रविवार, 7 दिसंबर 2014

और कितने शरद प्रशंसा, लवकुमार मारे जायेंगे?



घरेलू हिंसा रोकने सरकार शराब बंद करें, मुफत अनाज की जगह काम के बदले राशन बांटे

गौतम, शरद, विनय, प्रशंसा, लवकुमार यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ ऐसे मासूम बच्चे थे जिनने कम से कम ग्यारह माह से लेकर छह साल तक की जंदगी जी और बाद में माता पिता के बीच घरेलू कलह के चलते अथवा किसी प्रेम संबन्ध के चलते उन्हें इस दुनिया से रूकसत कर दिया. ऐस और भी बच्चे हैं,जिन्हें पूर्व में मार दिया गया जिनका नाम हमारें पास नहीं हैं. मारने वाले ओर कोई नहीं बल्कि इनकी खुद की मां थी या फिर इनका शराबी पिता. अपना अडियल रवैया या शराब की लत, अथवा जिद छोटे छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं.प्राय: सभी घटनाओं के पीछे घरेलू हिंसा,आर्थिक तंगी और शराब एक वजह है, जो परिवार की कलह और  मासूम बच्चों की मौत का कारण बन रही है. इन सबमें प्रमुख वजह शराब है.पिछले साल एक शराबी पिता ने वाल्मिकी नगर की गौतम छै साल, शरद चार साल और विनय दो साल को शराब के नशे में मौत के घाट उतार दिया था. इन बेचारों का क्या कसूर था? पति- पत्नी के बीच विवाद इनकी मौत का कारण बना. कोई सामान्य आदमी जो कृत्य नहीं कर सकता वह कृत्य शराब पीने के बाद कर जाता है, यही कृत्य इन बच्चो के पिता नीलम मिश्रा ने किया था वह एक और बच्चे व पत्नी को भी मार देना चाहता था लेकिन वे बच निकले. छत्तीसगढ़ सरकार खूब शराब परोस रही है.कम राजस्व हुई तो पूछताछ होती है, ज्यादा बढ़ाने के लिये और दुकाने खोल दी जाती है. अगर इससे भी पूरा नहीं हुआ तो गली- गली मोहल्लों में शराब सब्जी भाजी की तरह बेची जाती है. अच्छा भला आदमी इस लत में पड़कर हैवान बन जाता है और हमारी सरकार को इन हैवानों से ज्यादा अपने खजाने की चिंता रहती है.शराब पीकर होने वाले इस हैवानियत को सरकार घरेलू हिंसा कहकर आंख मूंद लेती है और इसकी असली वजह पर किसी प्रकार लगाम लगाने का प्रयास नहीं किया जाता. टिकरापारा में अभी दो दिन पहले शराबी बाप ने अपनी दुधमुंंहे बेटे को पत्नी से विवाद के बाद इसलिये मौत के घाट उतार दिया चूंकि वह रोना बंद नहीं कर रहा था.अक्टूबर 2013 में उरला निवासी राजेन्द्र देवांगन ने अपने साढ़े तीन साल के बेटे को तालाब में नहाने ले जाने के बहाने उसे डुबाकर इसलिये मार डाला चूंकि उसका इश्क दूसरी महिला से चल रहा था. घरेलू हिसां आर शराब का चौली दामन का साथ है. अधिकांश ऐसी घटनाएं शराब सेवन के साथ ही शुरू होती हैं जो वीभत्स रूप लेकर खत्म होती है. राजधानी के देवेन्द्र नगर के रैनी जैन का उसके पति प्रकाश जैन से तेरह माह की बच्ची को ब्यूटी पार्लर ले जाने से मना करने पर विवाद हुआ और उसने बच्ची की गला घोटकर हत्या कर दी घरेलू हिंसा की शुरूआत आमतौर पर आर्थिक तंगी से शुरू होती है. पैसा हाथ में रहे तो सब खुश वरना जिंदगी को बचे पैसे से शराब में डुबों दिया जाता है इसका पूरा प्रबंध सरकार की तरफ  से है. दारू सस्ते में मिलती है.बिलो पावरटी लाइन के नाम से सुविधाएं भी दी जाती हंै.महिलाएं राशन एकत्रित कर लाती है पुरूषों का एक बहुत बड़ा वर्ग शराब में अपने आपको डुबो लेता है और इसके बाद जो कुछ होता है सब देख ही रहे हैं. जहां तक छत्तीसगढ़ में घरेलू हिंसा का कारण है वह या तो प्रेम संबन्धों को लेकर है या फिर आर्थिक तंगी  को लेकर अथवा शराब को लेकर.दारू पीकर  लोग, घर, पडोसियों यहां तक कि पूरे मोहल्ले के लिये सरदर्द बन रहे हैं इसमें अगर समाज सामने आये तो वह भी मुसीबत में पड़ जाता है ऐसे में सरकार को शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ जो राशन वह मुफत मे बांट रही है उसके स्थान पर ऐसे परिवारों के बच्चों के लिये फिक्स डिपाजिट में पैसा जमा कराने के बारे में सोचना  चाहिये ऐसे परिवारों के मुखिया के लिये काम के बदले पैसे की व्यवस्था करें तभी इस समस्या का हल  संभव है.मुफत अनाज लोगों को आलसी व निठल्ला बना रही है लोगों को काम के प्रति लापरवाह बना रही है. कई रूके पड़े काम नहीं हो रहे हैं. जब मुफत में भोजन मुंह तक पहुंच रहा है तब लोग काम क्यों करें?- जो पैसा जैसे तैसा परिवार की महिला व अन्य सदस्यों से जैसे तैसे मिलता है वह शराब और ऐश में लुटाने की आदत लोगों में पड़ गई है-बिलो पावर्टी लाइन में घूरेलू हिंसा कुछ इन्हीें  कारणों से बढ़ रही है. सरकार शराब पर पाबंधी लगाये, बीपीएल परिवारों को मुफत अनाज की जगह या तो उनके बच्चों के एकाउन्ट में फिक्स जमा कराये या फिर काम के बदले अनाज की व्यवस्था करें यह ही एक उपाय है समृद्वि और घरेलू हिंसा रोकने  का!

अब धरती पर अत्याचार छोड़ आकाश की ओर बढों....! वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि पर लगे वृक्षों को भी नहीं काटा जा सकता. इसे भी काटने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.कहने का तात्पर्य सरकार अपनी तरफ से भी वनों की रक्षा के लिये कटिबद्व है लेकिन मजबूरियां ऐसी हैं कि सरकार को बाध्य होकर कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं जिसके चलते वृक्षों व वनों का सफाया करना अनिवार्य हो जाता है. बस्तर में बोधघाट परियोजना का ही उदाहरण ले- वृक्षों की भारी कटाई,कई गांवों के डुबान की स्थिति इन सबके चलते आज तक यह परियोजना अस्तित्व में नहीं आई. अब विकास की दौड़ मेंं सरकार के लिये यह मजबूरी है कि वह छत्तीसगढ़ के इस जंगल से आछादित क्षेत्र को नई दुनिया से जोड़ने के लिये यह यातायात की आधुनिकतम सुविधाएं मुहैया करायें.इसी कड़ी में राजधानी रायपुर से बस्तर तक रेल लाइन बिछाने का कार्य हाथ मेें लिया जा रहा र्है इस कड़ी में कई पहाड़, कई वृूक्ष उजडेंगें.तभी जाकर रेललाइन बिछेगी. यह बस्तर सहित पूरे देश की आवश्यकता है. इस परियोजना को अगर हम दूसरे नजरियें से देखें तो यह कुछ आसान है, जिसमें आम लोगों को सुविधा होगी, वन नहीं कटेगें पहाड़ों को नहीं हटाना पड़ेगा और सुविधाएं भी लोगों को मिलेंगी. सरकार रायपुर से बस्तर की दूरी जो करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक है धरती को छोडकर मेट्रो की तर्ज पर आकाश की तरफ धरती से ऊपर ट्रेेनें चलाये व सड़को को भी ऊपर ही ऊपर विकसित करें. विश्व के कई विकसित देशों में यह व्यवस्था है जिसके चलते धरती को छुए बगैर सारा यातायात चलता रहता है और किसी को जाम की स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ता. खर्चा इसमें भी होगा उसमें भी होगा लेकिन काम को चरण बद्व शुरू करने से यह काम आसान और कम खर्चीला होगा. अगर रायपुर से धमतरी तक या धमतरी से ये जगदलपुर तक इस योजना पर शुरूआती दौर पर काम किया जाय तो इसके फायदे नजर आने लगेंगे. सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कुछ ऐसा ही है. वे बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे जो सत्तर हजार करोड़ की तो सिर्फ एक बुलेट ट्रेन की है लेकिन यह योजना जो धरती से आकाश की ओर जाती है तो यह शायद उससे कम खर्च में पूरी हो सकती है. यातायात की गंभीर समस्या भविष्य में और पेचीदा होगी इसके लिये हम अब आकाश की ओर ताकना पड़ेगा ही.


वनों के मामले में हमारी पोजीशन दुनिया में दसवें नम्बर पर है, लेकिन भारत में जिस तेजी से वन कट रहे हैं उससे यह नम्बर कम होने की जगह भविष्य में कई आगे निकल जाये तो आश्चर्य नहीं. वनों के बगैर पर्यावरण नहीं और वन काटे बगैर विकास नहीं. वन नहीं तो कुछ भी नहीं, पीने के पानी से लेकर निस्तारी के पानी तक का संकट पैदा हो जाये तो आश्चर्य नहीं. सरकारें विकास पर तुली हुई है. वन काटकर विकास करना उनके लिये अनिवार्य है. सरकार को कहीं रेल लाइने बिछाना है तो कहीं बांध बनवाना है तो कहीं सड़के निकलवाना है. कई वनों को काटकर वहां कांक्रीट के जंगल खड़े करना ह,ै तो कई जंगल क्षेत्र में कोयले और अन्य खनिज ससंाधनों का भंडार भरा पड़ा है, उन्हें खोदकर निकालना है. विकास की बात जैसे जैसे आगे बढ़ती जायेगी वनों और जंगली जानवरों की मुसीबतें और बढ़ती जायेगी. आखिर क्या किया जाये कि वन कम से कम कटे अर्थात सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे?भारत सरकार का पर्यावरण विभाग, वन विभाग की परमीशन के बगैर राज्य सरकारें वनों के एक भी वृक्ष पर हाथ नहीं लगा सकती. कई राज्यों में तो किसी वृक्ष को काटने की सजा भी कठोर है यहां तक कि निजी भूमि पर लगे वृक्षों को भी नहीं काटा जा सकता. इसे भी काटने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.कहने का तात्पर्य सरकार अपनी तरफ से भी वनों की रक्षा के लिये कटिबद्व है लेकिन मजबूरियां ऐसी हैं कि सरकार को बाध्य होकर कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं जिसके चलते वृक्षों व वनों का सफाया करना अनिवार्य हो जाता है. बस्तर में बोधघाट परियोजना का ही उदाहरण ले- वृक्षों की भारी कटाई,कई गांवों के डुबान की स्थिति इन सबके चलते आज तक यह परियोजना अस्तित्व में नहीं आई. अब विकास की दौड़ मेंं सरकार के लिये यह मजबूरी है कि वह छत्तीसगढ़ के इस जंगल से आछादित क्षेत्र को नई दुनिया से जोड़ने के लिये यह यातायात की आधुनिकतम सुविधाएं मुहैया करायें.इसी कड़ी में राजधानी रायपुर से बस्तर तक रेल लाइन बिछाने का कार्य हाथ

मेें लिया जा रहा र्है इस कड़ी में कई पहाड़, कई वृूक्ष उजडेंगें.तभी जाकर रेललाइन बिछेगी. यह बस्तर सहित पूरे देश की आवश्यकता है. इस परियोजना को अगर हम दूसरे नजरियें से देखें तो यह कुछ आसान है, जिसमें आम लोगों को सुविधा होगी, वन नहीं कटेगें पहाड़ों को नहीं हटाना पड़ेगा और सुविधाएं भी लोगों को मिलेंगी. सरकार रायपुर से बस्तर की दूरी जो करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर तक है धरती को छोडकर मेट्रो की तर्ज पर आकाश  की तरफ धरती से ऊपर ट्रेेनें चलाये व सड़को को भी ऊपर ही ऊपर विकसित करें. विश्व के कई विकसित देशों में  यह व्यवस्था है जिसके चलते धरती को छुए बगैर सारा यातायात चलता रहता है और किसी को जाम की  स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ता. खर्चा इसमें भी होगा उसमें भी होगा लेकिन काम को चरण बद्व शुरू करने से यह काम आसान और कम खर्चीला होगा. अगर रायपुर से धमतरी  तक या धमतरी  से ये जगदलपुर तक इस योजना पर शुरूआती दौर पर काम किया जाय तो इसके फायदे नजर आने लगेंगे. सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी कुछ ऐसा ही है. वे बुलेट ट्रेन का सपना देख  रहे जो सत्तर हजार करोड़ की  तो सिर्फ एक बुलेट ट्रेन की है लेकिन यह योजना जो धरती से आकाश की ओर जाती है तो यह शायद उससे कम खर्च में पूरी हो सकती  है.  यातायात की गंभीर समस्या भविष्य में और पेचीदा होगी इसके लिये हम अब आकाश की ओर ताकना पड़ेगा ही.  

आखिर हम किससे डर रहे हैं-अमरीका, चीन या अपने आप से?सईद ललकार रहा है क्यों न हो जाये आर पार की लड़ाई


अस्सी हजार से ज्यादा लोग अब तक  आतंकवादियों के हाथों मारे जा चुके...हमें मालूम है कि इस नरसंहार के पीछे पाकिस्तानी सेना, भारत से भागे दाउद इब्राहिम और वहां के उग्रवादी संगठन जमात उद दावा के सरगना हाफिज सईद का हाथ है-यह व्यक्ति मुम्बई हमले का भी मास्टर माइण्ड है- इस कुख्यात व्यक्ति के सिर पर अमरीका ने भी एक करोड़ रूपये का इनाम रखा है, फिर भी हम चुप हैं...इस बार उसके पिट्ठू आये तो ए के 47 का जखीरा, खाने पीने के लिये रेडीमेड चिकन आचारी, दाल, रोटी सहित काजू किशमिश, खजूर और अन्य कई किस्म के ड्राय फ्रूट भी लेकर आये-प्लान बनाया था कि भारत के मस्तक पर बैठकर कई दिनों तक आतंक का खेल खेलेंगे लेकिन इन छक्कों के मंसूबों को भारतीय फौज ने सफल होने नहीं दिया लेकिन इस कड़ी में हमारे कम से कम बारह जवानों को भी शहीद होना पड़ा. तीन दशक से ज्यादा का समय हो गया- हम अपने पडौसी की  मनमानी झेल रहे हैं?क्या हमने  चूडियां पहन रखी है कि वह अपनी मनमानी  करता रहे और हम चुप बैठे रहे? क्यों नहीं हम आर या पार की लड़ाई लड़े? हम किससे डर रहे हैं?अमरीका से? चीन से? या फिर अपने आप से?कि अगर हम पाकिस्तान से मुकाबला करेंगे तो यह शक्तियां नाराज हो जायेंगी?यह भी कि क्या पाकिस्तान से हमला करने की स्थिति में हमे चीन से भी मुकाबला करना पड़ेगा? लेकिन आज हममें इतनी ताकत तो है कि हम एक बार दोनों से दो दो हाथ कर सकें.हाल ही हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमरीका के उस राष्ट्रपति से मिलकर आये हैं जिसने अपने देश में आंतकी हमला कर सैकडा़े लोगों को मारने वाले कुख्यात आंतकवादी ओसामा बिन

लादेन को पाकिस्तान में उसकी मांद से रातो रात निकालकर समुन्द्र में फेक दिया था-मोदी को जरूर उनसे प्रेरणा मिली होगी. अमरीका ने तो इतने दूर से आकर अपने दुश्मन को मार दिया लेकिन सईद तो हमारी बगल में छुट्टा घूम रहा है, वह हमे चिढ़ा रहा है, चुनौती दे रहा है और हमारे सब्र का इंतजार कर रहा है?सवाल यही उठता है कि हम कब तक सब्र करते रहेंगें ?हमारे पास  एक ही विकल्प है कि अपने  देश  में घुसपैठियों और आंतकवादियों को रोकने के लिये किसी की परवाह किये बगैर अपने  बलबूते पर पाकिस्तान से दो दो हाथ करें और बंगलादेश  में  नियाजी को घुटने पर खड़े कराने की तरह पाक  के इस आंतकवादी को भी हमारे देश लाकर उसे हमारे कानून के हवाले करें. सेना के पूर्व अफसरों व विशेषज्ञों की भी राय यही है कि अब वह समय आ गया है कि जब हमें आर या पार का फैसला करना होगा. कब तक हम अपने जवानों को यूं मरते देखेंगेें?सवाल यह भी उठता है कि इतने  वर्षो से हमने जो ताकत बनाई है उसे क्या हम यूं ही दिखाने के लिये शो केस में रखे सडाते रहेेंगे?

सोमवार, 17 नवंबर 2014

मौत फैक्ट्री से निकली दवा सिप्रोसिन-500


मौत फैक्ट्री से निकली दवा सिप्रोसिन-500
ने अब तक कितने लोगों को मारा,
क्या इसका रिकार्ड भी कंगाला जायेगा?

