रविवार, 23 मार्च 2014

कौन है पब्लिक सर्वेंट नेता या अफसर?


कौन है पब्लिक सर्वेंट
नेता या अफसर?

 पब्लिक सर्वेंट कौन? एक बड़े नेता के अनुसार हम पब्लिक सर्वेंट हैं? अगर हां तो नौकरशाहों को क्या कहें? नेता किस तरह के पब्लिक सर्वेटं? जो अपनी योग्यता नौकरशाहों से कम रखते हैं?तथा पब्लिक सर्वेंट होने का दंब भरते हैं, नेता जनता का सेवक मानते हैं तो तो उनका चुनाव भी उन सरकारी सेवकों की तरह क्यों नहीं? जो पढ़ लिखकर बड़ी- बड़ी इंटर्व्यू फेस करते हें और उसके बाद ही ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठने का हक हासिल करते हैं.आईएएस,आईपीएस,आईआरएस, आईएफएस जैसी सेवाओं की नौकरी पाने के लिये दिन रात मेहनत व ऐडी चोटी एक करनी पडती है लेकिन दुर्भाग्य कि बाद में यही नौकरशाह उन मिडिल और हायरसेकेण्डरी पास या फैल लोगों के आगे सलूट ेमारने और हाथ जोड़कर खड़े होने के लिये मजबूर हो जाते हैं.क्या यह इस देश के नौजवानो का अपमान नहीं है? क्या चुनाव आयोग या देश की सर्वोच्च अदालत को इस भेदभाव पर गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? क्यों नहीं देश के कर्णधार बन जाने वाले कथित पब्लिक सेवकों के लिये भी एक ऐसी तगड़ी व्यवस्था से गुजरने का रास्ता बना देती जो इस विषम विभिन्नता  को दूर नहीं कर देती? हम समाजवाद, समान अधिकार की बात करते हैं यह अधिकार देश संविधान में भी हर व्यक्ति को प्रदत्त है किन्तु जब पब्लिक सर्वेंट की बात आती है तो पढ़ा लिखा कई प्रतियोगिताओं से गुजरने वाला व्यक्ति अलग हो जाता है और विशेषताओं से कमजोर व्यक्ति ऊंचा हो जाता है.होना तो यह चाहिये कि देश के नेताओं के चयन के लिये भी एक ऐसी व्यवस्था हो जो देश के सारे लोगों को साथ लेकर चलने, देश की कानून और व्यवस्था का ज्ञान रखने वाला हो. इसके लिये यह जरूरी है कि वह कम से कम स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा के साथ अन्य अनेक क्षेत्रों में विशिष्टता रखता हो. ऐसे लोगों की कमी नहीं है हम उनका उपयोग नहीं कर रहे हैं. देश का नौजवान विषम आर्थिक परिस्थितियों में रहकर दिन रात मेहनत कर भी उतनी कमाई कि नौकरी नहीं कर पाता जो नेता और मंत्री बनने वाला कमाता है. -शायद यही कारण है कि अब ज्यादातर सरकारी सेवक आईएएस, आईपीएस तथा सेना के लोग  नौकरी छोड़कर इस व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं. इसके सिवा उनके ेपास दूसरा चारा भी तो नहीं है या तो वे मिडिल और हायर सेकेण्डी फैल- पास लोगों के समक्ष नतमस्तक हो या फिर उस नदी के बहाव में शािमल हो जाए जो उनकी नैया पार करने के लिये ही बनी है. यह जानकर खुशी हुई  कि इस  बार छत्तीसगढ़ की ग्यारह लोकसभा सीटों पर लड़ने के लिये कम से कम सात पढ़े लिखे  विद्वान सामने आये हंै जबकि दुख इस बात का  है कि शेष सीटों अर्थात कुल  चार सीटों पर लड़ने के लिये किसी भी पार्टी को इस छत्तीसगढ़ की इस चार से पांच करोड़  की आबादी में कुछ और व्यक्ति ऐसे नहीं मिले जो इसी तरह की  योग्यता रखते हो.यह अकेले  छत्तीसगढ़ की बात नहीं है पूरे देश में राजनीतिक दल प्रत्याशियों का चयन कुछ इसी तरह करती है. प्रत्याशी चयन में दल व्यक्ति की पर्सनलिटी तो देखती है लेकिन उसकी योग्यता को नजर अंदाज कर देती है. कोई दल उसकी वाकपटुता को देखता हैं तो कोई उसकी जनता के बीच उसकी पकड़ को देखता है. प्रदेश देश को चलाने के लिये योग्य और कुशल लोगों की जरूरत है वह चाणक्य जैसा विद्वान और वीरबल जैसा बाकपटु तथा बुद्विमान होना चाहिये.क्या कभी हमारे देश की संसद को ऐसे योग्य लोग मिल पायेंगे?  सन् 2009 में जब भारतीय ससंद के साठ वर्ष पूरे हुए तब संसद में स्नातकों की संख्या सिर्फ 79 प्रतिशत थी जबकि इसी अवधि में सिर्फ उनतीस प्रतिशत लोग ही स्नातकोत्तर थे. 

शनिवार, 22 मार्च 2014

क्यों की सीएसपी देव ने आत्महत्या?

