बुधवार, 29 दिसंबर 2010

उनका लक्ष्य है हिंसा से 'सत्ता, इनका तो कोई लक्ष्य ही नहीं!

रायपुर दिनांक 29 दिसंबर 2010

उनका लक्ष्य है हिंसा से 'सत्ता,
इनका तो कोई लक्ष्य ही नहीं!

ट्रेन का अपहरण, ट्रेन को पलटाकर कई लोगों की हत्या, सैकड़ों निर्दोष लोगों की गला रेतकर हत्या, देश के कई नवजवानों का खून बहाने, तथा करोड़ों रूपये की संपत्ति को फूं क देने के बाद भी अगर कोई सरकार सिर्फ कार्रवाही का भरोसा दिखाकर जनता को तसल्ली दे तो इसे क्या कहा जाये? वर्ष दो हजार दस अब खत्म होने को है और इस वर्ष में जिस तेजी से पूरे देश में नक्सलवाद ने अपने पैर जमाये हैं वह प्रजातंत्र पर विश्वास करने वालों के लिये एक कठोर चेतावनी है कि अब भी अगर वे नहीं चेते तो आने वाले वर्षो में उन्हें माओवाद को झेलना पड़ेगा। नक्सली सन् 2050 का टारगेट लेकर चल रहे हैं- उनका मानना है कि वे उस समय सत्ता पर काबिज हो जायेंगे लेकिन हमारी सरकार के पास ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है कि नक्सलियों के वर्तमान आतंक और तोडफ़ोड़ से कैसे निपटा जाये। प्राय: हर रोज किसी न किसी का खून बहता है तो दूसरी ओर करोडा़ रूपये की संपत्ति स्वाहा होती है। अभी दो रोज से लगातार बस्तर में ट्रेनों को पटरी से उतारकर देश का करोड़ों रूपये का नुकसान किया है। हम मिदनापुर की उस घटना को कैसे भूल सकते हैं जब ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस को पटरी से उतारकर दुर्घटनाग्रस्त कर दिया गया। इस कांड में कई निर्दोष यात्री मारे गये। इस मार्ग पर दहशत से रेलवे ने ट्रेनों का समय ही बदल दिया जो अब तक सही नहीं हुआ। देशभर में नक्सली हिंसा की बात को कुछ देर के लिये किनारे कर हम सिर्फ छत्तीसगढ़ की बात करें तो ''मानपुर-राजनांदगांव जहां मुठभेड़ में एस पी वी.के चौबे को अपनी जान गंवानी पड़ी, भाजपा के वरिष्ठ नेता बलिराम कश्यप के पुत्र व कांगे्रस नेता महेन्द्र कर्मा के रिश्तेदारों को भी नक्सली कहर झेलना पडा़ है। दंतेवाड़ा का मुकुराना जंगल जहां 6 अप्रेल को करीब 75 सीआरपीएफ जवानों को घेरकर मार डाला गया। नारायणपुर में भी इसी तरह सत्ताईस सुरक्षा जवानों को गोलियों से भून उाला गया। यात्रियों से भरी एक बस को भी नहीं बख्शा गया जब उसमें सवार लोगों में से 31 को जिसमें कुछ सुरक्षा जवान भी थे आग के हवाले कर दिया गया। यह सब ऐसी घटनाएं हैं जो हमारी आंखों के सामने घटित हुई, जिसे हम नई घटनाओ के साथ भूलते जा रहे हैं किंतु हमारी सरकार के पास इस समस्या को सुलझाने के लिये न कोई फार्मूला है और न ही उसकी कोई दिलचस्पी दिख रही है। जनता की संपत्ति नष्ट हो रही है, निर्र्दोष लोगों व देश की सेवा में लगे जवानों का लगातार खून बह रहा है। बस्तर के अनेक हिस्सों में लोग जाने से डरते हैं। स्कूलों की पढ़ाई नहीं हो रही, सरकारी कामकाज बंद है। नक्सली राज और उनके फरमान के आगे राज्य व केन््रद्र दोनों सरकार बेबस है। कुछ सक्रियता उसी समय दिखाई जाती है जब कोई घटना होती है जैसे ही मामला ठण्डा हुआ इसपर से ध्यान हट जाता है। गढचिरौली में चिदंबरम अचानक पहुंचे तो वहां के कलेक्टर ने यहंा तक कह दिया कि एसी कमरों में बैठकर नक्सली समस्या का समाधान नही निकल सकता। यह उस अधिकारी का दर्द है जो शायद इस गंभीर समस्या से जूझ रहा है। नक्सली समस्या पर जो रणनीति है उससे तो यही लगता है कि सरकार अपने ढर्रे पर है और नक्सली अपनी चाल पर। अब तो यह देखना रह गया है कि इस दौड़ में बाजी किसके हाथ में होगी?

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

प्याज के आंसू की दरिया बह रही है और सरकार को शर्म नहीं!

रायपुर मंगलवार दिनांक 28 दिसंबर

प्याज के आंसू की दरिया बह रही
है और सरकार को शर्म नहीं!

