बुधवार, 29 दिसंबर 2010

उनका लक्ष्य है हिंसा से 'सत्ता, इनका तो कोई लक्ष्य ही नहीं!

रायपुर दिनांक 29 दिसंबर 2010

उनका लक्ष्य है हिंसा से 'सत्ता,
इनका तो कोई लक्ष्य ही नहीं!

ट्रेन का अपहरण, ट्रेन को पलटाकर कई लोगों की हत्या, सैकड़ों निर्दोष लोगों की गला रेतकर हत्या, देश के कई नवजवानों का खून बहाने, तथा करोड़ों रूपये की संपत्ति को फूं क देने के बाद भी अगर कोई सरकार सिर्फ कार्रवाही का भरोसा दिखाकर जनता को तसल्ली दे तो इसे क्या कहा जाये? वर्ष दो हजार दस अब खत्म होने को है और इस वर्ष में जिस तेजी से पूरे देश में नक्सलवाद ने अपने पैर जमाये हैं वह प्रजातंत्र पर विश्वास करने वालों के लिये एक कठोर चेतावनी है कि अब भी अगर वे नहीं चेते तो आने वाले वर्षो में उन्हें माओवाद को झेलना पड़ेगा। नक्सली सन् 2050 का टारगेट लेकर चल रहे हैं- उनका मानना है कि वे उस समय सत्ता पर काबिज हो जायेंगे लेकिन हमारी सरकार के पास ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है कि नक्सलियों के वर्तमान आतंक और तोडफ़ोड़ से कैसे निपटा जाये। प्राय: हर रोज किसी न किसी का खून बहता है तो दूसरी ओर करोडा़ रूपये की संपत्ति स्वाहा होती है। अभी दो रोज से लगातार बस्तर में ट्रेनों को पटरी से उतारकर देश का करोड़ों रूपये का नुकसान किया है। हम मिदनापुर की उस घटना को कैसे भूल सकते हैं जब ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस को पटरी से उतारकर दुर्घटनाग्रस्त कर दिया गया। इस कांड में कई निर्दोष यात्री मारे गये। इस मार्ग पर दहशत से रेलवे ने ट्रेनों का समय ही बदल दिया जो अब तक सही नहीं हुआ। देशभर में नक्सली हिंसा की बात को कुछ देर के लिये किनारे कर हम सिर्फ छत्तीसगढ़ की बात करें तो ''मानपुर-राजनांदगांव जहां मुठभेड़ में एस पी वी.के चौबे को अपनी जान गंवानी पड़ी, भाजपा के वरिष्ठ नेता बलिराम कश्यप के पुत्र व कांगे्रस नेता महेन्द्र कर्मा के रिश्तेदारों को भी नक्सली कहर झेलना पडा़ है। दंतेवाड़ा का मुकुराना जंगल जहां 6 अप्रेल को करीब 75 सीआरपीएफ जवानों को घेरकर मार डाला गया। नारायणपुर में भी इसी तरह सत्ताईस सुरक्षा जवानों को गोलियों से भून उाला गया। यात्रियों से भरी एक बस को भी नहीं बख्शा गया जब उसमें सवार लोगों में से 31 को जिसमें कुछ सुरक्षा जवान भी थे आग के हवाले कर दिया गया। यह सब ऐसी घटनाएं हैं जो हमारी आंखों के सामने घटित हुई, जिसे हम नई घटनाओ के साथ भूलते जा रहे हैं किंतु हमारी सरकार के पास इस समस्या को सुलझाने के लिये न कोई फार्मूला है और न ही उसकी कोई दिलचस्पी दिख रही है। जनता की संपत्ति नष्ट हो रही है, निर्र्दोष लोगों व देश की सेवा में लगे जवानों का लगातार खून बह रहा है। बस्तर के अनेक हिस्सों में लोग जाने से डरते हैं। स्कूलों की पढ़ाई नहीं हो रही, सरकारी कामकाज बंद है। नक्सली राज और उनके फरमान के आगे राज्य व केन््रद्र दोनों सरकार बेबस है। कुछ सक्रियता उसी समय दिखाई जाती है जब कोई घटना होती है जैसे ही मामला ठण्डा हुआ इसपर से ध्यान हट जाता है। गढचिरौली में चिदंबरम अचानक पहुंचे तो वहां के कलेक्टर ने यहंा तक कह दिया कि एसी कमरों में बैठकर नक्सली समस्या का समाधान नही निकल सकता। यह उस अधिकारी का दर्द है जो शायद इस गंभीर समस्या से जूझ रहा है। नक्सली समस्या पर जो रणनीति है उससे तो यही लगता है कि सरकार अपने ढर्रे पर है और नक्सली अपनी चाल पर। अब तो यह देखना रह गया है कि इस दौड़ में बाजी किसके हाथ में होगी?

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

प्याज के आंसू की दरिया बह रही है और सरकार को शर्म नहीं!

रायपुर मंगलवार दिनांक 28 दिसंबर

प्याज के आंसू की दरिया बह रही
है और सरकार को शर्म नहीं!

टमाटर लाल,
प्याज ने निकाले आंसू,
गैस में लगी है आग-
ऐसे शीर्षकों से अखबार भरें पड़े हैं फिर भी हमारी सरकार को शर्म नहीं आ रही। कृषि मंत्री शरद पवार बेशर्मी से कहते हैं-प्याज के लिये अभी और रोना पड़ेगा- वे यह नहीं कहते कि स्थिति शीघ्र नियंत्रण में आ जायेगी। हर बार कृषि मंत्री एक भविष्य वक्ता की तरह कभी गन्ने के भाव बढऩे की तो कभी शक्कर के भाव तो कभी दालों के भाव बढने की बात कहकर कालाबाजारियों व जमाखोरों को मौका देते हैं। प्याज के मामले में गैर जिम्मेदाराना बयान के बाद प्रधानमंत्री को स्वंय संज्ञान लेना पड़ा तब कहीं जाकर विदेशों विशेषकर पाकिस्तान से प्याज पहुंचा और बाजार की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार आया किंतु यह सारी स्थिति एक तरह से उस समय पैदा होती है जब सत्ता में बैठे लोग गैर जिम्मेदाराना बयान देते हैं। यह भी समझ के बाहर है कि जिसे व्यवस्था करनी है वह व्यवस्था करने की जगह कमी और परेशानी का राग अलापकर सात्वना देता है या अपनी विवशता पर मरहम पट्टी लगाने का काम करता है। आज सामान्य व्यक्ति के लिये भारी मुश्किलें खड़ी हो गई है। पेट्रोल के भावों में लगातार बढौत्तरी से लोगो की तनखाह का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोल में ही निकल जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल के भाव में तेजी आये या नहीं हमारे देश में पेट्रोल,डीजल के भाव में तेजी लाने की शुरूआत हो जाती है। उपभोक्ता को आज की स्थिति में किसी क्षेत्र में राहत नहीं है। ईमानदारी से दो जून की रोटी जुटा पाने वाले इंसान को यूं सरकार कब तक आश्वासन के घूंट पिलाती रहेगी, रोज कमाने खाने वाले को एक माह में मिलने वाला वेतन हर दृष्टि से कम पड़ रहा है- इससे वह क्या करें? अपने मां बाप, पत्नी बच्चों का इलाज करायें? स्कूल में बच्चो को भारी फीस देकर पढऩे भेजे, मकान का किराया अदा करें। बच्चों के कपड़े लत्ते व अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करें और साथ साथ घर के रसोई की आवश्यकता की पूर्ति करें? वेतन इतना कम पड़ जाता है कि आगे उसके लिये महीना निकालना कठिन हो जाता है। आगे आने वाले दिनों में गैस के भाव सौ रूपये तक बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली गई है अर्थात गैस पांच सौ रूपये तक मिल जाये तो आप भाग्यशाली हैं जबकि ट्रेन व बस की यात्रा भी लोगों के लिये मंहगी साबित हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं का तो यह हाल है कि इसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं हैं। छोटी मोटी बीमारी का इलाज चिकित्सक और दवा मिलाकर पांच सौ से हजार रूपये से नीचे नहीं जाता जबकि एक बार चिकित्सक के पास जाने वाले को अनेक किस्म के टेस्टों से गुजरना पड़ता है। इसका खर्च अलग। आगे आने वाले दिनों में रसोई इतनी मंहगी हो सकती है कि ग्रहणियां क्या करें क्या न करें की स्थिति में आ सकती है। गैस के दाम बढऩे के संकेत के साथ बिजली की कीमतों में भी वृद्वि की संभावना व्यक्त कर दी गई है। जिनके पास अपना घर है वह भी परेशान है-एक छोटी सी रिेपेयरिंग के लिये उसे आज लेबर नहीं मिलते वहीं निर्माण सामग्रियों में आई बढौत्तरी किसी को काम जारी रखने की हिम्मत ही नहीं देती।

कौन जीता, कौन हारा से ज्यादा महत्वपूर्ण रही दलों की प्रतिष्ठा!

रायपुर दिनांक 27 दिसंबर

कौन जीता, कौन हारा से ज्यादा
महत्वपूर्ण रही दलों की प्रतिष्ठा!
उप चुनाव व नगर निकाय चुनावों में बहुत हद तक सत्तारूढ पार्टी की साख का पता चल जाता है कि उसकी नीतियां व कार्यक्रमों को किस हद तक जनता पसंद करती हैं। हाल ही संपन्न निकाय चुनावों में नीतियां और कार्यक्रमों की जगह 'प्रतिष्ठाÓ ज्यादा महत्वपूर्ण रही चूंकि चुनाव का सारा दारोमदार ही सीटों पर कब्जा जमाना था। हालाकि इन चुनावों में तेरह मे से आठ पर कब्जा कर भाजपा ने अपनी साख तो कायम रखी किंतु प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई के चलते चुनावों में पराजय से पार्टी व सरकार को धक्का लगा है। तेरह नगर पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनाव में से अगर पार्टी बेस बहुमत देखे तो भाजपा ही आगे रही, उसने आठ पर कब्जा जमाया है तो शेष पर कांग्रेस को सफलता मिली वैसे इससे भाजपा गदगद हो सकती है लेकिन उसके लिये आठ सीटों पर कब्जा करना उतना मायने नहीं रखता जितना प्रतिष्ठापूर्ण सीटों को गंवाना। एक सीट निर्दलीय के हाथ भी लगी है।बैकुंठपुर में तो कमाल ही हो गया जहां निर्दलीय प्रत्याशी ने कांग्रेस की जमानत जब्त कर भाजपा को भी शिकस्त दे पालिका पर कब्जा कर लिया। रायपुर के निकट वीरगांव नगर पालिका और भिलाई नगर निगम पर सबकी नजर थी। यह दोनों सीटें इसलिये प्रतिष्ठापूर्ण बन गई चूंकि सत्तारूढ़ दल ने इन सीटों को जीतने के लिये अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। शायद यही कारण है कि विपक्ष ने फतह हासिल करने के बाद पहली प्रतिक्रिया में यही कहा कि यहां कांग्रेस की जीत यही दर्शाती है कि सरकार पराजित हुई। राज्य सरकार व संगठन के बड़े बड़े नेता अपने प्रत्याशी को जिताने के लिये पूरे तामझाम से उतरे। यह सही है कि कांग्रेस की तरह भाजपा में भी गुटबाजी है किंतु इस चुनाव में हमें लगता है कि भाजपा की गुटबाजी की जगह उसके चुनाव संचालन की खामियां ज्यादा महत्व रखती हैैं। चुनाव संचालन की जिम्मेदारियंा जिन लोगों के सिपुर्द रही उनमें से अधिकांश को कार्यकर्ताओ ने पसंद नहीं किया। भाजपा भटगांव विधानसभा चुनाव में जीत से गदगद थी और उसे पूरा भरोसा था कि दोनों ही सीट पर आसानी से जीत जायेगी, इस ओवर कान्फीडेंस ने भी भाजपा को पीछे ढकेल दिया। सत्ता में रहते हुए भाजपा ने जहां वैशालीनगर विधानसभा उपचुनाव को भी प्रतिष्ठापूर्ण सीट मानकर लडा और पराजय का सामना किया वहीं भठगांव चुनाव में उसने जीत हासिल कर पराजय पर मरहम पट्टी की किंतु नगर निकायों में वह कांग्रेस से उन सीटों को छीन नहीं सकी जिसपर उसका कब्जा था। वीरगांव और भिलाई निकायों में कांगे्रस की जीत से भाजपा को झटका लगा है। जहां तक चुनाव में ग्रामीण इलाकों का सवाल है-कुल सात नगर पंचायतों के चुनाव नतीजों से यह लगता है कि भाजपा की साख ग्रामीण इलाकों में शहरों के मुकाबले अच्छी है। भाजपा को सात में से चार सीट यहां मिली है जबकि दो सीट कांगेस को तथा एक सीट पर निर्दलीय विजयी हुआ है। दलों की स्थिति के आंकलन का अगला पड़ाव संजारी बालौद है। तेरह सीटों पर जीत पाकर यद्यपि भाजपा उत्साहित है किंतु प्रतिष्ठापूर्ण सीटों पर उसकी पराजय ने हतोत्साहित भी किया है। संजारी बालोद पर भी निकट भविष्य में प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई होगी। यहां भाजपा को कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

छेडछाड़ करने वाला अधमरा,रोकने वाले को पीट पीटकर मार डाला!

रायपुर दिनांक 26 दिसंबर 2010

छेडछाड़ करने वाला अधमरा,रोकने
वाले को पीट पीटकर मार डाला!
छेड़छाड़ करने वालों के साथ क्या सलूक किया जाये? क्या वही जो छत्तीसगढ़ में रायपुर के जलविहार कालोनी के एक परिवार ने किया जिसमें एक स्कूली बच्ची के साथ छेड़छाड़ करने वाले को एक बार मना करने के बाद भी नहीं माना तो पीट पीट पीटकर अधमरा कर दिया। दूसरी घटना बलौदाबाजार के पलारी की है जिसमें एक शिक्षक को सिर्फ इसलिये पीट पीटकर मार डाला चूंकि उसने छेडख़ानी का विरोध किया था। अब बताइये कौन आज के जमाने में किसी की मदद के लिये तैयार होगा? मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने इस घटना के बाद छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का आदेश पुलिस को दिया है। पुलिस इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में मजनुओं के खिलाफ क्या कार्रवाई करती है यह आने वाला समय बतायेगा लेकिन पलारी की घटना के बाद यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि किसी की परेशानियों में हम कितना भागीदार बन सकते हैं? शिक्षक वाली घटना के संदर्भ में सड़क पर किसी के साथ छीना झपटी, लूट, छेडख़ानी या कोई दुर्घटना में घायल व्यक्ति भी पड़ा है तो उसे उठाकर न अस्पताल पहुंचाया जा सकता है और न ही पुलिस को सूचना दे सकते हैं। पुलिस में जानकारी देने पहुंचें तो घायल के बारे में कुछ बतान से पहले पूछा जाता है कि तुम कौन? तुम्हारे बाप का नाम क्या?कहां रहते हो? आदि । अगर अस्पताल ले जाओ तो डाक्टर एक्सीडेंट केस बताकर इलाज करने तैयार नहीं होता। यहां भी पुलिस का लफड़ा। अगर इसके बाद भी हमने हिम्मत कर किसी को अस्पताल में दाख्रिल करा दिया और वह मर गया तो कानून हमारा यहां भी पीछा नहीं छोड़ता। बलौदाबाजार के शिक्षक का कसूर बस इतना था कि उसने राह चलती छात्राओं से छेडख़ानी करने वाले मजनुओं को ऐसा करने से मना किया। इसके लिये उसे तो जान से हाथ धोना पड़ा वह अलग बात है लेकिन उसके पीछे उसपर आश्रित एक पूरा परिवार भी अपने मुखिया को खो बैठा। इस घटना के बाद शायद पलारी के लोग तो कम से कम अब कोई किसी लड़की को छेड़ रहा है तो भी आंख मूंदकर चले जायेगें।कै सी स्थिति निर्मित हो गई ह,ै हमारे समाज में? यह भी दुर्भाग्यजनक है कि कई इस तरह के मामले है जिनमें अगर सड़क पर किसी नाजायज बात का कोई विरोध कर रहा हो तो भी आसपास खड़े लोग तमाशा देखते खड़े रह जाते हैं। बलौदा बाजार शिक्षक हत्याकांड वाले मामले में अगर कुछ लोग सामने आते तो संभव है शिक्षक की जान बचाई जा सकती थी। वैसे इस पूरे मामले में शिक्षक की मौत का कारण हार्ट अटैक बताकर अपराधियों को बचाने का प्रयास पहले से ही कर लिया गया है। सार्वजनिक अपराध के ऐसे मामलों में तत्काल सजा का प्रावधान होना चाहिये। अपराध कई लोगों के सामने हुआ है। अपराधी तुरंत पकड़े गये है। चश्मदीद गवाह भी हैं अत: पीडि़त पक्ष को न्याय देने में किसी प्रकार की देरी नहीं करनी चाहिये। अगर देर हुई तो साक्ष्य प्रभावित होंगे-अपराधी छूटकर आ जायेंगे और समाज में एक गलत संदेश जायेगा।बहुत से ऐसे मामले उदाहरण के तौर पर दिये जा सकते हैं जिसमें न्याय प्रक्रिया मे देरी के कारण साक्ष्य को पलटा दिया गया और अपराधी पतले रास्ते से निकल भागे।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कांग्रेस में बुजुर्गो के दिन लदें! युवा कंधे पर आयेगा भार?

