शनिवार, 10 नवंबर 2012

KADVA SACH

majoseph23@gmail.comकड़वा सच-अक्सर मेरे घर व परिवार के लोग मुझसे सवाल करते हैं कि मैं चर्च क्यों नहीं जाता? सदैव इस सवाल का जवाब मैं हंसकर टाल देता, मैरे परिवार  के लोगों को मैरी यह आदत बहुत बुरी लगती। मेरे कई जातिगत मित्रों को भी यह पसंद नहीं कि मैं लगातार कई दिनों तक चर्च नहीं जाता, किन्तु इसका यह मतलब भी नहीं कि मैं नास्तिक हूं ,मुझे ईश्वर नामक महान शक्ति और अपने धर्म पर विशेषकर मदर मेरी पर पूर्ण विश्वास है चूंकि हर मुसीबत में वही मुझे बचाती रही हैं। मैं सुबह उठने के बाद उनको व मुझे जन्म देने वाली मां व मेरे पिता व स्वर्गीय पत्नी को जरूर याद करता हूं। सुबह स्नान करने के बाद मदर मेरी की मूर्ति के सामने कुछ पल अपने व अपने परिवार के लिये कुछ मांगता हूं इसमें मैं अपने परिवार की समृद्वि बच्चों की खुशहाली उनकी सलामती की दुआ करता हूं। यह बताकर मैं यह साबित करना चाहता हूं कि मैं पूरी तरह आस्थावादी हूं। अब रहा चर्च जाने या न जाने का सवाल? हमारी रचना ईश्वर ने की है तो हम उसके गुलाम है। परिवार, धर्म समाज सब बाद की व्यवस्था है जो इंसानों ने अपने लाभ के लिये और व्यक्ति को डराने के लिये की है। हम जब ईश्वर पर आस्था रखते हैं तो यह स्पष्ट है कि हम आस्थावादी है, उस सर्वशक्तिमान ताकत को स्वीकार करते हैं जिसने इस सृष्टि की रचना की है। व्यक्ति पर मुसीबत आती है तो वह ईश्वर को पुकारता है वही दौड़कर उसकी रक्षा करता है तब धर्म की ठेके दारी करने वाला कोई मदद के लिये नहीं दौड़ता। हमारा जन्म , जिंदगी या मौत को चर्च या कोई धार्मिक संस्था तय नहीं करती। मैने अपने लम्बे जीवन में  दादा, दादी, बुआ, मोसी, मां, पिता व पत्नी को अपने सामने मरते देखा हैं। किसी चर्च या धार्मिक संस्था समाज में यह ताकत नहीं थी उन्हें उस समय तक मैरे साथ जिंदा रखे जब तक मै इस दुनिया में हूं । जिंदगी भर के लिये मुझे अकेला मानसिक तनाव झेलने के लिये छोड़ दिया गया। यह अकेला मैरे साथ नहीं होता हर उस इंसान,पशु पक्षी व जीवित प्राणी  के साथ होता है जो धरती में जन्म लेता है? क्या धर्म  के नाम पर शोर मचाने वाला कोई भी इंसान यह बता सकता है कि इंसान मरने के बाद कहां जाता है? हकीकत यही है कि इसका जवाब किसी के पास भी नहीं है। सब शून्य में दौड़ रहे हैं। कुछ लोगों ने ईश्वर को बिना देखे ही सबकुछ रच डाला, उस ढोंगी व्यवस्था को मानने के लिये बाध्य किया जाता है जो बच्चे के पैदा होने से शुरू होकर उसके मरने तक जारी रहता है। मरकर क्या होता है यह किसी को नहीं मालूम। जब सबकुछ ऐसा है तो हमे क्यों नहीं सिर्फ और सिर्फ अपनी आस्था पर छोड़ दिया जाये? क्यों परिवार या समाज द्वारा जबर्दस्ती इस व्यवस्था को थोपा जाता है? हम मन में टटोलकर देखें कि हम  घर में शांति से ईश्वर नामक  जिस महान शक्ति की आराधना करते हैं वैसा क्या उस समाज द्वारा रचित व्यवस्था में जाकर मिलता  हैं जहां सब बनावटी तरीके से होता है? हमारा सवाल यह है कि क्या हम ईश्वर का नमन समाज व लोगों को दिखाने के लिये करते हैं ? शायद इसलिये कि समाज में रहने के लिये गेट टुगेदर जरूरी है तथा लोगों को दिखाना भी है कि हम कितने आस्थावादी है, हमारा स्टेटस इससे कितना बढ़ जायेगा?

शनिवार, 10 मार्च 2012

बुुड्ढों के दिन लदेे...