छत्तीसगढ़ में नसबंदी मौतों की वजह सिप्रोसिन-500 दवा है तो इस  सामूहिक हत्याकांड के पहले इस दवा ने और कितने लोगों की जान ली? क्या सरकार यह पता लगायेगी? अब तक नसबंदी  कांड में दवा खाने के बाद कम से कम उन्नीस लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन अब सवाल यह उठता है कि दवा तो कई दिनो, महीनों व सालों से बाजार में थी और चिकित्सक इस दवा को सर्दी झुखाम जैसी बीमारियों के लिये लिखते थे तथा कई जोग इसका सेवन भी करते थे इस दवा को खाने के बाद कई लोगों की हालत बिगड़ी भी होगी और उनकी मौत भी हुई होगी लेकिन माना यह ही गया कि स्वाभाविक रूप से ही संबन्धित व्यक्ति बीमारी के बाद चल बसा लेकिन ऐसे लोगों की संख्या तो हजारों में रही होगी क्योकि इस दवा की सप्लाई आज से नहीं वर्षो से हो रही थी.सारा  मामला तभी  उजागर हुआ जब सामूहिक रूप  से एक के बाद एक मौत होने का मामला सामने आया? अब सवाल  यह है कि आखिर इस बात का पता कैसे लगाया जायेगा कि सर्दी झुखाम या अन्य किसी  कारणों से सिप्रोसिन दवा खाने के बाद छत्तीसगढ़ और अन्य प्रांतो में कितने लोगो की मौत हुई? ऐसे में  मामले को क्यों नहीं किसी बड़ी जांच एजेंसी के सुपुर्द कर  दिया जाता?यह भी दिलचस्प है कि एक बार दवा पर  प्रतिबंध लगाने के बाद उसे पुन: अच्छी कंपनी का प्रमाण पत्र देकर बाजार में उतरने का मौका दिया गया. संपूर्ण मामला एक माफिया गिरोह ने चलाया और इसको चालू रखने में कतिपय लोगों ने खूब पैसा भी कमाया.कहने का तात्पर्य यह कि संपूर्ण मामला न केवल सामूहिक नरसंहार का है बल्कि ड्रग माफिया गिरोह द्वारा चलाया गया एक एक ऐसा मामला है जिसने एक तरफ कई लोगों को खूब पैसा कमाने का मौका दिया जबकि कई लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़  किया गया. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि सालों से बिक रही  सिप्रोसीन-500 दवा को खाकर कितने लोग मरे होंगे.
दवाओं की जांच न होती, तो यह राज़ भी कभी न खुलता. छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव डॉक्टर आलोक शुक्ला कि माने तो  पेंडारी और गौरेला पेंड्रा के नसबंदी शिविरों में महिलाओं को मेसर्स महावर फ़ार्मा प्राइवेट लिमिटेड की सिप्रोसीन-500 टैबलेट (सिप्रोफ़्लॉक्सेसिन) खाने के बाद उल्टियां शुरू हुई, जो जानलेवा साबित हुई. राज्य सरकार ने आनन-फानन में सिप्रोसीन 500 समेत दर्जन भर दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया. सिप्रोसीन बनाने वाली कंपनी के ख़िलाफ़ केस दर्ज कर उसके मालिक को गिरफ़्तार किया गया सिप्रोसीन-500 में ज़हरीला ज़िंक फ़ॉस्फ़ाइट मिला होने की बात सामने आई  है, जिसका इस्तेमाल चूहामार दवा में होता है. हालांकिकेंद्र सरकार की लैब में इसको  परीक्षण के लिये भेजा गया है वहां से रिपोर्ट आने के बाद और खुलासा होगा.अभी तक छत्तीसगढ़ की दवा दुकानों से सिप्रोसीन-500 की लाखो गोलियां ज़ब्त की गई हैं. सरकारी अभियान जारी है,सरकार चीख चीख कर कह रही है  कि कोई ये दवा न खाए.क्या सरकार अब चैती ह?ै.क्या सरकार ने नसबंदी शिविर के बाद ही यह माना कि मौत का कारण सिप्रोसिन दवा है जो महिलाओं को नसंबदी के बाद दी गई?अगर ऐसा है तो अंजोरी सूर्यवंशी, मदनलाल सूर्यवंशी, हरकुंवर बाई निषाद व गौड़ी तखतपुर की 55 वर्षीय महिला कमलाबाई कौशिक की मौत कैसे हुईर् तथा कोटा फिरंगीपारा के युवक अमृत श्रीवास को गंभीर हालत में अपोलों में क्यों भरती कराया गया. हकीकत यह भी  है कि सिप्रोसीन खाने वाले कम से कम छह लोग छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराए गए हैं, जिनका नसबंदी से कोई लेना-देना नहीं. दूसरे अस्पतालों में भी दर्जन भर लोग भर्ती हैं. दवा विशेषज्ञों के अनुसार सिपा्रेसिन बहुत सामान्य दवा है जिसे आमतौर पर दवा दुकानदार बेचते  हैं, लेकिन हमने कभी यह देखा ही नहीं कि इसके खाने वाले का क्या हुआ? अगर पता होता तो कभी न बेचते.विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सिप्रोसिन पांच चरणों में तैयार होता है लेकिन इसमें कभी जिंक फास्फ ाइट नहीं डाला जाता.इस पूरे मामले की कई एंगल से जांच होनी चाहिये.यह स्पष्ट है कि इस दवा में किसी ऐसे मिश्रण का उपयोग हुआ  है जिससे कई लोगो की  मौत हुई है.

गुरुवार, 19 जून 2014

सिर पर सिर का चक्कर,सुरक्षित रोमांचक किन्तु महंगा भी!


सिर पर सिर का चक्कर,सुरक्षित
रोमांचक किन्तु महंगा भी!

अभी तक लोगों को आंख पर अंाख लगाने का अनुभव था अब प्रशासन और सरकार ने लोगों को सिर पर सिर लगाना सिखाना शुरू कर दिया है. बड़े नगरों में यह बहुत पहले  से है किन्तु छत्तीसगढ़ में कम से कम तीन बार के प्रयोग के बाद पहली दफा है.कुछ लोगों को यह भारी भारी लग रहा है तो कुछ को अटपटा तो कुछ को शर्म आ रही है लेकिन प्रशासन है कि सिर फटने से मौत की लगातार घटनाओं से तंग आकर अब किसी की नहीं सुनने के मूड़ में है. प्रशासन  की सख्ती को देखते हुए कुछ लोगों ने अपने सिर पर सिर लगाने का यंत्र [हेलमेट] बेचने का कारोबार शुरू कर दिया है. इसके लिये वे बाहर से लाद लादकर सिर ला रहे हैं और सड़क पर बैठकर अपना कारोबार शुरू कर  रहे हैं. खूब ऊंचे& ऊंचे दाम  पर सिर की खरीदी बिक्री हो रही हैं. अब हेलमेट लगाने का तरीका देखिये..कुछ लोग अपने परिचित को देखते ही शरमा जाते हैं और तुरंत निकालकर हाथ में पकड़ लेते हैं या फिर अपने बाइक पर टांग देते हैं कहते हैं यार सिर पर सिर लगाने के बाद यह पता ही नहीं चलता कि मैं कौन और तुम कौन..अच्छी बला डाल दी  सरकार न,े मगर यह कोई नहीं कह रहा है कि यह अच्छा हुआ..किसी ट्रक के नीचे आ जाये तो सिर तो नहीं फटेगा. महंगे हेलमेट से भी लोग परेशान हैं वे कहते हैं यार इतना  महंगा हेलमेट लगाकर घूमने से तो अच्छा सिर फट जाये तो अच्छा है. कुछ कह रहे है हम बड़े कुम्हड़े का इंतजार कर रहे हैं बाजार में यह आने लगे तो हम इसे ही सुखाकर पहन लिया करेंगे-पुलिस वालों को सिर पर सिर चाहिये, कुम्हड़ा सस्ता है इसे लगाने से सिर पर ठंडक भी रहेगी और हम ट्रेफिक नियमों का पालन करते भी नजर आयेंगे. कुछ सिर पर कपड़े वाली टोपी लगाकर या रूमाल को हेलमेटनुमा बनाकर धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं.बहरहाल सरकार की सख्ती के बाद भी अब तक पच्चीस प्रतिशत लोग भी हेलमेट नहीं लगा रहे हैं.लोग पहले डर के मारे में ट्रेनों में यात्रा नहीं करते थे, हवाई जहाज में नहीं उड़ते थे यहाां तक कि फोन और मोबाइल नया नया आया तो उससे भी बात करने में शरमाते थे-आदत पड़ने मेें समय लगता है..धीरे धीरे लोगों में आदत पड़ जायेगी और लोग हेलमेट के बगैर घर से नहीं निकलेंगे लेकिन इससे पूर्व यह स्थिति है  कि हेलमेट लोगों के लिये बला ही है.पहले आंख पर आंख या चश्मा लगाने वाले भी परेशान  रहते थे वे भले  ही आंख से दिखाई न दे इसपर  रस्सी बाधंकर गले में कान के साथ टांग लेते थे इसी प्रकार जो लोग अभी- अभी सिर पर हेलमेट लगाने की ओपनिंग कर चुके हैं वे भी यातायात चौक तक तो बिना सिर पहुंचते है पास पहुंचते ही हेलमेट पहन लेते है.सरकार को सख्ती बरकरार रखनी चाहिये.अब छात्रों के लिये भी हेलमेट अनिवार्य हो गया है इससे बहुत  से कम आयु में स्वर्ग देखने की ख्वाहिश रखने वालों को थोड़ा धक्का जरूर लगेगा मगर उनके माता पिता जरूर राहत की सांस लेंगे. भ्गगवान सलामत रखें लोगों के सिर को नये सिर से...

बुधवार, 18 जून 2014

एसीबी के जाल में मछलियां सिर्फ तडपती हैं, मरती नहीं





एक लम्बे अंतराल  के बाद छत्तीसगढ़ का एंटी करप्शन ब्यूरो जागा, शुक्रवार  को उसने  एक बड़ी मछली को अपने जाल में फांसा। छत्तीसगढ़ शासन के वन  विभाग मरवाही में डीएफओ पद पर कार्यरत राजेश चंदेला ने संपूर्ण राज्य में अपना  साम्राज्य फैला  रखा है। छापे  में यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारी ने अपनी आय से कई गुना ज्यादा की संपत्ति बना डाली है। एंटी करप्शन विभाग की दो दिनी कार्रवाई में ही करीब पांच करोड़  रूपये की संपत्ति का पता चला है, इससे एक बात तो साफ हुई कि छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचारी जंगल में ऐसे कई भ्रष्टखोर मौजूद है जो सरकार में रहकर सरकार को चूना लगा रहे हैं लेकिन एसीबी यह नहीं बता पा रहा है कि इससे पूर्व की गई कार्रवाहियों पर क्या कार्रवाई की गई इनमें जून सन् 2012 में जांजगीर-चांपा अस्पताल के डा. आर चन्द्रा और रामकुमार थवाइत के ठिकानों से नौ करोड़, 5 अक्ूबर 2012 को प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास योजना के कार्यपालन यंत्री जे.एस जब्बी के ठिकानों से 4.5 करोड़, 22 जनवरी को  डिप्टी सेक्रेटरी एम.डी दीवान के ठिकानों से 47 मिलियन की संपत्ति तथा अंबिकापुर कलेक्ट्रेट लैण्ड रिकार्ड  विभाग के बाबू रिषी कुमार के ठिकानों से 6.5 करोड़ के मामले शामिल हैं। एसीबी की कार्रवाई सिर्फ हरासमेंट बनकर रह गई है। कोर्ट तक मामले पहुंचने और उनका निपटारा होने में वर्षो लग जाते हैं। लोकनिर्माण विभाग, परिवहन, स्वास्थ्य, वन कुछ ऐसे विभाग माने जाते हैं जिसे सिर्फ कमाई के लिये जाने जाते हंै। सरकार में बैठे अधिकारी से लेकर मंत्री, नेता सभी यह जानते हैं कि कौन विभाग और कौनसा अधिकारी क्या कर रहा है और कितनी  कमाई कर रहा है फिर पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जाती? भ्रष्ट अफसरों को कमाई का लगातार  मौका दिया जाता है। छापे की कार्रवाही अक्सर ऐसे समय पर होती  है जब अफसर रिटायर हाने  के करीब रहता है। एंटी करप्शन की कार्रवाई के बाद कोर्ट में चालान  पेश होने  में वर्षो लग जाते हैं, इस दौरान या तो संबन्धित कर्मचारी रिटायर हो जाता है या फिर उसकी मौत हो गई होती है ऐसे में एंटी करप्शन की कार्रवाही को सिर्फ दिखावा या टारगेट पूरा करना ही माना जाता रहा है। छत्तीसगढ़ में एंटी करप्शन  ब्यूरो द्वारा की गई छापे की बड़ी कार्रवाइयों में से शायद ही कोई ऐसा मामला है जो गिनाया जा सके कि इसमें किसी व्यक्ति को सजा दी गई  हो या उसकी संपत्ति जप्त की गई हो। एक तरह से छत्तीसगढ़ एंटी करप्शन ब्यूरो की कार्रवाही  सिर्फ कर्मचारियों के बीच कुछ समय के लिये दहशत पैदा करने व वाहवाही लूटने का विभाग बनकर रह गया है। छापे के बाद न  तो कर्मचारी सस्पेडं होता है न  ही उनकी सेवाएं खत्म की जाती है। जप्त अनुपातहीन संपत्ति के बारे में भी कोई फैसला नहीं होता। ऐसे भी कई मामले हैं जिसमें भ्रष्ट अफसर को पदोन्नत कर ऊंची कुर्सी पर बिठा दिया जाता है। छत्तीसगढ़ के पडौसी राज्य मध्यप्रदेश में एसीबी ने हाल के वर्षो में अपने जाल  में कई बड़ी मछलियों का शिकार किया है। मुख्यमंत्री का स्पष्ट निर्देश है कि ऐसे लोगों की अनुपातहीन संपत्ति को जप्त कर सरकारी खजाने में डाल  दिया जाय। बिहार में भी ऐसी ही व्यवस्था है फिर छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? 

और कितने शरद प्रशंसा, लवकुमार मारे जायेंगे



घरेलू हिंसा रोकने सरकार शराब बंद करें, मुफत अनाज की जगह काम के बदले राशन बांटे

गौतम, शरद, विनय, प्रशंसा, लवकुमार यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुछ ऐसे मासूम बच्चे थे जिनने कम से कम ग्यारह माह से लेकर छह साल तक की जंदगी जी और बाद में माता पिता के बीच घरेलू कलह के चलते अथवा किसी प्रेम संबन्ध के चलते उन्हें इस दुनिया से रूकसत कर दिया. ऐस और भी बच्चे हैं,जिन्हें पूर्व में मार दिया गया जिनका नाम हमारें पास नहीं हैं. मारने वाले ओर कोई नहीं बल्कि इनकी खुद की मां थी या फिर इनका शराबी पिता. अपना अडियल रवैया या शराब की लत, अथवा जिद छोटे छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं.प्राय: सभी घटनाओं के पीछे घरेलू हिंसा,आर्थिक तंगी और शराब एक वजह है, जो परिवार की कलह और  मासूम बच्चों की मौत का कारण बन रही है. इन सबमें प्रमुख वजह शराब है.पिछले साल एक शराबी पिता ने वाल्मिकी नगर की गौतम छै साल, शरद चार साल और विनय दो साल को शराब के नशे में मौत के घाट उतार दिया था. इन बेचारों का क्या कसूर था? पति- पत्नी के बीच विवाद इनकी मौत का कारण बना. कोई सामान्य आदमी जो कृत्य नहीं कर सकता वह कृत्य शराब पीने के बाद कर जाता है, यही कृत्य इन बच्चो के पिता नीलम मिश्रा ने किया था वह एक और बच्चे व पत्नी को भी मार देना चाहता था लेकिन वे बच निकले. छत्तीसगढ़ सरकार खूब शराब परोस रही है.कम राजस्व हुई तो पूछताछ होती है, ज्यादा बढ़ाने के लिये और दुकाने खोल दी जाती है. अगर इससे भी पूरा नहीं हुआ तो गली- गली मोहल्लों में शराब सब्जी भाजी की तरह बेची जाती है. अच्छा भला आदमी इस लत में पड़कर हैवान बन जाता है और हमारी सरकार को इन हैवानों से ज्यादा अपने खजाने की चिंता रहती है.शराब पीकर होने वाले इस हैवानियत को सरकार घरेलू हिंसा कहकर आंख मूंद लेती है और इसकी असली वजह पर किसी प्रकार लगाम लगाने का प्रयास नहीं किया जाता. टिकरापारा में अभी दो दिन पहले शराबी बाप ने अपनी दुधमुंंहे बेटे को पत्नी से विवाद के बाद इसलिये मौत के घाट उतार दिया चूंकि वह रोना बंद नहीं कर रहा था.अक्टूबर 2013 में उरला निवासी राजेन्द्र देवांगन ने अपने साढ़े तीन साल के बेटे को तालाब में नहाने ले जाने के बहाने उसे डुबाकर इसलिये मार डाला चूंकि उसका इश्क दूसरी महिला से चल रहा था. घरेलू हिसां आर शराब का चौली दामन का साथ है. अधिकांश ऐसी घटनाएं शराब सेवन के साथ ही शुरू होती हैं जो वीभत्स रूप लेकर खत्म होती है. राजधानी के देवेन्द्र नगर के रैनी जैन का उसके पति प्रकाश जैन से तेरह माह की बच्ची को ब्यूटी पार्लर ले जाने से मना करने पर विवाद हुआ और उसने बच्ची की गला घोटकर हत्या कर दी घरेलू हिंसा की शुरूआत आमतौर पर आर्थिक तंगी से शुरू होती है. पैसा हाथ में रहे तो सब खुश वरना जिंदगी को बचे पैसे से शराब में डुबों दिया जाता है इसका पूरा प्रबंध सरकार की तरफ  से है. दारू सस्ते में मिलती है.बिलो पावरटी लाइन के नाम से सुविधाएं भी दी जाती हंै.महिलाएं राशन एकत्रित कर लाती है पुरूषों का एक बहुत बड़ा वर्ग शराब में अपने आपको डुबो लेता है और इसके बाद जो कुछ होता है सब देख ही रहे हैं. जहां तक छत्तीसगढ़ में घरेलू हिंसा का कारण है वह या तो प्रेम संबन्धों को लेकर है या फिर आर्थिक तंगी  को लेकर अथवा शराब को लेकर.दारू पीकर  लोग, घर, पडोसियों यहां तक कि पूरे मोहल्ले के लिये सरदर्द बन रहे हैं इसमें अगर समाज सामने आये तो वह भी मुसीबत में पड़ जाता है ऐसे में सरकार को शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ जो राशन वह मुफत मे बांट रही है उसके स्थान पर ऐसे परिवारों के बच्चों के लिये फिक्स डिपाजिट में पैसा जमा कराने के बारे में सोचना  चाहिये ऐसे परिवारों के मुखिया के लिये काम के बदले पैसे की व्यवस्था करें तभी इस समस्या का हल  संभव है.मुफत अनाज लोगों को आलसी व निठल्ला बना रही है लोगों को काम के प्रति लापरवाह बना रही है. कई रूके पड़े काम नहीं हो रहे हैं. जब मुफत में भोजन मुंह तक पहुंच रहा है तब लोग काम क्यों करें?- जो पैसा जैसे तैसा परिवार की महिला व अन्य सदस्यों से जैसे तैसे मिलता है वह शराब और ऐश में लुटाने की आदत लोगों में पड़ गई है-बिलो पावर्टी लाइन में घूरेलू हिंसा कुछ इन्हीें  कारणों से बढ़ रही है. सरकार शराब पर पाबंधी लगाये, बीपीएल परिवारों को मुफत अनाज की जगह या तो उनके बच्चों के एकाउन्ट में फिक्स जमा कराये या फिर काम के बदले अनाज की व्यवस्था करें यह ही एक उपाय है समृद्वि और घरेलू हिंसा रोकने  का!

गुरुवार, 29 मई 2014

सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?


सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?

