गुरुवार, 30 सितंबर 2010

राज्यपाल सीएम को नहीं बुलाया गया?

रायपुर दिनांक 30 सितंबर 2010
एक्ट की बात सही, किंतु कौन से कारण थे
जो राज्यपाल सी एम को नहीं बुलाया गया?
राज्यपाल, मुख्यमंत्री और प्रदेश के नेताओं को एन आईटी के कार्यक्रम में क्यों नहीं बुलाया गया? कौन से ऐसे कारण थे जिसके चलते एन आईटी प्रबंधन ने केन्द्रीय विधि मंत्री को तो कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया लेकिन प्रदेश के राज्यपाल जो कुलाधिपति भी हैं, मुख्य मंत्री तथा शिक्षा मंत्री को दीक्षांत समारोह में बुलाना उचित नहीं समझा। संदर्भ था प्रदेश के सबसे बड़े प्रोद्योगिकी महाविद्यालय के पहले दीक्षांत समारोह का जिसके आयोजन की तैयारी पिछले कुछ दिनों से चल रही थी। इस चर्चित दीक्षांत समारोह में न राज्य के राज्यपाल शामिल हुए न मुख्यमंत्री और न ही प्रदेश के शिक्षा मंत्री। क्यों हुआ ऐसा? क्या इन बड़ी हस्तियों को बुलाना उचित नहीं समझा गया? और ऐसा समझा गया तो क्या कारण थे? इस विवाद से बचने के लिये विधि मंत्री वीरप्पा मो इली को एक्ट का सहारा क्यों लेना पडा? क्या यह पहले से तय था या किसी का निर्देश था कि राज्यपाल या कुलाधिपति सहित प्रदेश सरकार के किसी भी व्यक्ति को इस कार्यक्रम में नहीं बुलाया जा ये? वीरप्पा मोइली ने इस संदर्भ में एन आईटी अधिनियम का हवाला देते हुए कहा है कि- एक्ट के तहत दीक्षांत समारोह में राज्यपाल या मुख्यमंत्री को बुलाने के लिये बाध्य नहीं है। किंतु क्या नैतिकता के नाते व उस स्थिति में जबकि यह दोनों हस्तियां प्रदेश में विशेष कर उस तिथि व समय पर जबकि कार्यक्रम चल रहा था तब मौजूद थे। तब उन्हें इस कार्यक्रम से दूर रखना उनका अपमान नहीं? कया इसका सीधा- सीधा अर्थ यह नहीं है कि आयोजकों ने इन प्रमुख हस्तियों की पूर्णत: उपेक्षा की?ं मुख्यमंत्री व उच्च शिक्षा मंत्री प्राय: हर कार्यक्रम के लिये सहज उपलब्ध रहते हैं। प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर के इस कार्यक्रम में ऐसा कौन सा कारण बाधक बन गया, जो इस कार्यक्रम में इन हस्तियों की उपेक्षा की गई? हाल ही पत्रकारिता विश्वविद्यालय भवन शिलान्यास कार्यक्रम,जिसके मुख्य अतिथि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी थे- पूरी सरकार उमड़ पड़ी थी। वहीं प्रदेश के सबसे बड़े राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान के कार्यक्रम में प्रदेश के सारे नेताओं की अनुपस्थिति अपने आप में दिलचस्प बन पड़ी है। लोग संभावना भटगांव चुनाव को लेकर भी लगा रहे हैं कि नेताओं का हुजूम वहां व्यस्त रहा होगा, किंतु बड़े नेताओं के लिये इस कार्यक्रम में शामिल न होना एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी द्वारा पत्रकारिता विश्वविद्यालय की नींव रखने के बारे में चर्चा रही कि इस कार्यक्रम में उनको बुलाकर इसे राजनीतिक रूप दिया गया। एनआईटी के कार्यक्रम में नेताओं की लुप्तता का कारण यही तो नहीं? क्या यह केन्द्र और राज्य के बीच खिंची तलवार की एक झलक तो नहीं थी? मगर इस संदेह को भी हम इसलिये मान नहीं सकते, क्योंकि फिलहाल केन्द्र और राज्य के बीच ऐसी कोई टकराव की स्थिति नहीं है। एनआईटी का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। 14 सिंतबर 1956 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इंजीनियरिंग कालेज भवन की आधारशिला रखी थी और 14 मार्च 1963 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका उदघाटन किया था। सन् 2005 में इंजीनियरिंग कालेज को अपग्रेड कर एन आईटी किया गया। प्रथम दीक्षांत समारोह भी उसी गरिमा के साथ धूमधाम से आयोजित होगा, इसकी कल्पना सभी को थी लेकिन प्रबंधन से निराशा ही मिली। कुछ पुराने छात्रों को इस आयोजन में शामिल होने के लिये बुलाया गया और सिर्फ कुछ ही पल में कार्यक्रम कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई। गौरव बढ़ा या घटा?

बुधवार, 29 सितंबर 2010

कब तक दुष्टों को झेलती रहेंगी हमारी जेलें?

रायपुर, दिनांक 29 सितंबर

कब तक दुष्टों को झेलती रहेंगी हमारी
जेलें? क्यों नहीं निपटाते इन्हें?
एक दुष्ट सुरेंद्र कोली का नाम और जुड़ गया भारतीय जेल के सींखचों के पीछे, जिसे देश के कानून के मुताबिक फाँसी के फंदे पर लटका ना है-इसके पूर्व भारतीय संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु, मुम्बई में अंधाधुंध हमला कर कई निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारने वाला आमिर अजमल कसाब जैसा आंतकवादी भी जेल में पड़ा- पड़ा भारतीय रोटी खा रहा है.... और तो और कसाब ने मंगलवार को सुरक्षा प्रहरी पर हमला भी कर दिया। हम कब तक ऐसे दुष्टों को सहते रहेंगे? क्यों नहीं हमारे कानून को इतना कड़ा कर दिया जाता कि अपराध करने वाले घिनौने व्यक्तियों को तमाम दूसरे कानूनों से हटकर ऐसी सजा दी जाये कि और कोई दूसरा ऐसा करने की हिम्मत ही न कर सके। सुरेन्द्र कोली हो या कसाब एक ही चट्टे बट्टे के लोग हैं जिन्हें समाज व न्याय पालिका दोनों ही उनसे जीने का अधिकार छीन चुकी है। फिर उन्हें जेल में रख कर और रोटी खिलाने का औचित्य क्या? आज कानपुर से एक खबर आई कि कक्षा छठवीं में पडऩे वाली एक बारह साल की बच्ची से स्कूल में ही किन्हीं दरिन्दों ने रेप किया और उसे मरणासन्न स्थिति में घर पहुंचाया। जहां से उसे उसकी मां ने उसे अस्पताल पहुंचाया जहां अधिक रक्त स्त्राव के कारण उसकी मौत हो गई। एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले देश में यूं तो ऐसे दरिन्दों को छांटकर निकालना और उन्हें समाज के सारे क्रियाकलापों से सदैव के लिये मुक्त करना इतना आसान नहीं है। किंंतु हम, जो पकड़ में आते हैं उनको तो कम से कम ऐसी कठोर सजा दे सकते हैं जिससे समाज पर इसका गहरा असर पड़े। ऐसा करने में कौन सी बाधा आ रही है? क्यों हमें ऐसे दुष्टों को झेलने के लिये मजबूर किया जा रहा है? यद्यपि सरकार ने मामलों को जल्दी निपटाने के लिये फास्ट ट्रेक अदालतें जैसी व्यवस्था की है किंतु इन अदालतों के फैसले चुनौती पर चुनौती में वर्षो निकल जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी पहुँचकर यह मामले फैसले के बाद भी व्यवस्थापिका की फाइलों में वर्षो निकल जाते हैं। यह भी आश्चर्य का विषय है कि जिन लोगों को न्यायपालिका के निर्णयों को अमल में लाना है, वे ही कहते हैं कि- न्याय में देरी हो रही है। जबकि उनकी स्वयं की व्यवस्था ऐसी है कि फांसी जैसे निर्णयों को अमल में लाने में वर्षो निकल रहे हैं। आज की स्थिति में पूरे देश में पांच दर्जन से ज्यादा फाँसी के निर्णयों को अमल में लाने की फाइलें सरकारी मुहर के लिये गृह मंत्रालय या राष्ट्रपति भवन में धूल खा रही हैं। कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फाँसी देने के बाद से देश में कोई फाँसी नहीं हुई। जबकि अदालतों ने इस अवधि में कई लोगों को फाँसी पर लटका ने का आदेश जारी किया है। न्यायालय के निर्णय पर अमल नहीं होने या प्रक्रिया में देरी का ख़ामियाज़ा आम आदमी भुगत रहा है, जो कहीं न कहीं किसी दुष्ट का शिकार हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला हो या न हो इसपर अपना निर्णय मात्र दो घंटे की सुनवाई के बाद दिया। क्या देश में पकड़े गये चंद दुष्टों के भविष्य के बारे में भी फैसला कुछ इसी तरह नहीं लिया जा सकता?

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

फैसला होकर ही रहेगा!

रायपुर, दिनांक 28 सितंबर
फैसला होकर ही रहेगा!
फैसला जो भी हो इसे टाला नहीं जाना चाहिये- सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार को अयोध्या विवाद पर सुलह की अर्जी को खारिज करते वक्त दिये गये फैसले का सार कुछ यही था। इस महीने की चौबीस तारीख को इलाहाबाद उच्च न्यायालय को देश के सबसे पुराने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाना था। लेकिन रमेश चंद त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए याचिका लगाई कि मामले का हल आपसी समझौते से निकालने के लिये फैसले को टाला जाना चाहिये। किंतु सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया और हाइर्कोर्र्ट की बैंच से कहा कि- वह एक- दो दिन में इस मामले पर फैसला सुनाए। हाईकोर्ट का निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट के बदले लखनऊ हाई कोर्ट की बैच में सुनाया जायेगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज करने के बाद इस विवादास्पद मसले पर फैसला शुक्रवार तीस सितंबर को आने की संभावना है। हाई कोर्ट के एक जज अक्टूबर में रिटायर हो रहे हैं। इसलिये भी यह जरूरी है कि फैसला तीस सितंबर से पहले हो जाए। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट के फैसले पर है? क्या होगा फैसला? निर्णय हिंदुओं के पक्ष में होगा या मुसलमानों के? फैसले के बाद दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया क्या होगी? कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। इस बीच यह भी निश्चित है कि हाईकोर्ट का निर्णय जो भी आये विवाद यहां से निकल कर सुप्रीम कोर्ट जाना ही है। यद्यपि दोनों पक्षों के कई बड़े- बड़े नेताओं व धार्मिक गुरुओं ने विश्वास दिलाया है कि अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया जायेगा। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया उसका देश के दो बड़े राजनीतिक दलों कांग्रेस व भाजपा ने स्वागत किया है। मुस्लिमों के एक धार्मिक गुरु अंसारी ने तो यहां तक कह दिया कि हम अदालत का दर्जा काजी को देते हैं। वह जो भी फैसला देगा हमें मान्य होगा। कई हिन्दू धार्मिक नेताओं ने भी अदालत के फैसले को स्वीकार करने की बात कही है किंतु इस फैसले से दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स के प्रभावित होने अथवा खत्म होने की संभावना देश विदेश के टिप्पणीकारो ने की है हालाकि इसकी संभावना कम ही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की बैच क्या फैसला देगी?यह किसी को नहीं मालूम लेकिन इस विवाद पर एक नजर डालें तो यह अपने आप में एक अनोखा मामला है। जो शायद फैसले के बाद भी उलझा हुआ ही रहेगा। सन 1528 में मीर बाकी ने बाबर के नाम पर मस्जिद बन वाई जिसे लेकर कुछ हिंदुओं का दावा है कि मस्जिद भगवान राम की जन्म भूमि पर बना है। 1853 में इसको लेकर हिन्दू-मुस्लिम लड़ पड़े। अंग्रेजों ने इसपर फै सला दिया कि मुसलमान मस्जिद के अंदर और हिन्दू मस्जिद के बाहरी हिस्से में प्रार्थना करें। 1949 में मस्जिद में किसी ने भगवान राम की मूर्ति रख दी और यहां से विवाद कोर्ट में चला गया। 1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने अपना अभियान तेज किया और विवादित स्थल के करीब राम मंदिर की नींव रखी। 6 दिसंबर को देशभर से जुटे कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। तब से लेकर अब तक यह मामला चर्चा का विषय है। देश में इस मुद्दे को लेकर जहां सांप्रदायिक दंगे हुए और सत्ता पर भाजपा काबिज भी हुई। भाजपा ने वायदा किया था कि वह सत्ता में आने के बाद राम मंदिर बनवा देगी, लेकिन उसने अपना वादा पूरा नहीं किया। जनता ने आगे आने वाले वर्षो में उसे सत्ता से बे दखल कर दिया। यह मामला अति संवेदनशील होने के बाद भी पुराना पड़ गया। जनता का उतना समर्थन इस विवाद पर अब शायद न मिले जितना पहले मिला था। फिलहाल सबकी नजर लखनऊ में हाईकोर्ट के फैसले पर है।

शादी वरूण की, दर्द राहुल का

रायपुर दिनांक 28 सितंबर 2010

शादी वरुण की, दर्द राहुल का, कब
लोग इस सिस्टम से बाहर निकलेंगे?
वरुण गांधी बंगाली बाला या मिनी राय से इस वर्ष शादी करेंगें-आमतौर पर देखा जा ये तो यह खबर आम है किंतु खबर का सिरा कहीं न कहीं सत्ता व हाई प्रो फाइल से जुड़ा हुआ है, तो इसका महत्व भी उतना बढ़ गया। खबर निकालने वालों ने इसे नेहरू-गांधी परिवार की पुरानी परंपरा से जोड़कर बता दिया कि चौरानवे साल बाद इस खान दान में ब्राह्मण वधु आयेगी। इसमें भी दिलचस्प बात यह कि राजनीति से जुड़े लोगों ने इसमें अपना मकसद साधने का प्रयास किया। कुछ ने कहा कि इससे यूपी में जातिगत समीकरण में बदलाव आयेगा। कांग्रेस के लोगों ने गोटी बिठानी शुरू कर दी कि राहुल गांधी को भी अब शादी कर लेना चाहिये। राहुल अगर ब्राह्मण वधु लाते हैं तो उत्तर प्रदेश में सवर्ण वोट बैंक में इज़ाफा होगा। आम आदमी के बीच में जब इस शादी और इसमें राजनीतिक घुसपैठ की चर्चा हुई तो कई लोगों के मुंह से यही बात निकली कि आप शादी की बात करते हैं। यह राजनीति से जुड़े लोगों में से तो कई ऐसे भी है जो किसी की मौत पर भी शतरंज की बिसात बिछा कर गोटियां सरकाते हैं। वरुण गांधी भाजपा के फायरब्रांड नेता हैं। उनकी शादी भी लव मेरीज है। ग्राफिक डिज़ाइनर या मिनी राय से उनकी मुलाकात अमरीका के न्यूयार्क शहर में हुई थी। बाद में वे लंदन में मिले और प्यार परवान चढ़ता रहा तथा बात वरुण की मां मेनका गांधी तक पहुंची और मामला शादी तक पहुंच गया। प्यार अंधा होता है। अगर इस अंधे प्यार में वरूण को कोई गैर जातीय अथवा दूसरे धर्म की लड़की मिल जाती, तो हम कल्पना कर सकते हैं कि जो लोग आज गठजोड़ का समीकरण कर रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया कुछ और ही होती। नेहरू-गांधी परिवार ने देश में वर्षो तक शासन किया है। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कमला कौल से विवाह किया था, जो एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनकी पुत्री पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पारसी फिरोज गांधी से विवाह किया। जबकि श्रीमती गांधी के पुत्र राजीव गांधी ने इटेलियन सोनिया गांधी से और संजय गांधी ने सिख मेनका गांधी को पसंद किया। राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी का विवाह पंजाबी क्रिश्चियन राबर्ट वाढेरा से हुआ। इन सबको एक संयोग ही मानना चाहिये कि ऊपर से जो लिख दिया, उसे नीचे वालों ने बांध दिया। अब मैं पूछना चाहता हूं उन नेताओं से, जो हर ऐसे मामले को राजनीति और जाति से जोड़कर देखते हैं? क्यों वे सामाजिक बंधन और सामाजिक रीतिरिवाजों को राजनीति के गंदे माहौल में मिलाकर उसे अपवित्र करना चाहते हैं? असल में हम परिवारवाद के आगोश में इतने ज्यादा समा गये हैं कि उससे उबर नहीं पा रहे हैं। उनका बेटा, उनकी पत्नी, उनकी बहू के जाल में से निकलकर राष्ट्र में मौजूद प्रतिभाओं को सामने लाने का प्रयास कोई नही करता। हम कब तक बेगानी खुशी में अपनी खुशी बिखेरते रहेंगे। साठ- बासठ साल नेहरू गांधी परिवार का रहा, इसका हमें गर्व भी है गिला भी कि दूसरे को भी मौका मिलना चाहिये था। यह अब देश की जनता पर है कि वह एक अरब बीस करोड़ की आबादी में से ऐसे हीरे को ढूंढ निकाले। जो देश को परिवारवाद, सामंतवाद, ढकोसलावाद और न जाने क्या- क्या से हटकर देश को एक नई राह दिखाने वाले को ढूंढ निकालें!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