टमाटर लाल,
प्याज ने निकाले आंसू,
गैस में लगी है आग-
ऐसे शीर्षकों से अखबार भरें पड़े हैं फिर भी हमारी सरकार को शर्म नहीं आ रही। कृषि मंत्री शरद पवार बेशर्मी से कहते हैं-प्याज के लिये अभी और रोना पड़ेगा- वे यह नहीं कहते कि स्थिति शीघ्र नियंत्रण में आ जायेगी। हर बार कृषि मंत्री एक भविष्य वक्ता की तरह कभी गन्ने के भाव बढऩे की तो कभी शक्कर के भाव तो कभी दालों के भाव बढने की बात कहकर कालाबाजारियों व जमाखोरों को मौका देते हैं। प्याज के मामले में गैर जिम्मेदाराना बयान के बाद प्रधानमंत्री को स्वंय संज्ञान लेना पड़ा तब कहीं जाकर विदेशों विशेषकर पाकिस्तान से प्याज पहुंचा और बाजार की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार आया किंतु यह सारी स्थिति एक तरह से उस समय पैदा होती है जब सत्ता में बैठे लोग गैर जिम्मेदाराना बयान देते हैं। यह भी समझ के बाहर है कि जिसे व्यवस्था करनी है वह व्यवस्था करने की जगह कमी और परेशानी का राग अलापकर सात्वना देता है या अपनी विवशता पर मरहम पट्टी लगाने का काम करता है। आज सामान्य व्यक्ति के लिये भारी मुश्किलें खड़ी हो गई है। पेट्रोल के भावों में लगातार बढौत्तरी से लोगो की तनखाह का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोल में ही निकल जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल के भाव में तेजी आये या नहीं हमारे देश में पेट्रोल,डीजल के भाव में तेजी लाने की शुरूआत हो जाती है। उपभोक्ता को आज की स्थिति में किसी क्षेत्र में राहत नहीं है। ईमानदारी से दो जून की रोटी जुटा पाने वाले इंसान को यूं सरकार कब तक आश्वासन के घूंट पिलाती रहेगी, रोज कमाने खाने वाले को एक माह में मिलने वाला वेतन हर दृष्टि से कम पड़ रहा है- इससे वह क्या करें? अपने मां बाप, पत्नी बच्चों का इलाज करायें? स्कूल में बच्चो को भारी फीस देकर पढऩे भेजे, मकान का किराया अदा करें। बच्चों के कपड़े लत्ते व अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करें और साथ साथ घर के रसोई की आवश्यकता की पूर्ति करें? वेतन इतना कम पड़ जाता है कि आगे उसके लिये महीना निकालना कठिन हो जाता है। आगे आने वाले दिनों में गैस के भाव सौ रूपये तक बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली गई है अर्थात गैस पांच सौ रूपये तक मिल जाये तो आप भाग्यशाली हैं जबकि ट्रेन व बस की यात्रा भी लोगों के लिये मंहगी साबित हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं का तो यह हाल है कि इसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं हैं। छोटी मोटी बीमारी का इलाज चिकित्सक और दवा मिलाकर पांच सौ से हजार रूपये से नीचे नहीं जाता जबकि एक बार चिकित्सक के पास जाने वाले को अनेक किस्म के टेस्टों से गुजरना पड़ता है। इसका खर्च अलग। आगे आने वाले दिनों में रसोई इतनी मंहगी हो सकती है कि ग्रहणियां क्या करें क्या न करें की स्थिति में आ सकती है। गैस के दाम बढऩे के संकेत के साथ बिजली की कीमतों में भी वृद्वि की संभावना व्यक्त कर दी गई है। जिनके पास अपना घर है वह भी परेशान है-एक छोटी सी रिेपेयरिंग के लिये उसे आज लेबर नहीं मिलते वहीं निर्माण सामग्रियों में आई बढौत्तरी किसी को काम जारी रखने की हिम्मत ही नहीं देती।

कौन जीता, कौन हारा से ज्यादा महत्वपूर्ण रही दलों की प्रतिष्ठा!

रायपुर दिनांक 27 दिसंबर

कौन जीता, कौन हारा से ज्यादा
महत्वपूर्ण रही दलों की प्रतिष्ठा!
उप चुनाव व नगर निकाय चुनावों में बहुत हद तक सत्तारूढ पार्टी की साख का पता चल जाता है कि उसकी नीतियां व कार्यक्रमों को किस हद तक जनता पसंद करती हैं। हाल ही संपन्न निकाय चुनावों में नीतियां और कार्यक्रमों की जगह 'प्रतिष्ठाÓ ज्यादा महत्वपूर्ण रही चूंकि चुनाव का सारा दारोमदार ही सीटों पर कब्जा जमाना था। हालाकि इन चुनावों में तेरह मे से आठ पर कब्जा कर भाजपा ने अपनी साख तो कायम रखी किंतु प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई के चलते चुनावों में पराजय से पार्टी व सरकार को धक्का लगा है। तेरह नगर पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनाव में से अगर पार्टी बेस बहुमत देखे तो भाजपा ही आगे रही, उसने आठ पर कब्जा जमाया है तो शेष पर कांग्रेस को सफलता मिली वैसे इससे भाजपा गदगद हो सकती है लेकिन उसके लिये आठ सीटों पर कब्जा करना उतना मायने नहीं रखता जितना प्रतिष्ठापूर्ण सीटों को गंवाना। एक सीट निर्दलीय के हाथ भी लगी है।बैकुंठपुर में तो कमाल ही हो गया जहां निर्दलीय प्रत्याशी ने कांग्रेस की जमानत जब्त कर भाजपा को भी शिकस्त दे पालिका पर कब्जा कर लिया। रायपुर के निकट वीरगांव नगर पालिका और भिलाई नगर निगम पर सबकी नजर थी। यह दोनों सीटें इसलिये प्रतिष्ठापूर्ण बन गई चूंकि सत्तारूढ़ दल ने इन सीटों को जीतने के लिये अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। शायद यही कारण है कि विपक्ष ने फतह हासिल करने के बाद पहली प्रतिक्रिया में यही कहा कि यहां कांग्रेस की जीत यही दर्शाती है कि सरकार पराजित हुई। राज्य सरकार व संगठन के बड़े बड़े नेता अपने प्रत्याशी को जिताने के लिये पूरे तामझाम से उतरे। यह सही है कि कांग्रेस की तरह भाजपा में भी गुटबाजी है किंतु इस चुनाव में हमें लगता है कि भाजपा की गुटबाजी की जगह उसके चुनाव संचालन की खामियां ज्यादा महत्व रखती हैैं। चुनाव संचालन की जिम्मेदारियंा जिन लोगों के सिपुर्द रही उनमें से अधिकांश को कार्यकर्ताओ ने पसंद नहीं किया। भाजपा भटगांव विधानसभा चुनाव में जीत से गदगद थी और उसे पूरा भरोसा था कि दोनों ही सीट पर आसानी से जीत जायेगी, इस ओवर कान्फीडेंस ने भी भाजपा को पीछे ढकेल दिया। सत्ता में रहते हुए भाजपा ने जहां वैशालीनगर विधानसभा उपचुनाव को भी प्रतिष्ठापूर्ण सीट मानकर लडा और पराजय का सामना किया वहीं भठगांव चुनाव में उसने जीत हासिल कर पराजय पर मरहम पट्टी की किंतु नगर निकायों में वह कांग्रेस से उन सीटों को छीन नहीं सकी जिसपर उसका कब्जा था। वीरगांव और भिलाई निकायों में कांगे्रस की जीत से भाजपा को झटका लगा है। जहां तक चुनाव में ग्रामीण इलाकों का सवाल है-कुल सात नगर पंचायतों के चुनाव नतीजों से यह लगता है कि भाजपा की साख ग्रामीण इलाकों में शहरों के मुकाबले अच्छी है। भाजपा को सात में से चार सीट यहां मिली है जबकि दो सीट कांगेस को तथा एक सीट पर निर्दलीय विजयी हुआ है। दलों की स्थिति के आंकलन का अगला पड़ाव संजारी बालौद है। तेरह सीटों पर जीत पाकर यद्यपि भाजपा उत्साहित है किंतु प्रतिष्ठापूर्ण सीटों पर उसकी पराजय ने हतोत्साहित भी किया है। संजारी बालोद पर भी निकट भविष्य में प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई होगी। यहां भाजपा को कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