25 फरवरी 2014

 पिछली रात जज मारपीट कांड में निलंबित सीएसपी देवनारयण पटेल के घर जो कुछ हुआ वह चौका देने वाला है। प्रारंभिक रिपोर्ट यही कह रही है कि 2007 बेच के देवनारायण पटेल ने अपने घर में पत्नी प्रतिमा व दो बच्चों को गोली मारने के बाद खुद को भी गोली मार दी। दोनो बच्चों का रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में इलाज चल रहा है जहां बच्ची की  हालत गंभीर बताई जा रही है वहीं बेटे को खतरे से बाहर बताया गया है।। देवनारायण एक दबंग पुलिस अफसर के रूप में माने जाते रहे हैं उन्हें नक्सलियों से मुकबले के लिये वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपूर्ण घटना के पीछे रविवार रात का वह मामला है जिसमें पुलिस वालों की एक टीम सीएसपी के नेतृत्व में ढाबों व होटलो में अवैध शराब की जांच के लिये निकली थी, इस दौरान  सीएसपी की टीम संगम होटल  के पास पहुंची जहां जाम लगा हुआ था, इसी बीच डीएसपी व एडीजे ए. टोप्पो के बीच कहा सुनी हो गई और बात मारपीट तक आ पहुंची। बताया जाता है कि मारपीट के दौरान जज ने अपना परिचय भी दिया था लेकिन इसका असर पुलिस वालों पर नहीं हुआ, पुलिस का  आरोप था कि जज नशे में थे। सोमवार को जज ने डीजी से मुलाकात की। टोप्पो की लिखित रिपोर्ट के बाद सीएसपी को प्रारंभिक जांच में दोषी पाकर निलंबित कर पीएचक्यू मेंं अटैच कर दिया गया। जज ने सोमवार को सुबह कुछ जजों व वकीलो के साथ मेडिकल कालेज में अपना मुलाहिजा भी कराया। बताया जा रहा है कि डीजी से शिकायत में वकीलों ने सीएसपी पर नारायणपुर में भी वकीलों से मारपीट का आरोप लगाया था। संपूर्ण मामले में कुछ संदेह दीवार पर लगी गोली से पर  भी  जाता है जो हो सकता है पत्नी व बच्चों को मारने के दौरान लगी हो या किसी ने इस संपूर्ण घटना का फायदा उठाते हुए सीएसपी से बदला निकालने का सही मौका ढूंढा हो।  बहरहाल परिजन इसे  आत्महत्या का मामला नहीं मान रहे हैं वे पूरे घटना की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रहे हैं। पुलिस फोर्स में यह घटना नई नहीं है- एक ऐसी  ही घटना  सन् 2012 में  बिलासपुर रेस्ट में हुई थी जहां 2002 बेच के आईपीएस एसपी राहुल शर्मा (37) ने अपनी सर्विस रिवाल्वर से गोलीमारकर जान दे दी थी। 17 अक्टूबर 2013 में राजनांदंगाव के चिल्हारी पुलिस स्टेशन में तैनात जवान कौशल वर्मा ने  अपनी रायफल से खुदकुशी कर ली थी। एक अन्य घटना में छुट्टी नहीं मिलने के कारण एक जवान ने अपने अफसर को पहले गोली मारी  फिर अपने आपको खत्म कर डाला,रायपुर के मंदिर हसौद थाना अंतर्गत भी ऐसा ही कुछ हुआ था। छत्तीसगढ़ में पुलिस व्यवस्था डीजीपी के तहत है। राज्य बनने के बाद रामनिवास सातवें डीजीपी थे जिनके स्थान पर नये डीजीपी आनंद कुमार की नियुक्ति हो चुकी है लेकिन उन्होंने अभी तक कार्यभार नहीं सम्हाला है। सोलह सशस्त्र बटालियन जिसमे भारतीय रक्षा वाहिनी भी शामिल है के साथ भरपूर फोर्स है जबकि सौ से ज्यादा आईपीएस कैडर के अधिकारी यहां तैनात हैं। सीएसपी देवनारायण के आत्महत्या मामले ने पुलिस फोर्स में मायूसी का वातावरण है। एक अच्छे पुलिस अधिकारी ने ऐसा क्यों किया यह सबकी जवान पर है। अब पुलिस को ही इसके कारणों को भी  खोजना है?

चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल के बीच एक युग का अंत!

चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल
के बीच एक युग का अंत!
आडवानी मान गये, जसवंत सिंह रूठ गये और छाया का बी फार्म रूक गया... ऐसी खबरों के बीच आज देश के एक महान लेखक खुशवंत सिंह  के निधन ने सभी प्रबुद्व वर्ग को दु:खी कर दिया. सबसे पहले भाजपा के उस महान नेता कि, जिसे लोग जनसंघ काल से जानते हैं तथा भाजपा को आज इस  मुकाम तक पहुंचाने में महान योगदान दिया हैं. इस पड़ाव में आकर इस वरिष्ठ नेता को मानसिक यातना झेलनी पड़ रही है वह अपने आप में एक विचित्र स्थिति है. अपनी मनचाही सीट पाने के लिये उन्हें जद्दोजेहद करनी पड़ी, अंत में वे उस बहुमत के आगे झुक गये जो उन्हें अपने निर्णयानुसार चलने की ताकीत दे रहा था. वास्तव में यह सोचने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों? आडवानी का इस बार कोप उनको भोपाल से टिकिट नहीं देना था, पार्टी उन्हें गांधीनगर या बडौदरा से टिकिट देना चाहती थी लेकिन वे भोपाल पर अड़े थे. अंतत: उन्हें अपने हाईकमान के आगे नतमस्तक होना पड़ा. जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को संयोजक बनाया जा रहा था तब भी आडवानी का रूख कुछ इसी प्रकार ही था, जो कम से कम अडतालीस घंटे तक चला और फीका पड़ गया. इतने वरिष्ट नेता का दूसरा विरोध और उसके बाद फिर उसी तरह मान जाना दोनों ही उनके पुराने व्यक्तित्व को आघात पहुंचाता है. या तो उन्हें पहले से सीख लेकर ऐसा नहीं करना था या फिर अपने निर्णय पर अटल रहकर अपनी ताक त का अहसास कराना था. दूसरी ओर भाजपा के एक और वरिष्ठ नेता जसवंत सिह भी नाराज है उन्हें भी मनचाही सीट नहीं मिली. एक और वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी गुस्से में चुनाव लड़ने के लिये बाध्य हैं और भी कई नेता इस बार बेमन होकर चुनाव में उतरे हैं. असल में अब बुजुर्ग नेताओं का जमाना लद चुका है यह बात इतने वरिष्ठ होते हुए भी यह नेता समझ नहीं पा रहे हैं.. शायद यही कारण है कि उन्हें कई दफे अपनी पार्टी के अंदर ही अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.कांग्रेस में भी सबकुछ ठीक नहीं है, देशभर में टिकिट वितरण को लेकर नाराजगी ने कइयों को इधर से उधर कर दिया है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अब तक कांग्रेस अपने उम्मीदवार का अधिकृ त तौर पर ऐलान नहीं कर पाई है पहले छाया वर्मा फिर सत्यनारायण शर्मा फिर छाया वर्मा और अब फिर सत्यनारायण के साथ प्रतिभा पाण्डे और मोहम्मद अकबर- एक विचित्र स्थिति में गुजर रही है कांग्रेस. इन सब चुनावी माहौल के बीच बुद्विजीवियों के बीच से एक महान लेखक कुशवंत सिंह का उठ जाना भारी क्षति है. जीवन के हर पल को हंसी खुशी जिंदादिली से जीने वाले खुशवंत सिंह ने पत्रकारिता और पत्रकारों के लिये एक नई राह दिखाई. उनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया.

नक्सलियों पर सेना का उपयोग करने में क्यों कतराती है सरकार?


