मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कलंकित क्रिकेट!

कलंकित क्रिकेट!
मंगलवार।दिनांक 31 अगस्त 2010पाक का एक और मुखौटा इस समय विश्व के सामने हैं। मैच फ़िक्सिंग कर पाक खिलाडियों ने न केवल अपना नाम खराब किया बल्कि अपने देश का भी मुंह काला कर दिया। अब तक जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे यही बता रहे हैं कि सुरा-सुन्दरी में मस्त पाक क्रिकेट खिलाड़ी पैसा कमाने के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिये तैयार रहते हैं। पाक क्रिकेटरों की इन हरकतों ने पाक आंतकवादियों को भी शर्मिंदा कर दिया है। वे अब इन क्रि केटरों की खून के प्यासे हो गये हैं। पाक क्रि केटर आसिफ की एक पूर्व प्रेमिका पाक अभिनेत्री वीना मलिक ने जो रहस्योद्घाटन किया है, उसमें क्रिकेटरों की पोल पूरी तरह खुल जाती है। आसिफ़ का भारतीय सट्टेबाज़ से संबन्ध और उससे पैसे लेने की बात के बाद अब पाक क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस खिलाड़ी के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। उक्त महिला सारे प्रमाण भी देने के लिये तैयार बताई जा रही है। आसिफ़ ने पैसा कमाने और किसी से मुलाकात के लिये अचानक बैंकाक की यात्रा भी की थी। पाक का सारा खेल सेटिंग से रहा है। पाक की जनता जिन्हें सर आंखों पर लेकर चलती रही है। उनके कारनामों की पोल खुलने के बाद वे अब मुंह खोलने की स्थिति में नहीं हैं। किसी समय हम भी इस स्थिति से गुजर चुके हैं। जब हमारे भी कई खिलाड़ियों पर मैच फ़िक्सिंग का आरोप लगा था। इनमें से कुछ को इसकी सजा भी मिल चुकी हैं। शोहरत पाने के बाद इंसान किस कदर और पैसे की लालच करता है, यह मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। आईसीसी अध्यक्ष शरद पवार संपूर्ण मामले पर नजर रखे हुए हैं। पाक क्रिकेट बोर्ड की रिपोर्ट आने के बाद अगले पन्द्रह दिनों में यह तय होगा कि इन खिलाड़ियों पर क्या कार्रवाई की जाये। फिलहाल जो स्थिति है, वह इस रहस्योद्धाटन के बाद उत्तेजना और नाराज़गी की है। जो ख़बरें आ रही है वह यह दर्शा रही है कि पूरी टीम की स्थिति मैच फ़िक्सिंग मामले में संदिग्ध है। खिलाड़ियों ने सटोरिये से पैसा खाया है। यह बताने के लिये इतना ही काफी है कि उनके कमरे से इतना सारा पैसा बरामद हुआ है, जो उनके आचरण को अपने आप ही बयां करता है। पुलिस रिपोर्ट के बाद आईसीसी क्या कदम उठाये गी इस पर सभी की निगाह है, लेकिन क्रिकेट जगत के दिग्गजों की तरफ से बराबर यह मांग उठ रही है कि पूरी टीम को निलंबित किया जा ये तथा खिलाड़ियों के खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जा ये। इस बीच एक भारतीय फोटोग्राफर के इस बयान ने पूरे मामले में आग में घी का काम किया है कि पाक- इंग्लैड के दो वनडे मैच भी फ़िक्स हैं। आतंकवाद से ग्रसित पाक खिलाड़ियों के इस कारनामे और आतंकवादी धमकी के आगे ब्रिटिश सरकार को इनकी सुरक्षा का इंतज़ाम भी एक गंभीर समस्या है। कई खिलाड़ियों को अपने वतन लौटने के बाद भी दिक्कतें का सामना करना पड़ सकता है। क्रिकेट में जो लोग अब तक विकेट लेते और बा लिंग करते रहे हैं। उन्हें शायद अब जनता की गेंदों का सामना करना पड़ सकता है।

कलंकित क्रिकेट!

रायपुर मंगलवार।दिनांक 31 अगस्त 2010

कलंकित क्रिकेट!
पाक का एक और मुखौटा इस समय विश्व के सामने हैं। मैच फिक्सिंग कर पाक खिलाडियों ने न केवल अपना नाम खराब किया बल्कि अपने देश का भी मुंह काला कर दिया। अब तक जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे यही बता रहे हैं कि सुरा-सुन्दरी में मस्त पाक क्रिकेट खिलाड़ी पैसा कमाने के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिये तैयार रहते हैं। पाक क्रिकेटरों की इन हरकतों ने पाक आंतकवादियों को भी शर्मिंदा कर दिया है। वे अब इन क्रि केटरों की खून के प्यासे हो गये हैं। पाक क्रि केटर आसिफ की एक पूर्व प्रेमिका पाक अभिनेत्री वीना मलिक ने जो रहस्योद्घाटन किया है, उसमें क्रिकेटरों की पोल पूरी तरह खुल जाती है। आसिफ का भारतीय सट्टेबाज से संबन्ध और उससे पैसे लेने की बात के बाद अब पाक क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस खिलाड़ी के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। उक्त महिला सारे प्रमाण भी देने के लिये तैयार बताई जा रही है। आसिफ ने पैसा कमाने और किसी से मुलाकात के लिये अचानक बेंकाक की यात्रा भी की थी। पाक का सारा खेल सेटिंग से रहा है। पाक की जनता जिन्हें सर आंखों पर लेकर चलती रही है। उनके कारनामों की पोल खुलने के बाद वे अब मुंह खोलने की स्थिति में नहीं हैं। किसी समय हम भी इस स्थिति से गुजर चुके हैं। जब हमारे भी कई खिलाडिय़ों पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा था। इनमें से कुछ को इसकी सजा भी मिल चुकी हैं। शोहरत पाने के बाद इंसान किस कदर और पैसे की लालच करता है, यह मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। आईसीसी अध्यक्ष शरद पवार संपूर्ण मामले पर नजर रखे हुए हैं। पाक क्रिकेट बोर्ड की रिपोर्ट आने के बाद अगले पन्द्रह दिनों में यह तय होगा कि इन खिलाडिय़ों पर क्या कार्रवाई की जाये। फिलहाल जो स्थिति है, वह इस रहस्योद्घाटन के बाद उत्तेजना और नाराजगी की है। जो खबरें आ रही है वह यह दर्शा रही है कि पूरी टीम की स्थिति मैच फिक्सिंग मामले में संदिग्ध है। खिलाडिय़ों ने सटोरिये से पैसा खाया है। यह बताने के लिये इतना ही काफी है कि उनके कमरे से इतना सारा पैसा बरामद हुआ है, जो उनके आचरण को अपने आप ही बयां करता है। पुलिस रिपोर्ट के बाद आईसीसी क्या कदम उठायेगी इस पर सभी की निगाह है, लेकिन क्रिकेट जगत के दिग्गजों की तरफ से बराबर यह मांग उठ रही है कि पूरी टीम को निलंबित किया जाये तथा खिलाडिय़ों के खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाये। इस बीच एक भारतीय फोटोग्राफर के इस बयान ने पूरे मामले में आग में घी का काम किया है कि पाक- इंग्लैण्ड के दो वनडे मैच भी फिक्स हैं। आंतकवाद से ग्रसित पाक खिलाडियों के इस कारनामें और आंतकवादी धमकी के आगे ब्रिटिश सरकार को इनकी सुरक्षा का इंतजाम भी एक गंभीर समस्या है। कई खिलाडिय़ों को अपने वतन लौटने के बाद भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। क्रिकेट में जो लोग अब तक विकेट लेते और बालिंग करते रहे हैं। उन्हें शायद अब जनता की गेंदों का सामना करना पड़ सकता है।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

बांधों में लबालब पानी!

रायपुर सोमवार।दिनांक 30 अगस्त 2010

बांधों में लबालब पानी!
मौसम विशेषज्ञों की माने तो इस बार सितंबर में भी वर्षा होगी। अगर यह बात सही निकलती है तो प्रदेश में इतना पानी तो हो जायेगा कि अगले गर्मी में लोगों को ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। बशर्ते कि हम कृषि, निस्तारी व अन्य कामों में पानी का उपयोग सीमित मात्रा में करें। हमें जो आंकड़े प्राप्त हुए हैं उसके अनुसार प्रदेश के इकचालीस जलाशयों में इस समय कम से कम चार हजार मिलियन घन मीटर पानी जमा है। हाल के दिनों में हुई वर्षा से स्थिति में काफी सुधार हुआ है। प्रदेश के जलाशयों में कुल जलभराव क्षमता छै हजार चार सौ दशमलव दो सौ उन चालीस घन मीटर है। अर्थात आज की स्थिति में आधे से भी ज्यादा अर्थात साठ से पैसठ प्रतिशत पानी जलाशयों में मौजूद है। हम इसपर संतोष इसलिये नहीं कर सकते चूंकि कई जलाशय अभी भी चौदह या सत्रह प्रतिशत से ऊपर नहीं भरे हैं। यह स्थिति सरगुजा के बाक़ी व कुंवरपुर जलाशय की है। जबकि यहीं का श्याम जलाशय जिसकी क्षमता 62. 050 मिलियन घन मीटर है, में क्षमता के अनुरूप सौ प्रतिशत पानी भर चुका है। बस्तर के कोसारटेड़ा जलाशय पूरी तरह लबालब है तो रायपुर का सिकासार, बेल्लार,कुम्हारी और पेन्ड्रावन जलाशयों की स्थिति भी अच्छी ही कही जाना चाहिये। यहां बेल्लार को छोड़कर हर जलाशय में पचास प्रतिशत से ऊपर पानी है। बेल्लार का भराव मात्र बीस प्रतिशत है। जहां तक धमतरी के गंगरेल बांध का सवाल है, यहां इस समय अठासी प्रतिशत से ज्यादा पानी है। जो रायपुर- भिलाई के लिये भी एक शुभ संकेत हैं। अगर सितंबर में बारिश हो जाती है तो गंगरेल हन्ड्रेड परसेंट हो जायेगा। जबकि इसी क्षेत्र का सोंदूर और मरूमसिल्ली भी पूरी तरह से भराव की स्थिति में है। यहां क्रमश: सत्तर व बहत्तर प्रतिशत से ज्यादा पानी भरा हुआ है। दुर्ग का तांदुला खरखरा, गोंदली, मरोदा, खपरी बांध भी लबालब है। खपरी पूरी तरह से फुल हो गया है। बिलासपुर का खारंग, मनियारी और घोंधा की स्थिति भी संतोषजनक है। कोरबा के बांगों बांध में पानी अपनी क्षमता से बहुत कम है। यहां मात्र 46.62 प्रतिशत ही जलभराव हुआ है। कांकेर के दुधावा,परलकोट में साठ प्रतिशत से ज्यादा पानी भरा है तो मयाना का प्रतिशत अभी भी 26 से ऊपर नहीं पहुंचा है। महासमुन्द के कोडार बांध में साठ प्रतिशत से ज्यादा पानी है तो केशवा का पानी चालीस प्रतिशत से ऊपर नहीं गया। कबीरधाम के क्षीरपानी,सुतियापाट सरोदा और बेहारखार में से सरोदा को छोड़कर सभी डेमों में पर्याप्त पानी पहुंच गया है। राजनांदगांव के पिपरियानाला, मोगरा बराज, मटियामोती रूसे, धारा में पानी की कोई कमी नहीं है। यहां मटियामोती में सौ प्रतिशत पानी भरा हुआ है। रायगढ़ और कोरिया की स्थिति भी बेहतर है। जहां खुम्हारपाकुटही एक ऐसा बांध है जहां सत्ताईस प्रतिशत ही पानी है। जबकि अन्य बांधों केदारनाला, किनकारी नाला और पुटकानाला की स्थिति बेहतर है। कोरिया के झुमका में भी मात्र अड़तालीस प्रतिशत पानी का भराव है। अमूमन पूरे छत्तीसगढ़ में हालात इस समय ठीक ही कहा जा सकता है। अगर सितम्बर में अच्छी बारिश हो जाती है तो प्रदेश के जलाशयों में सत्तर से अस्सी प्रतिशत या उससे ज्यादा पानी का भराव दर्ज किया जायेगा। जो अगली गर्मी के लिये एक शुभ संकेत होगा।

छत्तीसगढ़ में क्रिमिनल्स की बाढ़

रायपुर,सोमवार दिनांक 30 अगस्त 2010

छत्तीसगढ़ में क्रिमिनल्स की
बाढ़, किसने प्रोत्साहन दिया?
नोएडा में आरूषी-हेमराज हत्याकांड के बाद जितने भी संदिग्ध हिरासत में लिये गये थ,े उनमें से अधिकांश नेपाल के नागरिक थे। इस हत्याकांड का खुलासा आज तक नहीं हुआ। रायपुर में शनिवार को डीआरसीएल लाजेस्टिक लिमिटेड में सात लाख इकसठ हजार की चोरी मामले में जिन लोगों को पकड़ा गया है, वे सभी नेपाली नागरिक हैं तथा यहां विभिन्न मोहल्लों में अपने आप ही अपाइंट होकर चौकीदारी कर रहे थे। इसमें जो प्रमुख आरोपी है वही मात्र ट्रांसपोर्ट कं पनी से संलग्न रहा हैं। इस कांड के बाद विदेशी नागरिकों व बाहरी राज्यों से आकर यहां बसने वाले कतिपय लोगों की गतिविधियां फिर संदेह के दायरे में आ गई है। असल में यह पूरा किस्सा लोगो की लापरवाही व पुलिस की ऐसे लोगो के प्रति निष्क्रियता का ही परिणाम है, जिसके चलते इनके हौसले बुलंदी पर हैं। हमको अति विश्वास है कि यह विदेशी नागरिक अपनी खुखरी और डंडे के बल पर सी टी बजाकर हमारी सुरक्षा करने का दायित्व बखूबी निभाते हैं मगर असलियत क्या यही है? मैं अपने इन्हीं कालमों में कई बार यह प्रश्न उठाता आया हूं कि कालोनियों में अचानक प्रकट होने वाले चौकीदार क्यों नहीं पुलिस की निगरानी में आते? प्राय: हर कालोनी में एक दो महीने की आड़ में एक नया नेपाली चौकीदार उस क्षेत्र के निवासियों की गेट के सामने पैसे मांगते हुए दिखाई देता है। जिसे कालोनी के लोग जानते तक नहीं फिर भी लोग उससे यह तक नहीं पूछते कि उसके पास कोई पुलिस वेरीफिकेशन सर्टिफ़िकेट या आइडेंटी कार्ड है कि नहीं? उसे पैसे दे दिया जाता है। मुश्किल से दस बीस रूपये हर माह वह कालोनी के एक घर से वसूल करता है। इससे उसका घर या परिवार जो भी है जहां भी रहता है कैसे चलता होगा? इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है। पुलिस कहीं भी चोरी होती है या डकैती पड़ती है तो सबसे पहले कालोनी के इस अनधिकृत चौकीदार को ढूंढती है। वह जो बताता है उससे संतुष्टि कर आगे की कार्रवाई की जाती है लेकिन अब तक पुलिस ने ऐसे अनधिकृत लोगों के बारे में कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया? यह अपने आप में रहस्य पूर्ण है। रायपुर की हर कालोनी में वर्षो से ऐसे लोग आते जाते हैं और चौकीदार बनकर रहते तथा कुछ दिन बाद चले जाते हैं। मगर पुलिस ने कभी इन लोगों से यह नहीं कहा कि वे पुलिस थाने में आकर अपनी आमद दे तथा अपना आइडेंटी कार्ड या अथारटी लेटर लें-क्या डीएआर सीएल में चोरी के पीछे यही कारण तो नहीं है? यह तत्व इतने घातक हथियार अपने साथ रखे हुए थे जिसे लेकर वे किसी की हत्या करने से भी नहीं चूकते। पुलिस जांच में भी यह बात सामने आई है। चोरी या हत्या के तत्काल बाद यह नेपाल भाग जाते तो पुलिस हाथ ग़लती रह जाती। पुलिस को अब भी चेत जाना चाहिये-हाल ही उसने हर थाने में यह पता लगाने का प्रयास किया है कि उसके थाना क्षेत्र में कितने पत्रकार रहते हैं और वे क्या करते हैं। बाहर से आकर रहने वालों की बनिस्बत क्या पुलिस को पत्रकारों से खतरा महसूस हो रहा है? जो लोग यहां वर्षो से मीडिया काम में लगे हैं उनको संदेह के नज़रिये से क्यों देखा गया? पुलिस को चाहिये कि वह बुद्विजीवियों के पीछे पढने की जगह ऐसे लोगों का पता लगा ये जो वास्तव में क्राइम कर रहे हैं। अकेले नेपाली ही नहीं राजधानी रायपुर सहित छत्तीसगढ़ के अधिकांश शहरों में ट्रकों,बसों और ट्रेनों के माध्यम से काफी संख्या में अपराधी आकर पनाह ले रहे हैं। इसके अलावा हवाई जहाज़ से भी हाई प्रो फाइल सफ़ेदपोश अपराधियों का आना- जाना जारी है। जब तक पु्रलिस इन सब पर सख्त नहीं होगी, उसे ऐसे कई अपराध और अपराधियों से सामना करना होगा।

रविवार, 29 अगस्त 2010

दुनिया के अंत का चक्कर...

दुनिया के अंत का चक्कर... अब
सौर तूफान आने की चेतावनी!
रायपुर रविवार।दिनांक 29 अगस्त 2010
बहुत पहले डिस्कवरी चैनल ने एक खोज पूर्ण खबर दिखाई थी जिसमें विश्व के एक विकासशील देश की उस पोल को खोला गया जिसमे उसने दावा किया था कि वह चाँद पर पहुंच गया और वहां उसके लोग घूम कर आये-चैनल ने अपनी खोज में वह चित्र दिखायें जिसमें कहा गया था कि यह देश चाँद पर वास्तव में पहुंचा ही नहीं इसके लिये चैनल ने हॉलीवुड की उस फिल्म का दृश्यांकन लोगों को दिखाया जिसके जरिये विश्व को बेवकूफ़ बनाने का प्रयास किया गया। वास्तव में जिस वीडियो को दिखा कर चाँद में उतरने वहां टहलने का दावा किया गया था वह हॉलीवुड की किसी फिल्म से लेकर दिखाया गया था। चैनल में उस फिल्म में मील का एक पत्थर देखकर यह पता लगा लिया कि जो दावा किया गया वह फ़र्ज़ी था। इस तथ्य को यहां उजागर करने के पीछे मैरा मकसद यह है कि हम वर्षो से यह भविष्यवाणी सुनते आ रहे है कि इस सन् मे या उस सन् में दुनिया का अंत हो जायेगा । कभी स्काइलैब गिरने की बात तो कभी महाअभियान से दुनिया का अंत तो कभी किसी वर्ष भारी तबाही मचाने वाले उल्का पिंड के गिरने की खबर से डराया जाता है। धर्म ग्रंथों में भी कई जगह दुनिया के अंत की बात कहीं गई है। असल में हम यह कह सकते हैं कि दुनिया का कभी अंत नहीं होने वाला। दुनिया तो अपनी जगह रहेगी,ै हां प्राकृतिक कोप और ऐसी ही अनेक विपतियां जिसमें भूकंप सुनामी आदि है के चलते इंसान, जानवर और संपत्ति भारी मात्रा में तबाह हो जाती है। बहरहाल एक ताजी भविष्यवाणी ने हाल ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया है यह भविष्यवाणी खगोलविदों की तरफ से है जिनका कहना है कि सन् 2012 में धरती से सौर तूफान टकरायेगा। नासा के वैज्ञानिक भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं उनका कहना है कि यह सौर तूफान इतना ताकतवर रहेगा कि धरती की संचार व विद्युृत व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट कर देगा। एयरलाइंस कंपनियां और जीपीएस प्रणाली को भी यह नष्ट कर सकता है। पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे सेटलाइटों को भी यह नष्ट कर सकता है। इससे पूर्व नासा ने इस महीने के आरंभ में ही चेतावनी दी थी कि अंतरिक्ष में जो चकाचौंध उन्होंने देखा हैं वह भीषण तूफान का एक संकेत त मात्र है लेकिन अब वे कह रहे हैं कि तूफान धरती में टकरा सकता है 1859 और 1921 में इसी तरह के तूफान ने दुनियाभर में हलचल मचा दी थी 2012 में आने वाले तूफान को इससे भी ज्यादा भयानक बताया गया है। वैसे पूर्व के आकलन और भविष्यवाणियों के आधार पर इन भविष्यवाणियों पर आसानी से लोग विश्वास करने तैयार नहीं लेकिन प्रकृति के करवट बदलते रूप को देखकर इसपर विश्वास किये बगैर भी नहीं रहा जा सकता।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

सकल घरेलू उत्पाद दर!