रायपुर बुधवार दिनांक 23 दिसंबर 2010

कांग्रेस में बुजुर्गो के दिन लदें! युवा कंधे पर आयेगा भार?
कांगे्रस ने अपने युवराज राहुल गांधी के ताजपोशी की तैयारियां शुरू कर दी है। हाल ही बीता कांग्रेस का अधिवेशन इस बात का गवाह हो गया कि निकट भविष्य में राहुल गांधी को ही आगे कर संपूर्ण राजनीति का ताना बाना बुना जायेगा। इस अधिवेशन में कांग्रेस अपनी संस्था के पूरे ओवरआइलिंग के मूड में भी दिखाई दी। 125 वें वर्ष पर आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जिस प्रकार राहुल गांधी को हाईलाइट किया गया तथा युवा फौज को अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा किया गया। उससे इस बात की संभावना बढ़ गई है, कि बुज़ुर्गो को किनारे कर युवा पीढ़ी को देश चलाने का मौका दिया जायेगा। अगर आगे चलकर ऐसा होता है, तो यह कांग्रेस के लिये पूरे देश में उठ खड़े होने का एक अवसर होगा। वरना आगे आने वाले वर्ष कांग्रेस के लिये दुखदायी होंगे। कांग्रेस के इस अधिवेशन में दिग्विजय सिंह जिस ढंग से मुखर हुए और उन्होंने जो बातें कही- विशेषकर साठ वर्ष से ऊपर के लोगों की राजनीति के बारे में, वह लगता है कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से सिखा- पढ़ाकर दिया गया बयान है। जो यही संकेत दे रहा है कि आगे के दिन कांग्रेस के बुुजुर्गो के लिये अवकाश के हैं। जिस मंजे हुुए राजनीतिज्ञ की तरह राहुल गांधी ने अधिवेशन को संबोधित किया। उसे भी एक संकेत ही कहा जाना चाहिये कि आने वाला वर्ष राहुल गांधी का है। अधिवेशन में शािमल लोगों के मुंह से यह बात भी निकली कि- राहुल, राजीव गांधी की प्रतिछाया है- इससे बड़ा संकेत और क्या हो सकता है? दूसरी सबसे बड़ी बात यह कि लोकसभा में मौजूद अधिकांश युवा चेहरे राहुल को अपना चहेता मानकर उनके नेतृत्व में काम करने की भी बात कर रहे हैं। भारत के युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भी राहुल गांधी को अपना आइडल मानकर उसी की राह पर चलने की मंशा ब्यक्त करता रहा है। विभिन्न प्रदेशों में राहुल के चुनावी दौरों में युवा वर्ग की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि वे कितना महत्व रखते हैं, युवाओं के बीच। युवक कांग्रेस के सदस्यता अभियान में संख्या हर बार बढ़ती जाती है। कांग्रेस को अब अगर देश में अपनी साख बनानी है, तो उसे वास्तव में साठ वर्ष या उससे आगे का मोह छोड़कर एक नई रणनीति के तहत काम करना होगा। कांग्रेस के अधिवेशन में यह बात स्पष्ट हो गई है कि- सोनिया गांधी प्रधानमंत्री का पद नहीं लेंगी। बल्कि वे वर्तमान स्थिति में संगठन का नेतृत्व करती रहेंगी। राहुल गांधी और संपूर्ण अधिवेशन में प्रमुख नेताओं ने जिस प्रकार राहुल गांधी को विकीलिक्स खुलासे से उत्पन्न स्थिति से बचाकर निकाला। उसे भी कांंग्रेस की परिपक्व रणनीति का द्योतक कहा जाना चाहिये। विपक्ष में कांग्रेस की इस नई पहल से हड़कम्प होना स्वाभाविक है और वे भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आने वाले समय में कांग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का भरपूर प्रयास करेगी। विपक्ष के लिये कांग्रेस द्वारा निर्मित होने वाले इस तूफान को रोक पाना कठिन ही लगता है। इस स्थिति से निपटने के लिये विपक्ष को चाहे वह भाजपा हो या अन्य कोई भी पार्टी, एक बहुत कठिन दौर से गुजरना पड़ सकता है। इसकी ऐहतियाती पहल फिलहाल तो विपक्ष के पास यही है कि वह राहुल गांधी के लूप होल को किसी न किसी तरह उजागर कर उनकी छवि को जनता के सामने कमजोर करे। इसकी पहल विकीलिक्स खुलासे के बाद जरूर हुआ किंतु इसमें कोई खास सफलता हासिल नहीं हो सकी। अगर विपक्ष इस मामले में इस रणनीति पर चल रहा है कि वह इसको चुनाव के दौरान भुनाने का प्रयास करेगा तो इसमें भी उसको कोई फायदा नहीं होने वाला। क्योंकि हमारे देश में लोगों को जल्द ही भूल जाने की आदत है.... !

प्रदेश की आम जनता सुरक्षित नहीं, सुरक्षित है तो सिर्फ प्रदेश के मंत्री!

रायपुर दिनांक 21 दिसंबर 2010

प्रदेश की आम जनता सुरक्षित नहीं,
सुरक्षित है तो सिर्फ प्रदेश के मंत्री!
और अब बारी आई एक बुद्विजीवी की! प्रदेश में किस तेजी से कानून और व्यवस्था का भट्ठा बैठा है, इसका उदाहरण है बिलासपुर के युवा पत्रकार सुशील पाठक की हत्या। अपहरण, चेन स्नेचिगं, बलात्कार, चोरी डकैती, हत्या जैसी वारदातों से लबालब छत्तीसगढ में आम आदमी का जीवन कितना सुरक्षित है? यह अब बताने की जरूरत नहीं। सरगुजा में एक के बाद दो बच्चों की हत्या जहां रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। वहीं बिलासपुर में युवा पत्रकार की गोली मारकर हत्या ने यह बता दिया है कि प्रदेश में जहां बच्चे, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, वहीं कलमकार की जिंदगी भी अब अपराधियों के रहमोकरम पर है। राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर छत्तीसगढ़ के दो बड़े शहर हैं। इन दो बड़े नगरों में राज्य बनने के बाद से जिस तेजी से अपराध बढ़ा है, उसकी देन हम किसे माने? केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने जब दिल्ली में बढ़ते अपराधों के बारे में यह टिप्पणी की कि- वहां बाहरी लोगों के कारण अपराध बढ़ रहा है, तो लोग उनपर पिल पड़े। यहां तक कि उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराधों के परिप्रेक्ष्य में भी क्या चिदम्बरम का बयान लागू नहीं होता? सरगुजा में स्कूली बालक ऋतेश का अपहरण कर उसकी हत्या में बाहरी लोगों का हाथ साफ है। राज्य में अब तक जितनी बैंक डकैतियां हुई हैं, उसमें भी पुलिस की शंका बाहरी गिरोह की ही बताई जाती रही है। कुछ जो संदेही पकड़े गये हैं, वे भी बाहरी हैं। रायपुर के टाटीबंद में महिलाओं के गले से चेन स्नेचिंग का जो आरोपी पकड़ा गया वह भी महाराष्ट्र से है। इस आरोपी ने कई कांड किये हैं। एक कांड संभवत: रंजीता सलूजा के गले से चेन खींचने के पहले उसने सर्वोदय कालोनी हीरापुर में राह चलती एक महिला के गले से चेन खींचने का प्रयास किया, किंतु वह मकसद में कामयाब नहीं हो सका। इस आरोपी के जिस एक साथी की तलाश है, वह भी मध्यप्रदेश का है। वारदातों की एक लम्बी फेहरिस्त है। ऐसा लगता है कि अपराधियों के आगे पुलिस की संपूर्ण व्यवस्था फेल हो चुकी है। अभी कुछ ही दिन पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मीडिया और राजनीतिक मोर्चे की किरकिरी से तंग आकर अचानक पुलिस मुख्यालय पहुंचे थे तथा वहां उन्होंने डेढ़ घंटे तक पुलिस को खरी- खोटी सुनाई थी। इसके बाद एक दिन खूब पुलिसियां सक्रियता दिखी। फिर वही ढाक के तीन पात। दूसरी ओर प्रदेश के गृह मंत्री अपनी पुलिस के मामले में एक तरह से असहाय हैं। विधान सभा में भी उन्होंने बयान दे डाला है कि- हमारे थानेदार रिश्वतखोर हैं। हाल की बड़ी घटनाओं पर एक नजर डालें तो बैंक डकैती, हत्या, टीनएज के बच्चे या बच्चियों का अपहरण है। अनेक मामलों में बच्चों को तब अगवा कर लिया गया, जब वे स्कूल से लौट रहे थे। न्यायधानी बिलासपुर में हुई ताजी घटना ने संपूर्ण व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। आज की स्थिति में न कोई व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित है, और न ही उनकी संपत्ति सुरक्षित है। विशेषकर महिलाएं और बच्चे- अगर कोई प्रदेश में सुरक्षित है तो प्रदेश के नेता और मंत्री जिनके आगे पीछे सदैव पुलिस लगी रहती है।

े.

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

बात की तीर से निकलती आग में जल रही देश की राजनीति!

रायपुर दिनांक 20 दिसबर।
बात की तीर से निकलती आग
में जल रही देश की राजनीति!
'बातो से मारोंÓ-राजनीति का एक नया रूप इन दिनों सबके सामने है। बस थोड़ी सी चिन्गारी चाहिये, बात की मार ऐसी आग लगाती है कि पूरी राजनीति में उबाल आ जाता है। इस समय वाक युद्व के सबसे बड़े हीरों हैं राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह। जिनके मुंह से निकले तीर कई लोगों को घायल कर गए हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व देश के वित्त मंत्री प्रणव मुकर्जी ने कहा था कि- राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री हो सकते हैं। उनके इस बयान के तुरन्त बाद आस्ट्रेलिया के जासूसी चैनल ने खुलासा किया कि राहुल गांधी ने अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर के साथ हुई बातचीत में हिन्दू कट्टर पंथ को लश्करें तौयबा के आंतकवाद से ज्यादा खतरनाक बताकर एक नई कान्ट्रोवर्सी खड़ी कर दी। हालंाकि विकीलिक्स का यह खुलासा कोई नई बात नहीं थी। नई बात बस इसलिये थी चूंकि यह बात सोनिया गांधी के पुत्र और कांग्रेस द्वारा भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित राहुल गांधी के मुंह से निकली थी। विकीलिक्स के खुलासे के पूर्व केन्दी्रय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने जब देश में भगवा आतंकवाद का जिक्र किया। तो भी कुछ इसी तरह की हलचल हुई थी। इसके बाद मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी इस मामले में भड़कीला बयान देकर कूद पड़े। राजनीतिकारों को एक दूसरे को नीेचा दिखाने के लिये बस मौके की जरूरत होती है। जनता जिसे इन बयानबाजियों से कोई लेना- देना नहीं, सिर्फ मजा लेती है। विकीलिक्स के रहस्योद्घाटन के बाद देशभर में राहुल के खिलाफ मौजूद लोग संगठित हो गये और एक- एक कर उन्होनें हमला बोला जिसमें भाजपा में शामिल होने के लिये कतार में मौजूद उमा भारती, और अन्य कई भाजपा नेताओं के अलावा महाराष्ट्र में शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे भी शामल हुए। प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी चंूंकि, एक तरह से यह बयान हालांकि एक बंद कमरे में दो प्रमुख हस्तियों के बीच का था लेकिन पूरे एक समुदाय पर प्रहार करने वाला था। बयान देन वाला भी भारतीय राजनीति का एक प्रभावशाली व्यक्ति! विकीलिक्स के रहस्योदूघाटन के बीच कांग्रेस के 125 वें स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय महाधिवेशन पर सबकी नजर गई। जहां आंतकवाद और भ्रष्टाचार पर नेताओं के कड़े प्रहार के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरएसएस पर प्रहार कर संपूर्ण देश का ध्यान फिर अपनी आोर आकर्षित करा लिया। इस बार सिंह ने यह कहकर संघ पर प्रहार किया कि वह 'हिटलर की नाजी सेनाÓ की तरह है। इससे पहले सिंह मुम्बई में पाकी हमले पर एटीएस प्रमुख शहीद करकरे के बारे में विवादास्पद बयान देकर चर्चा में आ चुके हैं। राजनीति करने के लिये अपने प्रतिद्वन्दी को किसी न किसी तरह से नीचा दिखाना पड़ता है। इसके लिये अगर ऐसे हथकंडे अख्तियार किये जाये जो संप्रदाय जाति और धर्म के बीच वैमनस्य खड़ा करने का प्रयास किया जाये। तो उसे क्या कहा जाये? अपना स्वार्थ साधने के लिये राजनीति से जुड़े लोग आम जनता की भावनााओं से क्यो खेल रहे हैं? एक तो देश यूं ही गंभीर समस्याओ से जूझ रहा हैं। वहीं राजनीति से जुडे लोग अपनी रोटी सेंकने के लिये नये -नये हथकंडे अपनाकर राजनीतिक निपुणता दिखाने में लगे हैं।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

क्यों देते हैं दिग्गी विवादास्पद बयान? दो साल क्यों चुप रहे?

रायपुर दिनांक 13 दिसंबर 2010

क्यों देते हैं दिग्गी विवादास्पद
बयान? दो साल क्यों चुप रहे?
यह हमारे पूर्व मुख्यमंत्री को क्या हो गया ? दिग्विजय सिंह आजकल कांग्रेस के महासचिव हैं- उन्होंने बयान दिया है कि मुम्बई 26-11 हमले में शहीद एटीएस चीफ की मौत के पीछे हिन्दू संगठनवादियों का हाथ है। दो साल तक इस घटना पर लगातार चुप्पी साधे रहने के बाद अचानक रहस्योद्घाटन कर चर्चा में आने वाले र्दििग्वजय सिंह के मुंह खोलते ही भाजपा नेता राजनाथ सिंह भड़क गये। उन्होंने भी यही सवाल किया कि दिग्विजय सिंह दो साल तक चुप क्यों थे और अचानक उन्हें यह बयान देने की क्या जरूरत पड़ी? राजनाथ सिंह से पूर्ण सहमत होते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि दिग्विजय सिंह के कथन की सच्चाई जानने के लिये उनकी और एटीएस चीफ के बीच यदि कोई बातचीत हुई है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिये। ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये। अगर करकरे ने उनसे ऐसी कोई आशंका जाहिर की तो एक बार नहीं कई बार टेलीफोन पर बातचीत हुई होगी। सवाल यहां यह भी उठता है कि एटीएस चीफ को अगर हिन्दू संगठनवादियों से खतरा था। तो यह बात उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को बताने की जगह दिग्विजय सिंह को क्यों बताई? यह बात एटीएस चीफ ने मुख्यमंत्री को भी जरूर बताई होगी । फिर मुख्यमंत्री ने अब तक ऐसा कोई खुलासा क्यों नहीं किया? और यह खुलासा दिग्विजय सिंह की तरफ से ही इतने दिनों बाद क्यों हुआ? दिग्विजय सिंह दूसरे दिन यह कहते हुए मुकर भी गये कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि करकरे की हत्या में हिन्दू संगठनवादियों का हाथ है- मैने यह कहा था कि हिन्दू संगठन करकरे को परेशान कर रहे थे। यह बात उसी समय बता दी जाती, तो मुम्बई पर हमले की जांच करने वालों को इससे काफी मदद मिलती। कांग्रेस स्वयं यह महसूस करती है कि उसके महासचिव का यह बयान बेतुका है। शायद उसने इसीलिये इस बयान से पल्ला झाड़ा और इसे उनका व्यक्तिगत बयान करार दिया। दिग्विजय सिंह इससे पूर्व भी अपने विवादास्पद बयानों के कारण चर्चा मेंं आ चुके हैं। इस ताजा बयान ने उन्हें कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। चूंकि स्वयं एटीएस चीफ करकरे की पत्नी कविता करकरे ने इस मामले में सज्ञान लेते हुए उनके बयान को कोरी बकवास करार दिया है तथा कहा है कि उनके पति की हत्या हिन्दू संगठनवादियों ने नहीं बल्कि आंतकवादियों ने की है। राजनीति के एक मंजे खिलाड़ी के रूप में जाने जाने वाले कांग्रेस के इस यौद्वा का यह बयान आम लोगों के नजीरिये से देखें तो यह पूर्णत: कपोल कल्पित औैर ऐसे समय पर दिया गया बयान लगता है जब संसद में भ्रष्टाचार को लेकर युद्व छिड़ा हुआ है। क्या दिग्विजय सिंह ने यह बयान स्पेक्ट्रम मुदृदे पर से देश का ध्यान हटाने के लिये दिया? कुछ भी कहें उनके इस बयान ने और राजनीतिक पार्टियों को भले ही जगाया न हो किंतु भाजपा को जरूर अपने विरूद्व बोलने का एक मौका दिया है। राजनीतिक हल्कों में चर्चा यह भी है कि दिग्विजय सिंह से यह बयान जानबूझकर दिलवाया गया। अगर इम मामले में थोड़ी भी सच्चाई होती तो दिग्विजय सिंह जैसेे राजनीतिज्ञ को इतने दिनों तक चुप रहने का कोई औचित्य नहीं था।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

क्या गलत बोल दिया शिवराज ने ? यह तो आज की आवाज है!

रायपुर दिनांक 14 दिसबर।
क्या गलत बोल दिया शिवराज
ने ? यह तो आज की आवाज है!
खरी बात किसी के गले नहीं उतरती। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जब यह कहा कि राज्य सभा अंगे्रजो की देन है, जो अब खरीद फरोख्त की मंडी बनकर रह गई है। तो लोग उनपर पिल पड़े और शिवराज ंिसंह को अपना बयान वापस लेना पड़ा। राज्य सभा ही नहीं आज ऐसी कितनी ही संस्थाएं ऐसी हंै, जिनकी आवश्यकता नहीं है और फिजूल खर्ची बढ़ा रही है। शिवराज ंिसंह जैसे युवा की सोच जब उनकी आवाज बनकर गूंजती है, तो उन लोगों को बुरा लगता है जो परंपरावादी बनकर ऐसी संस्थाओं को बनाकर रखना चाहते हैं। शिवराज ंिसंह ने इस बात की भी वकालत की है कि देश में प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री का चुनाव राष्ट्रपति पध्दति से कराया जाये। चुनावी खर्च कम करने के लिये यह जरूरी है कि विधानसभा और लोकसभा का चुनाव भी एक साथ कराया जाना चाहिये। बकौल शिवराज सिंह ''राज्य सभा का कोई औचित्य नहीं है। राज्य सभा के चुनाव विधायकों के खरीद-फरोख्त की मंडी होती हैं जिससे लोकतंत्र शर्मसार होता है। राज्य सभा के औचित्य पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं कि राज्य सभा ऐसे लोगों के लिये बनाया गया था, जो चुनाव नहीं लड़ सकते। मसलन कलाकार व साहित्यकार, अब तो ऐसे लोग भी चुनाव में हिस्सोदारी निभाते हैं जो इस वर्ग में नहीं आते- यही कारण है कि यह चुनाव विधायकों के खरीद-फरोख्त की मंडी बन जाता है। इस स्थिति से ईमानदारी से राजनीति करने वालों का नुकसान होता है। उद्योगपतियों के लिये चुनाव में पैसा लगाना इंवेस्टमेंट हैं और वे सिर्फ काला धन ही देते हैं। यही कारण है कि नीरा राडिया जैसे लोग जन्म लेते हैं। शिवराज सिंह आज के युवा वर्ग के प्रतिबिम्ब है, उन्होंने जो बात कही वह आज के युवा सोच और उनके दिल से निकली आवाज मानी जानी चाहिये। राज्य सभा से बढ़कर उन्होंने यह बात नहीं कही कि राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति का भी औचित्य क्या है। जबकि यह पद भी राज्यों में अनावश्यक खर्च बढ़ा रहे हैं। सवाल यही है कि इस पद की जरूरत क्या है? जब प्रदेशों में मुख्य न्यायाधीश का पद है तो वे राज्यपाल के दायित्व को भी आसानी से निभा सकते हैं। राज्यपाल के पास सिवाय राज्यों की रिपोर्ट केन्द्र को पे्रषित करने के अलावा सामान्य दिनों में क्या काम बच जाता है? बहुत से ऐसे पद व संस्थाएं हैं, जो सिर्फ कतिपय लोगों को खुश करने के लिये बनाकर रखे गये हैं। शिवराज सिंह की बातों में दम है। इस मुद्दे पर विरोध अपनी जगह है। शिवराज सिंह के बयान का विरोध करने वाले तो करते रहेंगे मगर, देश की व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये अगर कोई सही सुझाव देता है, तो तंत्र को उसपर गौर करना चाहिये। शिवराज ंिसंह के बयान में बहुत सी बातें देश के चुनाव आयोग को विचार करने के लिये है। कम से कम देश की इस संवैधानिक संस्था को शिवराज के विचारों पर गौर करना चाहिये।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!

शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य
में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!