थल,वायु,जल सबसे तो ले ली दुश्मनी

रायपुर दिनांक 27 सितंबर 2010

थल,वायु,जल सबसे तो ले ली दुश्मनी,
अब तैयार रहो परिणाम भुगतने..!
जाने-अनजाने में हम धरती को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं और जल वायु को कितना दूषित कर रहे हैं -क्या कभी इसकी कल्पना की है? हमने कल्पना की भी होगी तो हम अपने लोगों के सामने ही इस मामले में बे बस हैं। चूंकि जानते हुए भी लोगों को इसकी चिंता नहीं हैं। हम आमने- सामने होने वाले रोज़मर्रा कामों पर एक नजर डालें तो यह बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है कि हम जिस धरती में सोना उगाते हैं। उसी धरती पर कई जगह बुरी तरह गंदगी फैला प्रदूषित कर उसका अपमान कर रहे है। अपनी धरती को हम मां कहकर पुकारते हैं और उसी मां के सीने पर गंदगी फैला कर यातना दे रहे हैं। क्या यही हाल हमारी नदियों व तालाबों का नहीं है? जहां हर साल अपने धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर वह सब कुछ उस मां रूपी नदियों के साथ करते हैं, जो नहीं करना चाहिये। हाल ही संपन्न मूर्ति विसर्जन के बाद किये गये एक आकलन में कहा गया है कि मूर्तियों के विसर्जन से नदी के पानी में इतना रसायन घुल मिल गया है कि वह न पीने लायक रहा और न ही नहाने लायक। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो नदियों के प्रदूषण से लोगों को न केवल अलग- अलग किस्म की बीमारियों से पीड़ित होना पड़ेगा। वरन हमारे समक्ष निस्तारी व अन्य कई किस्म की समस्याएं उत्पन्न हो जायेगी। नदियों के जल को सदैव पवित्र माना जाता रहा है, किंतु मानव उपयोग की बढ़ोत्तरी और आस्थाजन्य कर्मो के चलते न केवल गंगा मैली हो गई बल्कि देश में बहने वाली प्राय: सभी प्रमुख व सहायक नदियों भी मैली हो गई। नदियों की तरह धरती को भी इस ढंग से रसायन युक्त किया जा रहा है कि आने वाला समय यह इंसानों के रहने लायक नहीं रह जायेगा। धरती अनाज उगाना बंद कर देगी और वायु, जल प्रदूषण का बढ़ता दायरा हर वर्ग के लिये खतरनाक होता जायेगा। न्यूयार्क टाइम्स में हाल ही प्रकाशित एक रिपोर्ट पर अगर गौर किया जाये। तो यह आने वाले भीषण संकट का एक संकेत मात्र है। रिर्पोट में कहा गया है कि विकासशील देशों में हर साल लगभग 20 लाख लोग चूल्हे के धुएं से होने वाली फेफड़े की बीमारियों के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। ओबामा प्रशासन ने हाल ही एक प्रोजेक्ट की घोषणा की है जिसके तहत अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के गांवों में दस करोड़ धुआंरहित स्टोव वितरित किए जाएंगे। ये स्टोव एक बड़ी आबादी को भोजन पकाने या पानी गर्म करने के लिए लकडिय़ां, भूसा और कोयला जलाने से निजात दिलाने का प्रयास है। भारत जैसे विकासशील देश में हर कदम पर प्रदूषण है। कहीं धूल है कहीं गंदगी, कहीं रसायन तो कहीं पानी में गंदगी से उपजा प्रदूषण। ध्वनि प्रदूषण भी एक समस्या है। भारत में चूल्हे से निकलने वाले धुएं के दुष्प्रभावों पर कभी ध्यान दिया गया हो , इसकी जानकारी नहीं किंतु यह धुआँ न्यूमोनिया से लेकर फेफड़े का कैंसर जैसी बीमारियाँ तक को आमंत्रित कर सकती हैं। ये चूल्हे ग्लोबल वार्मिंग को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा थल- जल और वायु को भी प्रदूषित कर हमने अपना दुश्मन बना लिया है।

शनिवार, 25 सितंबर 2010

अब खेल तो होकर रहेगा,चाहे कोई कुछ भी कहे!

रायपुर दिनांक 26 सितंबर 2010

कलमाडी झु़के, शर्मा दहाड़ें, अब खेल
तो होकर रहेगा,चाहे कोई कुछ भी कहे!
अगर कोई अपनी गलती स्वीकार कर ले तो उसका आधा गुनाह यूं ही माफ हो जाता है। कलमाडी अगर अपनी ग़लतियों को पहले ही स्वीकार कर लेते तो शायद राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की इतनी फ़ज़ीहत नहीं होती। कलमाडी ने आयोजन में ग़लतियों की सारी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली है तथा यह भी कहा है कि स्टेडियम पहले मिल जाता तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। विश्व में देश की छवि को बिगाड़ने में विदेशी मीडिया ने भी अहम भूमिका अदा की, इसमें चीन समर्थक कई राष्ट्र भी शामिल हो गये जो यह चाहते थे कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में भारत की कथित नाकामी के चलते आयोजन स्थल नई दिल्ली से हटाकर चीन में कर दिया जायें चूंकि चीन ने इस दौरान यह ऐलान कर दिया कि उसने अगले एशियाड की तैयारी अभी से पूरी कर ली है। यह ऐसे समय विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करवाने की एक चाल थी जो शायद भारत सरकार ने समय रहते भाप ली और राष्ट्रमंडल खेल के सारे विवाद को दरकिनार रखते हुए इसे देश की प्रतिष्ठा का सवाल मान लिया तथा फुट ओवर ब्रिज गिरने और स्टेडियम कक्ष की फाल्स सी लिंग गिरने के बाद भी यह ऐलान कर दिया कि समय पर खेल होगें और सारी तैयारियां भी पूरी कर ली जायेगी। जामा मस्जिद के पास फायङ्क्षरंग तथा कार में विस्फोट की घटना ने जरूर भारत को हिला दिया लेकिन इसे भी सम्हाल लिया। सरकार ने नष्ट हुए फुट ओवर ब्रिज के निर्माण कार्य को भी निजी हाथों से छीनकर सेना के जिम्मे कर दिया ताकि सेना अपने ढंग से समय पर इसे पूरा कर सके। फुट ओवर के निर्माण पर आयोजन समिति ने दस करोड़ चालीस लाख रूपये फ ूके थे लेकिन अब सेना मामूली राशि से फुट ओवर को खड़ा कर देगी। प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह की नाराज़गी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के दृढ निश्चय ने राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की सारी बाधाएं अब लगभग दूर हो गई हैं लेकिन खेल गांव में सुविधाओं के मामले में कई प्रशन अभी भी मौजूद हैं। इंग्लैंड, न्यूजीलैंड की टीमें भारत पहुंच गई हैं। इस बीच भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी तैयारियों को लेकर भारत की आलोचना कर रहे देशों के प्रति कडा रूख दिखाते हुए कनाडा की राजधानी ओटावा में दहाड़ लगाई कि उन्हें इसकी कीमत भारत जैसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था में व्यापारिक अवसरों के संदर्भ में चुकानी पड़ सकती है। पीटर वान लोआन भी इस संवाददाता सम्मेलन में मौजूद थे जब शर्मा ने यह बात कही। यूपीए सरकार के किसी मंत्री द्वारा पहली बार विश्व के सामने अपनी मर्दानगी प्रदर्शित की गई है। शर्मा ने यहा तक कह दिया कि इस समय भारत के साथ सहयोग न करना एक चूक होगी। अगर व्यापार की बात आएगी तो फिर नुकसान किसका होगा? अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी शर्मा के गुस्से की चपेट में आया। मीडिया को शर्मा ने कहा कि पुरानी और मनगढ़ंत तस्वीरें दिखा कर क्या आप हमारे देश को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। हम आपके इस रवैये को कभी स्वीकार नहीं कर सकते। भारत उभरती आर्थिक ताकत है और दुनिया एवं राष्ट्रमंडल का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। दिल्ली में भारी बारिश और बाढ़ की वजह से खेल गांव में काम प्रभावित हुआ इसके बावजूद खेलों का आयोजन होगा और सही ढंग से होगा।

हर चार दिन में वस्तुओं के दाममें वृद्वि !

रायपुर दिनांक 25 सितंबर 2010
हर चार दिन में वस्तुओं के दाम में वृद्धि,कैसे
महँगाई कम करने की बात करते हैं!
चार दिन पहले शरीर में लगाने की एक दवा चौंसठ रूपये में खरीदी। दो दिन बाद यही दवा सत्तर रूपये की हो गई। पैक की हुई वस्तुओं पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। कंपनियां जब मर्ज़ी आती है तब भाव बढ़ा देती हैं जिसका असर अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर पड़ता है। सरकार की कोई पकड़ पैक वस्तुएँ बेचने वाली कंपनियों पर नहीं हैं। चूंकि कंपनियों से सरकार या पार्टियों को चंदा मिलता है। उपभोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग खुली वस्तुओं की जगह पैक- सील बंद वस्तुओं को लेने में ही अपना व अपने परिवार की भलाई समझता है। उपभोक्तओं की इस मानसिकता का पूरा फायदा कंपनियां उठा रही हैं। आम उपभोक्ता के इस बदले रू ख का फायदा चिल्हर दुकानदारों ने भी उठाना शुरू कर दिया है। वे हल्दी, मिर्च, धनिया जैसी रोजमर्रा उपयोग में आने वाली वस्तुओं को अपने पैक में डालकर बाजार में अनाप- शनाप भावों पर उतार रही है- इसमें पैक वस्तु अधिनियम का पालन नहीं होता। उपभोक्ताओं को इस लूट से बचाने का प्रयास आज तक किसी स्तर पर नहीं हुआ। सरकार बढ़ी महँगाई के लिये देश के कई इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ को जिम्मेदार मानती है। सरकार का कहना है कि बारिश और बाढ़ के चलते आपूर्ति बाधित होने से खाद्यान्न कीमतों में लगातार चौथे सप्ताह वृद्धि हुई। 11 सितंबर को समाप्त- सप्ताह में महँगाई बढ़कर 15.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे पिछले सप्ताह खाद्य महँगाई दर 15.10 प्रतिशत थी। मोटे अनाज, चुनिंदा सब्जियों और दूध की कीमत में तेज बढ़त दर्ज की गई। अर्थशास्त्री बिना कोई कारण बताए यही रट लगाये हुए है कि बारिश के थमते ही कीमतों में नरमी आएगी। महँगाई पर सरकार को कोई ठोस सुझाव देने की जगह अर्थ शास्त्री बाढ़ और बारिश को जिम्मेदार मानते हुए कोई सुझाव सरकार को नहीं देते। रेलीगेयर कैपिटल मार्केट्स के मुख्य अर्थ शास्त्री जय शंकर का कहना है कि आपूर्ति प्रभावित होने से मांग और आपूर्ति के बीच अंतर पैदा हो गया है। इस वर्ष जून के बाद अब दिसंबर में महँगाई कम होने की बात की जा रही है। अर्थ शास्त्री भी महँगाई के बारे में कुछ सरकारी भाषा में ही बात कर रहे हैं। पता नहीं उनके पास कौन सी जादू की छड़ी आ गई, जो दिसंबर में महँगाई कम कर देगी? ऐसा लगता है कि विशेषज्ञों का सारा दारोमदार बंद कमरे में अनुमान और आंकड़ों पर निर्भर रहता है। नवंबर- दिसंबर में यूं ही फसल कटने का समय आ जाता है। तब महंगाई तो अपने आप ही कम होना है। यही बात विशेषज्ञ कहते हैं कि दिसंबर के अंत तक आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। दाल, चावल और गेहूं की कीमतें ऊंची होने से वार्षिक आधार पर मोटे अनाज की कीमतें 6.75 प्रतिशत ऊंची है। इस बीच दालें 4.01 प्रतिशत, गेहूं 9.21 प्रतिशत और चावल 5.52 प्रतिशत महंगी हैं। अन्य खाद्य वस्तुओं में दूध 23.41 प्रतिशत और फल 10.33 प्रतिशत तक ऊंचे हो गए हं। सब्जियों भी औसतन 6.84 प्रतिशत महंगी हुईं। आलू की कीमत में 48.56 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई है। अर्थशास्त्रियों ने महँगाई दर में बढ़त के रुख की वजह मूल्य सूचकांक की नई सीरिज़ को बताया हैं। क्योंकि पुरानी सीरीज 1993-94 की कीमतों पर आधारित थी, जबकि नई सीरिज़ 2004-05 की कीमतों पर आधारित है। महँगाई के संबंध में विशेषज्ञों व सरकार दोनों का रवैया उपभोक्ताओं को लॉलीपॉप दिखाने जैसा है। महँगाई आज घट जायेगी, कल घट जायेगी कहते हुए पूरा साल निकल गया किंतु महँगाई देश में ज्यों की त्यों है। महँगाई से सर्वाधिक मध्यमवर्ग का उपभोक्ता प्रभावित हो रहा है।

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

बाढ-सूखा, कब तक यह हमारी नियति बनी रहेगी?

