मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

अराजकता की श्रेणी तो आ ही चुकी, सम्हाल सको तो सम्हालों!

रायपुर दिनांक 2 फरवरी 2011

अराजकता की श्रेणी तो आ ही चुकी,
सम्हाल सको तो सम्हालों!

लोकतंत्र, अराजकता, बाद में तानाशाही- हमने राजनीति में यही पड़ा था। लोकतंत्र जब असफल होता है तो अराजकता आती है और उसके बाद तानाशाही। क्या देश में ऐसी स्थिति का निर्माण हो रहा है? अगर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के हालिया बयान का विश£ेषण करें तो कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। उन्होंने देश में चुनाव सुधारों की तत्काल आवश्यकता महसूस की है। मुख्य चुनाव आयुक्त के अनुसार चुनाव सुधार की प्रक्रिया पिछले बीस सालो से लंबित है। सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र की दुहाई देकर सत्ता में काबिज होने वाले राजनीतिक दलों ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को इतने वर्षो तक क्यों अनदेखा किया? देश में चहुं ओर जिस प्रकार का वातावरण निर्मित हुआ है चाहे वह भ्रष्टाचार हो, मंहगाई या अपराध-क्या उसे अराजकता की संज्ञा नहीं दी जा सकती। सबसे बड़ी बात तो यह कि निर्वाचित सरकार लोकताङ्क्षत्रक व्यवस्था में इस स्थिति को निपटाने में पूर्ण असफल साबित हुई है ओर पटरी से उतर चुकी व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने में एक तरह से विफल साबित हुई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े मंदिर में बाईस बाईस दिनों तक काम न होना क्या संकेत देता है? करोड़ों रूपये का काला धन लोगों की तिजोरियों से निकल रहा है, सड़क पर आम आदमी का चलना कठिन है, घरों को खुला छोडऩे की स्थ्ििात में किसी को भी अपनी संपत्ति के सुरक्षित रहने का भरोसा नहीं है। कानून के रखवाले खुद कानून तोड़ रहे हैं। इससे बड़ी अराजक स्थिति का क्या बखान करें? भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरेशी का कहना है कि लोकतंत्र की कमियों को जनता का मोहभंग होने से पहले ही दूर करना जरूरी है। हमेशा ऐसा नहीं चलेगा ,सुधार सही दिशा में नहीं हुआ तो एक दिन जनता ही ऊबकर तख्ता पलट देगी। कुरेेशी के अनुसार ऐसा कई देशों में हो चुका है। कुरेशी की बातो का समर्थन करते हुए हम यही कहना चाहेंगे कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, लोकतंत्र को बचाये रखने के लिये यह जरूरी है कि मौजूदा स्थिति में तत्काल बदलाव किया जाये। इसके लिये अगर सरकार को कठोर से कठोर कदम उठाने पड़े तो भी नहीं चूकना चाहिये। चुनाव सुधारों को लागू करने में क्या परेशानी है? अगर चुनाव सुधारने के लिये यह कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी एफआईआर है जिसमें पांच वर्ष या ज्यादा की सजा का प्रावधान है तो उसे चुनाव लडऩे के लिये अयोग्य घोषित किया जायें। एक अरब चालीस करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम होगी, अगर सरकार ऐसा नियम बनाती है तो किसका क्या बिगडऩे वाला? रही बीएसपी का संदेह कि ऐसे में निर्दोष लोगों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज होगें। ऐसे लोगों के लिये देश की अदालते मौजूद है। अदालत दूध का दूध और पानी का पानी साबित कर सकती है। चुनाव सुधार के बिन्दुओं को अगर आम जनता के नजरियें से देखें तो यह सुझाव कानून बनाकर आसानी से लागू किये जा सकते हैं किंतु इन्हें लागू करने से कई राजनीतिक दलों के हितों को नुकसान हो सकता है। यह भी आश्चर्य जनक है कि देश में बारह सौ राजनीतिक दल पंजीकृत हैं लेकिन सिर्फ डेढ़ सौ ही सक्रिय हैं। बाकी को आयकर में छूट का अधिकार क्यों दिया गया है? कानून मंत्रालय की चुनाव सुधार कमेटी के अध्यक्ष विवेक तन्खा के अनुसार लोकतंत्र का मतलब है गरीबों को अमीरों के बराबर का हक हो। क्या आप बता सकते हैं कि क्या हमारे लोकतात्रिंक देश में ऐसा है?

मौत के मुंह में घर का बेटा- परिजनों के आंसू से भीगी छत्तीसगढ़ की माटी

रायपुर दिनांक 1 फरवरी 2011

मौत के मुंह में घर का बेटा- परिजनों
के आंसू से भीगी छत्तीसगढ़ की माटी
जिसके साथ बीतती है वही जानता है दर्द क्या होता है?छत्तीसगढ़ वह दुर्भाग्यशाली राज्य बनता जा रहा है जहां बहुत से लोग प्राय: एक के बाद किसी न किसी अप्रत्याशित गम के दौर से गुजर रहे हैं। कभी किसी का अपहरण,किसी की दुर्घटना में मृत्यु तो कभी कोई बड़ी घटना में परिवार के किसी का गुजर जाना एक आम बात हो गई है। इस समय सर्वाधिक चर्चा है उन पांच जवानों की जिन्हें नक्सली अन्य ग्रामीणों के साथ अपहरण कर जंगल में ले गये। राज्य सरकार से गुहार लगाने के बाद भी कोई हल नहीं निकला तो इन जवानों के परिजन स्वंय उन्हें जंगल में खोजने के लिये निकल पड़े हैं। परिवार के सदस्यों का दर्द इतना ज्यादा है कि उनके मुंह से अब आवाज निकलना तक बंद हो चुकी है। उनके आंसू से धरती गीली होती जा रही है। यह दर्द उन्हें उस समय और बढ़ा देता है जब इन जवानों के साथ अपहरत किये गये ग्रामीण वापस आ जाते हैं मगर जवान वापस नहीं आते। मुख्यमंत्री उा. रमन सिंह ने दिल्ली रवाना होने के पहले नक्सलियों के नाम एक मार्मिक अपील यह कहते हुए की कि वे मानवता के नाते इन निहत्थे जवानों को छोड़ दें। यह जवान छ़ुट्टी पर अपने घर जा रहे थे तभी उनका अपहरण किया गया। कम से कम तेरह दिन हो गये मगर अब तक इन्हें छोड़ा नहीं गया। मुख्यमंत्री की अपील का नक्सलियों पर कोई असर नहीं पड़ा जबकि परिजनों की क्या स्थिति है इसका अंदाज कोइ्र्र भी लगा सकता है। हर पल किसी बुरी या अच्छी खबर की संभावना से परिजनों के सामने अंधेरा ही अंधेरा है। आखिर इस समस्या का हल क्या है? यह पहला अवसर नहीं है जब नक्सली अपहरण की वारदातों के चलते जवानों के परिवारों के समक्ष यह स्थिति निर्मित हुई है। वैसे बहुत कम हुआ है जिसमें नक्सलियों ने अपहरण किये लोगोंं का खून किया हो, पूर्व की घटनाओं के परिपे्रक्ष्य में यह आशा की जा सकती है कि इन अपहरत जवानों को भी सकुशल वापस भेज दिया जायेगा लेकिन चौबीस घंटे बारूद के सामने खड़े इन जिंदगियों के लिये लोग सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं। इधर छत्तीसगढ़ में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा पैसे की लालच में अपहरण और उनकी हत्या के दौर ने भी लोगों को परेशानी में डाल रखा है। छत्तीसगढ़ में तीन बच्चे अब तक अपहरण के बाद पैसा नहीं मिलने के कारण मारे जा चुके हैं जबकि कई लोगों को बंधक बनाकर उनके परिवारों को दुखभरे क्षणों का अनुभव करने के लिये मजबूर किय गया। परिवार के किसी न किसी सदस्य का खून आम बात होती जा रही है। प्राय: आम आदमी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, लोग इन खबरों को पड़ते हैं फेक देते हैं किंतु उन परिवारों के बारे में भी जरा सोचिये जिनका कोइ्र्र इकलौता बेटा किसी आंतकवादी के सामाने मौत का इंतजार करता खडा हो। कब मिलेगी इस अंचल के लोगों को इन घटनाओं से मुक्ति?

सोमवार, 31 जनवरी 2011

हर हाथ में मोबाइल की खुशी देखी नहीं गई सरकार से,बजट में और पड़ेगी मार!

