शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

भ्रष्ट आचरण पर कांगे्रस की महासभा में रहस्ययम चुप्पी!

रायपुर दिनांक 3नवम्बर

भ्रष्ट आचरण पर कांगे्रस की
महासभा में रहस्ययम चुप्पी!
लगता है अब राजनीतिक पार्टियों के पास आम जनता को लुभाने का कोई नुस्खा रह ही नहीं गया। मंगलवार को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सम्मेलन में मुख्य मुद्दा था आरएसएस का आंतकवाद। राहुल गांधी से श्ुाुरू हुआ यह मुद्दा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बड़े- बड़े नेताओं, यहां तक कि सोनिया गांधी की जुबान से भी निकला लेकिन सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात यह कि किसी नेता ने देश के ज्वलंत मुद्दे भ्रष्टाचार पर कोई चर्चा नहीं की। महाराष्ट्र में आदर्श आवास सोसायटी का मामला जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण आकंठ डूबे हुए हैं, पर्र अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी चुप हैं। हाल ही संपन्न राष्ट्र मंडल खेलों में हुए घोटाले के मामले में भी कांग्रेस की बोलती बंद है। कांग्रेस इस मामले में भी अब कुछ कहने की स्थिति में नहीं है कि- देश में मंहगाई के चलते आम जनता को क्या राहत दी जा रही है? विशेषकर मध्यमवर्गीय लोग जिन्हें किसी प्रकार का कोई लाभ सरकार की तरफ से नहीं दिया जा रहा है। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने देश को दो हिन्दुस्तान बना दिया-उनके अनुसार एक हिन्दुस्तान अमीरों का है और दूसरा गरीबों का। वे दोनों हिन्दुस्तान को एक करने की बात कहते हैं। पूरे देश की बागडोर जिनके हाथों में है, वे किससे खाई पाटने की बात करते हैं? क्यों नहीं ऐसे प्रयास किये जाते कि देश में यह स्थिति आए ही नहीं। गरीब और अमीर किसने बनाया? स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी तो देश से गरीबी हटाने का नारा दिया था। क्यों इस वादे को पूरा नहीं किया गया? क्या गरीबी और गरीबों को इसलिये नहीं बनाकर रखा गया कि वे राजनीतिक पार्टियों के वोट बैंक बनकर रहे। क्यों नहीं भ्रष्ट तंत्र पर कड़ाई से लगाम लगाया नहीं जाता? क्यों पार्टियां अपने सम्मेलनों में यह मुद्दे उठाती कि- देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये सख्त से सख्त कानून बनाए जाए। धर्म और संप्रदाय की राजनीति आम जनता को कतई पसंद नहीं । क्या, यह देश के नेताओं की बनाई गई समस्या नहीं हैं? कभी अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा तो कभी आरएसएस की भगवा संस्कृति और उसकी सांप्रदायिकता-आंतकवाद की बात कहकर कब तक देश को यूं बांटने का काम हमारे नेता करते रहेंगे? क्यों ये नेता देश के नव निर्माण, शहरों और गांव के विकास की बात करते? स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू, और स्व. इंदिरा गांधी की उस राजनीतिक पार्टी को यह क्या हो गया कि वह आज देश की जनता को उनकी नीतियों, उनके आदर्शो को त्याग कर दूसरी छोटी- छोटी पार्टियों के बगले झांक रही है। राहुल गांधी कहते हैं कि देश में एकमात्र कांग्रेस पार्टी है तो उनकी पार्टी क्यों नहीं गरीबों को कम से कम मध्यमवर्गीय बनाकर देश से सदैव इस समस्या को खत्म करने का प्रयास करती? आज देश में जो असल गरीब हंै वह और गरीब बनता जा रहा है। जबकि अमीर सारी हदों को पार कर पूरी ऊं चाइयों पर है, उसपर किसी प्रकार की रोक नहीं है। हमारा संविधान समाजवादी समाज की संरचना की बात करता है, लेकिन यह बात आज कहां गई? भ्रष्टाचार देश की रग- रग में समां गया है। जो लोग निर्माण कार्यो और देश के विकास का नारा लगाकर कथित जन सेवा में लगे हैं। वे विकास करने की जगह अपनी व अपने परिवार का पुश्तों तक इंतजाम करने में लगे हैं।

मौत की सामग्री से दहली राजधानी? कौन रच रहा है षडय़ंत्र!

रायपुर दिनांक 1 नवंबर 2010

मौत की सामग्री से दहली राजधानी? कौन रच रहा है षडय़ंत्र!
राज्य गठन की वर्षगांठ से ठीक एक दिन पूर्व रविवार को रायपुर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विस्फोट की अवाज से गूंज उठा। करीब डेढ किलोमीटर का पूरा क्षेत्र दहशत में आ गया। रिहायशी इलाके की बिल्डिंगे हिल गईं। आसपास खड़ी कारों के कांच टूट गये तथा घरों के शीशे सर्वत्र बिखर गये। विस्फोट कचरे के ढेर में पड़े डिब्बों में हुआ जिसमें डेटोनेटर वाले बम थे, जो तारों के गुच्छे व अन्य रासायनिक तत्वों से बने थे। पुलिस के आला अफसरों ने घटना का मुआयना करने के बाद इस संबंध में जो बयान दिया वह कुछ इस प्रकार था-''दीवाली का समय है, किसी ने कचरे में फे के गए विस्फोट में आग लगा दी यह बयान रायपुर में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिये काफी है। वह भी उस समय जब रायपुर में राज्योत्सव चल रहा है, दीवाली की तैयारी चल रही है, और कई महत्वपूर्ण हस्तियां आना जाना कर रही हैं। ऐसे समय शहर को दहला देने वाले विस्फोट पर गैर जिम्मेदाराना बयान ने यह बता दिया है कि पुलिस किसी मामले को गंभीरता से लेना ही नहीं चाहती। इस घटना के बाद शहर को एलर्ट कर दिया गया है किंतु अब तक इस मामले में किसी की जवाबदारी तय नहीं की गई है। रायपुर में राज्य निर्माण दिन 1 नवंबर से ठीक एक दिन पहले हुए इस विस्फोट ने सभी को यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि आखिर इस शांत शहर के शांत वातावरण को बिगाडऩे का प्रयास कौन कर रहा है? राजधानी के आसपास नक्सली हलचल किसी से छिपी नहीं है- धमतरी,महासमुन्द, सरायपाली, कसडोल क्षेत्र में नक्सलियों की सक्रियता स्वयं पुलिस के आला अफसर करते हैं। नक्सली रायपुर के विधायक विश्राम गृह तक में पर्चे लगाकर जा चुके हैं। शहर में कुछ महीने पूर्व भारी मात्रा में अग्रेयास्त्र और विस्फोटक सामग्रियां बरमाद हो चुक ी है। अभी कुछ दिन पूर्व ही पुलिस ने दावा किया था कि उसने रायपुर में स्िरक्रय डॉन ग्रुप को नेस्तानबूत कर दिया है। कुछ लड़कों को पहले पकड़ा गया था, उनके बारे में बताया गया कि वे नहीं है। उसके बाद कुछ नये लोगों को पकड़कर नये पुुलिस वालों ने बताया कि 'यही है ंवे अपराधीÓ आखिर इस दावे के बाद भी राजधानी में हो रहे सीरियल विस्फोटों में किसका हाथ है? क्या फरिश्ता काम्पलेक्स के पास हुए इस प्रभावशाली विस्फोट को यूं ही मामूूली दीवाली के कचरे का विस्फोट मानकर हवा में उड़ा दिया जाए? जबकि रायपुर में पिछले रिकार्ड को खंगाला जाये तो स्पष्ट है कि भाजपा कार्यालय के सामने बस में हुए विस्फोटों से जो शुरूआत हुई वह अब भी जारी है । इस विस्फोट के बाद बूढ़ा तालाब में सीमेंट के बैंच पर, विवेकानंद उद्यान के पास जहां एक बच्चा घायल हुआ। होली क्रास स्कूल गेट पर जहां भारी विस्फोट के बाद स्कूल के कमरों के शीशे फूटे और अब रजबंधा मेैदान क्षेत्र में ट्रांसफार्मर के पास कचरे के ढेर में तार के साथ डेटोनेटर से विस्फोट किसकी वारदात है, और कौन इस षडय़ंत्र में शामिल हैं? रायपुर में पुलिस किसकी सुरक्षा कर रही है? लालबत्ती लगे मंत्रियों के काफिले को आगे बढ़ाने के लिये सड़कों से आम इंसान को जानवरों की तरह हंकालने वाली पुलिस का बस यही काम रह गया है? क्यों वह आम आदमी की सुरक्षा के प्रति लापरवाह है। यह घटना कोई मामूली घटना नहीं है, उसे इसके पीछे गहराई से जाने की जरूरत है। खोज निकालना है कि राजधानी को दहलाने का षडयंत्र आखिर कौन रच रहा है? रविवार को विस्फोट ने संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। अपनी नाक बचाने के लिये एक उच्च पदस्थ अधिकारी का यह बयान कि दीवाली का समय है, किसी ने कचरे में विस्फोटक डाल दिया। जबकि दीवाली के पटाखे अभी फूटे भी नहीं और न ही पटाखोंं का कचरा बना। आखिर पुलिस हकीकत क्यों बयान नहीं करती? क्यों सारे मामले को उलझाकर सरकार व जनता को गुमराह करने का प्रयास करती है? विस्फोटक सामग्री किसने यहां रखी? क्या यह उसी डॉन ग्रुुप का है जिसका अभी तक कोई पता नहीं या फिर नक्सलियों के किसी आतंकी कार्रवाई के लिये एकत्रित की गई मौत की सामग्री।

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

क्यों दी हमने इतनी आजादी?

रायपुर दिनांक २7-अक्टूबर 2010

क्यों दी हमने इतनी आजादी?
प्रख्यात लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुन्धति राय का अब बयान है कि जम्मू कश्मीर भारत का अंग नही हैं। अरुन्धति के इस बयान पर हम केन्द्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री तथा कश्मीर के वरिष्ठ नेता फारूख अब्दुल्ला की उस टिप्पणी का कि क्यों दी हमने अभिव्यक्ति की आजादी का स्वागत करते हुए उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए यह कह सकते हैं कि- भारत में लोगों को कुछ ज्यादा ही आजादी मिली हुई है। आपस में तो एक दूसरे को कुछ भी बोल देते हैं। अब देश के खिलाफ भी बोलने लगे हैं। हाल ही बिहार के सांसद ने बयान दिया कि राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये। चलिये हम मानते हैं कि ऐसी बातें हमारे नेता कहते ही रहते हैं। मगर प्रख्यात लेखिका और समाजसेवी जब यह कहे कि- हमारा दायां या बायां हाथ हमारा नहीं, किसी और का है, तो उसे कैसे मान लें। यही न कि उनकी बुद्वि भ्रष्ट हो चुकी है। वे शायद इस मिट्टी में जन्म लेकर यह इसलिये कह रही है कि उन्हें बोलने की बहुत ज्यादा आजादी दे डाली है। कोई दूसरा देश होता तो शायद मैडम आगे कोई वक्तव्य देने लायक नहीं रह जातीं। विश्व के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में कुछ लोग संविधान द्वारा प्रदत्त बोलने व लिखने की आजादी का इस्तेमाल विनाश के लिए कर रहे हैं। जिस प्रकार से हम इस आजादी का उपयोग कर रहे हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है अरुन्धति राय की विवादास्पद टिप्पणी पर फारूख अब्दुल्ला का यह बयान कि- देश ने आजादी दी है। यह उन पर निर्भर करता है कि वह इसका कैसे उपयोग करते हैं। यह उन्हें अहसास करना है कि क्या सही है और क्या गलत है। क्या कहना चाहिए और क्या नहीं कहना चाहिए, यह व्यक्ति को खुद तय करना होता है। यह बयान अरुन्धति जैसे उन सभी लोगों पर लागू होता है, जो इस देश को खोखला करने की भूमिका अदा करते हैं। अरुन्धति उस समय पैदा भी नहीं हुई होंगी जब देश आजाद हुआ और भारत का एक टुकड़ा देकर पाकिस्तान को अलग किया गया। वही अरुन्धति आज बयान दे रही हैं कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और इसे भारत सरकार भी स्वीकार कर चुकी है। वे यहां तक कह गई कि ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद भारत शीघ्र ही औपनिवेशिक ताकत बन गया। वाह क्या आजादी है हमारे देश में... यूं ही हर कोई अपना मुंह खोलने लगा तो बहुत जल्द एक तरफ पाकिस्तान तो दूसरी तरफ चीन का कब्जा हो जायेगा। सरकार ने तय किया है कि इस लेखिका को अपने बयान के लिये न्याय के कटघरे पर खड़ा किया जाये। अभिव्यक्ति की इतनी भी स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिये कि लोग अपना मुंह देशद्रोहियों- आतंकवादियों के समर्थन में खोलने लगे। यह वही अरुन्धति राय है, जिसने नक्सली हिंसा का भी एक समय समर्थन किया था।

दबा-दबा उत्सव, मीरा कुमार से उद्घाटन क्यों नहीं कराया गया?

