रविवार, 21 नवंबर 2010

फिजूल खर्ची,अव्यवस्था बन रही लोकतंत्र में अडंग़ा, कौन ले संज्ञान?

रायपुर सोमवार दिनांक 22 नवंबर 2010

फिजूल खर्ची,अव्यवस्था बन रही
लोकतंत्र में अडंग़ा, कौन ले संज्ञान?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज ऐसा कुछ होता जा रहा है कि जिसकी जो मर्जी आये वह वैसा करता जाये। क्या आप और हम यह महसूस नहीं करते कि देश में भ्रष्टाचार के साथ नेताओं की फिजूल खर्ची, मनमर्जी भी कुछ ज्यादा होती जा रही है? बिहार चुनाव के दौरान खबर आई कि चालीस दिन के प्रचार में नेताओं ने हेलीकाप्टरों से उड़ान भरते हुए तेरह करोड़ रूपये खर्च कर डाले। यह तो हेलीकाप्टर का खर्चा है, इसके अलावा अन्य जो खर्च हुआ वह अलग। इस खर्च में हर चुनाव लडऩे वाली पार्टी शामिल हुई। चुनाव आयोग द्वारा खर्चों पर लगाम के बाद सिर्फ एक राज्य में चुनाव के दौरान यह खर्चा हुआ। जबकि देशभर में होने वाले चुनावों के दौरान नेताओं की हवाई उड़ान तथा अन्य होने वाले खर्चो का हिसाब लगाये, तो वह अरबों में होता है। जब देश में हर पांच साल में एक साथ चुनाव हुआ करते थे, तब इतना खर्चा नहीं होता था। आज एक के बाद एक राज्यों में होने वाले चुनावों के कारण खर्च हो रहा है। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बराबर यह मांग करते रहे हैं कि राज्य व केन्द्र के चुनाव एक साथ, एक ही बार में कराये जाये। सरकार में बैठे लोगों को अच्छे सुझावों को स्वीकार करने में क्या परेशानी है? स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद संसद की कार्रवाई लगातार बाधित हो रही है। संसद की कार्यवाही पर प्रति सेकेडं के हिसाब से लाखों रूपये का खर्चा होता है। अगर इन हंगामों और सदन की कार्रवाही नहीं होने से जनता का कोई भला हो, तो हम इसपर चुप्पी साधकर बैठ सकते हैं लेकिन लगातार कार्यवाही बाधित कर देश के खजाने को जो चोट पहुंचती है, उसका सारा भार तो आखिर जनता की जेब पर ही पड़ता है। स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ। संबन्धित मंत्री को निकाल भी दिया। सरकार क्या स्पेक्ट्रम घोटाले की कमाई को संबन्धित लोगों से छीन सकती है? क्या स्पेक्ट्रम से जुड़े लोगों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी पर चढ़ा सकते है, और क्या विपक्ष की मांग पर जेपीसी गठित होने से इस समस्या का हल हो सकता है? अगर सरकार ने जेपीसी का गठन कर भी दिया और उसका निष्कर्ष स्पेक्ट्रम घोटाले बाजों के खिलाफ गया, तो कितने पर कार्रवाई होगी? अब तक गठित जेपीसी की रिपोर्टों के बाद कितने भ्रष्ट लोगों को जेल के सींखचों के पीछे भेजा गया? ऐसा लगता है कि संपूर्ण हंगामा राजनीतिक मकसद को पूरा करने के उद्रदेश्य से होता है जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। आम जनता यह महसूस करती है कि उनका नेता उनके बीच का आदमी है लेकिन जैसे ही चुनाव जीतता है। उसकी सुरक्षा इतनी हो जाती है कि वह आम आदमी के बीच का न होकर किसी दूसरे गृह का व्यक्ति बना दिया जाता है। सरकारी खजाने से नेताओं की सुरक्षा उनकी सुख- सुविधाओं के लिये राजसी ठाठ की तरह व्यवस्था होती है। बहुत कम नेता गुलजारी लाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री सरीके रह गये हैं। जो मतदाता वोट देते समय अपने नेता को देखता है, वह उसे पांच वर्षो बाद ही दुबारा देख पाता है। जनता का जनता के लिये जनता के द्वारा चलाया जाने वाला लोकतंत्र बासठ साल बाद कितनी खामियों से घिर गया? इसका अंदाज लगाया जा सकता है। राजनीति को एक उद्योग का दर्जा देकर कुछ लोगों ने इसे पैसा कमाने का जरिया बना लिया है। हमारे दावे इसी से स्पष्ट होते हैं कि माननीयों ने अपने वेतन में बढ़ौत्तरी की मांग को लेकर ससंद की कार्यवाही को कई दिन तक चलने नहीं दी थी। अंतत: सरकार झुक गई। माननीयों का वेतन बढ़ गया, नुकसान हुआ देश की जनता का। भ्रष्ट व्यवस्था, फिजूल खर्ची और दमखम के बल पर शासन चलाने का कतिपय लोगों का अदाज राजतंत्र की याद ताजा करता है। न्यायपालिका जरूर बीच- बीच में इसपर संज्ञान लेती है, किंतु उसके बावजूद एक सघन निगरानी व नियंत्रण के अभाव में मनमानी नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।

शनिवार, 20 नवंबर 2010

समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी हासिल कर ली सरकारों ने!