छेडछाड़ करने वाला अधमरा,रोकने वाले को पीट पीटकर मार डाला!

रायपुर दिनांक 26 दिसंबर 2010

छेडछाड़ करने वाला अधमरा,रोकने
वाले को पीट पीटकर मार डाला!
छेड़छाड़ करने वालों के साथ क्या सलूक किया जाये? क्या वही जो छत्तीसगढ़ में रायपुर के जलविहार कालोनी के एक परिवार ने किया जिसमें एक स्कूली बच्ची के साथ छेड़छाड़ करने वाले को एक बार मना करने के बाद भी नहीं माना तो पीट पीट पीटकर अधमरा कर दिया। दूसरी घटना बलौदाबाजार के पलारी की है जिसमें एक शिक्षक को सिर्फ इसलिये पीट पीटकर मार डाला चूंकि उसने छेडख़ानी का विरोध किया था। अब बताइये कौन आज के जमाने में किसी की मदद के लिये तैयार होगा? मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने इस घटना के बाद छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का आदेश पुलिस को दिया है। पुलिस इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में मजनुओं के खिलाफ क्या कार्रवाई करती है यह आने वाला समय बतायेगा लेकिन पलारी की घटना के बाद यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि किसी की परेशानियों में हम कितना भागीदार बन सकते हैं? शिक्षक वाली घटना के संदर्भ में सड़क पर किसी के साथ छीना झपटी, लूट, छेडख़ानी या कोई दुर्घटना में घायल व्यक्ति भी पड़ा है तो उसे उठाकर न अस्पताल पहुंचाया जा सकता है और न ही पुलिस को सूचना दे सकते हैं। पुलिस में जानकारी देने पहुंचें तो घायल के बारे में कुछ बतान से पहले पूछा जाता है कि तुम कौन? तुम्हारे बाप का नाम क्या?कहां रहते हो? आदि । अगर अस्पताल ले जाओ तो डाक्टर एक्सीडेंट केस बताकर इलाज करने तैयार नहीं होता। यहां भी पुलिस का लफड़ा। अगर इसके बाद भी हमने हिम्मत कर किसी को अस्पताल में दाख्रिल करा दिया और वह मर गया तो कानून हमारा यहां भी पीछा नहीं छोड़ता। बलौदाबाजार के शिक्षक का कसूर बस इतना था कि उसने राह चलती छात्राओं से छेडख़ानी करने वाले मजनुओं को ऐसा करने से मना किया। इसके लिये उसे तो जान से हाथ धोना पड़ा वह अलग बात है लेकिन उसके पीछे उसपर आश्रित एक पूरा परिवार भी अपने मुखिया को खो बैठा। इस घटना के बाद शायद पलारी के लोग तो कम से कम अब कोई किसी लड़की को छेड़ रहा है तो भी आंख मूंदकर चले जायेगें।कै सी स्थिति निर्मित हो गई ह,ै हमारे समाज में? यह भी दुर्भाग्यजनक है कि कई इस तरह के मामले है जिनमें अगर सड़क पर किसी नाजायज बात का कोई विरोध कर रहा हो तो भी आसपास खड़े लोग तमाशा देखते खड़े रह जाते हैं। बलौदा बाजार शिक्षक हत्याकांड वाले मामले में अगर कुछ लोग सामने आते तो संभव है शिक्षक की जान बचाई जा सकती थी। वैसे इस पूरे मामले में शिक्षक की मौत का कारण हार्ट अटैक बताकर अपराधियों को बचाने का प्रयास पहले से ही कर लिया गया है। सार्वजनिक अपराध के ऐसे मामलों में तत्काल सजा का प्रावधान होना चाहिये। अपराध कई लोगों के सामने हुआ है। अपराधी तुरंत पकड़े गये है। चश्मदीद गवाह भी हैं अत: पीडि़त पक्ष को न्याय देने में किसी प्रकार की देरी नहीं करनी चाहिये। अगर देर हुई तो साक्ष्य प्रभावित होंगे-अपराधी छूटकर आ जायेंगे और समाज में एक गलत संदेश जायेगा।बहुत से ऐसे मामले उदाहरण के तौर पर दिये जा सकते हैं जिसमें न्याय प्रक्रिया मे देरी के कारण साक्ष्य को पलटा दिया गया और अपराधी पतले रास्ते से निकल भागे।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कांग्रेस में बुजुर्गो के दिन लदें! युवा कंधे पर आयेगा भार?