रायपुर दिनांक 24 सितंबर 2010
बाढ-सूखा, कब तक यह
हमारी नियति बनी रहेगी?
यहां बैठे -बैठे यह सुन बड़ा अजीब सा लगता है कि दिल्ली में बाढ़ आई है यूपी अथवा बिहार में बाढ़ ने कहर ढा दिया है। चूंकि हमारा नगर या हमारा प्रदेश तो सूखा है। दिल्ली यूपी को बाढ़ कैसे बहाकर ले गई? यह सिलसिला आज से नहीं वर्षो से चला आ रहा है। प्रकृति के इस अजीब करिश्मे को जानने का प्रयास आज तक हमारे लोगों ने कभी नहीं किया और न ही इस स्थिति से निपटने की कोई बड़ी योजना योजना कारों ने तैयार की। देश में प्रकृतिजन्य कहर से हर साल करोड़ों रूपये की फसल और संपत्ति यूं ही बर्बाद हो जाती है। आज़ादी के बासठ साल बाद भी देश बाढ़ और सूखे की मार को झेल रहा है। हर साल बाढ़-सूखे पर करोड़ों रूपये का ख़र्चा... हर साल यही सिलसिला चलता है, लेकिन अब तक कभी ऐसी योजना तैयार नहीं हुई, जिससे इसका स्थाई हल निकाला जा सके । संसद में छोटे से छोटे मुद्दे पर लंबी बहस कर हंगामा करने वाले हमारे माननी यों ने भी कभी आम जनता से जुड़ी इन समस्याओं पर गौर नहीं किया। इसकी जरूरत भी उन्होंने महसूस नहीं की, चूंकि ऐसी समस्याओं से उनका कोई लेना- देना नहीं। बाढ़ आती है तो सरकारी खज़ाने से जनता के टैक्स का पैसा निकालकर लोगों को मदद पहुंचा दी जाती है। सूखा पड़ता है तो राहत कार्य के लिये करोड़ों यहां तक कि अरबों रूपये निकालकर पीड़ितों का मुंह बंद कर दिया जाता है। मगर कभी यह नहीं सोचा कि हम कब तक यूं ही सरकारी खज़ाने को बाढ़ और सूखे के नाम पर खाली करते रहेंगें? आज हरियाणा दिल्ली, पटना, यूपी के कई गांव- शहर सब पानी में डूबे हैं और छत्तीसगढ़ सहित कई प्रदेशों में अच्छा पानी बरस ने के बावजूद क ई बांधों में जरूरत के अनुसार पानी नहीं। नदी- नाले उफान पर आये और पानी बहकर चला गया। धरती को इतना पानी नहीं मिला कि वह ग्रीष्म ऋतु में लोगों को पानी पिला सकें । यूपीए सरकार ने देश की नदियों को एक दूसरे से जोड़ने की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की योजना को सिर्फ इसलिये रद्दी की टोकनी में फेंक दिया चूंकि इसे विपक्ष ने तैयार किया था। हम सभी के लिये यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या देश की सभी नदियों को योजनाबध्द तरीके से आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया जाता तो आज जो समस्या यमुना से पानी छोडऩे अथवा भारी बारिश के कारण विभिन्न नगरों में उपस्थित हुई है, वैसी समस्या उत्पन्न होती? कई राज्य ऐसे हैं जहां सूखे के दिनों में भी खूब पानी गिरता है और वहां की नदियों में इतना पानी भरता है कि वे उसे सम्हाल नहीं पाते। अगर इस पानी का रूख तकनीकी तरीके से दूसरे राज्यों की तरफ कर दिया जाता तो न कहीं सूखा होता और न बाढ़ आती...योजनाकारों और सरकार को कम से कम अब तो सबक लेना चाहिये कि देश में हर साल बाढ़ की स्थिति में जो पानी घर व खेतों में घुस जाता है। उसका रूख ऐसे राज्यों की तरफ किया जा ये जो सूखे से पीड़ित हों और पीने के पानी तक के लिये तरस जाते हैं।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

वरना आज भाटापारा कल छत्तीसगढ़ पटरी पर दिखेगा!

रायपुर दिनांक 22 सितंबर

रेलवे वक्त के साथ चले वरना आज भाटापारा
कल छत्तीसगढ़ पटरी पर दिखेगा!
जन सुविधाओं की उपेक्षा सरकार के साथ- साथ देश को भी महंगी पड़ सकती है। यह बात भाटापारा में सर्वदलीय मंच के रेले रो को आंदोलन ने सिद्ध कर दिया है। पखवाड़े भर पहले भाटापारा सर्वदलीय मंच ने रेलवे को आगाह कर दिया था कि अगर भाटापारा में सुविधा बढ़ाने के मामले में उनकी मांगों को अन देखा किया गया तो उसका परिणाम बुरा होगा। रेलवे ने जनता की बातों को गंभीरता से नहीं लिया और लोग पटरी पर उतर आये। इस छोटे से आंदोलन ने थोड़ी ही देर में जहां हावड़ा-मुम्बई ट्रेन सेवा को अस्त व्यस्त कर दिया वहीं रेलवे को इससे भारी नुकसान हुआ। देश की महत्वपूर्ण यात्री ट्रेनें इसी मार्ग से चलती है। जबकि हावड़ा-मुम्बई के बीच का यह महत्वपूर्ण ट्रेक है। हजारों यात्री इस रेल मार्ग से निकलने वाली लम्बी दूरी की ट्रेनों में सफर करते हैं। भाटापारा में हुए आंदोलन से इस रूट के यात्रियों को जहां अपनी यात्रा में और घंटे जोड़ने पड़े वहीं कई मालगाडिय़ों को भी घंटों इस रूट पर रूकना पड़ा। आंदोलन से एक बात यह साफ हुई कि सरकार आंदोलन या तोडफ़ोड की भाषा ही समझती है। हड़ताल, आंदोलन किसी को पसंद नहीं लेकिन जन सुविधाओं की अवहेलना होने लगे तो इसका दूसरा उपाय क्या हो सकता है। रेलवे का बिलासपुर जोन यात्री व माल ढोने के मामले में आज से नहीं राज्य बनने से पहले अग्रणी रहा है। यहां से पहले जहां चावल रेक में भर- भरकर विदेशों को निर्यात होता था। वहीं आज भी कोयला, लोहा, खनिज, एल्यूमीनियम तथा अन्य कीमती वस्तुओं को दूसरे राज्यों के साथ विदेशों को भी भेजा जाता है। इसके बावजूद भाटापारा सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लोगों की छोटी सी मांग को मंज़ूर करने या उसपर किसी प्रकार का आश्वासन देने में रेल प्रशासन ने कई साल लगा दिये। रेल सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की मांग इस अंचल के नागरिक वर्षो से करते आ रहे हैं किन्तु यहां जो सुविधाऐं प्रदान की जाती है। वह एक तरह से भीख दे रहे हैं जैसी दी जाती है। जब इस प्रदेश से भारी राजस्व केन्द्र के खजाने में जाता है, तो उसे सुविधाएँ बढाऩे में क्या तकलीफ़? कोलकाता, पटना, उत्तर प्रदेश से अब तक रेल मंत्री बनते आये हैं। इन रेल मंत्रियों का अपने राज्य के सिवा किसी दूसरे राज्य से कोई लेना- देना नहीं। बजट में जितनी भी सुविधाएँ बढ़ती हैं, वे सारी की सारी इन मंत्रियों के क्षेत्र की होती हैं जबकि सर्वाधिक आय केन्द्र की झोली में डालने वाले छत्तीसगढ़ का हाल यह है कि उसे छोटी- छोटी सुविधा के लिये भी आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है। अगर छत्तीसगढ में भाटापारा जैसा संगठित आदोलन रेलवे सुविधाओं में बढ़ोत्तरी को लेकर होता है। तो इसका खामियाजा रेलवे को भुगतना पड़ सकता है। अत: रेलवे को इस छोटे पैमाने पर हुए किंतु गंभीर आंदोलन से सबक लेना चाहिये कि वह इस अंचल को कम से कम जानबूझकर तो सुविधाओं से वंचित न करें वरना आज भाटापारा तो कल छत्तीसगढ़ पटरियों पर दिखाई देगा।

इतना तो मत चिल्लाओं कि सियार भी शरमा जायें!

रायपुर, दिनांक 21 सितंबर 2010
इतना तो मत चिल्लाओं कि
सियार भी शरमा जायें!
हम कितने स्वतंत्र हैं? क्या आप महसूस नहीं करते कि हमारे संवैधानिक अधिकारों और हमारी स्वतंत्रता पर कोई न कोई खलल डाल रहा है? कोई हमारे घर के सामने जोर-जोर से लाउड स्पीकर बजा रहा है तो कोई हमारे घर के ठीक सामने कचरों का ढेर लगा रहा है। कोई सड़क पर बेतुके हॉर्न से हमारी एकाग्रता को भंग कर रहा है या फिर सड़कों को घेरकर अपना कब्जा जमा ये बैठा है। मुम्बई में सुपर स्टार अमिताभ बच्चन या लता मंगेशकर जैसी हस्तियां भी अपनी स्वतंत्रता के हनन से दुखी हैं। हम अपनी बात करें- कहने को हमें संविधान ने स्वतंत्रता से लाद दिया है, लेकिन हकीक़त क्या यही है कि हम संविधान प्रदत्त अधिकारों का उपयोग कर रहे हैं या हमें वह स्वतंत्रता मिल रही है। जो हमने अंग्रेज़ों से छीन कर हासिल की। क्या हमारी व्यवस्था ऐसी है कि वह हमारी स्वतंत्रता पर खलल डालने वालों से निपट सके? कानून यह कहता है कि कोई अगर सार्वजनिक नल पर नहाये या सार्वजनिक जगह पर थूक दे तो उसपर भी कार्यवाही की जा ये। लेकिन हम स्वतंत्रता का इस हद तक दुरुपयोग कर रहे हैं कि सार्वजनिक स्थल पर थूकने की बात छोडिय़े लघुशंका व दीर्घशंका तक करने से नहीं चूक रहे हैं और देश का कानून इन सब मामलों में मौन है। हम कितने स्वतंत्र हैं-हम अपने घर पर ताला लगाये बगैर बाहर नहीं जा सकते, हम सड़क पर ज्यादा पैसे लेकर नहीं निकल सकते। हम अगर थोड़ी देर के लिये भी अपनी लाइन से बाहर जायेगें तो उस जगह दूसरे का कब्ज़ा हो जाता है। हमारी हर गतिविधियों पर किसी की नजर है। हमारी कोई गोपनीयता नहीं है-टेलीफ़ोन टेप हो जाते हैं ,घर- परिवार और हमारी हर गतिविधियों की जासूसी हो जाती है। संविधान में लिख भर देने से क्या हम स्वतंत्र हैं या हमारे अधिकार हमें प्राप्त हो रहे हैं? एक अदना सा नेता सड़क पर लाल बत्ती लगाकर निकल जाता है तो पुलिस वाला हमें ऐसे हांकता है जैसे हम कोई गाय- बैल हों। किस तरह की व्यवस्था में हम लोकतंत्र की दुहाई देते हुए जी रहें हैं। क्यों नहीं हमारी व्यवस्था अनुशासन का पालन करने के लिये मजबूर करती। हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि अगर प्रशासन- शासन चाहे तो संपूर्ण व्यवस्था पटरी पर आ सकती है लेकिन इसके लिये दृढ संकल्प और इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। एक छोटा सा उदाहरण देने से यह बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लोग ट्रैफिक से बुरी तरह परेशान रहते हैं। कुछ दिनों से पुलिस की मामूली सख़्ती के आगे संपूर्ण व्यवस्था धीरे- धीरे पटरी पर आने लगी। लोगों को यह महसूस होने लगा कि लाइन से बाहर रखोगे तो गाड़ी पर जुर्माना होगा तथा पुलिस की अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा आदि। इससे पूर्व के फ्लैश पर एक नजर दौड़ाइयें- लोग कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देते थे और जैसा चाहे वैसा सिग्नल तोड़कर भाग जाते थे। यह प्रक्रिया अनुशासन को लागू कराने के मामले में सभी पर अपनाया जाये तो हर आदमी अपनी स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग कर सकेगा। हम अपने टाटीबंद इलाके की ही बात बताते हैं। यहां मंदिर भी है, चर्च भी है, गुरुद्वारा अयैपा मंदिर और मस्जिद भी है-सब एक साथ चिल्लाते हैं तो यहां भगवान कम आसपास के लोग भी सही ढंग से नहीं सुन पाते। कभी एक साथ त्यौहार आ गया तो इंसानों को उन सियारों की याद आ जाती है जो जंगल में एक के चिल्लाने पर एक साथ चिल्ला पड़ते हैं। ईश्वर को श्रद्धा से शांतिपूर्वक ढंग से स्मरण करो, क्यों उन्हें इतना तंग कर डालते हो कि वह तो क्या उनके शांतिप्रिय भक्तों की दिनचर्या में भी खलल पडऩे लगती है।

राज आस्था या सहानुभूति में से कौन सी लहर में बहेगा भटगांव!

रायपुर, 20 सितंबर।
राज आस्था या सहानुभूति में से कौन
सी लहर में बहेगा भटगांव!
राज आस्था और सहानुभूति के तराजू पर बैठी है इस समय भटगांव की जनता। भावना या सहानुभूति लहर में बहकर भाजपा को जिता ये या राजभवन की आस्था में डूब कर राज परिवार से खड़े हुए योद्धा को विजय दिला ये। यूं तो भटगांव के समर में कई योध्दा कूद पड़े हैं किंतु एक अक्टूबर को भटगांव की जनता को यह तय करना है कि उनका असली खेवनहार कौन होगा? कांग्रेस और भाजपा इस सीट के प्रबल दावेदार है। कांग्रेस को भरोसा है कि राज घराने से चुनाव मैदान में उतरे यूएस सिंह देव जीतेगें जबकि भाजपा का भरोसा रजनी त्रिपाठी पर है। पूर्व विधायक स्व. रविशंकर त्रिपाठी भटगांव में लोकप्रिय थे। यदि उनकी असमय मृत्यु से उपजी सहानुभूति लहर चली तो भटगांव सीट पर उनकी पत्नी रजनी त्रिपाठी विजयी होंगी। भावना, आस्था यह सब पहले होता था। आज का मतदाता बहुत समझदार और चालाक हो गया है। समय के साथ उसे जहां भूलने की आदत है वहीं उसने समय के साथ बदलना भी सीख लिया है। इसलिये यह कहना कि मतदाता को भावना की लहरें अपने साथ खींच ले जायेंगी या राजभवन की आस्था अपने साथ मिला लेगी, कहना ठीक नहीं। वैसे एक बात निश्चित है कि उपचुनावों में अक्सर सत्तारुढ़ पार्टी को लाभ मिलता है। सत्तारुढ़ पार्टी होने के कारण लोग पूर्व से ही यह आकलन भी कर लेते हैं कि सत्ता का प्रभाव कहीं न कहीं चुनाव में दिख ही जाता है। इसके चलते सत्तारुढ़ दल के प्रत्याशी की जीत निश्चित मानी जाती है। भटगांव में ऐसा कुछ हो जाये,तो कहा नहीं जा सकता, किंतु चुनाव में हम जैसा सोचते हैं होता नहीं। भटगांव में दोनों प्रत्याशियों की समानता के चलते चुनाव रोचक हो गया है। चूंकि यहां कांग्रेस के अब तक के कार्यो का आकलन इस चुनाव में होना है। तो डा.रमन सहित संगठन के कई धुरन्धरों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने भाजपा के नये छत्तीसगढ़ प्रभारी जे.पी. नड्डा भटगांव पहुंचे, तो चुनाव की कमान मुख्यमंत्री ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथ में ले ली। बृजमोहन अग्रवाल इस चुनाव के संचालक हैं। मुख्यमंत्री ने आम सभा को संबोधित कर चुनावी शंखनाद कर दिया है। चुनाव दंगल में मुख्यमंत्री ने बड़ी संख्या में कैबिनेट मंत्रियों को उतार दिया है। कैबिनेट मंत्री लता उसेण्डी, विक्रम उसेण्डी, केदार कश्यप, हेमचंद यादव सहित अन्य कई मंत्री भटगांव की जनता को रजनी के पक्ष में करने कोशिश कर रहे हैं। जातिगत आधार पर मंत्रियों को काम बांटा गया है। कई भाजपा विधायक भटगांव में नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि भटगांव उप चुनाव जीतने के लिए सत्तारुढ़ दल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पिछले चुनाव में भाजपा से रूठकर चले गये शिव प्रताप सिंह और उनके पुत्र विजय को भाजपा में फिर शामिल कर लिया गया है। संचालक बृजमोहन अग्रवाल बनाये गए हैं। कांग्रेस इस सीट को भाजपा से छीनने पूरी कोशिश में हैं। कांग्रेस के अध्यक्ष एवं नेता प्रति पक्ष तथा विधायकों की एक पूरी फौज भाजपा के खिलाफ मोर्चे पर है। यूएस और रजनी दोनों एक तुला पर है। इसमें जिस किसी का भी पलड़ा अगले दस दिनों में भारी होगा भटगांव का सिकंदर वही होगा।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

खरगोश प्रजाति के मानव, जोजीने के लिये सब करते हैं...!