यह केक था या देश का दिल जिसे गुरुवार को कांग्रेसियों ने चाकू से काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये? हम बात कर रहे हैं देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी के जन्म दिन पर कांग्रेसियों द्वारा काटे गये केक की। वाराणसी में आंतकी हमले के परिपे्रक्ष्य में सोनिया गांधी ने इस वर्ष अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था लेकिन उनके अति उत्साही कार्यकर्ताओंं ने केक काटा, इसपर किसी को कोई आपत्ति नहीं है लेकिन केक को राष्ट्रध्वज का प्रतीक बनाकर जिस ढंग से गोदा गया यह कितना उचित था? यह कांग्रेसियों का सोनिया के प्रति पे्रम का प्रदर्शन था या राष्ट्र के प्रतीक का अपमान? जब राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्वयं अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था तब इन कांग्रेसियों को कौनसा भूत सवार हो गया कि वे सारी मर्यादाओं को त्याग कर एक ऐसा केक उठा लाये जो बिल्कुल तिरंगे के आकार का था जिस पर चक्र भी बनाया गया था। अगर केक काटना ही था तो एक सामान्य केक काटकर अपनी खुशी का इजहार कर सकते थे, लेकि न सबसे अलग दिखाने की चाह व होड़ में वे यह भी भूल गये कि यह एक संवैधानिक अपराध है। जिसकी सजा तीन साल की जेल या जुर्माना दोनों हो सकता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रीय नेताओं के अपमान का एक सिलसिला सा चल पड़ा है। राष्ट्रीय ध्वज को पाकिस्तान ने कुछ दिन पूर्व उलटा फहराया था। ऐसा ही कुछ इससे पूर्व यूरोपीय देश में हुआ। राष्ट्रीय नेताओं के अपमान की तो एक लम्बी गाथा है- कभी अमरीका में भारत के पूर्व राष्ट्रपति से दुव्र्यवहार होता है तो कभी भारतीय राजनयिकों को कपड़े उतारकर अपनी सुरक्षा जांच कराने का हुक्म दिया जाता है। देश के अंदंर ही राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वालों का तांता लग गया है जिस पर किसी की नजर ही नहीं है। आस्टे्रलिया में तो रोज कोई न कोई भारतीय अपमानित होता है। इन अपमानों की एक लम्बी फेहरिस्त के बाद भी हमें शर्म नहीं आती कि हम ऐसे राष्ट्रों के अतिथि बनकर दुबारा पहुंचते हैं और दुबारा अपमानित होते हैं। अफ्रीका में महात्मा गांधी को ट्रेन से उठाकर फेंका तो उसकी चिंगारी पूरे विश्व में आग बनकर झुलसने लगी और देश आजाद हो गया किंतु आज उसी गांधी के देश में उसके अपने ही लोग राष्ट्रध्वज का अपमान कर रहे हैं। घूसखोरी, शराब खोरी, चोरी, लूट, बलात्कार, डकैती और हत्या से राष्ट्र के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। क्यों हम इस अवसाद की स्थिति में पहुंच गये? कौन जवाबदार है इसके लिये? क्या राष्ट्रीय ध्वज को केक बनाकर काटने वाले कांग्र्रेसियों में इतनी भी समझ नहीं रह गई कि वे जिसे चाकू से काट-काट कर खुशियां मना रहे हैं। वह करोडों राष्ट्रभक्तों के संघर्षों की एक संपूर्ण दास्तां का प्रतीक है। जव वह हवा में लहराता है तो देश का सीना तन जाता है, देश की आंखें चमक उठती हंै और हम गर्व से कहते हैं-'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा-Ó
शर्म करो -अब किया तो किया, भविष्य में ऐसा करोगे तो शायद कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा-

रायपुर बुधवार दिनांक 8 दिसबंर 2010

छेडछाड की बलि चढ़ी नेहा- क्या
अंतिम उपाय 'मौत ही रह गया ?
यह अकेले नेहा भाटिया की कहानी नहीं हैं, संपूर्ण छत्तीसगढ़ में स्कूली छात्राओं से छेडख़ानी और उन्हें प्रताडि़त करना एक आम बात हो गई है। छेड़छाड़ से दुखी नेहा ने अपने शरीर को आग के हवाले कर दिया था। मंगलवार को नेहा ने प्राण त्याग दिये। बहुत सी छात्राएं छेड़छाड़ को बर्दाश्त कर इसकी शिकायत इसलिये नहीं करती। चूंकि उन्हें डर लगा रहता है कि परिवार के लोग इसके पीछे पड़ कर बड़ी मुसीबत में पड़ जायेंगे। पुलिस में जाने से छेड़छाड़ पीडि़त महिला तो डरती ही है, उसका परिवार भी ऐसा नहीं करना चाहता। जबकि नेहा जैसी कई ऐसी छात्राएं भी हैं, जो अपमान को गंभीरता से लेकर उसे मन ही मन बड़ा कृत्य करने के लिये बाध्य हो जाती है। क्या स्कूल प्रबंधन इस मामले में बहुत हद तक दोषी नहीं है, जो ऐसी घटनओं की अनदेखी करता है? क्या छेड़छाड़ पीडि़तों के लिये यही एक अंतिम उपाय है कि वह मौत को गले लगा ले? नेहा कांड से पूर्व छत्तीसगढ़ के छोर सरगुजा से एक खबर आई कि एक युवक की लड़की के भाई और साथियों ने जमकर पिटाई कर दी, चूंकि वह बहन को छेड़ता था। मामला जो भी हो, छेड़छाड़ के अक्सर मामले में लोग कानून को हाथ में लेने बाध्य हो जाते हैं। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं रह जाता। छेड़छाड़ की घटनाओं का कोई समय नहीं होता- लड़की को अकेला देखा तो छेड़ दिया फिर चाहे, वह स्कूल जा रही हो, सब्जी लेने या दूध लेेने? गाली गलौज के रूप में छेडख़ानी के अलावा आजकल राह चलती महिलाओं के दुपट्टा खींचना, अश£ील हरकत करना, स्कूटर से गिरा देना या अन्य ऐसी ही हरकतें जहां आम हो गई हैं। वहीं इस छेड़छाड़ की आड़ में किसी के गले से चैन खींच लेना भी आम बात हो गई हैं। छेेड़छाड़ की आड़ में आपराधिक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। छेड़छाड़ पीडि़त महिला अगर सड़क में थोड़ा सा साहस दिखाये तो यह उसके हित में ही जायेगा। जैसे ही कोई उसके साथ छेडख़ानी करें युवती को चाहिये कि वह आसपास से निकल रहे लोगों से अपनी रक्षा के लिये सहायता लें। युवतियों की मदद के लिये कई लोग सड़क पर उतर जाते हैं। एक बार एक को अच्छा सबक सिखाया जाये तो दूसरे में इसकी हिम्मत नहीं रह जाती। छेडख़ानी का एक दूसरा माध्यम है मोबाइल। बच्चे स्कूल में इसका उपयोग किन कामों के लिये करते है, यह बताने की जरूरत नहीं। जहां तक छेडख़ानी में पुलिस की भूमिका का सवाल है पुरुष की बनिस्बत महिला पुलिस छेड़छाड़ करने वालो से अच्छे से निपट सकती है। जब तक छेडख़ानी के मामले में लिप्त व्यक्तियों को सार्वजनकि रूप से जलील नहीं किया जायेगा, ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। छेडख़ानी में लिप्त लड़कों की फौज या तो किसी पान ठेले में मौजूद रहेगी या फिर ऐसे किसी मोड़ पर जहां से होकर स्कूल कॉलेज के लिये निकलना लड़कियों की मजबूरी है। नेहा भाटिया के साथ जो कुछ हुआ उससे छत्तीसगढ़ शर्मसार है। छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में ऐसी घटना न दोहराई जाये, इसके लिये यह जरूरी है कि इन घटनााओं पर अंकुश लगाने के लिये कठोर कदम उठाये जायें।

रविवार, 21 नवंबर 2010

फिजूल खर्ची,अव्यवस्था बन रही लोकतंत्र में अडंग़ा, कौन ले संज्ञान?

रायपुर सोमवार दिनांक 22 नवंबर 2010

फिजूल खर्ची,अव्यवस्था बन रही
लोकतंत्र में अडंग़ा, कौन ले संज्ञान?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज ऐसा कुछ होता जा रहा है कि जिसकी जो मर्जी आये वह वैसा करता जाये। क्या आप और हम यह महसूस नहीं करते कि देश में भ्रष्टाचार के साथ नेताओं की फिजूल खर्ची, मनमर्जी भी कुछ ज्यादा होती जा रही है? बिहार चुनाव के दौरान खबर आई कि चालीस दिन के प्रचार में नेताओं ने हेलीकाप्टरों से उड़ान भरते हुए तेरह करोड़ रूपये खर्च कर डाले। यह तो हेलीकाप्टर का खर्चा है, इसके अलावा अन्य जो खर्च हुआ वह अलग। इस खर्च में हर चुनाव लडऩे वाली पार्टी शामिल हुई। चुनाव आयोग द्वारा खर्चों पर लगाम के बाद सिर्फ एक राज्य में चुनाव के दौरान यह खर्चा हुआ। जबकि देशभर में होने वाले चुनावों के दौरान नेताओं की हवाई उड़ान तथा अन्य होने वाले खर्चो का हिसाब लगाये, तो वह अरबों में होता है। जब देश में हर पांच साल में एक साथ चुनाव हुआ करते थे, तब इतना खर्चा नहीं होता था। आज एक के बाद एक राज्यों में होने वाले चुनावों के कारण खर्च हो रहा है। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बराबर यह मांग करते रहे हैं कि राज्य व केन्द्र के चुनाव एक साथ, एक ही बार में कराये जाये। सरकार में बैठे लोगों को अच्छे सुझावों को स्वीकार करने में क्या परेशानी है? स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद संसद की कार्रवाई लगातार बाधित हो रही है। संसद की कार्यवाही पर प्रति सेकेडं के हिसाब से लाखों रूपये का खर्चा होता है। अगर इन हंगामों और सदन की कार्रवाही नहीं होने से जनता का कोई भला हो, तो हम इसपर चुप्पी साधकर बैठ सकते हैं लेकिन लगातार कार्यवाही बाधित कर देश के खजाने को जो चोट पहुंचती है, उसका सारा भार तो आखिर जनता की जेब पर ही पड़ता है। स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ। संबन्धित मंत्री को निकाल भी दिया। सरकार क्या स्पेक्ट्रम घोटाले की कमाई को संबन्धित लोगों से छीन सकती है? क्या स्पेक्ट्रम से जुड़े लोगों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी पर चढ़ा सकते है, और क्या विपक्ष की मांग पर जेपीसी गठित होने से इस समस्या का हल हो सकता है? अगर सरकार ने जेपीसी का गठन कर भी दिया और उसका निष्कर्ष स्पेक्ट्रम घोटाले बाजों के खिलाफ गया, तो कितने पर कार्रवाई होगी? अब तक गठित जेपीसी की रिपोर्टों के बाद कितने भ्रष्ट लोगों को जेल के सींखचों के पीछे भेजा गया? ऐसा लगता है कि संपूर्ण हंगामा राजनीतिक मकसद को पूरा करने के उद्रदेश्य से होता है जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। आम जनता यह महसूस करती है कि उनका नेता उनके बीच का आदमी है लेकिन जैसे ही चुनाव जीतता है। उसकी सुरक्षा इतनी हो जाती है कि वह आम आदमी के बीच का न होकर किसी दूसरे गृह का व्यक्ति बना दिया जाता है। सरकारी खजाने से नेताओं की सुरक्षा उनकी सुख- सुविधाओं के लिये राजसी ठाठ की तरह व्यवस्था होती है। बहुत कम नेता गुलजारी लाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री सरीके रह गये हैं। जो मतदाता वोट देते समय अपने नेता को देखता है, वह उसे पांच वर्षो बाद ही दुबारा देख पाता है। जनता का जनता के लिये जनता के द्वारा चलाया जाने वाला लोकतंत्र बासठ साल बाद कितनी खामियों से घिर गया? इसका अंदाज लगाया जा सकता है। राजनीति को एक उद्योग का दर्जा देकर कुछ लोगों ने इसे पैसा कमाने का जरिया बना लिया है। हमारे दावे इसी से स्पष्ट होते हैं कि माननीयों ने अपने वेतन में बढ़ौत्तरी की मांग को लेकर ससंद की कार्यवाही को कई दिन तक चलने नहीं दी थी। अंतत: सरकार झुक गई। माननीयों का वेतन बढ़ गया, नुकसान हुआ देश की जनता का। भ्रष्ट व्यवस्था, फिजूल खर्ची और दमखम के बल पर शासन चलाने का कतिपय लोगों का अदाज राजतंत्र की याद ताजा करता है। न्यायपालिका जरूर बीच- बीच में इसपर संज्ञान लेती है, किंतु उसके बावजूद एक सघन निगरानी व नियंत्रण के अभाव में मनमानी नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।

शनिवार, 20 नवंबर 2010

समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी हासिल कर ली सरकारों ने!

रायपुर, शुक्रवार दिनांक 20 नवंबर 2010
समाज को बांटे रखने में भी मास्टरी
हासिल कर ली सरकारों ने!
क्या हमारी व्यवस्था खुद ही समाज को कई भागों में नहीं बांट रही? गरीब,निम्र वर्ग,मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग, हरिजन, आदिवासी, अल्प संख्यक यह सब शब्द समाज द्वारा दिये गये नाम तो नहीं हैं। सरकार ने इन सबकी उत्पत्ति कर इसे अलग- अलग वर्गो में बांटा है। वोट बैंक की राजनीति के लिये किये गये इस वर्गीकरण ने आज देश के सामने कई मुसीबतें खड़ी कर दी। आजादी के बाद देश में कुछ ऐसे हालात थे कि लोग काफी संख्या में पिछड़े हुए थे। गरीब थे- इतने गरीब कि उन्हें दो जून की रोटी नहीं मिलती थी, पहनने के लिये कपड़े नहीं और रहने के लिये छत नहीं। बच्चों को वे पढ़ा नहीं सकते थे, स्वास्थ्य की सविधाएं उन्हें मिलती नहीं थी। ऐसे लोगों को सरकारी मदद देकर सरकार ने उन्हें इस लायक बना दिया कि- वे कुछ काम करने के लायक बन गये। इस दौरान उनके बच्चे भी अन्य बच्चों के साथ पढ-लिख गये और उन्होंने नौकरियों में अच्छे- अच्छे पद भी प्राप्त किये। ऐसे लोगों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था एक समय सीमा तक होनी चाहिये थी, लेकिन सरकारे आती जाती रही, उसने यह नहीं सोचा कि गरीब जिसे वह मदद करता रहा है, कितना गरीब है? और जिसे आरक्षण देता रहा उसे और कितने दिन आरक्षण की जरूरत है। सरकारी व्यवस्था ने गरीबों को मदद और आरक्षण को एक धंधा बना लिया जिसके माध्यम से वह हर पांच साल में सत्ता मे आने का रास्ता बनाता। गरीब को गरीब बने रहने दो और आरक्षण पाने वालों को पुश्तों तक आरक्षण मिलता रहे ताकि वह सरकारी मदद के आगे सदैव नतमस्तक रहे तथा पार्टियों के वोटर बैेंक की तरह उन्हें सत्ता में लाते रहें। होना यह चाहिये था कि जिन गरीबों की मदद सरकार ने की, उसे वह देखे कि- मदद के बाद वह गरीबी रेखा से ऊंचा उठा कि नहीं? अगर उठ गया तो मदद बंद की जाये तथा इस बात का प्रयास करें कि आगे के वर्षो में गरीबों की संख्या न बढ़े। लेकिन सरकार की नीतियां हमेशा यही रही कि- गरीब को गरीब और आरक्षित को आरक्षित ही रहने दिया जाये। इसका नतीजा यह हुआ कि देश का जो टेलेंट है, वह या तो यहीं दबकर रह गया या फिर उसने विदेशों का रास्ता पकड़ लिया। गरीब वर्ग के नाम पर देश का एक ऐसा वर्ग सामने आ गया, जो गरीबों से उपर उठकर अपराधी प्रवृत्ति का हो गया तथा उसने एक तरह से असल गरीबों का हक उनसे छीनना शुरू कर दिया। कहीं एक बत्ती कनेक्शन तो कहीं चावल, कहीं मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य के नाम पर यह वर्ग ऐसी सारी सुविधाएं, जो असल गरीबों को मिलनी चाहिये थी वह सरकार को गुमराह कर या सांठगांठ कर हासिल करने लगा। इस मदद के नाम पर सरकार से जारी होने वाला दस रूपये का अधिकांश भाग या तो अफसरों और इन योजनओं को चलाने वालों के जिम्मे चला जाता या फिर यह ऐसे कथित गरीब लूटकर ले जाते जिसे मजदूरी या कोर्ई काम करके परिवार का भरण- पोषण करना चाहिये था। गरीबों को सरकार वर्गीकृत कर मदद पहुंचाना चाहती है, तो वह अंधेरे में तीर मारने की जगह हकीकत का सामना करे। असल गरीब जी न सकने के कारण आत्महत्या कर रहा है। सरकार की जयजयकार कर उसकी मदद पर वोट देेने वाले कथित गरीब असल गरीबों का हक मार रहे हैं। सरकार यह सुनिश्चित करें कि वह जिसे मदद या आरक्षित कर सहायता पहुंचा रहा है। वह अब उसका वास्तविक हकदार है कि नहीं। मदद की एक समयावधि निश्चित करें। उस दौरान उसे पूरा उठ खड़े होने का मौका दे, तभी देश में लोग समानता से जी सकेंगें। भीख और मदद की बात आजादी के त्रेसठ सालों बाद अब कोई औचित्य नहीं रखता। भारतीय संविधान में सभी को समान अवसर उपलब्ध है, उसका उपयोग कर हर नागरिक को जीने का अधिकार है। समाज को बंाटने का काम अब बंद होना चाहये।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

'मृगतृष्णा बन गई मंहगाई-हम पागलों की तरह भाग रहे हैं उसके पीछे...