''पढ़ोगे लिखोगे बनागे नवाब,
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब
जो बच्चे कभी लिखते पढ़ते नहीं,
वो इज्जत की सीड़ी पर चढ़ते नहीं,
यही दिन है पढ़ने के पढ़ लो किताब
बुराई  के रास्ते से बचके चला
कभी न झूठ बोलों न चोरी करोÓÓ
हमें बचपन से यही गीत गाकर पढ़ाया लिखाया गया है.हम यही सुनते आये है लेकिन ''अगर काम से ही किसी का मूल्याकंन करना है तो देश के युवाओं को अब डिग्री लेने की जरूरत नहींÓÓ-स्मृति इरानी की माने तो कुछ ऐसा ही संकेत मिलता है. नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल  में मानव संसाधन  मंत्री जैसा महत्वपूर्ण सम्हालने वाली कम उम्र की मंत्री,जिन्हें देश की उच्च शिक्षा, जाँब,शिक्षा में एफडीआई, आईआरटी, आईबाईएम, एम्स, स्किल डेवलपमेंट, युवाओं की उम्मीदो और  बेसिक शिक्षा  के दायित्वों को पूरा करना है,वे सिर्फ बारहवीं कक्षा पास है. उनका कहना हैै कि उनके पास  तजुर्बा है और उसी को रखकर देश की शिक्षा नीति और उससे संबन्धित अन्य कार्यो को तय करेंगी.  स्मृति अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव  हार  गई, राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के बड़े नेता को हराना उनकी दूसरी योग्यता है. इस पूरे मामले पर  देशभर में गंभीर बहस छिड़ी हुई है.कहा यह भी  जा रहा है कि उन्होंने सन् 2009 के चुनाव में जो शैक्षणिक योग्यता पेश की थी वह 2014 में बदल  दी गई. बहराहल हम इस मुद्दे पर न  जाकर उस संवैधानिक व्यवस्था की ओर जाना चाहते हैं जो इस संबन्ध में मौन है. मंत्री बनने के लिये कोई शैक्षणिक योग्यता को मापदण्ड नहीं बनाया गया है.अत: स्मृति इरानी चुनाव हारकर आई या जीतकर अथवा उन्होंने कितनी  शैक्षणिक योग्यता अर्जित की, इसे दरकिनार रख उन्हें जब इस पद पर रख ही दिया है तो कार्य करने  का मौका रहने देते हुए उनके कार्यो का मूल्यांकन करना चाहिय,े उसके बाद ही वे  इस पद के लायक है या  नहीं इसपर कोईनिर्णय लिया जाना चाहिये. वैसे हमे कोई  नौकरी पर लगाता है तो वह हमारी योग्यता परखता है-हम कहां तक पड़े हैं.हमारा एक्सपीरियेन्स क्या है? हमने कहां कहां काम किया है? आदि कई झमेलों और एफडेबिट भरने  के बाद हम नौकरी पर लगते हैं. कई लोगो की लाइन में से हमें छांटकर अपायनमेंट दिया जाता है फिर देश को चलांने वाले विधायक, सासंद और मंत्री के मामले में ऐसा क्यों नहींं? मंत्रियों में कई अनपढ़ और अंगूठा छाप भी देश को चला चुके हैं.संविधान में ऐसा कहीं लिखा भी नहीं है कि कोई अंगूठा छाप देश को नहीं चला सकता. यह भी नहीं लिखा कि मंत्री पद सम्हालने के लिये योग्यता क्या होनी चाहिये?मोदी  सरकार में मानव संसाधन मंत्री पद पर स्मृति इरानी को नियुक्त करने के बाद यह सवाल उठ खड़ा  हुआ है कि आखिर  ऐसा क्यों हुआ? लालू प्रसाद हो या मायावती इनको लोगों ने हमेशा हंसी का पात्र बनाया किन्तु उनकी  राजनीतिक योग्यता के साथ शैक्षणिक योग्यता भी कम नहीं थी. लालू प्रसाद यादव जहां बीए एलएलबी हैं तो मायवती बीए साथ  ही वे एक शिक्षिका के तौर पर भी काम कर चुकी है.नरेन्द्र मोदी  मंत्रिमंडल में स्मृति इरानी  से कम शैक्षणिक योग्यता वाले कई और सदस्य है किन्तु इनको दिये गये मंत्रीपद पर कहीं कोई आपत्ति किसी स्तर पर नहीं उठाई गई शायद  इसलिये भी कि मानवसंसाधन विभाग का देशव्यापी महत्व होने के साथ व्यक्ति के जीवन निर्माण में भी इस विभाग का महत्व अन्य विभागों की बनस्बत ज्यादा  है इसलिये भी शायद  इस पर  विवाद उठा.इस मामले में कश्मीर  के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्मृति इरानी का हालाकि बचाव करते हुए जो  बात कही वह भी  कम महत्वपूर्ण नहीं.उन्होंने कहा था कि ऐसे मे तो सिविल एविएशन का मिनिस्टर किसी पायलेट को बनाना चाहिये. यह बात उन्होंने उनके पक्ष में जरूर कही है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा ही नहीं  होना चाहिये ?अगर सिविल एविएशन का काम किसी पायलेट या उस विभाग से सबंन्धित लोगों को दिया जाये तो क्या इस विभाग का काम और अच्छे से नहीं चल सकेगा? मोदी मंत्रिमंडल मे सेना को अच्छी  तरह से जानने वाले वीके सिंह मौजूद है-रक्षा मंत्री का दायित्व उन्हें नहीं दिया जा सकता था?ठीक इसी  तरह पूर्व शिक्षा मंत्री  मुरली  मनोहर जोशी  भी तो जीते हुए शिक्षा से जुड़े व्यक्ति हैं? क्या उन्हें मानवसंसाधन  विभाग नहीं दिया  जा सकता था? ऐसे बहुत से सवाल  कुरेदों तो निकल सकते हैं लेकिन हमारी संवैधानिक व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं जिसे पहले हल करने की जरूरत है.मंत्री  कैसा हो, कितना पड़ा लिखा हो, उसकी शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक स्टेटस, उसका क्रिमिनल रिकार्ड, व अन्य आवश्यक आर्हताएं क्या- क्या हो यह सब तय होना चाहिये था. अगर ऐसा होता तो शायद ऐसे मामले उठते ही नहीं. एक आदमी चुनाव लड़ता  है दूसरा,तीसरा चौथा व अन्य उसे वोट देते हैं किन्तु इन सभी  को किस तरह की योग्यता वोट देने और लेने दोनों में होनी चाहिये, यह कहीं तय नहीं किया गया. वोट देने व लेने दोनों ही व्यक्ति की भी सारी शैक्षणिक,सामाजिक ,राजनैतिक स्टेटस के साथ साथ उसका क्रिमिनल  रिकार्ड व मानसिक स्थिति क्या है, यह तक तय होना चाहिये तभी चलकर हमें एक स्वस्थ और निष्पक्ष, साफसुथरा सही लोकतंत्र प्राप्त होगा.

मंगलवार, 27 मई 2014

धारा 370 पर कश्मीर गर्म आखिर है क्या यह धारा?



नरेन्द्र मोदी सरकार के एक मंत्री द्वारा भारतीय संविधान की धारा तीन सौ सत्तर पर दिये बयान के बाद बखेड़ा खड़ा हो गया है. सवाल  यह उठ रहा है कि  क्या नरेन्द्र मोदी सरकार इस धारा को खत्म करेगी? इससे पूर्व कि सरकार इसपर  कोई राय बनाये जम्मू कश्मीर  के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा दोनों ने ही इसपर गंभीर रूख अख्तियार करते हुए यहां तक कह दिया कि अगर धारा 370 को हटाया गया तो कश्मीर भी भारत से अलग हो जायेगा. आखिर धारा 370 है क्या बला? आम लोग यह नहीं जानते कि आखिर यह धारा 370 है क्या? -यह भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद (धारा) है जिसे अंग्रेजी में आर्टिकल 370 कहा जाता है. इस धारा के कारण ही जम्मू एवं कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार अथवा (विशेष दज़ार्) प्राप्त है. देश को आज़ादी मिलने के बाद से लेकर अब तक यह धारा भारतीय राजनीति में बहुत विवादित रही है.भारतीय जनता पार्टी एवं कई राष्ट्रवादी दल इसे जम्मू एवं कश्मीर में व्याप्त अलगाववाद के लिये जिम्मेदार मानते हैं तथा इसे समाप्त करने की माँग करते रहे हैं.भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था. स्वतन्त्र भारत के लिये कश्मीर का मुद्दा आज तक समस्या बना हुआ है. धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये. इसी विशेष दज़ेर् के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती.इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है.1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता. इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है. यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते.भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती.जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय करना ज़्यादा बड़ी ज़रूरत थी और इस काम को अंजाम देने के लिये धारा 370 के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को उस समय दिये गये थे.अब वक्त बहुत बीत चुका है तथा देश का बहुमत और नई पीढ़ी  दोनों,यहां तक कि नई सरकार भी यह महसूस करती हैै कि अब इस धारा को बनाये रखने का कोई औचित्य नहीं है.नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान जम्मू कश्मीर की सभा में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो वह इस धारा को खत्म कर देगी. अब भाजपा सत्ता में आ गई है और उसने अपने एक एक एजेण्डे पर काम करना भी शुरू कर दिया है इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय (पीएमओ) के राज्यमंत्री की ओर से जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के गुण दोषों पर चर्चा के संबंध में बयान दिये जाने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और मुख्य विपक्षी पीडीपी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। वैसे सरकार ने पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के बयान से उठे विवाद को कमतर करने का प्रयास किया और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कैबिनेट की बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा, हम इस पर विचार करेंगे. उनके अनुसार-आपने देखा था कि हमने चुनाव प्रचार के दौरान क्या कहा था, सरकार इस पर नियम कायदों के अनुरूप विचार करेगी.पहली बार जम्मू कश्मीर के उधमपुर से लोकसभा सदस्य जितेंद्र सिंह ने बुधवार को कहा था कि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर के लिहाज से अनुच्छेद 370 के गुण दोषों पर चर्चा के लिए तैयार है और राज्य में समाज के हर वर्ग के साथ संपर्क करके उन लोगों को समजाने के प्रयास किये जाएंगे जो असहमत हैं.57 वर्षीय सिंह को प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री बनाये जाने के मोदी के फैसले से कई लोगों को हैरानी हुई है. सिंह ने कहा कि भाजपा बहुत पेशेवर तरीके से इस मुददे पर काम कर रही है और कश्मीर घाटी में बैठकें बुला रही है.कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग राज्यमंत्री के तौर पर कामकाज संभालने के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा, हम कुछ लोगों को इस बारे में समझाने में कामयाब रहे हैं, सिंह के बयान पर उमर ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए टवीट किया कि अनुच्छेद 370 राज्य और शेष देश के बीच एकमात्र संवैधानिक कड़ी है. उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए  कहा कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में चर्चा करना गैरजिम्मेदाराना और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर है. उमर ने ट्वीट किया, पीएमओ के नये राज्यमंत्री कह रहे हैं कि अनुच्छेद 370 को हटाने की प्रक्रिया या बातचीत शुरू हो गयी है,वाह, कितनी तेज शुरूआत है.पता नहीं कि इस मुद्दे पर कौन-कौन बात कर रहा है.पीडीपी का मत है कि संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के संबंध में सिंह का बयान गंभीर नुकसान पहुंचाये, उससे पहले प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं को सिंह पर लगाम कसनी चाहिए. विवाद उठने के बाद मंत्री सिंह ने  रात में बयान जारी कर कहा कि खबरों में उनकी बात को गलत तरह से पेश किया गया है. उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि अनुच्छेद 370 पर मेरे बयान को मीडिया में आई खबरों में गलत तरह से पेश किया गया है. मैंने  प्रधानमंत्री का हवाला देते हुए कभी कुछ नहीं कहा. विवाद पूरी तरह निराधार है.पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने कहा, सिंह को समझना चाहिए कि जूनियर मंत्री के तौर पर उनके नये पद की कुछ जिम्मेदारियां हैं और प्रधानमंत्री को चाहिए कि उन्हें अनुशासित करने के लिए हस्तक्षेप करें. पीएमओ को जम्मू कश्मीर की जनता को आश्वस्त करने के लिए स्पष्ट करना चाहिए कि उसे कोई नुकसान नहीं होगा।
   

गुरुवार, 22 मई 2014

इच्छा शक्ति, छप्पन इंच का सीना ही जनता का विश्वास जीतेगी


इच्छा शक्ति, छप्पन इंच का सीना ही जनता का विश्वास जीतेगी!
नरेन्द्र मोदी के लिये काम आसान लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
बेेरोजगारी, काला धन, आर्थिक विकास/निवेश, आंतरिक सुरक्षा, चौबीस घंटे बिजली, सड़क, फास्ट ट्रेन, नि:शुल्क शिक्षा जैसी बातें जो आम आदमी से जुड़ी हैं जिसे सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिये हल करना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन इसके लिये भी इच्छा शक्ति के साथ छप्पन इंच का सीना भी होना चाहिये. अब तक शासन करने वालों में इसका अभाव था या उनके साथ काम करने वालों ने अपनी जेब भरने के साथ जनता से दूरी बनाई और समस्या को ज्यों का त्यों बनाये रखा लेकिन अब मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही लोगों की वे आशाएं जाग गई हैं जिनका वर्षों से वे सपना देखते रहे हैं?
नरेन्द्र मोदी 26 मई को शाम छह बजे भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे और इसी के साथ देश की जनता की वे आशाएं और अपेक्षाएं भी मोदी का पीछा करने लगेंगी जो उन्होंने चुनाव के दौरान लोगों से वादे किए थे. सबसे पहला मुद्दा है महंगाई- कम से कम एक महीने के भीतर नरेन्द्र मोदी को आम लोगों को यह महसूस कराना होगा कि उनके सिंहासन पर बैठते ही मंहगाई कम होने लगी है.
 पिछली सरकार ने कार्यग्रहण करने के बाद से लेकर अपने दस वर्षों के दौरान पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में अनाप-शनाप वृद्धि या तो ग्लोबल मंदी का बहाना या कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का बहाना बनाकर की या किसी  अन्य कारणों से. यह बढ़ोतरी मंहगाई का सबसे बड़ा कारण रहा है. जो पेट्रोल 35 रूपये लीटर मिल रहा था वह आज 75-80 रुपए के आसपास हो गया है. विपक्ष हमेशा कहता रहा है कि राज्य सरकारें टैक्स कम कर दें तो पेट्रोल-डीजल के भावों में कमी आ सकती है. मंहगाई की जड़ में कालाबाजारी और जमाखोरी  दोनों है. देखना है नई सरकार कीमतों को कैसे नीचे लायेगी. बेरोजगारी की समस्या देश में मुंह बाये खड़ी है. लाखों नौजवानों ने नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगियों को जिताया, वह यह सोचकर कि मोदी जीतेंगे तो बेरोजगारी दूर होगी, युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान होंगे. इसके उपाय भी मोदी अपने भाषणों में सुझाते रहे हैं, अत: अब यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि देश में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिये नई सरकार कौन से प्रभावशाली कदम उठाती है. हमारे युवाओं में सब्र का अभाव है, वे हर समस्या का त्वरित हल चाहते हैं. देश आंतरिक सुरक्षा के मामले में एक लम्बे समय से जूझ रहा है, विशेषकर पिछले दस सालों से समस्या और भी जटिल हो गई है. आंतकियों को फांसी पर लटका देने के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है. स्वयं प्रधानमंत्री के जीवन को खतरा है, ऐसे में आम आदमी की सुरक्षा के साथ-साथ देश की सुरक्षा भी सवालों के कटघरे में है. प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण करने से पूर्व ही घुसपैठियों ने एक पहल भारतीय सीमा में घुसने की की है. इसके अलावा देश आंतरिक आतंकवाद जैसे सिमी, नक्सली और बोडोलैंड जैसी समस्याओं से ग्रसित है, इन सबका हल जल्द होते देखना भी लोग चाहते हैं. आतंकवाद के लिये जिम्मेदार कई कुख्यात आंतकवादी पाकिस्तान में शरण लेकर बैठे हैं. उनको भारत लाने और उन्हें अदालत के कटघरे में खड़ा करने की दिशा में नरेन्द्र मोदी की स्टे्रटजी क्या होगी इस पर भी विश्लेषक नजर जमाये बैठे हैं. महिलाओं की सुरक्षा के मामले में सरकार के कदम क्या होंगे इस पर भी नजर होगी. ऐसे कठोर कानून की आशा है जिससे देश में महिलाओं और बच्चियों का जीवन सुरक्षित रहे.
देश के कई गांवों में सड़क नहीं है, शौचालय नहीं है. पीने के पानी के लिये कई दूर तक जाना पड़ता है. निस्तारी के पानी की समस्या है. चौबीस घंटे बिजली नहीं मिलती. अगर बिजली है तो भी लोग उसके बढ़े हुए बिल से परेशान हैं. लाखों वोटर यही चाहते हंै कि नई सरकार इन समस्याओं से निजात दिलाये. आम आदमी देश में बहुआयामी टैक्स से परेशान हंै वह चाहता है कि बहुआयामी टैक्स की जगह सिंगल टैक्स प्रणाली लागू हो. सिंगल टैक्स के अलावा बंैक लोन में कमी की भी वह आशा करते हैं. जिन बातों का जिक्र मोदी ने अपने भाषणों में किया है उस संबंध में तो जनता को विश्वास है कि आने वाले दिनों में वह इनमें से बहुत सी अपेक्षाओं को पूरी करेंगे.
भारत में ट्रेनों का जाल बिछा होने के  बाद भी देश की जनता ट्रेन की छतों पर और टायलेट के अंदर-बाहर बैठकर सफर करने मजबूर हैं. 120 किलोमीटर की रफ्तार से ज्यादा ट्रेनों को दौड़ाने में रेलवे को डर लगा रहता है कि कहीं दुर्घटना न हो जाये. दूर-दराज इलाकों तक आज तक ट्रेन सेवा उपलब्ध नहीं है. ज्यादा किराया देने के बावजूद द्वितीय व तृतीय दर्जे की एसी बोगियों में लोग ठूस-ठूस कर सामान्य दर्जे से बदतर हालत में सफर करते हैं. मंहगी यात्रा, गंदा खाना, गदंगी, देश की ट्रेन सेवा का दूसरा नाम है. क्या देश विश्व का श्रेष्ठ रेलवे मोदी के कार्यकाल में बनेगा?
 भ्रष्टाचार और कालाधन देश  की सबसे  बड़ी समस्या के रूप में मोदी सरकार के समक्ष चुनौती है. यूपीए सरकार द्वारा काले धन को विदेश से भारत लाने और देश में छिपे कालेधन को बाहर निकालने में असफलता तथा भ्रष्टाचार से निपटने में नाकामयाबी उसके हार के कारणों की गिनती में है. विदेश से कालेधन को भारत लाने की बात तो बाद की है, पहले देश में छिपे कालेधन को निकालने के मामले में क्या त्वरित कार्रवाही होती है यह देखना दिलचस्प होगा. उद्योग, निवेश और अन्य आर्थिक समस्याओं तथा देश में सड़क, पुल-पुलियों का विकास, नदियों को जोड़ने, नदियों की सफाई पर तो मोदी को महारत हासिल है लेकिन विदेश नीति क्या होगी? कैसे वह अपने पड़ोसियों से संबंध बनाये रखेगा. आज की परिस्थिति में कोई हमारा अच्छा मित्र नहीं है. प्राय: सभी पड़ोसी राष्ट्रों से सतही हाय-हलो है. दुख का कोई साथी नहीं तो सुख में भी यही स्थिति है. चीन का भय आज भी बना हुआ है. पाक पर किसी भी कार्रवाई की स्थिति में उससे पाक को सहायता का भय बना रहता है. अमरीका कई मामलों में भारत से नाराज है. नरेन्द्र मोदी से अंदरूनी नाराजी क्या भविष्य में दोस्ती का रूप ले पायेगी यह देखना भी दिलचस्प होगा. वैसे मोदी के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित किया जाना एक अच्छी पहल मानी जा सकती है. पाक से बिगड़े संबन्धो को यह न्यौता किस हद तक सुधार पायेगा यह भविष्य ही बता पायेगा.