आखिर वे कौन से कारण है, जिसके चलते सरकार नक्सलियों के खिलाफ सेना का उपयोग नहीं करती?हमने भी झीरम घाटी कांड के बाद इन्हीं कालमों में यह बात कही थी कि नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का उपयोग किया जाना चाहिये ताकि इस समस्या का तत्काल निदान हो जाये. वास्तविकता क्या है?आप और हम सोचते हैं कि जब सरकार युद्व के साथ देश की अन्य समस्याओं जैसे बाढ़,दंगे, कर्फयू, यहां तक कि किसी गांव के बोर में बच्चा गिर जाय अथवा तेन्दुए के उत्पात से निपटने के लिये भी सेना बुला लेती है तो लगता है कि छत्तीसगढ़ सहित देश की नक्सली समस्या को निपटाने के लिये सेना का उपयोग किया जा सकता है! जो चंद घंटों में ही इस समस्या का हल निकाल सकती है लेकिन यह इतना आसान नहीं चूंकि ऐसा हुआ तो सेना को भारी संख्या में नक्सलियों के साथ- साथ कई निर्दोषों का खून भी बहाना होगा, शायद यही एक कारण है कि वह सेना को इस काम के लिये उपयोग में नहीं ला रही. सेना अपने दुश्मनों से सीधे मुकाबला करती है जबकि नक्सलियों से  मुकाबला कुछ भिन्न है, जो एक तरह से आम ग्रामीणों के जीवन को खतरे में डालना भी है. असल में नक्सलियों की लड़ाई का तरीका ही भिन्न है, गुरिल्लाओं की तरह वे छिपकर व अचानक वार करते हैं तथा छितर- बितर हो जाते हैं. घटना को अंजाम देने के बाद वे आम ग्रामीणों के साथ उनके वेष में ही सामान्य नागरिक की तरह घूमने लगते हैं. हाल ही मेरी मुलाकात सेना के एक पूर्व अधिकारी से हुई जो अस्सी के दशक में नक्सलियों की तरह खतरा बन गये खालिस्तानी आतंकवादियों से गांव के गांव को मुक्त कराने के अभियान में शामिल थे. उन्होने नक्सलियों द्वारा हाल ही जवानों को मारकर यूबीजीएल मशीन लूटने को गंभीर बताया है तथा कहा है कि वे इससे बडी वारदात को अंजाम दे सकते हैं. इस हथियार का उपयोग हेलीकाप्टर को मार गिराने के लिये किया जाता है.इधर पंजाब में आंतकवादियों से निपटने के वक्त भारी तादात में निर्दोष भी मारे गये थे शायद सरकार के लिये यह सबक भी नक्सलियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल में बाधक है.नक्सली ग्रामीणों की शक्ल में उनके बीच ही रहते हैं. इसकी जानकारी ग्रामीणों और उस क्षेत्र के पंच -सरपंच सभी को रहती है तथा वे डर के कारण इसकी जानकारी किसी को नहीं देते. जानकारी देने का अंजाम वे अच्छी तरह जानते हैं सिर कलम कर देने की कई वारदातों ने इस डर को और भी गहरा कर दिया है। सेना की कार्रवाई में पहले ग्रामीणों को चुनचुनकर जीवित निकालना चुनौती होती है चूंकि इस कार्रवाही के दौरान दूसरी ओर से गोली चलने की स्थिति में गांव के गांव साफ होने का अंदेशा रहता है. शायद इस बड़े खून खराबे से अपने आपको बचाने के लिये ही सरकार सेना के उपयोग जैसे कदम उठाने से हिचकती है. नक्सलियों की ब्धूह रचना ऐसी है कि निर्दोष ग्रामीणों को पार कर ही उनसे निपटा जा सकता है नक्सली चालाकी से सीधे संघर्ष से बचते हैं. पुलिस, सीआरपीएफ और सीमा सुरक्षा बल के जवानों को भी कड़े प्रशिक्षण के बाद नक्सली इलाकों में तैनात किया जाता है लेकिन  गुरिल्ल्रा आक्रमण के आगे वे थोड़ी देर आमना सामना करने के बाद अपने साथियों को खोकर नक्सलियों की खोज में भी असफल हो जाते हैं.इन हालातों में अगर देश के प्रधानमंत्री नक्सली समस्या को देश की अंदरूनी सुरक्षा के लिये गंभीर समस्या मानते हैं तो यह गलत नहीं है.

गुरुवार, 20 मार्च 2014

भागम भाग....और अंतिम पढ़ाव राजनीति!

भागम भाग....और अंतिम
पढ़ाव राजनीति!
जंगल परिवार में जानवरों पक्षियों के बीच एक आदत पाई जाती है- जब  उनके बीच कोई अपरिचित प्राणी आ जाये तो उनका व्यवहार बदल जाता है मसलन वे कू्ररता करने लगते हैं, यहां तक कि उनपर हिंसक हो जाते हैं. यह बात मनुष्यों के बीच पलने वाले जानवरों विशेषकर डागी में भी पाई जाती है फिर मनुष्य इससे क्यों अलग हो- स्कूल कालेजों में कोई नया छात्र आ जाये तो उससे रेगिंग के नाम पर जो कुछ होता है उससे कोई अपरिचित नहीं है, उसके कपड़े तक फाड डाले जाते हैं.... और अब वर्षो बाद राजनीति में भी कुछ इसी प्रकार की प्रवृत्ति शुरू हो गई है. भारतीय राजनीतिक इतिहास में यूं तो कई राजनीतिक पािर्टयों का उदय और अस्त हुआ किन्तु यह भी पहली बार हो रहा है जब हाल ही उदित हुई एक नई पार्टी विशिष्ट तरह की परिस्थितियों का सामना कर रही है. किसी की नजर उसपर टेड़ी है तो कोई उसे घूरकर देख रहा है तो कोई उसपर झपट रहा है तो कोई हिंसक रूप धारण कर रहा है इतना ही नहीं मीडिया की भी उसपर कोई मेहरबानी नहीं ह,ै विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया जो कभी उसके बहुत ही फेवर में दिखाई पड़ता है तो कभी ऐसा लगता है कि उसे बाहर करने का कान्ट्रेक्ट ही ले लिया है.कहते हैं प्रेम और युद्व में सब वाजिब है अब वह समय आ गया है जब प्रेम, युद्व और राजनीति तीनों में सब सही ठहराया जा सकता है.सरकारी सेवा, फिल्म, व्यवसाय, सेना, पत्रकारिता और यहां तक कि सन्यास को छोड़ लोग राजनीति में आ रहे  हैं तब कोई न कोई बात तो होगी. आखिर कौन सा क्रेज है जो राजनीति लोगों को आकर्षित कर रही है.ग्लेमर ?अगर यह है तो ग्लेमर की दुनिया में शामिल लोग क्यों राजनीति की शरण में जा रहे हैं. पैसे की बात है तो व्यवसायी, उद्योगपति क्यों राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं?क्या वे और कमाई का लालच लेकर आगे बढ़़ रहे हैं? सेना और पत्रकारिता से जुड़े लोग क्यों राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं।  सन्यासियों को क्यों राजनीति अच्छी लग रही है? क्या राजनीति में आत्मशांति भी मौजूद है? पिछले कुछ वर्षो में हुए करोड़ों रूपये के घोटाले तो कहीं लोगों को उसकी तरफ आकर्षित नहीं कर रहे ? कई ऐसे प्रशन हैं जो अब तक अनसुलझे हैं लेकिन एक बात जो हमारी समझ में आ रही है वह कुछ ऐसा लगता है कि राजनीति में अब उन सबका समन्वय हो गया है जो जीवन के प्रत्येक अंग में मौजूद है. जब एक ही जगह सब एक साथ उपलब्ध होजाये तो कोई दूसरी ओर क्यों जाये?वहले एक परिवार में लोग एक सदस्य राजनीति से जुडा चाहते थे,एक सरकारी सेवा से जुड़ा चाहत थे और एक पुलिस से ताकि सारे सदस्य सुरक्षित रहे लेकिन अब सबकुछ बदल गया है. राजनीति में सबकुछ बदल गया है. वंशवाद इसी की उपज है पहले वंशवाद में सिर्फ गांधी परिवार था आज हर दिशा में वंशवाद राजघराने के रूप में मौजूद है. लोकतंत्र के बाद अराजकता फिर तानाशाही....क्या विश्व के इस बड़े लोकतंत्र का भविष्य अब कुछ ऐसा नजर नहीं आ रहा?