रायपुर दिनांक 20 नवंबर 2019
'मृगतृष्णा बन गई मंहगाई-हम पागलों
की तरह भाग रहे हैं उसके पीछे...
सरकार के आंकड़े दावे करने लगे हैं कि महंगाई कम होने लगी है। क्या यह आंकड़े हकीकत को बयान कर रहे हैं? जब तक आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान तीनों सही या उनकी आमदनी की पहुंच के आधार पर उपलब्ध न होने लगे, तब तक कैसे कह सकते हैं कि मंहगाई कम हो रही है? सरकार अभी जनता से मार्च तक और इंतजार करने को कह रही है, ऐसे कितने ही मार्च निकल गये...मंहगाई यूं ही बढ़ती चली गई। ऐसे जैसे कोई मृगतृण्णा हो, जिसके पीछे हम पागलों की तरह भागते ही चले जा रहे हैं। इस सप्ताह बुधवार को कहा गया कि प्याज के मूल्य तेजी से बढ़ रहे हैं। गुरुवार को खबर आई कि गेंहू की कीमत में ग्यारह प्रतिशत से अधिक की बढौत्तरी हुई। इधर सरकारी आंकडों ने गुरुवार को ही दावा किया है कि -ज्यादातर खाद्य वस्तुओं के दाम में नरमी से 6 नवंबर को समाप्त सप्ताह में मुद्रास्फीति की दर दो प्रतिशत घटकर 10.3 प्रतिशत रह गई। इसके साथ ही सकल मुद्रास्फीति के साल के अंत तक छह प्रतिशत के स्तर पर आने की उम्मीद बढ़ गई इससे पूर्व सप्ताह में खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति 12.3 प्रतिशत पर थी। जबकि बीते साल की समान अवधि में यह 13.99 प्रतिशत थी। यह सही है कि काफी लंबे समय के बाद खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति एक विशेष अवधि में बीते साल की समान अवधि के मुकाबले कम है, लेकिन इसके पीछे क्या हम यह कह सकते हैं कि सरकार के किसी प्रयास से यह संभव हो सका? बल्कि बात यह है कि वस्तुओं के दामों में अगर थोडी बहुत भी गिरावट आई है, तो उसके पीछे कारण यही हो सकता है कि त्यौहार का सीजन निपट गया तथा बारिश के बाद अब सर्दी के दिनों में नई फसल धीरे- धीरे बाजार में आना शुरू हो गई। इसमें सरकार ने क्या तीर मारा? जब मंहगाई सर्वाधक ऊंचे स्तर पर थी, तब सरकार ने आम लोगों को कोई राहत नहीं पहुंचाई। तो अब कौन सी जादुई छड़ी का इस्तेमाल कर दावा किया जा रहा है कि खाद्यान्न की कीमतों में कमी आ रही है। जिन वस्तुओं के दाम कथित महंगाई के दौरान बढ़ा दिया गया था। उसमें से एक भी वस्तु का दाम आज गिरा नहीं है। चाहे वह पेट्रोलियम पदार्थ हो, कपड़े हो, मकान बनाने का कच्चा माल हो या फिर खाने- पीने की वस्तुएं। सरकार अगर भाव कम हाने का दावा करती है तो वह डिब्बे बंद वस्तुओं में पुराने और नये कम दाम क्यों नहीं दर्शाने का निर्देश कंपनियों को देती। आजकल डिब्बा बंद खाद्यान्न वस्तुओं का जमाना है। सारी वस्तुएं सामान्य व्यक्ति की पहुंच से ऊंचे भाव पर चल रही है। जमाखोरों और कालाबाजारियों के गोदामों में अभी खाद्यान्न भरा पड़ा है। उसे निकालने प्रयास सरकारी स्तर पर होना चाहिये। जबकि सरकार जनहित की बात छोड़क र अपने ही मुद्दों पर उलझी हुई है। खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति में नरमी जरूर आई है, उससेे रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति को सख्त करने के उपायों के मामले में राहत ले सकता है। सख्त मौद्रिक नीति के चलते सितंबर में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 16 माह के निचले स्तर 4.4 प्रतिशत पर आ गई।
महाराष्ट्रध्दि में फसल बर्बाद होने के चलते प्याज की कीमतों में 0.63 प्रतिशत तेजी दर्ज की गई। जबकि प्रोटीन आधारित खाद्य वस्तुओं की कीमतों में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। अंडा, मीट और मछली की कीमत में 33 प्रतिशत से अधिक की बढ़ौतरी बनी हुई, वहीं दूध के दाम 25 प्रतिशत से अधिक और दालों के दाम 19.4 प्रतिशत अधिक बढ़े हुए हंै। इसके अलावा, गेहूं की कीमत में 11 प्रतिशत से अधिक की वृध्दि मध्यम वर्ग की रसोई के लिये आज भी समस्या खड़ी किये हुए है। रोज खाने और कमाने वाला अकेले खाद्य पदार्थो को नहीं देखता। उसकी रोजमर्रा की अन्य आवश्यकताएं भी हंै, उसे कैसे पूरा किया जाये? अभी शादी ब्याह का समय है-ऐसे में मध्यम वर्गीय सोने में आई थोड़ी सी राहत से कुछ सोना तो खरीद ही सकता है। सोना बीस हजार चार सौ बीस रूपये प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया था। अब यह एक सौ अस्सी रूपये लुढ़ककर बीस हजार दो सौ बीस रूपये प्रति दस ग्राम रह गया है। आम आदमी को जीने के लिये रोटी- कपड़ा और मकान चाहिये- जब यह तीनों ही आसानी से उपलब्ध नहीं है, तो कौन सी महंगाई को कम होने की बात हम कर सकते हैं?

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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!

रायपुर शुक्रवार 19 नवंबर
आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी
में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!
वह कौन सी जादुई छड़ी है जिससे घूसखोरी का इलाज किया जायें? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मानते हैं कि जब तक चुनावी चंदे पर रोक लगाकर पब्लिक फण्ड से चुनाव लडऩे की व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकती। बकौल गहलोत देश में कैग, सीवीसी, सूचना का अधिकार जैसी कई संस्थाएं और कानून बन गए, लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि चुनाव के लिए चंदा लेते ही भ्रष्टाचार की शुरूआत हो जाती है। क्या यही एक कारण है? बहुत हद तक इसे ठीक माना जा सकता है चूंकि इस फंड की बजह से ही देश में मंहगाई बढ़ती है और भ्रष्टाचार फैलता है। गहलोत तो यहां तक कहते हैं कि कितनी भी संस्थाएं बना ली जाएं, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। जब देश के एक मुख्यमंत्री की यह धारणा है तो भ्रष्टाचार में लिप्त इस देश को भगवान ही बचा सकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की नाकामी में गहलोत का यह कहना कि ठेकेदार अफसर के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। पैसे को इस ढंग से खर्च करना कि जनता को इसका पूरा लाभ मिले यह बहुत मुश्किल है और अब नरेगा जैसी योजनाओं में मिलने वाली भारी धनराशि के कारण यह काम सरकार के लिए और भी मुश्किल हो गया है। इससे यह साफ जहिर है कि सरकार के पास ऐसा कोई उपाय बचा ही नहीं है जिसके मार्फत देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से आम जनता को निजात दिलाई जायें। चुनावी फंड पर जनता तो लगाम नहीं लगा सकती। इसे सरकार को ही कानून बनाकर खत्म करना होगा। जब सारी बाते जनप्रतिनिधि जानते हैैं तो इसे वे जनता के पाले में क्यों फेंकते हैं। सरकार को कठोर से कठोर कानून बनाने से किसने रोका? भ्रष्टाचार सिस्टम में घुसकर आतंकवाद और जातिवाद जैसी ही चुनौती बन गया है, जो देश को खोखला कर रहा है। जो लोग देश के प्रमुख उद्योगपति टाटा को तक नहीं छोड़ते उनके अधिनस्थ काम करने वाले कर्र्मचाारी अधिकारी साधारण लोगों को कितना नौचते होंगें इसकी कल्पना की जा सकती है। टाटा के बयान के बाद दूसरे प्रमुख उद्योगपति राहुल बजाज ने भी यह स्वीकार किया है कि देश की कई बड़ी कंपनियां रिश्वत देकर अपना काम निकलवाती हैं। बकौल बजाज, आजकल देश में रिश्वत देना आम बात हो गई है। बजाज राज्य सभा के सदस्य भी हैं वे इसके लिये उन लोगों को दोषी करार देते हैं जो काम करवाने के लिये रिश्वत देते हैं मगर बजाज साहब बात यहीं खत्म नहीं होती चूंकि अगर पैसा नहीं दो तो हर आदमी का हश्र ऐसा ही होगा जैसा टाटा का हुआ- टाटा मांगे पन्द्र्रह करोड़ रूपये दे देते तो आज वे एक एयरलाइंस के भी मालिक होते। देश में ऐसे आदर्शवादियों की कमी नहीं हैं, रिश्वत नहीं देने के कारण उनकी कई योजनाएं अटकी पड़ी हैं-ऐसे लोगों का काम होगा भी नहीं जब तक वे संबन्धित व्यक्ति की मांग पूरी न कर दें।बजाज ने कहा है कि कंपनियां बिना रिश्वत दिए भी अपना काम करवा सकती हैं। बल्कि उनके लिए तो यह एक आम आदमी की तुलना में ज्यादा आसान होगा। बस उनमें इतना माद्दा होना चाहिए कि वो रिश्वत देने से मना कर सकें। हमारे अनुसार यह कहना आसान लगता है लेकिन बात जब हकीकत में आती है तो आप कुछ नहीं कर सकते मान लीजिये आप किसी छोटे मोटे झगड़े में फंस गये और पुलिस वाला कानून बताकर आपसे कह रहा है कि पांच हजार दो तो आदमी छूट जायेगा वरना उसे लाकअप में रहना पड़ेगा और कल उसे अदालत में पेश किया जायेगा , हो सकता है उसे जेल भी भेज दिया जाये- इस स्थिति में परिजन क्या करेगा? स्वाभाविक है कि वह अपने व्यक्ति को पैसा देकर छुडाना ही बेहतर समझेगा। रिश्वत ने हर व्यक्ति को जाल में जकड़ लिया है जिसका अंंत सिर्फ कठोर कानून है उसके बगैर देश में हम केवल भ्रष्टाचार को कोसने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

बुधवार, 17 नवंबर 2010

राष्ट्र का पौने दो लाख करोड़ रूपये डकार लिया, फिर भी तना है सीना!

रायपुर दिनांक १७ नवंबर।
राष्ट्र का पौने दो लाख करोड़ रूपये
डकार लिया, फिर भी तना है सीना!
सब कुछ खा -पीकर डकारने के बाद हमारे नेता कहते हैंं कि हमने कुछ नहीं खाया,चाहों तो हमारा पेट काट कर देख डालों। मंत्री पद से हाल ही बेदखल हुए केन्द्रीय संचार मंत्री ए. राजा सीना ठोककर यह कहते हुए घूम रहे है कि उन्होंने कुछ गलत नहंीं किया। कैग की रिपोर्ट कहती है कि २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले से देश को १.७६ लाख करो$ड रुपये का नुकसान हुआ। राजा ने नहीं खाया तो इतने पैसे का बाजा कैसे बजा? कौन खा रहा है देश का पैसा? क्यों ऐसे नेताओं को रााष्ट्र का पैसा खाने के बाद खुले आम घूमने की इजाजत दी जा रही? क्यों नहीं ऐसे लोगों के खिलाफ सेना में कोर्ट माश्रल की तरह देश की संपंत्ति हड़पने और देश की जनता को धोखे में रखकर उनका पैैसा खाने का मुकदमा कायम किया जाता? क्या देश की जनता के गले यह बात नहीं उतरती कि छोटी छोटी पार्टियां और उसके नेता सरकार में शािमल होने के लिये क्यों ललचाते हैं और मलाईदार विभाग हड़पने के लिये हाय तौबा करते हैं? मनमोहन ंिसंह सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में शशि थरूर को तत्काल बर्खास्त कर दिया लेकिन राजा के मामले में उसने इतना समय क्यों लगाया जबकि राजा पर तो थरूर से भी बड़ा गंभीर आरोप है। सराकार को मालूम था कि राजा ने बड़ा अपराध किया है किंतु डीएमके समर्थन वापस लेती है तो इस स्थिति में सरकार को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। सत्ता बचाने के लिये भ्रष्टाचारी को बचाकर मनमोहन सिंह सरकार ने भी रिश्वत खोर का साथ नहीं दिया?राजा की पूरी अकड़ अपने आका डीएमके नेता करूणानिधि के कारण है चूंकि वे जानते हैं कि करूणनिधि के रहते उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति हमारे देश के कई नेताओं के साथ है जिनपर किसी न किसी बड़े नेता की छाया रहती है और इसकी आड़ में कुछ भी करते हैं। राजा पर स्पेक्ट्रम घोटाले का आरोप बहुत पहले से लगा हुआ था। विपक्ष की लाख मांग के बावजूद वे जहां इस्तीफा नहीं देने की बात पर अडे हुए थे वहीं करूणानिधि ने भी अडियल रवैया अख्तियार कर रखा था। यह जानते हुए भी कि राजा स्पेक्ट्रम घोटाले में आंकठ डूबे हुए हैं उसके बाद भी वे कौन से कारण हैं जिसके चलते करूणानिधि अपने मोहरे को बचाने में लगे रहे, इसका अर्थ भी साफ है कि डीएमके पार्टी के लोग भी इस पूरे घोटाले में राजा के साथ भागीदार बने रहे हैं और उनको ंइसके लिये पूरी छूट देते रहे हेैं। संपूर्ण देश को हिलाकर रख देने वाले इस संचार घोटालेे ने यह तो साबित कर दिया है कि देश भ्रष्टाचार के प्रकरण में आंकठ डूब गया है। लोग लाख चिल्लते रहे, ऐसे भ्रष्टाचार मामलों का वही हश्र होता रहा है जो पूर्व के प्रकरणों का हुआ है। एक पूर्व संचार मंत्री पहले भी इसी प्रकार भ्रष्टाचार में बुरी तरह फंसे थे उनका क्या हुआ? उनके तो घर से भी इतना नगद बरामद हुआ था कि सीबीआई को सम्हाले नहीं सम्हल रहा था। ससंद में इससे पहले भी वर्तमान सत्तारूढ पार्टी और आज जो विपक्ष में बैठे चिल्ला रहे हैं उनके समय भी इसी तरह के घाोटालों के कारण ससंद की कार्रवाई बाधित होती रही है किंतु जिस भ्रष्टाचार को लेकर हंगामा होता रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त कोई भी नेता जेल के सीकचों के पीछे नहीं भेजा गया। चूंकि जांच की प्रक्रियाएं ही इतनी लम्बी चलती है कि जनता की बात तो छोडिय़ें सरकारें भी भूल जाती है कि क्या हुआ था।

सोमवार, 15 नवंबर 2010

हावडा-मुम्बई मेल को समय पर चलाने सोर्स स्टेशन नहीं बदलने की जिद क्यों?

रायपुर दिनांक 15 नवबंर
हावडा-मुम्बई मेल को समय पर चलाने
सोर्स स्टेशन नहीं बदलने की जिद क्यों?
रेलवे को इस बात की जिद क्यों हैं कि वह हावड़ा-मुम्बई मेल को हावड़ा से ही चलायेगी? 28 मई 2010 को ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को नक्सलियों द्वारा विस्फोट कर पटरी से उतारने और उसके जाकर एक मालगाड़ी से टकरा जाने के बाद से अब तक रेलवे यह तय नहीं कर पाई है, कि हावड़ा-मुम्बई मेल के समय को कैसे नियंत्रित किया जाये? हावड़ा-मुम्बई मेल के रायपुर पहुंचने का समय आज भी टाइम टेबिल पर और यहां तक कि रेलवे द्वारा जारी किये जाने वाले टिकिटों पर सुबह 9.05 लिखा हुआ है । लेकिन यह ट्रेन दुर्घटना दिन के बाद से लगातार अब तक रायपुर पहुंचती है- शाम सात, आठ या नौ बजे। पूछताछ कार्यालय से यही सूचना दी जात्री है कि आठ घंटे या दस घंटे लेट चल रही है। दुर्घटना या आंतकवादी घटना को पांच माह बीत चुके हैं और रेलवे अब तक यह तय नहीं कर पा रही है कि इस ट्रेन को समय पर यात्रियों को कैसे उपलब्ध कराया जाए। रेलवे, हावड़ा- मुम्बई मेल के विलंब का कारण 'सुरक्षा बताता है। अगर उसे इतना ही डर है तो इस ट्रेन के समय में स्थायी परिवर्तन क्यों नहंी करता या सोर्स स्टेशन क्यों नहीं बदलता? क्यों यात्रियों को सुबह नौ बजे से शाम या रात तक इंतजार करने के लिये मजबूर किया जा रहा है़? पश्चिम बंगाल, रेलमंत्री ममता बेनर्जी का गृह राज्य है। शायद यही कारण है कि रेलवे इस ट्रेन को हावड़ा से खडग़पुर-राउरकेला तक रद्द कर आगे की यात्रा पूर्व समयानुसार करने से हिचक रही है। अगर रेलवे को अब भी नक्सली हिंसा का डर है, तो उसे इस ट्रेन का सोर्स स्टेशन हावड़ा की जगह राउरकेला कर उसे आगे के लिये समयानुसार चलाना चाहिये। हम यह नहीं कहते कि सैकड़ों यात्रियों का जीवन संकट में डालकर मेल को या अन्य ट्रेनों को रात में उस रूट पर चलाये, जहां किसी प्रकार के तोडफ़ोड़ की आशंका है। रेलवे यह अच्छी तरह जानती है कि इस रूट पर यह एक स्थाई समस्या है। फिर उसने इसे हल करने का प्रयास पांच महीनों बाद भी क्यों नहीं किया ?। रेलवे की इस ढिलाई से कई यात्रियों ने इस उपयोगी ट्रेन से यात्रा करना छोड़ दिया चूंकि इसका स्टेशनों में पहुंचने का समय ऊठपटांग हो गया। अब यह बात भी लोगों को समझ में नहीं आ रही कि मुम्बई से रवाना होने वाली हावडृ़ा मैल का समय क्यों बदला गया। यह ट्रेन पहले रात आठ बजे के आसपास वीटी से छूटती थी जो अब कई महीनों से सुबह चार बजे छूट रही है। सुरक्षा के नाम पर रेलवे अपनी व्यवस्था ठीक करने में कोताही कर रही है और सैकड़ों याित्रयों को परेशानी में डाल रही है। हावड़ा मुम्बई मेल को उस समय तक राउरकला, रायगढ या बिलासपुर से चलाया जाये जब तक रेलवे इस ट्रेन की सुरक्षा का पुख्ता इतजाम न कर ले। रेलवे की कमजोरी इसी से उजागर होती है कि वह ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे,जिसमें 170 लोग मारे गये थे से अब तक सिर्फ सुरक्षा का बहाना कर कोई वैक्ल्पिक व्यवस्था न करते हुए ट्रेनों को अपनी मनमर्जी से चला रही है- उसे इस बात का कोई सरोकार नहीं कि यात्रियों को कितनी परेशानी हो रही है?यह उल्लेख भी यहां किया जा सकता है कि 19 जुलाई को पश्यिम बंगाल के सैतिया में उत्तरबंगा एक्सपे्रस-वनांचल एस्सपे्रस से भिड़ गई थी तथा इस दुर्र्घटना में 63 लोग मारे गये और 165 से ज्यादा लोग घायल हुए।

रविवार, 14 नवंबर 2010

खूब चिल्लाओं बाबाजी... भ्रष्टाचारियों पर नहीं पडऩे वाला कोई असर...!

खूब चिल्लाओं बाबाजी... भ्रष्टाचारियों
पर नहीं पडऩे वाला कोई असर...!
रामदेव बाबाजी,अन्ना हजारे ,स्वामी अग्रिवेश और किरण बेदी जी-आप सभी महानुभाओं से हमारा सिर्फ एक ही सवाल-आपने रविवार को दिल्ली के जंतर मंतर में चिल्ला चिल्लाकर कहा कि- देश में हजारों करोड़ रूपये का भ्रष्टाचार हुआ। क्या इसका कोई हल निकल सकता है? हर कोई यह जानता है कि देश पांच वर्ष के बजट से भी ज्यादा राशि के भ्रष्टाचार में आंकठ डूबा है। जो सत्ता में है, वह भी और जो सत्ता में नहीं, वह भी। आप जैसे चंद ईमानदार लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर आम लोगों में अलख जगाई उसके लिये आप बधाई के पात्र है। किंतु क्या इससे कोई फायदा होगा? आपने चिल्लाया, जनता ने सुना, सरकार ने भी सुना, विपक्ष ने भी सुना...और सबने सुना और सुनकर सब भूल गये कि- आपने क्या कहा। यह जो भूलने की प्रवृति है, इसी ने आज देश को भ्रष्ट तंत्र के हवाले कर दिया। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की दुहाई देते हैं। अमरीका जैसा विश्व शक्तिमान भी हमारी तारीफ करता है किंतु जिस तंत्र में हम सांस ले रहे हैं। उसमें हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने या कहें जैसा आप लोगों ने जंतर मंतर में चिल्लाया। उस ढंग की तो आजादी है लेकिन किसी की गिरेबान पकड़कर यह पूछने का अधिकार नहीं है कि आपने देश का पैसा क्यों चुराया? तुम्हें इसका अधिकार किसने दिया कि हमारे खरे पसीने की कमाई को तुम यूं ही अपने परिवार को मोटा ताजा करने के लिये लगाओ। बाबा रामदेव सहित सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों का पूर्ण सम्मान व अभिनंदन करते हुए कहना चाहते हैं कि जब तक हम देश में कठोर से कठोर कानून नहीं बनाएंगे। ऐसे भ्रष्टाचारी देश की सत्ता में काबिज होते रहेंगे। सारी व्यवस्था में परिवर्तन करने की जरूरत है। आज राजनीति जहां भ्रष्टाचार की गर्त में आंकठ डूब गई है। वहीं उसके द्वारा चलाया जा रहा सरकारी तंत्र भी आंकठ भ्रष्टाचार में डूब गया है। विकास कार्यो और गरीबों को परोसने के लिये दिये जाने वाले अनाज में तक रिश्वतखोरी की बू आने लगी है। घर में बच्चा पैदा होता है तो उसे भी पैदा करने के लिये अस्पताल को घूस देनी पड़ती है। तब कहीं जाकर मां के पेट से चीर- फाड़ किये बगैर शिशु जन्म लेता है। कैसी दुर्दशा में हम जी रहे हैं। बाबा रामदेव ने चुनाव के दौरान कहा था कि- स्विस बैंक से पैसा निकलवाने में वे अहम भूमिका निभायेंगें। हम पूछना चाहते हैं कि वे कितना पैसा स्विस बैंक से निकलवा सके? इस पांच वर्ष के दौरान देश का अरबों रूपये जो आम गरीब के पसीने से निकलता है नेता, मंत्री और अधिकारी मिल जुलकर खा गये। खेल को तक नहीं छोड़ा उसको भी चबा डाले। फिर भी जापान या अन्य किसी देश की तरह किसी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया। सब स्वतंत्र घूम रहे हैं। कोई विदेश में बैठा ललकार रहा है कि- आ तुझ में हिम्मत है तो मेरा बाल बांका कर ले तो कोई सार्वजनिक मंच पर खिलखिलाकर हमारी खिल्ली उड़ा रहा है कि- देख तेरा पैसा हम कैसे खा गये-तूने हमारा क्या बिगाड़ लिया। बाबाजी आप और आपके साथियों ने समाज को सुधारने के लिये जिस डगर को पकड़ा है। उसकी आगे की डगर बहुत कठिन है। फिर भी हम आपके हिम्मत की दाद देते हैं कि कहीं किसी ने कुछ तो पहल की।

शनिवार, 13 नवंबर 2010

खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?

