी अपने भाषणों में सुझाते रहे हैं, अत: अब यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि देश में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिये नई सरकार कौन से प्रभावशाली कदम उठाती है. हमारे युवाओं में सब्र का अभाव है, वे हर समस्या का त्वरित हल चाहते हैं. देश आंतरिक सुरक्षा के मामले में एक लम्बे समय से जूझ रहा है, विशेषकर पिछले दस सालों से समस्या और भी जटिल हो गई है. आंतकियों को फांसी पर लटका देने के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है. स्वयं प्रधानमंत्री के जीवन को खतरा है, ऐसे में आम आदमी की सुरक्षा के साथ-साथ देश की सुरक्षा भी सवालों के कटघरे में है. प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण करने से पूर्व ही घुसपैठियों ने एक पहल भारतीय सीमा में घुसने की की है. इसके अलावा देश आंतरिक आतंकवाद जैसे सिमी, नक्सली और बोडोलैंड जैसी समस्याओं से ग्रसित है, इन सबका हल जल्द होते देखना भी लोग चाहते हैं. आतंकवाद के लिये जिम्मेदार कई कुख्यात आंतकवादी पाकिस्तान में शरण लेकर बैठे हैं. उनको भारत लाने और उन्हें अदालत के कटघरे में खड़ा करने की दिशा में नरेन्द्र मोदी की स्टे्रटजी क्या होगी इस पर भी विश्लेषक नजर जमाये बैठे हैं. महिलाओं की सुरक्षा के मामले में सरकार के कदम क्या होंगे इस पर भी नजर होगी. ऐसे कठोर कानून की आशा है जिससे देश में महिलाओं और बच्चियों का जीवन सुरक्षित रहे.
देश के कई गांवों में सड़क नहीं है, शौचालय नहीं है. पीने के पानी के लिये कई दूर तक जाना पड़ता है. निस्तारी के पानी की समस्या है. चौबीस घंटे बिजली नहीं मिलती. अगर बिजली है तो भी लोग उसके बढ़े हुए बिल से परेशान हैं. लाखों वोटर यही चाहते हंै कि नई सरकार इन समस्याओं से निजात दिलाये. आम आदमी देश में बहुआयामी टैक्स से परेशान हंै वह चाहता है कि बहुआयामी टैक्स की जगह सिंगल टैक्स प्रणाली लागू हो. सिंगल टैक्स के अलावा बंैक लोन में कमी की भी वह आशा करते हैं. जिन बातों का जिक्र मोदी ने अपने भाषणों में किया है उस संबंध में तो जनता को विश्वास है कि आने वाले दिनों में वह इनमें से बहुत सी अपेक्षाओं को पूरी करेंगे.
भारत में ट्रेनों का जाल बिछा होने के  बाद भी देश की जनता ट्रेन की छतों पर और टायलेट के अंदर-बाहर बैठकर सफर करने मजबूर हैं. 120 किलोमीटर की रफ्तार से ज्यादा ट्रेनों को दौड़ाने में रेलवे को डर लगा रहता है कि कहीं दुर्घटना न हो जाये. दूर-दराज इलाकों तक आज तक ट्रेन सेवा उपलब्ध नहीं है. ज्यादा किराया देने के बावजूद द्वितीय व तृतीय दर्जे की एसी बोगियों में लोग ठूस-ठूस कर सामान्य दर्जे से बदतर हालत में सफर करते हैं. मंहगी यात्रा, गंदा खाना, गदंगी, देश की ट्रेन सेवा का दूसरा नाम है. क्या देश विश्व का श्रेष्ठ रेलवे मोदी के कार्यकाल में बनेगा?
 भ्रष्टाचार और कालाधन देश  की सबसे  बड़ी समस्या के रूप में मोदी सरकार के समक्ष चुनौती है. यूपीए सरकार द्वारा काले धन को विदेश से भारत लाने और देश में छिपे कालेधन को बाहर निकालने में असफलता तथा भ्रष्टाचार से निपटने में नाकामयाबी उसके हार के कारणों की गिनती में है. विदेश से कालेधन को भारत लाने की बात तो बाद की है, पहले देश में छिपे कालेधन को निकालने के मामले में क्या त्वरित कार्रवाही होती है यह देखना दिलचस्प होगा. उद्योग, निवेश और अन्य आर्थिक समस्याओं तथा देश में सड़क, पुल-पुलियों का विकास, नदियों को जोड़ने, नदियों की सफाई पर तो मोदी को महारत हासिल है लेकिन विदेश नीति क्या होगी? कैसे वह अपने पड़ोसियों से संबंध बनाये रखेगा. आज की परिस्थिति में कोई हमारा अच्छा मित्र नहीं है. प्राय: सभी पड़ोसी राष्ट्रों से सतही हाय-हलो है. दुख का कोई साथी नहीं तो सुख में भी यही स्थिति है. चीन का भय आज भी बना हुआ है. पाक पर किसी भी कार्रवाई की स्थिति में उससे पाक को सहायता का भय बना रहता है. अमरीका कई मामलों में भारत से नाराज है. नरेन्द्र मोदी से अंदरूनी नाराजी क्या भविष्य में दोस्ती का रूप ले पायेगी यह देखना भी दिलचस्प होगा. वैसे मोदी के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित किया जाना एक अच्छी पहल मानी जा सकती है. पाक से बिगड़े संबन्धो को यह न्यौता किस हद तक सुधार पायेगा यह भविष्य ही बता पायेगा.

मौसम पर वैज्ञानिक कितने सटीक,फंसते तो किसान हैं!


मौसम पर वैज्ञानिक कितने
सटीक,फंसते तो किसान हैं!