रायपुर शनिवार।
दिनांक 28 अगस्त 2010
सकल घरेलू उत्पाद दर!

अपना घर अपना ही होता है, किराये पर रहने वाले घर और अपने घर में यही अंतर है कि जो सुधार या विकास उसमें करना चाहते हैं वह किराये के मकान में नहीं कर पाते। जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का उपनिवेश बना हुआ था तब यहां विकास नाम मात्र का था। हमने छत्तीसगढ़ की मांग भी इसीलिये की क्योंकि हम यहां के लोगों की समृद्धि विकास व खुशहाली चाहते थे। राज्य बनने के बाद हमारी अपनी सरकार बनी यहां के लोगों को सात सौ किलोमीटर दूर भोपाल राजधानी तक जाने और वहां जाकर काम कराने से मुक्ति मिली। विकास के सारे कार्य लोगों के घर पर ही पहुंचने लगे। समृद्वि और उन्नति का जाल बिछाने मे हमारी कामयाबी का ही नतीजा है कि आज छत्तीसगढ़ राज्य देश में सकल घरेलू उत्पादन दर के मामले में देश के दूसरे राज्यों से आगे निकल गया। नक्सली हिंसा के बावजूद छत्तीसगढ़ की जीडीपी दर 11. 49 तक पहुंच गई। प्रति व्यक्ति आय जहां दोगुनी हुई वहीं राज्य में नये नये उद्योग लगे तथा खेती मे बदलाव आया। सर्वत्र तरक्की से आम जनता खुश है लेकिन हमें इसी से संतोष करके बैठ नहीं जाना है। इस अंचल को खुशहाल बनाने के लिये हमने सड़कों का जाल ज़रूर बिछा या लेकिन उससे जो वृक्ष कटे उससे जमीन के भीतर पानी की कमी हो गई। रेल, हवाई सुविधाओं के मामले में अब भी हम फिसड्डी हैं। खेती में बदलाव ज़रुर हुआ किंतु कांक्रीट के जो जंगल खड़े किये जा रहे हैं उससे खेती का रकबा घटा भी है। अतिउत्साह में बनी कुछ योजनाएं लोगों के लिये आगे मुसीबत भी खड़ी कर सकती हैं। सकल घरेलू उत्पाद दर राष्ट्रीय से ज्यादा होने पर हम गौरवान्वित हैं लेकिन यह दर आगे के वर्षो में भी जारी रहे इसका प्रयास किया जाना चाहिये। विकास को तेजी से अंजाम देने के लिये प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह वास्तव में बधाई के पात्र हैं जिनके प्रयास से ही प्रदेश को आगे बढऩे में मदद मिली है।

सकल घरेलू उत्पाद दर!

रायपुर शनिवार।
दिनांक 28 अगस्त 2010
सकल घरेलू उत्पाद दर!

अपना घर अपना ही होता है, किराये पर रहने वाले घर और अपने घर में यही अंतर है कि जो सुधार या विकास उसमें करना चाहते हैं वह किराये के मकान में नहीं कर पाते। जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का उपनिवेश बना हुआ था तब यहां विकास नाम मात्र का था। हमने छत्तीसगढ़ की मांग भी इसीलिये की क्योंकि हम यहां के लोगों की समृद्वि विकास व खुशहाली चाहते थे। राज्य बनने के बाद हमारी अपनी सरकार बनी यहां के लोगों को सात सौ किलोमीटर दूर भोपाल राजधानी तक जाने और वहां जाकर काम कराने से मुक्ति मिली। विकास के सारे कार्य लोगों के घर पर ही पहुंचने लगे। समृद्वि और उन्नति का जाल बिछाने मे हमारी कामयबी का ही नतीजा है कि आज छत्तीसगढ़ राज्य देश में सकल घरेलू उत्पादन दर के मामले में देश के दूसरे राज्यों से आगे निकल गया। नक्सली हिंसा के बावजूद छत्तीसगढ़ की जीडीपी दर 11. 49 तक पहुंच गई। प्रतिव्यक्ति आय जहां दोगुनी हुई वहीं राज्य में नये नये उद्योग लगे तथा खेती मे बदलाव आया। सर्वत्र तरक्की से आम जनता खुश है लेकिन हमें इसी से संतोष करके बैठ नहीं जाना है। इस अंचल को खुशहाल बनाने के लिये हमने सड़कों का जाल जरूर बिछाया लेकिन उससे जो वृक्ष कटे उससे जमीन के भीतर पानी की कमी हो गई। रेल, हवाई सुविधाओं के मामले में अब भी हम फिसड्डी हैं। खेती में बदलाव जरूर हुआ किन्तु कांक्रीट के जो जंगल खड़े किये जा रहे हैं उससे खेती का रकबा घटा भी है। अतिउत्साह में बनी कुछ योजनाएं लोगों के लिये आगे मुसीबत भी खड़ी कर सकती हैं। सकल घरेलू उत्पाद दर राष्ट्रीय से ज्यादा होने पर हम गौरवान्वित हैं लेकिन यह दर आगे के वर्षो में भी जारी रहे इसका प्रयास किया जाना चाहिये। विकास को तेजी से अंजाम देने के लिये प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह वास्तव में बधाई के पात्र हैं जिनके प्रयास से ही प्रदेश को आगे बढऩे में मदद मिली है।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

हल तो हमें ही खोजना होगा?

रायपुर शनिवार।
दिनांक 28 अगस्त 2010
हल तो हमें ही खोज ना होगा?
अभी कुछ दिन पहले ही हमारे मंत्रीगण और यहां तक कि राष्ट्रपति ने भी चीन की यात्रा की थी। चीन से प्रेम मोहब्बत की बात हुई और अंतत: उसने फिर अपना असली रूप दिखा ही दिया। पाकिस्तान और चीन के बारे में हम क्यों उनकी असलियत को नहीं समझते। यह वही चीन है जिसके प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई ने सन् 1962 में भारत का दौरा कर हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा दिया था और वापस चीन जाकर भारत पर हमला कर हमारी हजारों एकड़ ज़मीन को हड़प लिया। यह ज़मीन आज भी उसके कब्ज़े में हैं। इसे न हम उससे छुड़ा सकते हैं और न इसकी ताकत हमारी सरकार के पास है। यही हाल पाकिस्तान का है- उसके प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जिन्हें पाकिस्तान की सरकार ने बाद में फाँसी पर लटका दिया भारत के खिलाफ सौ वर्षो तक लड़ाई लड़ने की बात करते रहे। पाकिस्तान के हुक्मरानों के मुंह से निकलने वाली हर बात भारत में जहर का काम करती है। क्यों हम ऐसे लोगों से शांति और दोस्ती की उम्मीद करें?चीन ने हमारे जनरल को वीजा नहीं दिया तो कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिये वह इससे भी बढ़कर कुछ भी कर सकता है चूंकि पीठ में छुरा भोंकने की आदत उसमें हैं। पाक और चीन को दोस्ती का पैगाम देते देते हमारी कई पीडिय़ां निकल गई। क्यों नहीं समझते हमारे लोग? क्यों बार बार उनके झांसे में आते हैं और उनके बहकावे पर इन देशों की सैर करने चले जाते हैं। जिनके मुंह में सांप के विषैले दाँत छिपे हों उससे दोस्ती नहीं उनके वार को झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये। भारत सरकार चीन से संबंध सुधारने के लाख दावे करें लेकिन हकीक़त यही है कि चीन या पाकिस्तान दोनों कभी भारत के हो ही नहीं सकते। अरुणाचल में भारतीय सीमा पर लगातार चीनी गतिविधियाँ जारी हैं। सरकार यह जानते हुए भी चीन के प्रति नरम रूख अपना ये हुए हैं। असल में अब वह समय आ गया है जब हमें अपने पड़ोसी देशों के प्रति रवैये को स्थाई रूप से सख्त करने की जरूरत है। यह बात साबित हो चुकी है कि यह दोनों ही मुल्क हर समय हमारी छाती पर बंदूक ताने बैठै हैं तो हमें भी सोचना चाहिये कि हम इनसे बचाव के लिये कौनसा तरीका अख्तियार करें। यह रास्ता विश्व में नये दोस्त बनाकर उनसे ज्यादा से ज्यादा समर्थन जुटाकर भी किया जा सकता है क्योंकि एक समय ऐसा आ सकता है जब चीन और पाकिस्तान मिलकर हमारी एकता और अखंडता को ललकार सकते हैं- इससे पहले इस स्थिति से निपटने पूरे एहतियाती कदम उठाने की जरूरत है।

हर मोड़ पर मनचलों की छीठाकशी

रायपुर शनिवार।दिनांक २८ अगस्त २०१०

हर मोड़ पर मनचलों की छीटाकशी
बे बस युवतियों,कौन बचायें इन्हें?
अभी दो रोज पहले की बात है मैं काली बाड़ी चौक में खड़ा जगदलपुर से आ रही बस में अपने परिवार के सदस्यों का इंतजार कर रहा था। मैरे पास से दो तीन लड़के निकले, दिखने मेे सीधे साधे -वे बात करते हुए आगे निकल गये , वहीं सामने से दो तीन लड़कियाँ भी आ रही थी। मैने देखा कि उन लड़कों में से एक ने उन लड़कियों से छेडखानी करते हुए कोई ऐसी बात कही कि वह तिल मिला उठी सभ्य घरानों की इन लड़कियों ने सड़क में कोई सीन क्रियेट करना उचित नहीं समझा, वे सिर झुकाएं आगे बढ़ गई। इस वाक्यें से मेरे मन में कई विचार आये-पहला यह कि आज के हालात में लड़कियों का सड़क पर निकलना कितना कठिन है। सीधे साधे दिखने वाले युवक भी कैसा दु:साहस कर बैठते हैं? दूसरी बात कि सड़क पर चलने वाली महिलाओं ने अगर ऐसे किसी व्यक्ति को जवाब दे दिया तो उन्हें इसका ख़ामियाज़ा दूसरे ढंग से भी भुगतना पड़ सकता है। इस बीच अगर मेरे जैसे किसी व्यक्ति ने इस प्रकार की छेडख़ानी का विरोध कर दिया तो शायद इसका प्रतिफल मुझे या जो भी विरोध करें उसे ही भुगतना पड़ेगा। छेड़छाड़ की शिकार होने वाली अधिकांश लड़कियाँ भी इसके लिये दोषी हैं जो अपनी तड़क भड़क से मनचलों को अपनी और आकर्षित करती है और छेड़छाड़ का शिकार हो जाती हैं। फैशन,ग्लैमर और आधुनिक पहनावे से अपने आपको सुन्दर दिखाने के चक्कर में बहुत सी युवतियों छेड़छाड़ की शिकार होती है। मन चले युवकों पर राजधानी रायपुर में पुलिस का शिकंजा कितना कसा है यह तो हम नहीं जानते लेकिन हम जो आंकलन करते हैं वह यही दर्शाता है कि रायपुर शहर की नब्बे प्रतिशत छात्राएं, युवतियां व महिलाएं मनचलों की छीटाकशी और छेड़छाड़ का शिकार होती है। कोई इन मनचलों से सड़क पर लडऩे की हिम्मत नहीं करती औैर अधिकांश अपनी इज़्ज़त को बना ये रखने के लिये कोई प्रतिरोध नहीं करती, इसका फायदा यह मन चले उठाते हैं। आवारा किस्म के लड़कों के अलावा सभ्य घरानों के कुछ बिगड़े नवाब भी सड़कों पर मौजूद रहते हैं जिनका काम सिर्फ यही है। पुलिस इस मामले में अभियान ज़रुर चलाती है लेकिन उसके इस अभियान का कोई खास फायदा हुआ हो यह नहीं कहा जा सकता। सर्वाधिक छेड़छाड़ की शिकार स्कूल जाने वाली वे छात्राएं होती हैं जिन्हें किसी नुक्कड़ या सुनसान इलाके से निकल कर स्कूल कॉलेज जाना होता है। असल बात यह है कि मनचलों के आगे युवतियों व महिलाएं बे बस हैं वे छेड़छाड़ की शिकायत अपने परिवार के सदस्यों से भी नहीं करती क्योंकि उनको इस बात का डर रहता है कि ऐसा करने पर उन्हें इससे और परेशानी हो सकती है। उत्तेजित परिवार के सदस्य कुछ कर न बैठे इसका डर भी उन्हें सताता है। पुलिस में इस समय काफी संख्या में महिलाओं की भर्ती की गई है। पुलिस के बड़े अफसरों को चाहिये कि वे सादे वेष में महिला पुलिस को सड़क पर जगह जगह उतारे और शहर में महिलाओं के साथ क्या होता है इसका पता लगायें। जब तक मनचलों को इस बात का अहसास नहीं होगा कि जिनको छेड रहे हैं वह महिला पुलिस भी हो सकती है तब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है।

स्वाइन फ्लू।

रायपुर शुक्रवार।
दिनांक 27 अगस्त 2010
स्वाइन फ्लू।
स्वाइन फ्लू से एक के बाद एक सात मौतों ने छत्तीसगढ़ को दहशत में डाल दिया है। मरने वालों में से अधिकांश बिलासपुर जिले के हैं। दुर्ग व रायपुर भी स्वाइन फ्लू से पीडि़त है, यहां भी मरीज़ों की मृत्यु महामारी से हुई है। स्वाइन फ्लू। से मरीजों की मौत की पुष्टि दिल्ली स्थित प्रयोग शाला से आने वाली रिपोर्ट के बाद होती है। यहंा से रिपोर्ट आने में वक्त लग जाता है। पीड़ित मरीज़ एक दो दिन के भीतर ही प्राण छोड़ देता है। ऐसे में सरकार को छत्तीसगढ़ को स्वाइन फ्लू से मुक्त करने एक बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है। उसका ध्यान सिर्फ डॉ. आम्बेडकर अस्पताल पर है, जो आम आदमी की नजर में एक निष्क्रिय अस्पताल है। यहां पांच सौ थ्री लेयर मास्क मंगवाने का दावा किया गया है लेकिन मरीज़ों को किस तरह से चिकित्सा सुविधा मुहैया की जायेगी आदि की कोई ब्यूह रचना तैयार नहीं की गई है। दिल्ली की प्रयोग शाला को स्वाइन फ्लू पीडि़तों की चौबीस रिपोर्ट भेजी गई। इसमें से माात्र नौ कि रिपोर्ट मिली। इनमें चार स्वाइन फलू से पीडि़त हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि स्वाइन फ्लू ने तेजी पकड़ ली है और अगर इसपर तुरन्त एहतियाती कदम नहीं उठाये तो इसका अंजाम बहुत बुरा होगा। सरकार को चाहिये कि वह राजधानी में होने वाली सभी रैलियों पर कम से कम एक महीने के लिये प्रतिबंध लगाये। साथ ही रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड और हवाई जहाज से पहुंचने वाले प्रत्येक यात्री को स्वास्थ्य परीक्षण से गुजारे। राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के सभी नगरों की साफ सफाई पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मौसम में आये परिवर्तन से मौसमी बीमारी होना संभव है। लोग महामारी को भी छोटी बीमारी समझकर बढ़ावा दे जाते हैं। इसी का परिणाम हैं कि स्वाइन फ्लू पैर जमाने में सफल हो गया। छत्तीसगढ़ का चांपा,जांजगीर, बिलासपुर, दुर्ग इस समय स्वाइन फ्लू से प्रभावित है। यहां रोगियो की स्वाइन फ्लू से मौत की पुष्टि हो चुकी है।

दो लाख कुछ नहीं !

रायपुर शुक्रवार।
दिनांक 27 अगस्त 2010
दो लाख कुछ नहीं !
मंहगाई के इस दौर में केन्द्र सरकार की तरफ से उन लोगों को बड़ी राहत मिली है जिनकी आमदनी सालभर में दो लाख रूपये से कम है। अब तक एक लाख साठ हजार रूपये तक की आमदनी वाले व्यक्ति को आय कर पटाना पड़ता था लेकिन अब इसे बढ़ाकर दो लाख रूपये कर दिया गया है। केन्द्र सरकार ने करदाताओं को राहत पहुंचाने की गरज से प्रत्यक्ष कर संहिता डीटीसी को मंजूरी दी है। नये कानून में दो दशमलव पांच लाख रूपये की आय पर अब दस प्रतिशत और पांच दशमलव दस लाख की आय पर बीस व दस लाख से ज्यादा की आय पर तीस प्रतिशत की दर से कर लगने की संभावना है। वरिष्ठ नागरिक और महिलाएं पहले से छूट का फायदा उठा रहै है। संभव है यह छूट आगे भी जारी रहेगी। ऐसा लगता है सरकार ने अचानक यह कदम संसद में हाल ही सांसदों के वेतन में बढ़ोतरी से जनता में उभरे आक्रोश के परिप्रेक्ष्य में उठाया है। जनता माननी यों के वेतन में किये गये तीन सौ प्रतिशत की वृद्वि से भारी गुस्से में है, ऐसे समय में आयकर में थोड़ी बहुत छूट देकर जनता की नाराजगी को कम करने का एक प्रयास इसे माना जा सकता है। दो लाख तक टैक्स नहीं का फैसला कैबिनेट में हो चुका है। इसे अब संसद के चालू सत्र में पेश किया जायेगा ताकि अगले वित्त वर्ष से इसे लागू किया जा सके। आय कर में छूट के साथ सरकार ने पीएफ और प्रोवीडेंट फंड निकासी के वक्त लगने वाले कर पर भी राहत देने का फैसला किया है। ऐसा ही निर्णय पेंशन पर लगने वाले कर पर भी लिया गया है। 2004 से नौकरी पर लगे लोगों का पेंशन पूरी तरह से कर मुक्त होगा। सरकार द्वारा अचानक जनता के हित में लिये फैसले पर यद्यपि यह कहा जा रहा है कि सरकार कर ढांचे को आसान करना चाहती है तथा ज्यादा लोगों को कर दायरे में लाना आदि किंतु इसकी हकीक़त क्या है, यह बाद में ही पता चलेगा। बात यहां यह भी उठ रही है कि अगर सरकार जनता के प्रति इतना ही प्रेम दर्शा रही है, तो उसने आम लोगों पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों जैसे सर्विस टैक्स आदि को क्यों नहीं खत्म किया? सवाल जनता की तरफ से यह भी है कि उसने सांसदों के वेतन में तीन सौ से ज्यादा प्रतिशत की वृद्धि कर उन्हें खुश किया है तो आम जनता पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों पर छूट क्यों नहीं दी ़?

