बुधवार, 30 अप्रैल 2014

'इनमे से कोई नहीं के बाद भी एक आप्शन है,सरकार को चिंता नहीं


आप अपना वोट जरूर दे कि अपील आसान लेकिन वोट किसे दें?



हालाकि अगला चुनाव शायद जल्द आ जाय या फिर पांच साल पूरे करे लेकिन इस चुनाव ने फिर कई सवालों को यूं ही छोड़ दिया है?सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, सुपर स्टार आमिर खान सहित कई प्रमुख हस्तियों और सरकारी विज्ञापनों ने जनता को इस चुनाव में जागृत करने का प्रयास किया लेकिन वोटों का प्रतिशत कहीं शत प्रतिशत नहीं रहा. लगातार वोट के प्रतिशत में कमी या लोगों मे वोट न देने की प्रवृत्ति पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तो यहां तक कह दिया कि जो वोट न दे उसपर कानूनी कार्रवाही करनी चाहिये. चुनाव आयोग की सिफारिश पर जिस नोटा को संवैधानिक अधिकार में शामिल कराने में राजनीतिज्ञों और सरकार की अडगेंबाजी के कारण ग्यारह साल का समय लग गया वे वोट न डालने पर सजा की बात किस मुंह से करते हैं? भारत का नागरिक होने का हमें गर्व है और एक सच्चे नागरिक के तौर पर हम भी वोट देना चाहते हैं लेकिन किसे? वे जिन्हें पार्टियां चुनाव मैदान में उतारती हैं?जिनके खिलाफ कई किस्म के अपराध,आरोप और मामले दर्ज हैं या उन्हें जो चुनकर जाने के बाद संसद का समय बर्बाद क रते हैं या उन्हें जो चाकू लहराते हैं,गर्भग्रह तक पहुंच जाते हैं, तोड़फोड़ करते हैं या उन्हें वे जो ससंद में जाकर अपने क्षेत्र के बारे में एक शब्द नहीं बोलते अथवा वे जो मंहगाई, भ्रष्ष्टाचार,आर्थिक अपराध ,सामाजिक अपराध और अन्य बुराइयों के लिये जिम्मेदार हैं.क्यों हमारे जमीर को हर पांच साल में यूं ही ललकारा जाता है? वोट देना मजबूरी बना दिया गया लेकिन कोई विकल्प अच्छे व्यक्ति का नहीं दिया. क्यो नहीं मतदाताओं को भी प्रत्याशी बनने की पात्रता की तरह का नियम बनाया जाता? मतदान को अगर लोकतंत्र के मंदिर की पूजा समझा जाता है तो उस मंदिर में चढ़ने वाले फूल भी उतने ही पवित्र होनेे चाहिये.यह नहीं कि कोई शराब पाकर वोट डालने जा रहा है, तो कोई कम्बल, व पैसे खाकर मंदिर को अपवित्र कर रहा है.वोट डालने की वकालत करने वाले हमे बताये अगर अस्सी प्रतिशत वोट पडता है तो वह वोट कैसे पड़ते है? उसे पाने के लिये प्रत्याशी प्रचार- संपर्क के साथ क्या क्या जतन करता है?मसलन शराब, पैसा,कंबल, बाहुबल के बाद जब जीतता है तो स्वाभाविक है कि वह मतदाताओ की जेब से अपने खर्च को सूद समेत वसूल भी लेता है?वोट के प्रतिशत में बढौत्तरी उन नौजवानों की ह,ै जो अभी देश की राजनीति को पूरी तरह समझ नहीं पाये हैं और जिज्ञासा कर वोट डाल रहे हैं.हकीकत यह है कि एक हबहुत बड़ा समुदाय आज भी इस स्थिति में वोट डालना ही नहीं चाहता.सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने का अधिकार दिया है कोर्ट ने चुनाव आयोग को वोटरों को ईवीएम में 'इनमें से कोई नहींÓ का विकल्प देने का निर्देश दिया. चुनाव सुधार की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मील का पत्थर माना जा रहा है लेकिन इसमें भी गड़बड़ी की संभावना बनी हुई है.ऐसे वोट को सत्तारूढ़ पार्टियों द्वारा अपने खाते में करने की शिकायतें मिल रही है. सभी को रिजेक्ट का अधिकार पिछले विधानसभा चुनाव से लागू हो चुका है.गौरतलब है कि चुनाव आयोग 2001 मे ही यह प्रस्ताव सरकार को भेज चुका था लेकिन सरकारें इसे दबाये बैठी रही, ईवीएम मेल से कोई नहीं विकल्प के बाद वोटर अब कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आने पर उन्हें रिजक्ट कर सकेगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वोटिगं का अधिकार संवैधानिक अधिकार है तो उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी संवैधानिक के तहत अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है.  निगेटिव वोटिंग से चुनाव में सुचिता और जीवन्तता को बढावा मिलेगा और राजनैतिक दल साफ छवि वाले प्रत्याशियों को टिकिट देने के लिये मजबूर होंगे.दरअसल वोटरों के पास रूल नम्बर 49-0 ओ के तहत किसी भी उम्मीदवार  को वोट न देने का अधिकार पहले से ही था, इसके तहत वेाटर को फार्म भरकर पोलिंग बूथ पर चुनाव अधिकारी और एजेंट को अपनी पहचान दिखाकर वोट डालना होता था. इस प्रक्रिया में खामी यह थी कि  पैचीदा होने के साथ इसमें वोटर की पहचान गुप्त नहीं रह जाती. चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को गोपनीय और सुविधाजनक बनाने के लिये दस दिसंबर 2001 को ही ईवीएम में उम्मीदवारों का नाम के बाद इनमें से कोई नहीं का विकल्प देने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था लेकिन 12 सालो में इस पर कोई कदम नहीं उठाये गये .आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने वोटरों को विधानसभा चुनावों से यह अधिकार दे दिया.चुनाव सुधारों  की मांग कर रहे कार्यकर्ताओं का यह कहना है कि किसी क्षेत्र में यदि पचास प्रतिशत से ज्यादा वोटर 'इनमें से कोई नहीÓ के आप्शन पर पडता है तो वहां दुबारा चुनाव करवाना चाहिये.अभी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है,चुनाव आयोग ने भी इसका समर्थन किया था और सुझाव दिया था कि सरकार को ऐसा प्रावधान करने के लिये कानून में संशोधन करना चाहिये. सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.