मौसम का मिजाज कब बिगड़ जाये यह कोई नहीं जानता.हम बुधवार की रात सोने की तैयारी कर रहे थे तभी धरती अचानक हिल गई. ऐसा छत्तीसगढ़ में करीब तीस साल पहले भी हुआ था किन्तु समय में फरक था, उस समय सुबह चार बजे के आसपास धरती हिली लेकिन इस बार यह शाम को नौ साढ़े नौ बजे के आसपास हुआ. रायपुर में बहुत कम लोगों को इसका अहसास हुआ किन्तु ऐसे किसी भूकम्प की भविष्यवाणी किसी माध्यम से नहीं की गई, हां धरती हिलने के बाद यह बताने में कोई कमी नहीं की गई कि देश में कहीं भी धरती हिले मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कभी नहीं होगा बहरहाल ऐसे बहुत से मामले हैं जो मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणियों को झुठला देते हैं. सुबह से दोपहर तक खूब गर्मी पड़ती है और शाम होते ही जैसे किसी हंसते खेलते व्यक्ति का मूड बदल जाता है, उसी प्रकार तेज आंधी चलती है तूफान आता है और सब तबाह हो जाता है. अरबों रूपयें के मौसम की जानकारी के लिये संयत्र देश में लगे है लेकिन सटीक जानकारी न भारत के इन संयत्रों और इसमें तैनात विशेषज्ञों के पास है और न ही दूर सात समुन्द्र पार बैैठे महान वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले अमरीका के पास क्योंकि वह खुद भी अचानक मौसम में आए बदलाव की तबाहियों का गवाह बनता है. सब दावे उस समय बेकार साबित हो जाते हैं जब इस बात की कोई भविष्यवाणी करें बिना या किसी के समझे बगैर अचानक कहीं जोरदार भूंकप आ जाता है तो कभी भारी गर्मी के बीच धूलभरी तूफानी हवा चलती है और कुछ ही क्षणों मेंं सब तबाह होकर शहर, कस्बे, गांव सब तबाही  का मातम मनाते हैं. वैज्ञानिक और सब मामले में दावे कर सकते हैं लेकिन प्रकृति द्वारा संचालित नियमों पर शतप्रतिशत दावा करने में वह आज तक असफल रहा हैं. अगर दावे सही होते तो न रबी की कटाई के समय बेमौसम वर्षा होती और न आंधी-तूफान से तैयार फसल को क्षति होती. देश के कई भागों में ओलावृष्टि से बहुत नुकसान हुआ इसकी भविष्यवाणी कहीं नहीं की गई कि ऐसा होगा. इस तरह के अप्रत्याशित मौसम की आशंका भविष्य में और बढ़ सकती है, ऐसा भी कहा जा रहा है. ठोस दावा नहीं,माना जा रहा है कि दुनिया पर्यावरण बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुकी है. इस संकट को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों, विशेषकर कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने की बात की जा रही हैं मगर किसी को इसकी परवाह नहीं.कई जगह एसिड वर्षा इस बात का संकेत है कि आकाश मंडल  में धरती से उत्पन्न ऐसे रासायनिक गैस का जमाव ज्यादा हो गया जो समय समय पर एसिड वर्षा भी कर रहे है. यह विश्व स्तर की चुनौती है लेकिन स्थानीय स्तर पर खेती-किसानी की रक्षा इस बदलते दौर में हमें कई स्तरों पर करनी है इसके बगैर तो हमारे पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंच पायेगा.  इस दौर में कृषि,आपदा-प्रबंधन व राहत, जल व मिट्टी संरक्षण तथा वनीकरण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. किसानों, मजदूरों और अन्य गांववासियों की आजीविका का आधार अधिक मजबूत करना होगा. खेती-किसानी में अब बदलाव ही एक विकल्प है जो मौसम के बिगड़ते मिजाज के बावजूद किसानों के जोखिम और कर्ज को न्यूनतम कर सकती है.संपूर्ण देश में फसल बीमा लागू है लेकिन यह कितने किसानों तक पहुंची है अगर फसल चक्र फेल हो रहा हों, तो किसानों को इसके विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे. हरित क्रांति की कोशिशों में हमने फसलों की ऐसी बहुत-सी किस्मों को भुला दिया है, जो प्रतिकूल मौसम में भी अच्छी उपज दे देती थीं.ऐसी किस्मों को फिर से फसल-चक्र में जगह देने से किसान के हितों की रक्षा संभव है और खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। देश की खेती-किसानी को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर ले जाने का रास्ता साफ करने की जरूरत है.मौसम में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में यह जरूरी हो जाता है कि आपदा-प्रबंधन और राहत के लिए पहले से ही योजनाएं बनाई जाये व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आपदा के बाद तुरंत ही सारी चीजें अपने आप शुरू हो जाएं. देश की नदियां जहां  जोड़ी जा सकती है वहां वहां उसे जल्द जोड़ा जाये ताकि भविष्य में जल संकट की स्थिति और गंभीर न हो जाये.
  

रविवार, 18 मई 2014

आजाद भारत में पैदा हुआ पहला प्रधानमंत्री!

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युवाओं की अहम भूमिका रही...जाति-धर्म सब सीमाएं लांघी गई मोदी को जिताने के लिये...
कांग्रेस के भ्रष्टाचार और दस वर्षो के कुशासन से मुक्त होना चाहते थे लोग

 लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को जो ऐतिहासिक जीत मिली है उसे भारतीय लोकतंत्र में किसी एक पार्टी को हासिल जीत में सबसे बड़ी  जीत है. पार्टी ने  दिल्ली, राजस्थान सहित कई राज्यों की सभी सीटें अपने नाम कर ली हैं तो कई राज्यों में दिग्गज क्षेत्रीय पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया है। यह चुनाव  हम सब के लिए चौंकाने वाले हो सकते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए यह परिणाम अपेक्षित ही माना जा  रहा है क्योंकि 2011 के बाद से ही उन्होंने सुनियोजित रणनीति के तहत इसके लिए आगे बढ़ना शुरू कर दिया था। तब उन्होंने सद्भावना यात्रा शुरू की थी. अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के समय वे जरूर कुछ हाशिये पर आ गए थे मगर 2004 के आम चुनाव में जब भाजपा की हार हुई तो उन्हें लगा कि अब वे केंद्र में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं. यह वह समय था जब लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की कब्र पर जाकर उनके लिए सराहना के शब्द बोल दिए. वे संघ के निशाने पर आ गए.अब मोदी के लिए मैदान खाली था. 2014 के चुनाव में मोदी के लिये हिंदी का पट्टा महत्वपूर्ण तो है पर जादुई अंक के लिए पर्याप्त नहीं। इसलिए उन्होंने ऐसी सीटों पर फोकस किया, जिन्हें आमतौर पर उपेक्षित किया जाता है, गोवा, दमन-दीव, अंडमान जैसे राज्यों की छोटी-छोटी सीटें. चुनाव के लिये मोदी ने पारंपरिक प्रचार अभियान के साथ नए तौर-तरीके भी अपनाए. वे बाहर से आए टेक्नोक्रेट थेप्त ऐसे आयोजन किए जिसने मोदी को एक कमोडिटी बना दिया.हैदराबाद में अगस्त में हुआ उनका वह भाषण जिसे सुनने के लिए पांच रुपए का टिकट खरीदना पड़ता था। इस सभा के लिए मोदी ने किसी सहयोगी दल की मदद नहीं ली.
थ्रीडी, होलोग्राम, चाय पार्टी, जैसे तरीके 18-23 साल के युवाओं को बहुत पसंद आए। कुछ नया करने की तलाश करने वाली पीढ़ी को लगा कि मोदी नया इनोवेशन कर सकते है। सितंबर 2013 से  मोदी ने लगातार  450 भाषण देकर बहुत बड़े इलाके तक पहुंचे. भाषणों और दौरों के जरिये उन्होंने पहले जनता में स्वीकार्यता बढ़ाई उसके बाद ही वे मीडिया के पास पहुंचे. प्रचार के दौरान वे लगातार नए आइडिया फेंकते रहें फिर चाहे वह 100 मेगा सिटी बनाने की बात हो या बुलेट ट्रेनें चलाने की.दिल्ली विधानसभा चुनाव  में  'आपÓ की जीत के बाद वे थोड़े विचलित नजर आए पर उन्होंने कोई गलती नहीं की वे अरविंद केजरीवाल की ओर से गलती होने का इंतजार करते रहें। केजरीवाल की चमक फीकी पड़ते ही उन्होंने 2002 के विकास के हिंदू मॉडल कै  को आधुनिक रूप दिया और फिर जोरदार अभियान छेड़ दिया.यह भी  दिलचस्प है कि 34 सालों में भाजपा संसद में कभी भी 182 से ज्यादा सीटें नहीं ला पाई,ऐसे में किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि इस चुनाव में भाजपा 200-220 से ज्यादा सीटें ला पाएगी लेकिन मोदी की अगुवाई  में एनडीए ने 334 सीटें जीतने का करिश्मा कर दिखाया. इस चुनाव में  बीजेपी की स्वीकार्यता 35 फीसदी थी, वहां मोदी की स्वीकार्यता 65 फीसदी थी.पूरे चुनाव में युवा गेम चेंजर साबित हुआ.इस बार चुनाव और राजनीति से बेरुखी रखने वाले यही युवा न सिर्फ मत देने पहुंचे, बल्कि भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। मोदी को भाजपा के लिए जितने देशभर से वोट मिले, उस औसत से छह प्रतिशत ज्यादा समर्थन युवाओं का मिला।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों में युवाओं ने बढ़-चढ़कर खुद को वोटर के तौर पर रजिस्टर कराया और मतदान किया.नतीजा शुक्रवार को सामने आया तब पता चला कि उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहली बार पार्टी ने जातियों और समुदायों से जुड़कर वोट देने की परंपरा को तोड़ा. जहां चार फीसदी वोटों के अंतर से सरकारें बनती और गिरती रही हैं.वहां युवाओं का कांग्रेस को 19 प्रतिशत  और भाजपा को 39 प्रतिशत  वोट देना निर्णायक हो गया.देश में भाजपा को 33 फीसदी वोट मिले, लेकिन युवाओं ने 39 फीसदी भरोसा दिखाया. सबसे ज्यादा युवा वोटरों वाली 15 सीटों में से भाजपा को दस तो कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली.उत्साह से भरे युवा जानते थे कि राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं, भ्रष्टाचार, महंगाई तो इनके ध्यान में थे ही लेकिन सबसे ज्यादा मजबूत नेतृत्व के लिए वोट दिया. कुल 81.5 करोड़ वोटरों में से 12 करोड़ 18-23 वर्ष वाले थे जिनने  इस बार सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी  को ही चुना. पूरे देश में 2000 से ज्यादा होर्डिंग्स आर्ैर  रेडियो और टीवी पर हर दिन 50-50 विज्ञापन बुक किए गए. ग्रामीण इलाकों के लिए खासतौर पर दूरदर्शन पर विज्ञापन बुक किए गये मोदी का प्रचार उन स्थानों तक पहुंचाया गया जहां आज तक भाजपा नहीं पहुंची थी, जैसे पूर्वोत्तर से लेकर केरल तक 16वें आम चुनाव में 282 सीटों पर विजय हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी भाजपा को अकेले अपने दम पर बहुमत मिल चुका है. भाजपा गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली हैं. यानी यह एक भारी जीत है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत के पीछे क्या कारण थे. और क्या भाजपा की इस जीत ने कुछ पुराने जमे-जमाए राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं.कांग्रेस ने भाजपा के लिए अकेले खेलने के लिए पूरा मैदान खाली छोड़ दिया था. इसकी एक कारण कांग्रेस के प्रति लोगों में आक्रोश था. इसकी वजह से ढेर सारे मतदाताओं ने, जिन्होंने पहले कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए वोट किया था, इस बार उन्होंने भाजपा को वोट दिया.
ये सभी  परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जो पार्टी विकल्प के रूप में दिखाई दे रही थी, उसे इन सबने वोट दिया. आमतौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की पार्टी है. भाजपा को जिस तरह वोट प्रतिशत मिला है, जिस तरह की सीटें मिली हैं उसके अऩुसार भाजपा ने इस धारणा  को तोड़ दिया है. भाजपा को छोटे छोटे ग्रामीण इलाके में अभूतपूर्व समर्थन मिला है. पहले कभी भी भाजपा को गांवों में इस तरह वोट नहीं मिला. पहले जाति यादव, पिछडा वर्ग और दलित वोट दिया करते थे. लेकिन ऊँची जातियों का वोट इस बार जिस तरह बिहार, उत्तर प्रदेश एवं अन्य कई राज्यों में मिला वैसा कभी नहीं देखा गया. चुनाव में जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए हैं.मोदी  आजादी  के बाद पैदा हुए भारत के पहले  प्रधानमंत्री होंगें

युवा वोटरों की अपेक्षाएं..."जादू की छड़ी घुमायेंगे मोदी"