रायपुर, शुक्रवार दिनांक 20 नवंबर 2010
समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी
हासिल कर ली सरकारों ने!
क्या हमारी व्यवस्था खुद ही समाज को कई भागों में नहीं बांट रही? गरीब,निम्र वर्ग,मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग, हरिजन, आदिवासी, अल्प संख्यक यह सब शब्द समाज द्वारा दिये गये नाम तो नहीं हैं। सरकार ने इन सबकी उत्पत्ति कर इसे अलग- अलग वर्गो में बांटा है। वोट बैंक की राजनीति के लिये किये गये इस वर्गीकरण ने आज देश के सामने कई मुसीबतें खड़ी कर दी। आजादी के बाद देश में कुछ ऐसे हालात थे कि लोग काफी संख्या में पिछड़े हुए थे। गरीब थे- इतने गरीब कि उन्हें दो जून की रोटी नहीं मिलती थी, पहनने के लिये कपड़े नहीं और रहने के लिये छत नहीं। बच्चों को वे पढ़ा नहीं सकते थे, स्वास्थ्य की सविधाएं उन्हें मिलती नहीं थी। ऐसे लोगों को सरकारी मदद देकर सरकार ने उन्हें इस लायक बना दिया कि- वे कुछ काम करने के लायक बन गये। इस दौरान उनके बच्चे भी अन्य बच्चों के साथ पढ-लिख गये और उन्होंने नौकरियों में अच्छे- अच्छे पद भी प्राप्त किये। ऐसे लोगों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था एक समय सीमा तक होनी चाहिये थी, लेकिन सरकारे आती जाती रही, उसने यह नहीं सोचा कि गरीब जिसे वह मदद करता रहा है, कितना गरीब है? और जिसे आरक्षण देता रहा उसे और कितने दिन आरक्षण की जरूरत है। सरकारी व्यवस्था ने गरीबों को मदद और आरक्षण को एक धंधा बना लिया जिसके माध्यम से वह हर पांच साल में सत्ता मे आने का रास्ता बनाता। गरीब को गरीब बने रहने दो और आरक्षण पाने वालों को पुश्तों तक आरक्षण मिलता रहे ताकि वह सरकारी मदद के आगे सदैव नतमस्तक रहे तथा पार्टियों के वोटर बैेंक की तरह उन्हें सत्ता में लाते रहें। होना यह चाहिये था कि जिन गरीबों की मदद सरकार ने की, उसे वह देखे कि- मदद के बाद वह गरीबी रेखा से ऊंचा उठा कि नहीं? अगर उठ गया तो मदद बंद की जाये तथा इस बात का प्रयास करें कि आगे के वर्षो में गरीबों की संख्या न बढ़े। लेकिन सरकार की नीतियां हमेशा यही रही कि- गरीब को गरीब और आरक्षित को आरक्षित ही रहने दिया जाये। इसका नतीजा यह हुआ कि देश का जो टेलेंट है, वह या तो यहीं दबकर रह गया या फिर उसने विदेशों का रास्ता पकड़ लिया। गरीब वर्ग के नाम पर देश का एक ऐसा वर्ग सामने आ गया, जो गरीबों से उपर उठकर अपराधी प्रवृत्ति का हो गया तथा उसने एक तरह से असल गरीबों का हक उनसे छीनना शुरू कर दिया। कहीं एक बत्ती कनेक्शन तो कहीं चावल, कहीं मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य के नाम पर यह वर्ग ऐसी सारी सुविधाएं, जो असल गरीबों को मिलनी चाहिये थी वह सरकार को गुमराह कर या सांठगांठ कर हासिल करने लगा। इस मदद के नाम पर सरकार से जारी होने वाला दस रूपये का अधिकांश भाग या तो अफसरों और इन योजनओं को चलाने वालों के जिम्मे चला जाता या फिर यह ऐसे कथित गरीब लूटकर ले जाते जिसे मजदूरी या कोर्ई काम करके परिवार का भरण- पोषण करना चाहिये था। गरीबों को सरकार वर्गीकृत कर मदद पहुंचाना चाहती है, तो वह अंधेरे में तीर मारने की जगह हकीकत का सामना करे। असल गरीब जी न सकने के कारण आत्महत्या कर रहा है। सरकार की जयजयकार कर उसकी मदद पर वोट देेने वाले कथित गरीब असल गरीबों का हक मार रहे हैं। सरकार यह सुनिश्चित करें कि वह जिसे मदद या आरक्षित कर सहायता पहुंचा रहा है। वह अब उसका वास्तविक हकदार है कि नहीं। मदद की एक समयावधि निश्चित करें। उस दौरान उसे पूरा उठ खड़े होने का मौका दे, तभी देश में लोग समानता से जी सकेंगें। भीख और मदद की बात आजादी के त्रेसठ सालों बाद अब कोई औचित्य नहीं रखता। भारतीय संविधान में सभी को समान अवसर उपलब्ध है, उसका उपयोग कर हर नागरिक को जीने का अधिकार है। समाज को बंाटने का काम अब बंद होना चाहये।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

'मृगतृष्णा बन गई मंहगाई-हम पागलों की तरह भाग रहे हैं उसके पीछे...

रायपुर दिनांक 20 नवंबर 2019
'मृगतृष्णा बन गई मंहगाई-हम पागलों
की तरह भाग रहे हैं उसके पीछे...
सरकार के आंकड़े दावे करने लगे हैं कि महंगाई कम होने लगी है। क्या यह आंकड़े हकीकत को बयान कर रहे हैं? जब तक आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान तीनों सही या उनकी आमदनी की पहुंच के आधार पर उपलब्ध न होने लगे, तब तक कैसे कह सकते हैं कि मंहगाई कम हो रही है? सरकार अभी जनता से मार्च तक और इंतजार करने को कह रही है, ऐसे कितने ही मार्च निकल गये...मंहगाई यूं ही बढ़ती चली गई। ऐसे जैसे कोई मृगतृण्णा हो, जिसके पीछे हम पागलों की तरह भागते ही चले जा रहे हैं। इस सप्ताह बुधवार को कहा गया कि प्याज के मूल्य तेजी से बढ़ रहे हैं। गुरुवार को खबर आई कि गेंहू की कीमत में ग्यारह प्रतिशत से अधिक की बढौत्तरी हुई। इधर सरकारी आंकडों ने गुरुवार को ही दावा किया है कि -ज्यादातर खाद्य वस्तुओं के दाम में नरमी से 6 नवंबर को समाप्त सप्ताह में मुद्रास्फीति की दर दो प्रतिशत घटकर 10.3 प्रतिशत रह गई। इसके साथ ही सकल मुद्रास्फीति के साल के अंत तक छह प्रतिशत के स्तर पर आने की उम्मीद बढ़ गई इससे पूर्व सप्ताह में खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति 12.3 प्रतिशत पर थी। जबकि बीते साल की समान अवधि में यह 13.99 प्रतिशत थी। यह सही है कि काफी लंबे समय के बाद खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति एक विशेष अवधि में बीते साल की समान अवधि के मुकाबले कम है, लेकिन इसके पीछे क्या हम यह कह सकते हैं कि सरकार के किसी प्रयास से यह संभव हो सका? बल्कि बात यह है कि वस्तुओं के दामों में अगर थोडी बहुत भी गिरावट आई है, तो उसके पीछे कारण यही हो सकता है कि त्यौहार का सीजन निपट गया तथा बारिश के बाद अब सर्दी के दिनों में नई फसल धीरे- धीरे बाजार में आना शुरू हो गई। इसमें सरकार ने क्या तीर मारा? जब मंहगाई सर्वाधक ऊंचे स्तर पर थी, तब सरकार ने आम लोगों को कोई राहत नहीं पहुंचाई। तो अब कौन सी जादुई छड़ी का इस्तेमाल कर दावा किया जा रहा है कि खाद्यान्न की कीमतों में कमी आ रही है। जिन वस्तुओं के दाम कथित महंगाई के दौरान बढ़ा दिया गया था। उसमें से एक भी वस्तु का दाम आज गिरा नहीं है। चाहे वह पेट्रोलियम पदार्थ हो, कपड़े हो, मकान बनाने का कच्चा माल हो या फिर खाने- पीने की वस्तुएं। सरकार अगर भाव कम हाने का दावा करती है तो वह डिब्बे बंद वस्तुओं में पुराने और नये कम दाम क्यों नहीं दर्शाने का निर्देश कंपनियों को देती। आजकल डिब्बा बंद खाद्यान्न वस्तुओं का जमाना है। सारी वस्तुएं सामान्य व्यक्ति की पहुंच से ऊंचे भाव पर चल रही है। जमाखोरों और कालाबाजारियों के गोदामों में अभी खाद्यान्न भरा पड़ा है। उसे निकालने प्रयास सरकारी स्तर पर होना चाहिये। जबकि सरकार जनहित की बात छोड़क र अपने ही मुद्दों पर उलझी हुई है। खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति में नरमी जरूर आई है, उससेे रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति को सख्त करने के उपायों के मामले में राहत ले सकता है। सख्त मौद्रिक नीति के चलते सितंबर में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 16 माह के निचले स्तर 4.4 प्रतिशत पर आ गई।
महाराष्ट्रध्दि में फसल बर्बाद होने के चलते प्याज की कीमतों में 0.63 प्रतिशत तेजी दर्ज की गई। जबकि प्रोटीन आधारित खाद्य वस्तुओं की कीमतों में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। अंडा, मीट और मछली की कीमत में 33 प्रतिशत से अधिक की बढ़ौतरी बनी हुई, वहीं दूध के दाम 25 प्रतिशत से अधिक और दालों के दाम 19.4 प्रतिशत अधिक बढ़े हुए हंै। इसके अलावा, गेहूं की कीमत में 11 प्रतिशत से अधिक की वृध्दि मध्यम वर्ग की रसोई के लिये आज भी समस्या खड़ी किये हुए है। रोज खाने और कमाने वाला अकेले खाद्य पदार्थो को नहीं देखता। उसकी रोजमर्रा की अन्य आवश्यकताएं भी हंै, उसे कैसे पूरा किया जाये? अभी शादी ब्याह का समय है-ऐसे में मध्यम वर्गीय सोने में आई थोड़ी सी राहत से कुछ सोना तो खरीद ही सकता है। सोना बीस हजार चार सौ बीस रूपये प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया था। अब यह एक सौ अस्सी रूपये लुढ़ककर बीस हजार दो सौ बीस रूपये प्रति दस ग्राम रह गया है। आम आदमी को जीने के लिये रोटी- कपड़ा और मकान चाहिये- जब यह तीनों ही आसानी से उपलब्ध नहीं है, तो कौन सी महंगाई को कम होने की बात हम कर सकते हैं?