सोमवार, 28 अप्रैल 2014

कौन जिम्मेदार है शहर में पीलिया फैलाने के लिये?




जब प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदते हें और जब बीमारी से मौते होने लगती है तब हमें याद आती है सफाइ!र् स्वास्थ्य कार्यक्रम! और दुनियाभर के एहतियाती कदम! राजधानी रायपुर के मोहल्लों में कम से कम तीन महीनों से पीलिया महामारी का रूप धारण किये हुए हैैं और हमने अपने इन्हीें  कालमों में यह भी बताया था कि इसके पीछे कौन से प्रमुख कारण है किन्तु किसी ने इसपर संज्ञान नहीं लिया, अब जब आज यह बीमारी संक्रामक रूप ले चुकी है और एक साथ दो-दो मौते हो चुकी है तब प्रशासन को याद आ रहा है कि हां कुछ तो करना पड़ेगा नहीं तो लोग कीड़े मकोडा़ें की तरह मरने लगेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी आनन फानन में बीमारी की गंभीरता से अवगत करा दिया गया.लगातार लोगों के बीमार पड़ने के दौरान इसकी गंभीरता से अवगत कराने की जगह दो मौतों के बाद खबर उनके उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान ही पहुंचाई गई.रविवार को एक एनआईटी छात्र और बाद में एक महिला की मौत ने संपूर्ण प्रशासन को हिलाकर रख दिया और शहर  में सनसनी व दहशत का माहौल निर्मित हो गया.अफसरों ने बीमारी की गंभीरता से तो मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया पैसे भी स्वीकृत करा लिया लेकिन क्या एहतियातिक कदम उठाये गये? शहर आज भी गंदा है, मैला है और नालियां बदबूदार है इन्हीं नालियों के पास से लोगों के घरो के लिये नगर निगम की वे पाइप लाइनें गई हैं जिनसे लोग पीने का पानी लेते हैं. लोहे की पाइप लाइनें इतनी पुरानी  है कि इनके अंदर जंग लग चुकी है तथा इसमें कीड़ों ने अपना घर  बना लिया है. निगम शहर की नलों से पानी कम से कम दो या तीन बार खोलता है इसके बीच का समय कीडों का होता है जो नालियों  से निकलकर इन पाइप लाइनों में पहुंचते हैं. पानी चालू होते ही लोगों की भीड नलों की ओर दौड़ती है वे पानी भरते हैं साथ ही  कीडे मकोडा़ेें को भी अपने रसोई तक ले जाते हैं.पीलिया और उदर  रोग से संबन्धित अन्य बीमारियों की उत्पत्ती यहीं से होती है. निगम के एक बड़े अधिकारी रविवार को टीवी चैनल पर यह कहते हुए सुना गया कि लोगों को अपने घरों में पानी उबालकर पीना चाहिय,े आरओ लगाने की बात भी उन्होंने कहीं लेकिन कितने ऐसे लेाग हैं जो आरओ लगाने  के लिये सक्षम हैं?पानी गरमकर पीना  कहना आसान है लेकिन क्या यह भी हर समय ऐसा हो सकता है? हां हम मानते हैं कि निगम अपने ओवर हेड टैंकों से फिल्टर किया हुआ स्वच्छ पानी लोगों के घरों को भेजती है लेकिन यह भी सही है कि निगम द्वारा बिछाई गई पाइप लाइनें ही रायपुर के मोहल्लों में पीलिया फैला रही है,यह बदलने का काम उन मोहल्लों मे तो शुरू हो गया लेकिन अन्य वार्डाे का क्या  होगा? रविनगर की नालियां देखिये या सर्वोदय नगर हीरापुर की सेप्टिक  टैंक तरफ कीगलियां देखियें जहां सफाई शायद वर्षो से सफाई नहीं हुई.राजधानी रायपुऱ सहित छत्तीसगढ़ के प्राय: हर शहरों में लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार सहित नगर पालिकाओं और नगर निगमों की भी है. यह संस्थाएं आम नागरिकों से इसके लिये सालाना एक मुश्त रकम वसूल करती  है. यह न पटाने पर वे घरों के सामने सफाई नहीं कराते, स्ट्रीट लाइट की सुविधा नहीं देते और नलों को काट भी देते हैं लेकिन सवाल  यह भी उठता है कि क्या नगर निगम का स्वास्थ्य व  संबन्धित अन्य विभागों का अमला कभी यह देखने का प्रयास भी करता है कि मोहल्लों या वार्डो में सफाई हो रही है या नहीं, नलों से पानी बराबर सप्लाई  की जा रही है या नहीं? वार्डो में स्ट्रीट लाइट जल रहे हैं कि नहीं?क्या कभी नगर निगम ने अपने  द्वारा सप्लाई किये जा रहे पानी को किसी के घर से सेम्पल लेकर टेस्ट किया  है?अगर हां तो बताये कितने घरों की टेस्टिगं की और क्या  निष्कर्ष निकला?बीमारी  फैलाने के लिये निगम तो जिम्मेदार है ही साथ ही शहर के लोग भी उतने ही जिम्मेदार है जो रोज हर सेके ण्ड नालियों व सड़कों में कचरा फेककर शहर को और गंदा कर रहे हैं! ऐसे लोगों पर  कार्रवाई की जिम्मेदारी भी  निगम की बनती है.यह भी बताया जाये कि कितने लोगों पर दण्डात्मक कार्रवाई की गई?

जल प्रबंधन इतना कैसे बिगड़ा कि गांवों में सूखा पड़ने लगा!