रायपुर बुधवार दिनांक 23 दिसंबर 2010

कांग्रेस में बुजुर्गो के दिन लदें! युवा कंधे पर आयेगा भार?
कांगे्रस ने अपने युवराज राहुल गांधी के ताजपोशी की तैयारियां शुरू कर दी है। हाल ही बीता कांग्रेस का अधिवेशन इस बात का गवाह हो गया कि निकट भविष्य में राहुल गांधी को ही आगे कर संपूर्ण राजनीति का ताना बाना बुना जायेगा। इस अधिवेशन में कांग्रेस अपनी संस्था के पूरे ओवरआइलिंग के मूड में भी दिखाई दी। 125 वें वर्ष पर आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जिस प्रकार राहुल गांधी को हाईलाइट किया गया तथा युवा फौज को अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा किया गया। उससे इस बात की संभावना बढ़ गई है, कि बुज़ुर्गो को किनारे कर युवा पीढ़ी को देश चलाने का मौका दिया जायेगा। अगर आगे चलकर ऐसा होता है, तो यह कांग्रेस के लिये पूरे देश में उठ खड़े होने का एक अवसर होगा। वरना आगे आने वाले वर्ष कांग्रेस के लिये दुखदायी होंगे। कांग्रेस के इस अधिवेशन में दिग्विजय सिंह जिस ढंग से मुखर हुए और उन्होंने जो बातें कही- विशेषकर साठ वर्ष से ऊपर के लोगों की राजनीति के बारे में, वह लगता है कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से सिखा- पढ़ाकर दिया गया बयान है। जो यही संकेत दे रहा है कि आगे के दिन कांग्रेस के बुुजुर्गो के लिये अवकाश के हैं। जिस मंजे हुुए राजनीतिज्ञ की तरह राहुल गांधी ने अधिवेशन को संबोधित किया। उसे भी एक संकेत ही कहा जाना चाहिये कि आने वाला वर्ष राहुल गांधी का है। अधिवेशन में शािमल लोगों के मुंह से यह बात भी निकली कि- राहुल, राजीव गांधी की प्रतिछाया है- इससे बड़ा संकेत और क्या हो सकता है? दूसरी सबसे बड़ी बात यह कि लोकसभा में मौजूद अधिकांश युवा चेहरे राहुल को अपना चहेता मानकर उनके नेतृत्व में काम करने की भी बात कर रहे हैं। भारत के युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भी राहुल गांधी को अपना आइडल मानकर उसी की राह पर चलने की मंशा ब्यक्त करता रहा है। विभिन्न प्रदेशों में राहुल के चुनावी दौरों में युवा वर्ग की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि वे कितना महत्व रखते हैं, युवाओं के बीच। युवक कांग्रेस के सदस्यता अभियान में संख्या हर बार बढ़ती जाती है। कांग्रेस को अब अगर देश में अपनी साख बनानी है, तो उसे वास्तव में साठ वर्ष या उससे आगे का मोह छोड़कर एक नई रणनीति के तहत काम करना होगा। कांग्रेस के अधिवेशन में यह बात स्पष्ट हो गई है कि- सोनिया गांधी प्रधानमंत्री का पद नहीं लेंगी। बल्कि वे वर्तमान स्थिति में संगठन का नेतृत्व करती रहेंगी। राहुल गांधी और संपूर्ण अधिवेशन में प्रमुख नेताओं ने जिस प्रकार राहुल गांधी को विकीलिक्स खुलासे से उत्पन्न स्थिति से बचाकर निकाला। उसे भी कांंग्रेस की परिपक्व रणनीति का द्योतक कहा जाना चाहिये। विपक्ष में कांग्रेस की इस नई पहल से हड़कम्प होना स्वाभाविक है और वे भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आने वाले समय में कांग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का भरपूर प्रयास करेगी। विपक्ष के लिये कांग्रेस द्वारा निर्मित होने वाले इस तूफान को रोक पाना कठिन ही लगता है। इस स्थिति से निपटने के लिये विपक्ष को चाहे वह भाजपा हो या अन्य कोई भी पार्टी, एक बहुत कठिन दौर से गुजरना पड़ सकता है। इसकी ऐहतियाती पहल फिलहाल तो विपक्ष के पास यही है कि वह राहुल गांधी के लूप होल को किसी न किसी तरह उजागर कर उनकी छवि को जनता के सामने कमजोर करे। इसकी पहल विकीलिक्स खुलासे के बाद जरूर हुआ किंतु इसमें कोई खास सफलता हासिल नहीं हो सकी। अगर विपक्ष इस मामले में इस रणनीति पर चल रहा है कि वह इसको चुनाव के दौरान भुनाने का प्रयास करेगा तो इसमें भी उसको कोई फायदा नहीं होने वाला। क्योंकि हमारे देश में लोगों को जल्द ही भूल जाने की आदत है.... !

प्रदेश की आम जनता सुरक्षित नहीं, सुरक्षित है तो सिर्फ प्रदेश के मंत्री!