युवा वोटरों की अपेक्षाएं..."जादू की छड़ी घुमायेंगे मोदी"
निशुल्क शिक्षा,चौबीस घंटे बिजली, एकल टैक्स,  जैसे ग्यारह अनुरोध...
युवा मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग, जिनकी संख्या करीब 2.31 करोड होती है, पहली बार मतदान में हिस्सा लिया- भाजपा जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी पर वे एक तरह से फिदा थे. वर्तमान भ्रष्ट सरकार से उनका विश्वास उठ चुका था. शायद यही कारण था कि उसने नरेन्द्र मोदी पर इतना विश्वास किया कि वोट देने के मामले में उन्होंने अपने अभिावकों तक की नहीं सुनी. इन नये मतदाताओं पर राजनीतिक दलों की पैनी नजर थी और चुनाव में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले युवाओं का समर्थन अधिक प्राप्त हुआ. मोदी के मोहित करने वाली बातों तथा नये भारत के लिये जो सपने दिखाये उसने पूरे देश में ऐसा माहौल खड़ा कर दिया कि उसके आगे वे सम्मोहित हो गये तथा पुराने युवाओं को, जो एक लम्बे समय से दूसरी  पार्टियों के साथ जुड़े हुए थे उन्हें भी अपने साथ मिलाने  में कामयाब हो गये.एक तरह से युवा मतदाताओं के आगे यह नये मतदाता हावी हो गये तथा सारी बाजी पलट दी. अब चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी से युवा यह आशा कर रहे है कि वे उनकी आशाओं को पूरा करने में समय न गवायें तथा हर वायदे को जल्द पूरा करें. इन युवाओं को लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी है,जो तत्काल देश में मंहगाई को कम कर देगा.निशुल्क शिक्षा, चौबीस घंटे हर घर को बिजली, हर घर को पानी और अन्य ऐसी ही सुविधाएं बस पद ग्रहण करते ही एक झटके में प्रदान करने की बात यह युवा कर रहे हैं.  सोशल मीडिया में ऐसे  युवाओं द्वारा भावी प्रधानमंत्री को लिखे गये एक पत्र में भी यह बात उन्होंने सिलसिलेवार कह डाली हैं पत्र का मजमून उन्हें संबोधित है जिसमें कहा गया हैै-
1.बिना अवरोध के 365 दिन चौबीस घंटे बिजली घरेलू के लिये तीन  रूपये और व्यावसायिक पांच रूपये के हिसाब से दी जाये.
2.गर्मी के दिनों सहित पूरे दिन शुद्व पेय जल की  पूर्ति हो.
3. भारत के सभी गांवो को जोड़ने  के लिये पक्की  सड़के बनाई जायेेे.
4.तेज चलने  वाली ट्रेने, और हमारा रेलवे अगले  पांच वर्षो में विश्व का सबसे बेस्ट रेलवे होना चाहिये.
5. बिना किसी झिझक के 'एकल टैक्स प्रणालीÓ लागू की  जाये
6.लालफीताशाही के बगैर का सर्वोत्तम प्रशासन, जिसमे भ्रष्टाचार का कोई स्थान न हो, ऐसी व्यवस्था हो.
7.होम लोन 6 प्रतिशत प्रति वर्ष, व्यावसायिक लोन 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष एंव नि:शुल्क शिक्षा तथा नि:शुल्क चिकित्सा प्रदान की जाये
8.खुदरा एफडीआई न हो
9. सभी भारतीयों के लिये एक जैसा कानून हो.
10.समान अधिकार और कमाई का लाभ जाति के आधार पर न होकर कमाई के आधार पर हो.
11.डालर की कीमत को आगामी पांच वर्षो में पैतीस रूपये तक पहंचाया जाये. इससे स्वत: ही पेट्रोल, गैस और सोने के भाव में गिरावट आयेगी
11 स्विस बैंक और विदेशों में जमा कालाधन  को वापस लाया जाये
12 पुलिस को नागरिकों से मित्रवत व्यवहार के लायक बनाया जाये
गंभीर अपराधों के मामलों पर निर्णय के लिये अधिकतम छै महीने की समय सीमा निश्चित की जायेे
इन युवाओं को आशा  है कि अगले  साठ माह में नरेन्द्र मोदी यह सब कर डालेंगे ताकि अगली बार लोग 'अबकी बार मोदी सरकारÓ की जगह यह कहने लगे कि 'बार बार मोदी सरकार.Ó
चुनाव में भाजपा को 39 प्रतिशत युवाओं का समर्थन मिला, जबकि कांग्रेस पर सिर्फ 19 प्रतिशत युवाओं ने भरोसा जताया. युवाओं के सहयोग से दिल्ली में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी प्रदेश में एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही, हालांकि वह कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलने में सफल रही.राजनीतिक दलों ने नये मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए सोशल मीडिया तथा अन्य सूचना एवं संचार सुविधाओं का जबर्दस्त उपयोग किया था. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार देश के 81.45 करोड़ मतदाताओं में 2.31 करोड़ की आयु 18-19 वर्ष के बीच थी, जो कुल मतदाताओं का 2.8 प्रतिशत है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 1.27 करोड़ मतदाताओं में 3.37 लाख मतदाताओं की आयु 18-19 वर्ष के बीच थी जो कुल मतदाताओं का 2.7 प्रतिशत थी। चुनाव में एक-एक मतों के महत्व को ध्यान रखते हुए विभिन्न दल इस युवा वर्ग को अपने पाले में लाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे.आम आदमी पार्टी ने अपने अभियानों में सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग किया था इससे प्रभावित होकर या एक तरह से इस टेक्नीक को अपनी ओर खीचते हुए नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया को भी अपने प्रचार में महत्वपूणर््ा अंग बना लिया. लोकसभा की करीब 30 प्रतिशत सीटों के सोशल मीडिया से प्रभावित होने की बात  को गंभीरता से लेते हुए राजनीतिक दलों ने मतदाताओं से सीधे सम्पर्क जैसे परंपरागत माध्यम से चुनाव प्रचार करने के साथ सूचना एवं संचार सुविधाओं का जबर्दस्त उपयोग किया.सोशल मीडिया से युवा काफी संख्या में जुड़े हैं और चुनाव में इस वर्ग का काफी महत्व रहा. इस वर्ग तक सूचना एवं सम्पर्क के रूप में इंटरनेट, फेसबुक, ट्विटर आदि को आगे बढ़ाया गया.सोशल मीडिया पर अपने अभियान को गति देने और लोगों तक पहुंचने के प्रयास के तहत भाजपा ने मिशन 272 प्लस के तहत 60 स्वयंसेवकों की एक टीम बनायी थी, जिन्हें लोगों तक सकारात्मकता संदेश के साथ जुड़ने का दायित्व सौंपा गया था और इन्हें दो लाख लोगों में से चुना गया था। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने भी युवा जोश जैसे अभियान के साथ युवाओं को जोड़ने की पहल की. कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ने के लिए एक टीम भी बनाई मगर मोदी के मुकाबले राहुल ने यह काम बहुत बाद में उस समय किया जब मोदी प्रचार के हर मामले में आगे निकल चुके थे. राहुल का प्रचार दमदार होने के बाद भी असरदार नहीं रहा.चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 28 राज्यों एवं सात केंद्र शासित प्रदेशों में दादर एवं नागर हेवली में कुल मतदाताओं में 9.88 प्रतिशत युवा मतदाता (18-19 वर्ष) है, जबकि झारखंड में कुल मतदाताओं में 9.03 प्रतिशत युवा मतदाता हैं.अंडमान निकोबार में सबसे कम 1.1 प्रतिशत युवा मतदाता हैं. हिमाचल प्रदेश में कुल मतदाताओं का 1.3 प्रतिशत युवा मतदाता है. हिमाचल की चारों सीटें भाजपा के खाते में गईं.उत्तर प्रदेश में 18-19 वर्ष के 38.1 लाख मतदाता हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में 20.8 लाख 18-19 आयु वर्ग के मतदाता हैं.उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 71 पर भाजपा ने जीत दर्ज की. पश्चिम बंगाल में युवाओं की हिस्सेदारी से भाजपा को अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिली.दिल्ली की उत्तर पश्चिम सीट पर 18-19 वर्ष के 61,760 मतदाता हैं, वहीं पश्चिम दिल्ली सीट पर 55620, उत्तर पूर्व सीट पर 54889, पूर्वी दिल्ली सीट पर 46574 युवा मतदाता थे.दिल्ली की सभी सात सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की.पश्चिम बंगाल, केरल और तामिलनाडू के युवाओं पर नरेन्द्र मोदी का जादू नहीं चल सका जबकि केरल के युवाओं ने राहुल का साथ दिया. मोदी केरल और तामिलनाडू भी प्रचार हेतु पहुंचे किंतु वहां उनका जादू नहीं चल सका. हिन्दी बेल्ट के युवाओं का पूरा साथ मोदी के साथ रहा शायद यही कारण है कि  इन बेल्टों की क्षेत्रीय पार्टियां तक एकदम साफ हो गई.

बुधवार, 14 मई 2014

बस अब ज्यादा इंतजार नहीं.... आज एक्जिट पोल से कुछ तो स्थिति स्पष्ट होगी


गठजोड़ में मोदी को 'सिंहासन के करीब जाने से रोकने की कोशिशें भी!