नकल,भ्रष्टाचार का कलंक कैसे धोयेगी न्यायपालिका?

रायपुर शुक्रवार। दिनांक 27 अगस्त 2010

नकल,भ्रष्टाचार का कलंक
कैसे धोयेगी न्यायपालिका?
परीक्षा हाल में लगे कैमरे की मदद से देश के पांच जजों को आंध्र प्रदेश के एल एलएम परीक्षा आयोजकों ने नकल करते देखा। इनमें से एक पूरी किताब लिये हुए था तो कुछ के पास फाड़े हुए पन्ने और अन्य नकल सामग्री थी। आयोजकों की आंखों के बाद यह किस्सा पूरे देश में फैल गया कि पांच जज नकल करते हुए पकड़े गये। हमारी न्याय व्यवस्था को शर्मसार करने वाली यह पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व भी कम से कम आधा दर्जन माननीय जज पीएफ घोटाले और अन्य मामलों में दोषी पाए जा चुके हैं। इस घटना ने आम लोगों की न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और ईमानदारी दोनों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। न्याय व्यवस्था पर हम हमेशा गर्व करते रहे हैं। अब भी हमें उसपर गर्व है किंतु कहावत है- एक मछली पूरे तालाब को खराब करती है- क्या पीएफ घोटाले और एल एलएम परीक्षा में नकल मारने वाले माननी यों ने कु छ ऐसा ही नहीं किया? जो लोग नकल मारकर पास होते हैं, उनका नौकरी पाने के बाद का चरित्र क्या रहता है, यह बताने की जरूरत नहीं। जिन लोगों को पंच- परमेश्वर अर्थात भगवान का दर्जा प्राप्त है, वही जब ईमानदारी को किनारे रख अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को आगे बढ़ाये तो उनके भक्तों पर क्या गुजरेगी? देश में तेजी से पनप रहे भ्रष्टाचार और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ का ही यह नतीजा है कि हमारी न्याय व्यवस्था की छोर पकड़े लोग भी अब इस क्षेत्र में कूद पड़े हैं। देश की व्यवस्था के लिये यह एक कठिन चुनौती है। सब तरह से हारकर न्यायालय में पहुंचने वाला व्यक्ति कम से कम यहां पहुँचकर इस बात की उम्मीद करता रहा है कि उसे यहां संपूर्ण व स्वच्छ न्याय मिलेगा लेकिन कतिपय लोगों की लगातार भ्रष्ट कोशिशों ने इस व्यवस्था पर एक के बाद एक काले धब्बे लगाने शुरू कर दिये। हम मानते हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था आज भी पूर्व की तरह पवित्र है। इसमें आज भी ईमानदार और स्वच्छ छवि के लोग है जो निष्पक्ष न्याय करते हैं किंतु जिस तरह कतिपय नये लोगों का समावेश इस व्यवस्था में हो रहा है। वह राष्ट्रीय चरित्र में घुल मिल गई बुराइयों को साथ लेकर इस व्यवस्था में प्रवेश कर रहे हैं, जो पूरी व्यवस्था को आगे आने वाले दिनों में भारी संकट में डाल सकती है। कसाव को फाँसी या अन्य ऐसे ही बड़े मुद्दों पर फैसला होने पर जिस विश्व ने हमारी न्याय व्यवस्था को सराहा था, वह विश्व आज जब हमारे जजों को पीएफ फंड में घोटाला कर पैसा कमाने और नकल मारते पकड़े जाने जैसी खबर को देखता व सुनता है। तो उसकी प्रतिक्रिया का अहसास हम कर सकते हैं। न्याय व्यवस्था को न केवल पारदर्शी, ईमानदार व सर्वत्र बाहरी प्रभाव से मुक्त होने की जरूरत है-हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि वर्तमान न्याय व्यवस्था में मौजूद ईमानदार व स्वच्छ छवि का व्यक्तित्व इस काले धब्बे को धो कर न्याय व्यवस्था की ईमानदार छवि को कायम रख सकेंगे।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

कमजोर कानून

रायपुर,बुधवार दिनांक 25 अगस्त 2010

कमजोर कानून टीन एजर्स
में बढते अपराध का कारण
कानून सख्त हो जा ये तो किसी की मजाल नहीं कि मनमानी कर सकें- हम यह दावे के साथ कह सकते है कि ट्रेफिक के मामले में पिछले कुछ समय से की गई सख्ती ने रायपुर के लोगों को काफी राहत दी है। अपराध के मामले में पुलिस को कुछ इसी तरह का रवैया अपनाने की जरूरत है। जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं उसका एक बड़ा कारण कानून की दिलाई और कानून से लोगों का डर खत्म होना है। निमोरा में तिहरे हत्याकांड में लिप्त लड़के ही निकले जिन्होंने पैसे की लालच में चोरी की और चोरी करते देख लेने के डर से तीनों बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। हम पहले ही यह बता चुके हैं कि अपराध का तीन कारण हो सकता है- एक टीन एजर्स सेक्स, दूसरा चोरी और चोरी करते बच्चों का देख लेना या फिर आपसी रंजिश। इन तीनों में से दूसरी बात सही निकली। टीन एजर्स सेक्स की संभावना सिर्फ बालिका की भूमिका से ही व्यक्त किया गया। हमने यह भी बताया था कि बच्चे आपस मे ंखेल के खेल के दौरान बहुत कुछ कर डालते हैं। पड़ोसी युवकों का घर में आना जाना था। जब उन्होंने चोरी की तो उसे शेष बच्चों ने देख लिया और यह देख लेना इतना मंहगा पड़ा कि उन्होने बच्चों की वीभत्सता से हत्या कर दी। घर को सिर्फ बच्चों के भरोसे छोड़ने वाले मां बाप के लिये भी यह अपराध एक संदश है कि वे बच्चों को छोड़कर अकेले कहीं न जा ये और जायें तो किसी को उनकी जिम्मेदारी सौंपकर जायें। हत्याकांड के बाद हमने अपने कालमों में लिखा था कि हत्यारा गांव का ही काई सदस्य हा े हो सकता है जिसने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। सारे घर की परिस्थिति से अच्छी तरह जानने वाले पड़ोसी युवक की करतूतों से सारा गांव भी शरमिन्दा होगा। इतने दिनों तक वह सारे गांव की गिितिवधियों व पुलिस की कार्रवाइयों को देखता रहा और अंततरू पुलिस के जाल में फंस गया। शहर और आसपास के गाँवों में बढ़ रहे अपराध पर एक नजर डाले तो यह बात साफ है कि इसे करने वालों में प्रायरू बच्चे या युवा वर्ग के लडके है जिन्हे आगे पीछे की कोई सोच नही हैं और वे बे परवाह किसी भी ढंग का भीषण अपराध कर डालते हैं। टीन एजर्स के कारनामों की शुरूआत निमोरा से शुरू नहीं हुई बल्कि ऐसे अपराधों का राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में तेजी से फैल रहा है। अपराध का नब्बे प्रतिशत में हाथ टीन एजर्स व युवाओं का रहता है। छोटे बच्चे और तीस से पैंतीस साल की उम्र के लड़के बुरी तरह अपराध में लिप्त हो गये । मां बाप को इसका पता भी नहीं चलता कि उनका बेटा क्या कर रहा है और जब ऐसे ही किसी बड़े अपराध में फंस जाता है तो उनके पास रोने के सिवा कोई दूसरा उपाय बचता नहीं। हम इस अपराध के लिये घरों में अनुशासन की कमी और बच्चों को हर मामले में खुली छूट को मानते हैं। बजुर्गाे के प्रति आदर खत्म हो चुका है तथा स्कूल कालेज की पढ़ाई में कहीं अनुशासन व अच्छे गुण सिखाने की बात का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। बच्चे पैदा होने के बाद से लेकर युवा होते तक स्ट्रीट में रहते हैं और स्ट्रीट बाय बनकर वे सब कृत्य कर डालते हैं जो समाज को दुविधा में डाल देते हैं। अपराध के छोटे से छोटे मामले मे जब तक पुलिस कडी नहीं होगी तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा।
रायपुर,बुधवार दिनांक 25 अगस्त 2010

कमजोर कानून टीन एजर्स
में बढते अपराध का कारण
कानून सख्त हो जाये तो किसी की मजाल नहीं कि मनमानी कर सकें- हम यह दावे के साथ कह सकते है कि ट्रेफिक के मामले में पिछले कुछ समय से की गई सख्ती ने रायपुर के लोगों को काफी राहत दी है। अपराध के मामले में पुलिस को कुछ इसी तरह का रवैया अपनाने की जरूरत है। जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं उसका एक बड़ा कारण कानून की ढिलाई और कानून से लोगों का डर खत्म होना है। निमोरा में तिहरे हत्याकांड में लिप्न्त लड़के ही निकले जिन्होंने पैसे की लालच में चोरी की और चोरी करते देख लेेने के डर से तीनों बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। हम पहले ही यह बता चुके हैं कि अपराध का तीन कारण हो सकता है- एक टीन एजर्स सेक्स, दूसरा चोरी और चोरी करते बच्चों का देख लेना या फिर आपसी रंजिश। इन तीनों में से दूसरी बात सही निकली। टीन एजर्स सेक्स की संभावना सिर्फ बालिका की भूमिका से ही व्यक्त किया गया। हमने यह भी बताया था कि बच्चे आपस मे ंखेल के खेल के दौरान बहुत कुछ कर डालते हैं। पडौसी युवकों का घर में आना जाना था। जब उन्होंने चोरी की तो उसे शेष बच्चों ने देख लिया और यह देख लेना इतना मंहगा पड़ा कि उन्होने बच्चों की वीभत्सता से हत्या कर दी। घर को सिर्फ बच्चों के भरोसे छोडऩे वाले मां बाप के लिये भी यह अपराध एक संदश है कि वे बच्चों को छोड़कर अकेले कहीं न जाये और जायें तो किसी को उनकी जिम्मेदारी सौंपकर जायें। हत्याकांड के बाद हमने अपने कालमों में लिखा था कि हत्यारा गांव का ही काई सदस्य हा े हो सकता है जिसने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। सारे घर की परिस्थति से अच्छी तरह जानने वाले पडौसी युवक की करतूतों से सारा गांव भी शरमिन्दा होगा। इतने दिनों तक वह सारे गांव की गिितिवधियों व पुलिस की कार्रवाइयों को देखता रहा और अंततरू पुलिस के जाल में फंस गया। शहर और आसपास के गांवों में बढ़ रहे अपराध पर एक नजर डाले तो यह बात साफ है कि इसे करने वालों में प्रायरू बच्चे या युवा वर्ग के लडके है जिन्हे आगे पीछे की कोई सोच नही हैं और वे बेपरवाह किसी भी ढंग का भीषण अपराध कर डालते हैं। टीन एजर्स के कारनामों की शुरूआत निमोरा से शुरू नहीं हुई बल्कि ऐसे अपराधाों का राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में तेजी से फैल रहा है। अपराध का नब्बे प्रतिशत में हाथ टीन एजर्स व युवाओं का रहता है। छोटे बच्चे और तीस से पैतीस साल की उम्र के लड़के बुरी तरह अपराध में लिप्त हो गये । मां बाप को इसका पता भी नहीं चलता कि उनका बेटा क्या कर रहा है और जब ऐसे ही किसी बड़े अपराध में फंस जाता है तो उनके पास रोने के सिवा कोई दूसरा उपाय बचता नहीं। हम इस अपराध के लिये घरों में अनुशासन की कमी और बच्चों को हर मामले में खुली छूट को मानते हैं। बजुर्गाे के प्रति आदर खत्म हो चुका है तथा स्कूल कालेज की पढ़ाई में कहीं अनुशासन व अच्छे गुण सिखाने की बात का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। बच्चे पैदा होने के बाद से लेकर युवा होते तक स्ट्रीट में रहते हैं और स्ट्रीट बाय बनकर वे सब कृत्य कर डालते हैं जो समाज को दुविधा में डाल देते हैं। अपराध के छोटे से छोटे मामले मे जब तक पुलिस कडी नहीं होगी तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा।






आतंकवाद कौन फैला रहा?

रायपुर गुरुवार। दिनांक 26 अगस्त 2010

आतंकवाद कौन फैला रहा? नेता, मंत्री
अपने बयान पर लगाम लगायें!
यह चाहे हिन्दू आतंकवाद हो, चाहे मुस्लिम या फिर माओवाद या अन्य अपराध- इन सब में पिसती है आम जनता। बयान देने वाले नेताओं का कुछ नहीं होता- कोई भी निर्दाेष व्यक्ति जिसका किसी से लेना देना नहीं वह इस माहौल में आकर बलि का बकरा बन जाता है। आतंक फैलाने वाले खुश होते हैं और सरकार निंदा प्रस्ताव, मुआवजा और श्रध्दाजंलि देकर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर चुप हो जाती है। इस बीच कोई पुलिस का आदमी मारा जाता है, तो उसे शहीद बना दिया जाता है। शहीद वे कहलाते हैं जो देश के लिये दुश्मनों से लड़कर मारा जा ये लेकिन आजकल आतंकवादी, नक्सली की गोली या बारूद से मरने वाला भी शहीद हो जाता है। चाहे उसने मुठभेड़ की हो या नहीं। बार बार आतंक के चलते शहीद की परिभाषा ही बदल दी गई। लाखों करोड़ों रूपये अब तक शहीदों को मुआवज़े के नाम पर दिया जा चुका है लेकिन सरकार ने ऐसा कोई एहतियाती कदम नहीं उठाया कि निर्दाेष आम आदमी मारा न जाये तथा पुलिस के जवान कथित रूप से शहीद की गिनती में शामिल न हो वें। बुधवार को भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम साहब का एक बयान आया कि देश में अब हिन्दू आतंकवाद फैल रहा है। हम चिदंबरम साहब से यह पूछना चाहते हैं कि हिन्दू हो या मुस्लिम अथवा अन्य कोई भी आतंकवाद या अन्य किस्म के अपराध। इसे फैलने के लिये कौन जिम्मेदार है? सरकार आंख मूंदकर कहती रहेगी कि नक्सलवाद बढ़ रहा है, हिन्दू, मुसलमान या अन्य कोई धर्म के लोग आतंकवाद फैला रहे हैं तो इससे क्या देश में यह सब बुराइयां रूक जायेगी? चिदम्बर साहब और उनकी सरकार के पास न केवल गुप्तचर एजेंसियों हंै बल्कि पुलिस और सेना के रूप मे अपार शक्ति मौजूद है, क्यों नहीं वे इस बात का प्रयास करते कि आतंकवाद न बढे। कह देने से क्या आतंकवाद खत्म हो जायेगा? चिदंबरम यह भी कह रहे हैं कि आतंकवाद के ख़ात्मे में वर्षाे लग जायेंगे- इसका मतलब यही है कि इस समस्या का सरकार के पास कोई समाधान नहीं। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं। अलग- अलग राज्यों में बंटे इस देश में हिंदुओं की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि हिन्दू आतंकवादी हंै। इस देश में सभी धर्म और जाति के लोग न केवल मिलकर रहते हैं बल्कि अच्छे दोस्त व परिवार के सदस्य के रूप में भी रहते हैं। कुछ लोगों की सोच नफरत की हो सकती है-इस सोच व उनके रवैये को बदलने या इससे सस्ती से निपटने का काम सरकार का है न कि जनता का। जनता को यह बताकर क्यों राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास किया जा रहा है? देश को बांध कर रखने की जगह उसे टुक ड़े- टुकड़े करने व लोगों को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रपति व देश की सर्वाेच्च न्यायालय को इन सब पर संज्ञान लेने का वक्त आ गया है। वरना कुछ नेताओं ने तो लगता है देश में गृह युद्घ की स्थिति पैदा करने का बीड़ा उठा लिया है।

सांपों के लिये हास्टल...

रायपुर सोमवार।दिनांक 22 अगस्त 2010

सांपों के लिये हास्टल...और हाथी,
आवारा मवेशी, कुत्ते कहां जायेगें?
रायपुर के पास नंदनवन में सांपों का भी अपना हास्टल होगा, वे वहां आराम से रहेंगे, उनकों वन विभाग के कर्मचारी दूध- रोटी और कभी कभी चूहों का मांस भी खिलायेंगे! पूरे छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले सांपों का जमघट..क्या मजा आयेगा न! इस खबर ने आज मुझे रोमांचित कर दिया। मेरे मन में ख्याल आया कि हमारे लोगों को सांप की कितनी चिंता है। इंसान और भगवान को इस बरसात के मौसम में अवैध कब्जे के नाम से घरों से बेदखल किया जा रहा है और अंबिकापुर, सूरजपुर, जशपुर के जंगलों में रहने वालों को हाथी पछाड़ रहे हैं। तपकरा और कोरबा इलाकों में लोगों को नाग डस- डसकर काल के गाल में पहुंचा रहे हैं । वहीं राजधानी रायपुर की सड़कों पर आवारा मवेशियों और कुत्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है, उसकी किसी को चिंता नहीं। हमारे कर्ताधर्ताओं को चिंता है, उन सांपों की जिनके काटने के बाद आदमी सीधे स्वर्ग लोक के दर्शन करता है। जिसके काटने के बाद इंसान को बचाने के लिये अस्पतालों में दवा भी उपलब्ध नहीं होती। सांपों का नंदनवन या वनअधिकारियों के घरों की शोभा बढ़ाने के लिये सांप पालने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये लेकिन सांपों को घर और सुविधा देने के साथ इंसान को भी तो देखो। वह किन परिस्थितियों में सांप और हाथियों तथा आवारा मवेशियों के बीच रह रहा है। सांप के काटने से प्रतिवर्ष सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। तपकरा, कोरबा, जशपुर तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में सांप समस्या बने हुए है। वहीं इन्हीं क्षेत्रों के आसपास हाथियों ने कहर ढा रखा है। हाथियों के आंतक का कोई स्थाई समाधान नहीं निकल सका है। हाथियों के झुण्ड इंसानों को रौंद रहे हैं तथा उनकी संपत्ति को स्वाहा कर रहे हैं। सरकार के कान में बात डालने पर वे इस कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती है। राजधानी रायपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ की सड़कों पर आप कहीं से भी निकल जाइय े, आवारा मवेशियों व आवारा कुत्तों से सड़कें भरी पड़ी हैं। अगर आपकों सड़क से निकलना हो तो रास्ता स्वंय तैयार करना पड़ता है। ऐसी परेशानियों से रूबरू होने वाले हमारे कर्ता - धर्ता भी हैं जिन्हें इन सबसे कोई लेना- देना नहीं। हम वन विभाग की सांपों को नंदनवन में एक साथ एक हास्टल में रखने के लिये उन्हें बधाई देते हैं, लेकिन सरकार से यह भी मांग करते हैं कि जंगलों से आबादी वाले क्षेत्रों में आकर तबाही मचाने वाले हाथियों, शहर की सड़कों पर बेधड़क विश्राम कर रहे आवारा मवेशियों और गली- गली में भौं- भौ कर किसी भी इंसान को काटने वाले जानवरों के लिये भी कहीं ऐसा हास्टल तैयार करें, जहां उनके खान पान व रहने की भरपूर व्यवस्था हो...बस सांप को आदरपूर्वक मकान में संजोकर रखने वालों व सरकार दोनों से हम इंसानों की तरफ से यही एक निवेदन है।

रविवार, 22 अगस्त 2010

निमोरा हत्याकांड टीन एजर्स सैक्स तो नहीं ?