रायपुर दिनांक 21 दिसंबर 2010

प्रदेश की आम जनता सुरक्षित नहीं,
सुरक्षित है तो सिर्फ प्रदेश के मंत्री!
और अब बारी आई एक बुद्विजीवी की! प्रदेश में किस तेजी से कानून और व्यवस्था का भट्ठा बैठा है, इसका उदाहरण है बिलासपुर के युवा पत्रकार सुशील पाठक की हत्या। अपहरण, चेन स्नेचिगं, बलात्कार, चोरी डकैती, हत्या जैसी वारदातों से लबालब छत्तीसगढ में आम आदमी का जीवन कितना सुरक्षित है? यह अब बताने की जरूरत नहीं। सरगुजा में एक के बाद दो बच्चों की हत्या जहां रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। वहीं बिलासपुर में युवा पत्रकार की गोली मारकर हत्या ने यह बता दिया है कि प्रदेश में जहां बच्चे, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, वहीं कलमकार की जिंदगी भी अब अपराधियों के रहमोकरम पर है। राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर छत्तीसगढ़ के दो बड़े शहर हैं। इन दो बड़े नगरों में राज्य बनने के बाद से जिस तेजी से अपराध बढ़ा है, उसकी देन हम किसे माने? केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने जब दिल्ली में बढ़ते अपराधों के बारे में यह टिप्पणी की कि- वहां बाहरी लोगों के कारण अपराध बढ़ रहा है, तो लोग उनपर पिल पड़े। यहां तक कि उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराधों के परिप्रेक्ष्य में भी क्या चिदम्बरम का बयान लागू नहीं होता? सरगुजा में स्कूली बालक ऋतेश का अपहरण कर उसकी हत्या में बाहरी लोगों का हाथ साफ है। राज्य में अब तक जितनी बैंक डकैतियां हुई हैं, उसमें भी पुलिस की शंका बाहरी गिरोह की ही बताई जाती रही है। कुछ जो संदेही पकड़े गये हैं, वे भी बाहरी हैं। रायपुर के टाटीबंद में महिलाओं के गले से चेन स्नेचिंग का जो आरोपी पकड़ा गया वह भी महाराष्ट्र से है। इस आरोपी ने कई कांड किये हैं। एक कांड संभवत: रंजीता सलूजा के गले से चेन खींचने के पहले उसने सर्वोदय कालोनी हीरापुर में राह चलती एक महिला के गले से चेन खींचने का प्रयास किया, किंतु वह मकसद में कामयाब नहीं हो सका। इस आरोपी के जिस एक साथी की तलाश है, वह भी मध्यप्रदेश का है। वारदातों की एक लम्बी फेहरिस्त है। ऐसा लगता है कि अपराधियों के आगे पुलिस की संपूर्ण व्यवस्था फेल हो चुकी है। अभी कुछ ही दिन पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मीडिया और राजनीतिक मोर्चे की किरकिरी से तंग आकर अचानक पुलिस मुख्यालय पहुंचे थे तथा वहां उन्होंने डेढ़ घंटे तक पुलिस को खरी- खोटी सुनाई थी। इसके बाद एक दिन खूब पुलिसियां सक्रियता दिखी। फिर वही ढाक के तीन पात। दूसरी ओर प्रदेश के गृह मंत्री अपनी पुलिस के मामले में एक तरह से असहाय हैं। विधान सभा में भी उन्होंने बयान दे डाला है कि- हमारे थानेदार रिश्वतखोर हैं। हाल की बड़ी घटनाओं पर एक नजर डालें तो बैंक डकैती, हत्या, टीनएज के बच्चे या बच्चियों का अपहरण है। अनेक मामलों में बच्चों को तब अगवा कर लिया गया, जब वे स्कूल से लौट रहे थे। न्यायधानी बिलासपुर में हुई ताजी घटना ने संपूर्ण व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। आज की स्थिति में न कोई व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित है, और न ही उनकी संपत्ति सुरक्षित है। विशेषकर महिलाएं और बच्चे- अगर कोई प्रदेश में सुरक्षित है तो प्रदेश के नेता और मंत्री जिनके आगे पीछे सदैव पुलिस लगी रहती है।

े.

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

बात की तीर से निकलती आग में जल रही देश की राजनीति!

रायपुर दिनांक 20 दिसबर।
बात की तीर से निकलती आग
में जल रही देश की राजनीति!
'बातो से मारोंÓ-राजनीति का एक नया रूप इन दिनों सबके सामने है। बस थोड़ी सी चिन्गारी चाहिये, बात की मार ऐसी आग लगाती है कि पूरी राजनीति में उबाल आ जाता है। इस समय वाक युद्व के सबसे बड़े हीरों हैं राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह। जिनके मुंह से निकले तीर कई लोगों को घायल कर गए हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व देश के वित्त मंत्री प्रणव मुकर्जी ने कहा था कि- राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री हो सकते हैं। उनके इस बयान के तुरन्त बाद आस्ट्रेलिया के जासूसी चैनल ने खुलासा किया कि राहुल गांधी ने अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर के साथ हुई बातचीत में हिन्दू कट्टर पंथ को लश्करें तौयबा के आंतकवाद से ज्यादा खतरनाक बताकर एक नई कान्ट्रोवर्सी खड़ी कर दी। हालंाकि विकीलिक्स का यह खुलासा कोई नई बात नहीं थी। नई बात बस इसलिये थी चूंकि यह बात सोनिया गांधी के पुत्र और कांग्रेस द्वारा भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित राहुल गांधी के मुंह से निकली थी। विकीलिक्स के खुलासे के पूर्व केन्दी्रय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने जब देश में भगवा आतंकवाद का जिक्र किया। तो भी कुछ इसी तरह की हलचल हुई थी। इसके बाद मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी इस मामले में भड़कीला बयान देकर कूद पड़े। राजनीतिकारों को एक दूसरे को नीेचा दिखाने के लिये बस मौके की जरूरत होती है। जनता जिसे इन बयानबाजियों से कोई लेना- देना नहीं, सिर्फ मजा लेती है। विकीलिक्स के रहस्योद्घाटन के बाद देशभर में राहुल के खिलाफ मौजूद लोग संगठित हो गये और एक- एक कर उन्होनें हमला बोला जिसमें भाजपा में शामिल होने के लिये कतार में मौजूद उमा भारती, और अन्य कई भाजपा नेताओं के अलावा महाराष्ट्र में शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे भी शामल हुए। प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी चंूंकि, एक तरह से यह बयान हालांकि एक बंद कमरे में दो प्रमुख हस्तियों के बीच का था लेकिन पूरे एक समुदाय पर प्रहार करने वाला था। बयान देन वाला भी भारतीय राजनीति का एक प्रभावशाली व्यक्ति! विकीलिक्स के रहस्योदूघाटन के बीच कांग्रेस के 125 वें स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय महाधिवेशन पर सबकी नजर गई। जहां आंतकवाद और भ्रष्टाचार पर नेताओं के कड़े प्रहार के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरएसएस पर प्रहार कर संपूर्ण देश का ध्यान फिर अपनी आोर आकर्षित करा लिया। इस बार सिंह ने यह कहकर संघ पर प्रहार किया कि वह 'हिटलर की नाजी सेनाÓ की तरह है। इससे पहले सिंह मुम्बई में पाकी हमले पर एटीएस प्रमुख शहीद करकरे के बारे में विवादास्पद बयान देकर चर्चा में आ चुके हैं। राजनीति करने के लिये अपने प्रतिद्वन्दी को किसी न किसी तरह से नीचा दिखाना पड़ता है। इसके लिये अगर ऐसे हथकंडे अख्तियार किये जाये जो संप्रदाय जाति और धर्म के बीच वैमनस्य खड़ा करने का प्रयास किया जाये। तो उसे क्या कहा जाये? अपना स्वार्थ साधने के लिये राजनीति से जुड़े लोग आम जनता की भावनााओं से क्यो खेल रहे हैं? एक तो देश यूं ही गंभीर समस्याओ से जूझ रहा हैं। वहीं राजनीति से जुडे लोग अपनी रोटी सेंकने के लिये नये -नये हथकंडे अपनाकर राजनीतिक निपुणता दिखाने में लगे हैं।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