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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!

रायपुर शुक्रवार 19 नवंबर
आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी
में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!
वह कौन सी जादुई छड़ी है जिससे घूसखोरी का इलाज किया जायें? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मानते हैं कि जब तक चुनावी चंदे पर रोक लगाकर पब्लिक फण्ड से चुनाव लडऩे की व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकती। बकौल गहलोत देश में कैग, सीवीसी, सूचना का अधिकार जैसी कई संस्थाएं और कानून बन गए, लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि चुनाव के लिए चंदा लेते ही भ्रष्टाचार की शुरूआत हो जाती है। क्या यही एक कारण है? बहुत हद तक इसे ठीक माना जा सकता है चूंकि इस फंड की बजह से ही देश में मंहगाई बढ़ती है और भ्रष्टाचार फैलता है। गहलोत तो यहां तक कहते हैं कि कितनी भी संस्थाएं बना ली जाएं, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। जब देश के एक मुख्यमंत्री की यह धारणा है तो भ्रष्टाचार में लिप्त इस देश को भगवान ही बचा सकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की नाकामी में गहलोत का यह कहना कि ठेकेदार अफसर के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। पैसे को इस ढंग से खर्च करना कि जनता को इसका पूरा लाभ मिले यह बहुत मुश्किल है और अब नरेगा जैसी योजनाओं में मिलने वाली भारी धनराशि के कारण यह काम सरकार के लिए और भी मुश्किल हो गया है। इससे यह साफ जहिर है कि सरकार के पास ऐसा कोई उपाय बचा ही नहीं है जिसके मार्फत देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से आम जनता को निजात दिलाई जायें। चुनावी फंड पर जनता तो लगाम नहीं लगा सकती। इसे सरकार को ही कानून बनाकर खत्म करना होगा। जब सारी बाते जनप्रतिनिधि जानते हैैं तो इसे वे जनता के पाले में क्यों फेंकते हैं। सरकार को कठोर से कठोर कानून बनाने से किसने रोका? भ्रष्टाचार सिस्टम में घुसकर आतंकवाद और जातिवाद जैसी ही चुनौती बन गया है, जो देश को खोखला कर रहा है। जो लोग देश के प्रमुख उद्योगपति टाटा को तक नहीं छोड़ते उनके अधिनस्थ काम करने वाले कर्र्मचाारी अधिकारी साधारण लोगों को कितना नौचते होंगें इसकी कल्पना की जा सकती है। टाटा के बयान के बाद दूसरे प्रमुख उद्योगपति राहुल बजाज ने भी यह स्वीकार किया है कि देश की कई बड़ी कंपनियां रिश्वत देकर अपना काम निकलवाती हैं। बकौल बजाज, आजकल देश में रिश्वत देना आम बात हो गई है। बजाज राज्य सभा के सदस्य भी हैं वे इसके लिये उन लोगों को दोषी करार देते हैं जो काम करवाने के लिये रिश्वत देते हैं मगर बजाज साहब बात यहीं खत्म नहीं होती चूंकि अगर पैसा नहीं दो तो हर आदमी का हश्र ऐसा ही होगा जैसा टाटा का हुआ- टाटा मांगे पन्द्र्रह करोड़ रूपये दे देते तो आज वे एक एयरलाइंस के भी मालिक होते। देश में ऐसे आदर्शवादियों की कमी नहीं हैं, रिश्वत नहीं देने के कारण उनकी कई योजनाएं अटकी पड़ी हैं-ऐसे लोगों का काम होगा भी नहीं जब तक वे संबन्धित व्यक्ति की मांग पूरी न कर दें।बजाज ने कहा है कि कंपनियां बिना रिश्वत दिए भी अपना काम करवा सकती हैं। बल्कि उनके लिए तो यह एक आम आदमी की तुलना में ज्यादा आसान होगा। बस उनमें इतना माद्दा होना चाहिए कि वो रिश्वत देने से मना कर सकें। हमारे अनुसार यह कहना आसान लगता है लेकिन बात जब हकीकत में आती है तो आप कुछ नहीं कर सकते मान लीजिये आप किसी छोटे मोटे झगड़े में फंस गये और पुलिस वाला कानून बताकर आपसे कह रहा है कि पांच हजार दो तो आदमी छूट जायेगा वरना उसे लाकअप में रहना पड़ेगा और कल उसे अदालत में पेश किया जायेगा , हो सकता है उसे जेल भी भेज दिया जाये- इस स्थिति में परिजन क्या करेगा? स्वाभाविक है कि वह अपने व्यक्ति को पैसा देकर छुडाना ही बेहतर समझेगा। रिश्वत ने हर व्यक्ति को जाल में जकड़ लिया है जिसका अंंत सिर्फ कठोर कानून है उसके बगैर देश में हम केवल भ्रष्टाचार को कोसने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

बुधवार, 17 नवंबर 2010

राष्ट्र का पौने दो लाख करोड़ रूपये डकार लिया, फिर भी तना है सीना!