रायपुर बुधवार। दिनांक 27 अक्टूबर 2010

दबा-दबा उत्सव, मीरा कुमार से
उद्घाटन क्यों नहीं कराया गया?
राज्योत्सव की तैयारियों में कम से कम एक महीने का समय लगा। इस दौरान रायपुर शहर की सड़कों का डामरीकरण तो नहीं हुआ, हां यह कहा जा सकता है कि पेचिंग हुई। कुछ सड़कों के डामरीकरण का कार्य शुरू किया गया था। जिसे एक रोज दोपहर हुई तो बारिश ने चौपट कर दिया। उसके बाद डामरीकरण की पोल खुल गई और निगम आयुक्त ने डामरीकरण पर रोक लगा दी। महापौर कहती हं कि राज्य शासन ने उन्हें सड़क बनाने पैसा ऐन समय पर दिया। वरना वे सड़कों को चकाचक कर देती! रायपुर में जंग लगे स्ट्रीट लाइट के खम्बों का रंग रोगन हुआ। वह भी एक कोट से, तो डिवाइडरों पर लगे सूखे फूल पौधों को हटाकर कहीं -कहीं दूसरे पौधे लगाये गये। राज्योत्सव हर साल मनाया जाता है, इसका रूप अब बदलता जा रहा है। फायदा किसे हो रहा है? यह तो किसी को नहीं मालूम, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि राजधानी रायपुर दीपोत्सव से पहले रंगारंग दिखने लगी। बालीवुड अभिनेता सलमान खान को कमर मटकाने के लिये कितना पैसा दिया गया? यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन मुश्किल से दस मिनट के कार्यक्रम को देखने उन युवाओं की संख्या ज्यादा थी,जो सलमान खान की बॉडी देखना चाहते थे। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के रूप में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम अपने भारी खर्च के कारण चर्चा का विषय बनता जा रहा है। वहीं इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के माटी पुत्रों, कलाकारों व राज्य के लिये अपनी पूरी ताकत लगा देने वालों की घोर उपेक्षा होने लगी है। सबसे पहला सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ राज्योत्सव की उपयोगिता किस हद तक है? यह आयोजन सिर्फ मनोरंजन और मेले के चंद दिन बनकर रह गया है। जबकि इस आयोजन के लिये हर साल करोड़ों रूपये खर्च होने लगा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि बालीवुड कलाकारों को कार्यक्रमों में बुलाने का खर्च लाखों में होता है। अगर इतना पैसा पुराने रायपुर शहर के विकास कार्यो को तेजी से कर हर साल दीवाली के पहले तैयार कर लोगों के सिपुर्द कर दिया जाता, तो शायद इस उत्सव से ज्यादा इन दिनों की चर्चा होती। छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार इस आयोजन से दरकिनार कर दिये गये हैं। छत्तीसगढ़ी या हिन्दी के गायक कलाकारों की जगह पॉप सिंगर,पंजाबी सिंगर और अन्य इसी प्रकार के लोगों को बुलाकर इस अंचल के प्रतिभाओं की उपेक्षा की गई। छत्तीसगढ़ी नाचा,गम्मत ,लोकसंगीत से परहेज क्यों किया जा रहा है? सवाल यह भी उठता है कि छत्तीसगढ़ी भाषा के कार्यक्रमों का राज्योत्सव से गायब होने पर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिये हल्ला मचाने वालों ने मौन क्यों साध रखा ? क्या छत्तीसगढ़ में कलाकारों की कमी थी, जो बाहर से आयातित कर कलाकारों को बुलाया जाता है? छत्तीसगढ़ में जनाब शेख हुसैन को लोग मोहम्मद रफी की आवाज का द्योतक मानते हैं। निर्मला ठाकुर को छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर के रूप में जाना जाता है। अनसूइया, कविता वासनिक, लक्ष्मण मस्तूरिया को कार्यक्रम से क्यों दूर रखा गया? राज्यपाल शेखर दत्त उद्घाटन के लिये उचित व्यक्ति थे, लेकिन उद्घाटन समारोह के दिन लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार के राष्ट्रकुल संसदीय सम्मेलन में आने का कार्यक्रम पहले से तय था। उनसे एप्रोच की जाती, तो समय निकालकर इस आयोजन का उद्घाटन कर सकती थीं। लेकिन, उनसे शायद इस मामले में बात ही नहीं की गई। बहरहाल, छत्तीसगढ़ राज्योत्सव पूरे छत्तीगढ़ का न होकर यह सिर्फ राजधानी तक ही सिमटकर रह गया है। जबकि इसका पूरा फायदा छत्तीसगढ़ के हर नागरिक को किसी न किसी रूप में मिलना चाहिये। जिस समय साइंस कालेज में कार्यक्रम चल रहा था। उस समय रायपुर की सड़कों का नजारा रोजमर्रे जैसा था। साइंस कालेज में भीड़ थी किंतु यह भीड़ कार्यक्रम में नेताओं का भाषण सुनने के लिये नहीं, वरन् अभिनेता को देखने के लिये थी। अभिनेता यहां पहुंचे भी तो सिर्फ एक उद्योगपति का प्रमोषन करने के लिये। इससे कम से कम यह अंदाज तो लगाया जा सकता है कि राज्योत्सव कितना सिमटता जा रहा है।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

नेताओं के मसखरे बयानो के सफर मेंजुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !

रायपुर गुरूवार 28 अक्टूबर 2010
नेताओं के मसखरे बयानो के सफर में
जुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !
सुनिये हमारे राजनेता क्या कहते हैं-
बाल ठाकरे नकलची बिल्ली हैं- राज ठाकरे
राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये- शरद यादव
राज की मनसे चूहों की पार्टी है- बाल ठाकरे
आरएसएस और सिमी में कोई फर्क नहीं।-राहुल गांधी
और इन सबसे हटकर अपनी लोकप्रियता को चार चांद लगाने के लिये समाज सेविका और प्रख्यात लेखिका क्या कहती हैं सुनिये-कश्मीर शुरू से भारत का अंग नहीं है, इतिहास इसका गवाह है। भारत सरकार ने इसे स्वीकार किया है-अरुंधति राय
जो चाहे बोलो-जो चाहे करो और जितना चाहे पैसा अपनी पेटियों में भरते जाओ और जगह नहीं तो गुसलखाने और कुत्ते को बांधने के कमरों में भी भरते जाओ। लोगों को मिली इस आजादी को हम क्या कहें? मनमानी, एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी या लोगों के मुंह में लगाम नहीं अथवा अनाप शनाप छूट? शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में उतार दिया। राज ठाकरे, उद्वव ठाकरे, बहू स्मिता ठाकरे और अब भतीजे आदित्य ठाकरे। महाराष्ट्र तथा कुछ अन्य प्रदेशों में सीमित चल रही उनकी राजनीति को कभी भाषा के माध्यम से हवा में लहराया जाता है। तो कभी किसी चैनल या अखबार में तोडफ़ोड़ अथवा आपस में एक दूसरे के विरूद्व बयान को हवा देकर। लालू प्रसाद,अमर सिंह जैसे कुछ अन्य नेताओं की जुबान पर भी लगाम नहीं। लालू भी अब परिवारवाद पर उतर आये हैं। लानू के बाद बेटे को भी राजनीति के मैदान में लाकर खडा कर दिया। जनता नेताओं के पैतरे नहीं समझती। अत: वह उनके कारनामों व बयानों का मजा लेकर उसके पीछे भागती है। बिहार में चुनाव के दौरान जो प्रमुख आरोप- प्रत्यारोप हुए, उसमें शरद यादव का बयान इन दिनों चर्चा में हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये। सोचिये इस बयान का क्या मतलब है? सिवाय सुनने वालों में से कुछ लोग भीड़ में खिलखिलाकर हसें और मजा लें। राहुल गांधी के एक राजनीतिक बयान ने भी अच्छा खासा हंगामा खड़ा किया हुआ है। उन्होंने आरएसएस और सिमी को एक ही चट्टे बट्टे का कह दिया। रांची-पटना की अदालत तक यह मामला पहुंच गया। जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने और अपना नाम फैलाने के लिये संविधान में प्रदत्त अधिकारों का किस तरह दुरूपयोग हो रहा है। वह है प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय का वह बयान जो उन्होंने जम्मू कश्मीर के एक सेमिनार में दिया। जहां उन्होंने कश्मीर को भारत का अंग होने से ही इंकार कर दिया। इससे पूर्व इसी लेखिका ने नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जायज ठहराया था। भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि वह देश की अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ कुछ भी बयान दे। देश में राजनेताओं के अलावा समाज और साहित्य से जुड़े लोगों के इस तरह सार्वजनिक स्थलों पर बयान देने, आरोप- प्रत्यारोप पर हमारी न्याय पालिका कौन सा रूख अपनाती है? यह तो समय के गर्भ में है लेकिन अगर ब्यक्ति अपने अधिकार से बाहर जाकर कोई बयान दें या फिर राष्ट्र विरोधी कार्य करे तो न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका तीनों को ही संयुक्त कार्रवाही के लिये आगे आना चाहिये। अगर जरूरत पड़े तो इसके लिए कड़े कानून पर भी विचार किया जाना चाहिये। यह एक अरुंधति का अकेला सवाल नहीं है। अरुंधति ने खुले आम यह बात कही तो कानून के कान खड़े हो गये, लेकिन ऐसीे राष्ट्र विरोधी बातों को छोड़ दें तो राष्ट्र विरोधी हरकतों में भी लोग लगे हुए हैं। उनको भी छांटकर बाहर निकाला जाना चाहिये।

नये पत्रकार पढ़ेंगे आउटर में, इंजीनियर भी होगें शहरबदर!

रायपुर मंगलवार 26 अक्टूबर 2010
नये पत्रकार पढ़ेंगे आउटर में,
इंजीनियर भी होगें शहरबदर!
कई दिनों से कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अमलेशर में शिफ्ट किया गया और सोमवार से वहां पढ़ाई भी शुरू हो गई। करोड़ों रूपये खर्च कर तैयार किये गये इस कैम्पस में मात्र सौ छात्र -छात्राएं हैं। जिन्हें अनेक बाधाओं को पार कर इस विश्वविद्यालय तक पहुंचना पड़ता है। इन बाधाओं में शराबी,जुआरी और अन्य समाजविरोधी तत्व भी हैं। अब तक यह विश्वविद्यालय कोटा में चल रहा था। यहां से हटाकर इसे अमलेशर ले जाने का सपना किसने देखा? यह तो पता नहीं, किंतु जिसने भी इस बुद्वि का इस्तेमाल किया। उसकी सोच की दाद दी जानी चाहिये कि वह छात्रों को मुश्किलों से जूझना सिखाकर ही पत्रकारिता की डिग्री लेेने के लिये मजबूर करेगा। वैसे यह एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय का अकेला मामला नहीं है। शहर में यत्र तत्र फैले कॉलेजों का भी यही हाल है। जहां तक पहुंचने के लिये छात्रों को कई किस्म के पापड़ बेलने पड़ते हैं। रायपुर का मेडिकल कालेज पहले आज जहां आयुर्वेदिक कालेज है उसके बगल में अभी जहां डेंटल कालेज हैं, वहां लगा करता था। तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण चाहते थे कि मेडिकल कॉलेज जेल रोड़ पर बने। उन्होंने उसे वहां बना दिया। जबकि उस समय विश्वविद्यालय के पास इतनी भूमि पड़ी थी कि एक अच्छा और भव्य मेडिकल कालेज इसके पा्रगंण में बन जाता। विश्वविद्यालय के आसपास का सारा क्षेत्र शिक्षा से संबन्धित संस्थानों से भरा पड़ा है। फिर योजनाकारों ने शैक्षणिक संस्थानों को क्यों अलग -अलग किया। विश्चविद्यालय के समीप ही इंजीनियरिंग कालेज जो अब एनआईटी है, सामने साइंस कॉलेज, पीछे छात्रों का छात्रावास, बाजू में आयुर्वेदिक कॅालेज, संस्कृत कॉलेज , यूटीडी जैसी सुविधाएं हैं, तो अन्य नई उदित होने वाली शौक्षणिक संस्थानों को शहर से बाहर क्यों किया गया?एनआईटी को भी शहर बदर कर दिया गया है। सरकार के शैक्षणिक संस्थानों और निजी शैक्षणिक संस्थानों में अंतर ही क्या रह गया। रायपुर शहर पहली बार पहुंचने वालों को अगर रविशंंकर विश्व विद्यालय प्रागंण या उसके आसपास ही सारे शिक्षण संस्थान एक साथ मिल जाते तो दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़़ता। एनआईटी का नया भवन शहर से बाहर बनाकर, उसे भी शहर बदर कर दिया गया है। कुछ ही दिनों में नई राजधानी में सारे सरकारी दफतर मंत्रालय आदि शिफट हो जायेंगें- इससे शहर की सड़कों पर भीड़ थोडी बहुत कम होगी। बड़े अधिकारियों का कुछ नहीं बिगडऩे वाला लेकिन तृतीय और चतुर्थ वर्ग कर्मचािरयों की क्या स्थिति होने वाली है? इसकी कल्पना की जा सकती है। हालांकि बड़े शहरों की तरह लोकल ट्रेन, सिटी बस सेवा आदि की योजना है। मगर इस नई व्यवस्था को झेलकर उसमें समा जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। विशेषकर रायपुर में रहने वाली महिला कर्मचारियों के समक्ष तो बहुत बड़ी समस्या शुरू- शुरू के दिनों में आने वाली है।

सेना ने उत्साह तो भरा युवाओं में !