  कोई यह नहीं कह सकता कि इस वर्ष बारिश कम हुई, इन्द्र देवता खुश थे, खूब लबालब बारिश से नदी नाले सब भर गये, यहां तक कि मनुष्य द्वारा निर्मित बांधों में भी इतना पानी भर गया कि बांधों के गेट खोलकर पानी बहाया गया,इससे कई गांवों में बाढ़ की स्थिति निर्मित हुई.सवाल यहां अब यही उठ रहा है कि मानसून अनुकूल व सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में सूखे के हालात क्यो पैदा हो रहे हैं. क्यों महासमुन्द और अन्य  अनेक  क्षेत्रों में सूखे की नौबत आई?क्यों महानदी का पानी सूख गया और क्यों धरती का जलस्त्रोत नीचे गिरता जा रहा है?क्या यह हमारी प्रबंध व्यवस्था की खामियां थी जिसके कारण अप्रैल महीने से लोगों को सूखे की भयानक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. यह अब स्पष्ट होने लगा है कि शहरी क्षेत्रों के साथ साथ ग्रामीण इलाकों में पेय  जल के साथ निस्तारी की  समस्या भी गंभीर रूप  धारण करती जा रही है. गांव के गाव खाली होना शुरू हो गया है, मवेशियों तक  के लिये पीने का पानी गांवों में नहीं रह गया है. सूखे पर लोग अपना व्यापार चलाने लगे हैं एक एक टेैंकर पानी  की कीमत सोने के भाव चल रहा है.सरकार ग्रामीण व शहरी क्षेत्र  में सिंचाई, पीने व निस्तारी पानी  का प्रबंध करती है.तापमान बयालीस डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंचते ही अचानक यह स्थिति कैसे निर्मित हो गई कि अभी तक लहलहा रहे खेत सूख गये और गांवों में निस्तारी तक के लिये पानी नहीं बचा? लाखों करोड़ो रूपये जलसंसाधन विभाग के कर्मचारियों की तनखाह और स्थापना पर खर्च होता है किन्तु वे जब व्यवस्था नहीं बनाये रख सकते तो इस विभाग का औचित्य क्या है? क्यों नहीं इस विभाग ने अब तक इस छोटे से राज्य में ऐसे गांवों को खोजकर निकाला जहां बाढ की स्थिति पैदा होती है, सूखा पड़ता है और तबाही होती है?इतने वर्षो बाद भी अगर ऐसी छटनी नहीं की गई और पर्याप्त इंतजाम नहीं किये गये तो यह हमारा ही दोष है कि हम जल  प्रबंधन के मामले में असफल हो गये हैं. अगर बारिश के पानी  का समुचित संग्रहण हर तरफ बराबरी से होता तो शायद यह नौबत नहीं आती. नदियों को आपस में जोड़ने की बात भी प्रदेश में हवा- हवा ही है.अगर मध्यप्रदेश की तरह नदियों को एक दूसरे से जोड़ने की एक श्रंखला तेजी से शुरू होती तो ऐसे गांव जहां लोगों को मुसीबत के दिन देखने पड़ रहे हैं खुशहाल हो जाते.

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

क्या देश लहर पर लहरा रहा


         
सिर्फ 22 दिन..प्रतीक्षा कीजिये... अच्छे या पुराने दिन का!

- क्या देश में किसी एक पार्टी की लहर है?
-क्या इस बार देश में सत्ता का परिवर्तन होगा? 
-क्या सौ साल से ज्यादा पुरानी कांग्रेस की ऐसी स्थिति हो जायेगी जो आज तक कभी नहीं हुई?
-क्या आज देश में वैसी लहर बह रही है जो कभी इमेरजेंसी के बाद थी या वैसी लहर,जो इंदिरा  गांंधी के पुन: सत्ता में आने के समय थी? 
-क्या भाजपा आज अटल बिहारी बाजपेयी के समय से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है?अथवा यह नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है जिसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने सिर पर ले रखा है
 
नरेन्द्र मोदी की सभाओं में जनसैलाब को अगर लहर मान लिया जाये तो देश के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में यह लहर है. हिन्दी चैनलों में भी यह लहर है, मगर क्या यह लहर पूरे देश की फिजा को ही बदलकर रख देगा? यह गंभीर किन्तु कठिन प्रन है जिसका जवाब 16 मई के बाद ही प्राप्त होगा लेकिन इससे पहले देश का आधे से अधिक भाग मोदी और सुषमा स्वराज के साथ यही कह रहा है कि ''अच्छे दिन आने वाले हैं.ÓÓ 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी प्रकार की बात भाजपा की तरफ से 'फील गुडÓ के  नाम से सुनने को मिली थी, उस समय मैंै केरल में था, तब लालकृष्ण आाडवाणी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप पेश किया गया था. त्रिवेन्द्रम में उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को देखने से लगा कि पूरे केरल की सीट भाजपा के हाथ लग जायेगी लेकिन जब परिणाम आया तो केरल में भाजपा खाता भी नहीं खोल सकी बहरहाल इस समय पूरे देश में यही कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं,हम देश नहीं मिटने देंगे. हम देश नहीं झुकने देंगे तो क्या अभी तक देश मिट रहा था,क्या देश झुक रहा था? हर किसी की जिंदगी में कभी न कभी अच्छे दिन आते हैं, देश में अच्छे दिन आने वाले हैं,सवाल पर सवाल उठाया गया है कि क्या हम इतने  बुरे दिनों में जी रहे थे?यह सही है कि लोगों की अपेक्षाएं  बहुत है, अच्छे दिनों का इंतजार है क्योंकि उन्होंने  मंहगाई, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसे बुरे दिनों को देखा है लेकिन वह अच्छा दिन कब आएगा... कौन लाएगा...? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की आंखें तलाश रही है एक रोशनी को, जो  ऐसा चमत्कार करे कि सब पटरी पर आ जाये, कोई अवतार ले, कृपा निधान की तरह...इस समय हवा बदलाव की चल रही है। केंद्र सरकार की नीतियों से देश की जनता शायद ऊब चुकी है। उन्हें एक नए किरण की तलाश है जो एक जादू की झप्पी दे और सभी समस्याओं का हल कर दे। दस साल तक प्रधानमंत्री रहे डा. मनमोहन सिंह की उपलब्धियां गिनाने के बजाय कांग्रेस उनके ग्यारह सौ बार बोलने को उपलब्धियां मान रही है. जनता को बता रही है कि प्रधानमंत्री ने इतने बार अपना मुंह खोला।  क्या इससे किसी का भला होगा? चुनावी महासंग्राम में सभी दल के नेता अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, साथ ही एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और तीखे व्यंग्य बाण भी छोड़ रहे हैं। भाजपा पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी रोज सुबह, दोपहर, शाम रैली कर रहे हैं, पूरे देश में घूम-घूमकर सभा कर रहे हंै. मां-बेटे को कोस रहे हैं. कांग्रेस की बखिया उधेड़ रहे हैं, वहीं राहुल गांधी भी जगह-जगह रैली, सभा, रोड शो कर जनता को यूपीए सरकार के कामों एवं उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं, विपक्षी पार्टियों की पोल और उनकी कमजोरी को बयां कर रहे हैं सवाल यह है कि आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले नेता अपना मूल मुद्दा क्यों भूल गए ?जनता और देश के लिए वे क्या करेंगे?उनकी प्रमुख घोषणा और कार्य क्या होंगे। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, खाद्यान्न सुरक्षा इन सब बातों को किनारे कर ये नेता सिर्फ वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर एक-दूसरे पर आक्षेप कर जनता को अपनी ओर लुभाने का प्रयास कर रहे हैं.अभी तक केंद्र में अपनी सरकार बनाने का दावा करने वाले नेता अपना प्रमुख उद्देश्य जनता के सामने नहीं रख पाए हैं.डा. मनमोहन सिंह पर कम बोलने का आरोप लगातार लग रहा है-उन्होंने चुप से बड़ा सुख नहीं है वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पूरे दस साल बिता दिए...लेकिन चुप्पी ही सही, देश अब तक अपनी तरक्की के कई नए आयाम गढ़ते गया, जनता के लिए अनेक योजनाएं लागू हुई, वे सब सिर्फ प्रधानमंत्री की चुप्पी के आगे गौण हो गए। अब जनता को बोलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए, काम करने वाला नहीं..? तो अब क्या लगातार बोलने वाला आ रहा है शायद....शायद....रहस्य. कुछ मत पूछिये देश की आबादी एक अरब बीस पंच्चीस करोड़ के आसपास ह, नये मतदाता भी आ गये हैं, किसके मन में क्या छिपा है यह नहीं कहा जा सकता....अच्छे दिन आने वाले हैं या बुरे दिन यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन यह भी सच है कि देश की जनता को शांति, सौहार्द्रपूर्ण वातावरण चाहिए, मंहगाई से मुक्ति चाहिय,े महिलाओं को सुरक्षा चाहिेये,बेरोजगार युवको को रोजगार चाहिये,इसके साथ ही विकास और लोगों की अन्य अपेक्षाओं को पूरा करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए... सिर्फ बोलने से काम नहीं चलेगा...प्रतीक्षा कीजिये आज से सिर्फ 22 दिन और....