रायपुर दिनांक 31 जनवरी 2011

हर हाथ में मोबाइल की खुशी देखी नहीं
गई सरकार से,बजट में और पड़ेगी मार!
सब ठीक चल रहा था,लोग कहने लगे थे कि महंगाई सब जगह है लेकिन मोबाइल और फोन पर बात करना सस्ता है लेकिन ऐसा लगता है कि सराकर को लोगो की यह खुशी भी पसंद नहीं आई। नये संचार मंत्री ने ऐसी छड़ी घुमाई कि उनको सब जानने लगे कि मंहगाई बढाने वाले एक बादशाह यह भी हैं। स्पेक्ट्रम जिसके बारे में देश की आधे से भी ज्यादा जनता नहीं जानती का बहाना बनाकर मोबाइल की सुख सुविधा लोगों के हाथ से छीनने का बंदोबस्त आदरणीय कपिल सिब्बल साहब ने कर दिया। इसकी सीधी मार उपभोक्ताओ की जेब पर तो पड़ेगी ही नये आपरेटर जो अब तक खुशी खुशी अपना कारोबार शुरू कर रहे थे उन्हें भी दुखी कर दिया। स्पेक्ट्रम वह सिग्नल या रेडियोधर्मी तरंग है जो मोबाइल मे आवाज और सिग्नल के लिये प्रयोग में लाया जाता है। पूर्व में यह तरंग आपरेटरों के लिये नि:शुल्क कर दिया गया था इससे मोबाइल की दरें सस्ती हो गई थी लेकिन अब सरकार ने मना कर दिया कि वह नि:शुल्क स्पेक्ट्रम नहीं देगी। अब तक जो घोटाले इस मामले में किये हैं उनको सजा देने की जगह यह कौन सा न्याय है कि आम जनता और नये आपरेटरों दोनों को इसकी लपेट में ले लिया? मंहगाई बढ़ाने मे हमारे मंत्रीगण इस समय विशिष्ट भूामिका अदा कर रहे हैं। रेल बजट अभी आया नहीं है किंतु यह खबर आने लगी है कि यात्री किराये में बडौत्तरी होगी। इससे पूर्व कृृषि मंत्री शरद पवार के कारनामो से देश वाकिफ है। जिस मंहगाई के लिये उनका मंत्रालय सीधे सीधे उत्तरदायी था उसमें वे अपने आपको बचाने के लिये ऊल जलूल उत्तेजित बयानों से जनता को गुमराह करते रहे। देश के वित्त मंत्री प्रणब मुकर्जी पिछले वर्ष मार्च से यह कह रहे हैं कि मंहगाई छह महीनों में खत्म हो जायेगी। इस दौरान गर्मी निकल गई, बरसात भी निकल गई और ठण्ड का महीना भी निकलने को है लेकिन न छह महीने पूरे हुए और न मंहगाई घटी। वित्त मंत्री का बजट भी अभी आया नहीं किंतु खबर है कि दवाई की कीमतें भी बढने वाली है। मोबाइल, फोन, फ्रिज,गैस चूल्हा, वाहन,दवा यह सब अब देश में विलासिता की वस्तुएं न रहकर सामान्य जन के दैनिक जीवन का एक अंग बनता जा रहा है चूंकि समय के साथ हर आदमी को बदलना पड़ता है। अगर सुविधाएं सस्ते में देकर उसे महंगा कर छीनने का प्रयास किया गया तो यह जनता के आक्रोश का कारण बनता है किन्तु सदैव से विलासिता और सुविधा में जीवन जीने वाले हमारे तंत्र के कर्णधार आम लोगों की भावनाओं को समझ नहीं पाते। पहले हम हंसी उड़़ाते थे कि मोबाइल किसी दिन सब्जी बेचने और रद्दी बेचने वाले के पास भी होगा किंतु आज हम गर्व से कह सकते हैं कि मोबाइल आज हर ऐसे वर्ग के हाथ में है जो मेहनतकश है यह इसलिये संभव हो सका चूंकि इसे सस्ते में लोगों को उपलब्ध कराया। मोबाइल चार्ज महंगा होने की स्थिति में इस वर्ग के लिये अंगूर ख्ट्टे हैं का मुहावरा सच साबित न हो जाये?मेाबाइल की तरह ही पेट्रोल-डीजल को भी सामान्य जन के बजट से दूर कर दिया गया। सरकार मंहगाई के वर्तमान दौर से खुश नहीं है-उसे इस बात का रोग लग गया है कि वह जनता की सुख सुविधाओं पर और चोट करें-आम जनता को बजट में यह गिफट भी मिल सकता है-तैयार रहें!

रविवार, 30 जनवरी 2011

दुकाने कम करने से शराब पीने वालों में कितनी कमी होगी?

रायपुर दिनांक 30 जनवरी 2011

दुकाने कम करने से शराब पीने
वालों में कितनी कमी होगी?
छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश में शराब पीने वालों की संख्या घटाने के लिये दो हजार से कम आबादी वाले ढाई सौ ग्रामों में शराब दुकाने बंद करने का फैसला किया है। सरकार का दावा है कि इससे शराबखोरी बहुत हद तक बंद होगी? पीने वालों का क्या है, जिसें पीना है वह पाताल खोदकर भी पीता है, उसे कोई नहीं रोक सकता। इस गांव में शराब नहीं है तो दूसरे गांव में जाकर पियेगा। इस स्थिति से निपटने के लिये पूर्ण शराब बंदी ही एक उपाय है लेकिन सरकार के लिये यह संभव नहीं है चंूकि सरकार को करोड़ों रूपये का राजस्व सिर्फ इसी धंधे से मिलता है। गांव गांव में शराब दुकानें खोलकर सरकार स्वंय लोगों को शराब पीने के लिये प्रोत्साहित करती है। यह एक तरह से व्यवसाय है-इससे किसी का परिवार बिखरे या टूटे सरकार का कोई लेना देना नहीं। शराब बिक्री से राजस्व नहीं होने की स्थिति में इसका खामियाजा आबकारी विभाग को भरना पड़ता है। वे भी यही प्रयास करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा शराब लोग पिये। सरकार ने प्रदेश की ढाई सो शराब दुकानों को अगले वित्तीय वर्ष से बंद करने का निर्णय लिया है। सरकार के अनुसार बंद की जा रही सभी दुकानें दो हजार से कम आबादी वाले गांवों में है। इस निर्णय से सरकार को हर साल सौ करोड़ रूपये की हानि होगी। प्रदेश सरकार के आय का एक बहुत बड़ा जरिया शराब है। सरकार ने पूरे प्रदेश में 1054 शराब दुकानें खोल रखी हैं। इसमें से ढाई सौ चली गई तो भी उसके राजस्व में खास फरक पडऩे वाला नहीं। अगर प्रदेश में नई पीढ़ी को शराब की लत से बचाना है तो सरकार को इस आय को कम कर नये स्त्रोत ढूंढना ही पड़ेगा। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के अनुसार शराब पर पूर्ण पाबंदी तत्काल संभव नही हैं लेकिन चरणबद्व ढंग से इसे पूरा किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की बात को छोड़ भी दिया जाये तो आजकल शहरी क्षेत्रों में भी गली -गली शराब की बिक्री हो रही है और युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसकी ओर आकर्षित हो रहा है। पीने की लत से कई घर बरबाद हो गये हैं इसका ही परिणाम है कि छत्तीसगढ़ के कई शहरी व ग्रामीण इलाकों में महिलाएं, बच्चे भी इसके खिलाफ सड़क पर उतर आये हैं। जिन क्षेत्रों में शराब के खिलाफ आंदोलन चला उसमें से शायद ही कोई क्षेत्र होगा जहां शराब दुकान बंद करने का निर्णय लिया गया हो। पूरे प्रदेश में जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा नशे का आदी हो चुका है। छत्तीसगढ़ के मंदिर हसौद में भानखोज से शराब के खिलाफ आंदोलन की शुरूआत हुई थी-यह वह समय था जब छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बना था। सरकार ने दुकानेें बंद करने का निर्णय लेते समय इस क्षेत्र को भी नजर अंदाज किया। अगले वित्तीय वर्ष में जब शराब दुकानें खुलेंगी तो इन क्षेत्रों में फिर आक्र ोश भड़कना स्वाभाविक है जहां वर्षाे से शराब दुकाने बंद करने के लिये आंदोलन चल रहा है।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

सत्यनिष्ठों की कमी, बचे-कुचे जो हैं, उल्हें सम्हाले रखना जरूरी!

रायपुर दिनांक 29 जनवरी 2011

सत्यनिष्ठों की कमी, बचे-कुचे जो
हैं, उल्हें सम्हाले रखना जरूरी!
ईमानदार,सत्यनिष्ट, देशभक्त इन नामों के मनुष्य अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। जो बचे हैं उन्हें कहीं गोलियों से भून दिया जा रहा है तो कहीं जिंदा जलाया जा रहा है। अगर जल्द ही कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया तो इस ढंग के लोगों का नामोनिशान मिट जायेगा। अभी कुछ साल पहले इंडियन आयल कंपनी में गड़बड़ी पकड़ी तो ईमानदार एस. मंजूनाथ को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.... अैार अब महाराष्ट्र में एक एडीशनल कलेक्टर यशवंत सोनवाने को इसलिये जिंदा जला दिया गया चूंकि उसने मिलावट खोरों के खिलाफ सबूत इकट्ठे करने का प्रयास किया। हमारा राष्ट्रीय चरित्र कुछ इस ढंग का बिगड़ा है कि आम जनजीवन से ईमानदार, देशभक्त, सत्यनिष्ठ जैसे अलंकरण अब गायब होते जा रहे हैं। किसी भी प्रकार से एक मुश्त संपत्ति अर्जित करने के लिये लोग अपने देश तक को बेचने के लिये तैयार है। माधुरी गुप्ता सहित वे मीरजाफर इसके उदाहरण है जिन्होंने हाल के वर्षो में अपनी सुविधा और अपने हित के लिये देश को तक बेचने का काम किया। मंजूनाथ की जब हत्या की गई तब ऐसा लगा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अब सरकार चेतेगी किंतु उस समय चंद लोगों को गिरफतार करने के बाद फिर सरकार ने पीछे नहीं देखा। भ्रष्टाचारियों के हौसले बढ़ते गये। तेल में मिलावट होती है यह देश का बच्चा- बच्चा जानता है। यूपी में संगठित ढंग से मिलावटखोरी के मामले प्रकाश में आने के बाद भी सरकार खामोश रही। वहां यह पता चला था कि यह गिरोह पूरे देशभर में सक्रिय है फिर भी तेल माफियाओं के सामने सरकार खामोश रही। महाराष्ट्र्र्र, गुजरात और अन्य कई प्रदेशों, यहां तक कि छत्तीसगढ़ में भी गरीबो को मिलने वाला मिट्टी तेल किस तरह माफियाओं के चंगुल में पहुंचता है और इसकी मिलावट किस तरह से पेट्रोल डीजल मे होती है यह जानते हुए भी प्रशासन इसलिये खामोश बैठा रहता है चूंकि इसमें बड़े बड़े सफेद पोश लोगों का हाथ है। इनकी गिरेबान पर हाथ डालने का प्रयास कोई नहीं करता। यशवंत सोनवने ने मिलवाटियों की कारगुजारियों का भंडाफोडऩे का प्रयास किया तो उसे गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जिंदा जला दिया गया। सोनवने की शहादत बेकार नहीं गई। सरकार ने मिलावटखोरों के खिलाफ महाराष्ट में जगह जगह छापे मारे कइयों को पकड़ा भी किंतु यह कहानी सिर्फ महाराष्ट्र तक ही क्यों सीमित रह गई? पूरे देश में क्यों नहीं तेल माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाया गया? क्या महाराष्ट्र की कार्यवाही को भी हम यह मानकर चले कि यह सिर्फ जनता के त्वरित आक्रोश को दबाने की एक कार्रवाई मात्र है! असल में ऐसी कार्रवाइयों में छोटी मछलियां ही जाल में फंसती है इसके पीछे जो बड़ा खेल चलता है इसकी डोर तो ऐेसे बड़े लोगों के पास रहती है जिसे कोई छू भी नहीं सकता। यह बड़े लोग इन छोटी मछलियों को आसानी से एक ही झटके में छुडा़कर ले जाती हैं। तेल की तरह देश में नकली दवा, नकली खाद्यान्न और अन्य अनेक नकली वस्तुओं का निर्माण कर आम लोगो के जीवन से खिलवाड़ करने वालों का गिरोह सक्रिय है। जब तक ऐसे लोगों को कठोर कानून के दायरे में नहीं लाया जायेगा तब तक हम इन बुराइयो को रोकने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