रायपुर दिनांक 25 अक्टूबर 2010
वो जज्बा अनुशासन पहले था अभी नहीं,
लेकिन सेना ने उत्साह तो भरा युवाओं में !
आजादी के बाद के वर्षो में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों पड़ोसी राष्ट्रों से हमारा किसी न किसी मुद्दे को लेकर युद्व हुआ है। उस दौरान जो युवा थे। आज बुजॢगयत की ओर बढ़ रहे हैं। उस समय और अब में काफी परिवर्तन देखा जा रहा हैं। युवाओं में अनुशासनहीनता, समय का पाबंद न होना और अन्य अनेक किस्म की कमजोरियां घर कर गई है। देर से सोकर उठना और अपनी दिनचर्या को शुरू करने में अच्छा खासा आलस- यह सब देखने मिलता है। यहां तक कि जब तक साहबजादे के बिस्तर पर चाय न पहुंच पाये उठते ही नहीं। लड़कियां भी इस मामले में पीछे नहीं है। आपने कभी सोचा है- इन सबके पीछे कारण क्या है? हम जहां तक इसका आंकलन करते हैं- वह यह कि युवाओं को व्यवस्थित नहीं किया जा रहा। उन्हें किसी भी रूप में अनुशासन का पाठ नहीं डढ़़ाया जा रहा। युद्व के दौरान स्कूल और कॉलेजों में एनसीसी को कम्पलसरी कर दिया गया। इससे एक बात अच्छी हुई कि उस समय के युवा न केवल मेनर्स सीख गये, बल्कि उनमें अनुशासन और जीवन जीने की कला भी आ गई। समय पर उठना, समय पर खाना-पीना और अन्य अनेक दिनचर्या के क्रियाकलापों को एनसीसी के माध्यम से कू टकूट कर भर दिया गया। आज भी आप देख सकते हैं कि एनसीसी में अर्ध सैन्य प्रशिक्षण लेने व अन्य युवाओं की तुलना करने से दोनों के बीच काफी अंतर नजर आता है। अभी स्कूल कॉलेजो में एनसीसी कम्पलसरी नहीं हैं। किंतु हम इस बात का पुरजोर समर्थन करते हैं कि स्कूल और कॉलेज में युवाओं के लिये एनसीसी को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उच्च शिक्षा लेने के बाद कम से कम दो साल की सैनिक शिक्षा हर युवा को नौकरी के लिये अनिवार्य घोषित किया जाना चाहिये। छत्तीसगढ़ के युवा विशेषकर राजधानी रायपुर के युवा सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें हाल के दिनों में भारतीय स्थल और वायु सेना के बारे में जानकारी लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वरना यह अंचल तो इस मामले में वर्षो से शून्य रहा है। रायपुर के पुलिस परेड मैदान में सेना ने अत्याधुनिक हथियारों के अलावा ब्रह्मोस का डिमांस्ट्रेशन किया। थल व वायुसेना के जवानों द्वारा मोटर सायकिल डिस्प्ले, जंप, घुड़सवारी आदि के साहसिक कारनामों को देख युवाओं में जरूर सेना में भर्ती का लालच बढ़ा है। भारतीय वायुसेना की ओर से भी जवानों ने स्काय ड्रायविंग,हाट एयर, बैलुनिंग, पॉवर स्लाइङ्क्षडगं , माइक्रोलाइट डिस्पले, मौस मिलेट्री डिस्प्ले का बखूब प्रदर्शन कर युवाओं में वायुसेना में शमिल होने के प्रति दिलचस्पी पैदा की है। अगला आने वाला समय छत्तीसगढ़ के युवाओं का है। ज्यादा से ज्यादा युवा सेना में भर्ती होकर राज्य का नाम रौशन कर सकेंगे। राज्य सरकार को चाहिये कि इस अंचल में भारतीय सेना की टुकडियां स्थापति करने की दिशा में पहल करें। ताकि यहां इनके कार्यो को देख युवा ज्यादा से ज्यादा सेना की ओर आकर्षित हों। सेना अब छत्तीसगढ़ उड़ीसा में नेशनल काउंटर ट्रेररिस्ट कैम्प खोलने की पहल कर रही है। इसके लिये मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सारी मदद देने के लिये तायार है। यह एक अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री की सेना के प्रति विशेष दिलचस्पी है। वे शुरू से छत्तीसगढ़ में सेना की टुकड़ी की वकालत करते रहे हैं। युवाओं को इसका फायदा उठाना चाहिये। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिये कि इस समय जिन स्कूल और कॉलेज में एनसीसी का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। वहां केन्द्र सरकार पर दबाव डालकर एनसीसी केन्द्र खुलवाये। ताकि ज्यादा से ज्यादा युवा अनुशासन का बुनियादी पाठ सीख सके ।

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

कालिख पर सफेदी का प्रयास-बिल्ली दूध पी गई,सब देखते ही रह गये!

रायपुर दिनांक 23अक्टूबर 2010
कालिख पर सफेदी का प्रयास-बिल्ली
दूध पी गई,सब देखते ही रह गये!
कांग्रेस अब सामी के मुंह के कालिख को सफेद करने में लगी है। इसके लिये स्थानीय नेता कभी कुछ तो कभी कुछ बयान देने में लगे हैं। इसमें दो मत नहीं कि इस पूरे कांड में किसी बड़ी हस्ती का हाथ है। वह कौन है? इसका खुलासा करने की जगह कांग्रेस के सम्माननीय नेता मामले को और उलझाने में लगे हैं। यह लगभग सभी बड़े कांग्रेसियों को मालूम है कि किसने इस शर्मनाक घटना को जन्म दिया, लेकिन गुटबाजी में लिप्त प्राय: सभी नेता इस मामले में एक हो गये हैं। उनके मुंह से या तो नाम निकल नहीं रहा या वे खामोश आगे के एपीसोड़ का इंतजार कर रहे हैं। इस पूरे कांड में लिप्त आरोपियों ने जो खुलासा किया उसमें छोटे शिकारी ही प्रकाश में आये हैं। असल जो हैं वह या तो इस पूरे कांड की निंदा करने में लगे हैं या जांच की मांग करते हुए भीड़ में शामिल हो गये तथा तमाशे को और रोचक बनाने में लगे हैं। रायपुर में कांग्रेस का पुराना इतिहास देखा जाये तो यहां बहुत से कांड कांग्रेस भवन या बाहर हुए हैं। जो कांग्रेस के असली चेहरे को उजागर करती रही है। बिल्ली के बारे में एक बात प्रसिद्व है वह जब दूध पीती है तो आंखे बंद कर लेती है। इससे उसे ऐसा अहसास होता है कि वह जो कर रही है उसे कोई देख नहीं रहा। हममें से बहुत से लोगों ने कांग्रेस की कई हस्तियों को ऐसे कारनामें करते देखा है, जिसे अन्य लोग भी जानते हैं किंतु उसे हमेशा पर्दे में ही रहने दिया गया। असल में कांगे्रस इस कांड के बाद छत्तीसगढ़ में जो छबि खराब कर चुकी है, उसे सुधारने के लिये यह जरूरी है कि इस पूरे कांड में जो लोग भी इनवोल्व हैं उन्हें पूरी तरह से बेनकाब करें। ताकि कांग्र्रेस प्रदेश में अपना वजूद फिर से स्थापित कर सके। पार्टी के अंदर जितने भी ऐसे तत्व हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाये। हम यह नहीं कहते कि यह बीमारी सिर्फ कांग्रेस के अंदर है। भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों में भी इस ढंग के लोगों की मौजूदगी किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे नेता अपने प्रतिद्विन्दी को नीचा दिखाने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं-ऐसे नेताओं की ही करनी का परिणाम है- सामी के मुंह पर कालिख। अगर घर के अंदर घुसकर आपके मुंह पर कोई कालिख पोतकर चला जाये तो पुलिस क्या करें? कांग्रेसी इस समय यही चिल्ला रहे हैं कि सरकार ने सामी की सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया। अगर मान लें सरकार सुरक्षा का इंतजाम करती भी तो क्या यह वारदात नहीं होती? सामी कांग्रेस भवन में अपने परिवार अर्थात कांग्रेसियों की बैठक में थे। यहां उनके ही सदस्यों के कहने पर कुछ पैसे की लालच रखने वालों ने यह कृत्य कर दिया, तो इसमें सुरक्षा व्यवस्था क्या करती? अगर सुरक्षा में लगे पुलिसवाले ऐसे माहौल में कांग्रेस भवन या भाजपा कार्यालय में उस समय घुस जाते, तो वही एक हंगामे का कारण बन जाता। यह किसी नेता को बताने की जरूरत नही,ऐसा होता आया है। नेताओं को हमारा सुझाव है कि वे ऐसा ही काम करें, जो आम जनता के गले उतरे। उसे पहले जैसा बेवकूफ न समझे वह पढ़- लिख गया है और समझदार भी हो गया है। राजनीति करने वाले सभी को यह बात अब समझ लेनी चाहिये कि वह आम लोगों को अपनी तिकड़मबाजी से गुमराह नहीं कर सकते। सामी के मुंह पर कालिख पुती, इससे रायपुर शहर सहित पूरा छत्तीसगढ शर्मसार है। एक अतिथि का हमने अनादर किया है। इसका खामियाजा उन सच्चे कांग्रेसियों को ऐसे व्यक्ति का नाम सामने लाकर करना चाहिये। फिर चाहे वह कितना ही बड़ा ओहदा या प्रभावशाली व्यक्तित्व क्यों न रखता हो। हम यह भी जानते हैं कि ऐसा जो भी व्यक्ति इस कांड में लिप्त है, उसका भेद खुलने पर वह कहीं का न रह जायेगा। उसका राजनैतिक कैरियर सदैव के लिये खत्म हो जायेगा, लेकिन अगर किसी में भी देश के स्वस्थ प्रजातांत्रिक व्यवस्था की चाह है, तो उन्हें ऐसे लोगों को बिना किसी हिचक के बेनकाब करना चाहिये।

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

बाबाजी योग कीजिये..क्यों

रायपुर दिनांक 22 अक्टूबर 2010

बाबाजी योग कीजिये..क्यों बर के छत्ते पर
हाथ डाल अपनी छबि खराब कर रहे हैं?
योग गुरू बाबा रामदेव ने सरकार को धमकी दी है कि अगर सरकार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये जरूरी कदम उठाने में नाकाम रही, तो उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी बनानी होगी। हमारा तो कहना है कि उन्हें तुरंत अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन कर देना चाहिये। चूंकि न सरकार पर उनकी धमकी का कोई असर होने वाला और न ही देश से भ्रष्टाचार का अंत होगा। बल्कि बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के समर्थन में कोई पार्टी बना लें तो वे शीघ्र सत्ता में आकर प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर बैठ सकते हैं। बाबा रामदेव की भावना का तहे दिल से स्वागत करते हुए उन्हें यह सलाह देना चाहते हैं कि वे देश से और कुछ गंदगी को निकालने के लिये राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार...इसके खिलाफ पार्टी बनाने की कैसे सोच रहे हैं। बाबा रामदेवजी आपको कौन समर्थन देगा? देश का तंत्र जिस तरह से भ्रष्ट हो गया है, उसके आगे आप तो क्या भगवान भी जमीन पर उतर आये, तो उन्हें भी लोग रिश्वत देकर यह कहते हुए ऊपर वापस भेज देंगे कि- अभी तो मौका है, मरने के बाद थोड़े कमाने मिलेगा। भारत की राष्ट्रपति,भारत का सर्वोच्च न्यायालय, और भारत के प्रधानमंत्री सब तो भ्रष्टाचारी व्यवस्था को लताड़ चुके हैं और सम्हलने की चेतावनी दे चुके हैं। किंतु भ्रष्टाचार रूपी दैत्य का मुंह इतना खुल गया है कि उसमें पूरा देश ही समा गया है। बाबा रामदेवजी आप तो रोज अखबार पढ़ते और टीवी देखते होंगे फिर भी आपने कैसे यह धमकी दे डाली? हाल ही खत्म हुए कामन वेल्थ गेम्स में भारतीय मीडिय़ा जहां सिर्फ अठारह हजार करोड़ रूपये के गोलमाल की बात कर रही है। वहीं विदेशी मीडिया का दावा है कि पचास अरब का गोलमाल हुआ है। अगर रामदेव बाबा अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन करते हैं तो देश में बचे चंद ईमानदारों का ही समर्थन प्राप्त होगा। जबकि आज उनके योग शिविर और उनके भाषणों में हजारों लोग शिरकत करते हैं-शायद इसमें भी बहुत से उस तंत्र के लोग शामिल होगें, जिनकी खिलाफत करने के लिये बाबा राजनीतिक पार्टी की बात कर रहे हैं- बाबाजी पार्टी गठित हो जायेगी तो ऐसे लोग न आपका भाषण सुनने आयेंगे और न आपकी बनाई हुई दवाइयों को खायेगें। इसलिये यही अच्छा है कि आप जहां हैं वहीं रहें-क्यों जबर्दस्ती मधुमक्खी या बरयै के छत्ते पर पत्थर फेंक रहे हैं। मगर हम आपके हिम्मत की दाद देते हैं कि- इस एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में मर्दांनगी से आपने सरकार को ललकारा तो। वरना यहां लोगों के घरों की दीवारों और कुत्तों को सुलाने के कमरे और कुत्ते के तकिये से सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के चित्रों से छपे नोट टपकने के बाद भी लोगों को इस बात की भी चिंता नहीं होती कि जो पैसा इन भ्रष्टाचारियों के घरों से निकल रहा है। वह किसी अपने भाई की जेब से निकाला गया है या किसी की गर्दन काटकर भरी गई है। रामदेव बाबा ने सरकार से अनुरोध भी किया है कि- वह देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रभावकारी कदम उठाए और जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं, उनके लिए मौत की सजा का प्रावधान किया जाए। रामदेव बाबा पिछले विधानसभा चुनावों से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है । उनकी मांग स्विस बैंकों में जमा भारतीय धन को भी देश में लाने की है। बाबा आसमान से तारा तोडऩा चाहते हैं। सभी को मालूम है यह इतना आसान नहीं है!

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

बस कुछ भी हो आव देखा न ताव कह दिया यह शत्रु की करामात!