बुुड्ढों के दिन लदेे...
सपा ने उत्तर प्रदेश में एक नवजवान युवक को राज्य की बागडौर सौंपकर देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक पाॢटयों को चुुनौती दे डाली है कि उनमें दम हो तो किसी एक ऐसे युवा को देश का प्रधानमंत्री बनाकर दिखा दें।भाजपा-कांग्रेस-भाकपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को सपा की इस चुनौती को स्वीकार कर एक ऐसे युवा को लाकर खड़ा करना चाहिये जो देश के करोड़ों युवाओं की आशाओं पर खरा उतरे और गर्व से कह सके -यह हमारा नेता है। देश की राजनीतिक पार्टियों का एक बहुत बड़ा वर्ग बूढ़ा हो चुका है जिसकी सोच न केवल दखियानूसी है बल्कि सठियाई हुई है जिसे न बदले हुए माहौल की ङ्क्षचता है और न ही बदले पीढ़ी के भावनाओं की.. ऐसे परम्परावादियों और अडियल बूढ़ी विचारधारा के साथ भ्रष्टाचार का पनपना वाजिब है। एक अरब बीस करोड़ की जनसंख्या के साथ बदले माहौल में राष्ट्रीय पार्टियों को नये चिंतन की जरूरत है। अट्ठावन साल से ऊपर के लोगों को राजनीतिक पार्टियों में संजोकर उनसे कथित देशसेवा कराने का कोई औचित्य नहीं है। जिस प्रकार बूढ़ा होने के बाद व्यक्ति के हाथ पांव ढीले पड़ जाते हैं उसी प्रकार आज की राष्ट्रीय पार्टियों के अस्थि पंजर भी कमजोर हो गये हैं। युवाओं को मौका दे ताकि देश में भी उनके सरीके जोश का संचार हो।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

खनिज maaphia

मध्यप्रदेश में खनिज मफियाओं के खिलाफ कार्रवाई कर रहे एक आईएएस अफसर की ट्रेक्टर ट्राली से कुचलकर हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यू पत्थरों के नीचे दबकर हुई। यह पहिला मौका नहीं है जब इस प्रकार की घटना देश में हुई, महाराष्ट्र के नासिक में तेल मफियाओ ने तो एक अफसर को जिंदा जला दिया था। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी है जिनमें कई ईमानदार और सत्यनिष्ठ लोग बलि का बकरा बन चुके है। क्या हुआ इन सबका, बिगड़ा तो उन्हीं का जो उनके परिवार के सदस्य हैं। नेताओं ने निंदा कर घडियाली आंसू बहा दिये तो सरकार ने जांच आयोग गठित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी। हमारे कानून की खामियां ऐसे मामलों में तत्काल सजा नहीं देती वरना ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हाती। इस मामले में भी ट्रेक्टर ट्राली के ड्रायवर को तो तत्काल गिरफतार कर लिया गया किंतु जो असल में इस पूरी घटना के लिये जिम्मेदार हैं वे कहीं न कहीं छुपकर सारा तमाशा देख खुशियां मना रहे हैं....कानून को सख्त करने की जरूरत है, घटनाओं में लिप्त लोगों को तत्काल सजा का प्रावधान नहीं किया गया तो देश में बचे कुचे चंद ईमानदार लोग भी खत्म हो जायेगें।

बुधवार, 7 मार्च 2012

ऐसे भी लोग

अब तक यही सुनते आये हैं कि कतिपय लोग शादी ब्याह के रिश्तों को तोड़ने में खुशी महसूस करते हैं लेकिल आज एक न्यूज ने सभी को चौका दिया कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के इलाज के मामले में भी किसी ने डंडी मार दी। न्यूजीलैण्ड के चिकित्सकों को किसी ने डरा दिया कि वे अगर रायपुर आये तो उन्हें नक्सलियों से खतरा है। बेचारे विदेशियों ने डरके मारे अपनी यात्रा स्थगित कर दी। अब जोगी को बम्बई जाकर अपने आपको खडे करने के लिये मशीन लगवाना होगा। जोगी सक्षम है वे मुम्बई में जाकर अपना इलाज करवा लेंगे लेकिन इस संपूर्ण एपीसोड़ से किसे फायदा हुआ? कुछ लोगों की तो शायद आदत ही ऐसी हो गई है कि दूसरों को दुखी कर ही उन्हें खुशी महसूस होती है...यह अकेे ले इस मामले में नहीं सैकड़ो ही ऐसे किस्से हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कई ऐसे धुरन्धर हैं जो अपने साथी से मीठे बोल बोलते हैं और पीठ में छुरा भोंकते हैं..बहरहाल इसपर कभी विस्तार से चर्चा होगी। आज होली पर इतना ही बस... होली की शुभकामनाएं मैरे सभी मित्रों और शुभचिंतकों को....