रायपुर रविवार।दिनांक 22 अगस्त 2010

निमोरा हत्याकांड कहीं पर्दे के पीछे
टीन एजर्स सैक्स तो नहीं ?
जब घर पर मां-बाप नहीं रहते तब बच्चे कई किस्म के खेल खेलते हैं- कुछ खेल ऐसे भी होते हैं जो दूसरे बच्चों को गवारा नहीं होते। वे उस पर लड़ाई कर बैठते है और यहां तक कह बैठते हैं कि मां को आने दो या पिताजी को आने दो हम सब बता देंगे- बस इसी बात को लेकर ज़ोरदार लड़ाई हो जाती हैं, इसमें खून ख़राबा भी हो जा ये तो आश्चर्य नहीं। रायपुर से बीस किलोमीटर दूर निमोरा गांव में बीते शुक्रवार को तीन बच्चों की निर्मम हत्या और उसके बाद उसे जलाने की कोशिश मामले में पिछले अड़तालीस घंटे से पुलिस उलझी हुई है। हमने ऊपर सिर्फ एक उदाहरण दिया कि कुछ ऐसा भी हो सकता है। इसके अलावा घटना का कारण चोरी भी हो सकता है जिसे बच्चों ने देख लिया और हत्या हो गई। तीसरा और महत्वपूर्ण कारण सेक्स है, जो वहां मौजूद बच्चों ने देखा तथा इसका भेद न खुले इसके लिये खूनी खेल खेला गया। हम इस मामले में दावे के साथ नहीं कह सकते कि भुनेश्वरी नामक लड़की जो कि इस परिवार की एक सदस्या है, के साथ कोई अन्य युवक भी यहां मौजूद था जिसके हाथों या दोनों की मिली भगत से यह हत्या हो सकती है। अब तक की पुलिस जांच पड़ताल में जो निष्कर्ष सामने आ रहे हैं। वे यही संकेत दे रहे हैं। टीनएजर्स के बीच बढ़ते लव अफे यर्स का यह ग्रामीण रूप हो सकता है, जो इतने बड़े हत्याकांड के रूप में तब्दील हो गया। पुलिस की जांच पड़ताल में एक संदिग्ध भुनेश्वरी है, जो हर सवाल पर हां या न तक ही सीमित होकर चुप है। घर के पास पुरूष की चप्पल मिलना आदि सब यही इंगित कर रहा है कि कुछ न कुछ दाल में काला है। इस मामले में एक दूसरा पहलू आपसी रंजिश का भी हो सकता है। धरसीवा क्षेत्र के कुछ गांवों का पूर्व इतिहास देखा जाये तो यह स्पष्ट होता है कि यहां आपसी रंजिश और गुटबाजी चरम पर है। कुछ वर्षाे पूर्व भैसमुड़ा में तीन व्यक्तियों की हत्या के आरोपियों को हाल के दिनों में ही कारावास की सजा हुई है। निमोरा के इस वीभत्स हत्याकांड पर से जब पर्दा हटेगा तब संभव है यह या तो टीन एजर्स के बीच अवैध संबंधों को लेकर की गई हत्या का मामला निकले या फिर आपसी रंजिश अथवा चोरी की गरज से घर में घुसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा की गई हत्या का मामला। जो भी हो इस अंधे तिहरे हत्याकांड की गुत्थियों को सुलझाना छत्तीसगढ़ पुलिस के लिये एक चुनौती है। मगर बात साफ है कि इस पूरे हत्याकांड में हत्यारा गांव में ही कहीं मौजूद है, और छुट्टा घूम कर सारी गतिविधियों का जायजा ले रहा है। पुलिस को शायद आज या कल अथवा एक दो दिन और इस मामले में इंतजार करना पड़ सकता है।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

उनका पेट नहीं भरता!

रायपुर,शनिवार दिनांक 21 अगस्त 2010

उनका पेट नहीं भरता!
यह कैसी जिद? क्यों चाहते हैं सांसद भारत सरकार के सचिव से एक रूपये ज्यादा वेतन। और वेतन बढ़ाने की मांग पर यह कैसी राजनीति? संसद में अपना वेतन बढ़ाने के लिये गैर भाजपा सांसदों ने जो तरीका अपनाया क्या वह इन सांसदों के क्षेत्र के लोगों की भावनाओं के अनुरूप है? सांसद मुलायम सिंह हो या लालूप्रसाद यादव जन सेवा के लिये यह सांसद ग़रीबों के मसीहा बनने में कभी पीछे नहीं हटते, लेकिन जिस तरह यह करोड़पति सांसद अपनी जन सेवा का दाम लगा रहे हैं। यह तो यही दर्शा रहा है कि इन्हें अपने आगे पीछे घूमने वाली जनता से ज्यादा अपने व अपने परिवार की खुशहाली की चिंता है। केन्द्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को सांसदों का वेतन तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ा दिया लेकिन गैर भाजपा सांसदों को यह वृद्धि मंज़ूर नहीं। वे इसे कम आंकते हुए वेतन बढ़ाकर अस्सी हजार एक रूपये रखने की मांग कर रहे हैं। यह वेतन भारत सरकार के सचिवों के वेतन से एक रूपये ज्यादा है। अभी बढ़ा वेतन, कार्यालय खर्च, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और पेंशन मिलाकर वेतन करीब डेढ़ लाख रूपये तक पहुंच जायेगा। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि सांसदों के वेतन में बढ़ोत्तरी से प्रजातांत्रिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है। सांसदों का वेतन बढ़ाने का अर्थ यह हुआ कि निचले स्तर तक की संपूर्ण व्यवस्था में लगे लोग अब एक तरह से नई वेतन वृद्धि के हक़दार हो गये। क्या इसका असर देश की विधान सभाओं, नगर निकायों और अन्य सार्वजनिक संस्थानो पर नहीं पड़ेगा? पिछली बार विधायकों ने वेतन वृद्वि की मांग उठाई थी। इस बार यह मांग सांसदों की तरफ से उठी और उन्होंने इसे मनवा भी लिया। अब अलग- अलग प्रदेशों के विधायकों की तरफ से यह मांग उठे गी और इसको सदन में सर्वसम्मति मिलेगी। चूंकि पूरे भारत में एक यही मामला ऐसा है जिसपर सभी एक हो जाते हैं। इस बढ़ोत्तरी से देश में चुनाव लड़ने के तौर तरीके में भारी परिवर्तन की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । राजनीति एक तरह से नौकरी का रूप ले बैठी है। लोग पचास हजार रूपये मासिक वेतन और भत्ता पाने के लिये एक दूसरे का सर फोडऩे लगेगें। यूं ही बेरोज़गारी से तंग युवकों के लिये एक तरह से सरकार ने राजनीति को उद्योग का रूप देकर जनता के सामने पेश कर दिया है। जिसमें जितनी कूबत हो वह सामने आये और मुकाबला करें और लाटरी अपने हाथ कर ले। असल बात तो यह है कि सरकार ने अब चुनाव में हिंसा को आमंत्रित कर लिया है। सांसदों का वेतन अस्सी हजार एक करने की मांग को लेकर शुक्रवार को जो कुछ संसद में हुआ वह अभूतपूर्व था। धरना और मोक पार्लियामेंट आयोजित कर उन सांसदों ने लालू को अपना प्रधानमंत्री घोषित कर सरकार को बर्खास्त करने जैसी कार्रवाई की। यह सब अन्य राजनीतिक दल मजा लेकर देखते रहे शायद, यह सोचकर कि उनके इस विरोध का लाभ उन्हें भी तो मिलेगा।

भूखी नंगी जनता के चेहरे पर करारा तमाचा!

रायपुर शनिवार।दिनांक 21 अगस्त 2010

भूखी नंगी जनता के चेहरे पर
माननी यों का करारा तमाचा!
पटरियों पर फेंका हुआ झूठा भोजन हो या किसी आलीशान पार्टी से कूड़े दान में फेंका गया धूल मिट्टी से सना खाना - इसे खाने वाले इस देश में लाखों- करोड़ों की संख्या में भूखे- नंगे हैं। चूंकि यह इंडिया है जहां आम आदमी को दो जून की रोटी के लिये कुछ यूं ही मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन इन भूखे- नंगों की जिंदगी को संवारने का ठेका जिन हाथों में सौंपा गया ह,ै वे क्या कर रहे हैं? दिल्ली में मौजूद हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के चरम पर बैठकर इस भूखी- नंगी जनता को अंगूठा दिखा कर मुंह चिढ़ा रहे हैं। कल तक उन्हें इस जनता को दल दल से निकालने के लिये सोलह हजार रूपये मासिक दिया जाता था लेकिन अपनी हर बात मनवाने के काबिल इस वर्ग ने जनता की जेब पर ऐसा झपट्टा मारा कि इनकी जेब हर माह अब पचास हजार रूपये से भरने लगेगी। इसमें वह पैसा शामिल नहीं है जो इन्हें भत्तों और सुविधाओं के रूप में प्राप्त होगा। मंहगाई के बोझ से बुरी तरह दबी जनता को जब सांसदों की इस खुशख़बरी का पता चला तो उनका पहला सवाल था इन्हें वेतन की क्या जरूरत ? पहले से करोड़पति और अरब पति बने बैठे इस समूह की वेतनवृद्वि पर जनता यह भी पूछती है कि क्या ये कोई सरकारी नौकर हैं जो इनका वेतन जब चाहे तब उनकी अपनी ही समिति बनाकर बढ़ा दिया जाता है? तीन चार साल पहले ही माननीयों के वेतन में वृद्वि की गई थी। उसके बाद अचानक उनके चूल्हे में कहां से पानी पड़ गया कि घर- परिवार सब मंहगाई के जाल में फंस गया और वेतन बढ़ाने एक जुट हो गये। सरकारी व मलटीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों के वेतन में बा मुश्किल दो से तीन हजार रूपये की वृद्धि होती है, किंतु हमारे माननी यों के वेतन में चैतीस हजार रूपये का इज़ाफा कर ग़रीबों के मुंह पर ऐसा तमाचा मारा कि इसकी गूँज पूरे भारत सहित विश्व में गूँज रही है। इतना होने के बाद भी बेशर्मी से संसद में इस मामले में हंगामा कर इन कथित माननी यों ने जनता को अपना असली चेहरा दिखा दिया। यह तो हमारे माननी यों का हाल है। उनकी पार्टियों पर भी एक नजर हाल ही पड़ी । जब यह पता चला कि पार्टियों ने देश की जनता की जेब में डाका डालकर इतना पैसा अर्जित कर लिया कि ब्रिटेन जैसा देश भी शरमा गया। भारत की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, विपक्षी पार्टी भाजपा और यूपी की रूलिंग पार्टी के पास इतना पैसा है कि उसके आगे ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियाँ भी कहीं नहीं टिकती। ये हैं गरीब भारत के सेवक?

भूखी नंगी जनता के चेहने पर तमाचा!

रायपुर शनिवार।दिनांक 21 अगस्त 2010

भूखी नंगी जनता के चेहने पर
माननीयों का करारा तमाचा!
पटरियों पर फेंका हुआ झूठा भोजन हो या किसी आलीशान पार्टी से कूड़े दान में फेंका गया धूल मिट्टी से सना खाना - इसे खाने वाले इस देश में लाखों- करोड़ों की संख्या में भूखे- नंगे हैं। चूंकि यह इंडिया है जहां आम आदमी को दो जून की रोटी के लिये कुछ यूं ही मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन इन भूखें- नंगों की जिंदगी को संवारने का ठेका जिन हाथों में सौंपा गया ह,ै वे क्या कर रहे हैं? दिल्ली में मौजूद हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के चरम पर बैठकर इस भूखी- नंगी जनता को अंगूठा दिखाकर मुंह चिढ़ा रहे हैं। कल तक उन्हें इस जनता को दलदल से निकालने के लिये सोलह हजार रूपये मासिक दिया जाता था लेकिन अपनी हर बात मनवाने के काबिल इस वर्ग ने जनता की जेब पर ऐसा झपट्टा मारा कि इनकी जेब हर माह अब पचास हजार रूपये से भरने लगेगी। इसमें वह पैसा शामिल नहीं है जो इन्हें भत्तों और सुविधाओं के रूप मेंं प्राप्त होगा। मंहगाई के बोझ से बुरी तरह दबी जनता को जब सांसदों की इस खुशखबरी का पता चला तो उनका पहला सवाल था इन्हें वेतन की क्या जरूरत ? पहले से करोड़पति और अरबपति बने बैठे इस समूह की वेतनवृद्वि पर जनता यह भी पूछती है कि क्या ये कोई सरकारी नौकर हंै जो इनका वेतन जब चाहे तब उनकी अपनी ही समिति बनाकर बढ़ा दिया जाता है? तीन चार साल पहले ही माननीयों के वेतन में वृद्वि की गई थी। उसके बाद अचानक उनके चूल्हे में कहां से पानी पड़ गया कि घर- परिवार सब मंहगाई के जाल में फंस गया और वेतन बढ़़ाने एक जुट हो गये। सरकारी व मलटीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों के वेतन में बामुश्किल दो से तीन हजार रूपये की वृद्वि होती है, किन्तु हमारे माननीयों के वेतन में चैतीस हजार रूपये का इजाफा कर गरीबों के मुंह पर ऐसा तमाचा मारा कि इसकी गंूंज पूरे भारत सहित विश्व में गूंज रही है। इतना होने के बाद भी बेशर्मी से संसंद में इस मामले में हंगामा कर इन कथित माननीयों ने जनता को अपना असली चेहरा दिखा दिया। यह तो हमारे माननीयों का हाल है। उनकी पार्टियों पर भी एक नजर हाल ही पड़ी । जब यह पता चला कि पार्टियों ने देश की जनता की जेब में डाका डालकर इतना पैसा अर्जित कर लिया कि ब्रिटेन जैसा देश भी शरमा गया। भारत की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, विपक्षी पार्टी भाजपा और यूपी की रूलिंग पार्टी के पास इतना पैसा है कि उसके आगे ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियां भी कहीं नहीं टिकती। ये हैं गरीब भारत के सेवक?

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

अडियल कृषि मंत्री

रायपुर,शुक्रवार दिनांक 20 अगस्त 2010

अडियल कृषि मंत्री
मर जायेंगे, मिट जायेंगे मगर अपनी ज़मीन खाली नहीं करेंगे -यह अब तक सुनते आ रहे हैं लेकिन अब सरकार की तरफ से जो कहा जा रहा है वह है-गोदामों में पड़ा अनाज भले ही सड़ जायें और गरीब मर जा ये, फिर भी हम उसे फ्री में नहीं बांटेंगे। भारत की सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा देश के गोदामों में खचाखच भरे अनाज को ग़रीबों में मुफ्त बांटने के निर्देश के बाद केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का यह बयान आया है। माननीय पवार जी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को सरकार के लिये कोई आदेश नहीं मानते और कहते हैं कि अनाज गोदामों में पड़ा- पड़ा सड़ जा ये, मगर सरकार इसे मुफ्त में नहीं बांटेगी। केन्द्र के गोदामों में 608.79 लाख टन अनाज इस समय ठूंस ठूंस कर भरा हुआ है, इसमें से कुछ तो सडऩे भी लगा है। सरकार को इमर्जेंसी के लिये एक जुलाई तक केन्द्रीय पूल में 269 लाख टन अनाज होना चाहिये था। ऊपर दिखाये गये आंकड़े यह स्पष्ट बताते हैं कि इतना अनाज भरकर रख लिया गया है कि वह मुफ्त में बाँटा जा ये तो भी लेने वाले कम पड़ सकते हैं । फिर यह अनाज ग़रीबों और मध्यमवर्ग के लोगों को मुफत नहीं तो कम से कम सस्ते में बांटने में क्या हर्ज है? अब तक यह संभावना थी कि देश के कई इलाकों में बारिश नहीं होने या बाढ़ की स्थिति के कारण अनाज का संकट पैदा हो सकता है, लेकिन अब यह दोनों ही स्थिति टल चुकी है। ऐसे में सरकार को इसे बांटने में क्या परेशानी है? सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार का यह तर्क भी सही है कि वह अंत्योदय योजना के तहत सोलह रूपये में गेहूं खरीदकर लोगों को दो रूपये किलो पर गेहूं मुहैया करा रही है। पी डीएस में भी सरकारी अनाज कम दाम में ही उपभोक्ताओं को सुलभ करा रही है, किंतु सवाल यहां यह उठता है कि जब अनाज गोदामों में क्षमता से ज्यादा भरा पड़ा है, तो उसे गोदामों में रख कर क्यों सड़ाया जा रहा है? उसे खुले बाजार में बेचने के लिये क्यों नहीं दिया जा रहा। प्रति साल बारिश के दौरान बाहर रखा लाखों टन अनाज सड़ जाता है। न केवल सड़ता है बल्कि चूहे, दीमक और अन्य कीड़े- मकोड़े बर्बाद कर देते हैं। सरकार इस मामले में क्यों संवेदनशील नहीं है कि यह अनाज ऐसी स्थिति में पहुंचने से पहले आम लोगों के लिये खुले बाजार में बांटने के लिये दे दें। इसमें सरकार का बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होने वाला? जबकि गोदामों में खुले पड़े अनाज के पानी में भींग ने और चूहों तथा कीड़े-मकोडों के खाने और सरकार के कतिपय कर्मचारियों के भ्रष्टाचार से जो नुकसान होता है। वह ग़रीबों व मध्यम वर्ग को बांटने के लिये कथित रूप से होने वाले नुकसान से कई गुना ज्यादा है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए गोदामों में क्षमता से ज्यादा भरा पड़ा अनाज तुरंत आम जनता के लिये बाजार में उतारना चाहिये जिससे मंहगाई से राहत मिलेगी। साथ ही एक संतुलन भी बना रहेगा। जितना अनाज सरकार बाहर निकाले उससे कई गुना ताज़ा अनाज वह गोदामों में भी तो भर सकती है। अनाज को गोदामों में भरकर सड़ाने का औचित्य क्या है?