अब ज्यादा दिन नहीं बचे,सिर्फ चार दिन बाद यह स्पष्ट हो जायेेगा कि देश के सिंहासन पर कौन बैठेगा, लेकिन इससे पूर्व आज शाम एक्जिट पोलक लोगों की जिज्ञासा को बहुत हद तक कम कर देगा. इन पङ्क्षक्तयों के लिखे जाते तक आखिरी दौर का मतदान जारी है.मतदान की प्रक्रिया सोमवार को खत्म हो जायेगी, इस बीच जोड़-तोड़ का जो सिलसिला चला है वह भी कम इंन्टे्रस्टिंग नहीं है. भाजपा जहां स्पष्ट बहुमत का दावा कर रही है वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस जोड़-तोड़ में हैं कि किसी प्रकार केन्द्र में भाजपा की सरकार का उदय न हो. इस जोड़ तोड़ को देख भाजपा भी अपना इंतजाम करने में लगी है उसकी नजर ममता, मोदी और पटनायक पर है, भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि वह किसी प्रकार इन धुरन्धर नेताओं को मनाकर अपने साथ नहीं मिला सकती लेकिन 'साम धाम दण्ड भेदÓ का तरीका अख्तियार करने में भी वह पीछे नहीं है शायद यही वजह है कि सीबीआई को भी सत्ता पाने के लिये अपना मोहरा बनाने की बात चल रही है.
 इधर आम आदमी पार्टी की क्या भूमिका होगी यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उसका दावा है कि वह मोदी और राहुल को सत्ता में आने से रोकने के लिये तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने में मदद करेगी हालाकि इस मामले में आप के बीच मतभेद है किन्तु राजनीति में सबकुछ हो सकता है.कांग्रेस अभी इस हाल में भी दावे तो बहुत कर रही है लेकिन अंदर ही अंदर वह भी भाजपा की तरह ही डरी हुई है, शायद यही कारण है कि उसने बहुमत न आने की स्थिति में तीसरे मोर्चे का साथ देने की बात कही है लेकिन यहां भी पेच है कांग्रेस का समर्थन लेने के लिये कुछ विपक्षी नेता तैयार नहीं हैं.
आम आदमी पार्टी [आप] भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए तीसरे मोर्चे को समर्थन दे सकती हैं. आप के वरिष्ठ नेता गोपाल राय ने कहा कि अगर 16 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद तीसरे मोर्चे की सरकार के लिए पहल होती है तो पार्टी उसे मुद्दों पर आधारित समर्थन की पेशकश पर विचार कर सकती है.इस बयान का अरविन्द केजरीवाल ने खण्डन किया है. पूर्व में आये सर्वेेक्षणों में चौकाने वाली बात यही थी कि विपक्ष या तीसरा मोर्चा जो भी बनेगा वह अहम भूमिका निभाने की स्थिति में है तथा वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली ताकतों के साथ में आने की संभावना पर बातचीत तेज कर सकती है. सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य कई नेताओं ने इस तरह की संभावना जताई थी।  सोलहवीं लोकसभा में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के लिए नए साथियों की तलाश में सीबीआई अहम भूमिका अदा कर सकती है। मायावती, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे तीन बड़े क्षत्रप सीबीआई के निशाने पर हैं और उनके लिए सत्ताधारी दल के साथ टकराव आसान नहीं होगा।
ममता बनर्जी की तमाम कोशिशों के बावजूद शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी. इस घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेता फंसे हुए हैं और जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंचने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता.इस घोटाले का दायरा पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर असम और ओडिशा तक फैला हुआ है. अब तक घोटाले की जांच बीजू जनता दल के नेताओं तक भले ही नहीं पहुंची हो, लेकिन सीबीआई जांच की स्थिति में इसकी सारी परते खुल सकती है. जाहिर है ममता और नवीन पटनायक के लिए घोटाले की आंच से अपने कुनबे को सुरक्षित बचाने की मजबूरी होगी. मोदी के खिलाफ ममता बनर्जी की तमाम तल्ख टिप्पणियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों  का मानना है कि केंद्र सरकार से सीधा टकराव लेना उनके लिए संभव नहीं होगा. इसी प्रकार पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से एफआईआर निरस्त होने के बाद मायावती एक तरह से सीबीआई के चंगुल से बाहर निकल आई हैं, लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले को दोबारा खोलने की सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका नए सिरे से उनकी मुश्किलें बढ़ा सकती है। इस मामले पर 15 जुलाई को सुनवाई होनी है. फिलहाल सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को एफआइआर निरस्त होने के बाद पुरानेे सबूतों और बयानों के अप्रासंगिक होने का तर्क दिया, लेकिन अदालत के आदेश के बाद उसके पास जांच के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा.यहां यह भी इंगित करना होगा कि कि सीबीआइ सुप्रीम कोर्ट में लगातार मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के पुख्ता सबूत होने और इस सिलसिले में चार्जशीट तैयार होने का दावा करती रही है कि हमारा आंदोलन आम आदमी के लिए है और निश्चित रूप से मुद्दा आधारित समर्थन होगा. हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदार राजनीति की आवाज संसद में पहुंचे फिर यह मायने नहीं रखता कि हमें 10 सीटें मिलती हैं या 30 सीटें। आप ने 422 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम 100 सीटों पर जीत दर्ज करेगी.
छह चरणों के मतदान के बाद कांग्रेस ने यह मत बनाया था कि देश की सत्ता उसके हाथ से जा रही है. सत्ता का फायदा भाजपा को न मिले इसके लिए उसने चुनाव बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने के संकेत भी दिये. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि बहुमत न मिलने पर कांग्रेस तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है. मोदी को भाजपा के लिए ही बड़ी समस्या करार देते हुए खुर्शीद ने कहा था कि जब भगवान (राम मंदिर आंदोलन) की लहर कांग्रेस को नहीं रोक पाई तो मोदी की लहर क्या चीज है. इसलिए केंद्र में भाजपा की सरकार बनने की संभावना नहीं है. चुनाव बाद कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है. इतना ही नहीं वह सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे के दलों का समर्थन भी ले सकती है. माकपा ने भाजपा को सत्ता से रोकने के लिए चुनाव बाद सेक्युलर फ्रंट बनाने के संकेत दिए हैं.माकपा महासचिव प्रकाश कारत की माने तो  चुनाव के बाद सेक्युलर फ्रंट बन सकता है.  इसके लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन से कोई ऐतराज नहीं जबकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और रक्षा मंत्री ए.के एंटनी ने केरल की सभा में वामदलों को कांग्रेस के नेतृत्व में सेक्युलर फ्रंट के तहत एकजुट होने की अपील की थी.कारत का दावा है कि चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी. एंटनी के बयान पर उनका मत है कि चुनाव के बाद एंटनी और कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता होगा कि वह सेक्युलर मोर्चे को समर्थन दें, भाजपा को सरकार से दूर रखने के लिए सेक्युलर मोर्चे में कांग्रेस के समर्थन से कोई आपत्ति नहीं है.मोर्चे के नेतृत्व का फैसला चुनाव के बाद तय किया जा सकता है। 1996 में ऐसे ही हालात में संयुक्त मोर्चा बना था और नेता चुना गया था।

कब तक यात्री रेलवे के अत्याचारों को सहेगा?


कब तक यात्री रेलवे के  अत्याचारों को सहेगा?