रायपुर दिनांक 19 सितंबर
खरगोश प्रजाति के मानव, जो
जीने के लिये सब करते हैं...!
जानवरों में खरगोश एक ऐसा मूक् प्राणी है जो कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। आप कुछ भी कर लो वह आपके हाथ में चुपचाप बैठा रहेगा। उसे नोचों, दुखाओं तो भी उसके मुंह से आवाज़ नहीं निकलती। सरकारी महकमे में भी खरगेश की तरह के कुछ मानव हैं, जो उनकी भांति चुप रहते हैं। इन मानवों को जो काम सौपा जाता है। उसे बिना किसी विरोध के कर डालते हैं। होम गार्ड नाम का यह मानव सरकार के हर मर्ज की दवा है- साहब के घर सुरक्षा गार्ड से लेकर घर के प्राय: कामों में तो यह भागीदार होते ही हैं, इन्हें महत्वपूर्ण ड्यूटियों में भी पुलिस के साथ लगाया जाता है, लेकिन इन बे चारों को तनख्वाह सबसे कम मिलती है। गांव से कम पढ़े लिखे बेरोजगारों को ढूंढकर इस काम में लगाया जाता है। दिखने में यह पुलिस वालों से कम नहीं है लेकिन काम इनसे जो करा लो। बेचारे उफ तक नहीं करते। कई को सुरक्षा ड्यूटी के अलावा ट्रैफिक सम्हालने,पुलिस वालों की मदद करने व साहबों की चाक री के लिये लगाया जाता है। कुछ दफ्तर में तो, कुछ घरों पर। ऐसे ही इनकी पूरी नौकरी कट जाती है। फलाने साहब के घर से मैं होमगार्ड बोल रहा हूं या फलाने मंत्री के बंगले से मैं होमगार्ड बोल रहा हूं, जैसी आवाज आपको अक्सर सुनने को मिल जाती है। इन्हे तनख्वाह के मामले में भी अन्य सुरक्षा बलों के मुकाबले कम की ही गिनती में रखा जाता है। पुलिस को जो अधिकार दिये गये हैं। वैसे अधिकार इन्हें प्राप्त नहीं हैं। एक होम गार्ड ने शिकायत की- साहब हमारे दर्द को कोइ नहीं सुनता। हमारी चुनाव ड्यूटी मध्यप्रदेश में लगी थी। हमें इसके लिये सिर्फ भत्ता सौ रूपये दिया गया। जबकि छत्तीसगढ़ में चुनावी ड्यूटी पर हमें चार सौ रूपये दिया जाता है। हम इस भेदभाव पर चूप इसलिये भी हैं कि किसी से बोलने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो जाती है। हमने इस मामले में संतोष इसलिये कर लिया। चूंकि हमारे साथ ड्यूटी पर गये पुलिस वालों को भी इतना ही पैसा दिया गया। होम गार्ड की तरह एक दूसरा वर्ग भी है जो खरगोश की श्रेणी में आने वाला दूसरा वर्ग है। अर्दली कह लाने वाला यह वर्ग बड़े अफसरों के घर में मेम साहब के कपड़े धोने और बच्चों को खिलाने से लेकर साहब के कपड़े प्रेस करने व जूते साफ करने तक का काम करता है। यह प्रथा सिविल सर्विसेज के मुकाबले सेना में ज्यादा है। यहबेरोजगार मजबूर वर्ग है, जो अर्दली के काम में लगता है। उसे इतना समय भी नहीं मिलता कि वह अपने परिवार के साथ समय बितायें। अर्दली प्रथा या सरकारी सेवक से घर का काम लेने का चलन वर्षो से चला आ रहा है। अँग्रेज़ तो इसका भरपूर उपयोग करते रहे। अर्दली प्रथा को बंद करने की लाख कोशिशें की गई, लेकिन इसे बंद नहीं किया जा सका। सरकारी काम से लूप लाइन में डाले गये अधिकांश लोग इस ढंग के अत्याचार के शिकार होते हैं। ब्यूरोके्रटस की सेवा के लिये लगा ये जाने वाले इन कर्मियों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं...क्योंकि यह मानव होते हुए भी खरगोश प्रजाति के हैं।

पाक से चौथे पूर्ण युद्व के बादल मंडराने लगे!

रायपुर दिनांक 18 सितंबर 2010
पाक से चौथे पूर्ण युद्घ
के बादल मंडराने लगे!
उन तीस- ग्यारह जैसा हमला, भगवान न करें -अब भारत के किसी शहर में हो, अगर हुआ तो इसके भयंकर परिणाम निकल सकते हैं, शायद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्घ ही छिड़ जायें। पाक में आतंकवादियों की तैयारियाँ और भारत को मिल रहे गुप्त संदेश इस संभावना को बल दे रहे हैं। कश्मीर में लगातार हिंसक गतिविधियाँ और चीन की पाक अधिकृत कश्मीर में हलचल तथा श्रीलंका में बंदरगाह बनाने की योजना ने भारत को बाध्य कर दिया है कि वह किसी भी मुकाबले के लिये तैयार रहे। पाक जहां आंतकी चाल से भारत को अशांत करने में लगा है वहीं चीन ने भारत के सारे पड़ोसी देशों नेपाल, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका,म्यामार को किसी न किसी प्रकार से मदद पहुँचाकर अपनी मुट्ठी में कर लिया है। उसकी सबसे खतरनाक पहल पाक अधिकृत कश्मीर में निर्माण कार्यो के नाम पर घुसपैठ है। पाक के हौसले चीन की मदद के कारण बुलंदी पर हैं और पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी शिविर पाक की शह पर चल रहे हैं। इन परिस्थितियों में अब भारत उन तीस- ग्यारह जैसे किसी भी हमले को सहन करने की स्थिति में नहीं होगा। भारत और पाक के बीच संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं इसके पीछे पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के अलावा कश्मीर को अशांत करने के लिये वहां की जनता को भड़काने का काम भी एक कारण है। कश्मीर में हुए प्रदर्शनों में पाकिस्तानी झंडों का फहराना इस बात का पक्का सबूत है कि पाकिस्तानियों का कश्मीर को अशांत करने में हाथ है। मुंबई पर हुए भीषण आतंकवादी हमले की तरह किसी अन्य हमले की सूरत में इस बात की पूरी संभावना है कि भारत आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट करने के लिए सीमापार हमला कर सकता है जो भारत पाक के बीच 'पूर्ण युद्धÓ में बदल सकता है। इस युद्ध में परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिका के आतंकवाद रोधी रणनीतिक विशेषज्ञ पीटर बर्गेन ने कहा है कि यह गंभीर चिंता का विषय है और हम सभी को इसके लिए चिंतित होना चाहिए।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

सुरक्षा सुपरवाइजर की हत्या,परदे के पीछे आखिर क्या हुआ था ?

रायपुर दिनांक 15 sept

सुरक्षा सुपरवाइजर की हत्या,परदे
के पीछे आखिर क्या हुआ था ?
किसके इशारे पर पुलिस कर्मियों ने बिलासपुर में सुरक्षा सुपरवाइजर पर हमला किया था? क्या यह स्वस्फूर्र्त एक आकस्मिक आवेश में हुआ हमला था या किसी के निर्देश पर इसे अंजाम दिया गया? हांलाकि बिलासपुर में पुलिस कर्मियों द्वारा सुरक्षा सुपरवाइजर की हत्या मामले की दंडाधिकारी जांच का आदेश हुआ है लेकिन कई तथ्य ऐसे हैं जिसका भेद कभी न खुले। यह हत्याकांड हमें बताता है कि हम कानून के आगे कैसे बे बस हैं? यह दर्शाने के लिये यूं तो कई उदाहरण है लेकिन रविवार को फिल्म दबंग देखने पहुंचे पुलिस अधिकारी के लोगों ने एक सुरक्षा सुपरवाइजर को सिर्फ इसलिये पीट- पीट कर मार डाला चूंकि उसने साहब को पहचाना नहीं और उनसे कथित रूप से बदसलूकी कर डाली। बदसलूकी के बाद पुलिस अधीक्षक तो अपने रास्ते चल दिये लेकिन अचानक पुलिस कर्मियों में अपने अफ़सर पर इतना प्रेम कैसे उमड़ पड़ा कि उन्होंने उस व्यक्ति को पीट- पीट कर मार डाला। क्या यह आदेश पुलिस अफ़सर के जाने के बाद पीछे से वायरलेस या मोबाइल से आया था कि जिसने हमारे एसपी के साथ बदसलूकी की है,उसे अच्छा सबक सिखा दिया जा ये। चूंकि हमारी पुलिस इतनी स्वामी भक्त भी नहीं है कि वह अपने से होकर ऐसा निर्णय ले सके। कई ऐसे मामले हैं जिनमें आम लोगों के साथ बदसलूकी होती रही है और पुलिस खड़े- खड़े सारा माजरा मूक दर्शक की तरह देखती रही है। रायपुर में फ्रेण्ड्स डे पर महिलाओं के साथ जो कुछ हुआ। उसे लोग अभी भूले नहीं होंगे। बिलासपुर में आम लोगों के सामने सुरक्षा सुपरवाइजर को पीटा गया। इसके अनेक गवाह हैं लेकिन जो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आई वह यह कह रही है कि मृतक के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं है। फिर इस व्यक्ति की मौत कैसे हुई? कई पुलिस वालों ने सरेराह पीटा किन्तु चोट के एक भी निशान नहीं हैं। इस कांड के आरोपियों के लिये सिर्फ इतना ही काफी है कि वह हत्या के आरोप से बरी हो जायें। सवाल यह उठता है कि आखिर अहम साक्ष्य को मिटाने के लिये यह सब कैसे किया गया और कैसे- कैसे हथकण्डे किसके कहने पर अपनाये गये? ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनमें प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखने वाले गवाह मौजूद रहते हैं। फिर भी अपराधी पतली गली से निकल कर बाहर आ जाते हैं। पैसे और प्रभाव के आगे काननू बेबस है। पुलिस जो अत्याचार आम लोगों पर करती है, उसमें किस ढंग से मामले को दबाया जाता है। वह बिलासपुर कांड से अपने आप स्पष्ट हो जाता है। पुलिस ने यद्यपि इस मामले में दो पुलिस वालों को गिरफ़्तार कर अपनी निष्पक्षता को दर्शाने का प्रयास किया है लेकिन क्या इस हत्याकांड में सिर्फ दो ही पुलिस कर्मी थे? प्रशासन ने इस पूरे मामले को बड़े सहज ढंग से सलटाने का प्रयास किया। एसपी ने इस पूरे कांड से हाथ खींच लिया। कलेक्टर ने तुरन्त दण्डाधिकारी जांच के आदेश देकर मामले को आसानी से ठंडा करने का प्रयास किया। क्योंकि दण्डाधिकारीय जांच प्रशासन का एक ऐसा हथियार है जो जनता के गुस्से को ठंडा करने के लिये वर्षो से इस्तेमाल किया जाता है। पोस्टमार्टम करने वालों ने संपूर्ण मामले को दबाने का भरपूर प्रयास किया,यह सब किसने करवाया? पूरा मामला दिलचस्प किंतु गंभीर है। अब यह भी खबर है कि सरकार ने मामले की न्यायिक जांच कराने का फैसला किया है। अगर गहराई से छानबीन की जा ये तो कई तथ्यों से पर्दा हटेगा।

At the same time becomes instant decision- mosque standoff!

Date September 10, 2010
At the same time becomes instant decision
The temple - mosque standoff!
Justice delayed is how horrible the outcome - it is a live example Ayodhya Ram Temple - Babri Masjid dispute. If 64 years ago settled disputes arising at the same time little is made correctly. So maybe such a big crisis and the troubles of the country are turning round. Ram Temple - Babri Masjid dispute is currently in the High Court. Court probably his decision this month to date Sunayaega round. Before the decision is creating the conditions. He is saying that this decision after the case probably not going Slttene so easily. Related parties may take refuge in the Supreme Court. Meanwhile, demand is also being raised within the Parliament to settle the case or be living it. The historical background of the case 22 to 23 December, 1949 Take a look at the controversy began at that time. When allegedly began to keep idols inside the mosque and prayers began at the Ram platform. Hindus claim the mosque built here in the past the temple broke it. The disputed site is the birthplace of Lord Ram. In this case both the community of its own - its logic. From which no use arguing. We believe that the Ram Temple - Babri Masjid site historical and religious significance of the disputed site are both significant. What does the High Court decision - to come it will take just less than two weeks. F Slo one community may Ahsrith Akreaty the other can. So in this case the entire country to be cautious and patient need to understand the entire issue. Decision in the light of fears of a mishap the day and many people travel by train a few days further postponed. 19 th country in the decade after the Babri Masjid demolition is witness to the circumstances and the fear of recurrence is troubling. So who will decide. Both communities need only to look on him. Since this decision and another decision to give up the Peugwaraafhul court decisions which have to accept everyone. In our opinion this case should come a decision which is acceptable to all. But this is unlikely. So as a national heritage site in the Government should secure. So that communal harmony prevails between the two communities are. Government should talk to all sides that this issue for both communities near the disputed site to the new ground Aanatih. Whether this temple or mosque in which they scored. So what happened in the past can not be changed but it took only one way to save future generations from a conflict that the disputed site and want to be declared a national heritage aside both sides equal - be equal Aanatten this land.

पर्यावरण पर ध्यान दो वरना नये नयेरोग मानवता का खात्मा कर देंगे!