रायपुर गुरुवार। दिनांक 21 अक्टूबर 2010
बस कुछ भी हो आव देखा न ताव
कह दिया यह शत्रु की करामात!
कोई घटना हुई नहीं कि उसपर स्टेटमेंट जारी करने में लोग देरी नहीं करते। चाहे वह सही हो या नहीं अथवा उसकी हकीकत सामने आई हो या नहीं बस निशाना सीधे अपने विरोधी पर होता है। मंगलवार को कांग्रेस भवन में कांगे्स संगठन प्रभारी और केन्द्रीय मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंकने की घटना ने दिल्ली को भी हिला दिया। मामला कांग्रेस संगठन के एक वरिष्ठ नेता व केन्द्रीय मंत्री का होने के कारण इसकी महत्ता और भी बढ़ गई। कांग्रेस के प्राय: सभी नेताओं ने संतुलित होकर बयान जारी किया। घटना की निंदा की गई तथा दोषियों को कड़ी सजा की मांग की गई, मगर कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ पदाधिकारी व सासंद का जो बयान आया, उसने यह बता दिया कि राजनीति को किस किस तरह से रंगने का प्रयास किया जाता है। उक्त सासंद ने इस पूरे कांड के लिये भाजपा को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां तक कह दिया कि इससे भाजपा की पोल खुल गई। लगे हाथ सरकार पर आरोप भी लगा दिया कि उसने नारायण सामी की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया। अखबारों में छपी तस्वीरे साफ गवाह है कि पुलिस के शस्त्रधारी वी नारायण सामी को घेरे हुए हैं। इसके बावजूद ऐसे आरोप लगाकर जिम्मेदार नेता क्यों आम लोगों को गुमराह कर अपना मकसद साधने का प्रयास करते हैं? बुधवार की शाम तक कांग्रेस भवन में घटित घटना का जो खुलासा हुआ है। वह यही कह रहा है कि यह कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी का परिणाम है जिसके चलते कतिपय नेताओं ने भाड़े के युवकों को इकट्ठा कर यह कृत्य करवाया है। पुलिस जांच में यह खुलासा भी हुआ है तथा आरोपियों ने एक युवा नेता का नाम लिया है, जिसने प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता का सीधे सीधे नाम लेकर मामले को उलझा दिया है। यह अब लगभग स्पष्ट हो गया है कि पूरी घटना कांग्रेस की अदंरूनी गुटबाजी का परिणाम है लेकिन जिस ढंग से प्रदेश के नामी बड़े नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। उसपर सहज विश्वास करना आसान नहीं लेकिन यह सही है कि कांग्रेस की गुटबाजी के चलते ही यह काम किसी ने करवाया है मगर अब जो राजनीति इस मामले में चल रही है, वह आपसी लड़ाई को भुनाने की एक चाल भी लगती है। यह सही हो सकता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिये सामी का कथित रवैया कई नेताओ को पसंद नहीं आया इसे इस ढंग से भुनाया जायेगा इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। चूंकि जिन नेताओं पर यह आरोप लग रहे हैं। वे शायद ही ऐसा कृत्य कर अपने पूरे राजनीतिक कैरियर को दांव पर लगायें। बहरहाल, इस घटना का आगे जो भी खुलासा हो वह किसी के राजनीतिक भविष्य को खराब कर सकता है लेकिन घटना से उन नेताओं को जरूर सबक लेना चाहिये। जो घटना होते ही विरोधियों पर निशाना साधते हैं। कालिख पोछने से सामी को उतना फरक नहीं पड़ा होगा जितना कि इस घटना की जिम्मेदारी को भाजपा, सरकार व प्रशसान को जोड़कर तत्काल बयान देने वालों का हुआ । मै यह कहकर भाजपा का पक्ष नहीं ले रहा बल्क् ियह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि राजनीति में अक्सर लोग किस तरह उतर जाते हैं- भाजपा विपक्ष में होती तो उनका कोई नेता भी शायद इसी तरह का बयान देता।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

गुटों के जाल में नेताओं के मुंह पर कालिख का खेल!

रायपुर बुधवार। दिनांक 20 अक्टूबर 2010

गुटों के जाल में नेताओं के मुंह पर कालिख का खेल!
जब- जब कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर आती है, कांग्रेस में ऐसी घटनाएं होती हैं जो मंगलवार को कांग्रेस भवन में हुई। कुछ लड़कों ने प्रदेश कांग्रेस संगठन प्रभारी और केन्द्रीय मंत्री वी नारायण सामी के चेहरे पर कालिख पोत दी। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिये नियुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीमती विप्लव ठाकुर को भी नहीं बख्शा गया। कांग्रेस का फलेश बैक करेें तो पूर्व के वर्षो में जब अर्जुन सिंह प्रदेश कांग्रेस के नेता के रूप में रायपुर पहुंचे। तो उनके साथ जयस्तंभ चौक में गिरनार रेस्टोरेंट के सामने कुछ कांग्रेसियों ने झूमा झटकी- धक्का मुक्की की। ये कांग्रेसी उस समय के एक बड़े नेता के समर्थक थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जैसे ही लोगों को पता चला कि अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बनाना लगभग तय कर लिया गया है। तो विद्याचरण शुक्ल के फार्म हाउस में तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ जो कुछ हुआ, उसे बहुत से लोग जानते हैं। दिग्विजय सिंह यहां से जानबचाकर भागे थे। राज्य बनने के बाद विद्याचरण शुक्ल मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे लेकिन सोनिया गांधी ने अजीत प्रमोद जोगी को पसंद किया और वे मुख्यमंत्री बनें। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की गुटबाजी का पुराना इतिहास हैं। यह मध्यप्रदेश के समय से चला आ रहा है। जिन घटनाओं का उल्लेख ऊ पर किया गया, वे तो सिर्फ उदाहरण हंै जो आज भी लोगों की जुबान पर है। इसमें दो मत नहीं कि एक समय ऐसा भी था जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की तूती बोलती थी। मध्यप्रदेश सरकार को सदैव झुका देेने वाली ताकत रखने वाली कांग्रेस का ऐसा हश्र क्यों हुआ कि वह इस प्रदेश में अपना जनाधार तक खोती जा रही है? कभी विद्याचरण शुक्ल तो कभी अर्जुनसिंह गुट और बाद में चलकर कई गुटों में विभक्त कांग्रेस आज प्रदेश में इतने गुटों में बंट गई है कि पता नहीं चलता कि कौन किस गुट का हैै। अजीत जोगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में उनके गुट ने एक तरह से विद्याचरण-श्यामाचरण गुट से उनकी गुटबंदी का साम्राज्य छीन लिया। लेकिन जोगी गुट के विरोध में मोतीलाल वोरा, चरण दास मंहत जैसी हस्तियां भी आ गई। एक बार तो जोगी और वोरा भी सार्वजनिक रूप से लड़ पड़े। वोरा का दखल हाईकमान में होने के कारण उनके गुट की भी प्रदेश में अच्छी खासी साख बन गई और गुटबंदी का बाजार गर्म हो गया। विधानसभा चुनाव के वक्त तो यह गुट साफ नजर आते लेकिन बाद में इन गुटों का अस्तित्व निकाय व पंचायत चुनावों तक में नजर आने लगा और अब यह कैंसर का रूप ले बैठा है। गुटों की भरमार और युवा कार्यकर्ताओं की नेता बनकर सत्ता में भागीदारी की बढ़ती अभिलाषा ने कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में गुटबाजी को अपने मूल कार्यक्रमों से एकदम बाहर कर गुटबाजी के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया। प्रदेश कांग्रेेस में अपराधीकरण का भी बोलबाला इस बीच तेजी से हुआ। बिना देखे समझे कई ऐसे लोगों को कांग्र्रेस ने अपना सदस्य बना लिया जो स्वंय नेताओँ के लिये सरदर्द साबित हो रहे हैं। कांग्रेस में अगर गुटबाजी नहीं होती और भाजपा जैसा सख्त अनुशासन थोड़ा बहुत भी होता, तो शायद कांग्रेस अभी प्रदेश की सत्ता पर होती। अगर प्रदेश में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति का आंकलन किया जाये तो वह जनाधार खोती जा रही है। आपसी लड़ाई, अनुशासनहीनता और बूढ़े नेताओं की भरमार ने कांग्रेस को जगह- जगह शिकस्त देनी शुरू कर दी है। भटगांव चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस प्रदेश में एक तरह से हताश हो गई और अपनी चमड़ी बचाने के लिये बार -बार दिल्ली का दौरा कर नेता हाईकमान को अपनी सक्रियता का एहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। युवक कांग्रेस के चुनाव में जो माहौल देखने को मिला उसमें भी अनुशासनहीनता स्पष्ट नजर आई। भटगांव के बाद अब कांग्रेस को बालोद का चुनाव लडऩा है जहां भाजपा काबिज थी। इस सीट को हासिल करने से पूर्व कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिये जो घमाासान चल रहा है, उसी कि परिणति मंगलवार को देखने मिली। कांगेस की स्थिति प्रदेश में आम जनता से दूर कुछ पुराने नेताओं के हाथ में सिमटकर रह गई है। छत्तीसगढ प्रदेश कांग्रेस में लगे जंग को केन्द्र में बैठे नेता किस तरह निकालेंगे? यह आगे के दिनों में ही पता चलेगा लेकिन हम यह कह सकते हैं कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अगर प्रद्रेश में तेजी से बढ़ रही गुटबाजी को खत्म कर दिया जाय तो अगला सिंहासन कांग्रेस का होगा। वरना छत्तीसगढ में कांग्रेस की स्थिति यूपी, बिहार से भ्ी बदतर हो जायेगी।

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..

रायपुर दिनांक १८ अक्टूबर २०१०

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..क्या कभी
हमारी व्यवस्था की आंख खुलेगी?
अभी कुछ ही दिन पहले मुझे एक पत्र मिला, यह यूं ही टेबिल पर पड़ा था। कल फुर्सत के क्षणों में जब मंैने इसे खोलकर देखा तो यह जेल में बंद एक उम्र कैदी का था जिसने चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों की उस बैठक पर मेरे आलेख पर उसने अपनी टिप्पणी दी थी। आलेख में मंैने लिखा था कि- वे ही लोग अब राजनीति में बढते अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, जिन्होंने किसी समय इसे बढ़ावा दिया। उमर कैद की सजा भुगत रहे कैदी ने पत्र में जेलों में बंद ऐसे कैदियों का जिक्र किया है, जो अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सके और झूठे साक्ष्यों के आधार पर सजा भुगत रहे हैं। 'वो कहते हैं न- गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है।Ó ऐसा ही हमारे देश मेें हो रहा है, जहां की जेलों में ऐसे कई निर्दोष व्यक्ति सड़ रहे हैं जिन्होंने कभी कोई अपराध किया ही नहीं, किंतु किसी के बिछाये हुए जाल का शिकार हो गये। ऐसे लोग या तो किसी राजनेता, पहुंच अथवा प्रभावशाली व्यक्तियों की टेढ़ी दृष्टि के शिकार बन गये। ऐसे लोगों के लिये अदालतों में साक्ष्य पेश करना उतना ही आसान है जितना किसी का बाजार से पैसे देकर कोई सामान खरीदकर ले आना। बहरहाल, ऊपर दर्शाये गये कैदी के निर्दोष होने का प्रमाण हम इसे मान लेते हैं कि उसने मुझे जो पत्र लिखा उसमें उसने कहीं भी अपना नाम या पता नहीं दिया जिससे यह अंदाज लगाया जा सकता, कि वह मुझसे कुछ नहीं चाहता। लेकिन मै अपनी कलम से सरकार व अदालतों का ध्यान कम से कम ऐसे लोगों की ओर आकर्षित कर सकूं कि वह प्रभावशाली व पहुंच वाले लोगों के झांसे में न आयें और उसके जैसे किसी निर्दोष व्यक्ति को सलाखों के पीछे सडऩेे न दें। असल में हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं। उसमें किसी का किसी से कोई लेना- देना नहीं है। कानून यह कहता है कि ''सौ गुनाहगार छूट जायें, मगर किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिये।ÓÓ लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? कितने ही सीधे साधे लोग आज पैसे व पहुंच वालों की कोप के शिकार बनकर किसी न किसी बड़े मामले में फंसा दिये जाते हैं, और उन्हें सजा भी हो जाती है। चौका देने वाली बात तो यह है कि हमारे कानून में ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है कि एक बार लम्बी सजा प्राप्त व्यक्ति की वास्तविकता के बारे में खोजबीन करने का कोई प्रयास किसी स्तर पर किया जाये। देश में मानवता की दुहाई देने वाले रक्षक भी इस संबन्ध में खामोश हैं । पूरे देशभर की जेलों में सड़ रहे कैदियों की हकीकत का किसी झूठ या सच का पता लगाने वाली मशीन से आंकलन किया जाये तो ऐसे कम से कम पांच से दस प्रतिशत तो कैदी ऐसे निकल ही जायेगें जो किसी न किसी के षडय़ंत्र का शिकार हुए हैं। सरकार को इस दिशा में प्रयास करना चाहिये। वह अपने जासूसों के जरिये ही कम से कम असली -नकली का पता लगाये और मानवता के नाते उन्हें जेल से मुक्ति दे।

कही फूल, कहीं कांटे!