क्यों देते हैं दिग्गी विवादास्पद बयान? दो साल क्यों चुप रहे?

रायपुर दिनांक 13 दिसंबर 2010

क्यों देते हैं दिग्गी विवादास्पद
बयान? दो साल क्यों चुप रहे?
यह हमारे पूर्व मुख्यमंत्री को क्या हो गया ? दिग्विजय सिंह आजकल कांग्रेस के महासचिव हैं- उन्होंने बयान दिया है कि मुम्बई 26-11 हमले में शहीद एटीएस चीफ की मौत के पीछे हिन्दू संगठनवादियों का हाथ है। दो साल तक इस घटना पर लगातार चुप्पी साधे रहने के बाद अचानक रहस्योद्घाटन कर चर्चा में आने वाले र्दििग्वजय सिंह के मुंह खोलते ही भाजपा नेता राजनाथ सिंह भड़क गये। उन्होंने भी यही सवाल किया कि दिग्विजय सिंह दो साल तक चुप क्यों थे और अचानक उन्हें यह बयान देने की क्या जरूरत पड़ी? राजनाथ सिंह से पूर्ण सहमत होते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि दिग्विजय सिंह के कथन की सच्चाई जानने के लिये उनकी और एटीएस चीफ के बीच यदि कोई बातचीत हुई है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिये। ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये। अगर करकरे ने उनसे ऐसी कोई आशंका जाहिर की तो एक बार नहीं कई बार टेलीफोन पर बातचीत हुई होगी। सवाल यहां यह भी उठता है कि एटीएस चीफ को अगर हिन्दू संगठनवादियों से खतरा था। तो यह बात उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को बताने की जगह दिग्विजय सिंह को क्यों बताई? यह बात एटीएस चीफ ने मुख्यमंत्री को भी जरूर बताई होगी । फिर मुख्यमंत्री ने अब तक ऐसा कोई खुलासा क्यों नहीं किया? और यह खुलासा दिग्विजय सिंह की तरफ से ही इतने दिनों बाद क्यों हुआ? दिग्विजय सिंह दूसरे दिन यह कहते हुए मुकर भी गये कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि करकरे की हत्या में हिन्दू संगठनवादियों का हाथ है- मैने यह कहा था कि हिन्दू संगठन करकरे को परेशान कर रहे थे। यह बात उसी समय बता दी जाती, तो मुम्बई पर हमले की जांच करने वालों को इससे काफी मदद मिलती। कांग्रेस स्वयं यह महसूस करती है कि उसके महासचिव का यह बयान बेतुका है। शायद उसने इसीलिये इस बयान से पल्ला झाड़ा और इसे उनका व्यक्तिगत बयान करार दिया। दिग्विजय सिंह इससे पूर्व भी अपने विवादास्पद बयानों के कारण चर्चा मेंं आ चुके हैं। इस ताजा बयान ने उन्हें कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। चूंकि स्वयं एटीएस चीफ करकरे की पत्नी कविता करकरे ने इस मामले में सज्ञान लेते हुए उनके बयान को कोरी बकवास करार दिया है तथा कहा है कि उनके पति की हत्या हिन्दू संगठनवादियों ने नहीं बल्कि आंतकवादियों ने की है। राजनीति के एक मंजे खिलाड़ी के रूप में जाने जाने वाले कांग्रेस के इस यौद्वा का यह बयान आम लोगों के नजीरिये से देखें तो यह पूर्णत: कपोल कल्पित औैर ऐसे समय पर दिया गया बयान लगता है जब संसद में भ्रष्टाचार को लेकर युद्व छिड़ा हुआ है। क्या दिग्विजय सिंह ने यह बयान स्पेक्ट्रम मुदृदे पर से देश का ध्यान हटाने के लिये दिया? कुछ भी कहें उनके इस बयान ने और राजनीतिक पार्टियों को भले ही जगाया न हो किंतु भाजपा को जरूर अपने विरूद्व बोलने का एक मौका दिया है। राजनीतिक हल्कों में चर्चा यह भी है कि दिग्विजय सिंह से यह बयान जानबूझकर दिलवाया गया। अगर इम मामले में थोड़ी भी सच्चाई होती तो दिग्विजय सिंह जैसेे राजनीतिज्ञ को इतने दिनों तक चुप रहने का कोई औचित्य नहीं था।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

क्या गलत बोल दिया शिवराज ने ? यह तो आज की आवाज है!