 .

बुधवार, 19 मार्च 2014

वोटर कौन हो?प्रत्याशी कैसा हो इसमें कौन करेगा चेंज?



वोटर कौन हो?प्रत्याशी कैसा
हो इसमें कौन करेगा चेंज?
एक आम मतदाता, जो पढ़ा लिखा है व सब समझता है- वर्तमान चुनाव पद्वति के बारे में क्या सोचता है? विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा तो हम करते हैं और पिछले पैसठ वर्षो से उप चुनाव, मध्यावधि या आम चुनाव हो रहे हैं लेकिन क्या इस व्यवस्था ने आम मतदाताओं के दर्द को कभी देखा,समझा या महसूस किया है? पांच साल की अवधि के लिये एक बार मतदाता को यह अधिकार दिया जाता है कि वह अपने जनप्रतिनिधि या माननीय जो भी कहे का चुनाव करें लेकिन उसके बाद वोटर किन परिस्थितियों से गुजरता है?उसको दिये गये वायदों को कितना पूरा किया गया?और उस जनप्रतिनिधि का पांच साल का परफोरमेंस कैसा रहा यह सब देखने का प्रयास किसी स्तर पर नहीं होता. हमें अपने बीच से एक व्यक्ति को चुनने का तो विकल्प दे दिया जाता है लेकिन क्या कभी इस बात पर गौर किया जा  रहा है कि वह व्यक्ति कौन है, केैसा है उसका बैक ग्राउण्ड क्या है? उसकी क्वालिफिकेशन क्या है?क्या वह चुनाव जीतने के बाद कभी जनता के बीच गया है? क्या उसने विधानसभा या लोकसभा में कभी जनता की आवाज उठाई? प्रत्याशी कोई भी हो, पार्टियां चयन कर जनता पर थोप देती है. वोट का अधिकार भेड़ बकरियों की तरह देकर सिर्फ प्रतिशत देखा जाता है कि कितने ज्यादा लोगों ने वोट दिया. उन व्यक्तियों को चुनकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था में भेजने का अधिकार क्यों दिया जा  रहा हैं जो कम से कम शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर पाये हंै, आपराधिक छबि वाले व्यक्ति को संसद या विधानसभा में भेजने पर पाबंदी लगा दी लेकिन फिर भी चुनाव लड़ने वालों और मत देने वाले व्यक्ति को जो अधिकार दिये गये उसका कोई क्राइटेरिया नहीं निश्चित किया गया? एक मंदबुद्वि व्यक्ति या नासमझ व्यक्ति भी वोट देने के दायरे में है वह सामने वाले व्यक्ति से नोट या शराब की एक बोतल अथवा अन्य किसी लालच  के सामने बिक जाता है और पांच साल का गुलाम हो जाता है? क्यों ? देश की जनसंख्या एक अरब बाईस करोड़ के आसपास है इसमें  मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो चुनाव और मत देने का इंतजार करता है ऐसे लोग, जो न अपनी कथित पार्टियों व प्रत्याशियों के बारे में कुछ जानते हैं न उन्हें वोट देने का मतलब मालूम  है ऐसे लोग उन लोगों के लिये भारी पड रहे हैं जो वास्तव में एक सही प्रत्याशी को चुनकर ससंद या विधानसभा में भेजना चाहते हैं? भारतीय संविधान में निर्मित लोकतांत्रिक व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये यह जरूरी है कि चुनाव की वर्तमान घिसी -पिटी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन किया जाये, इसके लिये यह जरूरी है कि पार्टी, प्रत्याशी और मतदाता तीनों को एक ऐसे दायरे में लाया जाये जो सही व योग्य प्रत्याशियों का चयन कर विधानसभा व संसद में भेजे, इसके लिये जरूरी है कि प्रत्याशी व मतदाता कौन हो, दोनों ही बाते तय की जाये? हमारा तर्क यही है कि ''जब आप सरकारी निजी या अन्य किसी व्यवसाय में किसी को लेने के पूर्व उसकी योग्यता को परखते हो तो प्रत्याशी बनाने व मतदाता बनाने दोनों के लिये भी उसी प्रकार की योग्यता को परखा जाय आखिर हमारे माननीय भी तो हमारी नौकरी ही करते हैं.ÓÓ उन्हें गिन गिनकर तनखाह देते हैं. क्यों नहीं योग्यता के आधार पर मतदाता का भी चयन हो,देश लगभग शतप्रतिशत साक्षर हो चुका है, ऐसे में मत देने का अधिकार सिर्फ उन्हीं को देना जरूरी है, जो कम से कम यह जानते हो कि मत देन का मतलब क्या है. आपराधिक छबि का व्यक्ति न हो- इसका भी ध्यान रखना जरूरी है.लोकतांत्रिक व्यवस्था को मेकियावेली ने 'मूर्खो का शासनÓ कहा था, हम क्यों न इस धारणा को बदल दे?

गुरुवार, 6 मार्च 2014

थोड़े बहुत ही ईमानदार बचे हैं, उन्हें जीने दो!



कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपना काम ईमानदारी और निष्ठा से करते हैं ऐसे में किसी दूसरे का दखल उसकी आत्मा को कचोटता है, यह उस समय और भी आत्मघाती हो जाता है जब वह खुद भी यही महसूस करता है कि मैने जब कोई गलती ही नहीं कि तो मुझ्ंो यह सजा क्यों दी जा रही है। आत्मसम्मानी लोगों के साथ ऐसा होता है और वे इन परिस्थितियो में ऐसा कोई भी कदम उठाने में संकोच नहीं करते। जगदलपुर के सीएसपी देवनारायण शर्मा और बिलासपुर के एसपी राहुल शर्मा को क्या हम इस श्रेणी में नहीं रख सकते? जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से निभाता है तो उसे किसी का भय नहीं रहता वह किसी की परवाह किये बगैर आगे बढता जाता है, कोई बाधा आने पर भी उसका मुकाबाला भी उसी दबंगता के साथ करता है लेकिन लेकिन ऐसे लोगों को मुसीबतों का सामना भी बहुत करना पड़ता है। अंदर से नरम और अच्छे दिलवाला होने के बावजूद भी लोग उसे कठोर,अडियल,  जिद्दी जैसे शब्दों का प्रयोग करते है, इसकी परवाह भी उसे नहीं रहती मगर जब उसे काम सौपने वाले ही किसी के
बहकावे में आकर अथवा स्वंय ही निर्णय ले बैठते हैं तो यह एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाता है। कुछ सालों से देश में जो माहौल बना हुआ है वह भ्रष्ट आचरण करने वालों से भर गया है इस बीच जो थोड़े बहुत ईमानदार बचे हैं उन्हें संभालकर रखने का कोई प्रयास किसी तरह से नहीं हो रहा है। आम तौर सरकारी विभागों में यह आम बात है जहां बास अपने आपको सबसे बुद्विमान समझकर अपने कलिग के खिलाफ ऐसे कदम उठा लेते हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि ऐसे लोगो के खिलाफ कान भरने वालों का एक बहुत बड़ा वर्ग होता है जबकि उनके समर्थकों की संख्या बहुत कम होती है। सेना, पुलिस में फ्रस्टरेशन या निराशा कुंठा, तनाव की भरमार है इसके पीछे परिवार से दूर रहना, छुट्टी नहीं मिलना आदि कारण बनता है। यह न केवल छोटे स्तर पर होता है बड़े रेंक में काम करने वाले भी इसके शिकार होते हैं, कु छ अपने दिल में गुस्सा कुंठा पाले रखते हैं और मौका मिलते ही इतना उग्र रूप धारण कर लेते हैं कि उन्हे न तो अपने परिवार के भविष्य की चिंता होती है और न ही अपने जीवन की-इसका एक जीवंत उदाहरण है जम्मू कश्मीर के गांदरबल मानसबल का जहां सेना के एक कैम्प में कुमाऊ के रहने वाले एक जवान ने गुस्से में आकर अपने पांच साथियों की सोते में गोली मारकर हत्या कर स्वंय भी गोली मार ली। फोर्स में लगातार होने  वाली घटनाओं पर सरकार को भी कोई ऐसी प्रक्रिया अपनाने की जरूरत है जो कठिन परिस्थितियों में सेवा करने वालों को राहत दिला सकें।