रायपुर दिनांक 13 सितंबर
पर्यावरण पर ध्यान दो वरना नये नये
रोग मानवता का खात्मा कर देंगे!
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि मच्छर और मलेरिया के खिलाफ सरकार का अभियान चल रहा है। करोड़ों रूपये मच्छरों को मारने के लिये अब तक तक खर्च किये जा चुके हैं लेकिन न मच्छर मरे और न मलेरिया का उन्मूलन हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट यह बता रही है कि दुनिया में सालाना 10 लाख से ज्यादा लोग मच्छर जनित रोग से मरते हैं। इसके अलावा दूसरे अन्य रोग भी फिर इस धरती पर लौट आये हैं जिसमें काला आजार, चिकनगुनिया,डेंगू, दस्त, टायफाइड़, स्वाइन फलू शामिल है। दिल्ली जहां कुछ ही समय में राष्ट्रमंडल खेल होना है। वहां डेंगू महामारी का रूप ले चुका है। देश के अनेक भागों में भारी वर्षा और बाढ़ की स्थिति है। विदेश की बात करें तो वहां भी कतिपय रोग जानलेवा बनकर कहर ढा रहे हैं। ऐसे रोगों ने लोगों में दहशत की स्थिति पैदा कर दी है। सुपरबग नामक बीमारी एंटीबायोटिक के दुरुपयोग की वजह से शुरू हुई। जबकि साबिया वायरस, एल्टीचिया बैक्टीरिया, रिट वैली वायरस आदि सूक्ष्मजीवी तो अभी तक रहस्य ही बने हुए हैं। एक जानलेवा वायरस ऐसा है, जिसे अब तक नाम भी नहीं दिया जा सका है। वैज्ञानिक इसे 'एक्स वायरसÓ कह रहे हैं। ऐसे अनेक खतरनाक सूक्ष्मजीवी हैं, जिनकी पहचान तक नहीं हो पाई है। ज्यादातर सूक्ष्मजीवी परजीवी होते हैं। ये किसी जीवित कोशिका पर ही पलते-बढ़ते हैं। मलेरिया के कारक के बारे में बताया जाता है कि यह सूक्ष्मजीवी 'प्लाजमोडियमÓ शरीर की लाल रक्त कणिकाओं में पलता और विकसित होता है। एक रक्त कणिका पर यह तब तक पलता-बढ़ता है, जब तक कि वह रक्त कण नष्ट न हो जाए। इस तरह शरीर के आवश्यक लाल रक्त कण समाप्त होने लगते हैं और प्लाजमोडियम बढ़ता रहता है। धीरे-धीरे आदमी की मृत्यु हो जाती है। चिकित्सा व्यवस्था देश में आज मुनाफे वाला उद्योग बन गया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जगह पांच सितारा अस्पतालें खोलना सरकार की मुख्य प्राथमिकता बन गई है। जनता के पैसों से खुलने वाले इन अस्पतालों में आम आदमी के उपचार की सहूलियतें न के बराबर हैं। दवा बनाने और टॉनिकों का धंधा करने वाली बड़ी कंपनियों ने रोग और दवा का ऐसा बाजार कायम कर लिया है कि सामान्य व्यक्ति अपनी कमाई का एक बडा हिस्सा उपचार और दवा के लिए खर्च करने पर मजबूर है। करोड़ों लोग गरीबी के कारण अनेक जानलेवा बीमारियों के साये में जीने मजबूर हैं। दुनिया की कुल आबादी का पांच वां हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करता है। कुल जनसंख्या के एक तिहाई बच्चे कुपोषित हैं। आधी से ज्यादा आबादी अत्यंत जरूरी दवाएं भी नहीं खरीद पाती। केंद्रीकृत आर्थिक व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को जीविकोपार्जन के लिए शहरों की ओर जाने को बाध्य कर दिया है। चिकित्सा जगत कई रोगों के सामने लाचार है। सभी संवेदनशील आधुनिक चिकित्सा शास्त्री एक स्वर में अंग्रेजी दवाओं के न्यूनतम प्रयोग की बात कर रहे हैं, लेकिन बाजार की ताकतें इसे अनसुनी कर अनावश्यक दवाओं का ढेर लगा रही हैं। रोगों से मुकाबला करने के लिये पर्यावरण पर ज्यादा ध्यान देना होगा। वरना नये- नये रोग मानव का सर्वनाश कर डालेगें।

Disease will make an end to humanity!

Raipur, dated September 13
Focus on the environment or be newly
Disease will make an end to humanity!
We have been hearing since childhood that the government's campaign against mosquitoes and malaria is on. To kill millions of mosquitoes money has been spent so far but not far and not die of malaria mosquito eradication happened. World Health Organization reports telling the world annually, 10 million people die from mosquito borne disease. Also other other disease returned again on this earth containing Kala-azar, chikungunya, dengue, diarrhea, Tayafaer, including swine Afloo. Delhi Commonwealth Games to be where there in no time. Dengue epidemic has evolved there. Heavy rains and flooding in many parts of the country situation. Talking about the foreign victims as there are also certain fatal diseases. Such disease conditions has created panic among the people. Shuparbgh called misuse of antibiotics due to illness began. While Asabia virus, Cltichia bacteria, viruses, etc. microbial writ Valley so far has remained a mystery. Like a deadly virus, which could not have names yet. Scientist as "X-Virus Ó saying. There are many dangerous microbial, whose identity has not been long. Most are microbial parasites. They thrive on a living cell - is growing. Malaria is said about the factors that the microbial 'Plasmodium Ó red blood cells and multiplies in the body and is evolving. A blood corpuscle multiplies it by then - grows, until he should be destroyed hemoglobin. Such bodies must begin to eliminate red blood particles moves and Plasmodium. Gradually becomes the man's death. Medical system in the country has become profitable industry. PHC Asptalean open five-star place has become a key priority of the government. Opening of public money in these hospitals do not facilitate the equal treatment of the common man. Drug rackets and tonics disease and drug-to-large companies that market has established that a large part of their earnings normal person for treatment and medication is forced to spend. Due to poverty many millions are forced to live in the shadow of deadly diseases. Fifth of the total world population is living below the poverty line. A third of the total population are malnourished children. More than half the population could not afford essential medicines. Centralized economic system to the millions of people earn a living has forced cities to move towards. Medical world is helpless in front of many diseases. All sensitive modern medicine Shastri Angreji in unison to the use of drugs are minimal, but market forces to reject it are piles of unnecessary drugs. Llieye of combating diseases must focus more on the environment. Otherwise new - new disease to humans Dalagean the

शनिवार, 11 सितंबर 2010

भटगांव पर टिकी छत्तीसगढ़ की नजर!

रायपुर रविवार। दिनांक 12 सितंबर 2010


रजनी-यूएस में कौन? भटगांव
पर टिकी छत्तीसगढ़ की नजर!

रजनी या यूएस? इन दोनों में से कौन? भटगांव के लोगों का मन किस पर लगेगा यह तय होने में अभी वक्त लगेगा। यहां उप चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर की स्थिति बनती नजर आ रही है। भाजपा ने रजनी त्रिपाठी पर विश्वास किया है तो कांग्रेस ने सरगुजा राज परिवार के यूएस सिंह देव को मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में भटगांव सीट भाजपा ने जीती थी-उप चुनाव की नौबत यहां के विधायक रविशंकर त्रिपाठी की मृत्यु के बाद आई। रजनी रविशंकर त्रिपाठी की पत्नी तथा इस वक्त जिला सहकारी बैठक की उपाध्यक्ष है। कांग्रेस इस सीट को भाजपा से छीन ने के लिये एडी चोटी एक कर सकती है जबकि भाजपा ने अपनी सीट को बचाने के लिये अभी से यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सत्तारूढ पार्टी के कम से कम दो मंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व छत्तीसगढ़ प्रभारी की पूरी टीम भटगांव पर फिर एक बार कब्जा करने गोटी बिछाने में लगे हैं। मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह की दिलचस्पी भी इस सीट पर है। भाजपा को उम्मीद है कि उसके प्रत्याशी को मतदाताओं का पूर्व की भांति प्रेम मिलेगा साथ ही सहानुभूति लहर के चलते वह इस सीट पर कब्ज़ा करने में कामयाब हो जायेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने भटगांव से रजनी के खिलाफ सरगुजा राज घराने से यू एस सिंह देव को मैदान में उतारकर भाजपा की जीत को कठिन बना दिया है। भाजपा के धुरंधर व चुनाव गुरू मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को भटगांव चुनाव का प्रभारी बनाया है। उनका साथ दे रहे हैं राम विचार नेताम जो कि राज्य सरकार में मंत्री है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राम सेवक पेकरा तो यहां अपनी सक्रियता दर्ज करा चुके हैं जबकि प्रदेश प्रभारी नड्ढा भी इसे अपने प्रभारित्व काल में पहले चुनाव के रूप में एक चुनौती के रूप में ले रहे हैं। कांग्रेस द्वारा इस चुनाव में सरगुजा राज परिवार को मौका देने से यह चुनाव अब टफ हो गया लगता है लेकिन भाजपा इसकी खानापूर्ति अपने एक पूर्व नेता शिवप्रसाद को मनाकर करने के प्रयास में है। शिवप्रसाद अभी भाजपा से निष्कासित हैं पिछले चुनाव में भाजपा ने उनके बैटे विजय को टिकिट नहीं दी थी इससे खफा होकर उन्होने पार्टी के खिलाफ काम किया परिणाम स्वरूप पार्टी ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया। सिंह के पुत्र विजय ने गुस्से में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा तथा पार्टी से छह साल के लिये निकाल दिये गये। शिव प्रसाद को फिर से अपने खेमें में शामिल करने का आश्वासन शुक्रवार को एक मुलाकात के बाद चुनाव प्रभारी बृजमोहन अग्रवाल ने दिया है। बृज व राम विचार नेता उनसे उनके घर पर मिलने गये थे। शिव प्रताप के जरिये भाजपा गॉड मत हासिल करना चाहता है। बहरहाल अभी चुनाव का पहला चरण भी पूरा नहीं हुआ है। आगे बड़ी बड़ी गोटी इधर से उधर होगी। कांग्रेस के लोग भी शिव प्रसाद के टच में हैं-ऐसे में आगे की लड़ाई में कौन कौन इधर उधर होता है और किस पार्टी का बजन बढ़ता है इसी पर भटगांव में रजनी-यूएस के भाग्य का फैसला निर्भर करता है।

वरना देश आलसी हो जायेगा!

रायपुर दिनांक 11 सितंबर 2010
पहले गरीब छाटों फिर सुविधाओं से
लादों, वरना देश आलसी हो जायेगा!
इसमें दो राय नहीं कि समाज के गरीब तबके के उत्थान हेतु सरकार को प्रयास करना चाहिये लेकिन इस मामले में अति उत्साह या वोट की राजनीति दोनों ही घातक हो रही है। दो रूपये किलो चावल हो या मुफ़्त में गैस वितरण अथवा मुफ़्त में बिजली बांटने का काम। इन सब योजनाओं में उत्पन्न ख़ामियाँ अब परेशानी का सबब बनती जा रही हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि हर आदमी को कोई न कोई काम करते रहना चाहिये, लेकिन अभी की सरकारें क्या कर रही हैं। इंसान को एक साथ घर बैठे सारी सुविधाओं से लाद कर शराबी,जुआरी और अन्य सामाजिक बुराइयों का एडिक्ट बनाया जा रहा है। असली गरीब असहाय और अन्न के एक- एक दाने के लिये मोह ताज हैं तो दूसरी तरफ ऐसे लोग सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाकर ऐश कर रहे हैं। जो किसी समय तक कोई भी सुविधा नहीं मिलने से मेहनत कर अपना व अपने परिवार का भरण- पोषण करते थे। सरकार ने गरीबों की मदद के नाम से अपना ख़ज़ाना खोलकर वास्तव में गरीब और मध्यम वर्ग के बीच खाई पैदा कर दी है। गरीब वर्ग का व्यक्ति सरकार की ढेर सारी सुविधाओं जिसमें राशन, बिजली, स्वास्थ्य,चूल्हा , मकान जैसी सुविधाओं को बराबर प्राप्त कर मध्यमवर्गीय से ज्यादा बिना किसी काम के मुफ़्त सुविधा प्राप्त कर रहा है। सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने के सिवा उसने अन्य धन्धों को भी अपना लिया और छोटे- मोटे से कामों से मुंह मोड़ लिया। सरकारी सुविधाओं को प्राप्त कर वह सरकार का खास आदमी और यहां तक कि होने वाले हर मतदान में किसी न किसी एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता भी बनकर रह गया। दूसरी ओर मध्यम वर्गीय परिवार अपने काम के लिये या तो नौकरी पर आश्रित होकर रह गया है या फिर किसी न किसी की दया पर। समाज में एक नये वर्ग की उत्पत्ति सरकारों की तरफ से हो रही हैं किंतु गरीब कौन? की परिभाषा तक तय नहीं कर पाई है। फिर किन गरीबों में वह योजनाओं का हिस्सा वितरित कर रही है? पहले समाज के असल गरीबों को छांटकर निकालों। उन्हें चावल, गैस, व खाने- पीने की वस्तुएँ सुलभ कराने की जगह उनके बच्चों को पढ़ाने- लिखा ने के लिये एक म़ुश्त राशि जो इस समय मुफ़्त में खाद्यान्न व अन्य वस्तुएँ बांटने के लिये खर्च की जा रही है। उसकी जगह फ़िक्स डिपाजिट में डाला जाय। ताकि आगे उनका भविष्य बन सके। गरीब परिवार के सदस्यों को मुफ़्त में अनाज व अन्य सुविधाएँ बांटने की जगह काम के बदले यह सुविधाएँ दी जा ये। वरना देश में एक बहुत बड़ा वर्ग आलसी व काम चोर हो जा ये, तो आश्चर्य नहीं। आज की स्थिति में मध्यम वर्ग को, जो कि अपने बल पर घर को चलाता आ रहा है। हर मामले में असहाय और कमजोर होता जा रहा है। चूंकि यह वर्ग पढा़- लिखा है और किसी राजनीतिक दल के झांसे में आसानी से नहीं फंसता। ग़रीबों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराने का दावा यूपीए करती है। किंतु यह गरीब कोैन से हैं और उनकी वार्षिक आय कितनी हैं? यूपीए सरकार अब, गरीबी रेखा से नीचे,जिसका कोइ्र्र आकलन नहीं हुआ है, के लोगों को मुफ्त नया गैस कनेक्शन देने की योजना बना रही है। अगले महीने, दो अक्तूबर को गांधी जयंती के मौके पर इस योजना का आगाज हो सकता है। सरकार के इस कदम से उन गरीब परिवारों को काफी मदद मिलेगी। हम राज्य व केन्द्र सरकार दोनों के सोच की तारीफ करते हैं लेकिन सुविधाएँ उसे मिले जो वास्तव में गरीब हो और उसके जीवन की पटरी बिना सहायता के नहीं चल रही हो।

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

तो मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं होता!