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रायपुर शनिवार।
दिनांक १३ नवंबर २०१०
खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के
प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?
खाकी पहना पुलिस वाला कोई अपराध करें, तो उसके लिये अलग कानून और आम आदमी ने ऐसा कर दिया, तो उसके लिये अलग कानून। क्या दोनों के अपराध करने का तरीका अलग- अलग होता है? बलात्कार जैसे मामले मेंं अपराधी को तुरन्त गिरफ्तार कर हथकडिय़ों में जकडऩे का प्रावधान है। फिर पुलिस ऐसे अपराध पर इस ढंग की कार्रवाई क्यों नहीं करती?- हम बात कर रहे हैं धर्मजयगढ़ थाने की जहां कि पुलिस पर आरोप है कि उसने दो युवतियों की अस्मत को रौंद डाला। पहले इस मामले पर खूब बवाल मचा। बाद में युवतियों ने बलात्कार से इंकार किया और डाक्टरी परीक्षण से भी इंकार कर दिया। पुलिस के आला अफसर रिपोर्ट लिखने की बात छोडिय़े। इस मामले के अपराधी पुलिस वालों को पकड़कर सींखचों के पीछे भेजने तक से कतराते रहे । समाज की सुरक्षा का दायित्व जिन कंधों पर है, वह जिस ढंग का खेल खेल रहा है। वह उसकी संपूर्ण कार्यप्रणाली को ही एक बार पुनरीक्षित करने का दबाव बना रहा है। धर्मजयगढ़ में कथित बलात्कार की घटना के बाद गा्रमीणों के आक्रोश से कुछ तो कार्रवाई हुई। वरना युवतियों को अपराध के बाद जिस ढंग से दबाया गया, उससे तो लगता है कि इस थाने में यह आदत सी बन गई है। बहुत कम ही मामले होते हैं जिसमें कोई महिला अपने ऊपर बलात्कार का आरोप लगाकर अपने जीवन को दांव पर लगाती हैं। क्या इस मामले में युवतियों व उसके परिवार पर पुलिस का व्यापक दबाव नहीं पड़ा? महिलााओं पर अत्याचार के मामले में सरकार के कड़े कानून की भी पोल इस मामले से खुल जाती है। चूंकि संपूर्ण सूचना देेने के बाद भी महिला अत्याचार को गंभीरता से नहीं लिया गया। बाद में अब यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि बलात्कार हुआ ही नहीं। अगर ऐसा है तो युवतियों पर उलटा मुकदमा क्यों नहीं कायम किया गया? पुलिस युवतियों के पलटने के बाद उनको डाक्टरी परीक्षण के लिये मजबूर भी तो कर सकती थी ताकि- दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाये। बलात्कार की इस घटना ने जिसने पूरे छत्तीसगढ़ की पुलिस को दागदार किया है। पुलिस को इसे धोने के लिये संपूर्ण मामले की निष्पक्ष अधिकारियों से जांच कराई जानी चाहिये। यह अकेले धरमजयगढ़ का मामला नहीं हैं, जहां खाकी पर दाग लगा है। लवन में शनिवार को एक युवक को चोरी के शक में पकड़कर मरा समझकर उसके घर लाकर फेंक दिया गया। इसके विरोध में ग्रामीण सड़क पर आये, तो प्रशासन जागा। राजधानी रायपुर के कुछ थाने तो ऐसे हैं, जहां फरियादी की एफआईआर दर्ज करने तक के पैसे मांगे जाते हैं। नियम यह कहता है कि थाने में एफआईआर दर्ज करने के बाद एफआईआर की कापी फरियादी को भी दें। किंतु क्या पुलिस के आला अफसर बता सकते हैं कि कितने थानों में एफआईआर दर्ज होने के बाद फरियादी को उसकी कापी दी जाती है? खाकी की हरकतें खुद उसे गर्त की ओर ले जा रही हैं। कभी शराब पीकर रास्ते पर हुडदंग तो कभी किसी निर्दोष को पीट- पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। तो कभी थाने में ही किसी युवती की अस्मत लूट ली जाती है। हम कौन से युग में जी रहे हैं? असल बात तो यह है कि खाकी वर्दी पहनने के बाद पुलिस अपने आपको समाज से अलग- थलग एक दूसरे ग्रह का प्राणी समझने लगता है। उसे हमारी पृथ्वी पर रहने वाले जीव दूसरी तरह के नजर आते हैं। आपने कभी किसी समारोह में पुलिस जवानों को ट्रकों में भरकर ड्यूटी पर जाते देखा है- उस मार्ग से जाती महिला को इतना शर्मिन्दा कर दिया जाता है कि वह रास्ते पर आगे बढऩे की हिम्मत नहीं करती। यह है हमारी फोर्स का अनुशासन। जिसे समाज सुधारने का दायित्व सौंपा गया है। असल में पुलिस को हाईटेक करने से पहले उसे पूरी तरह से अनुशासन में रहने और समाज के बीच कैसे काम करना है, यह सिखाया जाना चाहिये। पुलिस के ऐसे जवानों को जो अपने परिवार से दूर रहते हैं। उन्हें क्यों ऐसे ग्रामीण थानों में तैनात किया जाता है, जहां वे अपनी पूरी मनमानी करते हैं?

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

ऑपरेशन क्लीन शुरू करों फिर देखों, लाखों रोजगार पा जायेगें

रायपुर शुक्रवार। दिनांक 12 नवबंर 2010
ऑपरेशन क्लीन शुरू करों फिर
देखों, लाखों रोजगार पा जायेगें
.....और अब सरगुजा का एक इंजीनियर तीन करोड़ रूपये का आसामी निकला.. सरकार के पास ऐसे और कितने हीरे से जड़े अधिकारी हैं? सिर्फ पैसा कमाना ही ध्येय बन गया है, हमारे जनसेवकों का। हर कोई जानता है कि इस देश में ऐसे भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की कोई कमी नहीं है जिनके पास देश के एक बजट से ज्यादा की राशि अपने खजानों में जमा है। नौकरी सरकार की करते है, गुणगान भ्रष्टाचरण में मिले पैसे का होता हैं। सरकार के पैसों को किस तरह से लूट-खसोटकर अपनी तिजोरियों में भरा जा रहा है इसके सैकड़ों उदाहरण सरकार के सामने आने के बाद भी ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है?यही न कि उन्हें कुछ समय के लिये मानसिक प्रताडऩा मिलती है। हमने हाल के आयकर छापों के बाद कुछ लोगों से बात की। तो उनकी ऐसी धारणा बन गई है कि भ्रष्टआचरण में लिप्त ऐसे लोगों का कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि हमारा कानून ही इतना लचीला है कि भ्रष्टाचारी को स्वतंत्र घूमने की खुली छूट है। विभाग में कुछ दिन चक्कर लगायेंगे। बाद में सब आपसी समझौते से रफा- दफा। कोई कठोर कानून ऐसे मामलों में न होने के कारण भ्रष्ट आचरण में लिप्त लोगों के हौसले ऊं चाइयों पर है। सरकार की लाचारी देखिये कि वह भ्रष्ट आचरण में लिप्त लोगों को नौकरी से तक बर्खास्त नहीं कर सकती। ज्यादा से ज्यादा निलबित कर दिया जाता है। कुछ दिन बाद निलंबन वापस लेकर उसे उसी पद पर या उससे ऊंचे पद पर फिर से विराजमान कर दिया जाता है। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें करोड़ों रूपये का घोटाला उजागर होने के बाद ऐसे लोगों को निलंबन के बाद न केवल नौकरी पर वापस लिया गया, बल्कि उन्हें ऊंचे पद पर बिठाकर उनका सम्माान किया गया?आम आदमी जो भ्रष्टाचार से तंग है उसका सरकार से यही सवाल है कि- ऐसे व्यक्तियों को, जो अकूत नाजायज संपत्ति बनाने के लिये दोषी है,उन्हें सरकारी नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाता ? और उन्हें इस तरह अयोग्य घोषित क्यों नहीं किया जाता कि वे आगे किसी सरकारी अथवा निजी संस्थान में काम करने के लायक नहीं रह जाय? उसकी संपत्ति जप्त कर सरकारी खजाने में क्यों नहीं डाली जाती? अगर, नेता ऐसे मामले में दोषी पाया जाता है, तो उसके साथ भी वहीं किया जाना चाहिये। जो सख्ती का बखान हमने सरकारी कर्मियों के लिये किया है। ऐसे नेताओंं की राजनीतिक गतिविधियों के लिये सदा के लिये रोक लगाने के साथ ही उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिेये। क्यों ऐसे लोगों को आम जनता के सर पर लादकर बेवजह उनका बजन बढ़ाया जा रहा है? सरकार अगर किसी भ्रष्ट व्यक्ति को पकड़ती है तो वह इसका ब्योैरा सार्वजनिक करें। साथ ही यह बताये कि उसपर क्या कार्रवाई की गई? उसे कितनी सजा दी गई? यह भी सार्वजनिक करें कि उसे नौकरी से निकाला या नहीं? बकायदा इसे अखबारों में इश्तहार के रूप में जारी करें, जिस प्रकार अन्य मामलों में वह डिफाल्टरों के बारे में जारी करती है। संपत्ति सगे संबन्धियों के नाम पर ही क्यों न हो जप्न्त करें। उसे उतनी ही संंपत्ति अपने पास रखने का अधिकार हो जितना उसने
अपने पसीने से बनाया हो। ऐसे लोगों के लिये इतनी कठोर सजा का प्रावधान हो कि भविष्य में कोई दूसरा ऐसा करने का प्रयास न करें। जबतक इस तरह से सरकार कठोर नहीं होगी, ऐसे भ्रष्ट धन पुत्र सामने आते रहेंगे। ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई नहंी करने का ही नजीजा है कि बेरोजगारों के लिये सीट खाली नहीं हो रही। अगर सरकार भ्रष्टों को एक- एक कर नौकरी से निकालना शुरू करें या 'ऑपरेशन क्लीनÓ शुरू करें, तो कल से देखिये देश में लाखों नवयुवको को रोजगार मिलने लगेगा!

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी भी है कानून में कुछ खामियां!

रायपुर दिनांक 11 नवंबर 2010
मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी
भी है कानून में कुछ खामियां!
कानून भावना मेंं नहीं बहता, साक्ष्य मिला तो सजा,वरना बरी। ऐसे कितने ही मामले रोज अदालतों में पहुंचते हैं जिसमें अपराध करने वालों की मंशा अपराध करने की नहीं होती, किं तु हो जाता है। ऐसे में भारतीय दंड विधान की कई धाराएं एकसाथ सक्रिय हो जाती हैं, जो ऐसे व्यक्ति के निकलने के सारे रास्ते बंद कर देती हैं। क्या कानून में भावना या इमोशन को स्थान दिया जाना चाहिये? इस सबंन्ध में कानूनविदो व आम लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है। लेकिन कुछ अपराध ऐसे होते हैं जो मर्जी से नहीं किये जाते, बस हो जाते हैं। ऐसे अपराधों को क्यों न इमोशन के आधार पर छोटी-छोटी सजा में बदला जायें? अब जयपुर के उस पॉलीटेक्रिक कालेज के डिप्लोमाधारी युवक दीपक की ही बात करें, जिसने लव मैरीज के बाद अदालती कार्रवाही के खर्चे पांच लाख रूपये निकालने के लिये बैंक में एटीएम और लॉकर तोडऩे की योजना बनाई। जिसके लिये वह बैंक के अंदर पूरे साजोसामान के साथ करीब चार दिन रहा और अंत में नाकामी के साथ पकड़ा गया। कानून की नजर में वह चोर है, और सामााजिक दृष्टि से देखे तो थोड़ा बहुत इमोशन इस युवक के प्रति भी मुड़ता है कि उसके सामने यह समाज विरोधी कृत्य जिसे कानून की नजर में अपराध कहते हैं, करने के सिवा कोई दूसरा उपाय ही नहीं था। पांच लाख रूपये आम आदमी के लिये एक बहुत बड़ी रकम होती है जिसे वह न समाज से मांग सकता है और न अपनों से। दोनों ही उसे अपने रास्ते पर छोड़ देंगे। लेकिन जब उसने बैंक में घुसने का अपराध किया तो वह सबकी नजर में चोर बन गया। यह कृत्य उसने तब किया जब वह हर तरफ से हार गया। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय उसके पास था भी नहीं। समाज और कानून को बनाने वालों को ऐसे सवालों का जवाब ढूंढने की जरूरत है। यह युवक सदा के लिये चोर बन गया। भले ही उसे इस कृत्य के लिये एक पैसा भी न मिला हो। दूसरा उदाहरण हम रायपुर में हाल ही घटित उस विस्फोट का दे सकते हैं, जिसने संपूर्ण छत्तीसगढ़ को हिलाकर रख दिया। पहले यह समझा गया कि यह कृत्य रायपुर में पिछले कई समय से सक्रिय कथित डॉन गिरोह का है या फिर नक्सलियों ने दहशत फैलाने के लिये किया है। लेकिन जब पुलिस को तहकीकात के अंतिम समय में जो सुराग मिला उसे कह सकते हैं- खोदा पहाड़ निकली चुहिया- लालच बुरी बलाये, उन युवकों के साथ भी वही हुआ, जो अमूमन अनजाने में अपराध कर जाते हैं। कचरा फेंकने निकले थे और विस्फोट में फंस गये। दवा दुकान अथवा गोदाम में सड़ रहे माल को कबाडी के हाथ बेचने निकले लड़कों को लगा कि अगर कबाड में जा रहे माल में से तांबा निकाल लिया जाये। तो शायद इससे उनकी दीवाली खुशहाल हो जायेगी। इसी चक्कर में उन्होंने मेडिकल कॉम्पलेक्स के कचरे के ढेर में अपने कबाड में रखे डेटोनेटर को मिलाकर आग लगा दी और इससे जो विस्फोट हुआ उसने पूरे प्रशासन को हिला दिया। अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिये यह लड़के तत्काल पुलिस में पहुंचकर अपनी गलती स्वीकार कर लेते, तो भी शायद उन्हें सजा होती। क्योंकि उन्होंने ऐसा कृत्य किया था, जिसने संपूर्ण व्यवस्था को झकाझोर दिया। इस मामले में यद्यपि अदालत मेंं यह लड़के अपनी निर्दोषिता सिद्व कर दे। लेकिन उनके जीवन में आये इस कानूनी दांव- पेंच ने न केवल दवा उठाकर देने वालों के सामाजिक जीवन को मुसीबत में डाल दिया। वरन् कई परिवार जो इन पर आश्रित हैं, उनको भी मुसीबत में डाल दिया। समाज व कानून को ऐसे मामलों में गंभीरता से सोच- विचार कर कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिये कि गेहूं के साथ घुन न पिस सके।

चिथड़े कपड़ों में लिपटे नन्हें हाथों की बुझे बारूद के ढेर में खुशियों की खोज

रायपुर, बुधवार दिनांक ८ नवंबर

चिथड़े कपड़ों में लिपटे नन्हें हाथों की
बुझे बारूद के ढेर में खुशियों की खोज
यह करीब पांच- साढ़े पांच बजे का वक्त होता है,जब लोग दीवाली का जश्र मनाकर गहरी नींद में सो रहे होते हैं- फटे- पुराने कपड़े पहने बच्चों का एक हुजूम लोगों के दरवाजों के सामने होता है। दीवाली के बाद आसपास बिखरे पड़े कचरे के ढेर से यह अपनी खुशी ढूंढते हैं। इन बच्चों की दीवाली लोगों के न टूटने वाले पटाखों की बारूद से मनती है। यह दौर दो- तीन दिन तक चलता है। तब तक इनके पास काफी ऐसे पटाखें इकट्ठे हो जाते हैं। करोड़ों रूपये के पटाखें लोगों ने एक- दो दिन में फूंक डाले, किंतु इसी समाज का एक वर्ग ऐसा भी है। जो सिर्फ हमारी खुशियों को ललचाते हुए निहारता रहता है। यह इस एक साल की बात नहीं है, हर साल ऐसा ही होता है। पो फटने से पहले ही गरीब बच्चे इसी आस में कि कहीं कचरे के ढेर में कोई जिंदा फटाका मिल जायें। फूटे हुए कचरे को उलट- पुलट करते हैं, ताकि वे अपनी दीवाली मना सकें। साठ - बासठ साल की आजादी के इस दौर में हमने कई ऐसे दौर देखे जब देश संकट की घडिय़ों से गुजरा, देश को विदेश से अनाज आयात करना पड़ता था। युद्व,अकाल और प्राकृतिक विपदाओं के उस दौर ने लोगों के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े हो गये थे। समय बीतता गया और उन्नति तथा विकास के दौर ने देश की दिनचर्या ही बदल दी। अमरीकी और रूसी मदद की जगह देश का अनाज हमारे गोदामों में भरा पड़ा है। विकास के पथ पर हमारी बराबरी अन्य विकसित देश के मुकाबले होती है। जबकि ताकत के मामले में हम विश्व की तीसरी ताकत के रूप में हैं किंतु इसके बावजूद हममें जो खामियां हैं। उसे दूर करने का प्रयास किसी स्तर पर नहीं हो रहा। गरीब वर्ग आज भी उसी हालत में है। वह किसी खुशी में भी मुख्य धारा के साथ नहीं जुड़ पा रहा। पंडित नेहरू ने एक समय आराम -हराम है का नारा दिया था, लोग इसे भूल गये। हम अपने त्योहार और उत्सवों की आड़ में अपने सारे कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं। भले ही एक घर में मुश्किल से एक सीमा तक पटाखे फूटते हों, किंतु ऐसा कर पूरे देश में करोड़ों का पटाखा फूट जाता है और हम चैन की नींद सो जाते हैं। दूसरे दिन से कम से कम एक हफ्ते तक कोई काम नहीं होता। अलाली इतनी छा जाती है कि लोग अपना सारा कार्य, यहां तक कि अपनी नौकरी का कर्तव्य भी भूल जाते हैं और स्वीकृत छुट्टियों को और दुगना कर देते हैं। त्योहार के दूसरे- तीसरे दिन भी दुकानें व अन्य संस्थानों का बंद रखना क्या इसी प्रवृत्ति का द्योतक नहीं है? देश ने त्योहार पर जो खुशियां मनाई, वह वाजिब थी। अगर सिर्फ यह मिठाइयों, नाच- गानों और अन्य कार्यक्रमों तक ही सीमित रहता तो उचित था किंतु इस दौरान जो आतिशबाजी के नाम पर अरबों रूपये हमने फूंक डाले। उस पर आगे के वर्षो में विचार करने की जरूरत है। आशिबाजी का पैसा आज उन गरीबों के कपड़े व अन्य उनकी आवश्यकताओं पर व्यय किया जाता। तो शायद उन गरीबों की दुआएं लोगों के घर- घर पहुंचती। आतिशबाजी के रूप में आवाज करने वाले पटाखों पर सरकार ने बहुत हद तक प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन इसके बावजूद ऐसे पटाखे बाजार में कैसे पहुंच जाते हैं? यह सरकार की लापरवाही का ही परिणाम है कि ऐसे पटाखा बनाने वाले कारखानो को वह ऐसा करने से नहीं रोकती।

बीते रे दिन!