लहर किस ओर ? फिफटी-फिफटी या एक तरफा?




सेोलह मई... कौन बनेगा प्रधानमंत्री? एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले सबसे बड़े लोकतंत्र में इक्यासी करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के बीच से इस सवाल का जवाब खोजना आसान नहीं, जितनी मुंह उतनी बाते.. देश की जनता क्या चाहती है?यह उसी समय पता चलेगा जब मतों की गणना होगी मगर यह जरूर कहा जा सकता है कि किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यूपीए फिर सत्ता में आयेगी और यह भी नहीं कहा जा सकता कि एनडीए सत्ता पर काबिज होगी लेकिन इस समय सिहासन के सबसे करीब कोई अपने आपको देख रहा है तो वह है भारतीय जनता पार्टी. चुनाव घोषणा से पूर्व तक उसने देश के कुछ हिस्से में कम से कम माहौल तो ऐसा  बना लिया है किन्तु यह भी मानकर चलना चाहिये कि भाजपा का अकेले सत्ता पर काबिज होना आसान नहीं वह दो सौ बहत्तर का बहुमत  लाने का दावा कर रही है लेकिन इतनी सीटे कहां से लायेंगी?खुद बहुमत के लायक सीटो पर भाजपा चुनाव नहीं लड़ रही जबकि कुछ सीटे उसने अपने सहयोगियों को बांट दी है. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रेलियों में लच्छेदार भाषणों से माहौल बनान का प्रयास जरूर कर रहे हैं लेकिन रेैलियों की भीड़ जो टीवी पर दिखाई जा रही है उस पर भी सवाल उठने लगे हैं. यह रहस्योद्घाटन हुआ है कि रैलियों में भीड़ की हकीकत वास्तवमें  वह नहीं है जो टीवी पर दिखाई जा रही है रैलियों में ऐसे कैमरे लगाये जाते हैं जो पचास हजार या एक लाख की भीड़ को कई गुना बनाकर दिखाती है। इसकी पुष्टि कुछ दिन पूर्व भाजपा नेता वरूण गांधी स्वंय कोलकत्ता रैली के बाद कर चुके हैं। इस चुनाव में युवा महत्वपूर्णा भूमिका अदा करेंगे।  भाजपा या मोदी के सिहासन के लिये हिन्दी भाषी बेल्ट पर हरी झंडी दिखती है तो 250 सीटो वाले दक्षिण, पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा का आधार नहीं । तीसरा मोर्चा का कई स्थानों पर बहुकोणीय मुकाबला है और ऐसे मुकाबले भी चुनाव में भाजपा के लिये मुसीबत बनेंगे। एक तरह से यही कहा जा सकता है कि हिन्दी बेल्ट वाले कई क्षेत्रों से जहां भाजपा को हरी झंडी है तो दूसरी व तीसरी तरफ सब लाल झंडी हैं. हरी झंडी वाले क्षेत्रों से एक बड़ा क्षेत्र जहां कांग्रेस शासित व कांग्रेस समर्थित है तो कुछ हिन्दी भाषी क्षेत्र आज भी जातिगत आधार पर वोट को बांटे हुए है। इनमें से बहुत से क्षेत्र में नवनिर्मित आम आदमी पार्टी और तीसरे मोर्चे की घुसपैठ ने चुनौती पैदा कर दी है। आम आदमी पार्टी दिल्ली में अपनी सफलता से उत्साहित है तो उसकी चुनौती भी भाजपा के हर उस क्षेत्र में हैं जहां भाजपा अब अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस ने विकास जरूर किया लेकिन इसके प्रचारित नहीं होने का खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है।  तीसरे मोर्चे के उदय ने भी भाजपा को दिल्ली में पताका फहराने से रोकने की कोशिश की है। भाजपा गठबंधन के बगैर केन्द्र में सत्तारूढ नहीं हो सकती, उसने जहां लोजपा को दलित वोट बटोरने के लिये सहयोगी  के रूप में चुना तो महाराष्ट्र में नितिन गडकरी की राज ठाकरे से मुलाकात के कारण शिव सेना से दोस्ती टूटती नजर आ रही है।  पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जहां अब भी मजबूत है तो उन्हें अन्ना का भी साथ मिला है। तामिलनाडृू में जयललिता का पताका अभी भी फहरा रहा है। यहां से भाजपा को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिये। जयललिता तीसरे मोर्चे से पहले ही सांठगांठ कर चुकी है जबकि आंन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।  कर्नाटक और पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस अभी हाल के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है। कांग्रेस कों केरल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों से फिर फायदा होने की आशा है जबकि महाराष्ट्र में क्या होगा इसका अंदाज भी अभी से नहीं लगाया जा सकता। 

सिंहासन छीनने, पाने व अस्तित्व कायम रखने की लड़ाई!




 सिंहासन छीनने, पाने व अस्तित्व कायम रखने की लड़ाई!