नाश्ते में चोरी, मारपीट...लंच में अपहरण-हत्या

रायपुर दिनांक 24 जनवरी 2011

नाश्ते में चोरी, मारपीट...लंच में अपहरण-हत्या
छत्तीसगढ़ बनी अपराध की मंडी!
पोह फटने के साथ ही अगर किसी शहर में अपराध का खाता खुल जाये तो यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उस शहर मे अपराध की दौड़ कितनी फास्ट होगी। रात गश्त(? ) पर निकले पुलिस वाले अभी उठ भी नहीं पाते कि चोरी-मारपीट की घटनाओं से उनका नाश्ता तैयार हो जाता है और रात तक अपराध के कई पकवान तैयार हो जाते है। पिछली रात छुरा गरियांबद में पत्रकार के खून से रंगी पिस्तौल से निकला खून अभी सूख भी नहीं पाया था कि रायपुर का डूमरतलाब पिस्तौल की धूं धू सेे कांप उठा। चौबीस घंटे के भीतर एक ही तरह की दो वारदातों ने पुलिस तंत्र को तो हिला ही दिया मगर सबसे ज्यादा दहशत में आम नागरिक है जो यह समझ ही नहीं पा रहा है कि छत्तीसगढ़ के शहरों में अचानक यह कौन सी आफत आन पड़ी है। बिलासपुर, रायपुर, छुरा तीन जगह एक ही तरह की वारदात- बिलासपुर में पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या, रायपुर में राजेश सिह डागा की गोली मारकर हत्या और छ़ुरा मे पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या लगभग लगभग एक ही तरह से हुई। कोई भी दो चके की गाड़ी पर नकाब लगाकर आपके- हमारे घर में घुस सकता है और किसी को भी अपनी गोली का निशाना बना सकता है। पुलिस की भूमिका वैसे घटना के बाद शुरू होती है किंतु वह उसमे भी फैल नजर आ रही है। अपराधी तत्वों के खिलाफ एहतियाती कदम मसलन किराये से घरों रहने वाले लोगों, होटलो-धर्मशालाओं, बसस्टैण्ड,रेलवे स्टेशन में घूमते अपराधियों पर कड़ी नजर रखी जाये व मजबूत पुलिस बंदोबस्त किया जाये तो काफी हद तक अपराधियों पर काबू पाया जा सकता है। पत्रकार सुशील पाठक मामले में पुलिस हाथ मलकर बैठ गई है। उमेश राजपूत मामले में उसे धमकी देने वाली महिला को जरूर पकड़ लिया गया है किेंतु शूटर कहां गये? डृमरतालाब रायपुर में राजेश सिंह डागा की गोली मारकर हत्या पुलिस के लिये इसलिये चुनौती बन गई चूंकि हत्यारों ने उसे मारने के लिये पुुलिस थाने से मात्र सौ मीटर दूरी को चुना। पुलिस का कहना है कि मृतक पर चंदन तस्करी का आरोप है, 2010 में उसके खिलाफ मामला दर्ज करने के बाद से वह फरारी के दिन काट रहा था। पुलिस इस बात के लिये भी जवाबदेह है कि एक फरार आरापी उसकी नाक के नीचे चमचमाती कार में घूम रहा है और उसे इस बात की जानकारी तक नहीं है। इससे इस बात का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में पुलिस का खुफिया तंत्र कितना मजबूत है? इन हत्याकांडों से यह भी स्पष्ट हो गया है कि सुपारी लेकर हत्या करने वालों को कोई खतरनाक गिरोह इस अंचल में सक्रिय हो गया है। चौबीस घंटे बाद गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित होने वाला है-इन घटनाओ के परिप्रेक्ष्य में इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि पुलिस कितनी मुस्तैद है। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के आपराधिक मंडी में अब हर किस्म के अपराधों की दुकाने सज गई है। अपहरण के बाद हत्या की भी कम से कम तीन ताजा वारदातें हो चुकी है। रीेतेश, दीपक और सत्यजीत तीन बच्चों की फिरौती के लिये मर्डर कर लाश को गटर में फेक दिया गया। कानून व्यवस्था पर एसी कमरों में बैठकर बड़ी बड़ी बात करने वालों के लिये अब यह जरूरी हो गया है कि वह मैदान मे आये और आम जनता को दहशत व अपराधियो से मुक्ति दिलायें।

शनिवार, 22 जनवरी 2011

हर भारतीय चाहता है चप्पे- चप्पे पर तिरंगा फहराये लेकिन बंदूक और तनाव के बीच नहीं!

रायपुर शनिवार 22 जनवरी 2011

हर भारतीय चाहता है चप्पे- चप्पे
पर तिरंगा फहराये लेकिन
बंदूक और तनाव के बीच नहीं!
छब्बीस जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर कश्मीर के लाल चौक में भाजपा द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने का निर्णय कश्मीर में लौट आई शांति को कितना कायम रख सकेगी यह अब सोचने का विषय बन गया है। हर राष्ट्रभक्त भारतीय चाहता है कि गणतंत्र पर भारत भूमि के चप्पे चप्पे पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाये लेकिन तिरंगा बंूदक और तनाव के बीच फहराये यह कोई नहीं चाहता। शायद इसी आशंका को लेकर कश्मीर के मुख्यमंत्री ने भाजपा से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की बात कही है। उन्नीस सालो में यह पहला अवसर था जब सन् 2010 में कश्मीर के लाल चौक में गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया। इसके पीछे छिपे कारण पर गौर किया जाना चाहिये कि तब अर्थात सन् 1991 से लेकर 2009 तक लाल चौक पर तिरंगा सेना पूरे लावलश्कर के साथ अपने अंदाज में फहराती रही है। बीजेपी और जम्मू कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस की तनातनी के बीच इस बार कश्मीर में विशेषकर लालचौक में तिरंगे का राजनीतिकरण कर दिया गया है। इस सारे फसाद की जड़ है जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का नेता मोहम्मद यासीन मलिक जिसने धमकी दी है कि 'हम देखेंगे 26 जनवरी को लाल चौक पर तिरंगा कौन फहराता है। इसका सीधा सीधा मतलब यह है कि वह वहंा बैठक्रर पूरे देश में को ललकार रहा हैं। उसकी इस ललकार को अगर चुनौती के रूप में स्वीकार कर आगे बड़े तो शायद इसका नुकसान हमकों ही होगा। जम्मू कश्मीर में अलगाववादियों को पाकिस्तान का सपोर्ट है उसी के बल पर वह इस प्रकार की ललकार कर रहा है। पाकिस्तान के हुकमरान देश में अशांति चाहते हैं यह अशातिं अगर जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश में इस मुद्दे को लेकर भडकाकर हो तो उन्हें क्या फरक पड़ता है? जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ माहों से जो हालात बिगड़े हुए थे उसमें कुछ सुधार आने के बाद अब पुन: इस मुद्दे को लेकर आग लगने की आशकां है। बीजेपी और जेकेएलएफ दोनों झंडा फहराने के मुद्दे को लेकर एक तरह से आमने सामने हैं दोनों के तेवरों के बीच उमर फारूख एक तरह से नर्वस नजर आ रहे हैं उन्होने कानून और व्यवस्था की स्थिति को बनाये रखने के लिये केन्द्र से मदद की गुहार लगाई थी जिसे केन्द्र ने उनसे खुद इस मामले से निपटने व जरूरत पडऩे पर मदद देने का आश्वासन देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। कश्मीर देश का अतिसंवेदनशील राज्य है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि लाल चौक पर तिरंगा फहराने से व्यवस्था बिगड़ सकती है । भारत का अभिन्न अंग होने के नाते तिरंगा फहराना जरूरी भी है। यह काम कश्मीर के लोगों को ही करना चाहिये। कश्मीर भाजपा को इसमें अहम भूमिका निभानी चाहिये न कि पूरे देश को इसमें इनवाल्व कर पाक को अपने मकसद पर कामयाब होने का मौका दें। केन्द्र ने इस मामले में जो निर्णय लिया है उसे सही माना जा सकता है चूंकि उमर वहां के हालातों को दूसरे से बेहतर समझते हैं। अगर कोई जबरन ऐसा करने के लिये उतावला हो तो इसकी गंभीरता को समझना चाहिये शायद यही कारण है कि एनडीए में बीजेपी के प्रमुख सहयोगी जेडी-यू के नेता शरद यादव ने भी बीजेपी से अपनी इस योजना को स्थगित करने को कहा है बीजेपी इसे स्थगित करने के मूड में नहीं दिख रही है। भारत के किसी भी भू-भाग पर तिरंगा फहराया जाना भारत के नागरिक होने के नाते किसी के लिए भी फक्र की बात होनी चाहिए। लेकिन क्या व्यक्ति से और व्यक्ति के लिए राष्ट्र है या फिर राष्ट्र से और राष्ट्र के लिए व्यक्ति है? अगर किसी जगह तिरंगा फहराने में कोई सवाल खड़ा हो रहा है तो क्या हमें उसे अपने देश की नाक का सवाल बना देना चाहिए? क्या हमारा लक्ष्य बस यह होना चाहिए कि लाल चौक पर किसी भी तरीके से तिरंगा फहर जाए, भले ही वह कश्मीर के साथ साथ देश की कई जिंदगियों की कीमत पर क्यों न हो?