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

उबाऊ प्रजातांत्रिक व्यवस्था,

रायपुर शुक्रवार।दिनांक 20 अगस्त 2010

उबाऊ होती जा रही है वर्तमान प्रजातांत्रिक
व्यवस्था,क्यों न हो डायरेक्ट इलेक्शन?
हमारे जन प्रतिनिधि, उन्हें देखिये! वे क्या कर रहे हैं? नौकरशाह- उन्हें देखो वह करोड़ों का मालिक बन बैठा है, नेता, उसके पास कई पुश्तों को खिलाने लायक संपत्ति.. व्यापारी,उद्योगपति उसकी तिजोरियां कभी खाली होती ही नहीं। गुण्डागर्दी, चोरी,सीनाजोरी, आंतक और समय के प्रति गंभीरता का खात्मा जैसी बुराइयों ने संपूर्ण व्यवस्था को अपनी लपेट में ले लिया है। अभी दो रोज पहलेंं ही खबर आई कि राजनीतिक दलों की तिजोरियां इस समय पैसे से लबालब हैं। इसमें नम्बर एक पर केन्द्र में सरकार चला रही पार्टी -कांग्रेस है, जिसके खज़ाने में सर्वाधिक राशि जमा है। जबकि दूसरे नम्बर पर बहुजन समाज पाटीै। और पार्टियों भी पैसे एकत्रित कर अपना खजाना भरने में पीछे नहीं हैं। राजनीति का दूसरा अर्थ पैसा कमाना और अपने व अपने परिवार को इस लायक बनाना है कि कहीं किसी को कोई तकलीफ़ न हो। जब राजनीति के ये मायने हो गए तो स्वाभाविक है उसमें लिप्त लोग भी सिर्फ एक ही मकसद को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। मसलन अपना व अपने परिवार को समृद्व बनाओं, देश व जनता, जिसकी सेवा की कसम खाकर सुनहरे कल की ओर पहुंचे हैं वह गई चूल्हें मेंं- किसी को इसकी चिंता नहीं कि देश की जनता किन- किन परिस्थितियों में अपने व अपने परिवार का पेट पाल रही है। देश की जनता इतनी बेबस व मजबूर हो गई है कि नेता के कहने पर उठता है, और नेता के कहने पर उसके चरणों में लोट जाता है, और इससे भी दिल नहीं भरा तो उसके गुणगान में जिंदा बाद के नारे लगाता हुआ अपना घर बर्बाद कर डालता है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का किस प्रकार माखौल उड़ रहा है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं-सारा काम उसकी आंखों के सामने हो रहा है। आज भी आपने बहुत कुछ आपने- अपने टीवी स्क्रीन पर देखा होगा। जनता को चुनाव के बाद पांच साल के लिये बांध दिया जाता है। उसके मतों की सजा उसे इतनी मिलेगी, इसकी कल्पना भी उसने नहीं की होगी। हम अपने प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कोस कर सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि हमने जो रास्ता इस व्यवस्था को चलाने के लिये कायम किया वह सही नहीं है। हमें चाहिये थी एक ऐसी प्रजातांत्रिक प्रणाली जो जनता की आयाज़ बनकर संसद और विधानसभा के गलियारों में गूँजे। हम आज जिन्हें अपना नेता चुन रहे हैं, उसे हम अपना नेता नहीं बल्कि एक समूह का नेता ही कह पा रहे हैं। क्योंकि हमारे बहुमत का एक हिस्सा तो उसे इस पद के लायक ही नहीं मानता। इसके लिये जरूरी है प्रजातंत्र की ही एक दूसरी प्रणाली जो अमरीका के प्रत्यक्ष चुनाव की तरह हो जिसमें नेता का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से भारी बहुमत से हो वह चाहे देश का राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री अथवा राज्य का मुख्यमंत्री सभी का चयन सीधे- सीधे उसकी लोकप्रियता, उसकी ईमानदारी, देशप्रेम पर आधिारित हो, न कि किसी एक समूह की पसंद पर। इस निर्वाचित व्यक्ति या उसके द्वारा मनोनीत व्यक्ति के पास इतने अधिकार हों कि वह देश की काया पलट दें। अब जब सारी बुराइयां वर्तमान प्रजातांत्रिक प्रणाली में मौजूद हैं। तब यह जरूरी है कि एक नई व्यवस्था जन्म ल,े ताकि सारी उन बुराइयों का खात्मा हो जो आज पूरे तंत्र में घर कर गई है। हम पूछना चाहते हैं कि इस वर्तमान व्यवस्था में हो क्या रहा है? नगर निकाय से लेकर विधानसभा और संसद तक सर्वत्र जो मर्जी में आता है वह किया जा रहा है। सबको किसी न किसी तरह से पैसा चाहिये। अगर नहीं मिलता तो वेतन -भत्ता बढ़वा लों, कोटा बढ़वा लो या कहीं ठेके में करोड़ों रूपये की लूट की खुली छूट दे दो।

पहुंच और रसूख के आगे बेबस इंसान!

रायपुर गुरूवार। दिनांक 19 अगस्त 2010 ,
पहुंच और रसूख के आगे बेबस
होता जा रहा आम इंसान!
उत्तर भारत के दो प्रमुख दो शहरों से पिछले दिनों आई दो खबरों ने आम आदमी को उद्वेलित कर यह सोचने के लिये विवश कर दिया कि वह आखिर जिये तो जिये कैसे? पहली खबर थी कि कुछ दबंगों ने, जिसमें कुछ नेता भी शामिल थे एक इंसान को खूब पीटा उसके बाद उसे जीप में बाँधकर घसीटा गया। इस इंसान के खून की स्याही सूखी भी नहीं थी कि एक अन्य खबर आई कि रसूखदार रईसजादियों ने प्रमुख मार्ग पर एक दूसरे से आगे निकलने के लिये कार रेसिंग की और सड़क पर चल रहे एक इंजीनियरिंग छात्र और उसके भाई को कुचल दिया। इंजीनियर तो घटनास्थल पर ही मौत के आगोश में समा गया लेकिन भाई को इस हालत में भर्ती किया गया जो पुलिस को घटना का पूरा बयान दे सकता है। घटना के बाद रईसजादी दुर्घटनाग्रस्त कार को छोड़कर अपनी सहेली की कार से भाग गई। पुलिस ने पता लगाया तो मालूम पड़ा कि यह कार एक कर्नल की थी तथा कार को उसकी लड़की चला रही थी। लड़की को गिरफतार करने की जगह उसको बचाने का सारा खेल शुरू हो गया। क्या कहते हैं आप ऐसी घटनाओं के बारे में? आपका उत्तर भी हम ही दे देते हैं- आप और हम सब बेसहारा हैं। ऐसे मामलों में जहां पहुंच, पैसा और शोहरत मौजूद रहती है। कानून जिसे अपना काम करना रहता है, वह भी इन सबके सामने बेबस हो जाता है। पुलिस तक पीड़ित के पहुंचने से पहले ही रसूखदारों का उन्हें बचाने का खेल शुरू हो जाता है। पहले तो कानूनी प्रक्रिया को इतना टालने का प्रयास किया जाता है कि उस अवधि में आरोपी को अदालत से जमानत मिल सके और वह कानून के चक्कर में न पड़े। संपूर्ण देश इस तरह के खेल से अटा पड़ा है। चाहे वह दिल्ली की सड़क हो चाहे मुम्बई की या महानगर की तरह विकसित होते रायपुर शहर की बात । सभी जगह इस तरह के हरकतबाजों ने आम आदमी की जिंदगी को सस्ता बना दिया है। फिल्म अभिनेता सलमान खान ने सड़क में नशे में धुत्त होकर सड़क पर सो रहे कई लोगों को कुचल दिया वहीं दिल्ली की सड़क पर एक उद्योगपति के रईसजादे पुत्र ने भी कई लोगों को कुचला। हालांकि हर जगह कानून ने अपना काम किया किन्तु इन मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण है कि एक आम आदमी जब कहीं भूल से भी इस तरह की गलती करता है, तो उसे कि स तरह की कानूनी पेचीदगियों से गुजरना पड़ता है। वहीं इन रईसजादों के लिये तो जैसे कानून इनकी मुटठी में रहता है, चाहे तो वे किसी आम आदमी को अपनी जीप या अन्य वाहन से खींचकर उसका काम तमाम करें। समाज में आये इस बदलाव ने संपूर्ण कानून व्यवस्था की ईमानदारी और निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि वह एक निष्पक्ष तथा समान कानून व्यवस्था कायम करने के लिये क्यों नहीं प्रयास करता? अमीर और पहुंच वालों के लिये एक कानून और आम आदमी के लिये दूसरा कानून... क्या हम देश के संविधान के भीतर हैं या हमारे ऊ पर जो व्यवस्था है, वह करती कुछ है और दिखाती कुछ?

हिंसा से शांति की ओर..

रायपुर,गुरूवार दिनांक 19 अगस्त 2010

हिंसा से शांति की ओर..
क्या माओवादी हिंसा छोड़कर मुख्य धारा से जुडेंगे? इस प्रश्न का उत्तर इतना आसान नहीं जितना हम समझते हैं। स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में माओवादियों से हिंसा छोड़ बातचीत की अपील का प्रति साद अच्छा निकला है। माओवादी चाहते हैं कि रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी की मध्यस्थता में यह बातचीत हो। इस आधार पर नक्सलियों से बातचीत की पहल हो तो आश्चर्य नहीं। माओवादियों ने वार्ता की पहली शर्त के तौर पर तीन महीने के संघर्ष विराम का प्रस्ताव रखा है। अगर वार्ता होती है तो संघर्ष विराम के प्रस्ताव को मानने में सरकार को कोई परेशानी नहीं होगी। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने लाल गढ़ की रैली में माओवादियों की उस मांग का समर्थन किया था जिसमें उन्होंने माओवादी नेता आज़ाद की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मौत की जांच की मांग की थी। ममता ने माओवादियों से हिंसा छोड़ शांति के साथ भारतीय संविधान के तहत प्रमुख धारा से जुड़ने की अपील भी की थी। नक्सली नेता किशनजी ने अब सरकार के शांति पहल की तरफ कदम बढा़ते हुए तीन महीने के संघर्ष विराम की बात कही है। फिलहाल वार्ता का कोई एजेण्डा तैयार नहीं है लेकिन राजनीतिक दलों की तरफ से जो प्रतिक्रियाएँ आ रही है। वह इस कदम को आगे बढऩे से रोक सकती है। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने ममता बनर्जी को मध्यस्थ बनाने की बात पर यह कहा है कि इससे यह साबित होता है कि नक्सली और तृणमूल कांग्रेस मिलकर काम करते हैं। वैसे देखा जा ये तो नक्सलियों से शांति वार्ता की पहल का सभी वर्ग को स्वागत करना चाहिये। चूंकि यह समस्या इतनी उग्र रूप ले चुकी है कि अब इस पर अगर बातचीत की बात उठती है, तो इस पर कुछ ठोस कदम भी उठाना चाहिये। चूंकि अब तक जो लोग सिर्फ बंदूक की भाषा से बातचीत करते रहे हैं उनके मुंह से अब शांति की बात निकलने लगी है तो इसमें अकेली ममता बनर्जी को ही क्यों मध्यस्थ बनाया जाए। उनके साथ देश की उन सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को भी शामिल किया जा ये जो नक्सली हिंसा को पसंद नहीं करते। नक्सली भी अपने साथ अपने प्रमुख साथियों को मिलायेंगे यह निश्चित है। ऐसे में हिंसा त्यागने वाली बातचीत कहां तक सफल होगी, यह देखना महत्वपूर्ण है। इससे पहले यह भी देखना होगा कि सरकार नक्सलियों के प्रस्तावों को कितना स्वीकार करती है? नक्सलियों का यह प्रस्ताव कोई चाल तो नहीं है, इस पर भी लोग संदेह कर रहे हैं। सरकार के सामने अहम जिम्मेदारियां हैं। एक लम्बे अर्से से चल रहे इस हिंसक आंदोलन पर पहली शांति वार्ता क्या रंग लायेगी? यह तो अभी से नहंीं कहा जा सकता किंतु इस वार्ता की सफलता- असफलता पर ही आंदोलन का पूरा दारोमदार टिका हुआ है।

हिंसा से शांति की ओर..

रायपुर,गुरूवार दिनांक 19 अगस्त 2010

हिंसा से शांति की ओर..
क्या माओवादी हिंसा छोड़कर मुख्य धारा से जुडेंगे? इस प्रश्न का उत्तर इतना आसान नहीं जितना हम समझते हैं। स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन मेें माओवादियों से हिंसा छोड़ बातचीत की अपील का प्रतिसाद अच्छा निकला है। माओवादी चाहते हैं कि रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बेनर्जी की मध्यस्थता में यह बातचीत हो। इस आधार पर नक्सलियों से बातचीत की पहल हो तो आश्चर्य नहीं। माओवादियों ने वार्ता की पहली शर्त के तौर पर तीन महीने के संघर्ष विराम का प्रस्ताव रखा है। अगर वार्ता होती है तो संघर्ष विराम के प्रस्ताव को मानने में सरकार को कोई परेशानी नहीं होगी। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बेनर्जी ने लालगढ़ की रैली में माओवादियोंं की उस मांग का समर्थन किया था जिसमेंं उन्होंने माओवादी नेता आजाद की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत की जांच की मांग की थी। ममता ने माओवादियों से हिंसा छोड़ शांति के साथ भारतीय संविधान के तहत प्रमुख धारा से जुडऩे की अपील भी की थी। नक्सली नेता किशनजी ने अब सरकार के शांति पहल की तरफ कदम बढा़ते हुए तीन महीने के संघर्ष विराम की बात कही है। फिलहाल वार्ता का कोई एजेण्डा तैयार नहीं है लेकिन राजनीतिक दलों की तरफ से जो प्रतिक्रियाएं आ रही है। वह इस कदम को आगे बढऩे से रोक सकती है। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने ममता बेनर्जी को मध्यस्थ बनाने की बात पर यह कहा है कि इससे यह साबित होता है कि नक्सली और तृणमूल कांग्रेस मिलकर काम करते हैं। वैसे देखा जाये तो नक्सलियों से शांति वार्ता की पहल का सभी वर्ग को स्वागत करना चाहिये। चूंकि यह समस्या इतनी उग्र रूप ले चुकी है कि अब इस पर अगर बातचीत की बात उठती है, तो इस पर कुछ ठोस कदम भी उठाना चाहिये। चंूकि अब तक जो लोग सिर्फ बंदूक की भाषा से बातचीत करते रहे हैं उनके मुंह से अब शांति की बात निकलने लगी है तो इसमें अकेली ममता बेनर्जी को ही क्यों मध्यस्थ बनाया जाए। उनके साथ देश की उन सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को भी शामिल किया जाये जो नक्सली हिंसा को पसंद नहीं करते। नक्सली भी अपने साथ अपने प्रमुख साथियों को मिलायेंगे यह निश्चित है। ऐसे में हिंसा त्यागने वाली बातचीत कहां तक सफल होगी, यह देखना महत्वपूर्ण है। इससे पहले यह भी देखना होगा कि सरकार नक्सलियों के प्रस्तावों को कितना स्वीकार करती है? नक्सलियों का यह प्रस्ताव कोई चाल तो नहीं है, इस पर भी लोग संदेह कर रहे हैं। सरकार के सामने अहम जिम्मेदारियां हैं। एक लम्बे अर्से से चल रहे इस हिंसक आंदोलन पर पहली शांति वार्ता क्या रंग लायेगी? यह तो अभी से नहंीं कहा जा सकता किन्तु इस वार्ता की सफलता- असफलता पर ही आंदोलन का पूरा दारोमदार टिका हुआ है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

गेंगरेप

अब भी मौजूद हैं रायपुर में जिस्म
को नोंच खाने वाले दरिन्दे

रायपुर शनिवार 8 मई 2010

छै दरिन्दो ने क्रूरता से एक युवती की इज्जत रौंदकर उसे मौत के घाट उतार दिया और रायपुर पुलिस सोती रही। एक महीने बाद उसका सुराग लगा तो अब बताया जा रहा है कि उसके साथ गैंग रेप हुआ। इस मामले में न मानव अधिकार के प्रणेताओ ने कुछ बोलना उचित समझा और न ही हर छोटे मोटे मामले में बढ चढ़कर बोलने वाली महिलाओं की हित रक्षक संस्था ने। अब इस युवती को विक्षिप्त बताकर सारे मामले को रफा दफा करने का प्रयास किया जा रहा है। घटना पर एक नजर डाले तो इस मामले की वीभत्सता और रायपुर में मौजूद दरिन्दों की दरिन्दगी का खुलासा होता है-घटना कम से कम एक माह पुरानी है जैसा पुलिस का अनुमान है- युवती धमतरी से रायपुर के मोतीबाग क्षेत्र में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने अपने किसी साथी युवक के साथ आई थी। उसने तो उसके साथ रेप किया ही साथ ही उसके और पांच साथियों ने भी उसको नहीं छोड़ा। गैंग रेप की असहनीय पीड़ा से इस युवती ने थोड़ी ही देर में प्राण त्याग दिये। नौ अप्रैल को पुलिस ने लावारिस हालत में उसकी लाश को बरमद किया। एक दूसरा पक्ष यह बताता है कि युवती अपनी कुछ सहेलियों के साथ आई थी और दरिन्दों का शिकार हो गई। एक तीसरा पक्ष भी है कि वह विक्षिप्त थी और मोतीबाग क्षेत्र में भटक रही थी तथा दरिन्दों के हाथ पड़ गई। क्या सही है यह अब अन्वेषण का विषय है। भले ही युवती की हत्या के कोई चिन्ह नहीं हैं लेकिन रेप के दौरान हुई क्रूरता से उसकी मौत को हत्या माना जा सकता है। युवती की लाश के पोस्टमार्टम और पता ठिकाने के बाद पुलिस अब दरिन्दों की खोज में हैं। खबर है कि एक को पकड़ लिया और बाकी की खोज की जा रही है किन्तु रायपुर को शर्मसार कर देने वाली इन घटनाओं ने सभ्य समाज को सोचने के लिये मजबूर कर दिया है कि ऐसेे दरिन्दों के लिये समाज में क्या स्थान होना चाहिये। रायपुर के बैरन बाजार में वर्षाे पूर्व श्वेता शर्मा बलात्कार हत्याकांड से शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। आये दिन महिलाओ ंकी लावारिस लाश मिलना और खानापूर्ति कर उसका खात्मा डाल देना पुलिस की नियति बन गई है। अभी कम से कम दो साल पहले नंदनवन मार्ग पर अटारी के पास दुर्ग जा रही एक दंपत्ति से भी इसी तरह छै लोगो ने मारपीट कर पत्नी से बलात्कार किया था। इसके जख्म को ताजा करने वाली इस नई घटना को अब तक मामूली तौर पर लेना यही दर्शा रहा है कि हमारी संवेदनाएं मर चुकी है। नंदनवन की घटना में गिरफतार युवक सजा पाकर जेल में हैं-इन दरिन्दो को पुलिस ने जनता के बीच घुमाकर दूसरे अपराधियों को भी सबक सिखाया था किन्तु मोतीबाग की घटना में जिस ढंग से कार्रवाई धीरे धीरे हो रही है और आम लोगों की इस मामले में जो शांत प्रतिक्रिया है वह अपराधियों की हौसला अफजाई ही कर रही है। क्यों नहीं समाज ऐसे मामलों मे आगे बढ़ता? इस ढंग का घृणित और अमानवीय अपराध करने वालें को कठोर से कठोर दंड देने के लिये प्रयास करना चाहिये।