यूपीए, एनडीए, तीसरा मोर्चा और छुटकू(?) पार्टी- 'आप -यह चार पहलवान इस बार लोकसभा चुनाव के अखाड़े में हैं इनमें से कौन सत्ता पर काबिज होगा इस पर अभी से कयास लगाना मुश्किल है लेकिन पार्टियां जिस ढंग से ताल ठोक रही हैं उससे लगता है कि मुकाबला न केवल रोमांचक होगा वरन कई पार्टियों का अस्तित्व भी दाव पर लगा हुआ है। ससंद में पिछले एक सप्ताह के दौरान जो कुछ हुआ वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभूतपूर्व समय माना जा सकता है जो सत्ता पर काबिज होने के लिये अब तक किया गया सबसे बड़ा कूटचक्र कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सत्ता पर दस साल काबिज रहने के बाद कांगे्रस नीत यूपीए चुनाव के बाद क्या फिर सत्ता पर काबिज होगी? या एनडीए, तीसरा मोर्चा अथवा 'आपÓ? राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने देश के चुनाव का समीकरण ही बदलकर रख दिया है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान,और मणिपुर चुनाव में जहां भाजपा और कांग्रेस काबिज हो गये वहीं दिल्ली में किसी पार्टी को बहुमत न मिलना तथा आम आदमी पार्टी का उदय तथा बाद में उसका कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाना पूरे देश की राजनीति को नया मोड़ देने में कारक बना।
राजनीति किस तरह अपना रंग बदलता है यह विधानसभा चुनाव के बाद साफ हुआ चुनाव के पूर्व तक भाजपा अपना माहौल बना चुकी थी। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर भाजपा ने अपना पासा फेका तो कांग्रेस अपने पत्ते खोलने में चूक गई लेकिन चुनाव में भारी हार के बाद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह कहा कि उचित समय पर वे प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करेंगी लेकिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार  बनाने की जगह चुनाव का नेतृत्व दिया। कांग्रेस एक तरह से दिल्ली में अपनी पार्टी की भारी पराजय और आप के अचानक उदय से घबरा गई। इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया। मोदी अपनी भाषण की शैली से जहां युुवाओं में अपना सिक्का कायम करने में कुछ हद तक कामयाब हुए वहीं वह भी 'आपÓ के उदय और दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने से कुछ हद तक निराशा के माहौल में आ गई, इस माहौल से निकलने के लिये कई प्रकार के हथकंडे अपनाये।
भाजपा का समीकरण फिर उस समय बदलता नजर आया जब आप जनलोकपाल बिल को लेकर सत्ता से बाहर आई और उसने लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया।  आप ने बीस उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी। इधर जयललिता, जिससे भाजपा को बहुत आशा थी, ने लोकसभा चुनाव के लिये वामपंथियों से गठबंधन कर नरेन्द्र मोदी के मनसूबे को बहुत हद तक लगाम लगा दी। दूसरी ओर  मुलायमसिंह एंड कंपनियो ने मिलकर तीसरा मोर्चा खड़ा करने की पहल  की। नरेन्द्र मोदी यद्यपि प्रचार के मोड़ में आज भी आगे चल रहे हैं लेकिन उनके सामने आप सबसे बड़ी मुसीबत के रूप में मौजूद हैं जिसने संपूर्ण समीकरण को ही बिगाड़ कर रख दिया है। चुनावी दंगल में कथित रूप से छोटी पार्टीे आप को ठिकाने लगाने के लिये उसंकी छोटी- छोटी गलतियों पर भी निशाना साधा जा रहा है। कांग्रेस का प्रचार अभियान जहां कतिपय मूददो को लेकर चल रहा है तो भाजपा यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाये हुए है। आप लोकसभा चुनाव के दंगल में कूदने के बाद कांग्र्रेस के दिग्गजों को चुनौती दे रही है मोदी को भी आड़े हाथों लिया है। तीसरा मोर्चा का गठबंधन का रूप कैसा होगा और इसमें कितने खिलाड़ी होंगे यह अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन यह स्प्ष्ट है कि इन  हालातों में नरेन्द्र मोदी का सत्ता तकर पहुंचना आसान नहीं लगता। पूरा चुनाव शक्ति प्रदर्शन, रैली, वाकयुद्व, छीटाकशी,आरोप- प्रत्यारोप से लड़ा जा रहा है इसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है कतिपय चैनलों का रवैया एकदम से पार्टियों की तरफ झुका हुआ अेौर उनके प्रवक्ता की तरह का नजर आता है। इस संबन्ध में कभी मोदी आरोप लगा रहे हैं तो कभी अरविन्द केजरीवाल, केजरीवाल ने तो यहां तक कह दिया है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिकों को पार्टियों ने खरीद लिया है। वैसे पैसा देकर प्रचार  के मामले में कांग्रेस जहां सबसे आगे हैं तो रैली में भीड़ जुटाने में भाजपा आगे है। आरोप प्रत्यारोप के दौर में अरविन्द केजरीवाल का आरोप है कि रैली में बीस -बीस करोड़ रूपये तक खर्च हो रहा है जो चुनाव के बाद जनता की जेब से निकाला जायेगा। अभी चुनाव में समय है मगर इससे पूर्व की रिहर्सल सारे चुनावपूर्व के दृश्य को सामने रख रही है। इस बीच यूपीए ने अपना आखिरी अतरिम बजट युवाओं और सैनिको को समर्पित कर एक नया पासा फेका है। तेलंगाना बिल को भी येन  केन प्रकारेण पास कराकर सरकार ने ऐन समय चुनाव में अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश की है।  अभी वह समय नही आया कि साफ तौर पर कहा जाये कि कौन पहलवान पार्टी का हाथ चुनावी दंगल में ऊंचा उठायेगा लेकिन इस चुनाव में युवाओं की भूमिका निर्णायक होगी!

'सुसाइड के एक नहीं कई कारण


मानसिक तनाव, गृह कलह, कर्ज, पे्रम मेें विफलता, चरित्र पर संदेह,  परीक्षा में अंक कम आना, परीक्षा में फैल होना,  यह कुछ ऐसे कारण है जिसके चलते इंसान आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं। आत्महत्या का रूप अब विस्तारित होने लगा है। लोग अब खुद तो अपने आपको खत्म कर ही रहे हैं दूसरे को भी खत्म कर अपने  आपको खत्म करने  पर तुल गये हैं।   एनसीआरबी- ''नेशनल कोएलीगेशन आफ मेन जेण्डर इक्वालिटी एण्ड सोशलिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या का राष्ट्रीय औसत 11.2 है जबकि छत्तीसगढ़ का 4.2 प्रतिशत। छत्तीसगढ़ में किसान से लेकर आईएएस आईपीएस तक की आत्महत्या के मामले सामने आये हैं ।अब इन दो चार महीनो में परिवार के मुखिया या परिवार के किसी सदस्य द्वारा सभी सदस्यों को मारकर आत्महत्या एक फैशन सा बना हुआ है। पिछले  साल एक सिरफिरे ने कबीर नगर में अपनी पत्नी व दो मासूम बच्चों का खून कर दिया । जबकि एक बच्चा कैसे भी बच गया वहीं शुक्रवार को रायपुर के ही ताज नगर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी व दो मासूम बच्चों की गला दबाकर  हत्या कर दी फिर खुद भी फांसी पर झूल गया। गरीबी से तंग आकर दुर्ग में एक पूरा परिवार पिछले साल आत्महत्या कर चुका है। घर के अंदर एकांत में होने वाले इन हत्याकांडों का आखिर क्या  इलाज हैं? समाज इसे खोजने का प्रयास करता आ रहा है लेकिन घटना होने के बाद कुछ समय तक हर मामलों की तरह इस मामले का भी कोई हल कोई नहीं निकाल पाया। आत्महत्या तो मौत है किन्तु इसके रूप भिन्न है। कई इसलिए आत्म हत्या कर रहे हैं चूंकि उन्हें परीक्षा में अंक कम आए. कुछ  इसलिए आत्म हत्या करते हैं कि वे अपने मां बाप की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. और कई इसलिए आत्म हत्या कर रहे हैं कि प्रेमिका ने उन्हे धोखा दे दिया. और कई नवयुवतियां इसलिए आत्म हत्या करती हैं कि उनके पिता के पास धन का अभाव था इसलिए शादी करने में असमर्थ हैं. कई मां बाप भी इसीलिए आत्म हत्या कर रहे हैं कि धन के अभाव में शादी नहीं करा पा रहे हैं ।  कुछ युवतियां दहेज  लोभी ससुराल वालो द्वारा परेशान करने के कारण आत्महत्या के लिए मज़बूर कर देते हैं. कई इसलिए आत्म हत्या कर रहे हैं कि वे आतंकवाद की चपेट मे आ गये हैं. और उनको धर्म की ज़हरीली घुट्टी पिलाई जाती है सुसाइड कर प्राण गंवाने वालों मे ज़रा भी संकोच नहीं होता, खुद तो मरते हैं साथ ही लोगों को बिना कसूर के मार देते हैं. सुसाइड पर अब तक कई तरह की बाते हुई लेकिन इस जघन्य कृत्य पर अब तक कोई अंकुश नहीं लग पाया।