रायपुर मंगलवार। दिनांक 19 अक्टूबर 2010

कही फूल, कहीं कांटे! यह कैसा
अडियल रवैया है निगम का?
जयस्तंभ चौक में आरएसएस के पथ संचलन पर किसी समय फूलों की वर्षा करने वाली रायपुर की महापौर को यह अचानक क्या हो गया कि उन्होंने विजयादशमी पर आरएसएस को सप्रे शाला प्रांगण में शस्त्र पूजन करने पर कठोर कार्रवाई करने का ऐलान कर दिया? हालांकि बाद में यह मामला सलटा लिया गया और पूजा वहीं हुई जहां यह वर्षो से होती आ रही है। महापौर ने अपने इस विरोध की वजह बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया जिसमेेंं स्कूल प्रांगण में कोई भी बाहरी कार्यक्रम आयोजित करने पर रोक लगी हुई है। अगर ऐसा है तो संघ के इस आयोजन से पहले इसी मैदान में जन्माष्टमी का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था उसपर रोक क्यों नहीं लगाई गई? महापौर ने कुछ ही दिन पहले आरएसएस के पथ संचलन के दौरान फूल बरसाकर सभी कांग्रेसियों को चकित कर दिया था। अब अचानक आये नये बदलाव ने फिर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। कांग्रेस की टिकिट पर महापौर बनीं किरणमयी नायक का रवैया शुरू से ही टकराहट का रहा है। वे यह जानती हंंै कि भाजपा सरकार से तालमेल बनाये बगैर शहर का विकास संभव नहीं है फिर भी न केवल सरकार से उन्होंने कई मामलों में पंगा लिया बल्कि अपनी ही पार्टी कांग्रेस में वे आलोचना का शिकार बनी। उनसे मतभेद के चलते एक पार्षद ने जहां एमआईसी से इस्तीफा दिया वहीं अनेक पार्षदों को अपने खिलाफ कर निया। दो पार्षदों ने दिल्ली में जाकर कांग्रेस आलाकमान से इसकी शिकायत की तो कई पार्षदों ने कांगेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा से भी उनके कार्यप्रणाली की शिकायत की। महापौर ने अपनी कार्यप्रणाली का जो रास्ता चुना है। वह इस शहर के विकास के लिये तो ठीक नहीं है, बल्कि खुद निगम के लिये भी ठीक नहीं है। निगम की माली हालत खराब हो चुकी है, आय के साधन बंद हो चुके हैं। कर्मचारियों को छठवें वेतन आयोग के तहत पैसा देने की स्थिति में नहीं हैं। ठेकेदारों को पैसा नहीं मिलने के कारण वे काम रोक देते हैं। सफाई का काम जब मर्जी आता है तब चलता है। निगम में कांग्रेस का कब्जा होने के बाद आम जनता को लगा था कि लेडी मेयर के आक्रामक रवैये से शहर का तेजी से विकास होगा लेकिन एक साल के अंदर ही सारी हकीकत लोगों के सामने आ गई। रायपुर नगर निगम व सरकार के बीच किसी प्रकार का तालमेल नहीं हैं यहां तक कि विपक्ष से निर्वाचित निगम सभापति और महापौर के बीच टकराहट की स्थिति है। निगम कमिश्रनर कुछ करते हैं और महापौर कुछ। इस हाल में इस शहर का क्या भला होगा? इन परिस्थितियों में क्या निगम फिर से प्रशासक कार्यकाल की ओर नहीं बढ़ रहा?

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

अब खुलेगी चमक की पोल!

रायुपर दिनांक 16 अक्टूबर 2010

अब तक चुप रहे,विदेशी चले गये
अब खुलेगी चमक की पोल!
यह पहला अवसर है जब भारतीय खिलाडिय़ों ने एक साथ सौ पदक प्राप्त कर देश का गौरव बढ़ाया। सभी को इस बात का आश्चर्य है कि एशियाड, ओलंपिक जैसी विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में एक-एक पदक के लिये जी जान एक कर देने के बाद भी एक भी पदक प्राप्त नहीं करने वाले भारतीय खिलाडिय़ों ने अपनी भूमि पर एक साथ सौ से ज्यादा पदक कैसे बटोर लिये? खिलाडिय़ों को भारी संख्या में मिले सोने के मेडल की चमक ने विश्व की आंखों को भी चकाचौंध कर दिया। चर्चा में तो बात यहां तक है कि राष्टमंडल खेलों की तैयारियों के दौरान जो छीछालेदर आयोजन समिति की हुई उसके चलते पूरे खेल का फिक्ंिसग कर लिया गया। फिक्सिंग की बात तो राष्टमंडल खेल के दिल्ली में आयोजित करने के मामले में भी हुई। जब भारतीय ससंद में यह आरोप लगाया कि नई दिल्ली में राष्टमंडल खेल आयोजित करने के लिये कुछ देशों को रिश्वत दी गई। चर्चाएं अफवाह अपनी जगह है किंतु जो हमने अपनी आंखों से देखा। उसमें हम यही कह सकते हैं कि भारत में राष्टमंडल खेलों का शानदार आगाज हुआ और जानदार अंत भी। हां यह दूसरी बात है कि खेल के दौरान मैदान में घुसा और खेल गांव में मेहमानों के सूट से सांप निकले। हमारे देश के अंदर जो कुछ भी हुआ, वह आगे के दिनों में जांच का विषय हो सकता है... जांच की शुरूआत भी हो गई है लेकिन इस खेल के अंत में सब कुछ ऑल इज वेल। वाह इंडिया! दुनिया सचमुच याद रखेगी। भारतीय संस्कृति की झलक के साथ 2010 राष्ट्रमंडल खेलों का आगाज जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में हुई और सार्वभौमिक प्रेम तथा एकता के संदेश के साथ समाप्त हुआ। जगमगाती रोशनी से दुल्हन की तरह सजे स्टेडियम में सूफी गानों से लेकर बैगपाइपर की धुन ने सारी फिजंा को आल्हादित कर दिया। तीन अक्टूबर को हुए उद्घाटन समारोह की तरह ही समापन समारोह ने भी दर्शकों का मनमोह लिया लेकिन तैयारियों की खामियां कहीं -कहीं साफ नजर आई। अब 2014 में राष्ट्रमंडल खेल स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होगा। ढाई घंटे तक चले समापन समारोह में भारत ने पूरे विश्व को अपनी संस्कृति का दर्शन करा दिया। पंजाब, मणिपुर, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात के कलाकारों ने मार्शल आर्ट का प्रदर्शन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मार्शल आर्ट के इस बेहतरीन प्रदर्शन में अखाड़ों से लेकर तलवारबाजी तक के हुनर शामिल थे। वहीं, सैन्य बलों की बटालियनों ने 14 मिनट तक चले बैगपाइपर संगीत पर अपनी प्रस्तुति दी। दिलचस्प तथ्य भारत में आयोजित इस आयोजन के सफलता की है, क्योकि शुरू से यह इसके समय पर पूरा होने को लेकर विवादित रहा है। यहां तक कि निर्माण कार्यो और सफाई आदि को लेकर काफी आलोचना हुई किंतु जब खेल शुरू हुआ तो सारी दुनिया की आंखों में आश्चर्यजनक ढंग से भा गया।

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

बर्बर कृत्य के लिये फांसी,

रायपुर दिनांक 11 अक्टूबर 2010

बर्बर कृत्य के लिये फांसी, नाबालिगो
से बहशीपन पर भी हो मौत की सजा!
>>बहुओं को जलाया जाना बर्बर और जंगली जानवरों जैसा कृत्य हैं। जब तक इस तरह के अपराध को अंजाम देेेने वालों को फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया जायेगा। तब तक लोग महसूस नहीं करेंगे कि बहुओं को जलाया जाना अपराध है। <<सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की खण्डपीठ ने पंजाब के फिरोजपुर की निचली अदालत द्वारा बहू की हत्या मामले में दोषी ठहराये गये एक फैसले में यह टिप्पणी की। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए उक्त व्यक्ति के आजन्म कारावास सजा बरकरार रखी है। न्यायमूर्ति काटजू ने यहां तक कहा कि हमारे बहुत से न्यायधीश अंहिसांवादी हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं। मिलापकुमार ने अपनी पत्नी राजबाला को इसलिये जलाकर मार डाला था। चूंकि उसने उसके साथ खेत पर काम करने से मना कर दिया। देश में ऐसी सैकड़ों घटनाओं के परिपे्रक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने देशभर के न्यायालयों में पड़े इस ढंग के अनेक मामलों में पीडि़त पक्ष को न्याय की आस दिलाई है। इसके साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि सरकार व सर्वोच्च न्यायालय को देश मे नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले अत्याचार को रोकने के लिये भी सख्त होना चाहिये। यंू तो देश में नाबालिगों को जिंदगी भर के लिये कहीं का न रहने देने की कई घटनाएं होती हैं, किंतु हम अकेले छत्तीसगढ़ की बात लें तो ऐसी घटनाएं माह में कम से कम एक दर्जन से ज्यादा घटनाएं नाबालिग बच्चियों को फुसलाकर या उनसे बलात कुकृत्य करने की होती हैं। जिसमें आधे से भी कम मामलेे ऐसे हैं, जिसमें लोग पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। क्योंकि लोग पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराकर कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहते या फिर मानमर्यादा अथवा सामने वाले की दबगंता अथवा प्रभाव के आगे बेबस हो जाते हैं। हाल ही छत्तीसगढ़ की राजधानी से एक नाबालिग छात्रा का उस समय दो लड़कों ने अपहरण कर लिया। जब वह शाम के समय सामान खरीदने निकली थी। उसे आरंग ले जाकर उन लड़कों ने तो रेप किया ही, साथ ही अपने दोस्तों से भी रेप कराया। मरणासन्न स्थिति में लड़की को छोड़कर ये भाग गये। ऐसे कितने ही मामले रोज आते हैं और गरीब परिवार न्याय के लिये तरस जाता है। एक मामला प्रेमनगर सरगुजा का भी है- जहां एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। ऐसे कृत्यों में लिप्त लोगों के प्रति पुलिस को तो सख्त होने की जरूरत ह।ै साथ ही ऐसे तत्वों के प्रति भी अदालतों का रवैया भी कथित बहू हत्या जैसे मामले की तरह सख्त होना चाहिये। जब तक अपराधियों को कठोर से कठोर सजा नहीं मिलेगी, ऐसे दरिन्दे समाज में घूमते रहेंगे और किसी अबला का रोज चीरहरण होता रहेगा। पुलिस व समाज दोनों की जिम्मेदारी इस मामले में बनती है। इस ढंग की वारदातों में लिप्त लोगों के पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर उनके साथ रोटी-बेटी का संबन्ध न रखा जाये। समाज में व्याप्त इस गंभीर बीमारी का इलाज देश की व्यवस्थापिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका से ज्यादा समाज के हाथ में हैं।

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

नक्सली अब अपनी आइडेंटिटी प्रदर्शन के साथ शहरों की ओर!

रायपुर रविवार दिनांक 10 अक्टूबर 2010
नक्सली अब अपनी आइडेंटिटी
प्रदर्शन के साथ शहरों की ओर!
अबूझमाड़ के जंगलों से निकलकर नक्सलियों ने शहरी क्षेत्र की ओर मार्च कर दिया है। शहरी क्षेत्र में नक्सलियों की बेखौफ मौजूदगी और ग्राीमणों के साथ मेलजोल,बातचीत और उनके बीच बैठकर खाना खाने से यह बात स्पष्ट हो गई है, कि नक्सलियों का पुलिस की गोली से खौफ खत्म हो गया है और वे किसी भी मुकाबले के लिये तैयार हैँ। आपको याद होगा जब नक्सल विरोधी अभियान के लिये राज्य सरकार ने पंजाब के पूर्व डायरेक्टर जनरल जी एस गिल की नियुक्ति की थी। तब नक्सलियों ने बस्तर क्षेत्र को धमाकों से उनके स्वागत में गुंजा दिया था अर्थात नक्सली एक तरह से पुलिस के नई नियुक्ति की खिल्ली उड़ा रहे थे। गिल के चार्ज लेने के बाद प्रदेश में नक्सलियों का अभियान तेज हो गया और एक के बाद एक चुनौतीपूर्ण घटनाएं हुई। गिल ने बाद में इस अभियान से अपने आपको अलग कर राज्य सरकार पर इस अभियान में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाते हुए छत्तीसगढ़ से विदा हो गये। यह भी महत्वपूर्ण है कि जब भी राज्य या केन्द्र में कोई पुलिस अधिकारी या नेता नक्सलियों से जोरदार तरीके से निपटने की बात करता है। तो इसका जवाब नक्सलियों की तरफ से हिंसा या तोडफ़ोड़ से ही होती है। मानो वे चुनौती दे रहे हो आजा निपट ले। अब केन्द्र ने चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने में अहम भूमिका निभाने वाले सीआरपीएफ के डीजी विजय कु मार को इस अभियान में लगाया है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिहं से उनकी औपचारिक मुलाकात में उन्होंने उन्हें नक्सलियों से निपटने की शुभकामना दी है। साथ ही यह भी कहा है कि यहां आपका मुकाबला एक वीरप्पन से नहीं कई वीरप्पनों से हैं। मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी शायद विजय कुमार को यह बताने की है कि वे जितना आसान इस टास्क को समझ रहे हैं। वह उतना आसान नहीं हैं। विजय कुूमार एक तेज तर्रार अफसर हंै। वे नक्सलियों से निपटने अच्छी ब्यूह रचना भी तैयार कर लें लेकिन इस अफसर को भी संपूर्ण स्थिति को समझने के लिये पहले छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति को समझना होगा। यह सही है कि कर्नाटक, आंन्ध्र, केरल और तामिलनाडू के जंगल में धूम मचाने वाले वीरप्पन को भारी फोर्स के जरिये जगंलों से बाहर निकालकर घेरकर मार दिया गया। लेकिन यहां आज की स्थिति में नक्सली जंगल से निकलकर आम रास्ते पर पक्की सड़कों पर हैं और ग्रामीणों से खुले आम मुलाकात कर रहे हैं। परिस्थितियां एकदम अलग हैं। दो- तीन सौ की संख्या में नक्सली पूरे लाव लश्कर के साथ निकलते हैं और पुलिस को चारों और से घेर रहे हैं। शनिवार को जो खबर आई उसके अनुसार पुलिस और नक्सलियों के बीच एक तरफ जहां राजनांदगांव के जगंली इलाकों में मुठभेड़ चल रही थी, तो दूसरी तरफ महासमुन्द में उड़ीसा सीमा पर पुलिस और नक्सलियों के बीच लगातार गोलियों का आदान प्रदान हो रहा था। नक्सलियों की यह चुुनौती जरूर नये डीआईजी के लिये है, लेकिन पहले चरण में करीब आठ से ज्यादा नक्सलियों के मारे जाने से उन्हें यह चुनौती महंगी पड़ी है। नक्सलियों के जंगलों से बाहर निकलकर शहर की और बढऩे का कदम उनकी कौन सी रणनीति है, यह तो पता नहीं लेकिन यह पहली बार है जब नक्सली अपनी आईडेंङ्क्षटटी दिखाकर सरकार व पुलिस दोनों को धमका रहे हैं। विजय कुुमार इनसे निपटने कौनसी रणनीति बनाते हैं, यह आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन यह सही है कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का एक बहुत बड़ा भाग इस समय नक्सलियों के नियंत्रण में हैं।

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

जोगी के आंकड़ों का खेल,क्या संभव है भाजपा में बगावत!