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

मानसिक अस्वस्थों की जिंदगी सड़क पर..जिम्मेदार कौन


एक व्यक्ति तीन दिन तक एक बड़े घराने की गेट के सामने भीषण गर्मी आंधी बारिश में पड़ा रहा. घर के लोगों ने भी उसे देखा, किन्तु पुलिस को खबर करने की जगह उसे अपने नौकरों के मार्फत सरकाकर गली तरफ डाल दिया. आते जाते लोगों ने भी देखा किन्तु किसी को उसपर दया नहीं आई आखिर तीसरे दिन आसपास के लोगों को लगा कि यह शख्स अब मरने वाला है और यहीं पड़ा-पड़ा सड़ जायेगा तो इसकी सूचना पुलिस को देने के लिये दौड़ धूप शुरू हुई और अंतत: पुलिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया.जब पुलिस से यह पूछा गया कि शहर में ऐसे घूमने वाले मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के पास आपके पास क्या व्यवस्था है तो पुुलिस का जवाब था कि हमको सूचना मिलती है तो हम पहुंचते हैं गाड़ी बुलावते हैं, गाड़ी नहीं तो अपने खर्चे पर ही किसी गाड़ी में डालकर मानवता के नाते उन्हें सरकारी अस्पताल पहुंचा देते हैं अस्पताल में ऐसे लोगों के साथ कौनसा ट्रीटमेंंट होता होगा यह सब जानते हैं.  ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचाने वाले पुलिस के लोगों का ही यह कहना है कि थोड़ा बहुत ठीक होने के बाद फिर वैसे ही यह सड़क पर नजर आते हैं. कहीं कूड़ेे के ढेर के पास तो कहीं उस स्थान पर जहां कोई शादी ब्याह या बड़ी पार्टी के बाद अपना खाना फेकते हैं. राजधानी रायपुर सहित देश के विभिन्न राज्यों के शहरों में यह समस्या आजादी के पैसठ साल बाद भी यूं ही बनी हुई है.ऐसे लोगों में से कुछ की मौत जहां ठण्ड से होती है तो कुछ भीषण गर्मी में लू लगने स.े कहीं न कही गिरकर मर जाते हैं या फिर किसी वाहन की चपेट में आकर मारे जाते हैं.देशभर में मानवता की बात करने वाले कई संगठन है जो कहीं न कहीं कुछ काम कर अखबारों की सुर्खियां बनते हैं लेकिन इस गंभीर समस्या पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया. मानसिक व शारीरिक अस्वस्थता से पीड़ित व्यक्ति को समाज यूं ही सड़क पर भगवान भरोसे क्यों छोड़ देता है? इस सवाल के साथ कई अन्य सवाल भी उठते हैं जो इस समस्या को और गंभीर बना देता है  कौन हैं वे लोग हैं जो इन मूक लोगों को सड़क पर घूमने और भूखे मरने के लिये छोड़ देते  हैं? पुलिस जब ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचाती है तो उसका कर्तव्य वहीं खत्म नहीं होना चाहिये असल में उस व्यक्ति चाहे वह पुरूष हो या महिला उसकी अस्पताल से स्वस्थता के बाद इस बात का पता लगाया जाना चािहये आखिर वह इस हाल में कैसे पहुंचा ? वह कौन है, कहां का रहने वाला या वाली है तथा उसके रिश्तेदार कौन है  तथा उसको इस हालत में सड़क तक पहुंचाने के लिये जिम्मदार कौन है? जब तक ऐसे अपराधियों के खिलाफ कार्रवाही नहीं होगी यह समस्या बनी रहेगी. नगर निगमों ने आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की जबकि यह उसी का काम है कि ऐसे लोगों के कपड़े, खाने पीने, रहने तथा उनके इलाज की समुचित व्यवस्था करें. इस ढंग से घूमने वाले एक बड़ा जीवन जी चुके होते हैं अत: यह जरूरी है कि इसके पीछे का रहस्य भी पुलिस खोज निकाले जो इन्हें इस लायक सड़क पर जीने के लिये मजबूर करता है?मानसिक रूप से विक्षिप्त घूमने वालों को पकडकर उन्हें किसी अस्पताल या आश्रम में रखकर उनका इलाज कराने का दायित्व नगर निगमों का होता है किन्तु कम से कम छत्तीसगढ़ में  न किसी निगम ने किसी दस्ते का गठन इसके लिये किया है और न ही कोई ऐस निजी आश्रम अथवा अस्पताल है जिसने इन्हें सही सलामत किसी ठिकाने पर पहुंचाने के लिये कर्मचारी व वाहन की व्यवस्था की है.










शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

गांवों में बिजली-पानी नहीं होने का दर्द...!



यह सन् 1950 के बाद के वर्षो की बात है जब हम भोपाल में रहा करते थे, एक ऐसी कालोनी जहां बिजली होते हुए भी हमारे पास पंखा नहीं था, प्रकृति की हवा मे जीना ही हमारी दिनचर्या थी.गर्मी में सारे शरीर पर घमोरियां परेशान  करती थी,हमें इंतजार रहता था बारिश का कि बारिश होगी तो इस समस्या से मुक्ति मिलेगी लेकिन आगे के वर्षो में हम भाइयों ने गुल्लाख में जेब खर्च इकट्ठा करके एक टेबिल फेन लिया तो लगा कि इसके नीचे सोने वालों को कितना मजा आता रहा होगा.हमें पानी   सार्वजनिक नल या कुए से भरना पड़ता था जहां अलग अलग राज्यों से आये लोगो से झगड़ा भी करना पड़ता था चूंकि कोई एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे. बहरहाल इस दुखड़े के पीछे छिपा है वही दर्द जो आजादी के पैसठ वर्षो बाद भी हमारे देश के करोड़ों लोगों को झेलना पड़ रहा है जो बिना बिजली-पानी के दूरदराज गंावों में निवास करते हैं.उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं. वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की बात करने वाले हमारे मंत्री नेता सिर्फ बाते ही करते हैं.जनता की सेवा के नाम पर  वोट मांगते हैं लेकिन उस गरीब, आदिवासी, हरिजन या सामान्य वर्ग की जनता की कुटिया की तरफ पांच वर्षो तक कभी  झांकते भी नहीं जिसकी  बदौलत वे सिंहासन तक पहुंचे हैं. इसकी पोल तभी खुलती है जब दूसरी बार फिर इनकी जरूरत पड़ती है. लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान छत्तीसगढ़ मेें बिलासपुर क्षेत्र के करीब तीन  सौ गांवों की जिन गंभीर समस्या पर से पर्दा हटा है वह संपूर्ण व्यवस्था की पोल ही खोलकर रख देता है. पोल उस समय खुली जब सोलहवीं लोकसभा के लिये मतदान दलों को इन ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा गया. मतदान दलों के लोग स्वंय चौक गये कि क्षेत्र में बिजली नहीं है और उन्हें लालटेन का सहारा लेना पड़ेगा. तीन सौ गांवो में लालटेन के जरिये मतदान कार्य करना पड़ेगा. अब सवाल यह उठता है कि विकास की सारी बाते दिखावे की है. ग्रामीण क्षेत्रों  को सुविधाओं से क्यों वंचित रखा जा रहा है या जो सुविधाएं पहुंचाने के दावे किये जा रहे हैं वह सब झूठे व मनगढंत है. हकीकत यही है कि ग्रामीणों को देश की आजादी व विकास का कोई फायदा नहीं मिल रहा. सवाल यह उठता है कि क्या ग्रामीण इलाकों में रहने वालों को शहरियों की तरह विकास व आवश्यक मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है?http://majosephs.blogspot.in/?spref=fb

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मायावी चक्रब्यूह खूनी पंजों का, जो फंसा वह मरा


शहीदों की बोली कब तक लगेगी?कितने और लोगों को यूं ही जीवन गंवाना होगा-सरकार बताये?


&''एक ब्लास्ट... कई जवान शहीद,
&प्रत्येक के परिवार को तयशुदा बीस लाख का मुआवजा-
&श्रद्वांजलि, निंदा, तोपों की सलामी और उसके बाद सब भूल जाओं...
मुआवजा लेेने के लिये परिजन चक्रब्यूह में फंस जाते हैं, उन्हेें कभी दस्तावेज के लिये प्रताड़ित होना पड़ता है तो कभी किसी अन्य कारण सेÓÓ इसके बाद  फिर वही विस्फोट...नौजवानों का एक नया बेच मायावी नक्सली गुफा में शहीद हो जाता है.आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा?क्या सरकार बस्तर सहित देश के कतिपय राज्यों में इस प्रकार के नक्सली संयत्र खोलकर रखे हुए हैं जो देश के नौजवानों और सरकारी अफसरों को मौत के घाट उतारने के लिये बना रखा है?या नेताओं व सरकार के संरक्षण में इस प्रकार के मायावी संयत्र चल रहे हैं?संदेह इस बात को लेकर भी उठता है कि क्यों नहीं सख्त कदम उठाये जाते?देश के नौजवानों को जानबूझकर मौत के सौदागरों के हाथ सौंपा जा रहा है.एक जवान मरता है तो उसके साथ- साथ उसका पूरा परिवार मरता है. ऐसे गुमराह लोग इस खूनी ताण्डव में लगे हैं जो यह भी नहीं बता पा रहे कि उनका मकसद क्या है और वे क्यों ऐसा कर रहे हैं? इस नक्सली मायावी फैक्ट्री में घुसने वाले कितने ही जवानों को अब तक मौत के घाट उतारा जा चुका है किन्तु सरकार कोई गंभीर कदम उठाने की जगह एक के बाद एक बटालियन को इस गुफा में झोंक रही है. यह भी आश्चर्यजनक  है कि नक्सलियों का निशाना सिर्फ उन बेकसूर जवानों और सरकारी अफसरों पर ही क्यो रहता है जो दूर दराज क्षेत्रों से सरकार के कहने पर अपना व अपने  परिवार का पेट भरने के लिये माओवादी समस्या से निपटने के नाम पर इन जंगली  इलाकों में भेजे गये हैं.झीरमघाटी में नेताओ को एक-एक कर निशाना बनाने के बाद यह पहली बार हुआ है जब मतदान कराने गये सरकारी कर्मचारियों पर हमला किया गया. इसे एक तरह से लोकतंत्र पर हमला भी कह सकते हैं मतदान कराने सरकार द्वारा भेजे गये लोगों के खून से धरती को लाल कर दिया गया.मतदान दल  के करीब सात लोगों को अपनी जान  गवानी पड़ी है इनकी या इनके परिवार  को शायद नक्सलियों ने न कभी देखा होगा न उनसे कभी कोई दश्मनी  रही होगी. अब यह सवाल हैं कि आखिर नक्सली क्या चाहते हैं?अगर आपसी बात कर समस्या को सुलझाने  वाली कोई बात है तो सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल क्यों नहीं की जाती?  इसी  प्रकार यदि समस्या का कोई हल नहीं निकल रहा तो इसको समूल नष्ट करने की कोई योजना ठीक पंजाब की तर्ज पर क्यों नहीं बनाई जाती?कब तक ऐसे निर्दोष लोगों को यूं ही मायावी दढ़बे में मारने के लिये छोड़ा जाता रहेगा?अंग्रेजों के समय में काला पानी हुआ करता था, जहां अपराध करने वालों को भेजा जाता था अब अलग अलग राज्य सरकारों ने अपने अपने इलाकों में ऐसे मायावी दडबे को खुली छूट देकर पनपने दिया है जहां ऐसे लोगों को भेजा जाता है जिनको मौत की सजा देना होता है.ऐसे हालात पैदा होते जा रहे हैं कि सरकार द्वारा न केवल अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की बात ढकोसली होती जा रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि नौजवानों को यूं ही हर पन्द्रह बीस दिन में नक्सलियों के हाथों मरवाने की योजना तैयार कर ली गई है.इस बार चुनाव के दौरान जो कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ हुआ क्या इसके बाद किसी और कर्मचारी का साहस होगा कि वह आगे सरकार के कहने पर इन मायावी गुफाओं में जाकर प्रजातंत्र को अक्षुण्ण बनाये रखने का काम करें?