मनुष्य के रक्त से ईश्वर को खुश करने का खेल!

कभी देवी को प्रसन्न करने के लिये तो कभी मन्नत पूरी कराने के लिये तो कभी अपने व्यवसाय की उन्नती के  लिये मनुष्य का खून कर देना सत्रहवीं सदी में माया संस्कृति से शुरू हुआ जो आज भी छत्तीसगढ़ सहित देश के कई राज्यों में मौजूद है।  नई संस्कृति,विज्ञान, टेक्नोलाजी सब इसके सामने फैल है। छत्तीसगढ़ के थान खम्हरिया में असफल नरबलि की कोशिश ने सोमवार को पूरे देश को हिलाकर रख दिया जब एनीकेट निर्माण में लगे ठेकेदार के आदमियों ने एक बारह साल के बच्चे अंकुश ़को पकडकर जिंदा दफन करने का प्रयास किया। वह तो छूट गया लेकिन इस घटना ने समा़ज को सोचने के लिये कई प्रश्र छोड़ दिये। आखिर हम किस युग में जी रहे हैं? और किस विकृ त मानसिकता तथा अंधविश्वास से पीड़ित लोगों को हमारे बीच पाल रहे हैं?
थान खम्हरिया में छत्तीसगढ़ सरकार के जल संसाधन विभाग का एनीकट निर्माण कार्य चल रहा है। कार्य ठेके पर दिया गया है, ठेेकेदार के मैनेजर और साथियों ने मिलकर शंकर निर्मलकर के आठ साल के बेेटे अंकुश निर्मलकर को उस समय उठा लिया जब वह शौच के लिये गया हुआ था। उसे मारपीट कर गला दबाते हुए बोरे में भरकर जिंदा दफन करने की कोशिश की जा रही थी तब उसकी चिल्लाहट सुन ग्रामीण एकत्रित हो गये और उसकी जान बच गई किन्तु इसके बाद जो हिंसा फैली उससे सभी परिचित हैं।
छत्तीसगढ़ में नरबलि के प्रयास व हत्या की यह पहली घटना नहीं है। वर्षो से यह सिलसिला चला आ रहा है। अंध विश्वास को दूर करने के प्रयास होते रहे लेकिन इसमें कोई कमी नहीं आई। नर बलि अपराध है और इसकी सजा मौत है लेकिन ग्रामीण इलाके की बात छोड़िये शहरी इलाके भी इससे अछूते नहीं हैं। अप्रैल 2013 को भाटापारा के खोखली गांव के एक बारह साल के लडके को चार बार चाकू घोंपने के बाद बुरी तरह जख्मी हालत में उसके माता पिता ने मेकाहारा में दाखिल किया था। इस लड़के को नवरात्र के दिन गांव में सरपंच के लड़के मुकेश साहू ने बलि देने के लिये मारने का प्रयास किया लेकिन वह उसमें सफल नहीं हो पाया।  बिलासपुर के जैलवारा गांव  में जनवरी 2012 को सात साल कि बच्ची ललिता टाटी का शव मिला। उसके शरीर के अवयव जिसमें यकृत भी शामिल है गायब था। पुलिस ने पहले शंका व्यक्त की कि रेप एण्ड मर्डर का केस है लेकिन गांव के ही सुक्कू को इस मामले में  गिरफतार किया तो हकीकत सामने आई। उसने अपने खेत में अच्छी फसल प्राप्त करने के लिये उसकी बलि चढाई थी। ऐसी ही एक घटना रायपुर से अस्सी किलोमीटर दूर धमतरी जिले के गांव बंजारी में हुई, जहां चार लोगों ने जिनमें दो महिलाएं भी थी ने छह साल के लड़के को दैविक शक्ति प्राप्त करने के नाम पर खत्म कर दिया।
छत्तीसगढ़ में नर बलि के लिये एक तांत्रिक को निचली अदालत से मौत की सजा प्राप्त हो चुकी है। अपे्रल सन् 2013 में रायगढ़ के इस तांत्रिक पर ग्यारह वर्षीय बालक की  बलि देने का आरोप है। हाल के दिनों में थानखम्हरिया की घटना के पूर्व ग्राम गोरखपुर कला की भूमिका साहू भी अपहरकर्ताओं के चंगुल से किसी प्रकार  बच निकली है जबकि कवर्धा जिले के गा्रम सूरजपुरा केदो बच्च्चों को पकड़ने का प्रयास कतिपय लोगों ने किया। कवर्धा जिले के ही रणवीरपुर के दो  बच्चे अभी भी गायब ब़ताये जाते हैं।
छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड, मेघालय,आन्ध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, यहां तक कि मुम्बई के आसपास भी नरबलि की घटनाओं ने सुर्खियां बनाई है। झारखंड के लोहार डग्गा मे एक पति ने भगवान को प्रसन्न करने केनाम पर अपनी पत्नी का ही सिर धड़ से अलग कर दिया। वहीं मुम्बई के पास नलासोपरा में एक लड़के और लड़की को शैतान भगाने के नाम पर पीट पीटकर मार डाला।आन्ध्र प्रदेश में गांव वालों ने छिपा धन निकालने के नाम पर चौदव साल के लड़के कि बलि दे दी।असम के विख्यात कामाख्या मंदिर में मिले एक मनुष्य के सिर को भी पुलिस ने नरबलि ही कहा था। नरबलि भारतीय दंड विधान धारओं के तहत गंभीर अपराध है लेकिन क्या धाराएं इस अपराध पर लगाम लगा रही हैं। अपराध होने के बाद प्रतिक्रिया होती है लेकिन कुछ दिन में सब शांत! उसके बाद फिर घटना होती है.... फिर प्रतिक्रिया होती है...आज तो विधानसभा में भी थानखम्हरिया के नरबलि प्रयास की गूंज रही। पता नहीं कब समाज को ऐसे घिनौने अपराधों से मुक्ति मिलेगी।12


बाहुबल-धनबल की तुला पर कानून!