रायपुर ,गुरुवार, दिनांक ५ नवंबर
बीते रे दिन!
खुशी,उमंग और उल्लास से भरा दीपोत्सव का त्यौहार हर भारतवासी के जीवन में और खुशियां बिखेरे यही आशा हम दीपोत्सव पर कर सकते हैं। भगवान राम के चौदह साल वनवास के बाद अयोध्या वापसी पर हर साल हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर उनके स्वागत व देश की खुशहाली और उन्नति के लिये यह त्यौहार मनाते हैं। आज से एक नया साल शुरू होता है लेकिन पिछला हमारा कोई ज्यादा अच्छा भी नहीं रहा। भगवान राम की जन्म भूमि का विवाद देश की एक छोटी कोर्ट से जरूर निपटा लेकिन आगे यह अब भी विवादास्पद बना हुआ है या बना दिया गया है। मगर एक आशा जगी है कि हर समुदाय और संप्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचे बगैर इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत इसे भी सदा- सदा के लिये निपटा देगी। सन् 1947 में आजाद हुआ हमारा देश अब बुजर्गियत के कगार पर पहुंच गया है। त्रैसठ वर्षो का लम्बा सफर तय कर लिया गया है। गरीबी,अज्ञानता,मंहगाई, भ्रष्टाचार, आंतक जैसी बुराइयों से हम आज भी निजात नहीं पा सके हैं। देश में नासूर बन चुके नक्सलवाद पर न केन्द्र की कोई नीति हैं और न राज्यों की। समस्या जैसे की तैसे से और बदतर होती जा रही है। बीते कुछ साल का जिक्र करें, तो हम देखते हैं कि हमने कुछ नहीं पाया। गरीब और गरीब हो गये, अमीरों की संख्या बढ़ गई, आंतकवाद पर पिछले वर्षाे के मुकाबले बहुत हद तक हमने सबक लेकर काबू पाया ,किंतु आम आदमी की जिंदगी में कोई सुधार नहीं आया। बेरोजगारी बढ़ गई-इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं ने संपूर्ण देश को घेर लिया। भ्रष्टाचार की जडं़े और मजबूत हो गई। विश्व के भ्रष्टाचार क्रम में भारत का दर्जा बढ़ गया। भ्रष्ट अफसरों, नेताओं तथा अन्य प्रभावशाली लोगों की तिजोरियां इतनी भारी हो गई कि उठाते नहीं बनता। देश के विकास और निर्माण के नाम पर निकलने वाला पैसा कई रावणों की तिजौरियों में भर रही हैं। पड़ोसी राष्ट्रों से संबन्ध सुधरने का दूर-दूर तक पता नहीं। चीनी ड्रेगन कब हम पर वार कर दे कोई नहीं जानता। पाकिस्तान आंतकवादियों की फौज तैयार करने में लगा है। उसकी निगाह हमेशा हमारी जमीन पर आंतक फैलाने और अस्थिरता लाने की रहती है। भारत विश्व में तीसरी ताकत बनकर उभरकर आया है लेकिन विदेशों से अच्छे संबन्ध बनाने के मामले में हम अब भी पिछड़े हुए हैं। दीपावली के इस दौर में हमारे बीच विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की उपस्थिति आत्मीयता का आभास जरूर करायेगी, लेकिन उनका रूख भी भारत के प्रति उतना खास नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हमें विश्व के सबसे बड़े फोरम सुरक्षा परिषद में जगह जरूर मिल गई लेकिन स्थाई सदस्यता के मामले में अमरीकी रूख अभी भी साफ नहीं है। प्रकृति इस बार देश के प्रति बहुत हद तक मेहरबान है। हालांकि भारी वर्षा और बाढ़ से काफी तबाही हुई है किंतु अन्य वर्षो के मुकाबले फसल अच्छी होने से कुछ तो राहत की उम्मीद की जा सकती है। आर्थिक मोर्चे पर हमारी हार चिंता का विषय है। महंगाई पर काबू पाने में नाकामी हर आदमी को चिंतित किये हुए है। पेट्रोल-डीजल को सरकार ने स्वतंत्र कर दिया। फलत: इसके दामों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर खुशियां जरूर मना रहे हैं। साथ में आगे की कई चिंता हमारे दिल को कचोट रही है। फिर भी हम यही सोचते हैं कि भगवान राम ने जिस तरह रावण का वध कर एक नये युग का सूत्रपात किया था, वह युग आगे के वर्षो में हमारे जीवन में आयेगा। आप सभी को दीपमामलाओं के इस मंगलमय उत्सव की अशेष शुभकामनाएं.....।

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

भ्रष्ट आचरण पर कांगे्रस की महासभा में रहस्ययम चुप्पी!

रायपुर दिनांक 3नवम्बर

भ्रष्ट आचरण पर कांगे्रस की
महासभा में रहस्ययम चुप्पी!
लगता है अब राजनीतिक पार्टियों के पास आम जनता को लुभाने का कोई नुस्खा रह ही नहीं गया। मंगलवार को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सम्मेलन में मुख्य मुद्दा था आरएसएस का आंतकवाद। राहुल गांधी से श्ुाुरू हुआ यह मुद्दा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बड़े- बड़े नेताओं, यहां तक कि सोनिया गांधी की जुबान से भी निकला लेकिन सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात यह कि किसी नेता ने देश के ज्वलंत मुद्दे भ्रष्टाचार पर कोई चर्चा नहीं की। महाराष्ट्र में आदर्श आवास सोसायटी का मामला जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण आकंठ डूबे हुए हैं, पर्र अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी चुप हैं। हाल ही संपन्न राष्ट्र मंडल खेलों में हुए घोटाले के मामले में भी कांग्रेस की बोलती बंद है। कांग्रेस इस मामले में भी अब कुछ कहने की स्थिति में नहीं है कि- देश में मंहगाई के चलते आम जनता को क्या राहत दी जा रही है? विशेषकर मध्यमवर्गीय लोग जिन्हें किसी प्रकार का कोई लाभ सरकार की तरफ से नहीं दिया जा रहा है। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने देश को दो हिन्दुस्तान बना दिया-उनके अनुसार एक हिन्दुस्तान अमीरों का है और दूसरा गरीबों का। वे दोनों हिन्दुस्तान को एक करने की बात कहते हैं। पूरे देश की बागडोर जिनके हाथों में है, वे किससे खाई पाटने की बात करते हैं? क्यों नहीं ऐसे प्रयास किये जाते कि देश में यह स्थिति आए ही नहीं। गरीब और अमीर किसने बनाया? स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी तो देश से गरीबी हटाने का नारा दिया था। क्यों इस वादे को पूरा नहीं किया गया? क्या गरीबी और गरीबों को इसलिये नहीं बनाकर रखा गया कि वे राजनीतिक पार्टियों के वोट बैंक बनकर रहे। क्यों नहीं भ्रष्ट तंत्र पर कड़ाई से लगाम लगाया नहीं जाता? क्यों पार्टियां अपने सम्मेलनों में यह मुद्दे उठाती कि- देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये सख्त से सख्त कानून बनाए जाए। धर्म और संप्रदाय की राजनीति आम जनता को कतई पसंद नहीं । क्या, यह देश के नेताओं की बनाई गई समस्या नहीं हैं? कभी अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा तो कभी आरएसएस की भगवा संस्कृति और उसकी सांप्रदायिकता-आंतकवाद की बात कहकर कब तक देश को यूं बांटने का काम हमारे नेता करते रहेंगे? क्यों ये नेता देश के नव निर्माण, शहरों और गांव के विकास की बात करते? स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू, और स्व. इंदिरा गांधी की उस राजनीतिक पार्टी को यह क्या हो गया कि वह आज देश की जनता को उनकी नीतियों, उनके आदर्शो को त्याग कर दूसरी छोटी- छोटी पार्टियों के बगले झांक रही है। राहुल गांधी कहते हैं कि देश में एकमात्र कांग्रेस पार्टी है तो उनकी पार्टी क्यों नहीं गरीबों को कम से कम मध्यमवर्गीय बनाकर देश से सदैव इस समस्या को खत्म करने का प्रयास करती? आज देश में जो असल गरीब हंै वह और गरीब बनता जा रहा है। जबकि अमीर सारी हदों को पार कर पूरी ऊं चाइयों पर है, उसपर किसी प्रकार की रोक नहीं है। हमारा संविधान समाजवादी समाज की संरचना की बात करता है, लेकिन यह बात आज कहां गई? भ्रष्टाचार देश की रग- रग में समां गया है। जो लोग निर्माण कार्यो और देश के विकास का नारा लगाकर कथित जन सेवा में लगे हैं। वे विकास करने की जगह अपनी व अपने परिवार का पुश्तों तक इंतजाम करने में लगे हैं।

मौत की सामग्री से दहली राजधानी? कौन रच रहा है षडय़ंत्र!

रायपुर दिनांक 1 नवंबर 2010

मौत की सामग्री से दहली राजधानी? कौन रच रहा है षडय़ंत्र!
राज्य गठन की वर्षगांठ से ठीक एक दिन पूर्व रविवार को रायपुर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विस्फोट की अवाज से गूंज उठा। करीब डेढ किलोमीटर का पूरा क्षेत्र दहशत में आ गया। रिहायशी इलाके की बिल्डिंगे हिल गईं। आसपास खड़ी कारों के कांच टूट गये तथा घरों के शीशे सर्वत्र बिखर गये। विस्फोट कचरे के ढेर में पड़े डिब्बों में हुआ जिसमें डेटोनेटर वाले बम थे, जो तारों के गुच्छे व अन्य रासायनिक तत्वों से बने थे। पुलिस के आला अफसरों ने घटना का मुआयना करने के बाद इस संबंध में जो बयान दिया वह कुछ इस प्रकार था-''दीवाली का समय है, किसी ने कचरे में फे के गए विस्फोट में आग लगा दी यह बयान रायपुर में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिये काफी है। वह भी उस समय जब रायपुर में राज्योत्सव चल रहा है, दीवाली की तैयारी चल रही है, और कई महत्वपूर्ण हस्तियां आना जाना कर रही हैं। ऐसे समय शहर को दहला देने वाले विस्फोट पर गैर जिम्मेदाराना बयान ने यह बता दिया है कि पुलिस किसी मामले को गंभीरता से लेना ही नहीं चाहती। इस घटना के बाद शहर को एलर्ट कर दिया गया है किंतु अब तक इस मामले में किसी की जवाबदारी तय नहीं की गई है। रायपुर में राज्य निर्माण दिन 1 नवंबर से ठीक एक दिन पहले हुए इस विस्फोट ने सभी को यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि आखिर इस शांत शहर के शांत वातावरण को बिगाडऩे का प्रयास कौन कर रहा है? राजधानी के आसपास नक्सली हलचल किसी से छिपी नहीं है- धमतरी,महासमुन्द, सरायपाली, कसडोल क्षेत्र में नक्सलियों की सक्रियता स्वयं पुलिस के आला अफसर करते हैं। नक्सली रायपुर के विधायक विश्राम गृह तक में पर्चे लगाकर जा चुके हैं। शहर में कुछ महीने पूर्व भारी मात्रा में अग्रेयास्त्र और विस्फोटक सामग्रियां बरमाद हो चुक ी है। अभी कुछ दिन पूर्व ही पुलिस ने दावा किया था कि उसने रायपुर में स्िरक्रय डॉन ग्रुप को नेस्तानबूत कर दिया है। कुछ लड़कों को पहले पकड़ा गया था, उनके बारे में बताया गया कि वे नहीं है। उसके बाद कुछ नये लोगों को पकड़कर नये पुुलिस वालों ने बताया कि 'यही है ंवे अपराधीÓ आखिर इस दावे के बाद भी राजधानी में हो रहे सीरियल विस्फोटों में किसका हाथ है? क्या फरिश्ता काम्पलेक्स के पास हुए इस प्रभावशाली विस्फोट को यूं ही मामूूली दीवाली के कचरे का विस्फोट मानकर हवा में उड़ा दिया जाए? जबकि रायपुर में पिछले रिकार्ड को खंगाला जाये तो स्पष्ट है कि भाजपा कार्यालय के सामने बस में हुए विस्फोटों से जो शुरूआत हुई वह अब भी जारी है । इस विस्फोट के बाद बूढ़ा तालाब में सीमेंट के बैंच पर, विवेकानंद उद्यान के पास जहां एक बच्चा घायल हुआ। होली क्रास स्कूल गेट पर जहां भारी विस्फोट के बाद स्कूल के कमरों के शीशे फूटे और अब रजबंधा मेैदान क्षेत्र में ट्रांसफार्मर के पास कचरे के ढेर में तार के साथ डेटोनेटर से विस्फोट किसकी वारदात है, और कौन इस षडय़ंत्र में शामिल हैं? रायपुर में पुलिस किसकी सुरक्षा कर रही है? लालबत्ती लगे मंत्रियों के काफिले को आगे बढ़ाने के लिये सड़कों से आम इंसान को जानवरों की तरह हंकालने वाली पुलिस का बस यही काम रह गया है? क्यों वह आम आदमी की सुरक्षा के प्रति लापरवाह है। यह घटना कोई मामूली घटना नहीं है, उसे इसके पीछे गहराई से जाने की जरूरत है। खोज निकालना है कि राजधानी को दहलाने का षडयंत्र आखिर कौन रच रहा है? रविवार को विस्फोट ने संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। अपनी नाक बचाने के लिये एक उच्च पदस्थ अधिकारी का यह बयान कि दीवाली का समय है, किसी ने कचरे में विस्फोटक डाल दिया। जबकि दीवाली के पटाखे अभी फूटे भी नहीं और न ही पटाखोंं का कचरा बना। आखिर पुलिस हकीकत क्यों बयान नहीं करती? क्यों सारे मामले को उलझाकर सरकार व जनता को गुमराह करने का प्रयास करती है? विस्फोटक सामग्री किसने यहां रखी? क्या यह उसी डॉन ग्रुुप का है जिसका अभी तक कोई पता नहीं या फिर नक्सलियों के किसी आतंकी कार्रवाई के लिये एकत्रित की गई मौत की सामग्री।

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

क्यों दी हमने इतनी आजादी?

रायपुर दिनांक २7-अक्टूबर 2010

क्यों दी हमने इतनी आजादी?
प्रख्यात लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुन्धति राय का अब बयान है कि जम्मू कश्मीर भारत का अंग नही हैं। अरुन्धति के इस बयान पर हम केन्द्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री तथा कश्मीर के वरिष्ठ नेता फारूख अब्दुल्ला की उस टिप्पणी का कि क्यों दी हमने अभिव्यक्ति की आजादी का स्वागत करते हुए उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए यह कह सकते हैं कि- भारत में लोगों को कुछ ज्यादा ही आजादी मिली हुई है। आपस में तो एक दूसरे को कुछ भी बोल देते हैं। अब देश के खिलाफ भी बोलने लगे हैं। हाल ही बिहार के सांसद ने बयान दिया कि राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये। चलिये हम मानते हैं कि ऐसी बातें हमारे नेता कहते ही रहते हैं। मगर प्रख्यात लेखिका और समाजसेवी जब यह कहे कि- हमारा दायां या बायां हाथ हमारा नहीं, किसी और का है, तो उसे कैसे मान लें। यही न कि उनकी बुद्वि भ्रष्ट हो चुकी है। वे शायद इस मिट्टी में जन्म लेकर यह इसलिये कह रही है कि उन्हें बोलने की बहुत ज्यादा आजादी दे डाली है। कोई दूसरा देश होता तो शायद मैडम आगे कोई वक्तव्य देने लायक नहीं रह जातीं। विश्व के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में कुछ लोग संविधान द्वारा प्रदत्त बोलने व लिखने की आजादी का इस्तेमाल विनाश के लिए कर रहे हैं। जिस प्रकार से हम इस आजादी का उपयोग कर रहे हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है अरुन्धति राय की विवादास्पद टिप्पणी पर फारूख अब्दुल्ला का यह बयान कि- देश ने आजादी दी है। यह उन पर निर्भर करता है कि वह इसका कैसे उपयोग करते हैं। यह उन्हें अहसास करना है कि क्या सही है और क्या गलत है। क्या कहना चाहिए और क्या नहीं कहना चाहिए, यह व्यक्ति को खुद तय करना होता है। यह बयान अरुन्धति जैसे उन सभी लोगों पर लागू होता है, जो इस देश को खोखला करने की भूमिका अदा करते हैं। अरुन्धति उस समय पैदा भी नहीं हुई होंगी जब देश आजाद हुआ और भारत का एक टुकड़ा देकर पाकिस्तान को अलग किया गया। वही अरुन्धति आज बयान दे रही हैं कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और इसे भारत सरकार भी स्वीकार कर चुकी है। वे यहां तक कह गई कि ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद भारत शीघ्र ही औपनिवेशिक ताकत बन गया। वाह क्या आजादी है हमारे देश में... यूं ही हर कोई अपना मुंह खोलने लगा तो बहुत जल्द एक तरफ पाकिस्तान तो दूसरी तरफ चीन का कब्जा हो जायेगा। सरकार ने तय किया है कि इस लेखिका को अपने बयान के लिये न्याय के कटघरे पर खड़ा किया जाये। अभिव्यक्ति की इतनी भी स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिये कि लोग अपना मुंह देशद्रोहियों- आतंकवादियों के समर्थन में खोलने लगे। यह वही अरुन्धति राय है, जिसने नक्सली हिंसा का भी एक समय समर्थन किया था।

दबा-दबा उत्सव, मीरा कुमार से उद्घाटन क्यों नहीं कराया गया?