रायपुर दिनांक १७ नवंबर।
राष्ट्र का पौने दो लाख करोड़ रूपये
डकार लिया, फिर भी तना है सीना!
सब कुछ खा -पीकर डकारने के बाद हमारे नेता कहते हैंं कि हमने कुछ नहीं खाया,चाहों तो हमारा पेट काट कर देख डालों। मंत्री पद से हाल ही बेदखल हुए केन्द्रीय संचार मंत्री ए. राजा सीना ठोककर यह कहते हुए घूम रहे है कि उन्होंने कुछ गलत नहंीं किया। कैग की रिपोर्ट कहती है कि २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले से देश को १.७६ लाख करो$ड रुपये का नुकसान हुआ। राजा ने नहीं खाया तो इतने पैसे का बाजा कैसे बजा? कौन खा रहा है देश का पैसा? क्यों ऐसे नेताओं को रााष्ट्र का पैसा खाने के बाद खुले आम घूमने की इजाजत दी जा रही? क्यों नहीं ऐसे लोगों के खिलाफ सेना में कोर्ट माश्रल की तरह देश की संपंत्ति हड़पने और देश की जनता को धोखे में रखकर उनका पैैसा खाने का मुकदमा कायम किया जाता? क्या देश की जनता के गले यह बात नहीं उतरती कि छोटी छोटी पार्टियां और उसके नेता सरकार में शािमल होने के लिये क्यों ललचाते हैं और मलाईदार विभाग हड़पने के लिये हाय तौबा करते हैं? मनमोहन ंिसंह सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में शशि थरूर को तत्काल बर्खास्त कर दिया लेकिन राजा के मामले में उसने इतना समय क्यों लगाया जबकि राजा पर तो थरूर से भी बड़ा गंभीर आरोप है। सराकार को मालूम था कि राजा ने बड़ा अपराध किया है किंतु डीएमके समर्थन वापस लेती है तो इस स्थिति में सरकार को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। सत्ता बचाने के लिये भ्रष्टाचारी को बचाकर मनमोहन सिंह सरकार ने भी रिश्वत खोर का साथ नहीं दिया?राजा की पूरी अकड़ अपने आका डीएमके नेता करूणानिधि के कारण है चूंकि वे जानते हैं कि करूणनिधि के रहते उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति हमारे देश के कई नेताओं के साथ है जिनपर किसी न किसी बड़े नेता की छाया रहती है और इसकी आड़ में कुछ भी करते हैं। राजा पर स्पेक्ट्रम घोटाले का आरोप बहुत पहले से लगा हुआ था। विपक्ष की लाख मांग के बावजूद वे जहां इस्तीफा नहीं देने की बात पर अडे हुए थे वहीं करूणानिधि ने भी अडियल रवैया अख्तियार कर रखा था। यह जानते हुए भी कि राजा स्पेक्ट्रम घोटाले में आंकठ डूबे हुए हैं उसके बाद भी वे कौन से कारण हैं जिसके चलते करूणानिधि अपने मोहरे को बचाने में लगे रहे, इसका अर्थ भी साफ है कि डीएमके पार्टी के लोग भी इस पूरे घोटाले में राजा के साथ भागीदार बने रहे हैं और उनको ंइसके लिये पूरी छूट देते रहे हेैं। संपूर्ण देश को हिलाकर रख देने वाले इस संचार घोटालेे ने यह तो साबित कर दिया है कि देश भ्रष्टाचार के प्रकरण में आंकठ डूब गया है। लोग लाख चिल्लते रहे, ऐसे भ्रष्टाचार मामलों का वही हश्र होता रहा है जो पूर्व के प्रकरणों का हुआ है। एक पूर्व संचार मंत्री पहले भी इसी प्रकार भ्रष्टाचार में बुरी तरह फंसे थे उनका क्या हुआ? उनके तो घर से भी इतना नगद बरामद हुआ था कि सीबीआई को सम्हाले नहीं सम्हल रहा था। ससंद में इससे पहले भी वर्तमान सत्तारूढ पार्टी और आज जो विपक्ष में बैठे चिल्ला रहे हैं उनके समय भी इसी तरह के घाोटालों के कारण ससंद की कार्रवाई बाधित होती रही है किंतु जिस भ्रष्टाचार को लेकर हंगामा होता रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त कोई भी नेता जेल के सीकचों के पीछे नहीं भेजा गया। चूंकि जांच की प्रक्रियाएं ही इतनी लम्बी चलती है कि जनता की बात तो छोडिय़ें सरकारें भी भूल जाती है कि क्या हुआ था।

सोमवार, 15 नवंबर 2010

हावडा-मुम्बई मेल को समय पर चलाने सोर्स स्टेशन नहीं बदलने की जिद क्यों?

रायपुर दिनांक 15 नवबंर
हावडा-मुम्बई मेल को समय पर चलाने
सोर्स स्टेशन नहीं बदलने की जिद क्यों?
रेलवे को इस बात की जिद क्यों हैं कि वह हावड़ा-मुम्बई मेल को हावड़ा से ही चलायेगी? 28 मई 2010 को ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को नक्सलियों द्वारा विस्फोट कर पटरी से उतारने और उसके जाकर एक मालगाड़ी से टकरा जाने के बाद से अब तक रेलवे यह तय नहीं कर पाई है, कि हावड़ा-मुम्बई मेल के समय को कैसे नियंत्रित किया जाये? हावड़ा-मुम्बई मेल के रायपुर पहुंचने का समय आज भी टाइम टेबिल पर और यहां तक कि रेलवे द्वारा जारी किये जाने वाले टिकिटों पर सुबह 9.05 लिखा हुआ है । लेकिन यह ट्रेन दुर्घटना दिन के बाद से लगातार अब तक रायपुर पहुंचती है- शाम सात, आठ या नौ बजे। पूछताछ कार्यालय से यही सूचना दी जात्री है कि आठ घंटे या दस घंटे लेट चल रही है। दुर्घटना या आंतकवादी घटना को पांच माह बीत चुके हैं और रेलवे अब तक यह तय नहीं कर पा रही है कि इस ट्रेन को समय पर यात्रियों को कैसे उपलब्ध कराया जाए। रेलवे, हावड़ा- मुम्बई मेल के विलंब का कारण 'सुरक्षा बताता है। अगर उसे इतना ही डर है तो इस ट्रेन के समय में स्थायी परिवर्तन क्यों नहंी करता या सोर्स स्टेशन क्यों नहीं बदलता? क्यों यात्रियों को सुबह नौ बजे से शाम या रात तक इंतजार करने के लिये मजबूर किया जा रहा है़? पश्चिम बंगाल, रेलमंत्री ममता बेनर्जी का गृह राज्य है। शायद यही कारण है कि रेलवे इस ट्रेन को हावड़ा से खडग़पुर-राउरकेला तक रद्द कर आगे की यात्रा पूर्व समयानुसार करने से हिचक रही है। अगर रेलवे को अब भी नक्सली हिंसा का डर है, तो उसे इस ट्रेन का सोर्स स्टेशन हावड़ा की जगह राउरकेला कर उसे आगे के लिये समयानुसार चलाना चाहिये। हम यह नहीं कहते कि सैकड़ों यात्रियों का जीवन संकट में डालकर मेल को या अन्य ट्रेनों को रात में उस रूट पर चलाये, जहां किसी प्रकार के तोडफ़ोड़ की आशंका है। रेलवे यह अच्छी तरह जानती है कि इस रूट पर यह एक स्थाई समस्या है। फिर उसने इसे हल करने का प्रयास पांच महीनों बाद भी क्यों नहीं किया ?। रेलवे की इस ढिलाई से कई यात्रियों ने इस उपयोगी ट्रेन से यात्रा करना छोड़ दिया चूंकि इसका स्टेशनों में पहुंचने का समय ऊठपटांग हो गया। अब यह बात भी लोगों को समझ में नहीं आ रही कि मुम्बई से रवाना होने वाली हावडृ़ा मैल का समय क्यों बदला गया। यह ट्रेन पहले रात आठ बजे के आसपास वीटी से छूटती थी जो अब कई महीनों से सुबह चार बजे छूट रही है। सुरक्षा के नाम पर रेलवे अपनी व्यवस्था ठीक करने में कोताही कर रही है और सैकड़ों याित्रयों को परेशानी में डाल रही है। हावड़ा मुम्बई मेल को उस समय तक राउरकला, रायगढ या बिलासपुर से चलाया जाये जब तक रेलवे इस ट्रेन की सुरक्षा का पुख्ता इतजाम न कर ले। रेलवे की कमजोरी इसी से उजागर होती है कि वह ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे,जिसमें 170 लोग मारे गये थे से अब तक सिर्फ सुरक्षा का बहाना कर कोई वैक्ल्पिक व्यवस्था न करते हुए ट्रेनों को अपनी मनमर्जी से चला रही है- उसे इस बात का कोई सरोकार नहीं कि यात्रियों को कितनी परेशानी हो रही है?यह उल्लेख भी यहां किया जा सकता है कि 19 जुलाई को पश्यिम बंगाल के सैतिया में उत्तरबंगा एक्सपे्रस-वनांचल एस्सपे्रस से भिड़ गई थी तथा इस दुर्र्घटना में 63 लोग मारे गये और 165 से ज्यादा लोग घायल हुए।

रविवार, 14 नवंबर 2010

खूब चिल्लाओं बाबाजी... भ्रष्टाचारियों पर नहीं पडऩे वाला कोई असर...!