दिनांक 10 सितंबर 2010
उसी समय त्वरित फैसला हो जाता
तो मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं होता!
न्याय में देरी का नतीजा कितना भयानक होता है- इसका जीता जागता उदाहरण है अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद। अगर चौंसठ साल पहले उपजे छोटे से विवाद का निपटारा उसी समय सही ढंग से कर दिया जाता। तो शायद आज देश इतने बड़े संकट व परेशानियों के दौर से नहीं गुजरता। राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद इस समय हाईकोर्ट में हैं। कोर्ट संभवत: इस महीने की चौबीस तारीख को अपना फैसला सुनायेगा। फैसले से पूर्व जो स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। वह यही कह रही है कि यह मामला शायद फैसले के बाद भी इतनी आसानी से सलटने वाला नहीं। हो सकता है संबंधित पक्ष सर्वोच्च न्यायालय की शरण लें। इस बीच यह मांग भी उठ रही है कि संसदीय दायरे में रहकर इस मामले को निपटा या जा ये। इस पूरे मामले की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर एक नजर डालें तो विवाद 22-23 दिसंबर 1949 को उस समय शुरू हुआ था। जब कथित तौर पर मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखनी शुरू हुई और राम चबूतरे पर पूजा अर्चना शुरू हुई। हिंदुओं का दावा है कि यहां पूर्व में जो मंदिर था उसे तोड़कर मस्जिद बनाया। जबकि यह विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है। इस मामले में दोनों ही समुदाय का अपना- अपना तर्क है। जिसपर बहस करने से कोई फायदा नहीं। हम मानते हैं कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद स्थल के विवादित स्थल का महत्व ऐतिहासिक व धार्मिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट क्या फैसला देती है- इसे आने में अभी कम से कम दो हफ्ते का समय लगेगा। फै सला किसी एक समुदाय को हश्रित कर सकता है तो दूसरे को आक्रेाति कर सकता है। ऐसे में संपूर्ण देश को इस मामले में सतर्क होने व संपूर्ण मसले को धैर्य से समझने की जरूरत है। फैसले के परिप्रेक्ष्य में किसी अनहोनी की आशंका में कई लोगों ने इस दिन और आगे के कुछ दिनों की ट्रेन यात्रा तक स्थगित कर दी है। देश 19 वें दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की परिस्थितियों का गवाह है और उसे इसके पुनरावृत्ति का भय भी सता रहा है। ऐसे में जो भी फैसला होगा। उसपर दोनों समुदाय को सिर्फ गौर करने की जरूरत है। चूंकि इस फैसले के ऊपर और दूसरा फैसला देने के लिये भी पॉवरफुल अदालत है जिसका निर्णय सभी को स्वीकार करना होगा। हमारी राय में एक ऐसा फैसला इस मामले में आना चाहिये जो सभी को मंज़ूर हो। मगर इसकी संभावना कम ही है। ऐसे में सरकार को इस स्थल को राष्ट्रीय धरोहर के रूप मे सुरक्षित कर देना चाहिये। ताकि दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव कायम रहे। सरकार को चाहिये कि वह इस मुद्दे पर सभी पक्षों से बात कर दोनों समुदाय के लिये विवादित स्थल के समीप ही नई भूमि आंवटित करें। जिसमें वे चाहे मंदिर बना ये या मस्जिद। अतीत में जो कुछ हुआ उसे बदला तो नहीं जा सकता लेकिन इसको लेकर भावी पीढ़ी को टकराव से बचाने का एक ही उपाय है कि विवादित स्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाये तथा बाजू में दोनों पक्षों को बराबर- बराबर भूमि का आंवटन किया जा ये।

हर मोड़ पर भ्रष्ट तंत्र,

दिनांक 9 सितंबर 2010
हर मोड़ पर भ्रष्ट तंत्र, किसे दोष दे जब
लगाम लगाने वाले ही मजबूर हों!
यह स्टेटस सिंबल बन चुका है कि आज जिसके पास जितना धन है वह समाज में उतना ही सम्मानित व्यक्ति है, लेकिन कोई यह नहीं जान पा रहा कि यह पैसा उसने कैसे और किन गलत तरीकों से कमाया है। भ्रष्टाचार के चरम को हर कोई जानता है-हमारा सरकारी तंत्र भी इससे वाक़िफ़ है। मगर सवाल उठता है कि वह असहाय क्यों? कई ऐसे व्यक्ति आज सम्माननीय हैं,चूंकि वह करोड़पति है। उसके कपड़े सफेद हैं किंतु उस सफेदी के पीछे किसी गरीब के आँसू और गले से कटा हुआ खून भी मिला हुआ है। यह सब जानते हुए भी ऐसा क्यों हैं? चूंकि हमारी संपूर्ण व्यवस्था आज भ्रष्ट हो चुकी है। अब तक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पद पर रहे प्रत्यूष सिन्हा भी यह जानते थे कि देश में हर तीसरा व्यक्ति पूरी तरह भ्रष्ट है। जबकि हर दूसरा व्यक्ति इसकी कगार पर है। उनकी राय में भ्रष्टाचार की समस्या के कारण ही मुख्यत: लोगों की धन- संपदा बढ़ रही है। वे क्यों अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार के इस चक्र को देखते रहें क्यों उन्होनें अपने मिले अधिकारों का उपयोग नहीं किया? पद पर से हटने के बाद कुछ भी कहकर अपने हाथ साबुन से धो लेने से क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदार से मुक्ति पा ली है? देश की व्यवस्था में ही बैठे लोग सब जानते हुए भी जब रिटायरमेंट पर पहुंच जाते हैं तो अपने कुछ न कर सकने और कमजोरी को क्यों उजागर करते हैं? सिन्हा जैसे लोग कितने ही ईमानदार हों किन्तु वे जानते हुए भी चुप बैठे रहे यह उनकी सबसे बड़ी गलती है। अपने पावर का उपयोग नहीं किया और अब मीडिया के सामने वही कह रहे हैं कि देश का हर तीसरा व्यक्ति भ्रष्ट है। क्या यह बात पुरानी नहीं हो चुकी कि देश में लोग भौतिकतावादी होते जा रहे हैं? इसका बढावा किसने दिया? हमने वह जमाना भी देखा है, जब कोई भ्रष्ट व्यक्ति सिर उठाकर चलने का साहस नहीं कर सकता था। इसमें सामाजिक कलंक लगने का अहसास जुड़ा था, लेकिन यह स्थिति कैसे खत्म हो गई? इसलिये कि बदलते परिवेश ने इस व्यवस्था को मान्यता दे दी। इसके लिये कौन जिम्मेदार है? आम जनता जो इस माहौल में पिस गई या वह कथित ईमानदार तंत्र जिसमें सिन्हा जैसे लोग भी मौजूद रहे। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। 20 फीसदी भारतीयों की अंतरात्मा आज भी ईमानदार है। 30 फीसदी लोग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। जबकि शेष लोग इसकी कगार पर हैं। क्या सरकारी तंत्र चाहे तो इस बदलाव की इतिश्री यहीं नहीं कर सकता? वन विभाग,सिचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग जैसे कमाऊ विभाग के एक अदने से कर्मचारी की संपत्ति करोडा़ें रूपये की है। तो उनके बड़े आका कितने बड़े पूजिपति होंगे इसकी कल्पना की जा सकती है? सरकार में बैठे लोगों में इतनी हिम्मत क्यों नहीं है कि ऐसे लोगों की अवैध कमाई को तत्काल जप्त कर देश के विकास कार्यो में लगाया जाये। क्यों ऐसा कानून नहीं बनाया जाता कि असीमित संपत्ति रखने वाला सरकारी व्यक्ति तत्काल पूछ- परख में ही जबाब नहीं देता। तो उसे फिर यह संपत्ति रखने का कोइ्र्र अधिकार न रहे... लेकिन नहीं, हमारा कानून इसकी इजाजत नहीं देता-कुछ ही दिनों में वह भ्रष्ट व्यक्ति सरकार की नौकरी में आ जाता है तथा प्रोमोशन भी पा जाता है-कई ऐसे उदाहरण हंै। अभी विश्व में चौरासवें क्रम पर कल पहले क्रम पर हम भ्रष्टाचार के मामले में आ जाये तो आश्चर्य नहीं। जिस तेज गति से यह सब बढ़ रहा है, वह तो यही कहता है। भ्रष्टाचार के इस बाजार में देश के लाखों या कहें करोड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय मूलभूत सहूलियतें हासिल करने के क्रम में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को रिश्वत देने मजबूर है। क्योंकि इसके बिना उनका काम चल ही नहीं सकता। चाहे इसके लिये उन्हें अपनी जमीन या इज़्ज़त ही बेचनी क्यों न पड़े।

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बुधवार, 8 सितंबर 2010

जहां मां बहनें सुरक्षित नहीं हैं वह देश है ..

रायपुर, दिनांक 8 सितंबर 2010
जहां मां बहने सुरक्षित नहीं हैं वह देश है
मेरा..नर पिशाचों पर कौन कसें फंदा?
जहां सोने की चिडिय़ा बसेरा करती है वह देश है मेरा....नहीं... अब यह नहीं रहा क्योंकि यहां एक नब्बे साल की दादी मां, दो दस और चौदह साल की बच्चियां युवकों के हवस का शिकार हो जाती हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहती है- वह देश है मेरा... इसके भी आगे है कि जिस देश की राष्ट्रपति महिला है, जिस देश की लोकसभा अध्यक्ष महिला है, जिस देश की प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष महिला है और जिस देश में प्रति पक्ष की नेता तथा विदेश सचिव महिला है। उस देश में महिलाओं के साथ वह सब कुछ हो रहा है। जो उसकी अपनी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पैनेपन को शर्मसार कर रही है। हम अपने आप यह कहते नहीं थकते कि यह देश कृष्ण और राधा की धरती है। यहां महिलाओं की पूजा होती है-सड़कों पर से लोगों को हटने के लिये राधे-राधे पुकारते हुए आगे बढ़ते हैं- नारी को दुर्गा और महाकाली तथा अन्य देवी के नाम से संबोधित किया जाता है। बच्ची पैदा होती है, तो उसे लक्ष्मी का रूप देकर गर्व करते हैं। उसी देश में एक असहाय नब्बे साल की खाट से उठ न सकने वाली वृद्ध महिला को ऐसे युवा यह एहसास दिलाते हैं कि नारी तू सिर्फ भोग की वस्तु है। जिसे जब चाहे जिस पड़ाव पर पुरुष नोच सकता है? हरदोई उत्तर प्रदेश में यह शर्मनाक घटना हुई। जहां एक झोपड़ी में अकेली रहने वाली नब्बे साल की बूढ़ी मां को दो युवा दरिन्दों ने अपनी हवस का शिकार बनाकर मरा हुआ समझकर छोड़ दिया। ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश के मुरैना, उत्तर पूर्व के राज्य गंगटोक और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुआ। जहां क्रमश: कार में सवार युवकों ने एक चौदह साल की बच्ची को यौवन पर पहुंचने के पूर्व ही तार-तार कर दिया। दूसरे मामले में एक दस साल की बच्ची के साथ बयालीस साल के व्यक्ति ने अपना मुंह काला किया और उस उत्तर प्रदेश में जहां भक्ति और विश्वास कूट कूट कर भरा है तथा जहां एक महिला शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता पर आसीन है। वहां एक युवती को सामूहिक रेप के बाद सातवीं मंज़िल से नीचे फेंक दिया गया। यह तो वे घटनाएँ हैं जो पिछले बहत्तर घंटों के अंदर प्रमुख रूप से सुर्खियों में आई। रोज ऐसी कितनी ही बच्च्चियां,अबलाएं ,वृद्वा, माँएं पैशाचिक हाथों में पड़कर अपने जन्म को कोस रही हैं। फिर भी हमारी सरकार को शर्म नहीं हैं। इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक घटना होती है, तो फिर दूसरी और फिर तीसरी- ऐसी पूरी श्रंखला तैयार हो जाती है। लेकिन सरकार ऐसे किसी कानून को पारित करना नहीं चाहती। जो ऐसे दरिन्दों को सरे आम आम आदमी के सुपुर्द कर दे या पत्थरों से मार- मार कर समाज को यह बता दे कि यह इंसान नहीं पागल कुत्ते से भी बदतर है। इसे समाज में जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं। इंसानियत को कलंकित करने वाले एक दरिन्दे को ही ऐसी सजा मिल जाये तो हम समझते हैं कि बाकी छुपे पिशाचों को भी एक उदाहरण मिल जायेगा। कहां हैं देश में महिलाओं की सुरक्षा की दुहाई देकर घूमने वाली महिला अधिकार संगठन? क्या उसकी आंखों में भी पट्टी बांध दी गई है? देश की सत्ता पर इतनी पावरफुल महिलाओं के काबिज होने का इस देश को क्या फायदा मिल रहा है-यही न कि रोज कोई न कोई महिला दुष्टों के हाथ में पड़ कर अपने जीवन पर कोस रही हैं। वह चाहे रेप हो,घर पर होने वाले अत्याचार अथ्वा ऑनर किलिंग अथवा दहेज की बलि वेदी- हर जगह महिला सू ली पर चढ़ाई जा रही है। देश को महिला आरक्षण नहीं ,महिला सुरक्षा कानून की जरूरत है। जो किसी बच्ची, किसी युवती , किसी महिला अथवा वृद्ध महिला के अस्मत की रक्षा कर सके।
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रविवार, 5 सितंबर 2010

आखिर कब हटेगा रहस्यों से पर्दा

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रायपुर, दिनांक 7 सितंबर 2010
एक धमाका ..और सब कुछ खत्म
आखिर कब हटेगा रहस्यों से पर्दा
...इन आकाशीय घटनाओं पर गौर की जिये.....एक स्कूली बच्चा मैदान में खड़ा था, आसमान से बिजली गिरी और वह मारा गया! छत्तीसगढ़ के जांजगीर में स्कूली बच्चे रेसेस के समय स्कूल परिसर में थे और क्लास रूम की तरफ जा रहे थे, कि अचानक तेज बारिश से कुछ बच्चे गुलमोहर झाड़ के नीचे भीगने से बचने के लिये खड़े हो गये। तभी आकाश में एक धमाका हुआ-पेड़ झुलस गया तथा तीन बच्चे वहीं खत्म हो गये तथा चार बुरी तरह झुलस गये। वैसे ही जैसा करेंट लगने या आग लगने के बाद होता है। आकाशीय घटनाएँ अब भी इंसान के लिये रहस्य है। जम्मू कश्मीर सीमा के लेह में आकाश से जो कहर बरपा उसमें सैकड़ों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। किसी ने इसे बादल फटना कहा तो किसी ने बर्फ के गोलों का गिर ना तो किसी ने उल्का पिण्ड से बादल का टकरा ना । किसी ने इसे पड़ोसी देश चीन की चाल निरूपित किया। लेकिन इस बादल फटने की घटना से चीन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। यहां भी आसमान से टपकी भारी बूदों ने भारी तबाही मचाई। हमारे वैज्ञानिक धरती पर बैठकर यह खोज रहे हैं कि सृष्टि की रचना किसने की- विख्यात वैज्ञानिक स्टीफ़न हाकिन्स ने तो यहां तक दावा कर दिया कि सृष्टि की रचना भगवान ने नहीं की। बल्कि एक विस्फोट से इसकी उत्पत्ति हुई किंतु उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि इससे पहले क्या हुआ था। सारे वैज्ञानिक स्टीफ़न हाकिन्स की थ्योरी को मानते हैं और बिग बैंग थ्योरी पर काम कर रहे हैं। स्टीफ़न हाकिन्स की थ्योरी ने आस्था वादियों को तकलीफ़ में डाल दिया है। ऐसा ही कुछ उस समय भी हुआ था। जब आइसक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज कर दुनिया को सकते में डाल दिया था। तत्कालीन पॉप की सत्ता इससे हिल गई थी और संपूर्ण आस्था वादियों ने आइसक न्यू टन की जिंदगी तक को मुसीबत में डाल दिया था, लेकिन आज आइसक के गुरुत्वाकर्षण की शक्ति से दुनिया के अनेक कार्य हो रहे हैं। बहरहाल, सवाल यहां यह है कि आमतौर पर हम इसे क्या समझे कि बारिश होते समय कोई उससे बचने के लिये पेड़ के नीचे खड़ा हो तो, उसपर बिजली का कहर क्यों बरपता है? क्यों होती है एक ही जगह में भारी बारिश ,क्यों कहीं आधे हिस्से में बारिश होती है और आधे हिस्से में सूखा पड़ता है? बादलों की भीषण गड़गड़ाहट क्या है और उससे उत्पन्न बिजली कैसे पेड़ों पर गिर जाती है? क्यो भूकंप होता है? क्यो सुनामी आती है? क्यों आसमान से बर्फ के गोले गिरते है? उल्का पिण्ड क्या है? और क्यों लोग मरते हैं और मर कर वह कहां जाते है? हम मानते हैं कि आस्था वादियों और वैज्ञानिकों के पास आम लोगों के इन सारे प्रश्नों का जवाब है, पर क्या यह सारे जवाब हमको अब तक संतुष्ट कर पा ये हैं? स्वर्ग और नर्क की बात भी अब लगभग खारिज हो चुकी है। बचपन से मां- बाप बच्चों को यही सीख देते आये हैं कि गलत काम करोगे तो नरक में जाओगे और अच्छा काम करोगे तो स्वर्ग में । यह सब बातें अब क़िस्से कहानी हो गई क्योंकि जब मनुष्य चाँद पर पहुंचा तो वहां न स्वर्ग दिखाई दिया और जब धरती और समुद्र को नीचे तक छान मारा तो वहां न नर्क दिखाई दिया और न यमराज। क्या हम यही कहें कि जो कुछ है वह सब इसी जन्म में है-अच्छा करोगे तो अच्छा रहोगे बुरा करोगे तो सब इसी जन्म में भुगतना होगा। ऊपर न स्वर्ग है न नीचे नर्क- जो कुछ है सब यहीं...अभी कई रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है..इंतजार की जिये!