रायपुर बुधवार। दिनांक 27 अक्टूबर 2010

दबा-दबा उत्सव, मीरा कुमार से
उद्घाटन क्यों नहीं कराया गया?
राज्योत्सव की तैयारियों में कम से कम एक महीने का समय लगा। इस दौरान रायपुर शहर की सड़कों का डामरीकरण तो नहीं हुआ, हां यह कहा जा सकता है कि पेचिंग हुई। कुछ सड़कों के डामरीकरण का कार्य शुरू किया गया था। जिसे एक रोज दोपहर हुई तो बारिश ने चौपट कर दिया। उसके बाद डामरीकरण की पोल खुल गई और निगम आयुक्त ने डामरीकरण पर रोक लगा दी। महापौर कहती हं कि राज्य शासन ने उन्हें सड़क बनाने पैसा ऐन समय पर दिया। वरना वे सड़कों को चकाचक कर देती! रायपुर में जंग लगे स्ट्रीट लाइट के खम्बों का रंग रोगन हुआ। वह भी एक कोट से, तो डिवाइडरों पर लगे सूखे फूल पौधों को हटाकर कहीं -कहीं दूसरे पौधे लगाये गये। राज्योत्सव हर साल मनाया जाता है, इसका रूप अब बदलता जा रहा है। फायदा किसे हो रहा है? यह तो किसी को नहीं मालूम, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि राजधानी रायपुर दीपोत्सव से पहले रंगारंग दिखने लगी। बालीवुड अभिनेता सलमान खान को कमर मटकाने के लिये कितना पैसा दिया गया? यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन मुश्किल से दस मिनट के कार्यक्रम को देखने उन युवाओं की संख्या ज्यादा थी,जो सलमान खान की बॉडी देखना चाहते थे। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के रूप में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम अपने भारी खर्च के कारण चर्चा का विषय बनता जा रहा है। वहीं इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के माटी पुत्रों, कलाकारों व राज्य के लिये अपनी पूरी ताकत लगा देने वालों की घोर उपेक्षा होने लगी है। सबसे पहला सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ राज्योत्सव की उपयोगिता किस हद तक है? यह आयोजन सिर्फ मनोरंजन और मेले के चंद दिन बनकर रह गया है। जबकि इस आयोजन के लिये हर साल करोड़ों रूपये खर्च होने लगा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि बालीवुड कलाकारों को कार्यक्रमों में बुलाने का खर्च लाखों में होता है। अगर इतना पैसा पुराने रायपुर शहर के विकास कार्यो को तेजी से कर हर साल दीवाली के पहले तैयार कर लोगों के सिपुर्द कर दिया जाता, तो शायद इस उत्सव से ज्यादा इन दिनों की चर्चा होती। छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार इस आयोजन से दरकिनार कर दिये गये हैं। छत्तीसगढ़ी या हिन्दी के गायक कलाकारों की जगह पॉप सिंगर,पंजाबी सिंगर और अन्य इसी प्रकार के लोगों को बुलाकर इस अंचल के प्रतिभाओं की उपेक्षा की गई। छत्तीसगढ़ी नाचा,गम्मत ,लोकसंगीत से परहेज क्यों किया जा रहा है? सवाल यह भी उठता है कि छत्तीसगढ़ी भाषा के कार्यक्रमों का राज्योत्सव से गायब होने पर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिये हल्ला मचाने वालों ने मौन क्यों साध रखा ? क्या छत्तीसगढ़ में कलाकारों की कमी थी, जो बाहर से आयातित कर कलाकारों को बुलाया जाता है? छत्तीसगढ़ में जनाब शेख हुसैन को लोग मोहम्मद रफी की आवाज का द्योतक मानते हैं। निर्मला ठाकुर को छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर के रूप में जाना जाता है। अनसूइया, कविता वासनिक, लक्ष्मण मस्तूरिया को कार्यक्रम से क्यों दूर रखा गया? राज्यपाल शेखर दत्त उद्घाटन के लिये उचित व्यक्ति थे, लेकिन उद्घाटन समारोह के दिन लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार के राष्ट्रकुल संसदीय सम्मेलन में आने का कार्यक्रम पहले से तय था। उनसे एप्रोच की जाती, तो समय निकालकर इस आयोजन का उद्घाटन कर सकती थीं। लेकिन, उनसे शायद इस मामले में बात ही नहीं की गई। बहरहाल, छत्तीसगढ़ राज्योत्सव पूरे छत्तीगढ़ का न होकर यह सिर्फ राजधानी तक ही सिमटकर रह गया है। जबकि इसका पूरा फायदा छत्तीसगढ़ के हर नागरिक को किसी न किसी रूप में मिलना चाहिये। जिस समय साइंस कालेज में कार्यक्रम चल रहा था। उस समय रायपुर की सड़कों का नजारा रोजमर्रे जैसा था। साइंस कालेज में भीड़ थी किंतु यह भीड़ कार्यक्रम में नेताओं का भाषण सुनने के लिये नहीं, वरन् अभिनेता को देखने के लिये थी। अभिनेता यहां पहुंचे भी तो सिर्फ एक उद्योगपति का प्रमोषन करने के लिये। इससे कम से कम यह अंदाज तो लगाया जा सकता है कि राज्योत्सव कितना सिमटता जा रहा है।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

नेताओं के मसखरे बयानो के सफर मेंजुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !

रायपुर गुरूवार 28 अक्टूबर 2010
नेताओं के मसखरे बयानो के सफर में
जुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !
सुनिये हमारे राजनेता क्या कहते हैं-
बाल ठाकरे नकलची बिल्ली हैं- राज ठाकरे
राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये- शरद यादव
राज की मनसे चूहों की पार्टी है- बाल ठाकरे
आरएसएस और सिमी में कोई फर्क नहीं।-राहुल गांधी
और इन सबसे हटकर अपनी लोकप्रियता को चार चांद लगाने के लिये समाज सेविका और प्रख्यात लेखिका क्या कहती हैं सुनिये-कश्मीर शुरू से भारत का अंग नहीं है, इतिहास इसका गवाह है। भारत सरकार ने इसे स्वीकार किया है-अरुंधति राय
जो चाहे बोलो-जो चाहे करो और जितना चाहे पैसा अपनी पेटियों में भरते जाओ और जगह नहीं तो गुसलखाने और कुत्ते को बांधने के कमरों में भी भरते जाओ। लोगों को मिली इस आजादी को हम क्या कहें? मनमानी, एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी या लोगों के मुंह में लगाम नहीं अथवा अनाप शनाप छूट? शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में उतार दिया। राज ठाकरे, उद्वव ठाकरे, बहू स्मिता ठाकरे और अब भतीजे आदित्य ठाकरे। महाराष्ट्र तथा कुछ अन्य प्रदेशों में सीमित चल रही उनकी राजनीति को कभी भाषा के माध्यम से हवा में लहराया जाता है। तो कभी किसी चैनल या अखबार में तोडफ़ोड़ अथवा आपस में एक दूसरे के विरूद्व बयान को हवा देकर। लालू प्रसाद,अमर सिंह जैसे कुछ अन्य नेताओं की जुबान पर भी लगाम नहीं। लालू भी अब परिवारवाद पर उतर आये हैं। लानू के बाद बेटे को भी राजनीति के मैदान में लाकर खडा कर दिया। जनता नेताओं के पैतरे नहीं समझती। अत: वह उनके कारनामों व बयानों का मजा लेकर उसके पीछे भागती है। बिहार में चुनाव के दौरान जो प्रमुख आरोप- प्रत्यारोप हुए, उसमें शरद यादव का बयान इन दिनों चर्चा में हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये। सोचिये इस बयान का क्या मतलब है? सिवाय सुनने वालों में से कुछ लोग भीड़ में खिलखिलाकर हसें और मजा लें। राहुल गांधी के एक राजनीतिक बयान ने भी अच्छा खासा हंगामा खड़ा किया हुआ है। उन्होंने आरएसएस और सिमी को एक ही चट्टे बट्टे का कह दिया। रांची-पटना की अदालत तक यह मामला पहुंच गया। जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने और अपना नाम फैलाने के लिये संविधान में प्रदत्त अधिकारों का किस तरह दुरूपयोग हो रहा है। वह है प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय का वह बयान जो उन्होंने जम्मू कश्मीर के एक सेमिनार में दिया। जहां उन्होंने कश्मीर को भारत का अंग होने से ही इंकार कर दिया। इससे पूर्व इसी लेखिका ने नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जायज ठहराया था। भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि वह देश की अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ कुछ भी बयान दे। देश में राजनेताओं के अलावा समाज और साहित्य से जुड़े लोगों के इस तरह सार्वजनिक स्थलों पर बयान देने, आरोप- प्रत्यारोप पर हमारी न्याय पालिका कौन सा रूख अपनाती है? यह तो समय के गर्भ में है लेकिन अगर ब्यक्ति अपने अधिकार से बाहर जाकर कोई बयान दें या फिर राष्ट्र विरोधी कार्य करे तो न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका तीनों को ही संयुक्त कार्रवाही के लिये आगे आना चाहिये। अगर जरूरत पड़े तो इसके लिए कड़े कानून पर भी विचार किया जाना चाहिये। यह एक अरुंधति का अकेला सवाल नहीं है। अरुंधति ने खुले आम यह बात कही तो कानून के कान खड़े हो गये, लेकिन ऐसीे राष्ट्र विरोधी बातों को छोड़ दें तो राष्ट्र विरोधी हरकतों में भी लोग लगे हुए हैं। उनको भी छांटकर बाहर निकाला जाना चाहिये।

नये पत्रकार पढ़ेंगे आउटर में, इंजीनियर भी होगें शहरबदर!

रायपुर मंगलवार 26 अक्टूबर 2010
नये पत्रकार पढ़ेंगे आउटर में,
इंजीनियर भी होगें शहरबदर!
कई दिनों से कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अमलेशर में शिफ्ट किया गया और सोमवार से वहां पढ़ाई भी शुरू हो गई। करोड़ों रूपये खर्च कर तैयार किये गये इस कैम्पस में मात्र सौ छात्र -छात्राएं हैं। जिन्हें अनेक बाधाओं को पार कर इस विश्वविद्यालय तक पहुंचना पड़ता है। इन बाधाओं में शराबी,जुआरी और अन्य समाजविरोधी तत्व भी हैं। अब तक यह विश्वविद्यालय कोटा में चल रहा था। यहां से हटाकर इसे अमलेशर ले जाने का सपना किसने देखा? यह तो पता नहीं, किंतु जिसने भी इस बुद्वि का इस्तेमाल किया। उसकी सोच की दाद दी जानी चाहिये कि वह छात्रों को मुश्किलों से जूझना सिखाकर ही पत्रकारिता की डिग्री लेेने के लिये मजबूर करेगा। वैसे यह एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय का अकेला मामला नहीं है। शहर में यत्र तत्र फैले कॉलेजों का भी यही हाल है। जहां तक पहुंचने के लिये छात्रों को कई किस्म के पापड़ बेलने पड़ते हैं। रायपुर का मेडिकल कालेज पहले आज जहां आयुर्वेदिक कालेज है उसके बगल में अभी जहां डेंटल कालेज हैं, वहां लगा करता था। तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण चाहते थे कि मेडिकल कॉलेज जेल रोड़ पर बने। उन्होंने उसे वहां बना दिया। जबकि उस समय विश्वविद्यालय के पास इतनी भूमि पड़ी थी कि एक अच्छा और भव्य मेडिकल कालेज इसके पा्रगंण में बन जाता। विश्वविद्यालय के आसपास का सारा क्षेत्र शिक्षा से संबन्धित संस्थानों से भरा पड़ा है। फिर योजनाकारों ने शैक्षणिक संस्थानों को क्यों अलग -अलग किया। विश्चविद्यालय के समीप ही इंजीनियरिंग कालेज जो अब एनआईटी है, सामने साइंस कॉलेज, पीछे छात्रों का छात्रावास, बाजू में आयुर्वेदिक कॅालेज, संस्कृत कॉलेज , यूटीडी जैसी सुविधाएं हैं, तो अन्य नई उदित होने वाली शौक्षणिक संस्थानों को शहर से बाहर क्यों किया गया?एनआईटी को भी शहर बदर कर दिया गया है। सरकार के शैक्षणिक संस्थानों और निजी शैक्षणिक संस्थानों में अंतर ही क्या रह गया। रायपुर शहर पहली बार पहुंचने वालों को अगर रविशंंकर विश्व विद्यालय प्रागंण या उसके आसपास ही सारे शिक्षण संस्थान एक साथ मिल जाते तो दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़़ता। एनआईटी का नया भवन शहर से बाहर बनाकर, उसे भी शहर बदर कर दिया गया है। कुछ ही दिनों में नई राजधानी में सारे सरकारी दफतर मंत्रालय आदि शिफट हो जायेंगें- इससे शहर की सड़कों पर भीड़ थोडी बहुत कम होगी। बड़े अधिकारियों का कुछ नहीं बिगडऩे वाला लेकिन तृतीय और चतुर्थ वर्ग कर्मचािरयों की क्या स्थिति होने वाली है? इसकी कल्पना की जा सकती है। हालांकि बड़े शहरों की तरह लोकल ट्रेन, सिटी बस सेवा आदि की योजना है। मगर इस नई व्यवस्था को झेलकर उसमें समा जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। विशेषकर रायपुर में रहने वाली महिला कर्मचारियों के समक्ष तो बहुत बड़ी समस्या शुरू- शुरू के दिनों में आने वाली है।

सेना ने उत्साह तो भरा युवाओं में !

रायपुर दिनांक 25 अक्टूबर 2010
वो जज्बा अनुशासन पहले था अभी नहीं,
लेकिन सेना ने उत्साह तो भरा युवाओं में !
आजादी के बाद के वर्षो में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों पड़ोसी राष्ट्रों से हमारा किसी न किसी मुद्दे को लेकर युद्व हुआ है। उस दौरान जो युवा थे। आज बुजॢगयत की ओर बढ़ रहे हैं। उस समय और अब में काफी परिवर्तन देखा जा रहा हैं। युवाओं में अनुशासनहीनता, समय का पाबंद न होना और अन्य अनेक किस्म की कमजोरियां घर कर गई है। देर से सोकर उठना और अपनी दिनचर्या को शुरू करने में अच्छा खासा आलस- यह सब देखने मिलता है। यहां तक कि जब तक साहबजादे के बिस्तर पर चाय न पहुंच पाये उठते ही नहीं। लड़कियां भी इस मामले में पीछे नहीं है। आपने कभी सोचा है- इन सबके पीछे कारण क्या है? हम जहां तक इसका आंकलन करते हैं- वह यह कि युवाओं को व्यवस्थित नहीं किया जा रहा। उन्हें किसी भी रूप में अनुशासन का पाठ नहीं डढ़़ाया जा रहा। युद्व के दौरान स्कूल और कॉलेजों में एनसीसी को कम्पलसरी कर दिया गया। इससे एक बात अच्छी हुई कि उस समय के युवा न केवल मेनर्स सीख गये, बल्कि उनमें अनुशासन और जीवन जीने की कला भी आ गई। समय पर उठना, समय पर खाना-पीना और अन्य अनेक दिनचर्या के क्रियाकलापों को एनसीसी के माध्यम से कू टकूट कर भर दिया गया। आज भी आप देख सकते हैं कि एनसीसी में अर्ध सैन्य प्रशिक्षण लेने व अन्य युवाओं की तुलना करने से दोनों के बीच काफी अंतर नजर आता है। अभी स्कूल कॉलेजो में एनसीसी कम्पलसरी नहीं हैं। किंतु हम इस बात का पुरजोर समर्थन करते हैं कि स्कूल और कॉलेज में युवाओं के लिये एनसीसी को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उच्च शिक्षा लेने के बाद कम से कम दो साल की सैनिक शिक्षा हर युवा को नौकरी के लिये अनिवार्य घोषित किया जाना चाहिये। छत्तीसगढ़ के युवा विशेषकर राजधानी रायपुर के युवा सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें हाल के दिनों में भारतीय स्थल और वायु सेना के बारे में जानकारी लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वरना यह अंचल तो इस मामले में वर्षो से शून्य रहा है। रायपुर के पुलिस परेड मैदान में सेना ने अत्याधुनिक हथियारों के अलावा ब्रह्मोस का डिमांस्ट्रेशन किया। थल व वायुसेना के जवानों द्वारा मोटर सायकिल डिस्प्ले, जंप, घुड़सवारी आदि के साहसिक कारनामों को देख युवाओं में जरूर सेना में भर्ती का लालच बढ़ा है। भारतीय वायुसेना की ओर से भी जवानों ने स्काय ड्रायविंग,हाट एयर, बैलुनिंग, पॉवर स्लाइङ्क्षडगं , माइक्रोलाइट डिस्पले, मौस मिलेट्री डिस्प्ले का बखूब प्रदर्शन कर युवाओं में वायुसेना में शमिल होने के प्रति दिलचस्पी पैदा की है। अगला आने वाला समय छत्तीसगढ़ के युवाओं का है। ज्यादा से ज्यादा युवा सेना में भर्ती होकर राज्य का नाम रौशन कर सकेंगे। राज्य सरकार को चाहिये कि इस अंचल में भारतीय सेना की टुकडियां स्थापति करने की दिशा में पहल करें। ताकि यहां इनके कार्यो को देख युवा ज्यादा से ज्यादा सेना की ओर आकर्षित हों। सेना अब छत्तीसगढ़ उड़ीसा में नेशनल काउंटर ट्रेररिस्ट कैम्प खोलने की पहल कर रही है। इसके लिये मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सारी मदद देने के लिये तायार है। यह एक अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री की सेना के प्रति विशेष दिलचस्पी है। वे शुरू से छत्तीसगढ़ में सेना की टुकड़ी की वकालत करते रहे हैं। युवाओं को इसका फायदा उठाना चाहिये। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिये कि इस समय जिन स्कूल और कॉलेज में एनसीसी का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। वहां केन्द्र सरकार पर दबाव डालकर एनसीसी केन्द्र खुलवाये। ताकि ज्यादा से ज्यादा युवा अनुशासन का बुनियादी पाठ सीख सके ।

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

कालिख पर सफेदी का प्रयास-बिल्ली दूध पी गई,सब देखते ही रह गये!