सजा-ए मौत

शुक्रवार दिनांक 7 मई 2010
सजा-ए मौत
फांसी पर लटकाना भी
तो इतना आसान नहीं

जहां तक हमारी जानकारी है देश में आखिरी फांसी कोलकत्ता में धनजंय को लगी थी जिसपर एक युवती से बलात्कार के बाद उसकी हत्या का आरोप था। उसे फांसी देने के लिये जल्लाद को बामुश्किल तैयार किया गया तत्श्चात उसने ऐलान कर दिया कि यह उसकी आखिरी फांसी है इसके बाद वह किसी को फांसी नहीं देगा। ऐसा नहंीं कि धनंजय की फांसी के बाद देश में अदालतों ने भी फांसी का निर्णय देना बंद कर दिया। 2009 दिसंबर को लोकसभा में गृह राज्य मंत्री मुल्लापल्ली रामचंन्द्रन द्वारा दी गई सूचना के अनुसार पूरे देश में 31 दिसंबर 2007 तक तीन सौ आठ लोग अदालतों से क्लियरेंस पाकर फंदे का इंताजार कर रहे थे। अब तक यह संख्या और बढ़ गई हो सकती है चूंकि इस अवधि में कई दोषियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। हम यह बात हाल ही कसाब को दी गई फांसी के संदर्भ मेें बता रहे हैं। हालाकि मुम्बई के इस आंतकवादी को विशेष अदालत ने फांसी की सजा सुना दी है औैर लोग खुश भी हो रहे हैं कि इस दरिन्दे को फंासी की सजा हुई मगर फांसी की लम्बी सूची देखकर हम कह सकते हैं कि कसाब को इतनी आसानी से और जल्दी फांसी संभव नहीं है। अभी उसने यदि इस फैसले के खिलाफ अपील की तो हाईकोर्ट में मुकदमा जायेगा। हाईकोर्ट में अगर वह नहीं जाता तो उस स्थिति में भी मुम्बई हाईकोर्ट से विशेष अदालत के निर्णय पर ठप्पा लगावाना जरूरी होगा। हाईकोर्ट की मुहर के बाद कसाब इस फैसले के खिलाफ सूुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। यहां से भी उसकी फांसी बरकरार रही तो वह राष्ट्रपति के पास मर्सी पेटीशन दायर कर सकता है। इस समय राष्ट्रपति के पास करीब 52 लोगों की क्षमा याचिका विचारार्थ पड़ी हुई हैं। यदि वह क्षमा याचिका दायर करता है तो संसद पर हमले पर फ ंांसी की सजा भुगत रहे अफजल गुरू की तरह कतार में लग जायेगा जिसका नम्बर अभी सत्ताईस है। वर्तमान में देश की सर्वाेच्च न्यायालय में कम से कम दो सौ छप्पन मामले ऐसे हैं जिनकों निचली अदालतो के फै सले के समर्थन का इंतजार है। इसमें अंडर वल्ड डान टाइगर मेनन का भाई याकूब मेनन भी है जिसें सन् 2006 में आंतकवाद निरोधी विशेष अदालत ने सजाए मौत की सजा सुनाई थी। राष्ट्रपति से क्षमादान नहीं मिलने वाले फांसी पर कब लटकाये जायेंगे इसका कोई जवाब नहीं है लेकिन अब तक ऐसा कोई मामला आया भी नहीं। गृह मंत्रालय का कहना है कि उसने याचिकाओं को गृृह मंत्री के पास भेज दिय है जबकि दूसरा पहलू यह भी है कि फांसी के लिये अभी जल्लाद का भी अकाल पड़ा हुआ है। ऐसे में फंासी की सजा पाए लोगों को बंदूक की गोली से भी तो मौत के घाट उतारा जा सकता है। कुछ भी हो ऐसे लोगों का त्वरित निपटारा ही पीड़ितों के प्रति सच्चा न्याय होगा।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

लालगढ़ की लाली से श्वेत कबूतर पकडऩे


रायपुर मंगलवार। दिनांक 8 अगस्त 2010
एम.ए. जोसेफ
लालगढ़ की लाली से श्वेत कबूतर पकडऩे
ममता का प्रयास या कुछ ओर...
सोमवार को पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में आयोजित तृणमूल कांग्रेस की रैली को किस नजरिये से देखा जाये? क्या यह देश की राजनीति में एक नया समीकरण है या यूं ही आमतौर पर होने वाली एक रैली? इस रैली का राजनीतिक पहलू यह है कि रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता श्रीमती ममता बेनर्जी ने पहली बार माओवादी अथवा नक्सलियों की हिमाकत की व उन्हें इस रैली में शामिल किया। इसे एक उपलब्धि ही माना जा सकता है शायद कांग्रेस ने यही देखकर ममता का समर्थन किया है। नक्सली हिंसा का जहां तक सवाल है वह एक तरफ है तथा निंदन है लेकिन अब तक सरकार के सारे शांति प्रयासों को ठुकरा चुके नक्सलियों अथवा माओवादियों को एक मंच पर लाने व उन्हें सही राह पर लाने का प्रयास ममता ने किया तो कहीं इसमें गलती नजर नहीं आ रही प् इसमें उनका राजनीतिक मकसद हो सकता है लेकि न अब तक जो विफल प्रयास सरकार करती रही है उसमें यदि यह एक मील का पत्थर बन रहा है तो क्या बुराई है। ममता ने रैली में नक्सलियों का समर्थन किया है किन्तु उन्होनें उनकी हिंसा को पूरी तरह नकार दिया है यह कहते हुए कि आजाद को पुलिस ने फ र्जी मुठभेड़ में मारा है उसकी जांच होनी चाहिये। नक्सलियों व सरकार के बीच शांति की पेशकश करने वाले स्वामी अग्रिवेश, लेखिका महेश्वर तथा मेघापाटकर भी यही बात कर रही हैं। आजाद के मुठभेड़ में मारे जाने को फर्जी बताकर ममता ने नक्सलियों के अब तक इस मामले को लेकर उनके द्वारा की जा रही हिंसा को लगाम देने उनका समर्थन अपनी ओर खींचने में जहां बहुत हद तक कामयाबी पाई है वहीं यह भी संभव हो गया है कि वे माओवादियों को हिंसा के मार्ग को बदलकर मुख्य मार्ग में लाने विशिष्ट भूमिका निबाने की स्थिति में आ गई है। आगे आने वाले दिन इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ममता के इस कदम की विपक्ष के एक बड़े वर्ग ने नक्सलियों का समर्थक कहते हुए आलोचना की है किन्तु आलोचकों को इस पूरे मामले का विश्लेषण करके भी देखना चाहिये कि ममता बेनर्जी कहीं भी नक्सली हिंसा की बात नहीं कर रही है। वे भी हर कोई की तरह नक्सली हिंसा को नकारती है किन्तु इसके माध्यम से वे नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास भी कर रही हैं। इसका दूसरा पहलूू यह है कि कई राज्यों में सक्रिय नक्सलियों का समर्थन अपनी ओर खीचने के राजनीतिक मकसद में भी कामयाब हो गई। एक तरह से उन्होंने लालगढ़ फतह कर लिया। तृणमूल की इस रैली में भारी मात्रा में नक्सलियों की उपस्थिति साथ में कांग्रेस का समर्थन भविष्य में नक्सली मूवमेंट को या तो एक नई राह प्रदान करेगा जो शायद हिंसा की जगह शांति का हो सकता है। ममता बेनर्जी ने अपने इस मकसद के लिये लालगढ को चुना जो नक्सलियों का एक तरह से सबसे बड़ा गढ़ है। देशभर में नक्सली मूवमेंट अलग अलग समूहों में बंटा हुआ है-लालगढ़ की लाली इन अलग अलग मूवमेंट को एक दागे में पिरोने और उसे सही रास्ते पर लाने में कितनी कारगर होगी अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा।



षडय़ंत्र, शांति प्रस्ताव और कानून

रायपुर, शुक्रवार, दिनांक 13 अगस्त 2010

षडयंत्र, शांति प्रस्ताव और कानून में
बदलाव- मौजूद है हर जगह खोट!
अंडरवल्ड डॉन छोटा शकील की नक्सलियों से रिश्ता कायम करने की कोशिश, दूसरी खबर पुलिस को अब किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करने या न करने के लिये इसकी वजह बतानी होगी तथा स्वामी अग्रिवेश नक्सलियों को नेताओं से मिलाने की प्रक्रिया में बहुत हद तक कामयाब हो गये। इन तीनों खबरों में कहीं आशा है तो कहीं भय तो कहीं खुशी। जहां तक अडंरवल्ड डॉन का सवाल है,ऐसा लगता है इस व्यक्ति ने देश को तबाह करने का बीड़ा उठा लिया है। हाल ही कर्नाटक,आंध्रप्रदेश में पकड़े गये छह नक्सलियों ने रहस्योद्धाटन किया है कि उन्हें अंडरवल्ड की तरफ से भारत में अशांति फैलाने के लिये पच्चीस लाख रूपये दिये गये थे। यह नक्सली दुबई में अडंरवल्ड के लोगों से मुलाकात करने जाने से पहले ही हवाई अड्डे पर धर लिये गये। इसे भारतीय खुफ़िया एजेंसी की सफलता ही कहा जाना चाहिये कि उसने समय रहते इन्हें दबोच लिया वरना क्या होता... इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है। इस गिरफ्तारी से नक्सलियों की आतंकवादी संगठनों से सांठगांठ के अंदाज़ की एक तरह से पुष्टि हो गई। अब सरकार को नक्सलियों से बातचीत के स्वामी अग्रिवेश के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। नक्सली सिर्फ एक ही शर्त पर सरकार से बातचीत के लिये तैयार हो रहे हैं। उनकी शर्त है कि माओवादी नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ़ आज़ाद की मुठभेड़ में मौत की न्यायिक जांच कराई जाये। माओवादियों का कहना है कि आज़ाद को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया। बातचीत के बाद अगर सरकार न्यायिक जांच को मान भी जाती है तो नक्सलियों पर कैसे भरोसा किया जा ये कि वे इसके बाद हिंसा छोड़ देंगे-क्या शेर कभी माँस खाना छोड़ सकता है? नक्सलियों के मुंह में इंसान का खून लग चुका है। वे शायद इसके स्वाद को अब कभी नहीं छोड़ पायेगें, फिर भी सरकार को कोशिश करने में क्या हर्ज है। इधर भारतीय संसद में ध्वनि मत से पारित एक प्रस्ताव ने उन निर्दाष लोगों को जरूर राहत दिलाई है जो ज़बरदस्ती संदेह के दायरे में आकर गिरफ़्तार कर लिये जाते हैं-अब सरकार को इसका कारण बताना पड़ेगा कि उसे क्यों गिरफ़्तार किया जा रहा है लेकिन इससे पुलिस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। वह संदेह में अगर असल मुल्जिम को भी पकड़े गी तो उसे इसके लिये भी मशक्कत करनी पड़ेगी। नये बनने वाले नियम के अनुसार पुलिस को अब अज्ञेय अपराधों में संदिग्ध किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करने या न करने की वजह बतानी होगी। इसके लिये सीआरपीसी की धारा 141 में संशोधन किया जा रहा है। नये नियम की अनिवार्यता सिर्फ उन अज्ञेय अपराधियों के लिये तय की गई है जिसमे दोषी को कम से कम सात साल की सजा दी जाती है।

डाक्टरों पर शिकंजा!

डॉक्टरों पर शिकंजा!
मरीज़ों के परिवार को शीघ्र ही सरकार की तरफ से एक बहुत बड़ा तोहफ़ा मिलने जा रहा है। भविष्य में उन्हे अपने परिजनों के इलाज के लिये डॉक्टरों को मनमानी फ़ीस नहीं देनी पड़ेगी। सरकार यह तय करने जा रही है कि किस अॉपरेशन के लिये कितनी फ़ीस ज्यादा से ज्यादा ली जानी चाहिये। अगर किसी आदमी का गुर्दा बदलने के लिये या कोई कैंसर के इलाज के लिये दो लाख की जगह दस या पन्द्रह लाख रूपये मांगता है, तो यह अब नहीं चलेगा। अगर सरकार ने तय किया कि इस अॉपरेशन के लिये सिर्फ दो या पांच लाख रूपये ही लगेंगे तो मरीज़ो परिवार से चिकित्सक उससे ज्यादा की मांग नहीं कर सके गा। केन्द्र सरकार देश के सभी निजी अस्पतालों में अॉपरेशन और उपचार के लिये एक समान फीस तय करने जा रही है। डॉक्टरों की फ़ीस तय करने के लिये मेडिकल ट्रीटमेंट स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल नाम से दिशा- निर्देश जारी किये जायेंगे। इसके बाद इस नियम का पालन सभी चिकित्सकों को करना होगा। डॉक्टरों की फ़ीस पर पिछले कई वर्षाे से बहस चली आ रही है,इसकी विभिन्नता ने हर आदमी को परेशान कर रखा है। सरकारी अस्पतालों की मनमानी और अव्यवस्था से तंग लोग निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं। वहां उनसे सौदा उसी प्रकार होता है, जैसे किसी सब्जी मंडी या परचून दुकान में। आपका सौदा पटा तो ठीक वरना आगे कि दुकान में बढ़ जाओ-देश की गली- गली में नर्सिंग होम खुल गये हैं। कुछ तो अॉपरेशन में आदमी को चीरने के बाद मरीज़ से पैसा रखने को कहते हैं। कन्सलटेंटों का यह हाल है कि उनपर भी कोई लगाम नहीं है। मरीज के सबंन्धी की हैसियत देखकर पैसे की वसूली की जाती है। आज की परिस्थिति में इंसान सिर्फ तीन दुआएँ करता है-एक चिकित्सक के पास न जाना पड़े, दूसरा पुलिस के चक्कर में न पडऩा पड़े और किसी अदालत के चक्कर न काटना पड़े। यह तीनों ही उसकी जेब काटने वाले कारखाने हैं, जहां जाकर वह पिस जाता है। स्वास्थ्य केन्द्रों के पैथालाजी लैब,एनआरआई और अन्य स्कैनिंग टेस्ट भी अब सरकारी नियंत्रण में होंगे- इनमें भी जो मनमानी रकम वसूल की जाती है, उसपर इस नये दिशा- निर्देशों से अंकुश लगेगा। इन सबके बावजूद गरीब परिवारों को इन अस्पतालों के लेन देन से कैसे बचाया जाये इस पर फिलहाल कानून मौन है। किंतु वर्तमान दिशा- निर्देशों में कुछ ऐसा भी है कि जो नियम का पालन नहीं करेगा वह दंड संहिता के तहत सजा का हक़दार होगा।

कौन कर रहा है हमारी स्वतंत्रता का हनन?

रायपुर, बुधवार, दिनांक 11 अगस्त 2010

राजा महाराजाओं की तरह एक वर्ग
का क़ब्ज़ा है हमारी स्वतंत्रता पर !
उनके घरों में आपकी जेब से निकलने वाले पैसे से झाड़ू लगता है, उनके यहां का हर काम ठाठ- बाट से चलता है, यहां तक कि उनके बच्चों को गेाद में उठाकर खिलाने के लिये भी हमारे ही लोग लगे रहते हैं। और तो और जब उनकी सवारी लाल- पीली बत्ती लगकर सड़कों पर से निकलती हैं, तब हमें किसी कोने में खड़े रहना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे राजा महाराजाओं के जमाने में उनकी सवारी निकला करती थी- अब से मात्र चार दिनों बाद हम भारत के स्वतंत्रता की त्रेसठवीं साल गिरह मनाने जा रहे हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम वाक़ई स्वतंत्र हैं? क्या हमें देश के अपने लोगों ने ही गुलामी के बंधन में नहीं जकड़ रखा है? क्या हम यह महसूस नहीं करते कि देश में हमारे से भी बड़ा एक बहुत प्रभावशाली वर्ग विकसित हो गया हैं। जो न केवल हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रहा है बल्कि हमारे और हमारे बच्चों की ख़ुशियों को भी छीन रहा है? नौकरशाहों और राजनेताओं के इस वर्ग ने समाज को दो वर्गाे में बांटकर रख दिया है। सारे एशो- आराम का तो जैसे उन्होंने ही ठेका ले रखा है। घर से लेकर अ।फिस और सड़क तक यह वर्ग आम आदमी को कुछ समझता ही नहीं। पैसे और प्रभाव के गरूर ने इस वर्ग को अपने मूल मकसद जनता की सेवा से दूर कर दिया है। उसे वह कीड़े -मकोड़ा समझने लगा है। जब उनकी सवारी निकले तो हम रास्ते में उसी प्रकार सिर झुकाए घंटों खड़े रहें जैसा राजा- महाराजाओं के समय होता रहता था। कई तो अपना पाँव भी छुआते हैं और देखते हैं कि कौन पांव नहीं छू रहा ताकि बाद में उसका पत्ता काटा जाये। इन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति बहुत बड़े आदमी हैं। उनकी छवि एक आदर्शवादी है। उन्होंने जनता की इस भावना को महसूस किया है। उनका कहना है कि राजनेता और नेता आज भी औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं। वे खुद को जनता का मालिक समझते हैं। इसलिये वे मानते है कि सरकारी काम में न पारदर्शिता की जरूरत है और न ही निष्पक्षता बरतने की। मूर्ति की उन बातों से क्या जनता सहमत नहीं है जिसमें उन्होंने कहा है कि राजनेताओं की मानसिकता पुरानी पड़ गई है और जनता भी उनकी इस मानसिकता से बराबर उदासीन है। एक हजार साल से सत्ता उन लोगों के हाथ में हैं जो जनता की पहुंच से हजारों मील दूर बैठे रहते हैं-भ्रष्टाचार के लिये पेनाल्टी बहुत कम है, किसी को डर नहीं है। इसलिये कोई जवाबदेही भी नहीं हैं। सरकारी क्षेत्र पूरी तरह भ्रष्टाचार और पतन की ओर है क्योंकि वह जनता से दूर हो गया। इस संबंध में इससे बड़ा उदाहरण और क्या दें कि जब हमारे स्कूल के छात्रों ने एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खराब प्रदर्शन किया तो एक वरिष्ठ अफ़सर का जवाब था कि भारत को ऐसी प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लेना चाहिये। हमे अपने प्रदर्शन को सुधरवाने की कोशिश करने की जगह हमें हतोत्साहित करने का काम भी यह नौकरशाह कर रहे हैं।

सीबीआई के पर कटे!

रायपुर दिनांक 10 अगस्त 2010

सीबीआई के पर कटे!
कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने यह कहा था कि सीबीआई को कांग्रेस जांच ब्यूरो न समझा जा ये। यह बयान उन्होंने अमित शाह मामले में सीबीआई के कथित दुरुपयोग के आरोप के बाद कहा था । इस बयान को अभी कुछ ही समय बीता होगा कि सरकार ने सीबीआई के संबंध में एक अहम निर्णय लेकर सभी को चैका दिया। सरकार ने निर्णय लिया है कि सीबीआई से दो महत्वपूर्ण अधिकार छीन लिये जायें। इसमें एक आतंकवादियों को आर्थिक मदद और दूसरा देश में जाली नोटों की सप्लाई का मामला है। इन दोनों ही मामलों मे सीबीआई को कोई सफलता हाथ नहीं लगी। इन मामलों की जांच का काम अब गृह मंत्रालय से सबंन्ध राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए को सौंपा गया है। इससे यह बात साबित हो रही हैं कि सरकार की नजर मे अब सीबीआई से बेहतर काम एनआईए कर रही है। आतंकवादियों को आर्थिक मदद का मामला जटिल है यह काम सीबीआई जैसी एजेंसी ही कर सकती थी लेकिन सीबीआई ने न इस काम कों पूरा किया बल्कि जाली नोटों की जांच का मामला भी सुस्त रहा। क्या हमारी यह एजेंसी अब इतनी सुस्त व निकम्मी हो गई है कि देश की आंतरिक सुरक्षा जैसे मामलो में भी पिछड़ गई। सीबीआई के पतन की शुरूआत बहुत पहले से हो गई थी जब क्राइम के मामले में भी उसे एक के बाद एक असफलता ही हाथ लगने लगी थी। देश के सर्वाधिक चर्चित नोयडा के आरूषि हत्याकांड का पर्दाफ़ाश करने में वह अब तक नाकाम साबित हुई। कुछ नहीं तो उसे विदेशी जांच एजेसिंयों से मदद की दर कार पड़ी। सरकार ने नकली नोटों के कारोबार का भांडा फोडने का दायित्व यह सोचकर दिया था कि वह निकट भविष्य में इसका बहुत बड़ा खुलासा करेगी लेकिन सीबीआई अपने गरूर के आगे कुछ नहीं कर सकी। दूसरी तरफ देश में आतंकवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने वाले तत्वों की खोजबीन के मामले में भी लम्बे समय तक विफलता ने सरकार को भी शायद यह एहसास दिला दिया कि यह एजेंसी अब नकारा साबित होने लगी है। एनआईए को नया दायित्व सौंपने के बाद अब यह देखना है कि यह इस जांच के मामले में कितना कारगर साबित होती है अगर उसे सफलता मिलती है तो आगे चलकर यह देश की नम्बर वन जांच एजेसीं बनने के करीब पहुंच सकती है वैसे भी देश में एक ऐसी जांच एजेंसी की जरूरत है जो भारत के राष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश के प्रति जिम्मेदार हो और निष्पक्ष तरीके से सभी किस्म के मामलों की जांच कर निष्कर्ष तक पहुंचे।

लालगढ़ की लाली से श्वेत कबूतर...