रायपुर दिनांक 14 दिसबर।
क्या गलत बोल दिया शिवराज
ने ? यह तो आज की आवाज है!
खरी बात किसी के गले नहीं उतरती। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जब यह कहा कि राज्य सभा अंगे्रजो की देन है, जो अब खरीद फरोख्त की मंडी बनकर रह गई है। तो लोग उनपर पिल पड़े और शिवराज ंिसंह को अपना बयान वापस लेना पड़ा। राज्य सभा ही नहीं आज ऐसी कितनी ही संस्थाएं ऐसी हंै, जिनकी आवश्यकता नहीं है और फिजूल खर्ची बढ़ा रही है। शिवराज ंिसंह जैसे युवा की सोच जब उनकी आवाज बनकर गूंजती है, तो उन लोगों को बुरा लगता है जो परंपरावादी बनकर ऐसी संस्थाओं को बनाकर रखना चाहते हैं। शिवराज ंिसंह ने इस बात की भी वकालत की है कि देश में प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री का चुनाव राष्ट्रपति पध्दति से कराया जाये। चुनावी खर्च कम करने के लिये यह जरूरी है कि विधानसभा और लोकसभा का चुनाव भी एक साथ कराया जाना चाहिये। बकौल शिवराज सिंह ''राज्य सभा का कोई औचित्य नहीं है। राज्य सभा के चुनाव विधायकों के खरीद-फरोख्त की मंडी होती हैं जिससे लोकतंत्र शर्मसार होता है। राज्य सभा के औचित्य पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं कि राज्य सभा ऐसे लोगों के लिये बनाया गया था, जो चुनाव नहीं लड़ सकते। मसलन कलाकार व साहित्यकार, अब तो ऐसे लोग भी चुनाव में हिस्सोदारी निभाते हैं जो इस वर्ग में नहीं आते- यही कारण है कि यह चुनाव विधायकों के खरीद-फरोख्त की मंडी बन जाता है। इस स्थिति से ईमानदारी से राजनीति करने वालों का नुकसान होता है। उद्योगपतियों के लिये चुनाव में पैसा लगाना इंवेस्टमेंट हैं और वे सिर्फ काला धन ही देते हैं। यही कारण है कि नीरा राडिया जैसे लोग जन्म लेते हैं। शिवराज सिंह आज के युवा वर्ग के प्रतिबिम्ब है, उन्होंने जो बात कही वह आज के युवा सोच और उनके दिल से निकली आवाज मानी जानी चाहिये। राज्य सभा से बढ़कर उन्होंने यह बात नहीं कही कि राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति का भी औचित्य क्या है। जबकि यह पद भी राज्यों में अनावश्यक खर्च बढ़ा रहे हैं। सवाल यही है कि इस पद की जरूरत क्या है? जब प्रदेशों में मुख्य न्यायाधीश का पद है तो वे राज्यपाल के दायित्व को भी आसानी से निभा सकते हैं। राज्यपाल के पास सिवाय राज्यों की रिपोर्ट केन्द्र को पे्रषित करने के अलावा सामान्य दिनों में क्या काम बच जाता है? बहुत से ऐसे पद व संस्थाएं हैं, जो सिर्फ कतिपय लोगों को खुश करने के लिये बनाकर रखे गये हैं। शिवराज सिंह की बातों में दम है। इस मुद्दे पर विरोध अपनी जगह है। शिवराज सिंह के बयान का विरोध करने वाले तो करते रहेंगे मगर, देश की व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये अगर कोई सही सुझाव देता है, तो तंत्र को उसपर गौर करना चाहिये। शिवराज ंिसंह के बयान में बहुत सी बातें देश के चुनाव आयोग को विचार करने के लिये है। कम से कम देश की इस संवैधानिक संस्था को शिवराज के विचारों पर गौर करना चाहिये।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!

शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य
में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!


यह केक था या देश का दिल जिसे गुरुवार को कांग्रेसियों ने चाकू से काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये? हम बात कर रहे हैं देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी के जन्म दिन पर कांग्रेसियों द्वारा काटे गये केक की। वाराणसी में आंतकी हमले के परिपे्रक्ष्य में सोनिया गांधी ने इस वर्ष अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था लेकिन उनके अति उत्साही कार्यकर्ताओंं ने केक काटा, इसपर किसी को कोई आपत्ति नहीं है लेकिन केक को राष्ट्रध्वज का प्रतीक बनाकर जिस ढंग से गोदा गया यह कितना उचित था? यह कांग्रेसियों का सोनिया के प्रति पे्रम का प्रदर्शन था या राष्ट्र के प्रतीक का अपमान? जब राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्वयं अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था तब इन कांग्रेसियों को कौनसा भूत सवार हो गया कि वे सारी मर्यादाओं को त्याग कर एक ऐसा केक उठा लाये जो बिल्कुल तिरंगे के आकार का था जिस पर चक्र भी बनाया गया था। अगर केक काटना ही था तो एक सामान्य केक काटकर अपनी खुशी का इजहार कर सकते थे, लेकि न सबसे अलग दिखाने की चाह व होड़ में वे यह भी भूल गये कि यह एक संवैधानिक अपराध है। जिसकी सजा तीन साल की जेल या जुर्माना दोनों हो सकता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रीय नेताओं के अपमान का एक सिलसिला सा चल पड़ा है। राष्ट्रीय ध्वज को पाकिस्तान ने कुछ दिन पूर्व उलटा फहराया था। ऐसा ही कुछ इससे पूर्व यूरोपीय देश में हुआ। राष्ट्रीय नेताओं के अपमान की तो एक लम्बी गाथा है- कभी अमरीका में भारत के पूर्व राष्ट्रपति से दुव्र्यवहार होता है तो कभी भारतीय राजनयिकों को कपड़े उतारकर अपनी सुरक्षा जांच कराने का हुक्म दिया जाता है। देश के अंदंर ही राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वालों का तांता लग गया है जिस पर किसी की नजर ही नहीं है। आस्टे्रलिया में तो रोज कोई न कोई भारतीय अपमानित होता है। इन अपमानों की एक लम्बी फेहरिस्त के बाद भी हमें शर्म नहीं आती कि हम ऐसे राष्ट्रों के अतिथि बनकर दुबारा पहुंचते हैं और दुबारा अपमानित होते हैं। अफ्रीका में महात्मा गांधी को ट्रेन से उठाकर फेंका तो उसकी चिंगारी पूरे विश्व में आग बनकर झुलसने लगी और देश आजाद हो गया किंतु आज उसी गांधी के देश में उसके अपने ही लोग राष्ट्रध्वज का अपमान कर रहे हैं। घूसखोरी, शराब खोरी, चोरी, लूट, बलात्कार, डकैती और हत्या से राष्ट्र के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। क्यों हम इस अवसाद की स्थिति में पहुंच गये? कौन जवाबदार है इसके लिये? क्या राष्ट्रीय ध्वज को केक बनाकर काटने वाले कांग्र्रेसियों में इतनी भी समझ नहीं रह गई कि वे जिसे चाकू से काट-काट कर खुशियां मना रहे हैं। वह करोडों राष्ट्रभक्तों के संघर्षों की एक संपूर्ण दास्तां का प्रतीक है। जव वह हवा में लहराता है तो देश का सीना तन जाता है, देश की आंखें चमक उठती हंै और हम गर्व से कहते हैं-'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा-Ó
शर्म करो -अब किया तो किया, भविष्य में ऐसा करोगे तो शायद कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा-

