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हम बस सत्तर सालों से 'आजाद हैं!

लोकतंत्र का बड़ा पर्व चुनाव अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां आम आदमी के मुकाबले ज्यादातर पैसे वालों व बाहुबली की भागीदारी हो रही है. गरीब, मजदूर और किसान की कोई पूछ नहीं होती, क्योंकि इस पर्व में सिर्फ पैसा बोलता है. अगर अवैध धन की बात छोड़ भी दें तो आधिकारिक रूप से भी चुनाव में उम्मीदवारों को 28 लाख रुपये तक खर्च करने की छूट दी गई है. समानता -सर्वकल्याण जैसी संकल्पना लोकतंत्र की मूल भावना में निहित हैं किन्तु चुनाव के दौरान आम आदमी जिसके मतों से चुनकर सरकार का अस्तित्व कायम होता है वह किनारे लगकर सिर्फ नारेबाजी करने और लाइन में लगकर अपने संविधान प्रदत्त अधिकार का उपयोग करने का साधन मात्र रह जाता है. पूरे पांच साल तक चुनकर भेजने वालों में से बहुत लोग जहां जनता के पैसे से सुख सुविधाएं भेागते हैं और बेचारा वह व्यक्ति जो वोट देने के बाद उस किसान की तरह हो जाता है जो कभी  बारिश न होने से आसमान की तरफ ताक लगाये बैठा रहता है. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाते हुए हम यह तो इंगित करना चाहते हैं कि चुनाव में खर्च की सीमा तय करते समय उसे यह भी ध्यान में रखना चाहिए था कि क्या एक आ…
हाल की पोस्ट

युवा पीढ़ी के दिमाग में सिर्फ किताबी किस्से ही क्यों?

आजादी के बाद के कई वर्षो तक प्राथमिक शिक्षा का जो माहौल था वह बच्चों में थोड़ा या कहीं -कहीं  ज्यादा डर पैदा कर कुछ सिखाने का रहता था. मंशा यह रहती थी कि बच्चा पढ़ाई के साथ कुछ ऐसा भी सीख ले कि वह आगे जाकर किसी कारणवश पढ़ाई छोड़ भी दे तो उसे जो बुनियादी सीख दी गई है वह उसके आधार पर अपना व्यवसाय उद्योग खेती कर अपना व अपने परिवार को पाल सके किन्तु आगे आने वाले वर्षो में यह सोच खत्म हो गई. बुनियादी शिक्षा के नाम पर पूर्व के कई स्कूलों में पढ़ाई के साथ साथ हस्तशिल्प, चित्रकारी खेलकूद, व्यायाम स्काउट, एनसीसी आदि के भी प्रशिक्षण का बोलबोला था. व्यावसायिक शिक्षा पद्वति अपनाने से छात्रों की पुस्तकों के प्रति होने वाली कथित बोरियत बहुत हद तक कम हो जाती थी. वैसे हम पूरे तौर पर यह नहीं कह सकते कि स्कूलों ने पुस्तकों के बोझ के परिप्रेक्ष्य में  पुरानी पढ़ाई की पद्वति को पूरी तरह तिलांजलि दे दी लेकिन इसका स्वरूप बदल गया. सरकारों ने इसे बहुत हद तक अलग कर इसके अलग-अलग विंग बना दिये या कहीं कहीं तो इसके अलग विभाग ही स्थापित कर दिये. बच्चे जो पहले पढ़ाई के साथ बुनाई, कढ़ाई, कला चिंत्राकन आदि का प्रशि…

ढोल बजा नहीं,शोर गूंजने लगा!