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यूं कब तक तोड़ते रहेंगे घोटाला भवनों को? सरकार जप्त करें

रायपुर दिनांक 21 जनवरी


यूं कब तक तोड़ते रहेंगे घोटाला
भवनों को? सरकार जप्त करें
जमीन घोटाला अब अन्य घोटालों की तरह आम हो गया है। देश का सर्वाधिक चर्चित जमीन घोटाला है मुम्बई का आदर्श सोसायटी मामला । इस घोटाले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मामला सीबीाआई के हाथ में हैं और हाईकोर्ट ने एफआई्रआर दर्ज करने में देरी के लिये सीबीआई को फटकार लगाई है। सेना के पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर सहित कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के फलेट भी इस विवादास्पद सोसायटी में हैं। हाल ही केन्द्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने नियमों का हवाला देते हुए आदर्श घोटाले में लिप्त बहुमंजिले भवन को तीन महीने के भीतर गिरा देने का आदेश दिया है? सवाल यह है कि देश में भ्रष्टाचार या अवैध तरीके से बनने वाले ऐसे भवनों को क्या तोड़ देने से समस्या का समाधान निकल जायेगा? हम मानते हैं कि इसे बनाने में भ्रष्टाचार हुआ है। इसे बनने में देश का पैसा लगा है। बनाने वाले भी देश के लोग और इसमें लगा मटेरियल सीमेंट, और अन्य कच्चा माल भी देश का। विदेश से कोई चीज नहीं आई? क्या बिल्डिग़ं को तोड़ देने से भ्रष्टावार का अंत हो जायेगा और हां तो ऐसे सारे भवनो को तोड़ दिया जाना चाहिये। भ्रष्टाचारियो को सजा मिले यह प्रमुख उद्देश्य होना चाहिये- यह पहला अवसर नहीं है जब इस तरह भ्रष्ट या अवैध तरीके से बने भवनों को तोडने का फैसला लिया गया। देशभर में ऐसे कई भवनों को अवैध बताकर या कोई अन्य कारण बताकर तोड़ा गया। इन्दौर मे बने करोड़ों रूपये के भवनों को विस्फोट कर उड़ाया गया चूंकि इनका निर्माण अवैध तरीके से हुआ था। जब इन भवनों को बनाया जा रहा था तब सरकार कहां थी? क्यों नहीं इसपर संज्ञान लिया गया? क्यो भवनों के पूरा बनते तक चुप्पी साधी गई? स्थानीय लोगों व वहां काम कर रहे लोगों तथा संबन्धित सभी विभागों को इस बात की जानकारी रहती है कि जो कार्य हो रहा है वह गैर कानूनी व अवैघ है-उस समय इसे रोकने का आदेश क्यों नहीं दिया जाता ? भ्रष्टाचार या अवैध तरीके से निर्र्मित होने वाले हर गैर कानूनी कार्य में उपर से लेकर नीचे तक सभी संंबन्घित पक्षों का हाथ होता है। चाहे वह क्षेत्रीय जोन का स्वायत्त शासी कमीश्रर हो या मेयर अथवा इन सबके अधीन काम करने वाले कर्मचारी। प्रारंभिक सूचना देने वाले से लेकर सब ऐसे मामलो में दोषी होते हैं। एक सामूहिक जिम्मेदारी सभी लोगों पर निर्धारित कर यह व्यवस्था की जानी चाहिये कि जांच शुरू करते ही इन सबकी नौकरी खत्म की जाये ताकि यह जांच को किसी प्रकार प्रभावित न कर पायें। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम यही है कि ऐसे बने किसी भी भवन अथवा कालोनी को नेस्तनाबूत करने की जगह उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाये। इसका उपयोग सरकार के किसी कार्यालय अथवा अन्य उपयोग के लिये किया जा सकता है। ऐसे भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को जेल भेजना तीसरा कदम होना चाहिये।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

यूं ही दबकर रह जाती है, केन्द्र में राज्य की आवाज!

रायपुर दिनांक 19 जनवरी 2011

यूं ही दबकर रह जाती है,
केन्द्र में राज्य की आवाज!
अगर राज्य कहे कि उसकी बात केन्द्र नहीं सुनता तो इसमें विश्वास न करने वाली बात ही नहीं है चूंकि केन्द्र और राज्य में दो विपरीत विचारधारा वाली सरकार है। जब ये बैठते हैं तो वे इनकी नहीं सुनते और जब वो बैठते हैं तो यह भी उनकी नहीं सुनते-सत्ता के समीकरण में यह खेल कई वर्षो से चला आ रहा है। इस खेल का शिकार उस राज्य के नागरिक होते हैं। सरकारें बनने के बाद पूर्व सरकार के निर्णय तक को बदल देती हैं चाहे वह जनता के हित मे हो या नहीं। विपरीत विचारधारावाली सरकार और केन्द्र के बीच सामंजस्य बिठाना बहुत कठिन काम है फिर भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने अपने व्यक्तित्व के आधार पर बहुत ताल मेल बिठाला है। उन्होनें केन्द्र से न केवल मदद हासिल की है बल्कि केन्द्र से अपने कार्यो की वाहवाही भी लूटी है इसके बावजूद केन्द्र से राज्य को जो मदद व सुविधाएं मिलनी चाहिये वह अब तक राज्य को उपलब्ध नहीं हो रही। रेलवे के लिये जो मांग राज्य से की जाती है उसमें से बहुत कम ही स्वीकार की जाती है। पर्यावरण मंत्रालय से हरी झंडी नहीं मिलने के कारण कई सिंचाई व विद्युत परियोजनाएं अटकी पड़ी है। सड़क परिवहन विभाग कई राज्यों में सड़क को विदेशी पेटर्न पर विकसित कर रहा है किंतु छत्तीसगढ इस मामले में अभी भी पिछड़ा है। कृषि से संबन्धित कई योजनाओं पर भी केन्द्र की मदद न के बराबर है। केन्द्र से जो मदद अब तक मिलनी चाहिये थी उसमें से अधिकांश का कोई अता पता नहीं है। राज्य सरकार को विकास कार्यो के लिये अब तक इतना पैसा मिल जाना चाहिये था कि वह एक लाख तीन हजार पांच सौ करोड़ रूपये का काम कर सके किंतु उसने इस ओर ध्यान ही नही दिया। मुख्यमंत्री दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं से नौ महीने मे डेढ़ दर्जन बार मिल चुके हैं लेकिन इसका कोई बड़ा फायदा उन्हें मिला हो यह नहीं कहा जा सकता। राज्य का विकास होना है उसमें केन्द्र की अहम भूमिका है। वैसे छत्तीसगढ स्वंय इस मामले में सक्षम है मगर राज्य के उत्पादन का बहुत बड़ा हिस्सा केन्द्र के खाते में चला जाता है। केन्द्र की पहली प्राथमिकता अपनी पार्टी और सहयोगी पार्टी की राज्य सरकारों को मदद पहुंचाने की रहती है। विपरीत विचारधारा वाली सरकारों को मदद देने का मामला बचा कुचा जो रह जाता है, उसी को देने का रहता है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि छत्तीसगढ़ की आवाज को यहां मौजूद कां्रग्रेस के शक्तिशाली नेता भी दिल्ल्री में बुलंद नहीं करते, अगर करते भी है तो उसकी मानिटरिंग नहीं होती और मामला यूं ही दबा रह जाता है। पिछले कई सालों से केन्द्रीय मंत्रिमंडल में किसी निवाॢचत प्रतिनिधि को अंचल से स्थान भी नहीं मिला है, इसा बार भी झुनझुना दिखा दिया गया। अक्सर कांगे्रस के लोग केन्द्र में अपने आकाओं के पास राज्य की समस्या को ले जाने की जगह अपनी व्यक्तिगत समस्या या फिर पार्टी के अदंरूनी झगड़ो को लेकर ही पहुंचते हैं। आम जनता से जुडी समस्या को पुख्ता तौर पर इन वर्षो में कभी उठाया हो इसकी जानकारी नहीं।

रविवार, 16 जनवरी 2011

सड़कों पर खूनी खेल...