एक गरीब या मध्यमवर्ग का आदमी कानून तोड़ता है तो उसे पुलिस अपने थाने के अंदर बने उन सलाखो के पीछे भेजता है जिसमें से मल -मूत्र की बदबू आती है और एक पहचान वाला या थोड़ा रसूख रखने वाला कानून तोड़ता है तो उसे थानेदार अपनी गोद में बिठाता है और जब कोई बाहुबलि या धनपति कानून का खून करता है तो उसे वातानुकूलित अस्पताल की शैया पर या आलीशान रेस्ट हाउस में सर्वसुविधाओं के साथ रहने की इजाजत देता है आखिर देश में कानून को यूं विभाजित करने का अधिकार किसने दिया ?
क्यों दोहरे- तिहरे मापदंड अपनाये जाते हैं? हमारे संविधान ने तो सभी को समान अधिकार दिया है फिर गरीब-मध्यम वर्ग के लिये एक कानून,बाहुबलि के लिये दूसरा कानून और धनपति के लिये तीसरा कानून क्यों? एक ही कानून को अलग-अलग विभाजित करने का अधिकार कानून के रखवालों को किसने दिया ?  कानून को चंद लोगों ने अपनी जेब में रखकर उसका मखौल बना दिया है.जो कानून आम आदमी की रक्षा के लिये बना है उसे यूं ढीला बना दिया कि उसमें सफेदपोश अपराधी पतली गली से कानून को अपने पैरों तले कुचलता हुआ निकल जाता है. कानून के भीतर कितना सुरक्षित है आम आदमी? जब कोई बाहुबलि, रसूखदार या धनपति आम आदमी को रौंदता है तो कानून क्यों इतना बौना, लचीला और असहाय हो जाता है, क्यों हमें ऐसा लगता है कि हमारी रक्षा करने वाला कोई नहीं? एक समय बाहुबलियों का था, अब धनपति के रूप में एक नया पात्र इस कानून की गोद में आया है जिसे न केवल पुछकारा जा रहा है बल्कि सहलाया भी जा रहा है. कानून का यह पक्षपातपूर्ण रवैया कोई नया नहीं है, इसने अपना एक लम्बा सफर यूं ही किया है.कानून की इस दोहरी व्यवस्था के चलते न केवल गरीब,मध्यम  और असहाय लोग न्याय नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं बल्कि संपूर्ण व्यवस्था पर से भी लोगों का विश्वास उठता जा रहा है.
लोकतंत्र, संप्रुभता, न्यायव्यवस्था और संविधान सब इसी गणतंत्र में मौजूद है किन्तु कानून का यह घिनौना खेल इस बड़ी व्यवस्था की आंखों के सामने हो रहा है.
क्या व्यवस्था को बनाये रखने की जिम्मेदारी लेने वाले यह नहीं देख रहे कि एक आम नागरिक जब कानून तोड़ता है तो उसे कोतवाली के अंदर मलमूत्र की बदबू  वाले हवालात में ठूस दिया जाता है लेकिन जब किसी पैसे वाली की बारी आती है तो उसे तुरंत चक्कर या हार्टअटैक आ जाता है और हमारा कठोर कानून नर्मी दिखाते हुए या तो उसे किसी ऐसे वातानुकूलित अस्पताल के खाट पर पहुंचा देता है या फिर किसी फाइव स्टार गेस्ट हाउस में. आम आदमी को कोतवाली में खाने की बात छोड़ो पानी,चाय नाश्ता भी नसीब नहीं होता जबकि अमीर आदमी के लिये परिवार के लोगों को मिलने के लिये दरवाजे खोल दिये जाते हैं तो घर से खाना और पुलिस की गाड़ी की जगह घर की गाड़ी तक पहुंचा दी जाती है? शायद ऐसा कानून विश्व के किसी देश में नहीं है. भारत मेें अंग्रेजों ने जो इधर-उधर से लेकर कानून बनाया उसे आज भी धिसे पिटे ढंग से चलाया जा रहा है.
अपराधी चाहे वह हत्या करें या चार सौ बीसी करें उसे उन्हीं धाराओं के तहत सजा भी मिलनी चाहिये जो सबके लिये बनी है लेकिन जब हम अपने कानून को देखते है तो इसमें स्पष्ट विभिन्नता सामने आती है हालांकि देश की न्याय व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह इन दोनों किस्म की धाराओं पर किसी प्रकार का कोई भेद नहीं करती लेकिन  अदालतों में जाने से पूर्व ऐसे लोगों की गिरफतारी का जो खेल होता है वह वास्तव में नाटकीय ही नहीं घोर आपत्तिजनक भी है.हाल के समय में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसने संपूर्ण कानून पर उंगली उठाई है. गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों के खरे पसीने की कमाई जो करीब बीस हजार करोड़ रूपये होती है को कथित रूप से हड़पने वाले को गिरफत में  लेने के बाद अदालत में पेश कर हवालात में रखने की जगह पुलिस की तगड़ी व्यवस्था के बीच हिरासत में एक ऐसे रेस्ट हाउस में रखा जाता है, जहां किसी फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा सुविधाएं हैं। क्या हर आदमी को ऐसी सुविधा हमारी पुलिस देती है? एक दिलचस्प व्यवस्था है हमारी, हम उसे बस देख सकते हैं किसी को कुछ कह नहीं सकते। भारतीय दंड संहिता में ढेर सारी धाराएं हैं. दफा चौतीस से लेकर दफा तीन सौ दो और उससे आगे तक लेकिन यह सब लगता है सिर्फ उन लोगों के लिये है जो किसी न किसी रूप में अपराध में फंस जाते हैं.बड़ी हस्तियां बड़ी धाराओं में फंसती भी हैं तो उनका ट्रीटमेंट भी व्ही आई पी तरीके से होता है अर्थात उनके शरीर के किसी हिस्से में खरोच की तो बात छोड़िये उनके पहने कपड़े पर धूल भी चढ़ने नहीं दी जाती.क्यों हम ऐसे कानूनों को बनाये हुए हैं जो आम लोगों  के लिये कुछ है तो खास लोगों के लिये कुछ. पुलिस के बाद अदालत और अदालत से सजा होने के बाद भी जो ट्रीटमेंट जेल में  ऐसे लोगों को मिलता है वह भी कम विचारणीय नहीं है. ऐसे लोगों के खास इन बंद दीवारी के भीतर भी मौजूद रहते हैं जो इन्हें यहां रहकर भी खास ही बने रहने में मदद करते हैं.