खूब चिल्लाओं बाबाजी... भ्रष्टाचारियों
पर नहीं पडऩे वाला कोई असर...!
रामदेव बाबाजी,अन्ना हजारे ,स्वामी अग्रिवेश और किरण बेदी जी-आप सभी महानुभाओं से हमारा सिर्फ एक ही सवाल-आपने रविवार को दिल्ली के जंतर मंतर में चिल्ला चिल्लाकर कहा कि- देश में हजारों करोड़ रूपये का भ्रष्टाचार हुआ। क्या इसका कोई हल निकल सकता है? हर कोई यह जानता है कि देश पांच वर्ष के बजट से भी ज्यादा राशि के भ्रष्टाचार में आंकठ डूबा है। जो सत्ता में है, वह भी और जो सत्ता में नहीं, वह भी। आप जैसे चंद ईमानदार लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर आम लोगों में अलख जगाई उसके लिये आप बधाई के पात्र है। किंतु क्या इससे कोई फायदा होगा? आपने चिल्लाया, जनता ने सुना, सरकार ने भी सुना, विपक्ष ने भी सुना...और सबने सुना और सुनकर सब भूल गये कि- आपने क्या कहा। यह जो भूलने की प्रवृति है, इसी ने आज देश को भ्रष्ट तंत्र के हवाले कर दिया। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की दुहाई देते हैं। अमरीका जैसा विश्व शक्तिमान भी हमारी तारीफ करता है किंतु जिस तंत्र में हम सांस ले रहे हैं। उसमें हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने या कहें जैसा आप लोगों ने जंतर मंतर में चिल्लाया। उस ढंग की तो आजादी है लेकिन किसी की गिरेबान पकड़कर यह पूछने का अधिकार नहीं है कि आपने देश का पैसा क्यों चुराया? तुम्हें इसका अधिकार किसने दिया कि हमारे खरे पसीने की कमाई को तुम यूं ही अपने परिवार को मोटा ताजा करने के लिये लगाओ। बाबा रामदेव सहित सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों का पूर्ण सम्मान व अभिनंदन करते हुए कहना चाहते हैं कि जब तक हम देश में कठोर से कठोर कानून नहीं बनाएंगे। ऐसे भ्रष्टाचारी देश की सत्ता में काबिज होते रहेंगे। सारी व्यवस्था में परिवर्तन करने की जरूरत है। आज राजनीति जहां भ्रष्टाचार की गर्त में आंकठ डूब गई है। वहीं उसके द्वारा चलाया जा रहा सरकारी तंत्र भी आंकठ भ्रष्टाचार में डूब गया है। विकास कार्यो और गरीबों को परोसने के लिये दिये जाने वाले अनाज में तक रिश्वतखोरी की बू आने लगी है। घर में बच्चा पैदा होता है तो उसे भी पैदा करने के लिये अस्पताल को घूस देनी पड़ती है। तब कहीं जाकर मां के पेट से चीर- फाड़ किये बगैर शिशु जन्म लेता है। कैसी दुर्दशा में हम जी रहे हैं। बाबा रामदेव ने चुनाव के दौरान कहा था कि- स्विस बैंक से पैसा निकलवाने में वे अहम भूमिका निभायेंगें। हम पूछना चाहते हैं कि वे कितना पैसा स्विस बैंक से निकलवा सके? इस पांच वर्ष के दौरान देश का अरबों रूपये जो आम गरीब के पसीने से निकलता है नेता, मंत्री और अधिकारी मिल जुलकर खा गये। खेल को तक नहीं छोड़ा उसको भी चबा डाले। फिर भी जापान या अन्य किसी देश की तरह किसी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया। सब स्वतंत्र घूम रहे हैं। कोई विदेश में बैठा ललकार रहा है कि- आ तुझ में हिम्मत है तो मेरा बाल बांका कर ले तो कोई सार्वजनिक मंच पर खिलखिलाकर हमारी खिल्ली उड़ा रहा है कि- देख तेरा पैसा हम कैसे खा गये-तूने हमारा क्या बिगाड़ लिया। बाबाजी आप और आपके साथियों ने समाज को सुधारने के लिये जिस डगर को पकड़ा है। उसकी आगे की डगर बहुत कठिन है। फिर भी हम आपके हिम्मत की दाद देते हैं कि कहीं किसी ने कुछ तो पहल की।

शनिवार, 13 नवंबर 2010

खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?