रायपुर मंगलवार। दिनांक 10 अगस्त 2010

लाल गढ़ की लाली से श्वेत कबूतर पकड़ने
ममता का प्रयास या कुछ ओर...
सोमवार को पश्चिम बंगाल के लाल गढ़ में आयोजित तृणमूल कांग्रेस की रैली को किस नज़रिये से देखा जा ये? क्या यह देश की राजनीति में एक नया समीकरण है या यूं ही आमतौर पर होने वाली एक रैली? इस रैली का राजनीतिक पहलू यह है कि रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता श्रीमती ममता बनर्जी ने पहली बार माओवादी अथवा नक्सलियों की हिमाकत की व उन्हें इस रैली में शामिल किया। इसे एक उपलब्धि ही माना जा सकता है शायद कांग्रेस ने यही देखकर ममता का समर्थन किया है। नक्सली हिंसा का जहां तक सवाल है वह एक तरफ है तथा निंदनीय है लेकिन अब तक सरकार के सारे शांति प्रयासों को ठुकरा चुके नक्सलियों अथवा माओवादियों को एक मंच पर लाने व उन्हें सही राह पर लाने का प्रयास ममता ने किया तो कहीं इसमें गलती नजर नहीं आ रही, इसके पीछे उनका राजनीतिक मकसद हो सकता है लेकि न अब तक जो विफल प्रयास सरकार करती रही है उसमें यदि यह एक मील का पत्थर बन रहा है तो क्या बुराई है? ममता ने रैली में नक्सलियों का समर्थन किया है किन्तु उन्होनें उनकी हिंसा को पूरी तरह नकार दिया है यह कहते हुए कि आज़ाद को पुलिस ने फ र्जी मुठभेड़ में मारा है उसकी जांच होनी चाहिये। नक्सलियों व सरकार के बीच शांति की पेशकश करने वाले स्वामी अग्रिवेश, लेखिका महाश्वेता देवी तथा मेघापाटकर भी यही बात कर रही हैं। आज़ाद के मुठभेड़ में मारे जाने को फ़र्ज़ी बताकर ममता ने नक्सलियों के अब तक इस मामले को लेकर उनके द्वारा की जा रही हिंसा को लगाम देने उनका समर्थन अपनी ओर खींचने में जहां बहुत हद तक कामयाबी पाई है वहीं यह भी संभव हो गया है कि वे माओवादियों को हिंसा के मार्ग को बदलकर मुख्य धारा में लाने विशिष्ट भूमिका निभाने की स्थिति में आ गई है। आगे आने वाले दिन इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ममता के इस कदम की विपक्ष के एक बड़े वर्ग ने नक्सलियों का समर्थक कहते हुए आलोचना की है किंतु आलोचकों को इस पूरे मामले का विश्लेषण करके भी देखना चाहिये कि ममता बनर्जी कहीं भी नक्सली हिंसा की बात नहीं कर रही है। वे भी हर कोई की तरह नक्सली हिंसा को नकारती है किंतु इसके माध्यम से वे नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास भी कर रही हैं। इसका दूसरा पहलू यह है कि कई राज्यों में सक्रिय नक्सलियों का समर्थन अपनी ओर खींचने के राजनीतिक मकसद में भी वे कामयाब हो गई। एक तरह से उन्होंने लाल गढ़ फ़तह कर लिया। तृणमूल की इस रैली में भारी मात्रा में नक्सलियों की उपस्थिति साथ में कांग्रेस का समर्थन भविष्य में नक्सली मूवमेंट को एक नई राह प्रदान करेगा जो शायद हिंसा की जगह शांति का हो सकता है। ममता बनर्जी ने अपने इस मकसद के लिये लालगढ को चुना जो नक्सलियों का एक तरह से सबसे बड़ा गढ़ है। देशभर में नक्सली मूवमेंट अलग अलग समूहों में बंटा हुआ है-लाल गढ़ की लाली से जो राजनीतिक गठजोड़ शुरू हुआ है वह आगे आने वाले समय में कौन सा रास्ता पकड़ना है यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

मज़दूर क्यों हैं मजबूर?

रायपुर सोमवार।
दिनांक 9 अगस्त 2010

मज़दूर क्यों हैं मजबूर?
राज्य बनने के बाद भी छत्तीसगढ़ के मज़दूर बाहर दूसरे प्रांतों में जाकर काम करने के लिये क्यों मजबूर हैं? वे कौन लोग हैं जो मज़दूरों को बहकाकर दूसरे प्रांतों में ले जाते हैं और बंधक बनाकर उनसे काम कराते हैं। सरकार की ढेर सारी योजनाओं के बाद भी ऐसी परिस्थितियां क्यों निर्मित हो रही है? इन सब सवालों का शायद यही जवाब है कि यहां मिलने वाली मजदूरी से कई गुना ज्यादा मजदूरी का लालच इन मज़दूरों को दिया जाता है जिसके चलते वे यहां से पलायन कर जाते हैं। लेह में बादल फटने के बाद आई बाढ के ताण्डव में छत्तीसगढ़ के आठ श्रमिकों की मौत ने सरकार की श्रमिकों के हित में शुरू की गई सारी योजनाओं की पोल खोलकर रख दी है। हमेशा यह कहा जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ से जो पलायन होता है वह गर्मी के दिनों में होता है, जब मजदूरों को काम मिलना मुश्किल होता है। इस दौरान वे दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करने के बाद बारिश शुरू होते ही अपने गांव वापस आ जाते हैं। इस प्रक्रिया को मान सकते हैं कि उनका निर्णय इस मामले में सही है कि गर्मी में कहीं कुछ काम कर दो पैसे कमा कर घर आ जाये और जो खेत खलिहान हैं उसमें कुछ पैदा कर अपना व अपने बच्चों का भरण पोषण करें। बारिश में बड़े खेतिहर किसानों के यहां मज़दूरों को काम मिल जाता है। किसी मजदूर के सामने इस समय रोजी रोटी की समस्या पैदा नहीं होती। कुछ ही ऐसे होते हैं जिनके समक्ष यह समस्या बनती है। अकेले जांजगीर जिले से कम से कम दो सौ श्रमिकों के भारत-पाक सीमावर्ती क्षेत्र में काम के लिये जाना और यह भी इस बरसात के मौसम में यही बताता है कि उन्हें कोई बरगलाकर या भरपूर लालच देकर ले गया और वहां ले जाकर बंधक बनाकर रखा। लेह बादल फटने और बाढ़ आने के हादसे में आठ लोगों के मरने की पुष्टि उनके परिवार के लोग कर रहे हैं जबकि इतने ही श्रमिकों की हालत गंभीर है। करीब एक सौ सत्रह श्रमिकों के फंसे होने की जानकारी मिली है। अधिकांश श्रमिकों को काम दिलाने के नाम पर ठेकेदारों के दलाल यहां से लेकर गये थे। प्रशासन के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि जांजगीर से कितने श्रमिक लेह या देश के विभिन्न भागों में गये हैं। शायद छत्तीसगढ़ में प्रशासन के लोग ऐसा कोई आंकड़ा रखते भी नहीं। यह तो श्रमिक और उनके आश्रित परिवारों का मामला है अब इस हादसे से सरकारी व्यवस्था की पोल खुलने के बाद यह प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ है कि मज़दूरों की तरह कितनी ही लड़कियों को भी यहां से बरगलाकर एजेंटों ने महानगरों में बेचा होगा। बहरहाल मामला सतह पर आने के बाद अब सरकार को चाहिये कि वह इस मामले की गंभीरता से जांच करें ताकि सारी स्थिति स्पष्ट हो।

जूता है महान...बड़े बडों को इसने

रायपुर सोमवार, दिनांक 9 अगस्त 2010
जूता है महान...बड़े बड़ों को इसने
शोहरत दिलाई...और अब...

जूते का आविष्कार जिस महान ने भी किया उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि लोगों के पैरों के लिये बनाया गया जूता किसी दिन इतना महान हो जायेगा कि वह बड़े से बड़े नेताओं के ऊपर बरसेगा। चाहे वह पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हो या भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम अथवा अमरीका के पूर्व शक्तिशाली राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश यह अब उन महान नेताओं में शुमार हो गये हैं, जिन्हें जूते खाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ,और भी कितने नेता जूता खा चुके होंगे इसका रिकार्ड नहीं लेकिन कई ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी किसी से चप्पल या जूता जरूर खाया होगा। नेता कैसे महान बनता है, यह जूता खाने के बाद ही पता चलता है। जूता खाने के बाद नेता तो सुर्खियों मे आ ही जाते हैं मारने वाला तो उससे भी बड़ा बन जाता है। जूता न केवल नेताओं पर ही बरसा है वरन् कई जजो को भी इसे खाने का शुभ अवसर मिला है इसलिये अब कोई यह कह भी दे कि तू यार जूते खाने का काम कर रहा है तो उसे इसका बुरा नहीं लगता -वह यह सोचता है कि क्या मैं बुश चिदंबरम या जरदारी सरीका बड़ा हो गया हूं जो यह मुझसे जूता खाने की बात करता है। जूते की महानता के परिप्रेक्ष्य में अब हमें भी यह सोचना पड़ेगा कि कोई हमारे घर आये तो उससे कहे कि आप जूता मत उतारे- जूता साहब को भी अपने साथ भीतर ले आये ताकि उनका भरपूर आदर किया जा सकें। नेताओं पर जूता बरसाने वालों की विश्व में खूब डिमांड हो गई है। बुश को जिसने जूता मारा, उसका नाम मुन्ताधर-अल-जेदी है जो एक टीवी पत्रकार है। उसने बुश पर जूता इराक में अमरीकी बम मारी के खिलाफ फेका थ। जूता फेंकने के इस कारनामे पर उसके देश के लोगों ने उसे हाथों हाथ उठा लिया। उसकी मूर्ति बन गई, उसके द्वारा फेकें गये जूते को सम्हालकर रखा गया यह बताने के लिये कि इस जूते साहब ने ही विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रपति की कुटाई की थी। जूते पैदा करने वाली कंपनियों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया। इसके बाद भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर भ्री एक हिन्दी अख़बार के पत्रकार जरनेल सिंह ने सिक्खों पर हमले में जगदीश टाइटलर को सीबीआई द्वारा क्लीन चिट के विरोध में अपना जूता उतारकर फेंक दिया तो उस पत्रकार की अपने संस्थान से तो नौकरी चली गई लेकिन उसके जूते की कदर हो गई। चिंदबरम के विरोधियों ने उसके जूते को हीरो बना दिया। नौकरी गई तो क्या हुआ दो लाख रूपये का इनाम इस पत्रकार को मिला....वाकई मे जूता और उसको बनाने वाले दोनों महान है। जूता बनाने वाले दो किस्म के जूते तैयार करते हैं -एक नर व दूसरा मादा। एक पुरूष पहनते हैं, दूसरा महिलाएं जो चप्पल के रूप में इस्तेमाल करती हैं। जूता मुश्किल से व जरूरत पडऩे पर ही बरसता है लेकिन चप्पल हमेशा बरसने के लिये तैयार रहता है। बस छेड़छाड़ हुई नहीं कि वह अपना काम शुरू कर देती है। पति ने भी ज्यादा चू चपड़ की तो उसपर भी कभी कभी यह उठ जाती है। नर-मादा दोनों जूतों की महानता को समझते हुए ही अभी कल लंदन में वहां के प्रधानमंत्री कैमरन की झिड़कियों के बाद वहां पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आसिफ अली जरदारी को अपने ही देश के एक बन्धें शमीम खान से जूता खाना पड़ा। अब जरदारी भी महान हो गये....इससे ज्यादा महान है जूता जो किसी को कुछ नहीं समझता।

रविवार, 8 अगस्त 2010

छत्तीसगढ़ के आपराधिक बाजार में

रायपुर रविवार। दिनांक 8 अगस्त 2010


छत्तीसगढ़ के आपराधिक बाजार में
पक रहे हैं कई प्रकार के व्यंजन!
छत्तीसगढ़ का आपराधिक बाजार इन दिनों विभिन्न किस्म के आपराधिक व्यंजनों से भरा पड़ा हैं यहां आपकों हर किस्म के व्यंजन बिना पैसे दिये मिल जायेंगे हां आपने खुद अपनी सुरक्षा कर ली तो यह आपका भाग्य वरना खुद तो लुट जाओगे पूरे परिवार को भी मुसीबत में डाल दोगें। इस बाजार में आपकों सड़क पर चलते चलते ही कोई ऐसा मिल जायेगा जो आपके गले से चैन छीन ले,हाथ में रखा रूपयों से भरा बैग छीन ले। घर में ताला लगाकर कहीं गये तो कोई भी मेटाडोर लेकर आयेगा पूरे घर के सामान पार कर लेगा। अगर नई नवेली घर आई है और दहेज में पैसे कम लाई है तो उसको पूरे घर के लोग घेर लेंगे तथा उसकी ऐसी धुनाई करेंगे कि वह इस जन्म को कोसने लगेगी फिर या तो खुद जलकर मर जायेगी या मार दी जायेगी अथवा मारकर फांसी पर लटका दी जायेगी।...और तो और यहां कुछ क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था और रिश्तो ं का भी खून होने लगा है। कभी ससुर अपनी बहू के साथ रेप कर बैठता है तो कभी भाभी के साथ देवर। इसके अलावा भी कई पकवान यहां रिश्तो को तार तार कर पक रहे हैं जिनमें बेटा अपने बाप का खून करके कहता है मुझे इसका कोई अफसोस नहीं, आपराधिक व्यंजनों में नक्सलियों को छोड़ दे तो यह इस अपराध के साथ न इंसाफी होगी। जंगलों से निकलकर होने वाले अपराधों में पुलिस वालों को उड़ा देना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की खिचड़ी और अन्य इसी किस्म के मसालेदार किस्से रोज अखबार की सुर्खियां बनते हैं। इसका दायरा कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। अपराध जगत की इन सुर्खियों के बारे में सबको पता है लेकिन हमारी खाखी, वह सोई हुई है, उसमें एकता नहीं है। उसके साथी चंद लोगों के हाथों पिट जाते हैं लेकिन कोई उसकी मदद के लिये नहीं पहुंचता ।आपराधिक बाजार में शुक्रवार-शनिवार के दरमियान जो घटना राजधानी के रायपुर रेलवे स्टेशन में हुई वह खाखी को शर्मसार करती है। कई पुलिसवालों के सामने उनका साथी आटो वालों से पिटता रहा कोई उसे बचाने सामने नहीं आया। जब पुलिस का यह हाल है तो आम आदमी की अगर सड़क में पिटाई हो रही है, लुट रहा है या उसके साथ कोई अन्य वारदात कर रहा है तो यह पुलिस क्या करेगी? इसका एक नजारा अभी कुछ दिन पहले फ्रेंडशिप डे पर देखने को मिल चुका है जहां पुलिस के सामने रायपुर की बेटियां बेइज्जत कर दी गई। आपराधिक जगत के इन अदपके े और पके व्यंजनों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि आम आदमी कहीं से भी सुरक्षित नहीं है। उसे अपनी रक्षा ठीक उसी प्रकार करनी होगी जैसा आजकल गोरेगांव में लुटरे के डर से लोग करने लगे हैं। दुकानों में मिर्ची पाउडर और हाकी स्टिक रख लोग जागरूक रहते हैं ताकि कभी कोई दुष्ट न आ जाये इस हथियार से वे मुकाबला करने बैठे हैं यह कहते हुए कि पुलिस निकम्मी हो गई। क्या ऐसी स्थिति पूरे छत्तीसगढ़ में नहीं बन चुकी?

बुधवार, 4 अगस्त 2010

प्रकृति का कोप

रायपुर रविवार, दिनांक 8 अगस्त 2010
प्रकृति का कोप
हम अगर अपने सर पर ज्यादा बोझ ढोते हैं तो क्या होता है- या तो हमारी कमर झुक जायेगी या फिर हम बैठ जायेगें। इस सिद्वान्त से सभी परिचित है अब तक की वैज्ञानिक सोच की माने तो धरती के साथ भी कुछ ऐसा ही है जो एक धुरी पर टिकी हुई है। अगर यह धुरी टूट गई तो धरती का नामों निशान मिट जायेगा। अर्थ शास्त्र में माल्थस थ्योरी आफ पापुलेशन कुछ इसी सिद्वान्त पर आधारित है। जब जब धरती पर बोझ बढ़ता है वह ऐसी प्राकृतिक आपदाएं खड़ी कर देता है जिससे पृथ्वी का संतुलन बनाये रहे। मानव उस संतुलन को कायम करने के बारे में सोचता ही नहीं जबकि पृथ्वी को उसके अस्तित्व की ङ्क्षचता रहती है इसलिये वह कभी तूफान के रूप में तो कभी बाढ़ के रूप में तो कभी भूकंप के रूप में और कभी सुनामी के रूप में आपदाओं को जन्म देता है। बोझ को कम करने के लिये कई प्रकार की संपति तथा कइयों की जान चली जाती है। धरती के स्वर्ग के रूप में लेह और केरल दो क्षेत्र भारत में हैं जहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है लेकिन लेह को इस बार प्रकृति के कोप का भाजन बनना पड़ा है। हजारों या लाखों लोग यहां बादल फटने से प्रभावित हुए हैं। कइयों का अब भी कोई पता नहीं हैं। जो सेना के जवान बचाव कार्य में उतरे थे उनमें से भी कुछ का अता पता नहीं है। यह कहानी अकेले भारत की नहीं है हमारे पडौसी मुल्क पाकिस्तान, बंगला देश, चीन में भी प्राकृतिक कोप किसी से पूछकर नहीं पहुंचता न ही विदेशों में आने वाले तूफान, बाढ़ व अग्रि का कोप किसी को बताकर पहुंचते हैं। प्रकृति की इस अद्भुत लीला के बारे में सभी जानते हैं किन्तु कोई भी संतुलन बनाये रखने में पृथ्वी की मदद नहीं करता शायद यही कारण है कि सब कुछ इतनी तेजी से हो जाता है कि किसी को सोचने समझने व सम्हलने का मौका नहीं मिलता। प्रकृति की इस लीला से पछताने की जरूरत नहीं किन्तु सम्हलने की जरूरत है। प्रकृति पर संतुलन बनाये रखने के लिये जनसंख्या को नियंत्रित करने के साथ-साथ पर्यावरण को ज्यादा से ज्यादा महत्व देेने की जरूरत है। भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, सिक्किम सभी प्राकृतिक कोप का शिकार हैं। जनसंख्या का दबाव और पर्यावरण को जिस ढंग से इन देशों में पिछले वर्षाे के दौरान बलि चढ़ाई गई है वह अपने आप में ही यह बताती है कि प्रकृति पूरी तरह से उससे नाराज है। लेह की घटना दर्दनीय है-इसमें हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि मृतकों को श्रद्वांजलि और मृतक परिवारों के प्रति सहानुभूति लेकिन आगे के लिये यही कि मानव जाति प्रकृति के संतुलन को बनाये रखने में मदद करें।

करना उन्हैं हैं, कह हमसे रहे हैं!