रायपुर दिनांक 15जनवरी 2011
सड़कों पर खूनी खेल... न कभी
किसी ने रोका, न ही रोक सका!
रात दस- ग्यारह बजे के बाद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सड़कों, पर खूनी खेल चलता है, यह खेल अग्रेयास्त्र से हो सकता है तो चाकू या फिर किसी खूनी वाहन से! कालोनियां, गली मोहल्ले भी इससे अछूते नहीं हैं। तेज वाहन हिट एंड रन का खेल खेलते हैं तो चाकूबाज और अग्नेयास्त्र से लैस लोग किसी का भी शिकार कर सकते हैं। दस बजे के बाद रायपुर का प्रशासन रिंग रोड़ से गुजरने वाली ट्रकों को भी रायपुर से घुसने की इजाजत दे देता है-यह वाहन तो शहर में धुसने के बाद सड़कों को अपनी जागीर समझ लेते हैं। इस दौरान शहर के बाहर बने ढाबों से खा पीकर लौटने वाले किस ढंग से गाड़ी चलाते हैं यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। बुधवार को जो हादसा शहीद स्मारक के पास से शास्त्री चौक के बीच हुआ वह रायपुर के लिये कोई नई बात नहीं। पांच महीने पहले शंकर नगर में बुलेरों से इसी प्रकार एक दंपत्ति कुचलकर मार दी गई थी। राजातालाब, लालगंगा शाप, कोटा-गुढियारी मार्ग, जेल रोड़ पर देवेन््र्रद्र नगर चौक, तेलीबांधा, फाफाडीह में हुई घटनाओं को कोई भूल नहीं सका। हत्या करने वाले को उम्र कैद या फांसी की सजा होती है किंतु लापरवाही से गाड़ी चलाकर खून करने वाला सस्ते में निपट जाता है। दुर्घटना पीडि़त परिवार को अपने से बिछुडने का गम और अकेले जिंदगी बिताने की सजा। अक्सर एक्सीडेंट के मामले में ड्रायवर इसलिये गाड़ी नहीं रोकता चूंकि उसे इस बात का डर लगा रहता है कि कहीं उसने गाड़ी रोक दी तो उसे इसका खामियाजा लोगो के गुस्से से भरना पड़ेगा। दुर्घटनाएं जानबूझकर नहीं होती लेकिन दुर्घटना हो जाने के बाद तकलीफ तो चलाने वाले को भी होती है चूंकि वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता। दुर्घटना के बाद वह अगर मदद के लिये गाड़ी से उतरा तो उसकी खैर नहीं जैसा कि हाल ही हुए हादसे से साफ जाहिर है। उसके पास सिर्फ हिट एंड रन के सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं रह जाता। डरा हुआ ड्र्रायवर भीड़ अथवा पुलिस कार्रवाही से बचने के लिये भागने में ही अपनी भलाई समझता है। इसी दौड़ में कई लोगों की जान चली जाती है। यूपी में एक बस ने करीब अट्ठारह लोगों को कुचल दिया था। रायपुर में ऐसी घटनाओ का इतिहास रहा है। टाटीबंद में आज से कम से कम पच्चीस तीस साल पहले भारत माता स्कूल के सामने ट्रक ने एक स्कूली बच्चे को कुचलने के बाद दो अन्य लोगों को कुचल दिया था। ऐसा ही हादसा सीएसईबी चौक जीई रोड़ पर हुआ था जब यहां एक साथ आजाद चौक थाने के दो पुलिस अधिकारियों को रात में रौंद दिया गया। इसी स्पाट में डगनिया की वैज्ञानिक पाध्ये दंपत्ति भी ट्रक की खूनी चपेट में आकर मारी गई। इतने वर्षो बाद भी रायपुर के कर्ताधर्ताओं ने घटनाओं को टालने कोई प्र्रबंध नहीं किया। वर्षो से चले आ रहे हिट एंड रन के अलावा भी रायपुर की सड़के गुडंा व असामाजिक तत्वों की हरकतों से रक्तरंजित होती रही हैं। पुलिस अगर एहतियात बरते तो कई घटनाओं को टाला जा सकता है।

मंहगाई का तमाशा.. सरकार कहां?

रायपुर दिनांक 16 जनवरी


मंहगाई का तमाशा.. सरकार कहां?
क्या करें गरीब! मुश्किल में इंसान
जनता गले तक मंहगाई में डूबी हुई है, उसका दम घुट रहा है और भारत के वित्त मंत्री कह रहे ह-ैं 'घबराने की जरूरत नहीं हैंÓ। दूसरी ओर कृषि मंत्री शरद पवार का कहना हैं कि देश में महंगाई बढऩे का उनके विभाग से कोई लेना देना नहीं। इस बीच पेट्रोलियम कंपनियों ने आव देखा न ताव एक माह में दूसरी बार पेट्रोल के भाव में ढाई रूपये की वूद्वि कर दी। पिछली बार भी लगभग इतनी ही वृद्वि की गई थी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली दावड़ा हाथ धोकर बैठ गये हैं। आखिर जनता किसके पास जाये? ईमानदारी से काम कर मासिक वेतन पाने वाला इंसान तो समझों मर गया। मंहगाई तो उसे मार ही रही है साथ ही अगर वह बीमार पड गया तो डाक्टर और दवा कंपनियां उसे मार डालेंगी। एक चिकित्सक आज सिर्फ जांचने का दो से लेकर ढाई सौ रूपये तक लेता है तभी वह आसमान छूती जीवनरक्षक दवाएं लिखकर देता है। आखिर क्या करें हम? सरकारों ने हमें किस हालात में लाकर छोड़ दिया है? बाजार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो आज एक मध्यम वर्गीय उपभोक्ता कुछ मामूली दाम देकर खरीद सकें। सरकार जहां मंहगाई पर अपना नियंत्रण खो चुकी है वहीं राज्य सरकारें और उनके अधिस्थ संस्थाएं आम आदमी को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। वेट लगाकर राज्य सरकारें पेट्रोल व पेट्रोलियम उत्पादों को और बढऩे में मदद कर रही हैं। स्वायत्त शासी निकाय ने जहां पीने का पानी तक मंहगा कर दिया है वहीं बिजली वालों ने घरों में अंधेरा करने में अब कोई कसर नहीं छोड़ी है। बिजली के दामों में अनाप- शनाप वृूद्वि हाल ही की है। गरीबों का हितैषी बनने वाली सरकार यह नहीं देख रही कि गरीबी मिटाने के नाम पर वह किसका भला कर रही हैं? गरीब अगर अपने 'मोटर सायकिलÓ में चालीस किलो चावल और अन्य कम कीमत में बंटने वाली सामग्री को भरकर ले जाये तो क्या उसे गरीब कहा जायेगा? यही हो रहा है... राज्यो में इसकी माँनिटरिगं की कोई व्यवस्था नहीं है। राजा का चावल,दाल और अन्य सुविधाओं का लाभ वे लोग उठा रहे हैं जो शक्तिशाली हैं। गरीब कहां है किसी को पता नहीं, गरीब कौन है उसकी कोई परिभाषा नहीं, असल गरीब के घर में खाने का अनाज नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, वह फुटपाथ पर सोया है। उसकी योजनाओं पर गरीब के नाम पर गुण्डे और मवाली मोज कर रहेे हैं। क्या व्यवस्था है?
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की मनमानी हद को पार कर रही हैं। विपक्ष इसकी आड़ में राजनीतिक रोटी सेकने में लगा है। सरकार मौन सादे सारा तमाशा देख रही है।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

न बच्चे सुरक्षित, न महिलाएं-

रायपुर दिनांक 11 जनवरी

न बच्चे सुरक्षित, न महिलाएं-गुण्डों की
नई पौध पुलिस से ज्यादा होशियार!
रितिक, रौशन, और सत्यजीत के बाद अब और न जाने कितने...?कौन देगा छत्तीसगढ़ के पालकों को गारंटी कि उनके बच्चे स्कूल या धर अथवा खेल के मैदान में सुरक्षित हैं। किसी को पैसे की जरूरत हो तो बच्चा पकड़ लाओं और खेल खलों फोन से जुए का-पैसा मिल गया तो ठीक वरना किसी गटर में अपने प्यारे बच्चे की सड़ी गली लाश ले जाओ..यह कैसी स्थिति बना दी गई है छत्तीसगढ़ में। कौन जिम्मेदार है, इसके लिये? संपूर्ण राज्य में अपराधियों ने एक तरह से अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। जो अपराध राज्य बनने के पहले नहीं होते थे वे भी अब फल फू ल रहे हैं। महिलाएं बच्चे कोई सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं के गले से कभी भी चैन खीच ली जाती है तो कभी भी उन्हें कोई मजनू सड़क पर बेइज्जत कर देता है। छेड़छाड़ की घटनाओ से तंग युवतियों को अपनी जान तक गवानी पड़ी है। छत्तीसगढ़ पुलिस में ढेर सारी महिला पुलिस कर्मियों की नियुक्ति के बाद भी न महिलाएं सुरक्षित हैं और न ही बच्चे। राजधानी रायपुर, बिलासपुर,अंबिकापुर, रायगढ, कोरबा, भिलाई सब आपराधिक गतिविधियों के केन्द्र बन गये हैं। एक अपराध के बाद पुलिस की मीटिंग होती है। अफसर अपने छोटे अफसरों को उपदेश देते हैं मीटिंग खत्म होते ही दूसरा क्र ाइम जांच के लिये तैयार रहता है। अपराधियों की पकड़ के लिये पुलिस गली मोहल्ले में घूमकर अपराधियों को खोजने की जगह मैन रोड़ पर बे्रकर लगा आम लोगों की जेब को टटोलकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। पुलिस व्यवस्था का ऐसा बुरा हाल इससे पहले कभी नहीं हुआ शायद यही कारण है कि शहरों की कालोनियों के आसपास ऊग आये नये गुण्डे और अन्य आपराधिक पौध की कोई जानकारी उनके पास नहीं है। पुलिस को यह भी नहीं पता कि आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों की आवक -जावक के कारण कई कालोनी के लोगो को दिन में भी अपने मैन गेट का ताला बंद रखना पड़ता है तथा महिलाएं घरों में कैद होकर रह जाती हैं। आपराधिक गतिविधियों के कारण लोगों का अपने बच्चों को जहां भारी सुरक्षा के बीच रखना पड़ रहा है वहीं घर की संपत्ति की सुरक्षा भी चिंता का कारण बनी हुई है। सबसे ज्यादा खतरा कालोनियों के आसपास की बस्तियों में पैदा हुए नये बच्चों से हो गया है जो किसी के नियंत्रण में नहीं हैं। सरकार का सस्ता अनाज खाकर ऐसे कतिपय लोग बच्चों को न स्कूल भेजते हैं और न उनकी बाहर की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। छोटी छोटी चोरी की अधिकांश घटनाओं में इन्हीं का हाथ होता है जिसकी रिपोर्ट लिखाने भी कोई नहीं जाता चूंकि सब जानते हैं कि इससे कुछ होना जाना नहीं। बड़े किस्म के अपराध और धरेलू हिंसा की भी बाढ़ आई हुई है।

एक दाढी ने क्या उड़ाया गवर्नर को,सारे दाढियों पर आई पाक में आफत!