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रायपुर शनिवार।
दिनांक १३ नवंबर २०१०
खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के
प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?
खाकी पहना पुलिस वाला कोई अपराध करें, तो उसके लिये अलग कानून और आम आदमी ने ऐसा कर दिया, तो उसके लिये अलग कानून। क्या दोनों के अपराध करने का तरीका अलग- अलग होता है? बलात्कार जैसे मामले मेंं अपराधी को तुरन्त गिरफ्तार कर हथकडिय़ों में जकडऩे का प्रावधान है। फिर पुलिस ऐसे अपराध पर इस ढंग की कार्रवाई क्यों नहीं करती?- हम बात कर रहे हैं धर्मजयगढ़ थाने की जहां कि पुलिस पर आरोप है कि उसने दो युवतियों की अस्मत को रौंद डाला। पहले इस मामले पर खूब बवाल मचा। बाद में युवतियों ने बलात्कार से इंकार किया और डाक्टरी परीक्षण से भी इंकार कर दिया। पुलिस के आला अफसर रिपोर्ट लिखने की बात छोडिय़े। इस मामले के अपराधी पुलिस वालों को पकड़कर सींखचों के पीछे भेजने तक से कतराते रहे । समाज की सुरक्षा का दायित्व जिन कंधों पर है, वह जिस ढंग का खेल खेल रहा है। वह उसकी संपूर्ण कार्यप्रणाली को ही एक बार पुनरीक्षित करने का दबाव बना रहा है। धर्मजयगढ़ में कथित बलात्कार की घटना के बाद गा्रमीणों के आक्रोश से कुछ तो कार्रवाई हुई। वरना युवतियों को अपराध के बाद जिस ढंग से दबाया गया, उससे तो लगता है कि इस थाने में यह आदत सी बन गई है। बहुत कम ही मामले होते हैं जिसमें कोई महिला अपने ऊपर बलात्कार का आरोप लगाकर अपने जीवन को दांव पर लगाती हैं। क्या इस मामले में युवतियों व उसके परिवार पर पुलिस का व्यापक दबाव नहीं पड़ा? महिलााओं पर अत्याचार के मामले में सरकार के कड़े कानून की भी पोल इस मामले से खुल जाती है। चूंकि संपूर्ण सूचना देेने के बाद भी महिला अत्याचार को गंभीरता से नहीं लिया गया। बाद में अब यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि बलात्कार हुआ ही नहीं। अगर ऐसा है तो युवतियों पर उलटा मुकदमा क्यों नहीं कायम किया गया? पुलिस युवतियों के पलटने के बाद उनको डाक्टरी परीक्षण के लिये मजबूर भी तो कर सकती थी ताकि- दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाये। बलात्कार की इस घटना ने जिसने पूरे छत्तीसगढ़ की पुलिस को दागदार किया है। पुलिस को इसे धोने के लिये संपूर्ण मामले की निष्पक्ष अधिकारियों से जांच कराई जानी चाहिये। यह अकेले धरमजयगढ़ का मामला नहीं हैं, जहां खाकी पर दाग लगा है। लवन में शनिवार को एक युवक को चोरी के शक में पकड़कर मरा समझकर उसके घर लाकर फेंक दिया गया। इसके विरोध में ग्रामीण सड़क पर आये, तो प्रशासन जागा। राजधानी रायपुर के कुछ थाने तो ऐसे हैं, जहां फरियादी की एफआईआर दर्ज करने तक के पैसे मांगे जाते हैं। नियम यह कहता है कि थाने में एफआईआर दर्ज करने के बाद एफआईआर की कापी फरियादी को भी दें। किंतु क्या पुलिस के आला अफसर बता सकते हैं कि कितने थानों में एफआईआर दर्ज होने के बाद फरियादी को उसकी कापी दी जाती है? खाकी की हरकतें खुद उसे गर्त की ओर ले जा रही हैं। कभी शराब पीकर रास्ते पर हुडदंग तो कभी किसी निर्दोष को पीट- पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। तो कभी थाने में ही किसी युवती की अस्मत लूट ली जाती है। हम कौन से युग में जी रहे हैं? असल बात तो यह है कि खाकी वर्दी पहनने के बाद पुलिस अपने आपको समाज से अलग- थलग एक दूसरे ग्रह का प्राणी समझने लगता है। उसे हमारी पृथ्वी पर रहने वाले जीव दूसरी तरह के नजर आते हैं। आपने कभी किसी समारोह में पुलिस जवानों को ट्रकों में भरकर ड्यूटी पर जाते देखा है- उस मार्ग से जाती महिला को इतना शर्मिन्दा कर दिया जाता है कि वह रास्ते पर आगे बढऩे की हिम्मत नहीं करती। यह है हमारी फोर्स का अनुशासन। जिसे समाज सुधारने का दायित्व सौंपा गया है। असल में पुलिस को हाईटेक करने से पहले उसे पूरी तरह से अनुशासन में रहने और समाज के बीच कैसे काम करना है, यह सिखाया जाना चाहिये। पुलिस के ऐसे जवानों को जो अपने परिवार से दूर रहते हैं। उन्हें क्यों ऐसे ग्रामीण थानों में तैनात किया जाता है, जहां वे अपनी पूरी मनमानी करते हैं?

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

ऑपरेशन क्लीन शुरू करों फिर देखों, लाखों रोजगार पा जायेगें

रायपुर शुक्रवार। दिनांक 12 नवबंर 2010
ऑपरेशन क्लीन शुरू करों फिर
देखों, लाखों रोजगार पा जायेगें
.....और अब सरगुजा का एक इंजीनियर तीन करोड़ रूपये का आसामी निकला.. सरकार के पास ऐसे और कितने हीरे से जड़े अधिकारी हैं? सिर्फ पैसा कमाना ही ध्येय बन गया है, हमारे जनसेवकों का। हर कोई जानता है कि इस देश में ऐसे भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की कोई कमी नहीं है जिनके पास देश के एक बजट से ज्यादा की राशि अपने खजानों में जमा है। नौकरी सरकार की करते है, गुणगान भ्रष्टाचरण में मिले पैसे का होता हैं। सरकार के पैसों को किस तरह से लूट-खसोटकर अपनी तिजोरियों में भरा जा रहा है इसके सैकड़ों उदाहरण सरकार के सामने आने के बाद भी ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है?यही न कि उन्हें कुछ समय के लिये मानसिक प्रताडऩा मिलती है। हमने हाल के आयकर छापों के बाद कुछ लोगों से बात की। तो उनकी ऐसी धारणा बन गई है कि भ्रष्टआचरण में लिप्त ऐसे लोगों का कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि हमारा कानून ही इतना लचीला है कि भ्रष्टाचारी को स्वतंत्र घूमने की खुली छूट है। विभाग में कुछ दिन चक्कर लगायेंगे। बाद में सब आपसी समझौते से रफा- दफा। कोई कठोर कानून ऐसे मामलों में न होने के कारण भ्रष्ट आचरण में लिप्त लोगों के हौसले ऊं चाइयों पर है। सरकार की लाचारी देखिये कि वह भ्रष्ट आचरण में लिप्त लोगों को नौकरी से तक बर्खास्त नहीं कर सकती। ज्यादा से ज्यादा निलबित कर दिया जाता है। कुछ दिन बाद निलंबन वापस लेकर उसे उसी पद पर या उससे ऊंचे पद पर फिर से विराजमान कर दिया जाता है। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें करोड़ों रूपये का घोटाला उजागर होने के बाद ऐसे लोगों को निलंबन के बाद न केवल नौकरी पर वापस लिया गया, बल्कि उन्हें ऊंचे पद पर बिठाकर उनका सम्माान किया गया?आम आदमी जो भ्रष्टाचार से तंग है उसका सरकार से यही सवाल है कि- ऐसे व्यक्तियों को, जो अकूत नाजायज संपत्ति बनाने के लिये दोषी है,उन्हें सरकारी नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाता ? और उन्हें इस तरह अयोग्य घोषित क्यों नहीं किया जाता कि वे आगे किसी सरकारी अथवा निजी संस्थान में काम करने के लायक नहीं रह जाय? उसकी संपत्ति जप्त कर सरकारी खजाने में क्यों नहीं डाली जाती? अगर, नेता ऐसे मामले में दोषी पाया जाता है, तो उसके साथ भी वहीं किया जाना चाहिये। जो सख्ती का बखान हमने सरकारी कर्मियों के लिये किया है। ऐसे नेताओंं की राजनीतिक गतिविधियों के लिये सदा के लिये रोक लगाने के साथ ही उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिेये। क्यों ऐसे लोगों को आम जनता के सर पर लादकर बेवजह उनका बजन बढ़ाया जा रहा है? सरकार अगर किसी भ्रष्ट व्यक्ति को पकड़ती है तो वह इसका ब्योैरा सार्वजनिक करें। साथ ही यह बताये कि उसपर क्या कार्रवाई की गई? उसे कितनी सजा दी गई? यह भी सार्वजनिक करें कि उसे नौकरी से निकाला या नहीं? बकायदा इसे अखबारों में इश्तहार के रूप में जारी करें, जिस प्रकार अन्य मामलों में वह डिफाल्टरों के बारे में जारी करती है। संपत्ति सगे संबन्धियों के नाम पर ही क्यों न हो जप्न्त करें। उसे उतनी ही संंपत्ति अपने पास रखने का अधिकार हो जितना उसने
अपने पसीने से बनाया हो। ऐसे लोगों के लिये इतनी कठोर सजा का प्रावधान हो कि भविष्य में कोई दूसरा ऐसा करने का प्रयास न करें। जबतक इस तरह से सरकार कठोर नहीं होगी, ऐसे भ्रष्ट धन पुत्र सामने आते रहेंगे। ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई नहंी करने का ही नजीजा है कि बेरोजगारों के लिये सीट खाली नहीं हो रही। अगर सरकार भ्रष्टों को एक- एक कर नौकरी से निकालना शुरू करें या 'ऑपरेशन क्लीनÓ शुरू करें, तो कल से देखिये देश में लाखों नवयुवको को रोजगार मिलने लगेगा!