हड़ताल या जनता को तकलीफ

रायपुर, दिनांक 6 सितंबर 2010
हड़ताल या जनता को तकलीफ़
सरकार क्यों नहीं होती सख्त?
जब कम वेतन पाने वाले और अधिक वेतन की मांग को लेकर आंदोलन करें तो बात समझ में आती है, लेकिन जब ज्यादा वेतन और सारी सुख- सुविधा भोग रहे लोग वेतन की मांग को लेकर काम बंद करें, तो ऐसा लगता है कि यह आम लोगों के साथ अति कर रहे हैं। हड़तालों का मौसम फिर शुरू हो गया है। इसी मद्देनज़र हम उन बातों को फिर दो हराने के लिये मजबूर हो गये जो हम सदैव से कहते आ रहे हैं कि- सरकार को उसी हड़ताल या आंदोलन की अनुमति देनी चाहिये जिनका आम उपभोक्ता के रोजमर्रे की आवश्यकताओं से कोई ताल्लुक न रखता हो। अब अगर देश के पेट्रोल पंप वाले हड़ताल करने लगे तो आम जनता क्या करेगी? बैंक वाले हड़ताल पर चले जाते हैं, तो देश की सारी आर्थिक लाइन गड़बड़ा जाती है। नगर निकाय के सफाई, फायर ब्रिगेड , पानी वितरण करने वाले हड़ताल पर बैठ जाये तो आम जनता का बुरा हाल हो जाता है। मंगलवार को प्रदेश के सरकारी कर्मचारी मंहगाई को लेकर हड़ताल पर जा रहे हैं। ठीक है मंहगाई आज सभी की समस्या है, लेकिन क्या हड़ताल से मंहगाई दूर हो जायेगी? यह तो ऐसा लग रहा है कि मंहगाई की आड़ में एक रोज छुट्टी मारने का मजा ले रहे हैं लोग। बुधवार सात सितंबर को स्टेट बैंक के प्रबंधन ने ऐलान कर दिया है कि ग्राहक सात सितंबर से पहले अपने बैंक से सबंन्धित काम काज निपटा लें। चूंकि उनके कर्मचारियों ने देशव्यापी हड़ताल पर जाने की धमकी दी है। बैंक कर्मचारी शुरू से मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह वेतन लेते रहे हैं। आज भी उन्हें सम्मान जनक वेतन प्राप्त होता है। उन बेचा रे रोज कमाने- खाने वालों की बनिस्बत इस वर्ग का वेतन चार से पांच गुना है। ऊपर से बैंक में काम करने वालों के कार्यो से आम जनता को संतोष भी नहीं है। कई लोग दुर्व्यवहार के भी शिकार होते हैं। बैंक कर्मी ही शायद देश में ऐसे हैं जो सर्वाधिक हड़ताल करते हैं। इसी महीेने की बाइस तारीख को उपभोक्त ाओं से सीधा जुड़ा एक अन्य वर्ग हड़ताल पर जाने वाला है। यह वर्ग है पेट्रोल-डी जल बेचने वालों का। इनकी माँगें जो भी हो, यह सरकार और इनके बीच का मामला है। इसे इन दोनों को मिल बैठकर हल करना चाहिये या सरकार को सख्ती बरतकर ऐसे हड़तालों पर लगाम लगानी चाहिये लेकिन यह नहीं होता । हड़तालें लम्बे समय तक खिंचती हैं। आम उपभोक्ता परेशान होता रहता है और अंतत: हड़ताल या तो समझौते के बाद मिठाई मुंह में ठूंसकर बंद हो जाती है या फिर सरकार की सख़्ती का डंडा चलता है। अगर यह डंडा शुरू में ही चले तो हड़ताल की नौबत ही न आये। देश की आबादी के अनुसार अब हड़तालों का मतलब है लाखों- करोड़ों लोगों की परेशानियां। सरकार को इस पर संज्ञान देने की जरूरत है। चंद लोगों की सुख- सुविधा के लिये की जाने वाली हड़तालों पर आम जनता को क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है?

यह कैसा रोना?

रायपुर सोमवार। दिनांक 6 सितंबर 2010
यह कैसा रोना?
हर बार की तरह इस बार भी शिक्षक दिवस आया और चला गया। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन को सन् 1962 के बाद से लगातार शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान कुछ शिक्षकों का सम्मान व पुरस्कार बांट कर सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। इसके बाद शिक्षकों, छात्रों या स्कूल की तरफ झांकने का प्रयास भी नहीं किया जाता। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल पिछले एक साल से कह रहे हैं कि- देश में शिक्षकों की कमी है। इस महत्वपूर्ण पद पर बैठकर जनता से यह कहना कि शिक्षकों की कमी है- बड़ा बेतुका लगता है। शिक्षकों की कमी को क्या जनता पूरा करेगी? लाखों- करोड़ों नौजवान शिक्षक बन सेवा करने के लिये तैयार बैठै हैं। क्यों नहीं सरकार ऐसी कोई योजना बनाती कि वह शिक्षकों की कमी को तत्काल पूरा किया जा सके। पूरे वर्ष भर यह कहते हुए हमें थका दिया कि शिक्षकों की कमी है, लेकिन न शिक्षकों की भर्ती हुई और न ही प्रशिक्षण केन्द्र खोले गये। शिक्षकों के वेतन में अभी कुछ वर्षो में वृद्धि हुई है। नहीं तो फटे हाल रहने वाले शिक्षकों को देख इस नौकरी में किसी की दिलचस्पी भी नहीं रहती थी। अब कम से कम युवाओं में शिक्षक बनने की इच्छा जागृत हुई है, तो सरकार को भी चाहिये कि वह सिर्फ लालीपॉप दिखा कर इन बे चारों को बेवकूफ़ न बनायें। देशभर में शिक्षकों की कमी है, यह अभी की बात नहीं वर्षो से ऐसा ही चला आ रहा है। अपने मंत्रियों, सांसदों ,विधायकों का वेतन झटके में तीन सौ से चार सौ गुना बढ़ जाता है लेकिन शिक्षकों की भर्ती या स्कूल भवन बनाने की बात आती है, तो सरकार आकर्षक बातें कर छलावे में रखती है। देश के स्कूलों में न केवल शिक्षकों की कमी है बल्कि फिजिकल इंस्ट्रक्टरों का भी अभाव है। स्कूलों में शिक्षकों को पढ़ाने के लिये आवश्यक साधन सुलभ नहीं है, तो खेल मैदान और प्रयोगशालाओं का भी अभाव है। सरकार द्वारा संचालित स्कूलों में पढने वाले गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे होते हैं। जिन्हें सुख- सुविधाओं के बगैर भी पढ़ा दिया, तो वे चू- चपड़ नहीं करते। जहां तक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता का सवाल है। यह निजी स्कूलों के मुकाबले बहुत ही निम्र स्तर की है। सरकारी स्कूलों से निकलने वाले बहुत से छात्र उपराष्ट्रपति तक के ओहदे तक पहुंचे हैं किंतु इसे हम स्कूल की योग्यता नहीं मानते। बल्कि ऐसे प्रतिभावान और साधनविहीन तथा पढ़ाई को अपने जीवन का ध्येय मानकर चलने वाले छात्रों के कारण ऐसा होता है। वरना आज सरकारी स्कूल में पढ़कर निकलने वाले कितने ही छात्र देश में बड़े से बड़े ओहदे पर बैठे होते।

सिंहासन का लक्ष्य! गडकरी ने भाजपाइयों को सूत्र में पिरोया!

रायपुर, दिनांक 5 सितंबर 2010
सिंहासन का लक्ष्य! गडकरी ने
भाजपाइयों को सूत्र में पिरोया!
तीसरी बार छत्तीसगढ़ में सरकार बनाना तथा दिल्ली की केन्द्रीय गद्दी पर कब्ज़ा जमाना - भाजपा का इस समय प्रमुख लक्ष्य माना जा सकता है, अगर नितिन गडकरी की छत्तीसगढ़ यात्रा के दो दिन की गतिविधियों का विश£ेषण किया जा ये तो बात कुछ यूं ही समझ ली जानी चाहिये। कार्यकर्ताओं, विधायकों, सांसदों और सरकार को उन्होंने जो नसीहत दी उसका यही निचोड़ निकलता है, कि पार्टी अपनी स्थिति को छत्तीसगढ़ सहित केन्द्र में और मजबूत करने की फिराक में है। इससे छत्तीसगढ़ का पावर तीसरी बार भी भाजपा के हाथ में हो। साथ ही यह प्रयास भी हो कि केन्द्र में भाजपा की सरकार बने। भाजपा के नये अध्यक्ष की छत्तीसगढ़ में यह पहली यात्रा थी जिसमें उन्होंने अपने लोगों को साफ- साफ कह दिया कि वे काम करें तभी कुछ बात बनेगी। निष्क्रिय पड़े विधायकों को भी सचेत कर दिया है कि वे सक्रिय हो जायें। वरना अगले विधानसभा चुनाव में टिकट उन्हें मिलेगी इसकी कोई गारंटी नहीं। सांसदों को भी सक्रिय करने के लिये उन्होने दिल्ली में उनकी सक्रियता का मंत्र फूका है। यह आने वाला समय ही बतायेगा कि प्रदेश के विधायक और सांसद अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के सुझाव अथवा आदेश का कितना पालन करते हैं। नितिन गडकरी ने पहले पत्रकारों फिर अपनी पार्टी के नेताओं के समक्ष सेंट्रल गवर्नमेंट को कोसा। देश में महंगाई,बेरोजगारी और आतंकवाद के लिये उनका सीधा सीधा प्रहार सेंट्रल गवर्नमेंट पर था जबकि सोनिया गांधी भी उसी दिन चौथी बार कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी। जिस दिन गडकरी ने रायपुर में पहली बार कदम रखा। इसपर उन्होंने कांग्रेस में व्याप्त परिवारवाद की भत्र्सना कर यह सवाल किया कि- क्या कांग्रेस में और कोई योग्य व्यक्ति नहीं है, जो इस परिवार से हटकर कांग्रेस की बागडोर सम्हाले। कटाक्ष उनका सोनिया गांधी के बार- बार अध्यक्ष बनने पर यह कहते हुए था कि अगर वे यह पद न लें तो उनकी पार्टी उनका अभिनंदन करेगी। संयमित ढंग से नितिन गडकरी ने सारी बातें रखी। देश में गरीबी बढ़ाने के लिये उन्होंने सीधे- सीधे कांग्रेस को दोषी ठहराया। यह कहते हुए कि कांग्रेस ने गरीबी नहीं ग़रीबों को खत्म किया है। त्रेसठ वर्षो में भी देश से गरीबी दूर न करने के लिये उन्होंने कांग्रेस को ही दोषी ठहराया। जबकि वे यह भूल गये कि कम से कम दस साल तो उनकी पार्टी ने भी देश में सरकार या तो खुद चलाई या दूसरी पार्टियों से हाथ मिलाकर चलाई। बहरहाल, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जिन मुद्दों को लेकर जनता के सामने उपस्थित हुए हैं, वह आम लोगों से जुड़ी समस्याएं हैं। इसमें मंहगाई,गरीबी, भुखमरी,बेरोज़गारी के अलावा आतंकवाद भी शामिल हैं। गडकरी के स्वागत में भीड़ उमड़ी और उसमें गुटबाज़ी भी दिखाई दी। भाजपा के दो गुटों में हिंसक उन्माद हुआ। खून से लथपथ लोगों को अस्पताल पहुंचाना पड़ा। रायपुर शहर नेताओं के स्वागत के लिये सदैव तत्पर रहा है। चाहे वह भाजपा, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी या अन्य दल। सभी के स्वागत में यहां भीड़ उमड़ती है और नेताओं को खुद कुछ समय के लिये ऐसा लगने लगता ह,ै कि यहां उनकी पार्टी के सिवा दूसरी कोई पार्टी नहीं है। पार्टियां भी इस मामले मे बड़े तरीके से इस भूमिका को अदा करती है। शहर से भीड़ एकत्रित करना कठिन होता है। इसके लिये बाहर से बसों- ट्रकों में लाद कर लोगों को यहां लाकर शक्ति प्रदर्शन कराया जाता है। नेताओं के स्वागत में तो पलक पावड़े बिछा दिये जाते हैं किंतु रायपुर की बेचारी जनता जिसमें स्कूली बच्चे, महिलाएं और रोगी शामिल हं,ै जाम में फंसकर या तो अपनी किस्मत पर रोते हैं या फिर नेताओं को कोसते हैं।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

खाकी का कत्ल हो गया बिहार सरकार की आंखो के सामने!