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

यह चुनाव है या जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर मारकाट का ऐलान

'''मार डालेंगे, काट डालेंगें , टुकड़े टुकड़े कर देंंगें- हमें सत्ता में आ जाने दो तब हम बतायेंगेÓं- ÓÓऐसे कुछ बयान  हैं जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व में उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के मुख से निकल रहे हंै.आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य क्या यही है जो हमारे नेताओं के श्रीमुख से सुनाई दे रहा है. सिंहासन पाने के लिये कोई मुस्लिमों को रिझा रहा है तो कोई हिन्दुओं को तो कोई दलितो को रिझाकर आगे बढ़ रहा है. युवाओं को दिग्भ्रमित करने की कोशिशे भी की जा रही है. मुद्दे, जनता तथा देश हित को लेकर बात करने की जगह नेता ये कहां एक दूसरे को लड़ाने वाले मुद्दे लेकर सामने आ गये? दिलचस्प तथ्य तो यह है कि कोई यह नहीं कह रहा कि वह अगर सिहासन पर काबिज होता है तो देश और देश की जनता के लिये क्या करेगा? उसकी विदेश नीति क्या होगी? आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर बनने वाली सरकार क्या करने वाली है? पडौसी राष्ट्रों, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के प्रति उसका रवैया क्या होगा? ऐसे अनेक मद्दों के अलावा यह भी कोई नहीं बता रहा कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये उनके पास कौन से जादू की छड़ी है? कोई यह भी बताने को तैयार नहीं कि देश मेें महंगाई को कम करने के लिये क्या देश में चीन की जनसंख्या नीति की तरह कोई नीति अख्तियार की जायेगी? या यूं ही खुली छूट देकर जनसंख्या को इस तरह बढ़ने दिया जायेगा कि देश में कहीं तिल रखने की जगह नहीं होगी और लोगों के समक्ष भूखे मरने की स्थिति निर्मित हो जायेगी.देश में कृषकों की बुरी स्थिति है, गरीबी चरम पर है, कुपोषण से भारी संख्या में मृत्यू हो रही है. जो गरीब है वह गरीब है, मध्यमवर्गीय के सामने अपने परविार को चलाने की समस्या है युवा बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढौत्तरी हो रही है. निजी व सरकारी दोनों क्षेत्रों में पहुंच व पार्टी आधारित लोगों को ही नौकरी पर लगाया जा रहा है.इन सब मुद्दों व समस्याओं पर स्पष्ट राय व्यक्त करने की जगह नेता क्या कह रहे हैं, यह भी अपने आप में गौर करने वाली बात है कि वे देश को किस राह पर ले जा रहे हैं. मसलन ''पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव अपमान बदले का है जिन्होंने अन्याय किया है डन्हें सबक सिखाने का चुनाव है केन्द्र में मोदी की सरकार बनी तो अगले ही दिन मुल्ला मुलायम की सरकार गिर जायेगी यह बात अमित शाह ने मुजफफरपुर में कही. इससे पहले सहारनपुर में कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद ने कहा कि मोदी की बोटी बोटी कर देंगे अब इसी बात पर राजस्थान की मुख्यमंत्री ने कह दिया कि टुकड़े किसके होंगे चुनाव के बाद पता चलेगा.ÓÓ हालाकि दलों के घोषणापत्र में बेरोजगारी, किसानों की समस्या, विकास जैसे कई मामलों का जिक्र है किन्तु जो वाक युद्व हो रहा है वह वास्तव में मतदातओं को गुमराह कर रहा है.इससे साफ है कि पार्टियां व नेता सिर्फ सत्ता की राजनीति कर रहे हैं उन्हें जनता से कोई लेना देना नहींं. घर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली कांग्रेस सरकार, जिसके शासनकाल में भ्रष्टाचार और मंहगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी भी अब जाति और धर्म को आधार बनाकर चुनाव में किसी नये मुद्दे को सामने न लाकर अपना अस्तित्व बचाने के लिये मुस्लिम नेताओं की शरण में जा रही है. कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की नीतियों का परिणाम है कि अलग अलग  समुदाय जो कभी एक जुअ हुआ करते थे अब आपस में लड पडे हंै- वास्तविकता यही है कि हमारे नेता देश की सेवा की जगह समाज व वर्ग को बांटने का काम कर रहे हैं यह इस चुनाव में प्रत्याशियों के चयन मामले में भी स्पष्ट हो चुका है प्रत्शशियों की लोकप्रियता सामाजिक स्टेटस, शिक्षा, आपराधिक प्रवृति आदि पर ध्यान दिये बगैर पार्टियों के प्रति समॢपता को देखकर लोकसभा क्षेत्र में जाति और धर्म की बहुलता के आधार पर प्रत्याशी बना दिया गया.यह सब स्पष्ट करता है कि हम किस प्रकार का चुनाव लड़ रहे हैं और किस ढंग की सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं. आगे आने वाले पांच वर्षो में शायद एक ऐसी ही लोकसभा में ऐसे ही माननीयों को देश की जनता को झेलना पड़ेगा तो अतिशयोक्ती नहीं होगी.