रायपुर सोमवार दिनांक 12 जनवरी 2011

एक दाढी ने क्या उड़ाया गवर्नर को,सारे
दाढियों पर आई पाक में आफत!

दाढी वाला, मूछवाला, मोटू, लम्बू, थोंधवाला, टिग्गू, फेटे वाला,चेन्दुआ, टकलू,कालू, गोरू।यह कुछ उपमाएं हैं जो लोगो को उनके रूप रंग और व्यक्तित्व के आधार पर मिलती है। लोगों ने अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार लोगों को यह उपनाम दे रखे हैं। ऐसी उपमाएं सिर्फ हमारे देश मे ही नहीं पडौस के देशों और यहां तक कि अंगे्रजों के देश में भी दी जाती हैं। इन उपमाओं को लोग उनके असली नाम की अपेक्षा जल्दी समझ जाते हैं। यह जिक्र इसलिये आया कि हाल ही पाकिस्तान में पंजाब सूबे के गवर्नर रहे सलमान तासीर की हत्या कर दी गई हत्या जिसने की वह एक सुरक्षा कर्मी था तथा दाढ़ी रखे हुए था। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में इस हत्याकांड के बाद सुरक्षा के लिहाज से माहौल तेज़ी से बदल रहा है वहां सरकार ने अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में तैनात 10 दाढ़ी वाले सुरक्षा कर्मियों को ड्यूटी से हटा दिया है। पंजाब सरकार ने नए सिरे से एलीट फोर्स के जवानों की जांच शुरू की है ताकि आगे तासीर की हत्या जैसी कोई वारदात न हो। पाकिस्तान में वीआईपी सेक्योरिटी के लिए गठित की गई एलीट फोर्स की एक विशेष जवानों और अधिकारियों की जांच कर रही है ताकि उनकी गतिविधियों और धार्मिक रूझान के बारे में पता लगाया जा सके। तासीर की हत्या के बाद शीर्ष नेताओं खासकर उदारवादी नेताओं को खतरा महसूस हो रहा है। कुछ दिनों पहले तासीर के अंतिम संस्कार (सुपुर्द-ए-खाक) में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इसी डर से सुपुर्द ए खाख कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया था। पाकिस्तानी हुकमरानों को दाढ़ी बढायें हुए सुरक्षा कर्मियों से खतरा महसूस हो रहा है। यह दिलचस्प है कि पाकिस्तान में अधिकांश सुरक्षा कर्मी ढाढ़ी वाले हैं वहां किस किस को हटायेंगें?हमारे देश में वैसे दाढ़ी का कोई रोना नहीं हैं यह रोना है थोधं वाले अफसरों व जवानों का। पुलिस फोर्स में थोंदू अफसरों व कर्मचारियों की संख्या बढ़ रही है। कई टिग्गू व लम्बू भी घुस गये हैं। वैसे इनमें लम्बू से कोई परेशानी नहीं है लेकिन ठिगने या टिग्गू कहीं नजर नहीं आते। भारतीय वायु सेवा में तो एयर होस्टेस अगर मोटी होने लगी तो उसकी छुट्टी कर दी जाती है। हाल ही एक ऐसी मोटी एयरहोस्टेस ने अपने आपको निकाले जाने के बाद मुकदमा लड़ा और जीतकर वापस आई। दूसरा बड़ा भेद शरीर के रंग का है।काला है तो कल्लू और गोरा हुआ तो गोरूआ जैसे उपनाम देकर लोगों को अन्य समुदाया से दूर करने का प्रयास किया जाता है। जहां तक पाक में दाढ़ी वाले पुलिस कर्मियों का सवाल है उनके सामने तो तासीर हत्याकांड के बाद आफत ही आन पड़ी है। बिना दाढ़ी रखे लोगो पर पाक वीआईपी मेहरबान है उनसे उनको कोई खतरा नजर नहीं आता। पाक के हिसाब से हम चलते तो शायद हमारे देश में ऐसा कितना ही झमेला हो जाता जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर की इसी हफ्ते मंगलवार को उनके ही सुरक्षाकर्मी ने हत्या कर दी थी। सुरक्षाकर्मी मुमताज हुसैन कादरी को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। हमलावर ने गवर्नर सलमान तासीर के काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें उनकी मौत हो गई थी। कादरी पाकिस्तान में एलीट कमांडो फोर्स का जवान था। पाकिस्तान में कई उदारवादी नेताओं की हत्या की जा चुकी है। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर, बलूचिस्तान के नेता नवाब अकबर बुगती जैसे कई लोग शामिल हैं।

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

भ्रष्टाचार में अर्जित संपत्ति

रायपुर दिनांक 8 जनवरी 2011

भ्रष्टाचार में अर्जित संपत्ति अब जनता के खजाने
में, बिहार में कानून, केन्द्र भी होगा सख्त!
भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखे गये मैरे प्राय: सभी आलेख में मैं शुरू से ही यह सुझाव देता आया हूं कि पहले उपाय के तौर पर सरकार को भ्रष्ट लोगों की संपत्ति जप्त कर लेनी चाहिये, लगता है जनता की तरफ से उठी मैरी आवाज सरकार तक पहुंच गई है और इस सुझाव पर इस वर्ष पूरे देश में अमल हो जाये तो आश्चर्य नहीं। बिहार सरकार ने सन् 2010 से इसपर अमल शुरू कर दिया है। विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत के बाद तो नितीश कुमार की सरकार इस मामले में और कड़क हो जाये तो आश्चर्य नहीं। भ्रष्टाचार से सारा देश पीडि़त है और अगर इसपर नियंत्रण की शुरू आत बिहार से हो जाये तो इसे एक अच्छा संकेत ही माना जायेगा। केन्द्र सरकार इस साल के शुरू होने के साथ भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिये एक अध्यादेश की बात कर रही है लेकिन अध्यादेश लाने में समय लग सकता है। भ्रष्ट नौकरशाहों और राजनेताओं की भ्रष्टाचार से बनाई गई संपत्ति को जप्त करना सर्वाधिक उचित उपाय है बिहार में इसकी सफलता से यह साल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे में नई उम्मीदें जगाती है। केन्द्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने भी मनी लांड्रिगं- [अवैध संपत्ती को वैध बनाना] रोकने के कानून के तहत काली कमाई से बनाई गई संपत्ति को जब्त करना शुरू कर दिया है। मनी लांड्रिगं कानून के शिकार झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोंडा और उनके पांच अन्य साथी हुए हैं। सन् 2009 में उनकी अवैध कमाई की संपत्ति को जप्त कर ली गई। इसी वर्ष किडऩी बेचकर अवैध कमाई करने वाले डाक्टर अमित कुमार को भी मनी लांड्रिगं कानून के तहत लाया गया और उनकी संपत्ति जप्त कर ली गई। डाक्टर की तो आस्ट्रेलिया की संपत्ति भी जप्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।आजादी के बाद से अब तक भ्रष्टाचार के मामले में कई लोग पकड़े गये, उनके पास अवैध संपत्ति है इसका भी पता चला, उनमें से कइयों को सजा भी हुई किंतु किसी की संपत्ति जप्त होने के बहुत कम मामले हुए। सन् 2010 में मनी लांड्रिगं के कम से कम 1500 मामले दर्ज हुए हैं। केन्द्र सरकार अगर अध्यादेश के माध्यम से यह कड़ा कानून बनाती है तो बहुत हद तक भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जप्त करने के साथ साथ कानून में यह प्रावधान भी किया जाना चाहिये कि भ्रष्टाचारी भविष्य में किसी सरकारी अर्धसराकरी या प्रायवेट नौकरी में सेवा न दे सकें। उसे तो मत देने के अधिकार से भी वंचित किया जाना चाहिये। हमारे कानून में भ्रष्टाचारी को मौत की सजा देेने का प्रावधान नहीं है लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से ऐसे व्यक्ति को जेल के सीकचों में बंद किया जा सकता है। केन्द्र द्वारा भ्रष्टाचार से निपटने जो अध्यादेश लाने वाला है उसमें किन नियम कानून का उल्लेख होगा यह तो अभी पता नहीं चला लेकिन यह तो तय दिख रहा है कि यह कानून भी बिहार के कानून की तर्ज होगा। अगर ऐसा हुआ तो देश में भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक अंकुश लग जायेगा लेकिन सरकार को निष्पक्ष होकर उन सभी राजनेतााओं, नौकरशाहों और अन्य अपराध में लिप्त लोगों पर हाथ डालना चाहिये जो देश को खोखला करने में लगे हुए हैं।