रायपुर, दिनांक 3 सितंबर 2010
खाखी का कत्ल हो गया बिहार
सरकार की आँखो के सामने!
बिहार को फ्लैश बैक में ले जाया जा ये तो दिल्ली में मुख्य मंत्रियों की बैठक में नीतिश कुमार ही ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होने नक्सलियंो के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का विरोध किया था। उन्होंने नक्सलियों से बातचीत कर समस्या का हल निकालने की सलाह दी थी। आज मुख्यमंत्री बिहार की जनता को अपना चेहरा कैसे दिखायेंगे जब उनके अपने राज्य में नक्सलियों ने मुठभेड़ में कई जवानों को मौत के घाट उतार दिया और चार को बंधक बनाकर सरकार से कहा कि वे पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर रखे गये उनके साथियों को छोड़े। वरना उनके द्वारा बंधक बनाकर रखे गये लोगों को मार दिया जायेगा। अड़तालीस घंटे से ज्यादा समय तक बंधक बना ये रखने के बाद दो को नक्सलियों द्वारा मारे जाने की खबर है। उन्होंने यह बता दिया कि वे अपनी धमकी को अंजाम देने में पीछे नहीं हटेंगे। नक्सलियों की हिमायत करने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने यह जरूरी भी नहीं समझा कि इस मुद्दे पर नक्सलियों से बातचीत कर ऐसा कोई रास्ता निकाले जिससे नक्सली बंधकों की जान न ले सकें। नक्सलियों की मांग थी कि सरकार गिरफ़्तार किये गये नक्सली साथियों को रिहा करें , वैसे यह किसी भी सरकार के लिये संभव नहीं था किंतु हम इसके पीछे राजग शासनकाल में भारतीय विमान को अपहरण कर कंधार ले जाने की घटना पर नजर दौड़ाये तो यात्रियों को छुड़ाने के लिये सरकार को अपहरणकर्ताओं के सामने न केवल झुकना पड़ा। वरन हमारे विदेश मंत्री स्वंय आतंकवादियों को लेकर कंधार पहुंचे और बंधकों की रक्षा की। उस हिसाब से नक्सलियों द्वारा बंधक बनाये गये निर्दोष पुलिस कर्मियों को छुड़ाने के लिये कम से कम छुड़ाने का उप क्रम ही किया जाता तो उस परिवार को राहत मिलती, जो अपने लोगों को अपनी आंखों के सामने मरते देख रहे थे। इस संपूर्ण घटनाक्रम का बिहार में नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे उन पुलिस कर्मियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? इसकी कल्पना की जा सकती है। उन पुलिस कर्मियों के परिवार के आँसू और दर्दनाक चीखों को बिहार की पुलिस ने अपने परिवार के साथ जोड़कर देखा होगा। नक्सलियों की मांग और हिंसात्मक गतिविधियाँ जो भी हो वे जो कृत्य कर रहे हैं, वह किसी भी तरह न्यायोचित नहीं हैं। वे आम जनता की सारी सहानुभूति खो चुके हैं। उनके साथ अब पुलिस जो भी हरकत करें उसपर जनता का पूर्ण समर्थन ही मिलेगा। नक्सलियों ने अपहत पुलिस कर्मियों की न केवल हत्या की है बल्कि उनके पूरे परिवार को जीवित लाश बना दिया है। यह उन मासूम बच्चों के चेहरे पर देखा जा सकता है जिनकी आंखों के सामने उनके पिता को मौत के घाट उतार दिया गया और बे बस सरकार कुछ नहीं कर पाई-क्या यही है नक्सलियों का इंकलाब? बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने इस मामले में जिस ढंग से निष्क्रियता का रूख अख्तियार किया। वह यही दर्शाता है कि उन्हें अपने बंधक पुलिस कर्मियों और उनके परिवार से कोई सहानुभूति नहीं थी। एक बार बस गिरफ़्तार नक्सलियों को छोड़ने का नाटक ही रचा जाता तो शायद मुख्यमंत्री पूरे बिहार की जनता की सहानुभूति और प्रेम अर्जित कर लेते। इस कांड से अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों को भी सबक लेने की जरूरत है। कभी भी नक्सली इन राज्यों में ऐसी घटना को अंजाम दे सकते हैं जिसमें पूरे परिवार पर मुसीबत आ सकती है। सरकारों को ऐसे मामलों से निपटने के लिये तैयार रहने की जरूरत है।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

तालमेल का अभाव!

रायपुर गुरूवार।दिनांक 2 सितंबर 2010

तालमेल का अभाव!
लोग कहने लगे हैं कांग्रेस को यह क्या हो गया? उसके नेताओं के बयान एक दूसरे से मेल नहीं खाते। एक मंत्री कुछ कहता है तो दूसरा कुछ। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इन मामलों में चुप्पी के संबंध में भी लोग यही कहते हैं कि या तो ऐसे मामलों में वे या तो मजा लेते रहते हैं या चुप्पी साधे रहना ही उचित समझते हैं। यह नहीं कि कांग्रेस ही इस रोग से पीड़ित है, विपक्ष विशेष कर भाजपा को भी यही बीमारी लगी है। अरूण जेटली और सुषमा स्वराज के बीच भी मतभेद अक्सर उभरकर सामने आ जाते हैं। भाजपा के बीच जो मतभेद पैदा होते हैं, उसे कई हद तक सार्वजनिक होने के पहले ही दबा दिया जाता है। जबकि कांग्रेस में ऐसा नहीं है। उसके नेताओं के वक्तव्य एक मुंह से निकलने के बाद गली- कूचों में घूमने लगता है। केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच ऐसी कौन सी टसल है कि चिदंबरम का कोई बयान आया नहीं कि दिग्विजय सिह अपना आपा खो बैठते हैं। भगवा आतंकवाद के मामले में चिंदबरम के वक्तव्य का पहले दिग्विजय सिंह ने एक तरह से समर्थन किया किन्तु, दूसरे ही दिन उन्होने इस बयान में संशोधन कर दूसरे ढंग से पेश कर चिदंबरम को आड़े हाथ लेने का प्रयास किया। पी चिंदबरम और दिग्विजय सिंह के बीच वाक बयानबाज़ी शुरू हुए एक लंबा अरसा हो गया लेकिन इसपर न कांग्रेस नत़त्व ने कुछ कहा और न ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का मुद्दा और भोपाल गैस ट्रेजड़ी पर आये फ़ैसलों पर भी इन दोनों नेताओं के बयानों का जनता ने जमकर मजा लिया। जहां तक मंत्रिमंडल के अन्य कतिपय सदस्यों की बात है। वे भी एक के बाद एक बयानबाज़ी में उलझते रहे हैं। चाहे वह जय राम रमेश हो, चाहे कपिल सिब्बल या अन्य मंत्री। कुछ मंिित्रयों के बयान ने तो सरकार तक का परेशानी में डाल दिया। इसके बावजूद न तो प्रधानमंत्री ने कोई संज्ञान लिया और न ही कांग्रेस की ओर से कोई कार्रवाई इन बयानों के मामले में की गई। चीन में एक मंत्री के विवादास्पद बयान के बाद प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा था। हालांकि विपक्ष भी तालमेल की कमी से जूझ रहा है किन्तु अवसर मिलने पर वे मंत्रियों के बीच तालमेल के अभाव का फायदा उठाने लगते हैं। संसद में शिक्षा अधिकरण के गठन का बिल, पुलिस हिरासत में अत्याचार रोकने का बिल और परमाणु जनादित्य बिल इस समय विपक्ष के टारगेट पर है। तीन बिल तो गृह मंत्री पी चिदंबरम के मंत्रालय से संबंधित हैं। जिसपर तालमेल का अभाव है। विपक्ष मंत्रियों में तालमेल नहीं बैठने की स्थिति को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। ऐसे में शीर्ष सत्ता की खामोशी विवादों को और सुलझाने का ही काम कर रही है।

जनता से बड़ा राजनीतिज्ञ कौन,

रायपुर, दिनांक 2 सितंबर 2010

जनता से बड़ा राजनीतिज्ञ कौन,
उसे भीड़ तंत्र डि गा नहीं सकता!
वर्षो तक छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस की छाया रही, अब ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस सत्ता व संगठन दोनों के परिवेश से दूर हो गया है। लगातार सत्ता भाजपा के हाथ में जाने के बाद जहां कांग्रेस की गतिविधियाँ शून्य हो गई है वहीं भाजपा ने इसका पूरा फायदा उठाते हुए आम जनों को अपने साथ जोड़कर अपनी सत्ता को अगले कुछ वर्षो तक और कायम रखने का भरपूर इंतज़ाम कर लिया है। साथ ही उसका पूरा प्रयास है कि वह इस दौर में अपने संगठन को भी इस अंचल में मजबूत करे। देश की सत्ता में काबिज होने में असफल भाजपा का पूरा प्रयास अभी अपने द्वारा शासित राज्यों में अपनी साख को कायम रखना है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का छत्तीसगढ़ दौरा भी लगता है कुछ इसी परिप्रेक्ष्य में है। वे अधिकांश ऐसे राज्यों का दौरा कर वहां अपनी स्थिति को मजबूत करने के प्रयास में लगे हैं, जहां उनका पहले से बोलबाला है। दूसरी ओर कांग्रेस की अगर देशव्यापी स्थिति का विश£ेषण किया जा ये तो उसके नेता विशेष कर राहुल गांधी की राजनीति उत्तर प्रदेश और उसके आसपास के राज्यों तक ही सिमटकर रह गई है। आदि वासियों के बीच अपनी पैठ कायम करने का प्रयास भी राहुल गांधी कर रहे हैं। मगर एक देशव्यापी छवि बनाने का उनका कोई प्रयास न होना कार्यकर्ताओं को निराश कर रहा है। छत्तीसगढ़ में व्यक्तिगत रूप से देखा जाये तो सिर्फ डॉ. रमन सिंह के कार्यो और उनकी सक्रियता ने यहां सत्ता व भाजपा दोनों को मज़बूती प्रदान की है। उनका मंत्रिमंडल यूं तो भरपूर है किंतु कुछेक को छोड़कर महत्वपूर्ण पोर्ट फोलियों सम्हाले लोगों के बारे में भी लोग नहीं जानते कि किस पद पर कौन बैठा है। ऐसे लोगों का न जनता के बीच उठना- बैठना है और न ही सरकारी कार्यो में कोई दिलचस्पी-हां ठाठ- बाट में कोई कमी नहीं है। लाल बत्ती में घूमने को ही वे सरकार चलाना समझते हैं। मुख्यमंत्री द्वारा हाल में निगम अध्यक्षों की नियुक्ति की गई पर ये भी कुछ ऐसा करके नहीं दिखा रहे हें जिससे इनकी उपयोगिता लोगों को समझ में आये। बहरहाल, नितिन गडकरी के छत्तीसगढ़ दौरे से भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को फिर से संगठित कर अपनी सक्रियता का अहसास कराने की कोशिश कर रही है। भाजपा को यह काम यहां करने की जगह उन राज्यों में करना चाहिये जहां उसकी स्थिति शून्य है। छत्तीसगढ़ रमनसिह की योजनाओं, विकास और व्यक्तिगत छवि के बल पर आगे बढ़ रहा है। उसे यहां फिलहाल जोर लगाने के लिये बाहर से नेताओं की जरूरत नहीं हैं। हां, एक जागरूकता लाने का एक हिस्सा यह ज़रुर हो सकता है किंतु राजनीतिक विश£ेषकों की माने तो नितिन गडकरी के प्रवास का कोई बहुत बड़ा लाभ पार्टी को मिलेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। हां एक बड़ा झटका कांग्रेस को लग सकता है कि वह विधानसभा में पिछली बार हार के बाद से अब तक ऐसा कोई भी उल्लेखनीय कार्य जनता के समक्ष करके नहीं दिखा सकी। जो उसे छत्तीसगढ़ में फिर एक नई उर्जा प्रदान कर सकें। कांग्रेस प्राय: सभी मामलों में निष्क्रिय है। उसके नेता बयानबाज़ी और कभी- कभी अपने व्यक्तिगत शक्ति परीक्षण तक ही सीमित रहते हैं। ऐसे में भाजपा का आम जनता के बीच अपनी साख बनाने की कोशिश का रंग लाना स्वाभाविक है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के आग मन का कोई बहुत बड़ा असर राजनीति पर पड़ेगा। इसकी आशा नहीं की जा सकती- दो तीन दिन तक राजधानी की सड़कों पर हलचल ज़रूर होगी। प्रदेश भर से लोगों को लाने व अपने नेता के भव्य स्वागत की तैयारी की गई है। किंतु सभी दलों के नेताओं को यह समझ लेना चाहिये कि आम जनता जो कि उनकी वोटर है, वह हर राजनीतिक दल की चाल को अपने चश्मे से देखने लगी है, क्योंकि वह भी त्रेसठ सालों में उनके साथ -साथ रहकर बहुत बड़ी राजनीतिज्ञ बन गई है।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

घर में लगी है आग, पड़ोसी की खबर लेने चले..!

रायपुर, दिनांक 1 सितंबर 2010

घर में लगी है आग, पड़ोसी
की खबर लेने चले..!
गेहूं,चावल, चीनी की कीमत बढऩे के कारण अब बच्चों के लिये बिस्किट खरीदना मंहगा होगा। बिस्किट ही क्यों, बच्चे तो आजकल महँगा दूध भी तो पी रहे हैं। कुछ बच्चे तो ऐसे हैं जिन्हें दूध तो क्या रोटी भी नसीब नहीं होती। भारत की आबादी का कम से कम बयालीस प्रतिशत गरीब भूखा और नंगा हैं। यह हम नहीं कह रहे, सरकार द्वारा पेश आंकड़े बता रहे हें। हमारे माननीय सांसदों की तनखाह हाल ही तीन सौ गुना बढ़ा दी गई। वे अब हर महीने सब मिलाकर कम से कम एक लाख साठ हजार के आसपास सरकारी खज़ाने से पैसा निकालेंगे। यह पैसा आम आदमी की जेब से निकला हुआ टैक्स है। सासंद हमारे लिये क्या करते हैं ? इसका आकलन जनता खुद करे लेकिन हम बता दे कि लोकसभा में उनके हंगामें के कारण एक दिन की कार्यवाही स्थगित होने पर करीब एक करोड़ पैसठ लाख रूपये का नुकसान होता है। यह पैसा भी सरकार हमारे और आपके जेब से टैक्स के रूप में वसूल करती है। इस मानसून सत्र में संसद में माननी यों ने न केवल अपना वेतन बढ़ाने के लिये हंगामा किया बल्कि, अन्य अनेक मुद्दे जिससे आम जनता का कोई लेना- देना नहीं हैं, को लेकर संसदीय कार्य में व्यवधान डाला। इससे देश क ा पैंतालीस करोड़ रूपये यूं ही पानी में बहाना पड़ा। इस पैसे से देश के गरीब बच्चों को यूनीफ़ॉर्म और अन्य ज़रूरतों की पूर्ति कर उनमें से कइयों को इस लायक बनाया जा सकता था कि वे अपना जीवन सम्मान के साथ जी सकें। फ़िज़ूलख़र्ची,हमदर्दी में भी हमारी सरकार कम नहीं है। फ़िज़ूलख़र्ची के नाम पर एक मंत्री के पीछे दस- पन्द्रह कार और भी बहुत कुछ इसका सारा पैसा देश की जनता की जेब से निकाला जाता है। इस बीच यह भी पता चला है कि पंजाब के माननीयों ने तेर्ईस करोड़ रूपये का पेट्रोल घटक लिया है। देश में कई क्षेत्रों में बाढ़ आई हुई है। लोग बेघर बार हैं, उन तक सहायता भी नहीं पहुंच रही है। इसके अलावा देश की एक बड़ी आबादी के पास तन ढंकने के लिये कपड़े नहीं है , सर छिपा ने के लिये छत नहीं है। पेट की आग बुझाने के लिये अनाज नहीं है किन्तु हमारे गोदामों में लक्ष्य से ज्यादा अनाज एकत्रित कर रख दिया गया है। यह अनाज गोदामों में पड़ा सड़ रहा है किन्तु सरकार की जिद है कि चाहे लोग भूखे मर जाये। हम अनाज मुफ्त में नहीं बांटेंगे। अगर बात यहीं तक बन जाती तो हम अपने देश के हुक्मरानों को माफ कर देते किन्तु, वे तो इससे भी हद से निकल गये। एक तरफ देश की भूखी, नंगी जनता और बेरोज़गारी की लंबी फौज हैं, वहीं हमारी सरकार बेमानी और दुश्मन देश के सुख दुख में शामिल होकर विश्व से अपनी पीठ थपथपाने का इंतजाम कर रही है। पाकिस्तान में बाढ से हमारी सरकार को हमदर्दी है, होनी भी चाहिये लेकिन यह नहीं कि हमारे लोगों को भूखे और छत विहीन रखकर उनकी मदद करे। हमारी नदियों भी उफान पर है। देश के कई भागों में लाखों लोग बेघर बार हो गये हैं जिसपर हमारे दुश्मन पड़ोसी राज्य ने इसपर कोई सहानुभूति तक नहीं दर्ज कराई लेकिन हम यह सब करने में आगे हैं। अपने घर में लगी आग को छोड़कर हम अपने पड़ोसी के घर की आग ही नहीं उसके पेट की आग को भी बुझा रहे हैं। भारत सरकार ने पाकिस्तान को ढाई करोड़ डालर की मदद देने का फैसला किया है। अगर यह राशि भारत के ग़रीबों के हितों में खर्च की जाती तो संभव है, अधिकांश लोग सहायता पाने के बाद फिर कभी गरीब नहीं कहलाते।