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

शहरों में आबादी का बोझ




शहरों में आबादी का बोझ अब चिंता का सबब बनता जा रहा है। सरकार इसपर चिंतित हैं किंतु क्या सिर्फ ङ्क्षचंता करने से इस समस्या का समाधान निकल जायेगा? बढ़ते बोझ से कई प्रकार की समस्याएं जन्म ले रही हैं। शहरों के ट्रैफिक में वूद्वि हो रही है, तो अपराध बढ़ रहे हैं। अलग- अलग गांवों से लोग रोजगार की तलाश में शहरों में पहुंचते हैं। जब रोजगार नहीं मिलता तो अपराध का रास्ता ढूंढ लेते हैं। जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के पांच वर्ष पूरे होने के बाद शहरीकरण संबंधी योजनाओं-परियोजनाओं को थोड़ी गति मिलने के आधार पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट होने का मतलब है, सामने खड़ी चुनौतियों से मुंह मोडऩा। शहरों के आसपास पड़ी कृषि भूमि जहां कांक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही हैं। वहीं गांव के अपने खेतों को जोतने के लिये आदमी नहीं मिल पा रहे हैं। धीरे- धीरेे हमारे नीति-निर्धारकों को उन विशेषज्ञों के सुझावों पर तत्काल प्रभाव से गंभीरता प्रदर्शित करनी ही होगी। जिन्होंने शहरों की परिवहन व्यवस्था और अन्य समस्याओं का उल्लेख करते हुए एक निराशाजनक तस्वीर पेश की है। यह ठीक नहीं कि शहरों की परिवहन व्यवस्था सुधारने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए उसका आधा भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सच तो यह है कि जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के तहत शहरी ढांचे को सुधारने के लिए उठाए गए कदम एक तरह से ऊंट के मुंह में जीरा जैसे हैं। जब क्रांतिकारी उपायों पर काम करने की आवश्यकता है, तब छिटपुट प्रयास किए जा रहे हैं और वह भी आधे-अधूरे मन से। इन स्थितियों में शहरों की आकर्षक तस्वीर के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। वर्तमान में देश के प्रमुख शहरों में करीब 35 करोड़ आबादी रह रही है। 2030 यानी अगले बीस वर्षो में यह आबादी 60 करोड़ से अधिक हो सकती है। एक आंकलन के अनुसार अगले बीस वर्षो में करीब 70 शहर ऐसे होंगे जहां की आबादी एक करोड़ से अधिक होगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि वर्तमान ढांचे वाले शहर इतनी अधिक आबादी का बोझ सहने में समर्थ नहीं होंगे। इनके लिये कहां से मकान की व्यवस्था होगी? कहां इनके खाने- पीने का इंतजाम होगा और कहां से इनकी अन्य जरूरतों को पूरा किया जायेगा? वर्तमान को देखा जाये तो यहां स्थिति ऐसी है कि जबजब कोई समस्या सिरदर्द बन जाती है। तब उससे निपटने के उपायों पर विचार किया जाता है। अथवा यह सामने आता है कि जब तक इन उपायों पर अमल होता है, तब तक समस्या और अधिक विस्तार ले लेती है। भारतीय शहर आज जिन समस्या का सामना कर रहे हैं वे काफी कुछ एक जैसी हैं, फिर भी उनके समाधान के लिए एकीकृत प्रयास नहीं किये जाते। आवश्यकता केवल इस बात की ही नहीं है कि शहरों का सुनिश्चित विकास हो, बल्कि उनमें ऐसी संस्कृति विकसित करने की भी जरूरत है जिसे हर तबके के लोग आत्मसात हो सके।

छत्तीसगढ़ में तेजी से फैल रहा लेबर 'फलू


निर्माण कार्य में लगे एक ठेकेदार को उस दिन काफी गुस्से में देखा गया, पता चला कि रात में उसके बंधक बनाये मजदूरों में से कुछने भागने का प्रयास किया. कुछ तो पकड़ लिये गये, कुछ भागने में सफल हुए. इस संपूर्ण मामले पर से जब पर्दा हटा तो पता चला कि ठेकेदार बंगाल से गरीब परिवार के लड़कों को बर्गलाकर छत्तीसगढ़ में लाते हैं और उनसे यहां सस्ते में काम कराते हैं. मजदूरों को उनका पैसा उनके घर पर ही एक मुश्त राशि के रूप में दे दिया जाता है,जो, करीब पांच छै हजार रूपये होता है,फिर चाहे उनसे जितनी भी देर, सुबह नौ बजे से लेकर देर रात दस बजे तक भी हो काम कराओ. यह धंधा अकेले बंगाल के  गरीब परिवार के युवकों के साथ ही नहीं हो रहा बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीबों के साथ भी हो रहा है. छत्तीिसगढ़ में तेजी से फैल रही इस रोजगार बीमारी- जिसे लेबर फलू का नाम दिया है, के कारण छत्तीसगढ़ के प्राय: घरों से यह आवाज सुनने को मिल रही है कि 'लेबर नहीं मिल रहे, काम रूका पड़ा है...Óचूंकि सारा काम ठेके पर चल रहा है. बंगाल, बिहार,उडीसा और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ छत्तीसगढ़ के मजदूरों को भी देकेदार उसी रेट पर खरीद लेते हैं जो बाहरी मजदूरों को देने की बात करते हैं. लेकिन इसके पीछे छिपे कारणों का गहराई से अध्ययन किया जाये तो वास्तविकता  कुछ ओर ही है. इसके लिये एक तो सरकारी नीति जिम्मेदार है दूसरा बाहर प्रांतों से रोजगार की तलाश में आने वाले लोगों की भरमार है. सरकार की शराब परोसने व एक रूपये में चावल बांटने की नीति ने गरीब वर्ग को सुविधा संपन्न बना दिया लेकिन जो पहले के मध्यम  व उच्च वर्गीय हैं उनके लिये गंभीर समस्या पैदा कर दी है. जहां काम करने के लिये स्थानीय मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं. यहां तक कि परचून दुकानों में भी काम करने के लिये लोग तैयार नहीं हो रहे हैं छत्तीसगढ़ के श्रमिकों के न नकूर और ज्यादा रेट मांगने के चलते ही ठेके पर काम कराने वालों ने इसका हल ढूढा है  वे दूसरे राज्यों से गरीब युवकों को लाकर काम कराने लगे हैं. ठेकेदार इन्हें इन राज्यो के दूरस्थ गांवो से झासें में खरीदकर लाते  हैं और अपने उन कार्य स्थलों के आसपास बंधक बनाकर रखते हैं जहां वे काम करते हैं. इन मजदूरों के खाने पीने रहने का प्रबंध ठेकेदार करते हैं तथा इनपर सघन निगरानी रखते हैं. इनके हाथ में पैसा उसी समय दिया जाता है जब उन्हें अपने घर जाने ये छुट्टी देते हंै. पैसा भी उतना ही दिया जाता है जितने में वे वापस आ जाये. बाकी पैसा वे बंधक बनाये रखते हैं.इधर छत्तीसगढ़ में श्रमिक परिवार जो  अबतक काम करने में बिल्कुल हिचकते नहीं थे वे सरकार का सस्ता चावल और अन्य जीवनोपयोगी सुविधाएं पाकर खुश जरूर हैं लेकिन उन्हे आलसी बना दिया है. काम के प्रति उनका लगाव खत्म हो गया  है घर की महिलाओं को काम पर भेजकर जो पैसा वसूल करते हैं उसे पुरूष शराब में बर्बाद कर देते हैं. सरकार को अपनी सस्ता  चावल नीति व शराब नीति पर तुरन्त गंभीरता से सोचने की जरूरत है. सस्ता चावल की जगह एक मुश्त राशि को उनका एकाउटं बनाकर उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई, उनको कपड़े देने, स्वास्थ्य आदि पर व्यय करना चाहिये. अगर सरकार व्यवस्था में तुरन्त बदलाव नहीं करती तो आगे आने वाले वर्ष में स्थिति और गंभीर हो जायेगी.