मौसम पर वैज्ञानिक कितने सटीक,फंसते तो किसान हैं!


मौसम पर वैज्ञानिक कितने
सटीक,फंसते तो किसान हैं!

मौसम का मिजाज कब बिगड़ जाये यह कोई नहीं जानता.हम बुधवार की रात सोने की तैयारी कर रहे थे तभी धरती अचानक हिल गई. ऐसा छत्तीसगढ़ में करीब तीस साल पहले भी हुआ था किन्तु समय में फरक था, उस समय सुबह चार बजे के आसपास धरती हिली लेकिन इस बार यह शाम को नौ साढ़े नौ बजे के आसपास हुआ. रायपुर में बहुत कम लोगों को इसका अहसास हुआ किन्तु ऐसे किसी भूकम्प की भविष्यवाणी किसी माध्यम से नहीं की गई, हां धरती हिलने के बाद यह बताने में कोई कमी नहीं की गई कि देश में कहीं भी धरती हिले मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कभी नहीं होगा बहरहाल ऐसे बहुत से मामले हैं जो मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणियों को झुठला देते हैं. सुबह से दोपहर तक खूब गर्मी पड़ती है और शाम होते ही जैसे किसी हंसते खेलते व्यक्ति का मूड बदल जाता है, उसी प्रकार तेज आंधी चलती है तूफान आता है और सब तबाह हो जाता है. अरबों रूपयें के मौसम की जानकारी के लिये संयत्र देश में लगे है लेकिन सटीक जानकारी न भारत के इन संयत्रों और इसमें तैनात विशेषज्ञों के पास है और न ही दूर सात समुन्द्र पार बैैठे महान वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले अमरीका के पास क्योंकि वह खुद भी अचानक मौसम में आए बदलाव की तबाहियों का गवाह बनता है. सब दावे उस समय बेकार साबित हो जाते हैं जब इस बात की कोई भविष्यवाणी करें बिना या किसी के समझे बगैर अचानक कहीं जोरदार भूंकप आ जाता है तो कभी भारी गर्मी के बीच धूलभरी तूफानी हवा चलती है और कुछ ही क्षणों मेंं सब तबाह होकर शहर, कस्बे, गांव सब तबाही  का मातम मनाते हैं. वैज्ञानिक और सब मामले में दावे कर सकते हैं लेकिन प्रकृति द्वारा संचालित नियमों पर शतप्रतिशत दावा करने में वह आज तक असफल रहा हैं. अगर दावे सही होते तो न रबी की कटाई के समय बेमौसम वर्षा होती और न आंधी-तूफान से तैयार फसल को क्षति होती. देश के कई भागों में ओलावृष्टि से बहुत नुकसान हुआ इसकी भविष्यवाणी कहीं नहीं की गई कि ऐसा होगा. इस तरह के अप्रत्याशित मौसम की आशंका भविष्य में और बढ़ सकती है, ऐसा भी कहा जा रहा है. ठोस दावा नहीं,माना जा रहा है कि दुनिया पर्यावरण बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुकी है. इस संकट को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों, विशेषकर कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने की बात की जा रही हैं मगर किसी को इसकी परवाह नहीं.कई जगह एसिड वर्षा इस बात का संकेत है कि आकाश मंडल  में धरती से उत्पन्न ऐसे रासायनिक गैस का जमाव ज्यादा हो गया जो समय समय पर एसिड वर्षा भी कर रहे है. यह विश्व स्तर की चुनौती है लेकिन स्थानीय स्तर पर खेती-किसानी की रक्षा इस बदलते दौर में हमें कई स्तरों पर करनी है इसके बगैर तो हमारे पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंच पायेगा.  इस दौर में कृषि,आपदा-प्रबंधन व राहत, जल व मिट्टी संरक्षण तथा वनीकरण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. किसानों, मजदूरों और अन्य गांववासियों की आजीविका का आधार अधिक मजबूत करना होगा. खेती-किसानी में अब बदलाव ही एक विकल्प है जो मौसम के बिगड़ते मिजाज के बावजूद किसानों के जोखिम और कर्ज को न्यूनतम कर सकती है.संपूर्ण देश में फसल बीमा लागू है लेकिन यह कितने किसानों तक पहुंची है अगर फसल चक्र फेल हो रहा हों, तो किसानों को इसके विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे. हरित क्रांति की कोशिशों में हमने फसलों की ऐसी बहुत-सी किस्मों को भुला दिया है, जो प्रतिकूल मौसम में भी अच्छी उपज दे देती थीं.ऐसी किस्मों को फिर से फसल-चक्र में जगह देने से किसान के हितों की रक्षा संभव है और खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। देश की खेती-किसानी को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर ले जाने का रास्ता साफ करने की जरूरत है.मौसम में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में यह जरूरी हो जाता है कि आपदा-प्रबंधन और राहत के लिए पहले से ही योजनाएं बनाई जाये व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आपदा के बाद तुरंत ही सारी चीजें अपने आप शुरू हो जाएं. देश की नदियां जहां  जोड़ी जा सकती है वहां वहां उसे जल्द जोड़ा जाये ताकि भविष्य में जल संकट की स्थिति और गंभीर न हो जाये.
  

रविवार, 18 मई 2014

आजाद भारत में पैदा हुआ पहला प्रधानमंत्री!

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युवाओं की अहम भूमिका रही...जाति-धर्म सब सीमाएं लांघी गई मोदी को जिताने के लिये...
कांग्रेस के भ्रष्टाचार और दस वर्षो के कुशासन से मुक्त होना चाहते थे लोग

 लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को जो ऐतिहासिक जीत मिली है उसे भारतीय लोकतंत्र में किसी एक पार्टी को हासिल जीत में सबसे बड़ी  जीत है. पार्टी ने  दिल्ली, राजस्थान सहित कई राज्यों की सभी सीटें अपने नाम कर ली हैं तो कई राज्यों में दिग्गज क्षेत्रीय पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया है। यह चुनाव  हम सब के लिए चौंकाने वाले हो सकते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए यह परिणाम अपेक्षित ही माना जा  रहा है क्योंकि 2011 के बाद से ही उन्होंने सुनियोजित रणनीति के तहत इसके लिए आगे बढ़ना शुरू कर दिया था। तब उन्होंने सद्भावना यात्रा शुरू की थी. अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के समय वे जरूर कुछ हाशिये पर आ गए थे मगर 2004 के आम चुनाव में जब भाजपा की हार हुई तो उन्हें लगा कि अब वे केंद्र में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं. यह वह समय था जब लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की कब्र पर जाकर उनके लिए सराहना के शब्द बोल दिए. वे संघ के निशाने पर आ गए.अब मोदी के लिए मैदान खाली था. 2014 के चुनाव में मोदी के लिये हिंदी का पट्टा महत्वपूर्ण तो है पर जादुई अंक के लिए पर्याप्त नहीं। इसलिए उन्होंने ऐसी सीटों पर फोकस किया, जिन्हें आमतौर पर उपेक्षित किया जाता है, गोवा, दमन-दीव, अंडमान जैसे राज्यों की छोटी-छोटी सीटें. चुनाव के लिये मोदी ने पारंपरिक प्रचार अभियान के साथ नए तौर-तरीके भी अपनाए. वे बाहर से आए टेक्नोक्रेट थेप्त ऐसे आयोजन किए जिसने मोदी को एक कमोडिटी बना दिया.हैदराबाद में अगस्त में हुआ उनका वह भाषण जिसे सुनने के लिए पांच रुपए का टिकट खरीदना पड़ता था। इस सभा के लिए मोदी ने किसी सहयोगी दल की मदद नहीं ली.
थ्रीडी, होलोग्राम, चाय पार्टी, जैसे तरीके 18-23 साल के युवाओं को बहुत पसंद आए। कुछ नया करने की तलाश करने वाली पीढ़ी को लगा कि मोदी नया इनोवेशन कर सकते है। सितंबर 2013 से  मोदी ने लगातार  450 भाषण देकर बहुत बड़े इलाके तक पहुंचे. भाषणों और दौरों के जरिये उन्होंने पहले जनता में स्वीकार्यता बढ़ाई उसके बाद ही वे मीडिया के पास पहुंचे. प्रचार के दौरान वे लगातार नए आइडिया फेंकते रहें फिर चाहे वह 100 मेगा सिटी बनाने की बात हो या बुलेट ट्रेनें चलाने की.दिल्ली विधानसभा चुनाव  में  'आपÓ की जीत के बाद वे थोड़े विचलित नजर आए पर उन्होंने कोई गलती नहीं की वे अरविंद केजरीवाल की ओर से गलती होने का इंतजार करते रहें। केजरीवाल की चमक फीकी पड़ते ही उन्होंने 2002 के विकास के हिंदू मॉडल कै  को आधुनिक रूप दिया और फिर जोरदार अभियान छेड़ दिया.यह भी  दिलचस्प है कि 34 सालों में भाजपा संसद में कभी भी 182 से ज्यादा सीटें नहीं ला पाई,ऐसे में किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि इस चुनाव में भाजपा 200-220 से ज्यादा सीटें ला पाएगी लेकिन मोदी की अगुवाई  में एनडीए ने 334 सीटें जीतने का करिश्मा कर दिखाया. इस चुनाव में  बीजेपी की स्वीकार्यता 35 फीसदी थी, वहां मोदी की स्वीकार्यता 65 फीसदी थी.पूरे चुनाव में युवा गेम चेंजर साबित हुआ.इस बार चुनाव और राजनीति से बेरुखी रखने वाले यही युवा न सिर्फ मत देने पहुंचे, बल्कि भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। मोदी को भाजपा के लिए जितने देशभर से वोट मिले, उस औसत से छह प्रतिशत ज्यादा समर्थन युवाओं का मिला।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों में युवाओं ने बढ़-चढ़कर खुद को वोटर के तौर पर रजिस्टर कराया और मतदान किया.नतीजा शुक्रवार को सामने आया तब पता चला कि उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहली बार पार्टी ने जातियों और समुदायों से जुड़कर वोट देने की परंपरा को तोड़ा. जहां चार फीसदी वोटों के अंतर से सरकारें बनती और गिरती रही हैं.वहां युवाओं का कांग्रेस को 19 प्रतिशत  और भाजपा को 39 प्रतिशत  वोट देना निर्णायक हो गया.देश में भाजपा को 33 फीसदी वोट मिले, लेकिन युवाओं ने 39 फीसदी भरोसा दिखाया. सबसे ज्यादा युवा वोटरों वाली 15 सीटों में से भाजपा को दस तो कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली.उत्साह से भरे युवा जानते थे कि राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं, भ्रष्टाचार, महंगाई तो इनके ध्यान में थे ही लेकिन सबसे ज्यादा मजबूत नेतृत्व के लिए वोट दिया. कुल 81.5 करोड़ वोटरों में से 12 करोड़ 18-23 वर्ष वाले थे जिनने  इस बार सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी  को ही चुना. पूरे देश में 2000 से ज्यादा होर्डिंग्स आर्ैर  रेडियो और टीवी पर हर दिन 50-50 विज्ञापन बुक किए गए. ग्रामीण इलाकों के लिए खासतौर पर दूरदर्शन पर विज्ञापन बुक किए गये मोदी का प्रचार उन स्थानों तक पहुंचाया गया जहां आज तक भाजपा नहीं पहुंची थी, जैसे पूर्वोत्तर से लेकर केरल तक 16वें आम चुनाव में 282 सीटों पर विजय हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी भाजपा को अकेले अपने दम पर बहुमत मिल चुका है. भाजपा गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली हैं. यानी यह एक भारी जीत है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत के पीछे क्या कारण थे. और क्या भाजपा की इस जीत ने कुछ पुराने जमे-जमाए राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं.कांग्रेस ने भाजपा के लिए अकेले खेलने के लिए पूरा मैदान खाली छोड़ दिया था. इसकी एक कारण कांग्रेस के प्रति लोगों में आक्रोश था. इसकी वजह से ढेर सारे मतदाताओं ने, जिन्होंने पहले कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए वोट किया था, इस बार उन्होंने भाजपा को वोट दिया.
ये सभी  परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जो पार्टी विकल्प के रूप में दिखाई दे रही थी, उसे इन सबने वोट दिया. आमतौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की पार्टी है. भाजपा को जिस तरह वोट प्रतिशत मिला है, जिस तरह की सीटें मिली हैं उसके अऩुसार भाजपा ने इस धारणा  को तोड़ दिया है. भाजपा को छोटे छोटे ग्रामीण इलाके में अभूतपूर्व समर्थन मिला है. पहले कभी भी भाजपा को गांवों में इस तरह वोट नहीं मिला. पहले जाति यादव, पिछडा वर्ग और दलित वोट दिया करते थे. लेकिन ऊँची जातियों का वोट इस बार जिस तरह बिहार, उत्तर प्रदेश एवं अन्य कई राज्यों में मिला वैसा कभी नहीं देखा गया. चुनाव में जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए हैं.मोदी  आजादी  के बाद पैदा हुए भारत के पहले  प्रधानमंत्री होंगें

युवा वोटरों की अपेक्षाएं..."जादू की छड़ी घुमायेंगे मोदी"