खूब ठंड, खूब बारिश, खूब गर्मी

रायपुर बुधवार दिनांक 5 जनवरी 2011

खूब ठंड, खूब बारिश, खूब गर्मी
अलग अलग रूपों में प्रकृति!
पारे का उतार चढ़ाव मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों दोनों को आश्चर्य चकित कर रहा है। विश्व में बरसात के बाद इस मौसम में इतनी ठंड पडी है कि बर्फ की चादर से सारा इलाका ढक गया। ठण्ड से देश व विदेश में कई लोगों की मृत्यु भी हुई है। गर्मी के दिनों में भी इसका उलटा था गर्मी इतनी पड़ी कि लोगों का जीना मुश्किल हो गया। पारा 53 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच गया। पिछले वर्ष बारिश ने भी ऐसा कहर ढाया कि दुनिया के कई देशों में जनधन की भारी बर्बादी हुई। कहा यही जाता है कि गर्मी ज्यादा पड़ी तो बारिश अच्छी होगी और बारिश अच्छी होगी तो ठंड भी ज्यादा पड़ेगी। बारिश के मौमस के बाद आई इस बार की ठंड ने शुरू से भारत के उत्तरी राज्यों में कहर ढाना शुरू कर दिया था। देश का उत्तरी भाग अब भी सिकुड़ रहा है लेकिन दक्षिण में इस मौसम में भी इतनी गर्मी पड़ रही है कि लोगों को बदन से कपड़े उतारने पड़ रहे हैं। एक ही देश में मौसम की दो परिस्थितियां -यह कोई नई बात नहीं है,गर्मी के मौसम में भी ऐसा ही होता है जब देश के कई इलाकों में भारी बारिश होती है। मौसम वैज्ञानिक इन बदलावों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं लेकिन प्रकृति के रहस्यों के आगे अब तक हमारा वैज्ञानिक तंत्र बौना है। देश में जहां एक तरफ ठंड है तो दूसरी तरफ देश के अंदर मौजूद हमारे इस छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ में मौसम की दोगली परिस्थितियां विद्यमान है यहां एक तरफ बर्फ की चादर बिछी हुई है तथा तापमान शून्य डिग्री से नीचे चला गया है तो कुछ इलाको में उतनी ज्यादा ठण्ड और बर्फ जमने जैसी स्थिति नहीं है। अगर पिछले साल से अब तक का आंकलन करें तो जहां भीषण गर्मी ने लोगो को हर दृृष्टि से हिलाकर रख दिया वहीं जब बारिश हुई तो छत्तीसगढ़ के नदी, नाले, बांध सभी लबालब हो गये। खेतों में खड़ी फसल को भी नुकसान हुआ। भारी और अच्छी बारिश का ही परिणाम है कि इस बार पिछले कई वर्षाो के मुकाबले अच्छी ठंड पड़ी। छत्तीसगढ का प्राय: हर क्षेत्र इस समय अच्छी ठण्ड से सिकुड़ रहा है। मैनपाठ में जहां पारा शून्य से नीचे चला गया है तो अंबिकाुपर सहित कई क्षेत्रों में शीतलहर से लोग ठिठुर रहे हैं। सरगुजा के मैनपाट में पूरी पहाड़ी जहां बर्फ की चादर से बिछी नजर आई वहीं चिल्फी घाटी में भी जगह जगह सफेदी सी छा गई है। सरगुजा शहर का न्यूनतम तापमान जब 2.7 डिग्री हो सकता है तो अंदाज लगाया जा सकता है कि आसपास के पहाड़ी क्षे9ों की क्या स्थिति होगी। जशपुर मे तापमान 2.0 तक पहुंच गया। पूरे देश के उत्तरी हिस्सों की ओर एक नजर डाले तो कश्मीर, पंजाब,हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में शीतलहर से लोग ठिठ़ुर रहे हैं वहीं जम्मू में बर्फबारी हो रही है। प्रकृति पर अध्ययन करने वालों का निष्र्कर्ष भले ही जो निकले मगर इस परिवर्तन के लिये बहुत हद तक हरियाली जिम्मेदार हैं जहां जहां हरियाली है वहां मौसम खुशनुमा है और जहां वन व पेउ़ काट दिये गये हैं वहां प्रकृति अपने वास्तविक रूप से अलग हटती जा रही है। पर्यावरण पर अब विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

छत्तीसगढ़ के शहरों में चोर-पुलिस का हाईटेक ड्रामा, पिस रहे हैं लोग!

रायपुर दिनांक 7 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ के शहरों में चोर-पुलिस
का हाईटेक ड्रामा, पिस रहे हैं लोग!
लकड़ी चोर को चौकीदार ने चोरी करने से ललकारा तो उसने उसका हाथ ही काट डाला, यह घटना हुई कोरिया के बंैकुठपुर में। राजधानी रायपुर में एक चोर का साहस देखिये कि वह पूर्व पुलिसवाले के घर ही चोरी करने पहुंच गया। एक अन्य मामला आमानाका थानान्तर्गत पार्थिवी पैसिफिक और मारूती इनक्लेव कालोनी में हुआ जहां चोर या डकैत जो भी हो, विरोध करने पर चौकीदार को बंधक बना लिया। कालोनी वालों को तो छोडिय़े पुलिस वालों से ही भिड़ गये चोर। उन्हें पत्थर मारकर दौड़ाया। कलेक्टर ने एक चोर को जिला बदर किया है जिसपर चोरी के दस मामले हैं। ऐसे कितने ही चोर जगह जगह उत्पात मचाये हुए हैं। राजधानी रायपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में चोरी अब एक व्यवसाय बनता जा रहा है। जिसमें बच्चों से लेकर युवा और अधेड़ तक शमिल हो गये हैं। जो पकड़ा गया वह चोर वरना ऐसे लोग अपना काम धडल्ले से किसी के भी घर को अपना निशाना बनाकर कर रहे हैं। पुलिस चोरों के इस बदलते रूख पर हाथ पर हाथ धरे बैठने के सिवा कुछ नहीं कर पा रही है। एक गिरोह नेस्तनाबूत हो जाता है तो उसकी तस्वीर पुलिसवालों के साथ फोटो सहित छप जाता है वरना चोर अपना काम कर रहे हैं। पुलिस ने चोरी के मामले में अपने हाथ खड़े कर दिये हैं। थक हारकर वह अब मोहल्ले वालों पर चोरी व अन्य अपराध रोकने की जिम्मेदारी थोपने के प्रयास में हैं। कुछ थाना क्षेत्रो में वहां के लोगों को लेकर बैठके भी हुई हैं। चोरी पकडऩे का काम पुलिस से ज्यादा आम लोग ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं बशर्ते वे चौकस रहे किंतु आवेश में आकर लोग चोर की इतनी पिटाई कर देते हैं कि उसका दम ही निकल जाता है फिर शुरू होता है पुलिस का नया नाटक जिसमें चोर को पीटने वाले पिसते हैं। जब ऐसी स्थिति आती है तो नागरिक इस कार्य को स्वंय करने की जगह पुलिस के पाले में फेक देते हैं। आज की स्थिति यह है कि चोर अपना काम कर रहे हैं और पुलिस अपना। दोनों के कार्य करने के तरीके में इतना अंतर है कि चोर व अन्य अपराधी पुलिस से आगे निकल गये। चोरों के डर के मारे कोई भी अपना घर थोड़ी देर के लिये भी सूना छोड़कर नहीं जा सकता। चोरों को यह मालूम रहता है कि किसके घर में कितना माल मिलेगा। चोरी करने वाले घरों मेंं घुसते हैं और उनकी नजर घर पर रखे सामानों को छोड़कर नगदी और सोने, चांदी पर रहती है। चोरों में बड़े युवा चोरों के अलावा कुछ बच्चे भी शामिल हैं जो खुला दरवााजा देखकर आसानी से घुस जाते हैं और जो हाथ में मिला लेकर भाग जाते हैं। बड़ी चोरी हुई तो लोग पुलिस में रिपेार्ट दर्ज करा देते हैं मगर छोटी चोरी में लोग पुलिस के पास इसलिये रिपोर्ट लिखाने नहीं जाते क्योंकि वे जानते हैं कि इसका कोई संज्ञान पुलिसवाले लेेने वाले नहीं। चोरी व अपराध की अन्य वारदातों के परिपे्रक्ष्य में पुलिस का जो दबाव है वह चौक-चौराहों तक ही सीमित होकर रह गया है। घटनाएं अक्सर कालोनियों में और प्रमुख मार्ग में रात को सुनसान पड़ी दुकानों में होती हैं जहां चोर आसानी से अपना काम करके निकल जाते हैं। चोर कोई बाहरी दुनिया से आया व्यक्ति नहीं होता। समाज के भीतर ही वह मौजूद है पुलिस केकई लोग इन्हें जानते व पहचानते हैं जब तक यह मित्रता कायम रहेगी चोरी पर अंकुश नहीं लग सकता।

शनिवार, 1 जनवरी 2011

आरूषी-हेमराज हत्याकांड-सीबीआई क्यों पीछे हटी-आखिर हत्यारा कौन?