ढोल बजा नहीं,शोर गूंजने लगा!
जी हां कुछ ऐसी ही स्थिति है गुजरात चुनाव की.चुनाव आयोग ने अभी गुजरात में चुनाव तिथियों का ऐलान नहीं किया है किन्तु इस बीच गुजरात को फतह करने  जोड़तोड़ शुरू हो गई है. जनता जिसे सबकुछ करना है वह शांत व मूक दर्शक है लेकिन सत्ता पर काबिज होने के लिये बेताब रणबाकुरे कोइ्र्र भी खेल इस दौरान  खेलने बेताब हैं. यह कोशिश वास्तव में  दिलचस्प है. गुजरात की सत्ता से कई सालों से बेदखल कांग्रेस को जहां इस बार गुजरात से काफी उम्मीद है वहीं उसके शुरूआती दाव पैच भाजपा को बैचेन कर रही है. प्रधानमंत्री के गृह राज्य में होने वाले इस चुनाव में उनकी दिलचस्पी स्वाभाविक है वहंी उनकी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है.इससे पूर्व यूपी में चुनाव हो चुका है जहां कांग्रेस व समाजवादी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था. बात यहां कुछ उलटी ही है. वह समय लहर का था लेकिन अब काम देखा जाने वाला भी हो सकता है.वोटरों को रिझाने सारे प्रयास जहां तेज हैं वहीं खीचतान का सिलसिला भी जारी है. मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की वजह से गुजरात के व्यापारियों को घाटा उठान…

भारत में 19 करोड़ लोग रोजाना भूखे पेट सोते हैं

 देश में चार में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। 
 58 फीसदी बच्चों की ग्रोथ 2 साल से कम उम्र में रुक जाती है 
...और दूसरी और वीवीआईपी संस्कृति में जीने वाला एक पूरा कुनबा भी है जो हीरे और सोने से लदा है फिर भी खुश नहीं!
इतनी सुविधाएं कि आंखे फटी रह जाये!


हम भले ही अपने आपको विश्व के बड़े देशों के समकक्ष स्थापित करें लेकिन हकीकत हमही जानते हैं कि हमारे देश का एक बड़ा समुदाय नंगा, भूखा और बहुत गरीब है जबकि मुट्टीभर लोगों के हाथ में बहुत कुछ आ गया है और वह देश की जनता को उंगलियों पर नचाने की ताकत भी रखता हैं. हां हम जिस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं उसमें सत्तासीन कई लोगों की सपंत्ति से दूसरे देशों की तुलना करेंं तो यह उनसे कई गुना है जबकि जिनकी मदद से वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं वे उनके सामने एकदम बौने हैं. आजादी के बाद के वर्षो में ऐसे लोगों की संपत्ति मेंं जो इजाफा हुआ है वह आश्चर्यजनक ,अविश्वसनीय है शायद यही कारण है कि देश में राजनीतिक दलों में घुसने और कुर्सी पाने की होड़ सी मची हुई है.इसमें भी वे लोग हैं जिसके पास अकूट संपत्ति है या जिनके पास मैन पावर है.मौजूदा लोकसभा की ही बात …

आखिर हत्यारें कौन? क्यों मिली निर्दोष को सजा

यह विचित्र बात है कि नौ साल बाद भी हमारे देश की जांच एजेंसिया यह पता नहीं लगा पाई कि बाहर से  बंद बंगले में रह रहे चार लोगों के बीच रह रहे दो व्यक्तियों की सनसनीखेज ढंग से की गई हत्या का  असली मुलजिम कौन हैं.सवाल यह उठता है कि क्या यह मामला भी अब उन पुराने मामलों की तरह गुमनामी में चला जायेगा जिसमें वास्तविक हत्यारों का पता लगाने या साक्ष्य प्रस्तुत करने में एजेंसियां विफल हो गई. कई मामलों में तो वास्तविक हत्यारें छुट्टा घूम रहे होते हैं जबकि डमी या निर्दोष पेश किये गये साक्ष्यों के आधार पर सजा भुगत रहे होते हैं.आरूषी-हेमलाल हत्याकांड में निचली अदालत ने आरूषी के माता पिता को उम्र कैद की सजा सुनाई थी जिसके विरूद्व उनके वकीलों ने हाईकोर्ट  में अपील की और हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में उन्हें बरी कर दिया. इस दौरान जो मानसिक व शारीरिक यातानांए इस परिवार को झेलनी पड़ी उसका जिम्मेदार कौन है? दूसरा प्रशन यह कि अगर आरूषी और हेमलाल की हत्या इन दोनों ने नहीं की तो किसने की? यह अब कभी पता चल पायेगा? कई ऐसे प्रश्न इस फैसले के बाद लोगों के दिमाग में कौद रहे हैं और पुलिस की जांच प्रणाली पर भी उंग…