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी भी है कानून में कुछ खामियां!

रायपुर दिनांक 11 नवंबर 2010
मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी
भी है कानून में कुछ खामियां!
कानून भावना मेंं नहीं बहता, साक्ष्य मिला तो सजा,वरना बरी। ऐसे कितने ही मामले रोज अदालतों में पहुंचते हैं जिसमें अपराध करने वालों की मंशा अपराध करने की नहीं होती, किं तु हो जाता है। ऐसे में भारतीय दंड विधान की कई धाराएं एकसाथ सक्रिय हो जाती हैं, जो ऐसे व्यक्ति के निकलने के सारे रास्ते बंद कर देती हैं। क्या कानून में भावना या इमोशन को स्थान दिया जाना चाहिये? इस सबंन्ध में कानूनविदो व आम लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है। लेकिन कुछ अपराध ऐसे होते हैं जो मर्जी से नहीं किये जाते, बस हो जाते हैं। ऐसे अपराधों को क्यों न इमोशन के आधार पर छोटी-छोटी सजा में बदला जायें? अब जयपुर के उस पॉलीटेक्रिक कालेज के डिप्लोमाधारी युवक दीपक की ही बात करें, जिसने लव मैरीज के बाद अदालती कार्रवाही के खर्चे पांच लाख रूपये निकालने के लिये बैंक में एटीएम और लॉकर तोडऩे की योजना बनाई। जिसके लिये वह बैंक के अंदर पूरे साजोसामान के साथ करीब चार दिन रहा और अंत में नाकामी के साथ पकड़ा गया। कानून की नजर में वह चोर है, और सामााजिक दृष्टि से देखे तो थोड़ा बहुत इमोशन इस युवक के प्रति भी मुड़ता है कि उसके सामने यह समाज विरोधी कृत्य जिसे कानून की नजर में अपराध कहते हैं, करने के सिवा कोई दूसरा उपाय ही नहीं था। पांच लाख रूपये आम आदमी के लिये एक बहुत बड़ी रकम होती है जिसे वह न समाज से मांग सकता है और न अपनों से। दोनों ही उसे अपने रास्ते पर छोड़ देंगे। लेकिन जब उसने बैंक में घुसने का अपराध किया तो वह सबकी नजर में चोर बन गया। यह कृत्य उसने तब किया जब वह हर तरफ से हार गया। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय उसके पास था भी नहीं। समाज और कानून को बनाने वालों को ऐसे सवालों का जवाब ढूंढने की जरूरत है। यह युवक सदा के लिये चोर बन गया। भले ही उसे इस कृत्य के लिये एक पैसा भी न मिला हो। दूसरा उदाहरण हम रायपुर में हाल ही घटित उस विस्फोट का दे सकते हैं, जिसने संपूर्ण छत्तीसगढ़ को हिलाकर रख दिया। पहले यह समझा गया कि यह कृत्य रायपुर में पिछले कई समय से सक्रिय कथित डॉन गिरोह का है या फिर नक्सलियों ने दहशत फैलाने के लिये किया है। लेकिन जब पुलिस को तहकीकात के अंतिम समय में जो सुराग मिला उसे कह सकते हैं- खोदा पहाड़ निकली चुहिया- लालच बुरी बलाये, उन युवकों के साथ भी वही हुआ, जो अमूमन अनजाने में अपराध कर जाते हैं। कचरा फेंकने निकले थे और विस्फोट में फंस गये। दवा दुकान अथवा गोदाम में सड़ रहे माल को कबाडी के हाथ बेचने निकले लड़कों को लगा कि अगर कबाड में जा रहे माल में से तांबा निकाल लिया जाये। तो शायद इससे उनकी दीवाली खुशहाल हो जायेगी। इसी चक्कर में उन्होंने मेडिकल कॉम्पलेक्स के कचरे के ढेर में अपने कबाड में रखे डेटोनेटर को मिलाकर आग लगा दी और इससे जो विस्फोट हुआ उसने पूरे प्रशासन को हिला दिया। अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिये यह लड़के तत्काल पुलिस में पहुंचकर अपनी गलती स्वीकार कर लेते, तो भी शायद उन्हें सजा होती। क्योंकि उन्होंने ऐसा कृत्य किया था, जिसने संपूर्ण व्यवस्था को झकाझोर दिया। इस मामले में यद्यपि अदालत मेंं यह लड़के अपनी निर्दोषिता सिद्व कर दे। लेकिन उनके जीवन में आये इस कानूनी दांव- पेंच ने न केवल दवा उठाकर देने वालों के सामाजिक जीवन को मुसीबत में डाल दिया। वरन् कई परिवार जो इन पर आश्रित हैं, उनको भी मुसीबत में डाल दिया। समाज व कानून को ऐसे मामलों में गंभीरता से सोच- विचार कर कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिये कि गेहूं के साथ घुन न पिस सके।