प्लेन में खराबी आ जाये तो संबन्धित एयर लाइंस अपने यात्रियों को किसी बड़े होटल में ठहराकर उनकी सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती लेकिन क्या देश की सबसे ज्यादा कमाऊपूत रेलवे अपने यात्रियों की सेवा इसी प्रकार करती है? इस प्रकार नहीं तो भी क्या वह अपने उन यात्रियों की कोई खैर खबर लेती है जिनसे वह लम्बी यात्रा के नाम पर अनाप शनाप रेट वसूल करती है. शुक्रवार और शनिवार की दरम्यिानी रात बैतूल के समीप एक मालगाड़ी दुर्घटना के बाद जो अनुभव इस रूट के लाखों यात्रियों को करना पड़ा वह अभूतपूर्व था हालाकि ऐसी दुर्घटनाएं अक्सर होती है तथा यात्री इस तरह की मुसीबतें झेलते हैं लेकिन गर्मी के दिनों में जो कठिनाई होती है वह किसी जेल में एक दिन की सजा से कम नहीं है. शुक्रवार रात करीब 10-11  बजे के आसपास  बेतूल के पास घोडाडोगरी रेलवे स्टेशन के बिल्कुल करीब एक कोयले से भरी मालगाड़ी जो सारिणी संयत्र के लिये कोयले लेकर जा रही थी खूब तेज गति से पटरी से उतरकर विद्युत खम्बों को तोडते हुए बुरी तरह दुर्घटनग्रस्त हो गई.संपूर्ण रेलवे लाइन पर चलने वाले इलेक्ट्रिक इंजन की रेलगाड़यां जहां थी वही खड़ी हो गई विद्युत आपूर्ती लडखड़ाने से सिग्नलों ने भी काम करना बंद कर दिया और भी कई मुसीबतें इन प्रभावित ट्रेनों में सवार लोगों के समक्ष आन पड़ी. कई गाडियों की एसी बंद हो गई. ट्रेन के जनरेटरों से कुछ समय तक तो लाइट व एसी चले किन्तु वह भी बाद में बंद हो गई. एक तरह से सारी ट्रेनों में अव्यवस्था फैल गई. ट्रेनों में मौजूद रेलवे के किसी कर्मचारी को यह नहीं मालूम था कि आखिर क्या हुआ. बहरहाल ट्रेने जैसी थी उसी हाल में सात से आठ घंटे तक इस भीषण गर्मी में यात्रियों से ठसाठस भरी हालत में यूं ही खड़ी रही. ट्रेनों में पानी खत्म हो चुका था तथा बच्चे मारे गर्मी के चीख पुकार कर रहे थे. यात्रियों से मनमाना पैसा वसूल करने वाले रेलवे को इसकी कोई चिंता नहीं थी. कहीं कोई अनाउंसमेंट भी नहीं किया गया कि आगे कब उन्हें राहत मिलेगी. कुछ ट्रेने तो ऐसे जंगलों में खड़ी थी जहां यात्रियों के सिवा कोई दूसरा इंसान नजर नहीं आता था. ऐसे हालत में रेलवे ने यात्रियों को राहत दिलाने के लिये बस इतना किया कि इलेक्ट्रिक  इंजनों की जगह डीजल इंजनों की व्यवस्था कर दूर दराज क्षेत्रों में खड़ी ट्रेनों को उन स्थानों से निकालकर दुुर्घटनास्थल से निकालने में मदद पहुंचाई लेकिन इस कार्य में भी करीब छै सात घंटे का समय लगा. ट्रेनों में सवार यात्रियों को खाने- पीने की राहत पहुंचाने का प्रबंध रेलवे ने नहीं किया जबकि यात्री जिन्हे अपने गंतव्य तक की यात्रा करने में जहां बारह घंटे का समय लगता था वह उन्होंने चौबीस और छत्तीस घंटों में पूरा किया. सवाल यह उठता है कि जिसप्रकार रेलवे किसी भी दुर्घटना के लिये राहत दल और राहत के लिये लगने वाली ट्रेन तथा मशीने तैयार रखता है उसी प्रकार वह ट्रेनों में यात्रा कर रहे उन यात्रियों को राहत पहुंचाने के लिये ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करता ?क्यों उन्हें घंटों भूखे प्यासे एक ही स्थान पर पड़े रहने के लिये मजबूर करता है?मालगाड़ी की जगह यात्री ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर रेलवे के पास अपनी संपत्ती की रक्षा करने की तो तैयारी है लेकिन यात्रियों को राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था आज तक नहीं की. शुक्रवार की घटना के बाद खड़ी यात्री गाड़ियों में कई ऐसे पेशेटं थे जो हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से पीड़ित थे उन्हें भी रेलवे ने भगवान भरोसे छोड़ दिया. यह यात्रियों की भी गलती है कि वह भी  रेलवे के इस अत्याचार को शांत दिल से बर्दाश्त कर लेता है.

एक्जिट पोल 'अच्छे दिन आने वाले हैं!