जनता के मूड पर निर्भर रहेगा अब का चुनाव!

जनता के मूड पर निर्भर रहेगा अब का चुनाव!
इस साल के आखिर तक होने वाला गुजरात विधानसभा का चुनाव यह बतायेगा कि अगले चुनावों में देश की दिशा क्या होगी? क्या भाजपा अगले सालों में सता पर बनी रहेगी? क्या अहमद पटेल की जीत के बाद गुजरात में माहौल बदला है? कांग्रेस इसी उत्साह से मैदान में उतरेगी कि उसे यहां  फिर सत्ता में आसीन होने का मौका मिलेगा. भाजपा- कांग्र्र्रेस के बीच जहां टक्कर होगी वहीं  तीसरी पार्टी के रूप में आम आदमी भी मैदान में उतरकर आगे के लिये अपनी रणनीति व किस्मत दोनो आजमा सकती है. गुजरात विधानसभा चुनाव जहां भाजपा के परफोरर्मेंस की नापझोक करेगा वहीं कांग्रेस को यह संदेश देगा कि उसकी किस्मत में आगे क्या लिखा है. असल में विधानसभा का यह चुनाव न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए भी यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है. दोनों सियासी महारथी इसी राज्य से आते हैं, इसलिए इन्हीं दोनों के कंधों पर गुजरात चुनाव का दारोमदार भी टिका है.वैसे गुजरात का माहौल पिछले वर्षो में बदला है. पटेल आंदोलन को ठीक से हैन्डिल न कर पाने के कारण जहां आनंद…

दंडधारी, चौकीदार, दरोगा से 'पुुलिस तक का सफर कितना सफल?

प्राचीन भारत का स्थानीय शासन मुख्यत:  ग्रामीण पंचायतों पर आधारित था गाँव के न्याय एवं शासन संबंधी कार्य ग्रामिक नामी एक अधिकारी द्वारा संचलित किए जाते थे. इसकी सहायता और निर्देशन ग्राम के वयोवृद्ध करते थे. पुलिस व्यवस्था के विकासक्रम में उस काल के दंडधारी को वर्तमान काल के पुलिस जन के समकक्ष माना जा सकता है यह ग्रामिक राज्य के वेतनभोगी अधिकारी नहीं होते थे वरन् इन्हें ग्राम के व्यक्ति अपने में से चुन लेते थे. ग्रामिणों के ऊपर 5-10 गाँवों की व्यवस्था के लिए गोप एवं लगभग एक चौथाई जनपद की व्यवस्था करने के लिए स्थानिक नामक अधिकारी होते थे.इन निर्वाचित ग्रामीण अधिकारियों द्वारा अपराधों की रोकथाम का कार्य सुचारु रूप से होता था और उनके संरक्षण में जनता अपने व्यापार उद्योग-निर्भय होकर करती थी.हिन्दू काल के बाद सल्तनत और मुगल काल में भी ग्राम पंचायतों और ग्राम के स्थानीय अधिकारियों की परंपरा अक्षुण्ण रही.मुगल काल में ग्राम के मुखिया मालगुजारी एकत्र करने, झगड़ों का निपटारा आदि करने का महत्वपूर्ण कार्य करते थे और निर्माण चौकीदारों की सहायता से ग्राम में शांति की व्यवस्था स्थापित की जाती थी. चौक…