युवा वोटरों की अपेक्षाएं..."जादू की छड़ी घुमायेंगे मोदी"
निशुल्क शिक्षा,चौबीस घंटे बिजली, एकल टैक्स,  जैसे ग्यारह अनुरोध...
युवा मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग, जिनकी संख्या करीब 2.31 करोड होती है, पहली बार मतदान में हिस्सा लिया- भाजपा जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी पर वे एक तरह से फिदा थे. वर्तमान भ्रष्ट सरकार से उनका विश्वास उठ चुका था. शायद यही कारण था कि उसने नरेन्द्र मोदी पर इतना विश्वास किया कि वोट देने के मामले में उन्होंने अपने अभिावकों तक की नहीं सुनी. इन नये मतदाताओं पर राजनीतिक दलों की पैनी नजर थी और चुनाव में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले युवाओं का समर्थन अधिक प्राप्त हुआ. मोदी के मोहित करने वाली बातों तथा नये भारत के लिये जो सपने दिखाये उसने पूरे देश में ऐसा माहौल खड़ा कर दिया कि उसके आगे वे सम्मोहित हो गये तथा पुराने युवाओं को, जो एक लम्बे समय से दूसरी  पार्टियों के साथ जुड़े हुए थे उन्हें भी अपने साथ मिलाने  में कामयाब हो गये.एक तरह से युवा मतदाताओं के आगे यह नये मतदाता हावी हो गये तथा सारी बाजी पलट दी. अब चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी से युवा यह आशा कर रहे है कि वे उनकी आशाओं को पूरा करने में समय न गवायें तथा हर वायदे को जल्द पूरा करें. इन युवाओं को लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी है,जो तत्काल देश में मंहगाई को कम कर देगा.निशुल्क शिक्षा, चौबीस घंटे हर घर को बिजली, हर घर को पानी और अन्य ऐसी ही सुविधाएं बस पद ग्रहण करते ही एक झटके में प्रदान करने की बात यह युवा कर रहे हैं.  सोशल मीडिया में ऐसे  युवाओं द्वारा भावी प्रधानमंत्री को लिखे गये एक पत्र में भी यह बात उन्होंने सिलसिलेवार कह डाली हैं पत्र का मजमून उन्हें संबोधित है जिसमें कहा गया हैै-
1.बिना अवरोध के 365 दिन चौबीस घंटे बिजली घरेलू के लिये तीन  रूपये और व्यावसायिक पांच रूपये के हिसाब से दी जाये.
2.गर्मी के दिनों सहित पूरे दिन शुद्व पेय जल की  पूर्ति हो.
3. भारत के सभी गांवो को जोड़ने  के लिये पक्की  सड़के बनाई जायेेे.
4.तेज चलने  वाली ट्रेने, और हमारा रेलवे अगले  पांच वर्षो में विश्व का सबसे बेस्ट रेलवे होना चाहिये.
5. बिना किसी झिझक के 'एकल टैक्स प्रणालीÓ लागू की  जाये
6.लालफीताशाही के बगैर का सर्वोत्तम प्रशासन, जिसमे भ्रष्टाचार का कोई स्थान न हो, ऐसी व्यवस्था हो.
7.होम लोन 6 प्रतिशत प्रति वर्ष, व्यावसायिक लोन 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष एंव नि:शुल्क शिक्षा तथा नि:शुल्क चिकित्सा प्रदान की जाये
8.खुदरा एफडीआई न हो
9. सभी भारतीयों के लिये एक जैसा कानून हो.
10.समान अधिकार और कमाई का लाभ जाति के आधार पर न होकर कमाई के आधार पर हो.
11.डालर की कीमत को आगामी पांच वर्षो में पैतीस रूपये तक पहंचाया जाये. इससे स्वत: ही पेट्रोल, गैस और सोने के भाव में गिरावट आयेगी
11 स्विस बैंक और विदेशों में जमा कालाधन  को वापस लाया जाये
12 पुलिस को नागरिकों से मित्रवत व्यवहार के लायक बनाया जाये
गंभीर अपराधों के मामलों पर निर्णय के लिये अधिकतम छै महीने की समय सीमा निश्चित की जायेे
इन युवाओं को आशा  है कि अगले  साठ माह में नरेन्द्र मोदी यह सब कर डालेंगे ताकि अगली बार लोग 'अबकी बार मोदी सरकारÓ की जगह यह कहने लगे कि 'बार बार मोदी सरकार.Ó
चुनाव में भाजपा को 39 प्रतिशत युवाओं का समर्थन मिला, जबकि कांग्रेस पर सिर्फ 19 प्रतिशत युवाओं ने भरोसा जताया. युवाओं के सहयोग से दिल्ली में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी प्रदेश में एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही, हालांकि वह कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलने में सफल रही.राजनीतिक दलों ने नये मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए सोशल मीडिया तथा अन्य सूचना एवं संचार सुविधाओं का जबर्दस्त उपयोग किया था. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार देश के 81.45 करोड़ मतदाताओं में 2.31 करोड़ की आयु 18-19 वर्ष के बीच थी, जो कुल मतदाताओं का 2.8 प्रतिशत है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 1.27 करोड़ मतदाताओं में 3.37 लाख मतदाताओं की आयु 18-19 वर्ष के बीच थी जो कुल मतदाताओं का 2.7 प्रतिशत थी। चुनाव में एक-एक मतों के महत्व को ध्यान रखते हुए विभिन्न दल इस युवा वर्ग को अपने पाले में लाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे.आम आदमी पार्टी ने अपने अभियानों में सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग किया था इससे प्रभावित होकर या एक तरह से इस टेक्नीक को अपनी ओर खीचते हुए नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया को भी अपने प्रचार में महत्वपूणर््ा अंग बना लिया. लोकसभा की करीब 30 प्रतिशत सीटों के सोशल मीडिया से प्रभावित होने की बात  को गंभीरता से लेते हुए राजनीतिक दलों ने मतदाताओं से सीधे सम्पर्क जैसे परंपरागत माध्यम से चुनाव प्रचार करने के साथ सूचना एवं संचार सुविधाओं का जबर्दस्त उपयोग किया.सोशल मीडिया से युवा काफी संख्या में जुड़े हैं और चुनाव में इस वर्ग का काफी महत्व रहा. इस वर्ग तक सूचना एवं सम्पर्क के रूप में इंटरनेट, फेसबुक, ट्विटर आदि को आगे बढ़ाया गया.सोशल मीडिया पर अपने अभियान को गति देने और लोगों तक पहुंचने के प्रयास के तहत भाजपा ने मिशन 272 प्लस के तहत 60 स्वयंसेवकों की एक टीम बनायी थी, जिन्हें लोगों तक सकारात्मकता संदेश के साथ जुड़ने का दायित्व सौंपा गया था और इन्हें दो लाख लोगों में से चुना गया था। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने भी युवा जोश जैसे अभियान के साथ युवाओं को जोड़ने की पहल की. कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ने के लिए एक टीम भी बनाई मगर मोदी के मुकाबले राहुल ने यह काम बहुत बाद में उस समय किया जब मोदी प्रचार के हर मामले में आगे निकल चुके थे. राहुल का प्रचार दमदार होने के बाद भी असरदार नहीं रहा.चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 28 राज्यों एवं सात केंद्र शासित प्रदेशों में दादर एवं नागर हेवली में कुल मतदाताओं में 9.88 प्रतिशत युवा मतदाता (18-19 वर्ष) है, जबकि झारखंड में कुल मतदाताओं में 9.03 प्रतिशत युवा मतदाता हैं.अंडमान निकोबार में सबसे कम 1.1 प्रतिशत युवा मतदाता हैं. हिमाचल प्रदेश में कुल मतदाताओं का 1.3 प्रतिशत युवा मतदाता है. हिमाचल की चारों सीटें भाजपा के खाते में गईं.उत्तर प्रदेश में 18-19 वर्ष के 38.1 लाख मतदाता हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में 20.8 लाख 18-19 आयु वर्ग के मतदाता हैं.उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 71 पर भाजपा ने जीत दर्ज की. पश्चिम बंगाल में युवाओं की हिस्सेदारी से भाजपा को अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिली.दिल्ली की उत्तर पश्चिम सीट पर 18-19 वर्ष के 61,760 मतदाता हैं, वहीं पश्चिम दिल्ली सीट पर 55620, उत्तर पूर्व सीट पर 54889, पूर्वी दिल्ली सीट पर 46574 युवा मतदाता थे.दिल्ली की सभी सात सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की.पश्चिम बंगाल, केरल और तामिलनाडू के युवाओं पर नरेन्द्र मोदी का जादू नहीं चल सका जबकि केरल के युवाओं ने राहुल का साथ दिया. मोदी केरल और तामिलनाडू भी प्रचार हेतु पहुंचे किंतु वहां उनका जादू नहीं चल सका. हिन्दी बेल्ट के युवाओं का पूरा साथ मोदी के साथ रहा शायद यही कारण है कि  इन बेल्टों की क्षेत्रीय पार्टियां तक एकदम साफ हो गई.

बुधवार, 14 मई 2014

बस अब ज्यादा इंतजार नहीं.... आज एक्जिट पोल से कुछ तो स्थिति स्पष्ट होगी


गठजोड़ में मोदी को 'सिंहासन के करीब जाने से रोकने की कोशिशें भी!


अब ज्यादा दिन नहीं बचे,सिर्फ चार दिन बाद यह स्पष्ट हो जायेेगा कि देश के सिंहासन पर कौन बैठेगा, लेकिन इससे पूर्व आज शाम एक्जिट पोलक लोगों की जिज्ञासा को बहुत हद तक कम कर देगा. इन पङ्क्षक्तयों के लिखे जाते तक आखिरी दौर का मतदान जारी है.मतदान की प्रक्रिया सोमवार को खत्म हो जायेगी, इस बीच जोड़-तोड़ का जो सिलसिला चला है वह भी कम इंन्टे्रस्टिंग नहीं है. भाजपा जहां स्पष्ट बहुमत का दावा कर रही है वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस जोड़-तोड़ में हैं कि किसी प्रकार केन्द्र में भाजपा की सरकार का उदय न हो. इस जोड़ तोड़ को देख भाजपा भी अपना इंतजाम करने में लगी है उसकी नजर ममता, मोदी और पटनायक पर है, भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि वह किसी प्रकार इन धुरन्धर नेताओं को मनाकर अपने साथ नहीं मिला सकती लेकिन 'साम धाम दण्ड भेदÓ का तरीका अख्तियार करने में भी वह पीछे नहीं है शायद यही वजह है कि सीबीआई को भी सत्ता पाने के लिये अपना मोहरा बनाने की बात चल रही है.
 इधर आम आदमी पार्टी की क्या भूमिका होगी यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उसका दावा है कि वह मोदी और राहुल को सत्ता में आने से रोकने के लिये तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने में मदद करेगी हालाकि इस मामले में आप के बीच मतभेद है किन्तु राजनीति में सबकुछ हो सकता है.कांग्रेस अभी इस हाल में भी दावे तो बहुत कर रही है लेकिन अंदर ही अंदर वह भी भाजपा की तरह ही डरी हुई है, शायद यही कारण है कि उसने बहुमत न आने की स्थिति में तीसरे मोर्चे का साथ देने की बात कही है लेकिन यहां भी पेच है कांग्रेस का समर्थन लेने के लिये कुछ विपक्षी नेता तैयार नहीं हैं.
आम आदमी पार्टी [आप] भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए तीसरे मोर्चे को समर्थन दे सकती हैं. आप के वरिष्ठ नेता गोपाल राय ने कहा कि अगर 16 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद तीसरे मोर्चे की सरकार के लिए पहल होती है तो पार्टी उसे मुद्दों पर आधारित समर्थन की पेशकश पर विचार कर सकती है.इस बयान का अरविन्द केजरीवाल ने खण्डन किया है. पूर्व में आये सर्वेेक्षणों में चौकाने वाली बात यही थी कि विपक्ष या तीसरा मोर्चा जो भी बनेगा वह अहम भूमिका निभाने की स्थिति में है तथा वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली ताकतों के साथ में आने की संभावना पर बातचीत तेज कर सकती है. सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य कई नेताओं ने इस तरह की संभावना जताई थी।  सोलहवीं लोकसभा में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के लिए नए साथियों की तलाश में सीबीआई अहम भूमिका अदा कर सकती है। मायावती, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे तीन बड़े क्षत्रप सीबीआई के निशाने पर हैं और उनके लिए सत्ताधारी दल के साथ टकराव आसान नहीं होगा।
ममता बनर्जी की तमाम कोशिशों के बावजूद शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी. इस घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेता फंसे हुए हैं और जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंचने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता.इस घोटाले का दायरा पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर असम और ओडिशा तक फैला हुआ है. अब तक घोटाले की जांच बीजू जनता दल के नेताओं तक भले ही नहीं पहुंची हो, लेकिन सीबीआई जांच की स्थिति में इसकी सारी परते खुल सकती है. जाहिर है ममता और नवीन पटनायक के लिए घोटाले की आंच से अपने कुनबे को सुरक्षित बचाने की मजबूरी होगी. मोदी के खिलाफ ममता बनर्जी की तमाम तल्ख टिप्पणियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों  का मानना है कि केंद्र सरकार से सीधा टकराव लेना उनके लिए संभव नहीं होगा. इसी प्रकार पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से एफआईआर निरस्त होने के बाद मायावती एक तरह से सीबीआई के चंगुल से बाहर निकल आई हैं, लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले को दोबारा खोलने की सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका नए सिरे से उनकी मुश्किलें बढ़ा सकती है। इस मामले पर 15 जुलाई को सुनवाई होनी है. फिलहाल सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को एफआइआर निरस्त होने के बाद पुरानेे सबूतों और बयानों के अप्रासंगिक होने का तर्क दिया, लेकिन अदालत के आदेश के बाद उसके पास जांच के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा.यहां यह भी इंगित करना होगा कि कि सीबीआइ सुप्रीम कोर्ट में लगातार मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के पुख्ता सबूत होने और इस सिलसिले में चार्जशीट तैयार होने का दावा करती रही है कि हमारा आंदोलन आम आदमी के लिए है और निश्चित रूप से मुद्दा आधारित समर्थन होगा. हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदार राजनीति की आवाज संसद में पहुंचे फिर यह मायने नहीं रखता कि हमें 10 सीटें मिलती हैं या 30 सीटें। आप ने 422 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम 100 सीटों पर जीत दर्ज करेगी.
छह चरणों के मतदान के बाद कांग्रेस ने यह मत बनाया था कि देश की सत्ता उसके हाथ से जा रही है. सत्ता का फायदा भाजपा को न मिले इसके लिए उसने चुनाव बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने के संकेत भी दिये. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि बहुमत न मिलने पर कांग्रेस तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है. मोदी को भाजपा के लिए ही बड़ी समस्या करार देते हुए खुर्शीद ने कहा था कि जब भगवान (राम मंदिर आंदोलन) की लहर कांग्रेस को नहीं रोक पाई तो मोदी की लहर क्या चीज है. इसलिए केंद्र में भाजपा की सरकार बनने की संभावना नहीं है. चुनाव बाद कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है. इतना ही नहीं वह सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे के दलों का समर्थन भी ले सकती है. माकपा ने भाजपा को सत्ता से रोकने के लिए चुनाव बाद सेक्युलर फ्रंट बनाने के संकेत दिए हैं.माकपा महासचिव प्रकाश कारत की माने तो  चुनाव के बाद सेक्युलर फ्रंट बन सकता है.  इसके लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन से कोई ऐतराज नहीं जबकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और रक्षा मंत्री ए.के एंटनी ने केरल की सभा में वामदलों को कांग्रेस के नेतृत्व में सेक्युलर फ्रंट के तहत एकजुट होने की अपील की थी.कारत का दावा है कि चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी. एंटनी के बयान पर उनका मत है कि चुनाव के बाद एंटनी और कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता होगा कि वह सेक्युलर मोर्चे को समर्थन दें, भाजपा को सरकार से दूर रखने के लिए सेक्युलर मोर्चे में कांग्रेस के समर्थन से कोई आपत्ति नहीं है.मोर्चे के नेतृत्व का फैसला चुनाव के बाद तय किया जा सकता है। 1996 में ऐसे ही हालात में संयुक्त मोर्चा बना था और नेता चुना गया था।

कब तक यात्री रेलवे के अत्याचारों को सहेगा?


कब तक यात्री रेलवे के  अत्याचारों को सहेगा?

प्लेन में खराबी आ जाये तो संबन्धित एयर लाइंस अपने यात्रियों को किसी बड़े होटल में ठहराकर उनकी सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती लेकिन क्या देश की सबसे ज्यादा कमाऊपूत रेलवे अपने यात्रियों की सेवा इसी प्रकार करती है? इस प्रकार नहीं तो भी क्या वह अपने उन यात्रियों की कोई खैर खबर लेती है जिनसे वह लम्बी यात्रा के नाम पर अनाप शनाप रेट वसूल करती है. शुक्रवार और शनिवार की दरम्यिानी रात बैतूल के समीप एक मालगाड़ी दुर्घटना के बाद जो अनुभव इस रूट के लाखों यात्रियों को करना पड़ा वह अभूतपूर्व था हालाकि ऐसी दुर्घटनाएं अक्सर होती है तथा यात्री इस तरह की मुसीबतें झेलते हैं लेकिन गर्मी के दिनों में जो कठिनाई होती है वह किसी जेल में एक दिन की सजा से कम नहीं है. शुक्रवार रात करीब 10-11  बजे के आसपास  बेतूल के पास घोडाडोगरी रेलवे स्टेशन के बिल्कुल करीब एक कोयले से भरी मालगाड़ी जो सारिणी संयत्र के लिये कोयले लेकर जा रही थी खूब तेज गति से पटरी से उतरकर विद्युत खम्बों को तोडते हुए बुरी तरह दुर्घटनग्रस्त हो गई.संपूर्ण रेलवे लाइन पर चलने वाले इलेक्ट्रिक इंजन की रेलगाड़यां जहां थी वही खड़ी हो गई विद्युत आपूर्ती लडखड़ाने से सिग्नलों ने भी काम करना बंद कर दिया और भी कई मुसीबतें इन प्रभावित ट्रेनों में सवार लोगों के समक्ष आन पड़ी. कई गाडियों की एसी बंद हो गई. ट्रेन के जनरेटरों से कुछ समय तक तो लाइट व एसी चले किन्तु वह भी बाद में बंद हो गई. एक तरह से सारी ट्रेनों में अव्यवस्था फैल गई. ट्रेनों में मौजूद रेलवे के किसी कर्मचारी को यह नहीं मालूम था कि आखिर क्या हुआ. बहरहाल ट्रेने जैसी थी उसी हाल में सात से आठ घंटे तक इस भीषण गर्मी में यात्रियों से ठसाठस भरी हालत में यूं ही खड़ी रही. ट्रेनों में पानी खत्म हो चुका था तथा बच्चे मारे गर्मी के चीख पुकार कर रहे थे. यात्रियों से मनमाना पैसा वसूल करने वाले रेलवे को इसकी कोई चिंता नहीं थी. कहीं कोई अनाउंसमेंट भी नहीं किया गया कि आगे कब उन्हें राहत मिलेगी. कुछ ट्रेने तो ऐसे जंगलों में खड़ी थी जहां यात्रियों के सिवा कोई दूसरा इंसान नजर नहीं आता था. ऐसे हालत में रेलवे ने यात्रियों को राहत दिलाने के लिये बस इतना किया कि इलेक्ट्रिक  इंजनों की जगह डीजल इंजनों की व्यवस्था कर दूर दराज क्षेत्रों में खड़ी ट्रेनों को उन स्थानों से निकालकर दुुर्घटनास्थल से निकालने में मदद पहुंचाई लेकिन इस कार्य में भी करीब छै सात घंटे का समय लगा. ट्रेनों में सवार यात्रियों को खाने- पीने की राहत पहुंचाने का प्रबंध रेलवे ने नहीं किया जबकि यात्री जिन्हे अपने गंतव्य तक की यात्रा करने में जहां बारह घंटे का समय लगता था वह उन्होंने चौबीस और छत्तीस घंटों में पूरा किया. सवाल यह उठता है कि जिसप्रकार रेलवे किसी भी दुर्घटना के लिये राहत दल और राहत के लिये लगने वाली ट्रेन तथा मशीने तैयार रखता है उसी प्रकार वह ट्रेनों में यात्रा कर रहे उन यात्रियों को राहत पहुंचाने के लिये ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करता ?क्यों उन्हें घंटों भूखे प्यासे एक ही स्थान पर पड़े रहने के लिये मजबूर करता है?मालगाड़ी की जगह यात्री ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर रेलवे के पास अपनी संपत्ती की रक्षा करने की तो तैयारी है लेकिन यात्रियों को राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था आज तक नहीं की. शुक्रवार की घटना के बाद खड़ी यात्री गाड़ियों में कई ऐसे पेशेटं थे जो हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से पीड़ित थे उन्हें भी रेलवे ने भगवान भरोसे छोड़ दिया. यह यात्रियों की भी गलती है कि वह भी  रेलवे के इस अत्याचार को शांत दिल से बर्दाश्त कर लेता है.

एक्जिट पोल 'अच्छे दिन आने वाले हैं!