दुनिया के प्राय: सभी लोकताङ्क्षत् देशों में एक्जिट पोल का बोलबाला है,यह मतदाताओं व प्रत्याशियों को कुछ समय तक टेंशन से दूर रखने की कोशिश तो करता है किन्तु हकीकत में यह असल पोल के नतीजे नहीं बन पाते.भारत में लोकसभा चुनाव के बाद पिछले कुछ वर्षो से एक्जिट पोल का ्रचलन शुरू हुआ है.मतदान के दौरान भी एक्जिट पोल दिखाये जा रहे थे किन्तु चुनाव आयोग ने  इसपर रोक लगा दी.चुनाव खत्म होते ही इसकी अनुमति दे दी और आननफानन में टीवी चैनलों ने एक्जिट पोल दिखा भी दिया. देश की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा सहित सभी विपक्षी पार्टी के नेताओं ने एक्जिट पोल के नतीजे को स्वीकार करने की जगह यही कहा है कि मतगणना के दिन का  इंतजार कीजिये. वास्तव में एक्जिट पोल बहुत सीमित लोगों के बीच से होता है, भारत जैसे एक अरब पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश में जिसमें  आधे  से ज्यादा अर्थात करीब  सत्तर प्रतिशत लोग मतदान में हिस्सा लेते हैं में से यह खोज निकालना किसी के लिये भी कठिन हो जाता है कि मतगणना के बाद क्या स्थिति होने वाली है. करीब एक महीने के चुनाव अभियान के दौरान चुनाव प्रचार के समय एक्जिट पोल में लगे लोगों ने करीब पौने दो लाख लोगों के बीच से यह बात निकाल ली कि भावी स्थिति क्या होगी? एक टीवी चेनल के एंकर ने एक्जिट पोल के परिणाम पर टिप्पणी के बाद यही बात कही कि आप इस परिणाम को असल परिणाम के नजरिये से मत देखिये दुनिया के किसी देश का एक्जिट पोल आज तक सही परिणाम नहीं दे पाया हैं. बहरहाल एक्जिट पोल ने जो परिणाम दिये है वह चुनाव  के दौरान मौजूद कथित लहर और मतदान प्रतिशत में बढौत्तरी के आधार पर भी हो सकता है. एक्जिट पोल में एनडीए को भारी बहुमत का दावा किया है जिसमें उसे 340 सीट तक लाने की बात कही गई  है जबकि वर्तमान सत्तारूढ दल को कहीं सत्तर और कहीं 119, 123 सीट तक मिलने का दावा किया गया है. कांग्रेस का जहां सूपड़ा साफ है वहीं हाल ही अस्तित्व में आई आप पार्टी को देश की संसद में खाता खोलते बताया गया है. इससे पहले  सन् 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह का आंकलन एक्जिट पोल करने वालों ने किया था. 2004 में अटल बिहारी बाजपेयी की तेरह दिनी सरकार के बाद चुनाव कराया गया था. उस समय 'फील गुडÓ का नारा चला और सब 'बेड- बेडÓ हो गया इसके बाद 2009 में फिर  एक्जिट पोल मे दिखाया गया कि यूपीए सत्ता से बाहर हो रही है लेकिन सत्ता पर फिर वही काबिज हुई. इस बार एनडीए ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए नरेन्द्र मोदी पर दाव खेला है.मोदी ने 'अच्छे दिन आने वालेÓ हैं का वादा करते हुए धुआंधार प्रचार में देश के युवाओ को बांधा. हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उनका सिक्का बहुत हद तक जम गया लेकिन दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में अब भी कु छ नहीं कहा जा सकता. सोलह तारीख को इलेक्ट्रोनिक मशीनों से जब वोट उगलेंगे तभी इस बात का पता चलेगा कि देश में किये जाने वाले एक्जिट पोल में कितना दम है.बहरहाल एक्जिट पोल को देखे तो हिंदी पंट्टी से लेकर पश्चिम और दक्षिण कहीं से भी कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं आ रही हैं. पिछले दो बार से लगातार मजबूती देते रहे आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस बंटवारे का कार्ड खेलने के बाद भी धड़ाम रही.आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी इससे आगे निकलते दिखाए गए हैं.वैसे कांग्रेस ने एक्जिट पोल पर होने वाली किसी भी बहस का बहिष्कार किया है और उसने वर्ष 2004 और 2009 के चुनावों में एक्जिट पोल गलत साबित होने का उदाहरण दिया है.चुनाव के नतीजे शुक्रवार को आने वाले हैं. सभी एक्जिट पोल केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनती और कांग्रेस की अब तक की सबसे बुरी हार होती दिख रही हैं, इनमें आज तक-सीसरो जहां राजग को 272 सीटें मिलते दिखा रहा है, वहीं इंडिया टीवी-सी वोटर इसे 289 सीटों के साथ अच्छी बढ़त पाता दिखा रहा है। टाइम्स नाऊ-ओआरजी मार्ग ने राजग को 249 सीटें मिलने की भविष्यवाणी जरूर की है, लेकिन ऐसी स्थिति में भी यह गठबंधन जरूरी सीटों से ज्यादा दूरी पर नहीं है। इसी तरह आज तक-सीसरो ने जहां कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग को 115 सीटें दी हैं, वहीं अन्य दलों के लिए 156 सीटें रखी हैं। इंडिया टीवी-सी वोटर ने संप्रग को 101 सीटें दी हैं। एक्जिट पोल में आम आदमी पार्टी भी पांच सीटों के साथ अपने पहले चुनाव में खाता खोल रही है. हालांकि, यह नहीं भूला जा सकता कि 2004 में तो ऐसे अधिकांश सर्वेक्षण भाजपा नेतृत्व की सरकार आती दिखा रहे थे. गत विस चुनावों में सबसे सटीक आकलन देने वाली सर्वेक्षण एजेंसी टुडेज चाणक्य ने अकेले भाजपा को 291 व राजग 340 सीटें दी हैं और कांग्रेस को आपातकाल के बाद से भी कम यानी 57 सीटों का अनुमान लगाया है।

शास्त्री चौक ही सब कुछ क्यों? जयस्तभं-शारदा चौक भी तो है!


 रायपुर का ट्रेफिक सुधार कार्यक्रम शास्त्री चौक तक ही सिमटा हुआ क्यों है?पिछले कई दिनों से पूरा प्रशासन शास्त्री चौक को ही पूरा शहर मान बैठा है और उसकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ रहा शायद इसलिये भी कि यहां से इस प्रदेश के कर्ताधर्ता दिन में कई बार गुजरते हैं जबकि जयस्तंभ चौक जो शहर का दिल है उसे विकसित करने का कार्य ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है. इधर रायपुर के टैफिक को बुरी तरह प्रभावित करने वाले शारदा चौक से लेकर तात्यापारा तक के रोड़ पर ट्रेैफिक की बुरी हालत पर रायपुर का प्रशासन चाहे वह नगर निगम हो या जिला प्रशासन अथवा पुलिस प्रशासन सब खामोश है. इस मार्ग को आमापारा से तात्यापारा चौड़ीकरण के साथ- साथ पूरा किया जाना था लेकिन आज तक इस दिशा में कोई कार्रवाही नहीं की गई. संबन्धित लोगों को मुआवजा देकर उसी समय हटा दिया जाता तो शायद यह नौबत नहीं आती  कि अब यहां से हटाने के लिये लोगों को दा से तीन गुना ज्यादा मुआवजा देना पड़ेगा. रायपुर नगर निगम, जिला प्रशासन  और सरकार के बीच  के झगड़े का खामियाजा रायपुर सहित पूरे देश के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है. पीक हावर्स में इस रोड़ से गुजरना कठिन हो जाता है.वाहन एक दूसरे से चिपचिपाते हुए चलते हैं ऊपर से ट्रेफिक पुलिस वालों ने अस्थाई विभाजन के नाम से मोटे मोटे विभाजक लगा दिये हैं. विचित्र हालात है इस रोड़ का.जीई रोड़ होकर भी शहर का यह हिस्सा किसी गली से कम नजर नहीं आता. शहर के कर्ताधर्ता योजनाएं बनाते हैं, उसे लम्बा खीचते हैं इस दौरान खर्चा दुगना तीन गुना हो जाता है. इस छोटे से पेच को ठीक करने में मुश्किल से एक माह का समय लगेगा लेकिन अहम की लड़ाई में आम आदमी पिस रहा है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुम्बई- नागपुर-राजनांदगांव- दुर्ग- भिलाई तरफ से शहर की तरफ से आने वाला सारा ट्रेफिक इसी मार्ग से होकर गुजरता है. सरकार को चाहिये कि तत्काल  इस सड़क का चौड़ीकरण करें या फिर टाटीबंद से कृषि विश्वविद्यालय तक फलाई ओवर का निर्माण करें. ऐसे ही एक फलाई ओवर की जरूरत पंचपेड़ी नाका से  रायपुर रेलवे स्टेशन तक भी जरूरी है. अगर चौड़ीकरण के साथ फलाई  ओवर और साथ में मोनो रेल की व्यवस्था नहीं की गई तो आगे आने वाले वर्षो में मौजूदा सड़कों पर  से लोगों का गुजरना कठिन होगा. शहर के योजनाकारों को चाहिये कि वह एक ऐसी योजना बनाए जो भविष्य में किसी प्रकार की ट्रेफिक समस्या को जन्म ही न लेने दें.

रविवार, 11 मई 2014

बस अब ज्यादा इंतजार नहीं.... आज एक्जिट पोल से कुछ तो स्थिति स्पष्ट होगी? गठजोड़ में मोदी को 'सिंहासनÓ के करीब जाने से रोकने की कोशिशें भी!