रायपुर बुधवार दिनांक 8 दिसबंर 2010

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा- क्या
अंतिम उपाय 'मौत ही रह गया ?
यह अकेले नेहा भाटिया की कहानी नहीं हैं, संपूर्ण छत्तीसगढ़ में स्कूली छात्राओं से छेडख़ानी और उन्हें प्रताडि़त करना एक आम बात हो गई है। छेड़छाड़ से दुखी नेहा ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया था। मंगलवार को नेहा ने प्राण त्याग दिये। बहुत सी छात्राएं छेड़छाड़ को बर्दाश्त कर इसकी शिकायत इसलिये नहीं करती। चूंकि उन्हें डर लगा रहता है कि परिवार के लोग इसके पीछे पड़ कर बड़ी मुसीबत में पड़ जायेंगे। पुलिस में जाने से छेड़छाड़ पीडि़त महिला तो डरती ही है, उसका परिवार भी ऐसा नहीं करना चाहता। जबकि नेहा जैसी कई ऐसी छात्राएं भी हैं, जो अपमान को गंभीरता से लेकर उसे मन ही मन बड़ा कृत्य करने के लिये बाध्य हो जाती है। क्या स्कूल प्रबंधन इस मामले में बहुत हद तक दोषी नहीं है, जो ऐसी घटनओं की अनदेखी करता है? क्या छेड़छाड़ पीडि़तों के लिये यही एक अंतिम उपाय है कि वह मौत को गले लगा ले? नेहा कांड से पूर्व छत्तीसगढ़ के छोर सरगुजा से एक खबर आई कि एक युवक की लड़की के भाई और साथियों ने जमकर पिटाई कर दी, चूंकि वह बहन को छेड़ता था। मामला जो भी हो, छेड़छाड़ के अक्सर मामले में लोग कानून को हाथ में लेने बाध्य हो जाते हैं। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं रह जाता। छेड़छाड़ की घटनाओं का कोई समय नहीं होता- लड़की को अकेला देखा तो छेड़ दिया फिर चाहे, वह स्कूल जा रही हो, सब्जी लेने या दूध लेेने? गाली गलौज के रूप में छेडख़ानी के अलावा आजकल राह चलती महिलाओं के दुपट्टा खींचना, अश£ील हरकत करना, स्कूटर से गिरा देना या अन्य ऐसी ही हरकतें जहां आम हो गई हैं। वहीं इस छेड़छाड़ की आड़ में किसी के गले से चैन खींच लेना भी आम बात हो गई हैं। छेेड़छाड़ की आड़ में आपराधिक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। छेड़छाड़ पीडि़त महिला अगर सड़क में थोड़ा सा साहस दिखाये तो यह उसके हित में ही जायेगा। जैसे ही कोई उसके साथ छेडख़ानी करें युवती को चाहिये कि वह आसपास से निकल रहे लोगों से अपनी रक्षा के लिये सहायता लें। युवतियों की मदद के लिये कई लोग सड़क पर उतर जाते हैं। एक बार एक को अच्छा सबक सिखाया जाये तो दूसरे में इसकी हिम्मत नहीं रह जाती। छेडख़ानी का एक दूसरा माध्यम है मोबाइल। बच्चे स्कूल में इसका उपयोग किन कामों के लिये करते है, यह बताने की जरूरत नहीं। जहां तक छेडख़ानी में पुलिस की भूमिका का सवाल है पुरुष की बनिस्बत महिला पुलिस छेड़छाड़ करने वालो से अच्छे से निपट सकती है। जब तक छेडख़ानी के मामले में लिप्त व्यक्तियों को सार्वजनकि रूप से जलील नहीं किया जायेगा, ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। छेडख़ानी में लिप्त लड़कों की फौज या तो किसी पान ठेले में मौजूद रहेगी या फिर ऐसे किसी मोड़ पर जहां से होकर स्कूल कॉलेज के लिये निकलना लड़कियों की मजबूरी है। नेहा भाटिया के साथ जो कुछ हुआ उससे छत्तीसगढ़ शर्मसार है। छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में ऐसी घटना न दोहराई जाये, इसके लिये यह जरूरी है कि इन घटनााओं पर अंकुश लगाने के लिये कठोर कदम उठाये जायें।