रायपुर शनिवार दिनांक 1 जनवरी 2011

आरूषी-हेमराज हत्याकांड-सीबीआई
क्यों पीछे हटी-आखिर हत्यारा कौन?
चार दीवारी के भीतर चार लोग, इसमें से दो की हत्या, एक मरने वाला घर का नौकर-दूसरा घर की बेटी। कौन हो सकता है हत्यारा? नोएड़ा का आरूषी हेमराज हत्याकांड दो साल से इसी सवाल पर उलझा हुआ है। पहले लोकल पुलिस फिर सीआईडी और बाद में देश की सबसे बड़ी व अधिकार प्राप्त गुप्तचर एजेंसी -'सीबीआइर्Ó। कभी घर के नौकर पर संदेह तो कभी बेटी के बाप पर तो कभी कंपाउडंर और दूसरे के घरों में काम करने वाले नौकरों पर! इन संंदेहों के आधार पर सीबीआई ने पूछताछ के नाम पर कई लोगों को हिरासत में लिया, नारकोटिक्स टेस्ट से गुजारा और हत्या का आरोपी बनाकर जेल में भी ठूस दिया किंतु नतीजा यही निकला कि इनमें से कोई नहीं। अगर इनमें से कोई नहीं तो हत्या किसने की? सीबीआई ने सबूत नहीं मिलने की बात कहते हुए इस हत्याकांड के खुलासे पर घुटने टेक दिये। सीबीआई इस मामले में आगे जांच नहीं करना चाहती। ताजा घटनाक्रम के अनुसार देशभर में सीबीआई के इस कदम की छीछालदर होने के बाद विधिमंत्री वीरप्पा मोइली ने सीबीआई चीफ को बुलाकर जांच जारी रखने की बात कही है। सीबीआई की अब क्या भूमिका होगी इसका खुलासा अभी नहीं हुआ है लेकिन हमारे देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी की मजबूरी का यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले जसिका लाल हत्याकांड में भी सीबीआई की भूमिका कुछ इसी तरह की थी जिसमें बाद में अपराधी को पकड़कर कोर्ट में पेश कर उसे सजा दी गई। रूचिका गिरहोत्रा हत्याकांड में भी सीबीआई ने हाथ खड़े कर दिये थे फिर निठारी में कई बच्चों की हत्या मामले में नौकर सुरेन्द्र कोली के मत्थे सारा दोष मढकर मोनिन्दर सिंह पंढेर को पतली गली से लगभग बाहर कर दिया गया। आरूषी-हेमलाल हत्याकांड मामला यद्यपि अब खत्म करने के लिये अदालत में पहुंच गया है किंतु सीबीआई की नोट शीट में जो तथ्य उजागर हुए हैं वह आरूषी के पिता राजेश तलवार और उनकी पत्नी नूपर तलवार की और केन्दित हो रहे हैं जो यह बता रहे है कि राजेश तलवार ने आरूषी के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को प्रभावित किया। यह हत्याकांड शुरू से ही हाईप्रोफ ाइल परिवार का होने से दो साल तक सिवाय 'नाटकÓ के हकीकत कभी सामने नहीं आई। आख्रिर इस पूरे मामले में हत्यारा कौन है? घर के भीतर हुई हत्या में आरोपी भी घर का ही हो सकता है, लोकल पुलिस ने यह साबित करने के लिये आरूषी के पिता को गिरफतार कर जेल भेजा और रिहा कर दिया। आज की स्थिति में जब सीबीआई ने सच्चाई जानने के मामले में घुटने टेक दिये हैं तो यह अब दिलचस्प बन पडा है कि आखिर हत्यारा कौन है? वह इस पूरे जांच में या तो जांच एजेङ्क्षसयों के साथ मिलकर उन्हें गुमराह करता जा रहा है या फिर उसकी पहुंच इतनी ज्यादा है कि उसे सीकचों के पीछे भेजने में कहीं न कहीं से भारी दबाव पड़ रहा है-अगर दबाव डाला जा रहा है तो दबाव डालने वाला कौन है? क्या यही कारण तो नहीं है कि सीबीआई ने गुस्से में आकर इस मामले में कुछ करने से ही हाथ खीच लिया है? सीबीआई का यह निर्णय भले ही उसकी कोई ब्यूह रचना हो या वास्तविक निर्णय इससे देश में इस एजेंसी पर विश्वास करने वाले करोड़ों लोगों को आघात पहुंचा है। देश में होने वाले अधिकांश बड़े अपराधों में चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या आपराधिक इनमे लोग निष्पक्ष जांच के लिये केन्द्रीय जांच ब्यूरों-सीबी आई की ही मांग करते हैं। सीबीआई के वर्तमान निर्णय के बाद उसकी निष्पक्षता, उसकी कार्यक्षमता तथा अन्य अनेक मामलों मे सवाल उठना स्वाभाविक है किंतु अगर विधि मंत्री इस मामले की जांच जारी रखने का आदेश देते हैं तो सीबीआई को इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर निष्पक्ष ईमानदार व तेज तर्रार अधिकारियों की मदद से संपूर्ण मामले का खुलासा करना चाहिये। यह सीबीआई का अपनी साख पुन: बनाये रखने के लिये भी जरूरी है।

कैसे बीत गया 2010...?

रायपुर, शनिवार दिनांक 1 जनवरी 2011

कैसे बीत गया 2010...? भूले दुर्दिन को,
और मनायें नये साल का जश्न...!
आज जब आपके हाथ में अखबार होगा नया साल लग चुका होगा। आप सभी को नये साल की शुभकामनाओं के साथ बीते साल के दुस्वप्रों को भूलकर आगे बढऩे की ताकत देेने की प्रार्थना के साथ हम पुराने साल के घटनाक्रमों का स्मरण करें तो शायद बीता साल वास्तव में इस सदी का सबसे ज्यादा घटनाक्रम वाला साल रहेगा जहां भारतीय संसद घपले-घोटालों, भ्रष्टाचार से गूंजता रहा और एक के बाद एक हादसों दुर्घटनाओं ने देश को दहला दिया। उपलब्धियां भी कम नहीं रही। बीता साल क्रिकेट के क्षेत्र में सचिन तेन्दुलकर और बेडमिंटन के क्षेत्र में सायना नेहवाल का रहा। देश ने खेल के क्षेत्र में विश्व में नाम कमाया। कामनवेल्थ गैम्स ने जहां भारत का नाम रौशन किया वहीं इसके आयोजन में हुए घपले घोटालों ने दाग भी लगाया। विदशों से संबन्ध बनाये रखने के मामले में काफी प्रगति हुई। भारत को सुरक्षा परिषद् मे सदस्यता तो प्राप्त हुई लेकिन स्थाई सदस्यता का ख्वाब अब भी बना हुआ है। साल की शुरूआत रेल हादसों से हुई। उत्तर प्रद्रेश में कोहरे की वजह से कम से छै रेल दुर्घटनाएं हुई जिसमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। साल के दूसरे महीने में की जर्मन बैकरी में आंतकी हमले ने देश को चौका दिया यहां कम से कम सात्रह लोग मारे गये और साठ लोग जख्मी हो गये। बीते वर्ष में भारत ने परमाणु मामले में काफी प्रगति की । भारत का रूस,फ्रांस सहित कई देशों से परमाणु रियेक्टर और अन्य कार्यक्रमों के लिये समझाौता हुआ। अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा इस बार जहां महत्वपूणर्र््ा रही वहीं रूस,फ्रांस,जापान, ब्रिटेन, चीन जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत की यात्रा की। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को सफलताा मिली तो विफलता भी हाथ लगी। कामनवेल्थ गैम्स का आयोजन और उसमें महिला खिलाडिय़ों के ज्यादा से ज्यादा गोल्ड मेडल ने देश को गौरवान्वित किया तो भोपाल गैस कांड के फैसले में आठ लोग दोषी पाये गये। बीते वर्ष जून की गर्मी पिछले सारे रिकार्ड तोड़ नया कीर्तिमान 53 डिग्री सेंटीग्रेड़ का बनाया। गर्मी कई लोगों को अपने साथ लेकर चली गई। अभूतपूर्व पानी के संकट ने छत्तीसगढ़ सहित देश के कई भागों में विषम स्थिति पैदा कर दी। इसी दौरान महाराष्ट्र में हुई भीषण वर्षा से 46 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मुम्बई हमले के एक मात्र जीवित बचे पाकिस्तानी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाने का आदेश हुआ। सरकार ने बीते साल जहां राष्ट्रीय परिचय योजना की शुरूआत की वहीं छै से चौदह साल के बच्चों के लिये अनिवार्य स्क्ूली शिक्षा कानून बनाया। ससंद में स्पेक्ट्रम घोटाला गूंजा तो महाराष्ट्र में आदर्श सहकारी भूमि घोटाले ने मुख्यमंत्री अशोक चौहान की नौकरी छीन ली और पृथ्वीराज चौहान को नई नौकरी दी। राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले व भ्रष्टाचार ने देश को विश्व के सामने मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा। विश्व में जहां भारत शकितशाली राष्ट्रों में तीसरे नम्बर का बना तो रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामले में नबंर वन बन गया। मंहगाई ने सारे हदें पार कर दी। नक्सलवादियों के कहर से सारा देश हलाकान रहा। बस्तर में टावर गिराने से कई दिनों तक बिजली ठप्प रही तो दंतेवाड़ाा, बीजापुर, नारायणपुर में एक तरह से नक्सलियों का राज रहा जहां सीआरपीएफ के जवानों व नागरिकों की एक के बाद एक सामूहिक हत्याएं होती रही। नक्सलियों ने यात्रियों व जवानों से भरी एक बस को भी आग के हवाले किया। कई निर्दोष लोगों को भी मार डाला गया। मिदनापुर में ज्ञानेश्वारी एक्सपे्रस को पटरी से उतारकर कई लोगो की हत्या कर दी गई। इससे हावड़ा मुम्बई रेल सेवा आज भी प्रभावित है। नक्सलियों का साथ देने के लिये विनायक सेन, नारायण सान्याल और पियूष गुहा को देशद्रोही करार कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। मंगलोर में हवाई जहाज दुर्घटना में करीब 158 लोग मारे गये। तूफान लैला ने दक्षिण में कहर ढाया तो पूर्वी भारत में तूफान ने तबाही मचाई।आ और भी बहुत कुछ हुआ लेकिन अब उन्हें याद करने की जगह हमें खुशी मनाना है नये वर्ष के आगमन की..कामना है ढेरों खुशियां आपके जीवन को और खुशहाल बनायें