चिथड़े कपड़ों में लिपटे नन्हें हाथों की बुझे बारूद के ढेर में खुशियों की खोज

रायपुर, बुधवार दिनांक ८ नवंबर

चिथड़े कपड़ों में लिपटे नन्हें हाथों की
बुझे बारूद के ढेर में खुशियों की खोज
यह करीब पांच- साढ़े पांच बजे का वक्त होता है,जब लोग दीवाली का जश्र मनाकर गहरी नींद में सो रहे होते हैं- फटे- पुराने कपड़े पहने बच्चों का एक हुजूम लोगों के दरवाजों के सामने होता है। दीवाली के बाद आसपास बिखरे पड़े कचरे के ढेर से यह अपनी खुशी ढूंढते हैं। इन बच्चों की दीवाली लोगों के न टूटने वाले पटाखों की बारूद से मनती है। यह दौर दो- तीन दिन तक चलता है। तब तक इनके पास काफी ऐसे पटाखें इकट्ठे हो जाते हैं। करोड़ों रूपये के पटाखें लोगों ने एक- दो दिन में फूंक डाले, किंतु इसी समाज का एक वर्ग ऐसा भी है। जो सिर्फ हमारी खुशियों को ललचाते हुए निहारता रहता है। यह इस एक साल की बात नहीं है, हर साल ऐसा ही होता है। पो फटने से पहले ही गरीब बच्चे इसी आस में कि कहीं कचरे के ढेर में कोई जिंदा फटाका मिल जायें। फूटे हुए कचरे को उलट- पुलट करते हैं, ताकि वे अपनी दीवाली मना सकें। साठ - बासठ साल की आजादी के इस दौर में हमने कई ऐसे दौर देखे जब देश संकट की घडिय़ों से गुजरा, देश को विदेश से अनाज आयात करना पड़ता था। युद्व,अकाल और प्राकृतिक विपदाओं के उस दौर ने लोगों के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े हो गये थे। समय बीतता गया और उन्नति तथा विकास के दौर ने देश की दिनचर्या ही बदल दी। अमरीकी और रूसी मदद की जगह देश का अनाज हमारे गोदामों में भरा पड़ा है। विकास के पथ पर हमारी बराबरी अन्य विकसित देश के मुकाबले होती है। जबकि ताकत के मामले में हम विश्व की तीसरी ताकत के रूप में हैं किंतु इसके बावजूद हममें जो खामियां हैं। उसे दूर करने का प्रयास किसी स्तर पर नहीं हो रहा। गरीब वर्ग आज भी उसी हालत में है। वह किसी खुशी में भी मुख्य धारा के साथ नहीं जुड़ पा रहा। पंडित नेहरू ने एक समय आराम -हराम है का नारा दिया था, लोग इसे भूल गये। हम अपने त्योहार और उत्सवों की आड़ में अपने सारे कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं। भले ही एक घर में मुश्किल से एक सीमा तक पटाखे फूटते हों, किंतु ऐसा कर पूरे देश में करोड़ों का पटाखा फूट जाता है और हम चैन की नींद सो जाते हैं। दूसरे दिन से कम से कम एक हफ्ते तक कोई काम नहीं होता। अलाली इतनी छा जाती है कि लोग अपना सारा कार्य, यहां तक कि अपनी नौकरी का कर्तव्य भी भूल जाते हैं और स्वीकृत छुट्टियों को और दुगना कर देते हैं। त्योहार के दूसरे- तीसरे दिन भी दुकानें व अन्य संस्थानों का बंद रखना क्या इसी प्रवृत्ति का द्योतक नहीं है? देश ने त्योहार पर जो खुशियां मनाई, वह वाजिब थी। अगर सिर्फ यह मिठाइयों, नाच- गानों और अन्य कार्यक्रमों तक ही सीमित रहता तो उचित था किंतु इस दौरान जो आतिशबाजी के नाम पर अरबों रूपये हमने फूंक डाले। उस पर आगे के वर्षो में विचार करने की जरूरत है। आशिबाजी का पैसा आज उन गरीबों के कपड़े व अन्य उनकी आवश्यकताओं पर व्यय किया जाता। तो शायद उन गरीबों की दुआएं लोगों के घर- घर पहुंचती। आतिशबाजी के रूप में आवाज करने वाले पटाखों पर सरकार ने बहुत हद तक प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन इसके बावजूद ऐसे पटाखे बाजार में कैसे पहुंच जाते हैं? यह सरकार की लापरवाही का ही परिणाम है कि ऐसे पटाखा बनाने वाले कारखानो को वह ऐसा करने से नहीं रोकती।

बीते रे दिन!

रायपुर ,गुरुवार, दिनांक ५ नवंबर
बीते रे दिन!
खुशी,उमंग और उल्लास से भरा दीपोत्सव का त्यौहार हर भारतवासी के जीवन में और खुशियां बिखेरे यही आशा हम दीपोत्सव पर कर सकते हैं। भगवान राम के चौदह साल वनवास के बाद अयोध्या वापसी पर हर साल हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर उनके स्वागत व देश की खुशहाली और उन्नति के लिये यह त्यौहार मनाते हैं। आज से एक नया साल शुरू होता है लेकिन पिछला हमारा कोई ज्यादा अच्छा भी नहीं रहा। भगवान राम की जन्म भूमि का विवाद देश की एक छोटी कोर्ट से जरूर निपटा लेकिन आगे यह अब भी विवादास्पद बना हुआ है या बना दिया गया है। मगर एक आशा जगी है कि हर समुदाय और संप्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचे बगैर इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत इसे भी सदा- सदा के लिये निपटा देगी। सन् 1947 में आजाद हुआ हमारा देश अब बुजर्गियत के कगार पर पहुंच गया है। त्रैसठ वर्षो का लम्बा सफर तय कर लिया गया है। गरीबी,अज्ञानता,मंहगाई, भ्रष्टाचार, आंतक जैसी बुराइयों से हम आज भी निजात नहीं पा सके हैं। देश में नासूर बन चुके नक्सलवाद पर न केन्द्र की कोई नीति हैं और न राज्यों की। समस्या जैसे की तैसे से और बदतर होती जा रही है। बीते कुछ साल का जिक्र करें, तो हम देखते हैं कि हमने कुछ नहीं पाया। गरीब और गरीब हो गये, अमीरों की संख्या बढ़ गई, आंतकवाद पर पिछले वर्षाे के मुकाबले बहुत हद तक हमने सबक लेकर काबू पाया ,किंतु आम आदमी की जिंदगी में कोई सुधार नहीं आया। बेरोजगारी बढ़ गई-इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं ने संपूर्ण देश को घेर लिया। भ्रष्टाचार की जडं़े और मजबूत हो गई। विश्व के भ्रष्टाचार क्रम में भारत का दर्जा बढ़ गया। भ्रष्ट अफसरों, नेताओं तथा अन्य प्रभावशाली लोगों की तिजोरियां इतनी भारी हो गई कि उठाते नहीं बनता। देश के विकास और निर्माण के नाम पर निकलने वाला पैसा कई रावणों की तिजौरियों में भर रही हैं। पड़ोसी राष्ट्रों से संबन्ध सुधरने का दूर-दूर तक पता नहीं। चीनी ड्रेगन कब हम पर वार कर दे कोई नहीं जानता। पाकिस्तान आंतकवादियों की फौज तैयार करने में लगा है। उसकी निगाह हमेशा हमारी जमीन पर आंतक फैलाने और अस्थिरता लाने की रहती है। भारत विश्व में तीसरी ताकत बनकर उभरकर आया है लेकिन विदेशों से अच्छे संबन्ध बनाने के मामले में हम अब भी पिछड़े हुए हैं। दीपावली के इस दौर में हमारे बीच विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की उपस्थिति आत्मीयता का आभास जरूर करायेगी, लेकिन उनका रूख भी भारत के प्रति उतना खास नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हमें विश्व के सबसे बड़े फोरम सुरक्षा परिषद में जगह जरूर मिल गई लेकिन स्थाई सदस्यता के मामले में अमरीकी रूख अभी भी साफ नहीं है। प्रकृति इस बार देश के प्रति बहुत हद तक मेहरबान है। हालांकि भारी वर्षा और बाढ़ से काफी तबाही हुई है किंतु अन्य वर्षो के मुकाबले फसल अच्छी होने से कुछ तो राहत की उम्मीद की जा सकती है। आर्थिक मोर्चे पर हमारी हार चिंता का विषय है। महंगाई पर काबू पाने में नाकामी हर आदमी को चिंतित किये हुए है। पेट्रोल-डीजल को सरकार ने स्वतंत्र कर दिया। फलत: इसके दामों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर खुशियां जरूर मना रहे हैं। साथ में आगे की कई चिंता हमारे दिल को कचोट रही है। फिर भी हम यही सोचते हैं कि भगवान राम ने जिस तरह रावण का वध कर एक नये युग का सूत्रपात किया था, वह युग आगे के वर्षो में हमारे जीवन में आयेगा। आप सभी को दीपमामलाओं के इस मंगलमय उत्सव की अशेष शुभकामनाएं.....।