रायपुर दिनांक 9 अक्टूबर 2010
जोगी के आंकड़ों का खेल, क्या
संभव है भाजपा में बगावत!
अजीत जोगी का नया पैतरा भाजपा सरकार को कितना हिलायेगा यह तो हम नहीं कह सकते लेकिन 12 भाजपा विधायकों की उनसे मुलाकात की बात ने सियासी हलकों को चर्चित जरूर कर दिया है, कि वे इस दावे के साथ सरकार को परेशान करने की स्थिति में आ गये हैं! अभी कुछ ही दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विधायकों व पार्टी कार्यकताओं को एक सूत्र में बंधे रहने का डोस दिया था। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद जोगी की बस्तर यात्रा के बाद बने नये समीकरण(?) और उसके बाद के बयान का विश£ेषण किया जाये। तो जोगी से बस्तर में कुछ असंतुष्ट विधायकों की मुलाकात जरूर हुई होगी और यहां उन्होंने जोगी को राज्य सरकार के कार्यो की शिकायत भी जरूर की होगी तथा उनको साथ देने का वायदा भी किया होगा। लेकिन यह संख्या कितनी रही होगी? इसका आंकलन तत्काल नहीं किया जा सकता। जोगी को सरकार पलटाने की महारथ हासिल है,यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिये शायद सत्ता पक्ष भी उनकी बातों को यूं ही आई गई नहीं होने देगा। जोगी जब पहली बार सत्ता में आये तो उन्होनें बारह के आंकडेे में ही तरूण चटर्जी और गंगूराम बघेल सहित बारह विधायकों को अपने खेमें में मिलाकर तहलका मचा दिया था। इसके बाद हुए चुनाव में अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलते देख कुछ विधायकों को पलटाने का आरोप उनपर लगा। अब बस्तर में रेल सुविधाओं की मांग को लेकर रेल रोको अभियान के बाद जोगी ने जो बारह विधायकों के उनसे मिेलने की बात कही है, उसमें कितनी सच्चाई है? राजनीतिक विश£ेषकों ने इसे फिलहाल एक राजनीतिक स्टंट या शिगूफा ही माना है। यह विश£ेषक मानते हैं कि अभी मुख्यमंत्री डॅा. रमन सिंह को हिलाने की ताकत कांगे्रस में नहंीं है। विशेषकर ऐसे समय में जब भटगांव में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस समय जोगी को ऐसा बयान देना क्यों पडा़? इस बारे में विश£ैषकों का कहना है कि अगर जोगी से बारह विधायक मिलते तो वे इसकी पब्लिसिटी नहीं करते-खामोशी से अपना काम कर जाते। किंतु जब उन्होंने आंकड़ा पूरा होते नहीं देखा? तो यह बयान सामने आया। इससे उनके दो मकसद पूरे हुए- एक यह कि भाजपा के अंदर कानाफंूसी करवा दी और भाजपा के जासूसों को काम पर लगा दिया कि किस- किस विधायक ने पूर्व मुख्यमंत्री से मुलाकात की। दूसरा सरकार के अंदर भी हलचल पैदा कर दी कि बस्तर दौरे के बाद फिर जोगी ने आदिवासी कार्ड को भुनाने का प्रयास किया! यहां यह भी उल्ल्ेख करना जरूरी है कि इस बार के पहले हुए विधानसभा चुनाव में जिन विधायकों की खरीद- फरोख्त का आरोप जोगी पर लगा था। उनमें से अधिकांश आदिवासी थे। बहरहाल, राजनीति का रंग कब बदल जाये कोई नहीं कह सकता। मुख्यमंत्री डॅा. रमन सिंह को फिलहाल कोई खतरा नहीं लगता। चूंकि वर्तमान में ऐसी कोई परिस्थिति भी नहंीं है कि बारह विधायक एक साथ दल बदल जैसा कदम उठाये- अगर ऐसी बात होती तो मैंने जैसा पूर्व में कहा- सब कुछ शंतिपूर्ण हो जाता। जोगी कुछ नहीं बोलते, एक तरह से उन्होंने बयान देकर इस सारे खेल को आगे बढऩे से स्वंय ही रोक दिया!

खिलाडिय़ों का खून और पसीना!

रायपुर दिनांक 8 अक्टूबर
स्वर्ण के एक एक हिस्से पर लगा हैं
खिलाडिय़ों का खून और पसीना!
जिस स्वर्ण पदक को जीतकर आज सारा देश गौरवान्वित महसूस कर रहा है। उसे जीतने के लिये हमारे खिलाडिय़ों को कितने पापड़ बेलने पड़े हैं। यह जब उनकी जुबानी बाहर आती है तो हमारी व्यवस्था पर गुस्सा आता है कि वह देश में खिलाडिय़ों को तैयार करने के नाम पर उनकी पूरी उपेक्षा ही कर रही है। जो कुछ गौरव हासिल किया जा रहा है, उसे खिलाडी अपनी स्वयं की प्रतिभा,मेहनत और खून- पसीना एक कर से अर्जित कर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों की भारोत्तोलन प्रतियोगिता में देश के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने वाली रेणुबाला चानू को बुधवार रात पदक जीतने के बाद वापस खेलगांव जाने के लिए करीब पांच घंटे आटोरिक्शा का इंतजार करना पड़ा। वह अपने परिवार के साथ थीं। यह तो गनीमत थी कि उसे आटो मिल गया। वरन् देश का यह गौरव कहां भटकती रहती इसका अंदाज व्यवस्था करने वाले भी नहीं लगा पाते। अब अपनी खाल बचाने के लिये आयोजन समिति कह रही है कि रेणु ने स्वयं ही आटोरिक्शा से खेलगांव जाने का निर्णय लिया था। गोल्ड मेडल जीतने के बाद रेणु के साथ जहां यह व्यवहार था तो दूसरी ओर शूटिंग में दो स्वर्ण जीतकर भारत को गौरवान्चित करने वाली अनीसा सईद ने जो रहस्योद्घाटन किया, वह देश में खेल और खिलाडिय़ों, दोनों की दशा को दर्शाता है। अनीसा को इस मुकाम तक पहुंचने के लिये कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अनीसा सईद रेलवे की नौकरी करती है और उसे रेलवे ने पन्द्रह महीने से वेतन नहीं दिया। जबकि उसके पति का कहना है कि अनीसा की पिस्तल की पिन को ठीक कराने के लिये उनके पास पैसे नहीं थे। एक निजी कंपनी की मदद से उसकी पिस्टल ठीक कराई। दिलचस्प तथ्य यह है कि कामनवेल्थ गेम्स मे अधिकांश पदक विजेता अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा के बल पर पदक हासिल करने में कामयाब हुए हैं। भारतीय निशानेबाज गुरप्रीत सिंह और विजय कुमार ने 25 मीटर पिस्टल पेयर्स में सोने का तमगा अपने नाम कर लिया। राष्ट्रमंडल खेलों में ढेर सारे पदक लेकर हम गौरवान्वित हैं , लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिये कि- अगर कम मेहनत और सुविधाओं के अभाव में हमारे खिलाड़ी इतना अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। अगर उन्हें पर्याप्त सुविधाएं सुलभ कराई जाये तो देश के खिलाड़ी ओलंपिक प्रतियोगिताओं में चीन और जापान से काफी आगे निकल सकते हैं। खिलाडिय़ों को प्रोत्साहित करने उन्हें सुविधाएं सुलभ करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। स्कूल से ही बच्चों में खेलों के प्रति रूचि बढ़ाई जाये, तो कई छिपी प्रतिभाएं बाहर आ सकती हैं। मगर कई राज्यों में तो स्थिति यह है कि बच्चों को खेलने के लिये मैदान नहीं है । जिम्रेशियम की व्यवस्था नहीं है, कोच नहीं है, खेल के लियेजरूरी साधन नहीं है। इन हालातों में भी अगर देश से प्रतिभाएं उभरकर सामने आती हैं तो हमें अपने पर ही गर्व करना चाहिये कि- हम हर परिस्थिति में ऊंचा उठने की ताकत रखते हैं।

कपडे में मुंह छिपाकर घूमने वाले कौन? पुलिस क्यों हैं खामोश...!

रायपुर दिनांक 6 अक्टूबर 2010
कपडे में मुंह छिपाकर घूमने वाले
कौन? पुलिस क्यों हैं खामोश...!
छत्तीसगढ़ में रायगढ़ नगर के आईसीसीआई बैंक में चार युवक चेहरा ढक कर पहुंचे, कई लोगों की उपस्थिति में उन्होनें पेटी में करीब पौन करोड़ रूपये भरे और रफूचक्कर हो गये। निशानी के बतौर वे बैंक के स्पाई कमरें में अपना चेहरा ढका हुआ छोड़ गये- पुलिस इसी छबि को लेकर इन्हें पकडऩे के लिये माथा पच्ची कर रही है। गमछा मुंह में बांधे तेज गति से बाइक चलाने वाले युवको की गतिविधियां पूरे छत्तीसगढ़ में आम आदमी के लिये तो सरदर्द है साथ ही पुलिस के लिये भी सरदर्द बने हुए हैं। यद्यपि पुलिस की सक्रियता ऐसे लोगों को पकडऩे के लिये उसी समय होती है जब कहीं वारदात होती है वरना इनसे कोई पूछताछ नहीं होती। पिछले दस पन्द्रह सालों में नये बेरोजगार युवाओ की एक बड़ी फ ौज तेयार हो गई हैं जिसमें चेहरा ढक कर घूमने की आदत सी हो गई है। गर्मी में अगर कोई धूप से बचने के लिये चेहरे को गमछे से लपेट ले तो हम कह सकते हैं कि यह गर्मी से बचाव का एक उपाय है किंतु सदैव गमछे से चेहरे को लपेटकर घूमने वाले आखिर हैं कोन?और इनके चेहरे से नकाब हटाने का प्रयास पुलिस क्यों नहीं करती।? छत्तीसगढ़ में पिछली डकैतियों पर एक नजर दौड़ाये तो इन सभी में पच्चीस से तीस साल के युवाओ ंका हाथ है जिनकी पैदाइश सत्तर या उसके बाद के वर्षो की है। बेरोजगारी और गरीबी से तंग एक वर्ग ने चोरी, लूट ,डकैती जैसे अपराधों को अपना धंधा बना लिया है। बैंक डकैती की घटनाओं में प्राय: बाहरी गिरोह का हाथ दिखाई देता है जबकि छत्तीसगढ़ में अन्य अपराधो में लिप्त युवाओं की संख्या में लगातार बढौत्तरी हो रही है जो चोरी, लूटपाट व अन्य कर्मो में तो लिप्त हैं ही साथ ही किन्हीं राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर जिंदाबाद के नारे लगाते हुए अपने मूल धंधे को छिपा लेते हैं। अपराधों पर लगाम लगाने के लिये पुलिस को एक सशक्त अभियान ऐसेे लावारिस टाइप के बैठै युवाओं पर निगरानी रखने करनी होगी वरना यह समस्या इतनी गंभीर हो जायेगी कि उसे सम्हाल पाना कठिन हो जायेगा। प्रत्येक थाना क्षेत्र में ऐसे युवाओं को तैयार करना होगा जो पुुलिस तक ऐसे लोगो की सूचना पहुंचाये। मोहल्लों में मूर्तियां बिठाने और अन्य आयोजनों के नाम पर चंदा वसूली कर यह अपने मूल धंघे की मंदी के समय अपना जेब खर्च निकालते हैं। जब तक मोहल्लों मोहल्लो से ऐसे तत्वों को ढूंढकर नहीं निकाला जायेगा बढ़ते अपराध पर अंकुश लगाना कठिन होगा।

पहुंच,प्रभाव के आगे फिरबौना हुआ देश का तराजू!