दुनिया के प्राय: सभी लोकताङ्क्षत् देशों में एक्जिट पोल का बोलबाला है,यह मतदाताओं व प्रत्याशियों को कुछ समय तक टेंशन से दूर रखने की कोशिश तो करता है किन्तु हकीकत में यह असल पोल के नतीजे नहीं बन पाते.भारत में लोकसभा चुनाव के बाद पिछले कुछ वर्षो से एक्जिट पोल का ्रचलन शुरू हुआ है.मतदान के दौरान भी एक्जिट पोल दिखाये जा रहे थे किन्तु चुनाव आयोग ने  इसपर रोक लगा दी.चुनाव खत्म होते ही इसकी अनुमति दे दी और आननफानन में टीवी चैनलों ने एक्जिट पोल दिखा भी दिया. देश की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा सहित सभी विपक्षी पार्टी के नेताओं ने एक्जिट पोल के नतीजे को स्वीकार करने की जगह यही कहा है कि मतगणना के दिन का  इंतजार कीजिये. वास्तव में एक्जिट पोल बहुत सीमित लोगों के बीच से होता है, भारत जैसे एक अरब पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश में जिसमें  आधे  से ज्यादा अर्थात करीब  सत्तर प्रतिशत लोग मतदान में हिस्सा लेते हैं में से यह खोज निकालना किसी के लिये भी कठिन हो जाता है कि मतगणना के बाद क्या स्थिति होने वाली है. करीब एक महीने के चुनाव अभियान के दौरान चुनाव प्रचार के समय एक्जिट पोल में लगे लोगों ने करीब पौने दो लाख लोगों के बीच से यह बात निकाल ली कि भावी स्थिति क्या होगी? एक टीवी चेनल के एंकर ने एक्जिट पोल के परिणाम पर टिप्पणी के बाद यही बात कही कि आप इस परिणाम को असल परिणाम के नजरिये से मत देखिये दुनिया के किसी देश का एक्जिट पोल आज तक सही परिणाम नहीं दे पाया हैं. बहरहाल एक्जिट पोल ने जो परिणाम दिये है वह चुनाव  के दौरान मौजूद कथित लहर और मतदान प्रतिशत में बढौत्तरी के आधार पर भी हो सकता है. एक्जिट पोल में एनडीए को भारी बहुमत का दावा किया है जिसमें उसे 340 सीट तक लाने की बात कही गई  है जबकि वर्तमान सत्तारूढ दल को कहीं सत्तर और कहीं 119, 123 सीट तक मिलने का दावा किया गया है. कांग्रेस का जहां सूपड़ा साफ है वहीं हाल ही अस्तित्व में आई आप पार्टी को देश की संसद में खाता खोलते बताया गया है. इससे पहले  सन् 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह का आंकलन एक्जिट पोल करने वालों ने किया था. 2004 में अटल बिहारी बाजपेयी की तेरह दिनी सरकार के बाद चुनाव कराया गया था. उस समय 'फील गुडÓ का नारा चला और सब 'बेड- बेडÓ हो गया इसके बाद 2009 में फिर  एक्जिट पोल मे दिखाया गया कि यूपीए सत्ता से बाहर हो रही है लेकिन सत्ता पर फिर वही काबिज हुई. इस बार एनडीए ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए नरेन्द्र मोदी पर दाव खेला है.मोदी ने 'अच्छे दिन आने वालेÓ हैं का वादा करते हुए धुआंधार प्रचार में देश के युवाओ को बांधा. हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उनका सिक्का बहुत हद तक जम गया लेकिन दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में अब भी कु छ नहीं कहा जा सकता. सोलह तारीख को इलेक्ट्रोनिक मशीनों से जब वोट उगलेंगे तभी इस बात का पता चलेगा कि देश में किये जाने वाले एक्जिट पोल में कितना दम है.बहरहाल एक्जिट पोल को देखे तो हिंदी पंट्टी से लेकर पश्चिम और दक्षिण कहीं से भी कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं आ रही हैं. पिछले दो बार से लगातार मजबूती देते रहे आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस बंटवारे का कार्ड खेलने के बाद भी धड़ाम रही.आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी इससे आगे निकलते दिखाए गए हैं.वैसे कांग्रेस ने एक्जिट पोल पर होने वाली किसी भी बहस का बहिष्कार किया है और उसने वर्ष 2004 और 2009 के चुनावों में एक्जिट पोल गलत साबित होने का उदाहरण दिया है.चुनाव के नतीजे शुक्रवार को आने वाले हैं. सभी एक्जिट पोल केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनती और कांग्रेस की अब तक की सबसे बुरी हार होती दिख रही हैं, इनमें आज तक-सीसरो जहां राजग को 272 सीटें मिलते दिखा रहा है, वहीं इंडिया टीवी-सी वोटर इसे 289 सीटों के साथ अच्छी बढ़त पाता दिखा रहा है। टाइम्स नाऊ-ओआरजी मार्ग ने राजग को 249 सीटें मिलने की भविष्यवाणी जरूर की है, लेकिन ऐसी स्थिति में भी यह गठबंधन जरूरी सीटों से ज्यादा दूरी पर नहीं है। इसी तरह आज तक-सीसरो ने जहां कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग को 115 सीटें दी हैं, वहीं अन्य दलों के लिए 156 सीटें रखी हैं। इंडिया टीवी-सी वोटर ने संप्रग को 101 सीटें दी हैं। एक्जिट पोल में आम आदमी पार्टी भी पांच सीटों के साथ अपने पहले चुनाव में खाता खोल रही है. हालांकि, यह नहीं भूला जा सकता कि 2004 में तो ऐसे अधिकांश सर्वेक्षण भाजपा नेतृत्व की सरकार आती दिखा रहे थे. गत विस चुनावों में सबसे सटीक आकलन देने वाली सर्वेक्षण एजेंसी टुडेज चाणक्य ने अकेले भाजपा को 291 व राजग 340 सीटें दी हैं और कांग्रेस को आपातकाल के बाद से भी कम यानी 57 सीटों का अनुमान लगाया है।

शास्त्री चौक ही सब कुछ क्यों? जयस्तभं-शारदा चौक भी तो है!


 रायपुर का ट्रेफिक सुधार कार्यक्रम शास्त्री चौक तक ही सिमटा हुआ क्यों है?पिछले कई दिनों से पूरा प्रशासन शास्त्री चौक को ही पूरा शहर मान बैठा है और उसकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ रहा शायद इसलिये भी कि यहां से इस प्रदेश के कर्ताधर्ता दिन में कई बार गुजरते हैं जबकि जयस्तंभ चौक जो शहर का दिल है उसे विकसित करने का कार्य ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है. इधर रायपुर के टैफिक को बुरी तरह प्रभावित करने वाले शारदा चौक से लेकर तात्यापारा तक के रोड़ पर ट्रेैफिक की बुरी हालत पर रायपुर का प्रशासन चाहे वह नगर निगम हो या जिला प्रशासन अथवा पुलिस प्रशासन सब खामोश है. इस मार्ग को आमापारा से तात्यापारा चौड़ीकरण के साथ- साथ पूरा किया जाना था लेकिन आज तक इस दिशा में कोई कार्रवाही नहीं की गई. संबन्धित लोगों को मुआवजा देकर उसी समय हटा दिया जाता तो शायद यह नौबत नहीं आती  कि अब यहां से हटाने के लिये लोगों को दा से तीन गुना ज्यादा मुआवजा देना पड़ेगा. रायपुर नगर निगम, जिला प्रशासन  और सरकार के बीच  के झगड़े का खामियाजा रायपुर सहित पूरे देश के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है. पीक हावर्स में इस रोड़ से गुजरना कठिन हो जाता है.वाहन एक दूसरे से चिपचिपाते हुए चलते हैं ऊपर से ट्रेफिक पुलिस वालों ने अस्थाई विभाजन के नाम से मोटे मोटे विभाजक लगा दिये हैं. विचित्र हालात है इस रोड़ का.जीई रोड़ होकर भी शहर का यह हिस्सा किसी गली से कम नजर नहीं आता. शहर के कर्ताधर्ता योजनाएं बनाते हैं, उसे लम्बा खीचते हैं इस दौरान खर्चा दुगना तीन गुना हो जाता है. इस छोटे से पेच को ठीक करने में मुश्किल से एक माह का समय लगेगा लेकिन अहम की लड़ाई में आम आदमी पिस रहा है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुम्बई- नागपुर-राजनांदगांव- दुर्ग- भिलाई तरफ से शहर की तरफ से आने वाला सारा ट्रेफिक इसी मार्ग से होकर गुजरता है. सरकार को चाहिये कि तत्काल  इस सड़क का चौड़ीकरण करें या फिर टाटीबंद से कृषि विश्वविद्यालय तक फलाई ओवर का निर्माण करें. ऐसे ही एक फलाई ओवर की जरूरत पंचपेड़ी नाका से  रायपुर रेलवे स्टेशन तक भी जरूरी है. अगर चौड़ीकरण के साथ फलाई  ओवर और साथ में मोनो रेल की व्यवस्था नहीं की गई तो आगे आने वाले वर्षो में मौजूदा सड़कों पर  से लोगों का गुजरना कठिन होगा. शहर के योजनाकारों को चाहिये कि वह एक ऐसी योजना बनाए जो भविष्य में किसी प्रकार की ट्रेफिक समस्या को जन्म ही न लेने दें.

रविवार, 11 मई 2014

बस अब ज्यादा इंतजार नहीं.... आज एक्जिट पोल से कुछ तो स्थिति स्पष्ट होगी? गठजोड़ में मोदी को 'सिंहासनÓ के करीब जाने से रोकने की कोशिशें भी!


अब ज्यादा दिन नहीं बचे,सिर्फ चार दिन बाद यह स्पष्ट हो जायेेगा कि देश के सिंहासन पर कौन बैठेगा, लेकिन इससे पूर्व आज शाम एक्जिट पोल लोगों की जिज्ञासा को बहुत हद तक कम कर देगा. इस बीच जोड़-तोड़ का जो सिलसिला चला है वह भी कम इंन्टे्रस्टिंग नहीं है. भाजपा जहां स्पष्ट बहुमत का दावा कर रही है वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस जोड़-तोड़ में हैं कि किसी प्रकार केन्द्र में भाजपा की सरकार का उदय न हो. इस जोड़ तोड़ को देख भाजपा भी अपना इंतजाम करने में लगी है उसकी नजर ममता, मोदी और पटनायक पर है, भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि वह किसी प्रकार इन धुरन्धर नेताओं को मनाकर अपने साथ नहीं मिला सकती लेकिन 'साम धाम दण्ड भेदÓ का तरीका अख्तियार करने में भी वह पीछे नहीं है शायद यही वजह है कि सीबीआई को भी सत्ता पाने के लिये अपना मोहरा बनाने की बात चल रही है. इधर आम आदमी पार्टी की क्या भूमिका होगी यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उसका दावा है कि वह मोदी और राहुल को सत्ता में आने से रोकने के लिये तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने में मदद करेगी हालाकि इस मामले में आप के बीच मतभेद है किन्तु राजनीति में सबकुछ हो सकता है.कांग्रेस अभी इस हाल में भी दावे तो बहुत कर रही है लेकिन अंदर ही अंदर वह भी भाजपा की तरह ही डरी हुई है, शायद यही कारण है कि उसने बहुमत न आने की स्थिति में तीसरे मोर्चे का साथ देने की बात कही है लेकिन यहां भी पेच है कांग्रेस का समर्थन लेने के लिये कुछ विपक्षी नेता तैयार नहीं हैं.
आम आदमी पार्टी [आप] भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए तीसरे मोर्चे को समर्थन दे सकती हैं. आप के वरिष्ठ नेता गोपाल राय ने कहा कि अगर 16 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद तीसरे मोर्चे की सरकार के लिए पहल होती है तो पार्टी उसे मुद्दों पर आधारित समर्थन की पेशकश पर विचार कर सकती है.इस बयान का अरविन्द केजरीवाल ने खण्डन किया है. पूर्व में आये सर्वेेक्षणों में चौकाने वाली बात यही थी कि विपक्ष या तीसरा मोर्चा जो भी बनेगा वह अहम भूमिका निभाने की स्थिति में है तथा वह भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली ताकतों के साथ में आने की संभावना पर बातचीत तेज कर सकती है. सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य कई नेताओं ने इस तरह की संभावना जताई थी।  सोलहवीं लोकसभा में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के लिए नए साथियों की तलाश में सीबीआई अहम भूमिका अदा कर सकती है। मायावती, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे तीन बड़े क्षत्रप सीबीआई के निशाने पर हैं और उनके लिए सत्ताधारी दल के साथ टकराव आसान नहीं होगा।
ममता बनर्जी की तमाम कोशिशों के बावजूद शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी. इस घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेता फंसे हुए हैं और जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंचने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता.इस घोटाले का दायरा पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर असम और ओडिशा तक फैला हुआ है. अब तक घोटाले की जांच बीजू जनता दल के नेताओं तक भले ही नहीं पहुंची हो, लेकिन सीबीआई जांच की स्थिति में इसकी सारी परते खुल सकती है. जाहिर है ममता और नवीन पटनायक के लिए घोटाले की आंच से अपने कुनबे को सुरक्षित बचाने की मजबूरी होगी. मोदी के खिलाफ ममता बनर्जी की तमाम तल्ख टिप्पणियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों  का मानना है कि केंद्र सरकार से सीधा टकराव लेना उनके लिए संभव नहीं होगा. इसी प्रकार पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से एफआईआर निरस्त होने के बाद मायावती एक तरह से सीबीआई के चंगुल से बाहर निकल आई हैं, लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले को दोबारा खोलने की सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका नए सिरे से उनकी मुश्किलें बढ़ा सकती है। इस मामले पर 15 जुलाई को सुनवाई होनी है. फिलहाल सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को एफआइआर निरस्त होने के बाद पुरानेे सबूतों और बयानों के अप्रासंगिक होने का तर्क दिया, लेकिन अदालत के आदेश के बाद उसके पास जांच के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा.यहां यह भी इंगित करना होगा कि कि सीबीआइ सुप्रीम कोर्ट में लगातार मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के पुख्ता सबूत होने और इस सिलसिले में चार्जशीट तैयार होने का दावा करती रही है कि हमारा आंदोलन आम आदमी के लिए है और निश्चित रूप से मुद्दा आधारित समर्थन होगा. हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदार राजनीति की आवाज संसद में पहुंचे फिर यह मायने नहीं रखता कि हमें 10 सीटें मिलती हैं या 30 सीटें। आप ने 422 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम 100 सीटों पर जीत दर्ज करेगी.
छह चरणों के मतदान के बाद कांग्रेस ने यह मत बनाया था कि देश की सत्ता उसके हाथ से जा रही है. सत्ता का फायदा भाजपा को न मिले इसके लिए उसने चुनाव बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने के संकेत भी दिये. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि बहुमत न मिलने पर कांग्रेस तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है. मोदी को भाजपा के लिए ही बड़ी समस्या करार देते हुए खुर्शीद ने कहा था कि जब भगवान (राम मंदिर आंदोलन) की लहर कांग्रेस को नहीं रोक पाई तो मोदी की लहर क्या चीज है. इसलिए केंद्र में भाजपा की सरकार बनने की संभावना नहीं है. चुनाव बाद कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है. इतना ही नहीं वह सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे के दलों का समर्थन भी ले सकती है. माकपा ने भाजपा को सत्ता से रोकने के लिए चुनाव बाद सेक्युलर फ्रंट बनाने के संकेत दिए हैं.माकपा महासचिव प्रकाश कारत की माने तो  चुनाव के बाद सेक्युलर फ्रंट बन सकता है.  इसके लिए उन्हें कांग्रेस के समर्थन से कोई ऐतराज नहीं जबकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और रक्षा मंत्री ए.के एंटनी ने केरल की सभा में वामदलों को कांग्रेस के नेतृत्व में सेक्युलर फ्रंट के तहत एकजुट होने की अपील की थी.कारत का दावा है कि चुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी. एंटनी के बयान पर उनका मत है कि चुनाव के बाद एंटनी और कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता होगा कि वह सेक्युलर मोर्चे को समर्थन दें, भाजपा को सरकार से दूर रखने के लिए सेक्युलर मोर्चे में कांग्रेस के समर्थन से कोई आपत्ति नहीं है.मोर्चे के नेतृत्व का फैसला चुनाव के बाद तय किया जा सकता है। 1996 में ऐसे ही हालात में संयुक्त मोर्चा बना था और नेता चुना गया था।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

'इनमे से कोई नहीं के बाद भी एक आप्शन है,सरकार को चिंता नहीं


आप अपना वोट जरूर दे कि अपील आसान लेकिन वोट किसे दें?



हालाकि अगला चुनाव शायद जल्द आ जाय या फिर पांच साल पूरे करे लेकिन इस चुनाव ने फिर कई सवालों को यूं ही छोड़ दिया है?सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, सुपर स्टार आमिर खान सहित कई प्रमुख हस्तियों और सरकारी विज्ञापनों ने जनता को इस चुनाव में जागृत करने का प्रयास किया लेकिन वोटों का प्रतिशत कहीं शत प्रतिशत नहीं रहा. लगातार वोट के प्रतिशत में कमी या लोगों मे वोट न देने की प्रवृत्ति पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तो यहां तक कह दिया कि जो वोट न दे उसपर कानूनी कार्रवाही करनी चाहिये. चुनाव आयोग की सिफारिश पर जिस नोटा को संवैधानिक अधिकार में शामिल कराने में राजनीतिज्ञों और सरकार की अडगेंबाजी के कारण ग्यारह साल का समय लग गया वे वोट न डालने पर सजा की बात किस मुंह से करते हैं? भारत का नागरिक होने का हमें गर्व है और एक सच्चे नागरिक के तौर पर हम भी वोट देना चाहते हैं लेकिन किसे? वे जिन्हें पार्टियां चुनाव मैदान में उतारती हैं?जिनके खिलाफ कई किस्म के अपराध,आरोप और मामले दर्ज हैं या उन्हें जो चुनकर जाने के बाद संसद का समय बर्बाद क रते हैं या उन्हें जो चाकू लहराते हैं,गर्भग्रह तक पहुंच जाते हैं, तोड़फोड़ करते हैं या उन्हें वे जो ससंद में जाकर अपने क्षेत्र के बारे में एक शब्द नहीं बोलते अथवा वे जो मंहगाई, भ्रष्ष्टाचार,आर्थिक अपराध ,सामाजिक अपराध और अन्य बुराइयों के लिये जिम्मेदार हैं.क्यों हमारे जमीर को हर पांच साल में यूं ही ललकारा जाता है? वोट देना मजबूरी बना दिया गया लेकिन कोई विकल्प अच्छे व्यक्ति का नहीं दिया. क्यो नहीं मतदाताओं को भी प्रत्याशी बनने की पात्रता की तरह का नियम बनाया जाता? मतदान को अगर लोकतंत्र के मंदिर की पूजा समझा जाता है तो उस मंदिर में चढ़ने वाले फूल भी उतने ही पवित्र होनेे चाहिये.यह नहीं कि कोई शराब पाकर वोट डालने जा रहा है, तो कोई कम्बल, व पैसे खाकर मंदिर को अपवित्र कर रहा है.वोट डालने की वकालत करने वाले हमे बताये अगर अस्सी प्रतिशत वोट पडता है तो वह वोट कैसे पड़ते है? उसे पाने के लिये प्रत्याशी प्रचार- संपर्क के साथ क्या क्या जतन करता है?मसलन शराब, पैसा,कंबल, बाहुबल के बाद जब जीतता है तो स्वाभाविक है कि वह मतदाताओ की जेब से अपने खर्च को सूद समेत वसूल भी लेता है?वोट के प्रतिशत में बढौत्तरी उन नौजवानों की ह,ै जो अभी देश की राजनीति को पूरी तरह समझ नहीं पाये हैं और जिज्ञासा कर वोट डाल रहे हैं.हकीकत यह है कि एक हबहुत बड़ा समुदाय आज भी इस स्थिति में वोट डालना ही नहीं चाहता.सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने का अधिकार दिया है कोर्ट ने चुनाव आयोग को वोटरों को ईवीएम में 'इनमें से कोई नहींÓ का विकल्प देने का निर्देश दिया. चुनाव सुधार की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मील का पत्थर माना जा रहा है लेकिन इसमें भी गड़बड़ी की संभावना बनी हुई है.ऐसे वोट को सत्तारूढ़ पार्टियों द्वारा अपने खाते में करने की शिकायतें मिल रही है. सभी को रिजेक्ट का अधिकार पिछले विधानसभा चुनाव से लागू हो चुका है.गौरतलब है कि चुनाव आयोग 2001 मे ही यह प्रस्ताव सरकार को भेज चुका था लेकिन सरकारें इसे दबाये बैठी रही, ईवीएम मेल से कोई नहीं विकल्प के बाद वोटर अब कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आने पर उन्हें रिजक्ट कर सकेगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वोटिगं का अधिकार संवैधानिक अधिकार है तो उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी संवैधानिक के तहत अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है.  निगेटिव वोटिंग से चुनाव में सुचिता और जीवन्तता को बढावा मिलेगा और राजनैतिक दल साफ छवि वाले प्रत्याशियों को टिकिट देने के लिये मजबूर होंगे.दरअसल वोटरों के पास रूल नम्बर 49-0 ओ के तहत किसी भी उम्मीदवार  को वोट न देने का अधिकार पहले से ही था, इसके तहत वेाटर को फार्म भरकर पोलिंग बूथ पर चुनाव अधिकारी और एजेंट को अपनी पहचान दिखाकर वोट डालना होता था. इस प्रक्रिया में खामी यह थी कि  पैचीदा होने के साथ इसमें वोटर की पहचान गुप्त नहीं रह जाती. चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को गोपनीय और सुविधाजनक बनाने के लिये दस दिसंबर 2001 को ही ईवीएम में उम्मीदवारों का नाम के बाद इनमें से कोई नहीं का विकल्प देने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था लेकिन 12 सालो में इस पर कोई कदम नहीं उठाये गये .आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने वोटरों को विधानसभा चुनावों से यह अधिकार दे दिया.चुनाव सुधारों  की मांग कर रहे कार्यकर्ताओं का यह कहना है कि किसी क्षेत्र में यदि पचास प्रतिशत से ज्यादा वोटर 'इनमें से कोई नहीÓ के आप्शन पर पडता है तो वहां दुबारा चुनाव करवाना चाहिये.अभी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है,चुनाव आयोग ने भी इसका समर्थन किया था और सुझाव दिया था कि सरकार को ऐसा प्रावधान करने के लिये कानून में संशोधन करना चाहिये. सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.