रायपुर, शुक्रवार । दिनांक 7 अगस्त 2010।
सरकार हमसे कह रही है यह होना
चाहिये लेकिन करना तो उन्हें ही है!
दो ख़बरें आज शिक्षकों संबंधित दिखाई दी। एक यह कि छत्तीसगढ़ के शिक्षकों को भी गुजरात और महाराष्ट्र के शिक्षकों की तरह कोड़ नम्बर दिये जायेंगें तथा स्कूलों को कम्पयूटर से जोडा जायेगा अर्थात एक पूरा नेट वर्क तैयार किया जायेगा। दूसरी खबर केन्द्र से है, सरकार का कहना है कि पूरे देश में इस समय बारह लाख शिक्षकों की कमी है। क पिल सिब्बल ने यह बात लोकसभा में कही है। शिक्षा मंत्री के अनुसार देश में शिक्षकों की कमी का एक कारण बीएड शिक्षा प्राप्त युवकों का अभाव है जिसके कारण शिक्षको की भर्ती नहीं हो पा रही है। हम पूछना चाहते हैं सरकार से कि यह किसकी गलती है? भारत आजाद होने के बाद शुरू शुरू में शिक्षा और बुनियादी प्रशिक्षण महाविद्यालयों अर्थात पीजीबीटी कॉलेज को जितना महत्व दिया गया, उतना उसके बाद के वर्षा में क्यों नहीं दिया गया? इसके पीछे कारण क्या है? और कौन इसके लिये जिम्मेदार हैं! जब हम स्कूलों में पड़ते थे तब स्कूलों में प्रशिक्षु शिक्षक आया करते थे और वे हमें अपने कई प्रायोगिक कार्य सिखाया करते थे चूंकि उन्हें इसके लिये अपनी थीसिस तैयार करनी होती थी लेकिन आज यह व्यवस्था लगभग खत्म सी हो गई। बुनियादी प्रशिक्षण को पूर्व की तरह महत्व भी नहीं दिया जाता। सरकार के लोग जब केन्द्र व राज्यों में बैठकर यह कहते हैं कि ऐसा होना चाहिये या ऐसा करना चाहिये तो आम जनता के मुंह से यही निकलता है कि कौन करेगा? हमने तो आपको सत्ता में बिठा दिया आपके ही अधिकार क्षेत्र में सब कुछ है फिर जनता को मुखातिब होकर यह क्यों कहा जाता है कि ऐसा किया जाना चाहिये या ऐसा नहीं किया जाना चाहिये?- जनता को थोड़े ही यह सब करना है। हाल ही भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी कुछ ऐसे ही बयान दिये है जिसपर यही प्रतिक्रिया हुई कि जो आपको करना चाहिये वह आप जनता से क्यों कह रहे हो। बहरहाल त्रेसठ सालों बाद सरकार को होश तो आया कि देश के स्कूलों की दशा खराब है और उसमें शिक्षकों की कमी है। हम सरकार को यह भी बता दे कि देश के स्कूलों में न केवल शिक्षकों की कमी है बल्कि स्कूल भवनों, प्रयोगशालाओं, खेल मैदानों, फिजिकल इंस्ट्रक्टर तथा अन्य अनेक मूलभूत सुविधाओं की कमी है। एक अरब बीस करोड़ की आबादी में से बारह लाख शिक्षकों को तैयार कर निकालने में सरकार को नानी याद आ रही है तो उस सरकार को क्या कहा जायें। शिक्षकों की भर्ती में क्या क्या धांधली होती है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। दस साल पहले बने छत्तीसगढ़ राज्य की सरकार ने इस मामले में कुछ सुध ली है। इस कड़ी में उसने स्कूलों को कम्पयूटर से जोडऩे और शिक्षकों का कोड़ तैयार करने का निर्णय लिया है इससे सरकार को शिक्षक व स्कूलों में छात्रों की गतिविधियों आदि पर नियंत्रण करने में आसानी होगी। देर से ही सही सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है। गुजरात और महाराष्ट्र में यह व्यवस्था पहले से ही जारी है।

कैसे बन रहे हैं अफसर,कर्मी

रायपुर शुक्रवार। दिनांक 6 अगस्त 2010

कैसे बन रहे हैं अफ़सर,कर्मी
अकूट संपति के मालिक?
पन्द्रह से बीस हजार की तनखाह...और आलीशान जिंदगी! क्या मौज़ है हमारे नौकरशाहों के! जिनके हाथ में देश को संवारने का ठेका है वे खुद अपना घर भरने में लगे हैं। पीडब्लूडी का सब इंजीनियर हो या वन विभाग का रेंजर अथवा तहसील से संबंधित पटवारी यह सरकार के वे अंग हैं जो विभागों में अवैध रूप से संपत्ति अर्जन के क्षेत्र में छोटी मछली के रूप में जाने जाते हैं लेकिन इनके घरों की शान देखिये यह किसी राजा महाराजाओं से कम नहीं हैं। जब विभागों की इतनी छोटी मछलियों का यह हाल है तो कल्पना की जा सकती है कि इनसे बड़ी मछलियों का क्या हाल होगा। पूर्व में पड़े आर्थिक व आय कर के छापों में यह प्रायरू सिद्व हो चुका है कि देश में कतिपय अफसरों व कर्मचारियों के घरों में अकूट बेनामी संपत्ति भरी पड़ी है। बे हिसाब संपत्ति के मालिक बन बैठे अफसरों व कर्मचारियों में से बहुत कम ही सपड़ में आते हैं वह भी जब उनकी तड़क भड़क से लोगों को शंका होने लगे तथा उनके दुश्मन इस अकूत संपत्ति के बारे में शिकायत करें वरना आज भी ऐसी कई छोटी बड़ी बिल्लियां है जो आँख बंद कर दूध और मलाई दोनों झटक रही हैं, ऐसा सोचकर कि कोई उन्हें नहीं देख रहा । हाल ही लोक निर्माण विभाग के उक साहब को पकड़ा वे इस विभाग के एक छोटे से कर्मचारी हैं जिन्हें सब इंजीनियर कहा जाता है। हो सकता है उन्हें सरकार ने इस पद पर किसी अन्य पद से प्रमोट किया हो। उनकी शानोशौकत का इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि वे सवा करोड़ रूपये के मालिक हैं। खुद का मकान,फार्म हाउस और अन्य आधुनिक सुविधाओं के मालिक होने के बाद भी सरकारी आवास में डेरा डाले हुए हैं। यह अलग मामला है कि कितने ही ईमानदार कर्मचारी हैं जो आज सरकारी मकान के लिये भटक रहे हैं वहीं कतिपय भ्रष्ट और अवैध कमाई से लबालब अधिकारी व कर्मचारी सरकारी मकानों में कब्जा जमाये बैठे हैं। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि छापे मारने वाली एजेङ्क्षसंया भी दूध की धुली नहीं होती। इनमें कार्यरत कतिपय लोगों का हाल यह है कि वे भी अकूट संपत्ति के मालिक हैं उनके गले में घंटी कौन बांधें। छत्तीसगढ़ में कई वर्षाे पूर्व एक अधिकारी हुआ करते थे, उनकी छापे मार कार्रवाई के कारण लोगों ने उनका नाम ही छापा मार रखा। लोग उनके ईमानदारी की दाद देते थे किन्तु रिटायर होने के पहले उनके घर को दूसरे छापा मारों ने नहीं बख्शा, तब पता चला कि वे अकूट संपत्ति के मालिक हैं। आज स्थिति यह है कि संपूर्ण देश में अरबों रूपये की संपत्ति अफसरों,कर्मचारियों, व अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में काम करने वालो के पास बेनामी संपत्ति के रूप में दबी पड़ी हुई है इसमें अब नेतागिरी में शामिल कतिपय व्यक्ति व अन्य लोग भी शामिल हो गये हैं जो कालाबाजरी, जमाखोरी को प्रश्रय देने व अन्य गैर कानूनी तरीके से पैसा इकट्ठा कर अपना व अपने परिवार की जिंदगी तो ऐशों आराम की बना रहे हैं लेकिन देश को खोखला करने में लगे हुए हैं लेकिन देश को खोखला किये जा रहे हैं।

कामन वेल्थ गेम्स

रायपुर शुक्रवार, दिनांक 6 अगस्त 2010
कामन वेल्थ गेम्स
अब कामनवेल्थ गेम्स भगवान भरोसे हैं। यह हम नहीं भारत के खेल मंत्री एम.एस.गिल संसद में बयान दे रहे हैं। सारा विश्व जान गया कि हम इन खेलों में विश्वभर से आने वाले मेहमानों की अगवानी कैसे करने वाले हैं। यह तो अच्छा हुआ कि बारिश से पहले ही सारी पोल खुल गई वरना उस समय बारिश होती तो हम कहीं के नहीं रह जाते। अभी जो पोल खुली है उसकी लीपा पोती संभव है किन्तु आयोजनों से पूर्व जो घपले और भ्रष्टाचार की पोल खुली है उसने संपूर्ण विश्व का ध्यान भारत में व्याप्त अव्यवस्थाओं की ओर खीच लिया है। कामनवेल्थ गैम्स आयोजन समिति के चार बड़े पदाधिकारियों को ऐन समय में हटाकर समिति ने यह बताने का प्रयास किया है कि वह आगे कुछ करके दिखायेगी लेकिन जिस ढंग से भ्रष्टाचार और मनमानी हुई है उसे आसानी से पाटना भी तो संभव नहीं है। समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी इस पूरे मामले में अपने को बचाने का प्रयास जरूर कर रहे हैं किन्तु वे और ज्यादा घिरते प्रतीत हो रहे हैं। भारत में कामनवेल्न्थ गैम्स के आयोजन का फैसला जब लिया गया तो भारत की जनता को इसपर गर्व था कि इससे उसका नाम ऊ ंचा होगा लेकिन कामनवेल्थ आयोजन से पूर्व ही ऐसे कलंक लग गये हैं जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। ठेका देने में परिवारवाद से लेकर पैसे के लेन देन और वस्तुओं की खरीदी सभी में भारी गोलमाल के चलते कामनवेल्थ गेम्स उसके प्रारंभ होने से पहले ही एक घोटाले का बाजार हो गया हैं। जैसे जैसे पोल पर पोल खुलती जा रही है विश्व में हमारा नाम ऊंचा होने की जगह नाक कटनी शुरू हो गई है। आगे क्या होगा यह कोई नहीं जानता। आने वाले वर्षाे में कामनवेल्थ गैम्स के बाद एशियाड़ का भी आयोजन करना है। इसका आयोजन कामनवेल्थ की सफलता -विफलता पर निर्भर करेगा। कामनवेल्थ गैम्स आयोजन के लिये सरकार ने जितनी राशि लगाई है वह अगर उसका उपयोग सही ढंग से भारत में गरीबी दूर करने के लिये किय जाता तो एक गंभीर समस्या का हल सदा सदा के लिये हो जाता। समिति ने जिस ढंग से इस संपूर्ण मामले में भ्रष्टाचार किया है वह असहनीय है। कामनवेल्थ गैम्स के लिये बनाये गये भवनों से पानी टपकने व अन्य अनेक प्रकार की शिकायतों ने यह संकेत तो दे दिया है कि संपूर्ण व्यवस्था चूना लगाकर तैयार की जा रही है। अब लोगों को मणिशंकर अयैर की टिप्पणियां याद आ रही है -जिसमें उन्होंने इस आयोजन को न केवल फिजूल खर्ची कहा बल्कि कुछ सांस्कृतिक परंपराओं के विपरीत भी बताया है। कलमाडी के दरबारियों को आयोजन समिति से बाहर करने के बाद अब यह समिति कम समय में आयोजन को कितना सफल बना सकेगी यह देखना महत्वपूर्ण होगा। बहराल अभी की स्थिति यह है कि इस आयेजन पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

कानूनी उलझन, पीडित को अपराधी

रायपुर दिनांक 5 अगस्त 2010
कानूनी उलझन, पीडित को अपराधी
की धमकी से कौन बचायें?
कानून उस स्थिति में क्या करें जब कोई मुलजिम किसी पीड़ित को हिरासत से वापस लौटने के बाद देख लेेने या जान से मार देने की धमकी देता है? हर आदमी के पीछे तो पुलिस लगाई नहीं जा सकती और हर आदमी को सुरक्षा प्रदान भी नहीं की जा सकती. ऐसे में पीड़ित क्या करें? अक्सर होता यह है कि लोग दादा किस्म के लोगों को गिरफतार तो करवा देते हैं किन्तु जब पुलिस उन्हें गिरफतार कर ले जाती है तो वे पुलिस के सामने ही चमकाते हुए कहते हैं -ठीक है अभी तूने मुझे पकड़वा दिया, कल छूटकर आने दे तब तुझे और तेरे सारे परिवार को देख लूंगा. यह देख लूंगा पूरे परिवार को ही दहशत में डाल देता है. उसे मानसिक रूप से इतनी प्रताडऩा मिलती है कि वह उसे सहन नहीं कर पाता. क्या यह सब हमारे कानून के लचीलेपन के कारण नहीं होता? देश भर में ऐसे बहुत से मामले सामने आये हैं जिसमे अपराधियों ने हिरासत में लेने अथवा गिरफतारी के तुरन्त बाद संबन्धित व्यक्ति को यह कहते हुए सुना है कि छूटकर आते ही तुझे देख लूंगा. कुछ ने अपनी इस कथनी को अंजाम भी दिया है। तत्काल पुलिस द्वारा इस संबन्ध में कोई कार्रवाई नहीं की जाती। यह हमारे कानून की खामी नहीं तो ओर क्या हो सकता है. अक्सर आम आदमी के साथ यही होता है. अगर हम किसी अपराधी को पकड़ाना चाहते हैं या अपनी बहादुरी दिखाना चाहते हैं तो हमारे सामने अपने व अपने परिवार की सुरक्षा का प्रशन सामने आ जाता है. अपराधी तो अपराधी है वह एक बार जेल जा चुका होता है दूसरी बार जाने में भी कोई डर उसे नहीं लगता. ऐसी परिस्थिति में वह किसी मोहल्ले में आकर जो भी दुरूसाहस करें क्या उसे सहन कर लिया जाये? या आम आदमी मोहल्ले में डंडे लेकर तैयार रहे कि-अगर वह बदला लेने आयेगा तो उसका मुंह तोड़ जवाब दिया जायेगा? समाज के साथ बड़ी दुविधाजनक स्थिति है. हमारे न्यायविदों को इस गंभीर प्रश्र का हल ढूंढना चाहिये. कानून साक्ष्य के आधार पर फैसला देता है. जब साक्ष्य न्यायालय में उपस्थित होता है तो उसके सामने कई किस्म के प्रलोभन व दहशत दोनों पैदा कर दिये जाते हैं. अपराधी को या तो न्यायालय से जमानत पर छोड़ दिया जाता है या ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह दिन की हिरासत पर जेल भेज दिया जाता है. इस दौरान वह अपने वकील की मदद से छूटकर बाहर आ जाता है.ऐसे व्यक्ति के छूटकर बाहर आने का मतलब है पीड़ित परिवार की सिट्ड्ढटी बिट्ड्ढटी बंद हो जाना. कानून क्या करें? ऐसे मामले की बेबसता को दूर करने आज तक कोई प्रयास नहीं किये गये. ऐसे में होना यह चाहिये कि पीड़ितों को सुरक्षा देने के लिहाज से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये कि न्यायालय कथित अपराधी को यह आदेश दे कि उसे जमानत पर छोड़ा तो जा रहा है लेकिन अगर पीड़ित परिवार को खरोच भी आई या उसे मानसिक ठेस पहुंचाई गई अथवा उसके साथ कोई भी हादसा हुआ तो उसके लिये वह खुद जिम्मेदार रहेगा अर्थात उसकी व उसके परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी रहेगी. ऐसे हालात में ही पीड़ित को सुरक्षा मिल सकेगी वरना अपराधी अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे और कोई प्रताड़ित किसी अपराधी को पकड़वाने सामने नहीं आयेगा.

अंतहीन समस्याएं!

रायपुर गुरूवार, दिनांक 5 अगस्त 2010
अंतहीन समस्याएं!
देश के अंदरूनी हालात भारत की विकास संभावनाओं पर घीरे धीरे बे्रक लगा रही है। कुछ समस्याएं अस्थाई न होकर स्थाई बन गई है जिससे यहां सरकार का पूरा ध्यान इन समस्याओं पर केन्द्रित होकर रह गया है। इन्हें हल करने की दिशा में उसका प्रयास नगण्य है फलस्वरूप यह समस्याएं और गंभीर होती जा रही हैं, इसमें चाहे छत्तीसगढ़ सहित कम से कम देश के ग्यारह राज्यों में फैलते नक्सलवाद की समस्या हो चाहे कश्मीर में हत्याओं के बाद उत्पन्न होने वाला विवाद या आंतकवाद अथवा उल्फा की असम में विध्वसंक कार्यवाहियां। इन सबने धीरे धीरे समस्याओं को गहन कर दिया है, इन सबके पीछे अगर कारण देखा जाये तो सरकारो की इन मामलों को निपटाने में ढिलाई और विपक्ष का गंभीर मसलों को छोड़ अन्य बेफालतू मुद्दो को लेकर संसद व सड़क पर हंगामा है। स्थाई समस्याओं के अलाव सरकार अस्थाई समस्याओं के प्रति भी लापरवाह है। अब जैसे तेलांगाना प्रांत का मामला। छोटे राज्यों में काम अच्छा हो रहा है। हाल के वर्षाे में बने छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड ने अपनी पहचान बना ली है फिर चाहे वह तेलंगाना हो या विदर्भ उन्हें छोटे राज्यों में विकसित करने की छूट देने में क्या हर्ज? कम से कम रोज-रोज के आंदोलन से मुक्ति तो मिलेगी। कश्मीर और नक्सलवादी इस समय सबसे बड़ी और स्थाई समस्या के रूप में हमारे सामने हैं। कश्मीर सीमावर्ती राज्य होने के कारण हर हिंसा या वहां होने वाली गतिविधियों में पाकिस्तान का प्रत्यक्ष या परोक्ष हाथ रहता है। उसके नेता स्वयं कहते हैं कि वह कश्मीर की मांग नहीं छोड़ेंगेे और अब पिछले कम से कम एक महीने से वहां हत्याओं के बाद जो माहौल तैयार हुआ है वह यह साफ इंगित कर रहा है कि जनताा को भड़काने में पाकिस्तान से घुस आये लोगों का हाथ है। कश्मीर के अलावा भी देश में होने वाली अधिकाश्ंा समस्याओं की जड़ में पाकिस्तान के हाथ से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा ग्यारह राज्यों मे फैल रहा नक्सलियों का हिंसक आंदोलन कभी कभी तो ऐसा लगता है कि यह किसी की शह या संरक्षण में चल रहा है। सेट लाइट और अन्य सुविधाएं होने के बावजूद भारत के जंगलों में छिपे खुंखार नक्सलियों को खोज निकालने में हमारी पुलिस नाकाम रही है। इस स्थाई समस्या के चलते कुछ राज्यों में विकास होने के बाद भी उसपर एक तरह से लगाम लग जाता है। तीसरा मुद्दा बाहरी आतंकवाद का है जो पिछले कुछ दिनों से शांत है किन्तु उनकी गतिविधियां यदा- कदा जारी है। ऐसे तत्वों को तो ढूंढ ढूंढ कर खत्म किया जा सकता है। इसमें भी सरकार की लाचारी ही नजर आती है। सरकार को चाहिये कि वह पहले अस्थाई समस्याओं को एक एक कर निपटाये फिर अन्य स्थाई समस्यआों को हल करें। शुरू में कश्मीर ही मात्र एक समस्या थी लेकिन अब समस्याओ की गिनती करना कठिन हो गया है चाहे वह नक्सलवाद हो, आंतकवाद हो, उल्फा की गतिविधियों हो, पृथकतावादी आंदोलन हो या अन्य समस्याएं जिसमें मंहगाई भी शामिल है।