रायपुर दिनांक 23अक्टूबर 2010
कालिख पर सफेदी का प्रयास-बिल्ली
दूध पी गई,सब देखते ही रह गये!
कांग्रेस अब सामी के मुंह के कालिख को सफेद करने में लगी है। इसके लिये स्थानीय नेता कभी कुछ तो कभी कुछ बयान देने में लगे हैं। इसमें दो मत नहीं कि इस पूरे कांड में किसी बड़ी हस्ती का हाथ है। वह कौन है? इसका खुलासा करने की जगह कांग्रेस के सम्माननीय नेता मामले को और उलझाने में लगे हैं। यह लगभग सभी बड़े कांग्रेसियों को मालूम है कि किसने इस शर्मनाक घटना को जन्म दिया, लेकिन गुटबाजी में लिप्त प्राय: सभी नेता इस मामले में एक हो गये हैं। उनके मुंह से या तो नाम निकल नहीं रहा या वे खामोश आगे के एपीसोड़ का इंतजार कर रहे हैं। इस पूरे कांड में लिप्त आरोपियों ने जो खुलासा किया उसमें छोटे शिकारी ही प्रकाश में आये हैं। असल जो हैं वह या तो इस पूरे कांड की निंदा करने में लगे हैं या जांच की मांग करते हुए भीड़ में शामिल हो गये तथा तमाशे को और रोचक बनाने में लगे हैं। रायपुर में कांग्रेस का पुराना इतिहास देखा जाये तो यहां बहुत से कांड कांग्रेस भवन या बाहर हुए हैं। जो कांग्रेस के असली चेहरे को उजागर करती रही है। बिल्ली के बारे में एक बात प्रसिद्व है वह जब दूध पीती है तो आंखे बंद कर लेती है। इससे उसे ऐसा अहसास होता है कि वह जो कर रही है उसे कोई देख नहीं रहा। हममें से बहुत से लोगों ने कांग्रेस की कई हस्तियों को ऐसे कारनामें करते देखा है, जिसे अन्य लोग भी जानते हैं किंतु उसे हमेशा पर्दे में ही रहने दिया गया। असल में कांगे्रस इस कांड के बाद छत्तीसगढ़ में जो छबि खराब कर चुकी है, उसे सुधारने के लिये यह जरूरी है कि इस पूरे कांड में जो लोग भी इनवोल्व हैं उन्हें पूरी तरह से बेनकाब करें। ताकि कांग्र्रेस प्रदेश में अपना वजूद फिर से स्थापित कर सके। पार्टी के अंदर जितने भी ऐसे तत्व हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाये। हम यह नहीं कहते कि यह बीमारी सिर्फ कांग्रेस के अंदर है। भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों में भी इस ढंग के लोगों की मौजूदगी किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे नेता अपने प्रतिद्विन्दी को नीचा दिखाने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं-ऐसे नेताओं की ही करनी का परिणाम है- सामी के मुंह पर कालिख। अगर घर के अंदर घुसकर आपके मुंह पर कोई कालिख पोतकर चला जाये तो पुलिस क्या करें? कांग्रेसी इस समय यही चिल्ला रहे हैं कि सरकार ने सामी की सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया। अगर मान लें सरकार सुरक्षा का इंतजाम करती भी तो क्या यह वारदात नहीं होती? सामी कांग्रेस भवन में अपने परिवार अर्थात कांग्रेसियों की बैठक में थे। यहां उनके ही सदस्यों के कहने पर कुछ पैसे की लालच रखने वालों ने यह कृत्य कर दिया, तो इसमें सुरक्षा व्यवस्था क्या करती? अगर सुरक्षा में लगे पुलिसवाले ऐसे माहौल में कांग्रेस भवन या भाजपा कार्यालय में उस समय घुस जाते, तो वही एक हंगामे का कारण बन जाता। यह किसी नेता को बताने की जरूरत नही,ऐसा होता आया है। नेताओं को हमारा सुझाव है कि वे ऐसा ही काम करें, जो आम जनता के गले उतरे। उसे पहले जैसा बेवकूफ न समझे वह पढ़- लिख गया है और समझदार भी हो गया है। राजनीति करने वाले सभी को यह बात अब समझ लेनी चाहिये कि वह आम लोगों को अपनी तिकड़मबाजी से गुमराह नहीं कर सकते। सामी के मुंह पर कालिख पुती, इससे रायपुर शहर सहित पूरा छत्तीसगढ शर्मसार है। एक अतिथि का हमने अनादर किया है। इसका खामियाजा उन सच्चे कांग्रेसियों को ऐसे व्यक्ति का नाम सामने लाकर करना चाहिये। फिर चाहे वह कितना ही बड़ा ओहदा या प्रभावशाली व्यक्तित्व क्यों न रखता हो। हम यह भी जानते हैं कि ऐसा जो भी व्यक्ति इस कांड में लिप्त है, उसका भेद खुलने पर वह कहीं का न रह जायेगा। उसका राजनैतिक कैरियर सदैव के लिये खत्म हो जायेगा, लेकिन अगर किसी में भी देश के स्वस्थ प्रजातांत्रिक व्यवस्था की चाह है, तो उन्हें ऐसे लोगों को बिना किसी हिचक के बेनकाब करना चाहिये।

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

बाबाजी योग कीजिये..क्यों

रायपुर दिनांक 22 अक्टूबर 2010

बाबाजी योग कीजिये..क्यों बर के छत्ते पर
हाथ डाल अपनी छबि खराब कर रहे हैं?
योग गुरू बाबा रामदेव ने सरकार को धमकी दी है कि अगर सरकार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये जरूरी कदम उठाने में नाकाम रही, तो उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी बनानी होगी। हमारा तो कहना है कि उन्हें तुरंत अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन कर देना चाहिये। चूंकि न सरकार पर उनकी धमकी का कोई असर होने वाला और न ही देश से भ्रष्टाचार का अंत होगा। बल्कि बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के समर्थन में कोई पार्टी बना लें तो वे शीघ्र सत्ता में आकर प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर बैठ सकते हैं। बाबा रामदेव की भावना का तहे दिल से स्वागत करते हुए उन्हें यह सलाह देना चाहते हैं कि वे देश से और कुछ गंदगी को निकालने के लिये राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार...इसके खिलाफ पार्टी बनाने की कैसे सोच रहे हैं। बाबा रामदेवजी आपको कौन समर्थन देगा? देश का तंत्र जिस तरह से भ्रष्ट हो गया है, उसके आगे आप तो क्या भगवान भी जमीन पर उतर आये, तो उन्हें भी लोग रिश्वत देकर यह कहते हुए ऊपर वापस भेज देंगे कि- अभी तो मौका है, मरने के बाद थोड़े कमाने मिलेगा। भारत की राष्ट्रपति,भारत का सर्वोच्च न्यायालय, और भारत के प्रधानमंत्री सब तो भ्रष्टाचारी व्यवस्था को लताड़ चुके हैं और सम्हलने की चेतावनी दे चुके हैं। किंतु भ्रष्टाचार रूपी दैत्य का मुंह इतना खुल गया है कि उसमें पूरा देश ही समा गया है। बाबा रामदेवजी आप तो रोज अखबार पढ़ते और टीवी देखते होंगे फिर भी आपने कैसे यह धमकी दे डाली? हाल ही खत्म हुए कामन वेल्थ गेम्स में भारतीय मीडिय़ा जहां सिर्फ अठारह हजार करोड़ रूपये के गोलमाल की बात कर रही है। वहीं विदेशी मीडिया का दावा है कि पचास अरब का गोलमाल हुआ है। अगर रामदेव बाबा अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन करते हैं तो देश में बचे चंद ईमानदारों का ही समर्थन प्राप्त होगा। जबकि आज उनके योग शिविर और उनके भाषणों में हजारों लोग शिरकत करते हैं-शायद इसमें भी बहुत से उस तंत्र के लोग शामिल होगें, जिनकी खिलाफत करने के लिये बाबा राजनीतिक पार्टी की बात कर रहे हैं- बाबाजी पार्टी गठित हो जायेगी तो ऐसे लोग न आपका भाषण सुनने आयेंगे और न आपकी बनाई हुई दवाइयों को खायेगें। इसलिये यही अच्छा है कि आप जहां हैं वहीं रहें-क्यों जबर्दस्ती मधुमक्खी या बरयै के छत्ते पर पत्थर फेंक रहे हैं। मगर हम आपके हिम्मत की दाद देते हैं कि- इस एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में मर्दांनगी से आपने सरकार को ललकारा तो। वरना यहां लोगों के घरों की दीवारों और कुत्तों को सुलाने के कमरे और कुत्ते के तकिये से सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के चित्रों से छपे नोट टपकने के बाद भी लोगों को इस बात की भी चिंता नहीं होती कि जो पैसा इन भ्रष्टाचारियों के घरों से निकल रहा है। वह किसी अपने भाई की जेब से निकाला गया है या किसी की गर्दन काटकर भरी गई है। रामदेव बाबा ने सरकार से अनुरोध भी किया है कि- वह देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रभावकारी कदम उठाए और जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं, उनके लिए मौत की सजा का प्रावधान किया जाए। रामदेव बाबा पिछले विधानसभा चुनावों से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है । उनकी मांग स्विस बैंकों में जमा भारतीय धन को भी देश में लाने की है। बाबा आसमान से तारा तोडऩा चाहते हैं। सभी को मालूम है यह इतना आसान नहीं है!

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

बस कुछ भी हो आव देखा न ताव कह दिया यह शत्रु की करामात!

रायपुर गुरुवार। दिनांक 21 अक्टूबर 2010
बस कुछ भी हो आव देखा न ताव
कह दिया यह शत्रु की करामात!
कोई घटना हुई नहीं कि उसपर स्टेटमेंट जारी करने में लोग देरी नहीं करते। चाहे वह सही हो या नहीं अथवा उसकी हकीकत सामने आई हो या नहीं बस निशाना सीधे अपने विरोधी पर होता है। मंगलवार को कांग्रेस भवन में कांगे्स संगठन प्रभारी और केन्द्रीय मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंकने की घटना ने दिल्ली को भी हिला दिया। मामला कांग्रेस संगठन के एक वरिष्ठ नेता व केन्द्रीय मंत्री का होने के कारण इसकी महत्ता और भी बढ़ गई। कांग्रेस के प्राय: सभी नेताओं ने संतुलित होकर बयान जारी किया। घटना की निंदा की गई तथा दोषियों को कड़ी सजा की मांग की गई, मगर कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ पदाधिकारी व सासंद का जो बयान आया, उसने यह बता दिया कि राजनीति को किस किस तरह से रंगने का प्रयास किया जाता है। उक्त सासंद ने इस पूरे कांड के लिये भाजपा को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां तक कह दिया कि इससे भाजपा की पोल खुल गई। लगे हाथ सरकार पर आरोप भी लगा दिया कि उसने नारायण सामी की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया। अखबारों में छपी तस्वीरे साफ गवाह है कि पुलिस के शस्त्रधारी वी नारायण सामी को घेरे हुए हैं। इसके बावजूद ऐसे आरोप लगाकर जिम्मेदार नेता क्यों आम लोगों को गुमराह कर अपना मकसद साधने का प्रयास करते हैं? बुधवार की शाम तक कांग्रेस भवन में घटित घटना का जो खुलासा हुआ है। वह यही कह रहा है कि यह कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी का परिणाम है जिसके चलते कतिपय नेताओं ने भाड़े के युवकों को इकट्ठा कर यह कृत्य करवाया है। पुलिस जांच में यह खुलासा भी हुआ है तथा आरोपियों ने एक युवा नेता का नाम लिया है, जिसने प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता का सीधे सीधे नाम लेकर मामले को उलझा दिया है। यह अब लगभग स्पष्ट हो गया है कि पूरी घटना कांग्रेस की अदंरूनी गुटबाजी का परिणाम है लेकिन जिस ढंग से प्रदेश के नामी बड़े नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। उसपर सहज विश्वास करना आसान नहीं लेकिन यह सही है कि कांग्रेस की गुटबाजी के चलते ही यह काम किसी ने करवाया है मगर अब जो राजनीति इस मामले में चल रही है, वह आपसी लड़ाई को भुनाने की एक चाल भी लगती है। यह सही हो सकता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिये सामी का कथित रवैया कई नेताओ को पसंद नहीं आया इसे इस ढंग से भुनाया जायेगा इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। चूंकि जिन नेताओं पर यह आरोप लग रहे हैं। वे शायद ही ऐसा कृत्य कर अपने पूरे राजनीतिक कैरियर को दांव पर लगायें। बहरहाल, इस घटना का आगे जो भी खुलासा हो वह किसी के राजनीतिक भविष्य को खराब कर सकता है लेकिन घटना से उन नेताओं को जरूर सबक लेना चाहिये। जो घटना होते ही विरोधियों पर निशाना साधते हैं। कालिख पोछने से सामी को उतना फरक नहीं पड़ा होगा जितना कि इस घटना की जिम्मेदारी को भाजपा, सरकार व प्रशसान को जोड़कर तत्काल बयान देने वालों का हुआ । मै यह कहकर भाजपा का पक्ष नहीं ले रहा बल्क् ियह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि राजनीति में अक्सर लोग किस तरह उतर जाते हैं- भाजपा विपक्ष में होती तो उनका कोई नेता भी शायद इसी तरह का बयान देता।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

गुटों के जाल में नेताओं के मुंह पर कालिख का खेल!

रायपुर बुधवार। दिनांक 20 अक्टूबर 2010

गुटों के जाल में नेताओं के मुंह पर कालिख का खेल!
जब- जब कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर आती है, कांग्रेस में ऐसी घटनाएं होती हैं जो मंगलवार को कांग्रेस भवन में हुई। कुछ लड़कों ने प्रदेश कांग्रेस संगठन प्रभारी और केन्द्रीय मंत्री वी नारायण सामी के चेहरे पर कालिख पोत दी। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिये नियुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीमती विप्लव ठाकुर को भी नहीं बख्शा गया। कांग्रेस का फलेश बैक करेें तो पूर्व के वर्षो में जब अर्जुन सिंह प्रदेश कांग्रेस के नेता के रूप में रायपुर पहुंचे। तो उनके साथ जयस्तंभ चौक में गिरनार रेस्टोरेंट के सामने कुछ कांग्रेसियों ने झूमा झटकी- धक्का मुक्की की। ये कांग्रेसी उस समय के एक बड़े नेता के समर्थक थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जैसे ही लोगों को पता चला कि अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बनाना लगभग तय कर लिया गया है। तो विद्याचरण शुक्ल के फार्म हाउस में तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ जो कुछ हुआ, उसे बहुत से लोग जानते हैं। दिग्विजय सिंह यहां से जानबचाकर भागे थे। राज्य बनने के बाद विद्याचरण शुक्ल मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे लेकिन सोनिया गांधी ने अजीत प्रमोद जोगी को पसंद किया और वे मुख्यमंत्री बनें। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की गुटबाजी का पुराना इतिहास हैं। यह मध्यप्रदेश के समय से चला आ रहा है। जिन घटनाओं का उल्लेख ऊ पर किया गया, वे तो सिर्फ उदाहरण हंै जो आज भी लोगों की जुबान पर है। इसमें दो मत नहीं कि एक समय ऐसा भी था जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की तूती बोलती थी। मध्यप्रदेश सरकार को सदैव झुका देेने वाली ताकत रखने वाली कांग्रेस का ऐसा हश्र क्यों हुआ कि वह इस प्रदेश में अपना जनाधार तक खोती जा रही है? कभी विद्याचरण शुक्ल तो कभी अर्जुनसिंह गुट और बाद में चलकर कई गुटों में विभक्त कांग्रेस आज प्रदेश में इतने गुटों में बंट गई है कि पता नहीं चलता कि कौन किस गुट का हैै। अजीत जोगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में उनके गुट ने एक तरह से विद्याचरण-श्यामाचरण गुट से उनकी गुटबंदी का साम्राज्य छीन लिया। लेकिन जोगी गुट के विरोध में मोतीलाल वोरा, चरण दास मंहत जैसी हस्तियां भी आ गई। एक बार तो जोगी और वोरा भी सार्वजनिक रूप से लड़ पड़े। वोरा का दखल हाईकमान में होने के कारण उनके गुट की भी प्रदेश में अच्छी खासी साख बन गई और गुटबंदी का बाजार गर्म हो गया। विधानसभा चुनाव के वक्त तो यह गुट साफ नजर आते लेकिन बाद में इन गुटों का अस्तित्व निकाय व पंचायत चुनावों तक में नजर आने लगा और अब यह कैंसर का रूप ले बैठा है। गुटों की भरमार और युवा कार्यकर्ताओं की नेता बनकर सत्ता में भागीदारी की बढ़ती अभिलाषा ने कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में गुटबाजी को अपने मूल कार्यक्रमों से एकदम बाहर कर गुटबाजी के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया। प्रदेश कांग्रेेस में अपराधीकरण का भी बोलबाला इस बीच तेजी से हुआ। बिना देखे समझे कई ऐसे लोगों को कांग्र्रेस ने अपना सदस्य बना लिया जो स्वंय नेताओँ के लिये सरदर्द साबित हो रहे हैं। कांग्रेस में अगर गुटबाजी नहीं होती और भाजपा जैसा सख्त अनुशासन थोड़ा बहुत भी होता, तो शायद कांग्रेस अभी प्रदेश की सत्ता पर होती। अगर प्रदेश में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति का आंकलन किया जाये तो वह जनाधार खोती जा रही है। आपसी लड़ाई, अनुशासनहीनता और बूढ़े नेताओं की भरमार ने कांग्रेस को जगह- जगह शिकस्त देनी शुरू कर दी है। भटगांव चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस प्रदेश में एक तरह से हताश हो गई और अपनी चमड़ी बचाने के लिये बार -बार दिल्ली का दौरा कर नेता हाईकमान को अपनी सक्रियता का एहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। युवक कांग्रेस के चुनाव में जो माहौल देखने को मिला उसमें भी अनुशासनहीनता स्पष्ट नजर आई। भटगांव के बाद अब कांग्रेस को बालोद का चुनाव लडऩा है जहां भाजपा काबिज थी। इस सीट को हासिल करने से पूर्व कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिये जो घमाासान चल रहा है, उसी कि परिणति मंगलवार को देखने मिली। कांगेस की स्थिति प्रदेश में आम जनता से दूर कुछ पुराने नेताओं के हाथ में सिमटकर रह गई है। छत्तीसगढ प्रदेश कांग्रेस में लगे जंग को केन्द्र में बैठे नेता किस तरह निकालेंगे? यह आगे के दिनों में ही पता चलेगा लेकिन हम यह कह सकते हैं कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अगर प्रद्रेश में तेजी से बढ़ रही गुटबाजी को खत्म कर दिया जाय तो अगला सिंहासन कांग्रेस का होगा। वरना छत्तीसगढ में कांग्रेस की स्थिति यूपी, बिहार से भ्ी बदतर हो जायेगी।

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..

रायपुर दिनांक १८ अक्टूबर २०१०

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..क्या कभी
हमारी व्यवस्था की आंख खुलेगी?
अभी कुछ ही दिन पहले मुझे एक पत्र मिला, यह यूं ही टेबिल पर पड़ा था। कल फुर्सत के क्षणों में जब मंैने इसे खोलकर देखा तो यह जेल में बंद एक उम्र कैदी का था जिसने चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों की उस बैठक पर मेरे आलेख पर उसने अपनी टिप्पणी दी थी। आलेख में मंैने लिखा था कि- वे ही लोग अब राजनीति में बढते अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, जिन्होंने किसी समय इसे बढ़ावा दिया। उमर कैद की सजा भुगत रहे कैदी ने पत्र में जेलों में बंद ऐसे कैदियों का जिक्र किया है, जो अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सके और झूठे साक्ष्यों के आधार पर सजा भुगत रहे हैं। 'वो कहते हैं न- गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है।Ó ऐसा ही हमारे देश मेें हो रहा है, जहां की जेलों में ऐसे कई निर्दोष व्यक्ति सड़ रहे हैं जिन्होंने कभी कोई अपराध किया ही नहीं, किंतु किसी के बिछाये हुए जाल का शिकार हो गये। ऐसे लोग या तो किसी राजनेता, पहुंच अथवा प्रभावशाली व्यक्तियों की टेढ़ी दृष्टि के शिकार बन गये। ऐसे लोगों के लिये अदालतों में साक्ष्य पेश करना उतना ही आसान है जितना किसी का बाजार से पैसे देकर कोई सामान खरीदकर ले आना। बहरहाल, ऊपर दर्शाये गये कैदी के निर्दोष होने का प्रमाण हम इसे मान लेते हैं कि उसने मुझे जो पत्र लिखा उसमें उसने कहीं भी अपना नाम या पता नहीं दिया जिससे यह अंदाज लगाया जा सकता, कि वह मुझसे कुछ नहीं चाहता। लेकिन मै अपनी कलम से सरकार व अदालतों का ध्यान कम से कम ऐसे लोगों की ओर आकर्षित कर सकूं कि वह प्रभावशाली व पहुंच वाले लोगों के झांसे में न आयें और उसके जैसे किसी निर्दोष व्यक्ति को सलाखों के पीछे सडऩेे न दें। असल में हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं। उसमें किसी का किसी से कोई लेना- देना नहीं है। कानून यह कहता है कि ''सौ गुनाहगार छूट जायें, मगर किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिये।ÓÓ लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? कितने ही सीधे साधे लोग आज पैसे व पहुंच वालों की कोप के शिकार बनकर किसी न किसी बड़े मामले में फंसा दिये जाते हैं, और उन्हें सजा भी हो जाती है। चौका देने वाली बात तो यह है कि हमारे कानून में ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है कि एक बार लम्बी सजा प्राप्त व्यक्ति की वास्तविकता के बारे में खोजबीन करने का कोई प्रयास किसी स्तर पर किया जाये। देश में मानवता की दुहाई देने वाले रक्षक भी इस संबन्ध में खामोश हैं । पूरे देशभर की जेलों में सड़ रहे कैदियों की हकीकत का किसी झूठ या सच का पता लगाने वाली मशीन से आंकलन किया जाये तो ऐसे कम से कम पांच से दस प्रतिशत तो कैदी ऐसे निकल ही जायेगें जो किसी न किसी के षडय़ंत्र का शिकार हुए हैं। सरकार को इस दिशा में प्रयास करना चाहिये। वह अपने जासूसों के जरिये ही कम से कम असली -नकली का पता लगाये और मानवता के नाते उन्हें जेल से मुक्ति दे।