अब ज्यादा दिन नहीं बचे,सिर्फ चार दिन बाद यह स्पष्ट हो जायेेगा कि देश के सिंहासन पर कौन बैठेगा, लेकिन इससे पूर्व आज शाम एक्जिट पोल लोगों की जिज्ञासा को बहुत हद तक कम कर देगा. इस बीच जोड़-तोड़ का जो सिलसिला चला है वह भी कम इंन्टे्रस्टिंग नहीं है. भाजपा जहां स्पष्ट बहुमत का दावा कर रही है वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस जोड़-तोड़ में हैं कि किसी प्रकार केन्द्र में भाजपा की सरकार का उदय न हो. इस जोड़ तोड़ को देख भाजपा भी अपना इंतजाम करने में लगी है उसकी नजर ममता, मोदी और पटनायक पर है, भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि वह किसी प्रकार इन धुरन्धर नेताओं को मनाकर अपने साथ नहीं मिला सकती लेकिन 'साम धाम दण्ड भेदÓ का तरीका अख्तियार करने में भी वह पीछे नहीं है शायद यही वजह है कि सीबीआई को भी सत्ता पाने के लिये अपना मोहरा बनाने की बात चल रही है. इधर आम आदमी पार्टी की क्या भूमिका होगी यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उसका दावा है कि वह मोदी और राहुल को सत्ता में आने से रोकने के लिये तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने में मदद करेगी हालाकि इस मामले में आप के बीच मतभेद है किन्तु राजनीति में सबकुछ हो सकता है.कांग्रेस अभी इस हाल में भी दावे तो बहुत कर रही है लेकिन अंदर ही अंदर वह भी भाजपा की तरह ही डरी हुई है, शायद यही कारण है कि उसने बहुमत न आने की स्थिति में तीसरे मोर्चे का साथ देने की बात कही है लेकिन यहां भी पेच है कांग्रेस का समर्थन लेने के लिये कुछ विपक्षी नेता तैयार नहीं हैं.
आम आदमी पार्टी [आप] भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए तीसरे मोर्चे को समर्थन दे सकती हैं. आप के वरिष्ठ नेता गोपाल राय ने कहा कि अगर 16 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद तीसरे मोर्चे की सरकार के लिए पहल होती है तो पार्टी उसे मुद्दों पर आधारित समर्थन की पेशकश पर विचार कर सकती है.इस बयान का अरविन्द केजरीवाल ने खण्डन किया है. पूर्व में आये सर्वेेक्षणों में चौकाने वाली बात यही थी कि विपक्ष या तीसरा मोर्चा जो भी बनेगा वह अहम भूमिका निभाने की स्थिति में है तथा वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली ताकतों के साथ में आने की संभावना पर बातचीत तेज कर सकती है. सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य कई नेताओं ने इस तरह की संभावना जताई थी।  सोलहवीं लोकसभा में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के लिए नए साथियों की तलाश में सीबीआई अहम भूमिका अदा कर सकती है। मायावती, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे तीन बड़े क्षत्रप सीबीआई के निशाने पर हैं और उनके लिए सत्ताधारी दल के साथ टकराव आसान नहीं होगा।
ममता बनर्जी की तमाम कोशिशों के बावजूद शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी. इस घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेता फंसे हुए हैं और जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंचने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता.इस घोटाले का दायरा पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर असम और ओडिशा तक फैला हुआ है. अब तक घोटाले की जांच बीजू जनता दल के नेताओं तक भले ही नहीं पहुंची हो, लेकिन सीबीआई जांच की स्थिति में इसकी सारी परते खुल सकती है. जाहिर है ममता और नवीन पटनायक के लिए घोटाले की आंच से अपने कुनबे को सुरक्षित बचाने की मजबूरी होगी. मोदी के खिलाफ ममता बनर्जी की तमाम तल्ख टिप्पणियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों  का मानना है कि केंद्र सरकार से सीधा टकराव लेना उनके लिए संभव नहीं होगा. इसी प्रकार पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से एफआईआर निरस्त होने के बाद मायावती एक तरह से सीबीआई के चंगुल से बाहर निकल आई हैं, लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले को दोबारा खोलने की सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका नए सिरे से उनकी मुश्किलें बढ़ा सकती है। इस मामले पर 15 जुलाई को सुनवाई होनी है. फिलहाल सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को एफआइआर निरस्त होने के बाद पुरानेे सबूतों और बयानों के अप्रासंगिक होने का तर्क दिया, लेकिन अदालत के आदेश के बाद उसके पास जांच के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा.यहां यह भी इंगित करना होगा कि कि सीबीआइ सुप्रीम कोर्ट में लगातार मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के पुख्ता सबूत होने और इस सिलसिले में चार्जशीट तैयार होने का दावा करती रही है कि हमारा आंदोलन आम आदमी के लिए है और निश्चित रूप से मुद्दा आधारित समर्थन होगा. हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदार राजनीति की आवाज संसद में पहुंचे फिर यह मायने नहीं रखता कि हमें 10 सीटें मिलती हैं या 30 सीटें। आप ने 422 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम 100 सीटों पर जीत दर्ज करेगी.
छह चरणों के मतदान के बाद कांग्रेस ने यह मत बनाया था कि देश की सत्ता उसके हाथ से जा रही है. सत्ता का फायदा भाजपा को न मिले इसके लिए उसने चुनाव बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने के संकेत भी दिये. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि बहुमत न मिलने पर कांग्रेस तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है. मोदी को भाजपा के लिए ही बड़ी समस्या करार देते हुए खुर्शीद ने कहा था कि जब भगवान (राम मंदिर आंदोलन) की लहर कांग्रेस को नहीं रोक पाई तो मोदी की लहर क्या चीज है. इसलिए केंद्र में भाजपा की सरकार बनने की संभावना नहीं है. चुनाव बाद कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है. इतना ही नहीं वह सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे के दलों का समर्थन भी ले सकती है. माकपा ने भाजपा को सत्ता से रोकने के लिए चुनाव बाद सेक्युलर फ्रंट बनाने के संकेत दिए हैं.माकपा महासचिव प्रकाश कारत की माने तो  चुनाव के बाद सेक्युलर फ्रंट बन सकता है.  इसके लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन से कोई ऐतराज नहीं जबकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और रक्षा मंत्री ए.के एंटनी ने केरल की सभा में वामदलों को कांग्रेस के नेतृत्व में सेक्युलर फ्रंट के तहत एकजुट होने की अपील की थी.कारत का दावा है कि चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी. एंटनी के बयान पर उनका मत है कि चुनाव के बाद एंटनी और कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता होगा कि वह सेक्युलर मोर्चे को समर्थन दें, भाजपा को सरकार से दूर रखने के लिए सेक्युलर मोर्चे में कांग्रेस के समर्थन से कोई आपत्ति नहीं है.मोर्चे के नेतृत्व का फैसला चुनाव के बाद तय किया जा सकता है। 1996 में ऐसे ही हालात में संयुक्त मोर्चा बना था और नेता चुना गया था।