रायपुर,7 सितंबर 2010
पहुंच,प्रभाव के आगे फिर
बौना हुआ देश का तराजू!
हमारी न्याय व्यवस्था को विश्व ने सराहा है, चाहे वह अयोध्या में राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला हो या फिर मुम्बई में आंतकी हमलों में जीवित बचे एक मात्र आंतकी अब्दुल अजमल कसाब के मामले में हाईकोर्ट का फैसला हो। किंतु पिछले कुछ समय से जो फैसले आ रहे हैं। वह अपराधियों के लिये तो राहत देने वाला है, मगर समाज में इसका गलत संदेश जा रहा है। न्याय व्यवस्था पर पिछले कुछ समय से लगातार उंगली उठ रही है जिसमें न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार से भी संबन्धित है। कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है। भोपाल गैस ट्रेजडी पर दिये गये फैसले ने पहली बार सबको चौकाया और उसकी जगह-जगह थू -थू हुई। क्योंकि जिस मामले में आरोपियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिये था। उन्हें मामूली जुर्माने और कम सजा में ही निपटा दिया गया। ऐसे लगा कि न्याय को खरीद लिया गया। इस मामले में हजारों लोगों की जान चली गई थी तथा इसमें हत्या का मुकदमा दायर करना था। उसकी जगह कम धाराएं लगाकर मामला कोर्ट में पेश किया गया और आरोपी एक तरह से छूट गये। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टृ मामले में जो फैसला दिया उसने पूरे देश को चौका दिया। लोगों में यह प्रतिक्रिया है कि गरीब व पहुंच विहीन लोगों के लिये अलग न्याय है और पहुंच वालों के लिये अलग न्याय। इस मामले में आरोपी एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का बेटा है। संतोष कुमार सिंह को छात्रा प्रियदर्शिनी की बलात्कार के बाद हत्या करने के आरोप में फांसी पर लटकाएं जाने का आदेश था। सुप्रीम कोर्ट में मामला पहँुचने के बाद इस मामलें में न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संतोष कुमार सिंह के खिलाफ इतने पुख्ता सबूत नहीं है कि उसे फांसी पर लटकाया जाए। जेल में रहने के दौरान उसके चाल- चलन में बदलाव की बात भी फैसला देते समय कही गई है। ऐसे कितने ही लोग आज देश की जेलों में सजा भुगत रहे हैं जिनके अपराधों के पुख्ता सबूत नहीं है और वे जेल की सींखचों के पीछे सड़ रहे हैं। उनके पास न पहुंंच हैं, न साधन और न ही वे सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ सकते हैं। इस फैसले के बाद प्रियदर्शनी की मां नीलम कटारा का यह बयान भी देश की न्याय व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है कि- भारत में उम्र कैद का मतलब गुनहगारों के लिये आजादी होता है। वर्ष 2006 में संतोष सिंह को दिल्ली की उच्च न्यायलय ने फांसी की सजा सुनाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद में बदल दिया। इस मामले में शुरू से कानूनी पचड़ा रहा। हत्या और बलात्कार के बाद आरोपी आईपीएस के लड़के को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन निचली अदालत ने उसे दोषी बताने के बावजूद सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। मामला सीबीआई के पास गया और उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इस सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुुनौती दी गई और अंतत: निराशाजनक फैसले ने यह संदेश दिया कि पहुंच, प्रभाव के आगे कहीं- कहीं न्याय भी बौना है। अगर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाइ्रकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता, तो शायद इस फैसले की इतनी आलोचना नहीं होती।

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

चुभने लगा अपराधी करण!

रायपुर दिनांक 5 अक्टूबर 20010
चुभने लगा अपराधी करण!
चुनाव आयोग द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों ने राजनीति में अपराधी करण पर अंकुश लगाने की मांग की हैं। इस मांग पर विस्मय इस बात को लेकर है कि जिन पार्टियों ने पहले राजनीति का अपराधी करण को बढावा दिया वे ही अब इसपर अंकुश लगाने की मांग कर रहे हैं। विभिन्न दलों ने चुनाव आयोग के समक्ष राजनीति में अपराधी करण और चुनावों में धन के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की। एक समय था जब राजनीतिक दलों ने अपने दरवाज़े खुले दिल से अपराधियों व धन कुबेरों के लिये खोल दिया। फिलहाल राजनीति के धार्मिकीकरण पर किसी ने कोई चिंता व्यक्त नहीं की लेकिन यह भी भविष्य में एक समस्या बन जा ये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये। पूर्व के वर्षो का इतिहास रहा है कि राजनीतिक दलों ने ही राजनीति में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को प्रश्रय दिया और धन कुबेरों को शामिल कर धन का खेल खेला लेकिन अब यही उनपर उलटा वार करने लगे। पिछले दो तीन दशक में राजनीति का जितना अपराधी करण हुआ तथा धनकुबेरों का वर्चस्व बना वह इससे पहले कभी नहीं हुआ। प्र्राय: सभी राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग से इन पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया है। राजनीति का अपराधी करण, चुनावों में धन का बढ़ता प्रभाव और चुनाव के समय रकम लेकर रिपोर्ट प्रकाशित करने का मीडिया में चलन लोकतंत्र के लिए खतरा बनता जा रहा है। लिहाजा आयोग को इन प्रवृत्ति यों पर अंकुश लगाने के लिए असरदार कदम उठाने चाहिए। ईवीएम के सवाल पर भी नेताओं ने आयोग से बात की। कांग्रेस जहां चुनावों में इनके इस्तेमाल के पूरी तरह पक्ष में हैं जबकि ज्यादातर दलों का कहना है कि आयोग को ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक हल कों में उठाए जा रहे सवालों का निराकरण करना चाहिए। चुनाव आयोग के समक्ष भाजपा ने प्रस्ताव रखा है कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ हत्या, अपहरण, आतंकवाद से जुड़ी मादक पदार्थों की तस्करी और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में अदालत में अभियोग तय किए जा चुके हैं तो उसे चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए । यह भी बात सामने आई कि अगर उम्मीदवारों का चुनाव खर्च सरकार वहन करे और लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं- इससे चुनावों में धन का प्रभाव घटाने में मदद मिलेगी। शायद यह सुझाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण है लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होना चाहिये। धन लेकर रिपोर्ट प्रकाशित करने के मीडिया में चलन को चताजनक बताया गया है। यह तो सीधा सीधा भ्रष्टाचार है। आयोग को पेड़ न्यूज़ को परिभाषित करने और इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के उपाय सुझाने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन करना चाहिए जिसमें न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और मीडिया के प्रतिनिधियों को शामिल कि या जा सकता हैं। बाम दलों का मानना है कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इन कानूनों को ईमानदारी और असरदार ढंग से लागू किया जाए।

चुभने लगा अपराधीकरण!

रायपुर दिनांक 5 अक्टूबर 20010
चुभने लगा अपराधी करण!
चुनाव आयोग द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों ने राजनीति में अपराधी करण पर अंकुश लगाने की मांग की हैं। इस मांग पर विस्मय इस बात को लेकर है कि जिन पार्टियों ने पहले राजनीति का अपराधी करण को बढावा दिया वे ही अब इसपर अंकुश लगाने की मांग कर रहे हैं। विभिन्न दलों ने चुनाव आयोग के समक्ष राजनीति में अपराधी करण और चुनावों में धन के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की। एक समय था जब राजनीतिक दलों ने अपने दरवाज़े खुले दिल से अपराधियों व धन कुबेरों के लिये खोल दिया। फिलहाल राजनीति के धार्मिकीकरण पर किसी ने कोई चिंता व्यक्त नहीं की लेकिन यह भी भविष्य में एक समस्या बन जा ये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये। पूर्व के वर्षो का इतिहास रहा है कि राजनीतिक दलों ने ही राजनीति में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को प्रश्रय दिया और धन कुबेरों को शामिल कर धन का खेल खेला लेकिन अब यही उनपर उलटा वार करने लगे। पिछले दो तीन दशक में राजनीति का जितना अपराधी करण हुआ तथा धनकुबेरों का वर्चस्व बना वह इससे पहले कभी नहीं हुआ। प्र्राय: सभी राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग से इन पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया है। राजनीति का अपराधी करण, चुनावों में धन का बढ़ता प्रभाव और चुनाव के समय रकम लेकर रिपोर्ट प्रकाशित करने का मीडिया में चलन लोकतंत्र के लिए खतरा बनता जा रहा है। लिहाजा आयोग को इन प्रवृत्ति यों पर अंकुश लगाने के लिए असरदार कदम उठाने चाहिए। ईवीएम के सवाल पर भी नेताओं ने आयोग से बात की। कांग्रेस जहां चुनावों में इनके इस्तेमाल के पूरी तरह पक्ष में हैं जबकि ज्यादातर दलों का कहना है कि आयोग को ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक हल कों में उठाए जा रहे सवालों का निराकरण करना चाहिए। चुनाव आयोग के समक्ष भाजपा ने प्रस्ताव रखा है कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ हत्या, अपहरण, आतंकवाद से जुड़ी मादक पदार्थों की तस्करी और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में अदालत में अभियोग तय किए जा चुके हैं तो उसे चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए । यह भी बात सामने आई कि अगर उम्मीदवारों का चुनाव खर्च सरकार वहन करे और लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं- इससे चुनावों में धन का प्रभाव घटाने में मदद मिलेगी। शायद यह सुझाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण है लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होना चाहिये। धन लेकर रिपोर्ट प्रकाशित करने के मीडिया में चलन को चताजनक बताया गया है। यह तो सीधा सीधा भ्रष्टाचार है। आयोग को पेड़ न्यूज़ को परिभाषित करने और इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के उपाय सुझाने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन करना चाहिए जिसमें न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और मीडिया के प्रतिनिधियों को शामिल कि या जा सकता हैं। बाम दलों का मानना है कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इन कानूनों को ईमानदारी और असरदार ढंग से लागू किया जाए।

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

खंडपीठ देरी के लिये कौन जिम्मेदार?

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर
हाईकोर्ट की खंडपीठ रायपुर में स्थापित
करने मे देरी के लिये कौन जिम्मेदार?
वीरप्पा मो इली की पिछली रायपुर यात्रा में एक महत्वपूर्ण रहस्योद्धाटन हुआ कि राजधानी रायपुर में बिलासपुर उच्च न्यायालय की खंडपीठ स्थापना के लिये राज्य शासन की तरफ से कोई प्रस्ताव भेजा ही नहीं गया। केन्द्रीय विधि मंत्री मो इली से जब रायपुर के लोगों ने अनुरोध किया कि बिलासपुर उच्च न्यायालय की खंडपीठ रायपुर में स्थापित की जा ये तो उनका जवाब सुनकर सब चौक गये कि राज्य शासन प्रस्ताव प्रेषित करें तो वे उस संबंध में विचार करेंगे। इस बयान से यह रहस्योद्धाटन हुआ कि रायपुर में उच्च न्यायालय की खण्डपीठ स्थापना के संबंध में राज्य की अब तक की सरकारें ला परवाह रही। राज्य स्थापना को एक दशक बीतने को है लेकिन राज्य सरकार ने रायपुर में खंडपीठ के लिये कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जबकि अपनी सुविधाओं का विस्तार करने के लिये नई राजधानी और नये भवन सब आधुनिक ढंग से तैयार किये गये। आम आदमी के हित को मद्दे नजर रखते हुए अगर रायपुर मे खंडपीठ का प्रस्ताव भेज दिया जाता तो शायद अब तक यहां खंडपीठ की स्थापना हो जाती। राज्य स्थापना के पूर्व से रायपुर में हाई कोर्ट की ब्रांच की मांग की जाती रही है। इसके लिये सरकार ने जसवंत सिंह आयोग का गठन किया और उसने भी अपनी रिपोर्ट में रायपुर में हाईकोर्ट बैंच की अनुशंसा की लेकिन जब नये राज्य की राजधानी का मामला आया तो हाईकोर्ट बिलासपुर के हिस्से में चला गया और रायपुर को राजधानी से संतोष करना पड़ा। बिलासपुर को हाईकोर्ट मिला उसका रायपुर वासियों को कोई गिला शिकवा नहीं किंतु रायपुर में हाईकोर्ट बैंच की मांग उस समय से बलवती थी। राज्य सरकारों ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे की क्यो अवहेलना की यह अपने आप में एक यक्ष प्रश्न है। क्या यह नौकरशाहों की एक चाल तो नहीं थी जिसके कारण यह प्रस्ताव केन्द्र को नहीं भेजा गया। सरकार के कई मुकदमे हाईकोर्ट बिलासपुर और जबलपुर में चल रहे हैं इसके लिये जो टीडीए मिलता है वह रायपुर मे हाईकोर्ट बैंच की स्थापना के बाद मिलना बंद हो जायगा। बिलासपुर में हाईकोर्ट की वजह से बहुत से सुदूर क्षेत्रो के कई पक्ष उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाते। आज की स्थिति में बिलासपुर हाईकोर्ट मे अधिकतर मामले सुदूर क्षेत्रो के हैं जो लंबित पड़े हैं। अगर एक नजर हम देश के राज्यों पर डाले तो अधिकांश में हाईकोर्ट की खंडपीठ कायम है। उत्तर प्रदेश मे इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ से ही अयोध्या का मुकदमा सुनाने के लिये राजधानी लखनऊ भेजा गया। महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में हाईकोर्ट के बैंच है तब रायपुर का अधिकार हर दृष्टि से बनता है। इस अधिकार को मांगने में जिन लोगों ने भी देर की उन्हे इस क्षेत्र की जनता कभी माफ नहीं कर सकती। अब जब केन्द्रीय विधि मंत्री ने स्वंय इस मामले में एक तरह से पहल की है तो सरकार को प्रस्ताव प्रेषित करने और उसके लिये रायपुर के राजकुमार कॉलेज भवन को अधिग्रहित कर वहां हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने में किसी प्रकार की देरी नहीं करना चाहिये।

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी ब्याह में सैकड़ों लोगों के लिये खाना बनता है जब वह बनकर आता है तो सभी को अच्छा लगता है किंतु उसे किन परिस्थितियों में बनाया जाता है यह सोचने का वक्त किसी को नहीं मिलता चूंकि भूख भी अच्छी लगी रहती है। घर परिवार में खाना बनाते समय प्राय: लोग पूरा ख्याल रखते है। पहले रसोई के झाडू पोछे से लेकर बर्तन की सफाई और अपने स्वयं के हाथ पैर साफ करके ही लोग खाना बनाते हैं किंतु क्या होटल व आयोजनो तथा मेस चलाने वाले ऐसा करते हैं? अभी कुछ दिनों पर्व नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारियों ने टाटीबद के एक प्रसिद्व मिष्ठान भंडार कोलकता स्वीट में छापा मारा तो अविश्वसनीय गड़बडियों का खुलासा हुआ। जो स्वीट्स लेने के लिये लोग लाइन में खड़े रहते थे उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उसे बनाने की जगह इतनी गंदी थी कि वहां कोई दो मिनिट भी खड़े नहीं रह सकता है। इसी प्रकार बनाने वाले कभी नहाते भी है यह तक संदिग्ध लग रहा था। शहर की कई होटले इसी प्रकार की मिलेंगी जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। महोबाबाजार स्थित एक बडी होटल में कई दिन से फ्रिज में रखा चिकन पकाकर ग्राहकों को खिलाने का रहस्योद्धाटन बहु्त पहले हो चुका है जबकि कई होटल राजधानी में ऐसे भी है जहां पकवान बनने वाले स्थल पर कर्मचारियों के अंडर गारमेंट सूखते नजर आते हैं.। जब शहर के बड़े बड़े संस्थान जहां बाहर से कुछ और अंदर से कुछ का माहौल है तो इन गरीब मजूदरेो को पक ने वाले खाने और उससे उनके बीमार होने पर कोसने से क्या फायदा? असल में इन सबकी जांच का दायित्व जिन लोगों को सौंपा गया है वे कभी कभी ही जागते है-होटलों और मेस चलाने वालों को अकेले दोष देने से कोई मतलब नहीं असल में कार्रवाई होनी चाहिये उन जिम्मेदार अफसरों पर जिन्हे लोगों के खाने पीने के मामले में स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

भाजपा को भटगांव जीतना था कांग्रेस अब तो सबक सीखों!