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

खून की प्यासी क्यों हो रही नई पीढ़ी?



एक बारह साल की लड़की ने अपने नौ साल के भाईर् की गला काटकर हत्या कर दी.जुवेनिल कोर्ट ने दिल्ली दुष्कर्म कांड के नाबालिग सर्वाधिक क्रूरतम कर्म करने वाले आरोपी को तीन वर्ष की कैद की सजा दी. यह खबरे सुनकर सभी को आश्चर्य तो हुआ होगा साथ ही यह भी मन में विचार आया होगा कि वर्तमान पीड़ी किस बहाव में बह रही है.बहन द्वारा भाई की निर्ममतापूर्वक हत्या का मामला अभी बुधवार का ही है जिसने संपूर्ण  जगन्नाथपुर जमशेदपुर झारखंड सहित पूरे देश को सोचने के  लिये मजबूर कर दिया कि देश की युवा पीढ़ी का एक बहुत बड़ा वर्ग किस तरफ बढ़ रहा है और हमारा समाज उसे क्यों गंभीरता से नहीं ले रहा. यह भी सवाल उठने लगा है कि आजकल टीवी चैनलों में दिखाये जा रहे इंटरनेट के एक विज्ञापन की तरह क्या बच्चा पैदा होते ही इतना ज्यादा एडवांस हो गया है कि वह सारी दुनियादारी को समझकर समाज के एक बहुत बड़े हिस्से के लिये खतरनाक साबित होने लगा है.अभी कुछ दिन पहले की बात है रायपुर की एक कालोनी में दो तीन बच्चे जिनकी उमर करीब दस बारह साल के आसपास की होगी एक घर में चंदा मांगने पहुंचे वहां उनकी उस व्यक्ति से चंदे को लेकर कु छ विवाद हुआ. वे वहां से चले गये लेकिन कुछ देर बाद ही कुछ और बच्चों को  लेकर लाठी व अन्य हथियारों से लैस होकर फिर वहां पहुंच गये तथा उसी प्रकार लड़ाई करने लगे जैसे बड़े लोग करते हैं. सरकार हर बच्चों को शिक्षा और घर का बच्चा पढ़े, जैसे लाख दावे करें लेकिन यह सत्य है कि बच्चों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी स्कूल की दहलीज तक भी नहीं पहुंचा है. ऐसे बच्चों का एक बहुत बड़ा वर्ग खड़ा हो रहा है जो घर-परिवार के लिये तो खतरा बन ही रहा है साथ ही समाज के लिये भी, जिनकी बुनियाद ही छोटी छोटी चोरी,जुआ,शराबखोरी पर रखी जा रही है. ''मां कहती है बेटा जा फलाने घर के आंगन में लगे कच्चे आम या करियापत्ती तोड़ ला.मां या बाप का यह छोटा सा काम जो बच्चे को सौपा जाता है वह कितने बड़े अपराध को जन्म देता है, यह वे नहीं समझ पाते. बच्चा डंडे लेकर किसी मकान में करियापत्ती या  आम तोड़ने जाता है, तो वहां उसे कई चीजे बाहर पड़ी दिखाई देती है- उसे भी वह उनके साथ समेट लेता है-यह उसके चोरी की शुरूआत है, इसके साथ ही वह बड़े बच्चो के साथ बीड़ी, सिगरेट,जुआ व अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन भी शुरू कर देता है.ÓÓ बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति का विकास कुछ इसी तरह हो रहा है, जो घर से होकर मोहल्ला, गांव और शहर तक पहुंच रहा है. जगन्नाथपुरी में हुई घटना कुछ इसी तरह की परिस्थितियों का परिणाम है जिसके चलते एक बहन ने अपने छोटे भाई की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी. यह बच्चे मजदूर परिवार के हैं तथा मां बाप घटना के समय काम पर गये थे, लड़की ने खूब शराब पी रखी थी. शराब परिवारों को तो तबाह कर रही है बच्चो को भी अपनी चपेट में ले रहा है यह इस बात का गवाह है. सराकर के लिये ऐसे परिवारों की मोनिटरिंग अब जरूरी हो गई है. जब तक आसपास के स्कूल शिक्षक- शिक्षिकाओं को आसपास के घर- घर भेजकर लोगों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिये मजबूर नहीं कराया जायेगा इस तरह की घटनाएं होंगी. यह केंसर का रूप न ले बैठे इससे पूर्व सरकार को प्राथमिकता से इस पर घ्यान देना जरूरी है. अमीरों व मध्यम वर्ग के बच्चे तो किसी प्रकार स्कूल भेज दिये जाते हैं लेकिन गरीबों का एक बड़ा वर्ग आज भी सही ढंग से शिक्षित नहीं हो रहा इसपर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है.