सोमवार, 28 अप्रैल 2014

कौन जिम्मेदार है शहर में पीलिया फैलाने के लिये?




जब प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदते हें और जब बीमारी से मौते होने लगती है तब हमें याद आती है सफाइ!र् स्वास्थ्य कार्यक्रम! और दुनियाभर के एहतियाती कदम! राजधानी रायपुर के मोहल्लों में कम से कम तीन महीनों से पीलिया महामारी का रूप धारण किये हुए हैैं और हमने अपने इन्हीें  कालमों में यह भी बताया था कि इसके पीछे कौन से प्रमुख कारण है किन्तु किसी ने इसपर संज्ञान नहीं लिया, अब जब आज यह बीमारी संक्रामक रूप ले चुकी है और एक साथ दो-दो मौते हो चुकी है तब प्रशासन को याद आ रहा है कि हां कुछ तो करना पड़ेगा नहीं तो लोग कीड़े मकोडा़ें की तरह मरने लगेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी आनन फानन में बीमारी की गंभीरता से अवगत करा दिया गया.लगातार लोगों के बीमार पड़ने के दौरान इसकी गंभीरता से अवगत कराने की जगह दो मौतों के बाद खबर उनके उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान ही पहुंचाई गई.रविवार को एक एनआईटी छात्र और बाद में एक महिला की मौत ने संपूर्ण प्रशासन को हिलाकर रख दिया और शहर  में सनसनी व दहशत का माहौल निर्मित हो गया.अफसरों ने बीमारी की गंभीरता से तो मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया पैसे भी स्वीकृत करा लिया लेकिन क्या एहतियातिक कदम उठाये गये? शहर आज भी गंदा है, मैला है और नालियां बदबूदार है इन्हीं नालियों के पास से लोगों के घरो के लिये नगर निगम की वे पाइप लाइनें गई हैं जिनसे लोग पीने का पानी लेते हैं. लोहे की पाइप लाइनें इतनी पुरानी  है कि इनके अंदर जंग लग चुकी है तथा इसमें कीड़ों ने अपना घर  बना लिया है. निगम शहर की नलों से पानी कम से कम दो या तीन बार खोलता है इसके बीच का समय कीडों का होता है जो नालियों  से निकलकर इन पाइप लाइनों में पहुंचते हैं. पानी चालू होते ही लोगों की भीड नलों की ओर दौड़ती है वे पानी भरते हैं साथ ही  कीडे मकोडा़ेें को भी अपने रसोई तक ले जाते हैं.पीलिया और उदर  रोग से संबन्धित अन्य बीमारियों की उत्पत्ती यहीं से होती है. निगम के एक बड़े अधिकारी रविवार को टीवी चैनल पर यह कहते हुए सुना गया कि लोगों को अपने घरों में पानी उबालकर पीना चाहिय,े आरओ लगाने की बात भी उन्होंने कहीं लेकिन कितने ऐसे लेाग हैं जो आरओ लगाने  के लिये सक्षम हैं?पानी गरमकर पीना  कहना आसान है लेकिन क्या यह भी हर समय ऐसा हो सकता है? हां हम मानते हैं कि निगम अपने ओवर हेड टैंकों से फिल्टर किया हुआ स्वच्छ पानी लोगों के घरों को भेजती है लेकिन यह भी सही है कि निगम द्वारा बिछाई गई पाइप लाइनें ही रायपुर के मोहल्लों में पीलिया फैला रही है,यह बदलने का काम उन मोहल्लों मे तो शुरू हो गया लेकिन अन्य वार्डाे का क्या  होगा? रविनगर की नालियां देखिये या सर्वोदय नगर हीरापुर की सेप्टिक  टैंक तरफ कीगलियां देखियें जहां सफाई शायद वर्षो से सफाई नहीं हुई.राजधानी रायपुऱ सहित छत्तीसगढ़ के प्राय: हर शहरों में लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार सहित नगर पालिकाओं और नगर निगमों की भी है. यह संस्थाएं आम नागरिकों से इसके लिये सालाना एक मुश्त रकम वसूल करती  है. यह न पटाने पर वे घरों के सामने सफाई नहीं कराते, स्ट्रीट लाइट की सुविधा नहीं देते और नलों को काट भी देते हैं लेकिन सवाल  यह भी उठता है कि क्या नगर निगम का स्वास्थ्य व  संबन्धित अन्य विभागों का अमला कभी यह देखने का प्रयास भी करता है कि मोहल्लों या वार्डो में सफाई हो रही है या नहीं, नलों से पानी बराबर सप्लाई  की जा रही है या नहीं? वार्डो में स्ट्रीट लाइट जल रहे हैं कि नहीं?क्या कभी नगर निगम ने अपने  द्वारा सप्लाई किये जा रहे पानी को किसी के घर से सेम्पल लेकर टेस्ट किया  है?अगर हां तो बताये कितने घरों की टेस्टिगं की और क्या  निष्कर्ष निकला?बीमारी  फैलाने के लिये निगम तो जिम्मेदार है ही साथ ही शहर के लोग भी उतने ही जिम्मेदार है जो रोज हर सेके ण्ड नालियों व सड़कों में कचरा फेककर शहर को और गंदा कर रहे हैं! ऐसे लोगों पर  कार्रवाई की जिम्मेदारी भी  निगम की बनती है.यह भी बताया जाये कि कितने लोगों पर दण्डात्मक कार्रवाई की गई?

जल प्रबंधन इतना कैसे बिगड़ा कि गांवों में सूखा पड़ने लगा!



  कोई यह नहीं कह सकता कि इस वर्ष बारिश कम हुई, इन्द्र देवता खुश थे, खूब लबालब बारिश से नदी नाले सब भर गये, यहां तक कि मनुष्य द्वारा निर्मित बांधों में भी इतना पानी भर गया कि बांधों के गेट खोलकर पानी बहाया गया,इससे कई गांवों में बाढ़ की स्थिति निर्मित हुई.सवाल यहां अब यही उठ रहा है कि मानसून अनुकूल व सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में सूखे के हालात क्यो पैदा हो रहे हैं. क्यों महासमुन्द और अन्य  अनेक  क्षेत्रों में सूखे की नौबत आई?क्यों महानदी का पानी सूख गया और क्यों धरती का जलस्त्रोत नीचे गिरता जा रहा है?क्या यह हमारी प्रबंध व्यवस्था की खामियां थी जिसके कारण अप्रैल महीने से लोगों को सूखे की भयानक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. यह अब स्पष्ट होने लगा है कि शहरी क्षेत्रों के साथ साथ ग्रामीण इलाकों में पेय  जल के साथ निस्तारी की  समस्या भी गंभीर रूप  धारण करती जा रही है. गांव के गाव खाली होना शुरू हो गया है, मवेशियों तक  के लिये पीने का पानी गांवों में नहीं रह गया है. सूखे पर लोग अपना व्यापार चलाने लगे हैं एक एक टेैंकर पानी  की कीमत सोने के भाव चल रहा है.सरकार ग्रामीण व शहरी क्षेत्र  में सिंचाई, पीने व निस्तारी पानी  का प्रबंध करती है.तापमान बयालीस डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंचते ही अचानक यह स्थिति कैसे निर्मित हो गई कि अभी तक लहलहा रहे खेत सूख गये और गांवों में निस्तारी तक के लिये पानी नहीं बचा? लाखों करोड़ो रूपये जलसंसाधन विभाग के कर्मचारियों की तनखाह और स्थापना पर खर्च होता है किन्तु वे जब व्यवस्था नहीं बनाये रख सकते तो इस विभाग का औचित्य क्या है? क्यों नहीं इस विभाग ने अब तक इस छोटे से राज्य में ऐसे गांवों को खोजकर निकाला जहां बाढ की स्थिति पैदा होती है, सूखा पड़ता है और तबाही होती है?इतने वर्षो बाद भी अगर ऐसी छटनी नहीं की गई और पर्याप्त इंतजाम नहीं किये गये तो यह हमारा ही दोष है कि हम जल  प्रबंधन के मामले में असफल हो गये हैं. अगर बारिश के पानी  का समुचित संग्रहण हर तरफ बराबरी से होता तो शायद यह नौबत नहीं आती. नदियों को आपस में जोड़ने की बात भी प्रदेश में हवा- हवा ही है.अगर मध्यप्रदेश की तरह नदियों को एक दूसरे से जोड़ने की एक श्रंखला तेजी से शुरू होती तो ऐसे गांव जहां लोगों को मुसीबत के दिन देखने पड़ रहे हैं खुशहाल हो जाते.

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

क्या देश लहर पर लहरा रहा


         
सिर्फ 22 दिन..प्रतीक्षा कीजिये... अच्छे या पुराने दिन का!

- क्या देश में किसी एक पार्टी की लहर है?
-क्या इस बार देश में सत्ता का परिवर्तन होगा? 
-क्या सौ साल से ज्यादा पुरानी कांग्रेस की ऐसी स्थिति हो जायेगी जो आज तक कभी नहीं हुई?
-क्या आज देश में वैसी लहर बह रही है जो कभी इमेरजेंसी के बाद थी या वैसी लहर,जो इंदिरा  गांंधी के पुन: सत्ता में आने के समय थी? 
-क्या भाजपा आज अटल बिहारी बाजपेयी के समय से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है?अथवा यह नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है जिसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने सिर पर ले रखा है
 
नरेन्द्र मोदी की सभाओं में जनसैलाब को अगर लहर मान लिया जाये तो देश के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में यह लहर है. हिन्दी चैनलों में भी यह लहर है, मगर क्या यह लहर पूरे देश की फिजा को ही बदलकर रख देगा? यह गंभीर किन्तु कठिन प्रन है जिसका जवाब 16 मई के बाद ही प्राप्त होगा लेकिन इससे पहले देश का आधे से अधिक भाग मोदी और सुषमा स्वराज के साथ यही कह रहा है कि ''अच्छे दिन आने वाले हैं.ÓÓ 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी प्रकार की बात भाजपा की तरफ से 'फील गुडÓ के  नाम से सुनने को मिली थी, उस समय मैंै केरल में था, तब लालकृष्ण आाडवाणी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप पेश किया गया था. त्रिवेन्द्रम में उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को देखने से लगा कि पूरे केरल की सीट भाजपा के हाथ लग जायेगी लेकिन जब परिणाम आया तो केरल में भाजपा खाता भी नहीं खोल सकी बहरहाल इस समय पूरे देश में यही कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं,हम देश नहीं मिटने देंगे. हम देश नहीं झुकने देंगे तो क्या अभी तक देश मिट रहा था,क्या देश झुक रहा था? हर किसी की जिंदगी में कभी न कभी अच्छे दिन आते हैं, देश में अच्छे दिन आने वाले हैं,सवाल पर सवाल उठाया गया है कि क्या हम इतने  बुरे दिनों में जी रहे थे?यह सही है कि लोगों की अपेक्षाएं  बहुत है, अच्छे दिनों का इंतजार है क्योंकि उन्होंने  मंहगाई, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसे बुरे दिनों को देखा है लेकिन वह अच्छा दिन कब आएगा... कौन लाएगा...? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की आंखें तलाश रही है एक रोशनी को, जो  ऐसा चमत्कार करे कि सब पटरी पर आ जाये, कोई अवतार ले, कृपा निधान की तरह...इस समय हवा बदलाव की चल रही है। केंद्र सरकार की नीतियों से देश की जनता शायद ऊब चुकी है। उन्हें एक नए किरण की तलाश है जो एक जादू की झप्पी दे और सभी समस्याओं का हल कर दे। दस साल तक प्रधानमंत्री रहे डा. मनमोहन सिंह की उपलब्धियां गिनाने के बजाय कांग्रेस उनके ग्यारह सौ बार बोलने को उपलब्धियां मान रही है. जनता को बता रही है कि प्रधानमंत्री ने इतने बार अपना मुंह खोला।  क्या इससे किसी का भला होगा? चुनावी महासंग्राम में सभी दल के नेता अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, साथ ही एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और तीखे व्यंग्य बाण भी छोड़ रहे हैं। भाजपा पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी रोज सुबह, दोपहर, शाम रैली कर रहे हैं, पूरे देश में घूम-घूमकर सभा कर रहे हंै. मां-बेटे को कोस रहे हैं. कांग्रेस की बखिया उधेड़ रहे हैं, वहीं राहुल गांधी भी जगह-जगह रैली, सभा, रोड शो कर जनता को यूपीए सरकार के कामों एवं उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं, विपक्षी पार्टियों की पोल और उनकी कमजोरी को बयां कर रहे हैं सवाल यह है कि आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले नेता अपना मूल मुद्दा क्यों भूल गए ?जनता और देश के लिए वे क्या करेंगे?उनकी प्रमुख घोषणा और कार्य क्या होंगे। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, खाद्यान्न सुरक्षा इन सब बातों को किनारे कर ये नेता सिर्फ वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर एक-दूसरे पर आक्षेप कर जनता को अपनी ओर लुभाने का प्रयास कर रहे हैं.अभी तक केंद्र में अपनी सरकार बनाने का दावा करने वाले नेता अपना प्रमुख उद्देश्य जनता के सामने नहीं रख पाए हैं.डा. मनमोहन सिंह पर कम बोलने का आरोप लगातार लग रहा है-उन्होंने चुप से बड़ा सुख नहीं है वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पूरे दस साल बिता दिए...लेकिन चुप्पी ही सही, देश अब तक अपनी तरक्की के कई नए आयाम गढ़ते गया, जनता के लिए अनेक योजनाएं लागू हुई, वे सब सिर्फ प्रधानमंत्री की चुप्पी के आगे गौण हो गए। अब जनता को बोलने वाला प्रधानमंत्री चाहिए, काम करने वाला नहीं..? तो अब क्या लगातार बोलने वाला आ रहा है शायद....शायद....रहस्य. कुछ मत पूछिये देश की आबादी एक अरब बीस पंच्चीस करोड़ के आसपास ह, नये मतदाता भी आ गये हैं, किसके मन में क्या छिपा है यह नहीं कहा जा सकता....अच्छे दिन आने वाले हैं या बुरे दिन यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन यह भी सच है कि देश की जनता को शांति, सौहार्द्रपूर्ण वातावरण चाहिए, मंहगाई से मुक्ति चाहिय,े महिलाओं को सुरक्षा चाहिेये,बेरोजगार युवको को रोजगार चाहिये,इसके साथ ही विकास और लोगों की अन्य अपेक्षाओं को पूरा करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए... सिर्फ बोलने से काम नहीं चलेगा...प्रतीक्षा कीजिये आज से सिर्फ 22 दिन और....