रायपुर, 4 अक्टूबर 2010

भाजपा को भटगांव जीतना था
कांग्रेस अब तो सबक सीखों!
राज आस्था और सहानुभूति के तराजू पर तुली भटगांव की जनता ने अंतत: सहानुभूति लहर में बहना ही बेहतर समझा। भाजपा की प्रत्याशी रजनी त्रिपाठी कांग्रेस के यूएस सिंह देव को करीब पैंतीस हजार मतों से पराजित कर विजयी हुईं। भाजपा की यहां से जीत के कई कारण हैं। पहली बात तो रजनी त्रिपाठी को यहां के पूर्व लोकप्रिय विधायक और उनके पति की सामयिक मृत्यु से पूर्ण सहानुभूति मिली। जबकि भटगाव की जनता इतनी समझदार हो गई कि उसने ऐसे समय में भाजपा का साथ देना ही बेहतर समझा जब प्रदेश में वह सत्तारुढ़ पार्टी की भूमिका अदा कर रही है। आम वोटरों में अब इतनी समझ तो आ ही गई है कि कब किन परिस्थितियों में किसका साथ दिया जायें। भटगांव ने अच्छी तरह से समझ- बूझकर व नाप- तौलकर ही राज परिवार पर आस्था प्रकट करने की जगह भाजपा को जिता ने का निर्णय लिया। भाजपा भले ही यह समझे कि उसके विकास कार्यो या अन्य के कारण उसकी जीत हुई है, तो उसमें उतना ज्यादा दम नहीं लगता। चूंकि सत्तारुढ़ पार्टी की यहां जीत होनी ही थी। उसकी पूरी सेना ने यहां डेरा डाला और अपने प्रत्याशी को जिता ने के लिये ऐड़ी चोटी एक कर दी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कांग्रेस अपने घिसे पिटे नेताओं के बल पर अब भटगांव तो क्या छत्तीसगढ़ की अन्य कोई सीट भी जीत जा ये, तो इसे आश्चर्य ही माना जायेगा। कांग्रेस के एक बड़े नेता धनेन्द्र साहू को अपनी हार के बाद टीवी पर खीज निकालते देखा गया। हार स्वीकार करने की जगह उन्होंने जो आरोप- प्रत्यारोप का दौर चलाया। उसे स्वस्थ राजनीति नहीं कही जा सकती। कांग्रेस को अपने नेताओं में बदलाव करना होगा। उसे नये ऊर्जाशील ज़मीन से जुड़े युवाओं को मौका देना होगा। जब तक वह ऐसा नहीं करेगी तब तक उससे छत्तीसगढ़ में सत्ता और दूर होती जायेगी। मैंने भटगांव विधानसभा क्षेत्र का दौरा नहीं किया लेकिन मैं रायपुर में बैठे- बैठे भटगांव की सारी गतिविधियों पर नजर रखता रहा। भाजपा और कांग्रेस की धमाचौकड़ी मंत्रियों -नेताओं का जम घट सब पर मेरी नजर थी। मुझे यह आश्चर्य लगा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण सामी, कांग्रेस प्रभारी होने के सिवा जिनका छत्तीसगढ़ से दूर दूर तक का नाता नहीं है और जिन्हें छत्तीसगढ़ी तो क्या हिन्दी भी ठीक ढंग से नहीं आती। कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने भटगांव पहुंचे। क्या इसे इस नेता की अपने कर्तव्य की खानापूर्ति नहीं माना जाना चाहिये? यूं तो भटगांव के समर में कई योध्दा कूद पड़े थे किंतु एक अक्टूबर को ही भटगांव की जनता ने यह तय कर दिया कि उनका असली खेवनहार कौन होगा? कांग्रेस और भाजपा इस सीट के प्रबल दावेदार थे। कांग्रेस को भरोसा था कि राज घराने से चुनाव मैदान में उतरे यूएस सिंहदेव जीतेंगे। जबकि भाजपा का भरोसा रजनी त्रिपाठी पर था। इस चुनाव से भाजपा को ज्यादा इतरा ने की जरूरत नहीं है तो कांग्रेस को भी हार मानकर घुटने नहीं टेक ना चाहिये। उसे अगले आने वाले चुनावों में भाजपा को टक्कर देने के लिये बहुत कुछ करना है। नेताओं में बदलाव के साथ नई रणनीति नहीं तैयार करेगा तो प्रदेश में उसको चारों खाने चित्त होना पड़ सकता है।

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

जो जीता वही सिकदंर!

रायपुर दिनांक 2 अक्टूबर

जो जीता वही सिकंदर!
चार पुलिस कर्मियों को नक्सलियों ने कम से कम बारह दिन तक अपने कब्ज़े में रखने के बाद रिहा तो कर दिया किंतु इस रिहाई ने कई प्रश्न खड़े कर दिये। झारखंड व छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की कार्रवाई लगभग एक जैसी थी। वहां अपहरण कर बंधक बना ये गये एक पुलिस कर्मी को नक्सलियों ने सरकार द्वारा मांग पूरी नहीं करने के कारण मार दिया तथा बाकी को छोड़ दिया। जबकि छत्तीसगढ़ में बंधक बना ये गये सभी चारों बंधकों को रिहा कर दिया। बंधक बनाये गये जवानों में अपने घर लौटने पर जहां खुशी थी वहीं नक्सलियों का खौंफ भी था। नक्सलियों के चंगुल से मुक्त होने के बाद पुलिस कर्मियों ने नक्सलियों द्वारा किसी प्रकार के दुर्व्यवहार की शिकायत नहीं की। जबकि उनकी इन बातों से ख़ौफ़ झलकता है कि वे परिवार के दबाव में आकर अब नौकरी छोड़ भी सकते हैं। शायद यह नक्सलियों की रणनीति का एक हिस्सा है, जो सरकार को डराने के लिये किया जा रहा है कि- आपकी पुलिस हमारे सामने नतमस्तक है। पुलिस कर्मियों की रिहाई परिवारजनों व गांव के लोगों की सहानुभूति अर्जित करने का एक प्रयास हो सकता है। नक्सली सरकार के ग्रीन हंट और अपने साथियों की गिरफ़्तारी से इस समय दबाव में हैं। पुलिस कर्मियों के अपहरण की छत्तीसगढ़ में यह पहली वारदात है। इससे पूर्व वे ग्रामीणों का अपहरण कर ले जाते थे और उनमें से बहुत कम ही लौटते थे। अधिकांश की गला रेतकर हत्या ही हुई लेकिन हाल ही नक्सलियों ने एक एसपीऔ की गर्भवती रिश्तेदार का अपहरण कर अपने पास रखने के दो दिन बाद छोड़ दिया। अपहृत व बंधक बनाये गये पुलिस कर्मियों को छुड़वाने कोई बातचीत पुलिस से नहीं हुई। पुलिस या सरकार नक्सलियों की मांगों को पूरा करने में असपर्थ थी। ऐसे में बंधक बना ये पुलिस जवानों की जान बचाने की ज़िम्मेदारी मानव अधिकार से जुड़े लोगों और मीडिया की थी जिसमें मीडिया एक तरह से अपने मकसद में कामयाब हो गई। डीजीपी विश्वरंजन ने मीडिया को इस पहल के लिये जहां धन्यवाद दिया है, वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि बुनियादी कारणों से सरकार नक्सलियों से लड़ रही है। यह लड़ाई जारी रहेगी। डीजीपी इसे बुनियादी जरूर कह रहे हैं लेकिन इस लड़ाई में कुछ निर्दोष लोग भी पुलिस जवानों के आक्रोश के शिकार हो रहे हैं। ताजा घटना सुकमा की है, केरलापाल के साप्ताहिक बाजार में नक्सली हमले के बाद सीआरपीएफ ने ग्रामीणों पर कहर बरपा दिया। इस हमले में दो जवान घायल हो गये थे। इसके बाद फोर्स उत्तेजित हो गई और जो मिला उसकी पिटाई कर दी। नक्सलियों और पुलिस के बीच इस समय चूहा- बिल्ली का खेल है। जो जीता वही सिकंदर!

एशिया की धरती पर कामनवेल्थ गैम्स

रायपुर दिनांक 3 अक्टूबी 2010

एशिया की धरती पर कामनवेल्थ गैम्स,
भारत की आर्थिक ताकत मजबूत हुई!
रविवार से कामनवेल्थ गैम्स शुरू हो रहे हैं। यह आयोजन दिल्ली में हो या कनाडा के हेमिल्टन में, इस मुकाबले में दिल्ली की विजय हुई थी ऐसा लगता है कि दिल्ली में कामनवेल्थ गैम्स खूब विवादों में रहने के बावजूद भाग्यशाली रहा कि उसका आयोजन समय पर हो रहा है। कामनवेल्थ तैयारियों के दौरान आयोजकों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे तो हाल ही करोड़ों रूपये में बना फुट ब्रिज भी टूट कर गिर गया, जिसे सेना की मदद से बनाना पड़ा। खेलगांव में सफाई व्यवस्था और अन्य अनेक मुद्दे सदैव चर्चा के विषय रहे। आतंक के साये में आयोजित होने वाले इस खेल पर पहले प्रश्न चिन्ह जामा मस्जिद के पास आतंकवादियों द्वारा अंधाधुन्ध फ़ायरिंग से लगा। तभी अयोध्या पर फैसले से तो विश्व यही समझ बैठा कि शायद अब कामनवेल्थ गैम्स टल जायेगा। अयोध्या फैसले पर सारा देश शांत रहा तो एक और खबर कामनवेल्थ गैम्स से आई कि चीफ मेडिकल आफीसर बीमार पड़ गये हैं। चीफ मेडिकल ऑफिसर को टाइफाइड हो गया है। दूसरे मेडिकल आफिसर को लगाकर यह मसला हल कर लिया गया। टाइफाइड खाने- पीने की गड़बड़ी से फैलने वाली बीमारी है और भारत में यह बहुत आम है। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों में हिस्सा लेने वाले खिलाडिय़ों को खास हिदायत दी गई है कि वह खाने- पीने में बहुत सावधानी बरतें। 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी तय करने के लिए नवंबर 2003 में जमाइका के मोंटेगो शहर में कॉमनवेल्थ खेल संघ की आम सभा में मतदान हुआ। तो उस समय आमने- सामने थे दिल्ली और हैमिल्टन। दिल्ली को 46 वोट मिले जबकि 22 वोटों के साथ हैमिल्टन काफी पीछे रह गया। भारत के हैदराबाद शहर में 2003 में हुए अफ़्रो एशियाई खेलों की कामयाबी ने भी मेजबानी के रुख को भारत के पक्ष में मोड़ा। पूर्व खेल मंत्री अय्यर ने जुलाई में राज्यसभा में दावा किया था कि भारत ने ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे देशों को एक- एक लाख डॉलर दिए। ताकि दिल्ली को खेलों की मेजबानी मिल सके। अय्यर कहते हैं कि इन देशों को खेलों की तैयारी के लिए पैसे देने की जरूरत नही थी। उनके मुताबिक, कानून चाहे जो कहे, लेकिन मैं तो इसे रिश्वत ही कहूँगा। हालांकि अय्यर के इन संगीन आरोपों को न्यूजीलैंड की ओलंपिक समिति ने सिरे से खारिज किया। उसने यह तो माना कि कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी हासिल करने की प्रक्रिया के दौरान भारत से उसे पैसा मिला, लेकिन वह इसे रिश्वत नहीं मानते बल्कि यह रकम तो हर मेजबान देश को खेलों में हिस्सा लेने वाले देशों को देनी होती है। दिल्ली एशिया का दूसरा शहर है जिसे कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी मिली। इससे पहले 1998 में मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में कॉमनवेल्थ खेल हो चुके हैं। 1982 के एशियाई खेलों के बाद कॉमनवेल्थ खेल दिल्ली में होने वाला सबसे बड़ा खेल आयोजन है। यह आर्थिक तौर पर उभरते भारत के लिए अपनी ताकत दिखाने का मौका है। एशियाई खेल सफलतापूर्वक हो, इसकी अब हम कामना कर सकते हैं।