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

मानसिक अस्वस्थों की जिंदगी सड़क पर..जिम्मेदार कौन


एक व्यक्ति तीन दिन तक एक बड़े घराने की गेट के सामने भीषण गर्मी आंधी बारिश में पड़ा रहा. घर के लोगों ने भी उसे देखा, किन्तु पुलिस को खबर करने की जगह उसे अपने नौकरों के मार्फत सरकाकर गली तरफ डाल दिया. आते जाते लोगों ने भी देखा किन्तु किसी को उसपर दया नहीं आई आखिर तीसरे दिन आसपास के लोगों को लगा कि यह शख्स अब मरने वाला है और यहीं पड़ा-पड़ा सड़ जायेगा तो इसकी सूचना पुलिस को देने के लिये दौड़ धूप शुरू हुई और अंतत: पुलिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया.जब पुलिस से यह पूछा गया कि शहर में ऐसे घूमने वाले मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के पास आपके पास क्या व्यवस्था है तो पुुलिस का जवाब था कि हमको सूचना मिलती है तो हम पहुंचते हैं गाड़ी बुलावते हैं, गाड़ी नहीं तो अपने खर्चे पर ही किसी गाड़ी में डालकर मानवता के नाते उन्हें सरकारी अस्पताल पहुंचा देते हैं अस्पताल में ऐसे लोगों के साथ कौनसा ट्रीटमेंंट होता होगा यह सब जानते हैं.  ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचाने वाले पुलिस के लोगों का ही यह कहना है कि थोड़ा बहुत ठीक होने के बाद फिर वैसे ही यह सड़क पर नजर आते हैं. कहीं कूड़ेे के ढेर के पास तो कहीं उस स्थान पर जहां कोई शादी ब्याह या बड़ी पार्टी के बाद अपना खाना फेकते हैं. राजधानी रायपुर सहित देश के विभिन्न राज्यों के शहरों में यह समस्या आजादी के पैसठ साल बाद भी यूं ही बनी हुई है.ऐसे लोगों में से कुछ की मौत जहां ठण्ड से होती है तो कुछ भीषण गर्मी में लू लगने स.े कहीं न कही गिरकर मर जाते हैं या फिर किसी वाहन की चपेट में आकर मारे जाते हैं.देशभर में मानवता की बात करने वाले कई संगठन है जो कहीं न कहीं कुछ काम कर अखबारों की सुर्खियां बनते हैं लेकिन इस गंभीर समस्या पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया. मानसिक व शारीरिक अस्वस्थता से पीड़ित व्यक्ति को समाज यूं ही सड़क पर भगवान भरोसे क्यों छोड़ देता है? इस सवाल के साथ कई अन्य सवाल भी उठते हैं जो इस समस्या को और गंभीर बना देता है  कौन हैं वे लोग हैं जो इन मूक लोगों को सड़क पर घूमने और भूखे मरने के लिये छोड़ देते  हैं? पुलिस जब ऐसे लोगों को अस्पताल पहुंचाती है तो उसका कर्तव्य वहीं खत्म नहीं होना चाहिये असल में उस व्यक्ति चाहे वह पुरूष हो या महिला उसकी अस्पताल से स्वस्थता के बाद इस बात का पता लगाया जाना चािहये आखिर वह इस हाल में कैसे पहुंचा ? वह कौन है, कहां का रहने वाला या वाली है तथा उसके रिश्तेदार कौन है  तथा उसको इस हालत में सड़क तक पहुंचाने के लिये जिम्मदार कौन है? जब तक ऐसे अपराधियों के खिलाफ कार्रवाही नहीं होगी यह समस्या बनी रहेगी. नगर निगमों ने आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की जबकि यह उसी का काम है कि ऐसे लोगों के कपड़े, खाने पीने, रहने तथा उनके इलाज की समुचित व्यवस्था करें. इस ढंग से घूमने वाले एक बड़ा जीवन जी चुके होते हैं अत: यह जरूरी है कि इसके पीछे का रहस्य भी पुलिस खोज निकाले जो इन्हें इस लायक सड़क पर जीने के लिये मजबूर करता है?मानसिक रूप से विक्षिप्त घूमने वालों को पकडकर उन्हें किसी अस्पताल या आश्रम में रखकर उनका इलाज कराने का दायित्व नगर निगमों का होता है किन्तु कम से कम छत्तीसगढ़ में  न किसी निगम ने किसी दस्ते का गठन इसके लिये किया है और न ही कोई ऐस निजी आश्रम अथवा अस्पताल है जिसने इन्हें सही सलामत किसी ठिकाने पर पहुंचाने के लिये कर्मचारी व वाहन की व्यवस्था की है.










शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

गांवों में बिजली-पानी नहीं होने का दर्द...!



यह सन् 1950 के बाद के वर्षो की बात है जब हम भोपाल में रहा करते थे, एक ऐसी कालोनी जहां बिजली होते हुए भी हमारे पास पंखा नहीं था, प्रकृति की हवा मे जीना ही हमारी दिनचर्या थी.गर्मी में सारे शरीर पर घमोरियां परेशान  करती थी,हमें इंतजार रहता था बारिश का कि बारिश होगी तो इस समस्या से मुक्ति मिलेगी लेकिन आगे के वर्षो में हम भाइयों ने गुल्लाख में जेब खर्च इकट्ठा करके एक टेबिल फेन लिया तो लगा कि इसके नीचे सोने वालों को कितना मजा आता रहा होगा.हमें पानी   सार्वजनिक नल या कुए से भरना पड़ता था जहां अलग अलग राज्यों से आये लोगो से झगड़ा भी करना पड़ता था चूंकि कोई एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे. बहरहाल इस दुखड़े के पीछे छिपा है वही दर्द जो आजादी के पैसठ वर्षो बाद भी हमारे देश के करोड़ों लोगों को झेलना पड़ रहा है जो बिना बिजली-पानी के दूरदराज गंावों में निवास करते हैं.उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं. वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की बात करने वाले हमारे मंत्री नेता सिर्फ बाते ही करते हैं.जनता की सेवा के नाम पर  वोट मांगते हैं लेकिन उस गरीब, आदिवासी, हरिजन या सामान्य वर्ग की जनता की कुटिया की तरफ पांच वर्षो तक कभी  झांकते भी नहीं जिसकी  बदौलत वे सिंहासन तक पहुंचे हैं. इसकी पोल तभी खुलती है जब दूसरी बार फिर इनकी जरूरत पड़ती है. लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान छत्तीसगढ़ मेें बिलासपुर क्षेत्र के करीब तीन  सौ गांवों की जिन गंभीर समस्या पर से पर्दा हटा है वह संपूर्ण व्यवस्था की पोल ही खोलकर रख देता है. पोल उस समय खुली जब सोलहवीं लोकसभा के लिये मतदान दलों को इन ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा गया. मतदान दलों के लोग स्वंय चौक गये कि क्षेत्र में बिजली नहीं है और उन्हें लालटेन का सहारा लेना पड़ेगा. तीन सौ गांवो में लालटेन के जरिये मतदान कार्य करना पड़ेगा. अब सवाल यह उठता है कि विकास की सारी बाते दिखावे की है. ग्रामीण क्षेत्रों  को सुविधाओं से क्यों वंचित रखा जा रहा है या जो सुविधाएं पहुंचाने के दावे किये जा रहे हैं वह सब झूठे व मनगढंत है. हकीकत यही है कि ग्रामीणों को देश की आजादी व विकास का कोई फायदा नहीं मिल रहा. सवाल यह उठता है कि क्या ग्रामीण इलाकों में रहने वालों को शहरियों की तरह विकास व आवश्यक मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है?http://majosephs.blogspot.in/?spref=fb

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मायावी चक्रब्यूह खूनी पंजों का, जो फंसा वह मरा


शहीदों की बोली कब तक लगेगी?कितने और लोगों को यूं ही जीवन गंवाना होगा-सरकार बताये?


&''एक ब्लास्ट... कई जवान शहीद,
&प्रत्येक के परिवार को तयशुदा बीस लाख का मुआवजा-
&श्रद्वांजलि, निंदा, तोपों की सलामी और उसके बाद सब भूल जाओं...
मुआवजा लेेने के लिये परिजन चक्रब्यूह में फंस जाते हैं, उन्हेें कभी दस्तावेज के लिये प्रताड़ित होना पड़ता है तो कभी किसी अन्य कारण सेÓÓ इसके बाद  फिर वही विस्फोट...नौजवानों का एक नया बेच मायावी नक्सली गुफा में शहीद हो जाता है.आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा?क्या सरकार बस्तर सहित देश के कतिपय राज्यों में इस प्रकार के नक्सली संयत्र खोलकर रखे हुए हैं जो देश के नौजवानों और सरकारी अफसरों को मौत के घाट उतारने के लिये बना रखा है?या नेताओं व सरकार के संरक्षण में इस प्रकार के मायावी संयत्र चल रहे हैं?संदेह इस बात को लेकर भी उठता है कि क्यों नहीं सख्त कदम उठाये जाते?देश के नौजवानों को जानबूझकर मौत के सौदागरों के हाथ सौंपा जा रहा है.एक जवान मरता है तो उसके साथ- साथ उसका पूरा परिवार मरता है. ऐसे गुमराह लोग इस खूनी ताण्डव में लगे हैं जो यह भी नहीं बता पा रहे कि उनका मकसद क्या है और वे क्यों ऐसा कर रहे हैं? इस नक्सली मायावी फैक्ट्री में घुसने वाले कितने ही जवानों को अब तक मौत के घाट उतारा जा चुका है किन्तु सरकार कोई गंभीर कदम उठाने की जगह एक के बाद एक बटालियन को इस गुफा में झोंक रही है. यह भी आश्चर्यजनक  है कि नक्सलियों का निशाना सिर्फ उन बेकसूर जवानों और सरकारी अफसरों पर ही क्यो रहता है जो दूर दराज क्षेत्रों से सरकार के कहने पर अपना व अपने  परिवार का पेट भरने के लिये माओवादी समस्या से निपटने के नाम पर इन जंगली  इलाकों में भेजे गये हैं.झीरमघाटी में नेताओ को एक-एक कर निशाना बनाने के बाद यह पहली बार हुआ है जब मतदान कराने गये सरकारी कर्मचारियों पर हमला किया गया. इसे एक तरह से लोकतंत्र पर हमला भी कह सकते हैं मतदान कराने सरकार द्वारा भेजे गये लोगों के खून से धरती को लाल कर दिया गया.मतदान दल  के करीब सात लोगों को अपनी जान  गवानी पड़ी है इनकी या इनके परिवार  को शायद नक्सलियों ने न कभी देखा होगा न उनसे कभी कोई दश्मनी  रही होगी. अब यह सवाल हैं कि आखिर नक्सली क्या चाहते हैं?अगर आपसी बात कर समस्या को सुलझाने  वाली कोई बात है तो सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल क्यों नहीं की जाती?  इसी  प्रकार यदि समस्या का कोई हल नहीं निकल रहा तो इसको समूल नष्ट करने की कोई योजना ठीक पंजाब की तर्ज पर क्यों नहीं बनाई जाती?कब तक ऐसे निर्दोष लोगों को यूं ही मायावी दढ़बे में मारने के लिये छोड़ा जाता रहेगा?अंग्रेजों के समय में काला पानी हुआ करता था, जहां अपराध करने वालों को भेजा जाता था अब अलग अलग राज्य सरकारों ने अपने अपने इलाकों में ऐसे मायावी दडबे को खुली छूट देकर पनपने दिया है जहां ऐसे लोगों को भेजा जाता है जिनको मौत की सजा देना होता है.ऐसे हालात पैदा होते जा रहे हैं कि सरकार द्वारा न केवल अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की बात ढकोसली होती जा रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि नौजवानों को यूं ही हर पन्द्रह बीस दिन में नक्सलियों के हाथों मरवाने की योजना तैयार कर ली गई है.इस बार चुनाव के दौरान जो कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ हुआ क्या इसके बाद किसी और कर्मचारी का साहस होगा कि वह आगे सरकार के कहने पर इन मायावी गुफाओं में जाकर प्रजातंत्र को अक्षुण्ण बनाये रखने का काम करें?

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

यह चुनाव है या जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर मारकाट का ऐलान

'''मार डालेंगे, काट डालेंगें , टुकड़े टुकड़े कर देंंगें- हमें सत्ता में आ जाने दो तब हम बतायेंगेÓं- ÓÓऐसे कुछ बयान  हैं जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व में उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के मुख से निकल रहे हंै.आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य क्या यही है जो हमारे नेताओं के श्रीमुख से सुनाई दे रहा है. सिंहासन पाने के लिये कोई मुस्लिमों को रिझा रहा है तो कोई हिन्दुओं को तो कोई दलितो को रिझाकर आगे बढ़ रहा है. युवाओं को दिग्भ्रमित करने की कोशिशे भी की जा रही है. मुद्दे, जनता तथा देश हित को लेकर बात करने की जगह नेता ये कहां एक दूसरे को लड़ाने वाले मुद्दे लेकर सामने आ गये? दिलचस्प तथ्य तो यह है कि कोई यह नहीं कह रहा कि वह अगर सिहासन पर काबिज होता है तो देश और देश की जनता के लिये क्या करेगा? उसकी विदेश नीति क्या होगी? आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर बनने वाली सरकार क्या करने वाली है? पडौसी राष्ट्रों, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के प्रति उसका रवैया क्या होगा? ऐसे अनेक मद्दों के अलावा यह भी कोई नहीं बता रहा कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये उनके पास कौन से जादू की छड़ी है? कोई यह भी बताने को तैयार नहीं कि देश मेें महंगाई को कम करने के लिये क्या देश में चीन की जनसंख्या नीति की तरह कोई नीति अख्तियार की जायेगी? या यूं ही खुली छूट देकर जनसंख्या को इस तरह बढ़ने दिया जायेगा कि देश में कहीं तिल रखने की जगह नहीं होगी और लोगों के समक्ष भूखे मरने की स्थिति निर्मित हो जायेगी.देश में कृषकों की बुरी स्थिति है, गरीबी चरम पर है, कुपोषण से भारी संख्या में मृत्यू हो रही है. जो गरीब है वह गरीब है, मध्यमवर्गीय के सामने अपने परविार को चलाने की समस्या है युवा बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढौत्तरी हो रही है. निजी व सरकारी दोनों क्षेत्रों में पहुंच व पार्टी आधारित लोगों को ही नौकरी पर लगाया जा रहा है.इन सब मुद्दों व समस्याओं पर स्पष्ट राय व्यक्त करने की जगह नेता क्या कह रहे हैं, यह भी अपने आप में गौर करने वाली बात है कि वे देश को किस राह पर ले जा रहे हैं. मसलन ''पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव अपमान बदले का है जिन्होंने अन्याय किया है डन्हें सबक सिखाने का चुनाव है केन्द्र में मोदी की सरकार बनी तो अगले ही दिन मुल्ला मुलायम की सरकार गिर जायेगी यह बात अमित शाह ने मुजफफरपुर में कही. इससे पहले सहारनपुर में कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद ने कहा कि मोदी की बोटी बोटी कर देंगे अब इसी बात पर राजस्थान की मुख्यमंत्री ने कह दिया कि टुकड़े किसके होंगे चुनाव के बाद पता चलेगा.ÓÓ हालाकि दलों के घोषणापत्र में बेरोजगारी, किसानों की समस्या, विकास जैसे कई मामलों का जिक्र है किन्तु जो वाक युद्व हो रहा है वह वास्तव में मतदातओं को गुमराह कर रहा है.इससे साफ है कि पार्टियां व नेता सिर्फ सत्ता की राजनीति कर रहे हैं उन्हें जनता से कोई लेना देना नहींं. घर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली कांग्रेस सरकार, जिसके शासनकाल में भ्रष्टाचार और मंहगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी भी अब जाति और धर्म को आधार बनाकर चुनाव में किसी नये मुद्दे को सामने न लाकर अपना अस्तित्व बचाने के लिये मुस्लिम नेताओं की शरण में जा रही है. कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की नीतियों का परिणाम है कि अलग अलग  समुदाय जो कभी एक जुअ हुआ करते थे अब आपस में लड पडे हंै- वास्तविकता यही है कि हमारे नेता देश की सेवा की जगह समाज व वर्ग को बांटने का काम कर रहे हैं यह इस चुनाव में प्रत्याशियों के चयन मामले में भी स्पष्ट हो चुका है प्रत्शशियों की लोकप्रियता सामाजिक स्टेटस, शिक्षा, आपराधिक प्रवृति आदि पर ध्यान दिये बगैर पार्टियों के प्रति समॢपता को देखकर लोकसभा क्षेत्र में जाति और धर्म की बहुलता के आधार पर प्रत्याशी बना दिया गया.यह सब स्पष्ट करता है कि हम किस प्रकार का चुनाव लड़ रहे हैं और किस ढंग की सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं. आगे आने वाले पांच वर्षो में शायद एक ऐसी ही लोकसभा में ऐसे ही माननीयों को देश की जनता को झेलना पड़ेगा तो अतिशयोक्ती नहीं होगी.

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

शहरों में आबादी का बोझ




शहरों में आबादी का बोझ अब चिंता का सबब बनता जा रहा है। सरकार इसपर चिंतित हैं किंतु क्या सिर्फ ङ्क्षचंता करने से इस समस्या का समाधान निकल जायेगा? बढ़ते बोझ से कई प्रकार की समस्याएं जन्म ले रही हैं। शहरों के ट्रैफिक में वूद्वि हो रही है, तो अपराध बढ़ रहे हैं। अलग- अलग गांवों से लोग रोजगार की तलाश में शहरों में पहुंचते हैं। जब रोजगार नहीं मिलता तो अपराध का रास्ता ढूंढ लेते हैं। जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के पांच वर्ष पूरे होने के बाद शहरीकरण संबंधी योजनाओं-परियोजनाओं को थोड़ी गति मिलने के आधार पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट होने का मतलब है, सामने खड़ी चुनौतियों से मुंह मोडऩा। शहरों के आसपास पड़ी कृषि भूमि जहां कांक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही हैं। वहीं गांव के अपने खेतों को जोतने के लिये आदमी नहीं मिल पा रहे हैं। धीरे- धीरेे हमारे नीति-निर्धारकों को उन विशेषज्ञों के सुझावों पर तत्काल प्रभाव से गंभीरता प्रदर्शित करनी ही होगी। जिन्होंने शहरों की परिवहन व्यवस्था और अन्य समस्याओं का उल्लेख करते हुए एक निराशाजनक तस्वीर पेश की है। यह ठीक नहीं कि शहरों की परिवहन व्यवस्था सुधारने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए उसका आधा भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सच तो यह है कि जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के तहत शहरी ढांचे को सुधारने के लिए उठाए गए कदम एक तरह से ऊंट के मुंह में जीरा जैसे हैं। जब क्रांतिकारी उपायों पर काम करने की आवश्यकता है, तब छिटपुट प्रयास किए जा रहे हैं और वह भी आधे-अधूरे मन से। इन स्थितियों में शहरों की आकर्षक तस्वीर के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। वर्तमान में देश के प्रमुख शहरों में करीब 35 करोड़ आबादी रह रही है। 2030 यानी अगले बीस वर्षो में यह आबादी 60 करोड़ से अधिक हो सकती है। एक आंकलन के अनुसार अगले बीस वर्षो में करीब 70 शहर ऐसे होंगे जहां की आबादी एक करोड़ से अधिक होगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि वर्तमान ढांचे वाले शहर इतनी अधिक आबादी का बोझ सहने में समर्थ नहीं होंगे। इनके लिये कहां से मकान की व्यवस्था होगी? कहां इनके खाने- पीने का इंतजाम होगा और कहां से इनकी अन्य जरूरतों को पूरा किया जायेगा? वर्तमान को देखा जाये तो यहां स्थिति ऐसी है कि जबजब कोई समस्या सिरदर्द बन जाती है। तब उससे निपटने के उपायों पर विचार किया जाता है। अथवा यह सामने आता है कि जब तक इन उपायों पर अमल होता है, तब तक समस्या और अधिक विस्तार ले लेती है। भारतीय शहर आज जिन समस्या का सामना कर रहे हैं वे काफी कुछ एक जैसी हैं, फिर भी उनके समाधान के लिए एकीकृत प्रयास नहीं किये जाते। आवश्यकता केवल इस बात की ही नहीं है कि शहरों का सुनिश्चित विकास हो, बल्कि उनमें ऐसी संस्कृति विकसित करने की भी जरूरत है जिसे हर तबके के लोग आत्मसात हो सके।